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उत्तर खण्ड · अध्याय 205

निगमबोध की कथा

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206

श्लोक 1 (padma.6.205.1)

शिवशर्मोवाच- एकदाऽत्र महातीर्थे पंके मग्नां पयस्विनीम् । दृष्ट्वा स राक्षसश्रेष्ठस्तामुद्धर्तुं विवेश ह

śivaśarmovāca- ekadā'tra mahātīrthe paṁke magnāṁ payasvinīm dṛṣṭvā sa rākṣasaśreṣṭhastāmuddhartuṁ viveśa ha

शिवशर्मा ने कहा — एक बार यहाँ इस महातीर्थ में कीचड़ में धँसी हुई एक गाय को देखकर, उस राक्षसश्रेष्ठ ने उसे निकालने के लिए प्रवेश किया।

श्लोक 2 (padma.6.205.2)

गोरक्षणे महान्धर्मो रक्षतुः स्वर्गतिर्भवेत् । चिंतयन्निति मध्ये तु सगृहीतोंबुहस्तिना

gorakṣaṇe mahāndharmo rakṣatuḥ svargatirbhavet ciṁtayanniti madhye tu sagṛhītoṁbuhastinā

'गौ-रक्षा महान् धर्म है, रक्षक की स्वर्ग-गति होती है' — ऐसा सोचते हुए ही, बीच में वह जल-गज (मगर) की सूँड़ से पकड़ लिया गया।

श्लोक 3 (padma.6.205.3)

नीतस्तु वारिणोऽधस्ताज्जलपूर्णोदरस्तदा । तत्याज जीवितं सद्यस्तेन पीडितविग्रहः

nītastu vāriṇo'dhastājjalapūrṇodarastadā tatyāja jīvitaṁ sadyastena pīḍitavigrahaḥ

जल के नीचे ले जाया गया, उसका उदर जल से भर गया; तब पीड़ित शरीर वाला वह तत्क्षण प्राण त्याग बैठा।

श्लोक 4 (padma.6.205.4)

दिव्यरूपं समास्थाय विमानमपि ढौकितम् । गणेन प्रहितेनाथ दैवैरिंद्रपुरोगमैः

divyarūpaṁ samāsthāya vimānamapi ḍhaukitam gaṇena prahitenātha daivairiṁdrapurogamaiḥ

उसने तुरन्त दिव्य रूप धारण कर लिया, और इंद्र आदि देवताओं द्वारा भेजे गए गणों के साथ एक विमान भी उसके निकट लाया गया।

श्लोक 5 (padma.6.205.5)

गच्छन्निति मया पृष्टः स निशाचरपुंगवः । मुक्तिदेऽत्र महातीर्थे मृत्युं प्राप्य सदुर्लभे

gacchanniti mayā pṛṣṭaḥ sa niśācarapuṁgavaḥ muktide'tra mahātīrthe mṛtyuṁ prāpya sadurlabhe

इस प्रकार जाते हुए उस निशाचर-श्रेष्ठ से मैंने पूछा — 'मुक्ति देने वाले इस दुर्लभ महातीर्थ में मृत्यु पाकर—'

श्लोक 6 (padma.6.205.6)

कथं देवपदप्राप्तिर्जाता तव महामते । इत्युक्तो मामुवाचेदं वांछासीदत्र मेऽनघ

kathaṁ devapadaprāptirjātā tava mahāmate ityukto māmuvācedaṁ vāṁchāsīdatra me'nagha

'—हे महामते! तुम्हें देव-पद की प्राप्ति कैसे हुई?' ऐसा पूछे जाने पर उसने मुझसे कहा — 'हे निष्पाप! यहाँ मेरी यही इच्छा थी—'

श्लोक 7 (padma.6.205.7)

तस्मिन्गते पुण्यजने स्वर्गं पुण्यवतां पदम् । एकाकिना मया विष्णुः सद्गतिः प्रापितस्तदा

tasmingate puṇyajane svargaṁ puṇyavatāṁ padam ekākinā mayā viṣṇuḥ sadgatiḥ prāpitastadā

जब वह पुण्यजन स्वर्ग को, पुण्यवानों के पद को, चला गया, तब मैंने अकेले ही विष्णु को अपनी सद्गति के रूप में प्राप्त किया।

श्लोक 8 (padma.6.205.8)

गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्जाग्रत्स्नानं कुर्वंश्च नित्यशः । तमेव पुंडरीकाक्षमहं दध्यावनन्यधीः

gacchaṁstiṣṭhansvapanjāgratsnānaṁ kurvaṁśca nityaśaḥ tameva puṁḍarīkākṣamahaṁ dadhyāvananyadhīḥ

चलते, खड़े रहते, सोते, जागते और सदा स्नान करते हुए भी, मैं अनन्य-मन से उन्हीं पुण्डरीकाक्ष (विष्णु) का ध्यान करता रहा।

श्लोक 9 (padma.6.205.9)

हरे तव पदांभोजमहं शरणमागतः । ब्रह्मत्वे च महेशत्वे नेंद्रत्वे मम मानसम्

hare tava padāṁbhojamahaṁ śaraṇamāgataḥ brahmatve ca maheśatve neṁdratve mama mānasam

'हे हरि! मैं आपके चरण-कमलों की शरण में आया हूँ; ब्रह्मत्व में, महेशत्व में अथवा इंद्रत्व में भी मेरा मन नहीं लगता।'

श्लोक 10 (padma.6.205.10)

प्रार्थयन्नित्यहं तात तमेव पुरुषोत्तमम् । उषितोऽत्र महातीर्थे कृत्वा निर्विषयं मनः

prārthayannityahaṁ tāta tameva puruṣottamam uṣito'tra mahātīrthe kṛtvā nirviṣayaṁ manaḥ

'हे तात! सदा उन्हीं पुरुषोत्तम से प्रार्थना करते हुए, मन को विषयरहित करके मैं इस महातीर्थ में निवास करता रहा।'

श्लोक 11 (padma.6.205.11)

विष्णुशर्मोवाच- वसतोऽत्र महातीर्थे मरणं चेत्तवाभवत् । कथं जन्म पुनः प्राप्तं त्वयेति मम संशयः

viṣṇuśarmovāca- vasato'tra mahātīrthe maraṇaṁ cettavābhavat kathaṁ janma punaḥ prāptaṁ tvayeti mama saṁśayaḥ

विष्णुशर्मा ने कहा — 'यदि इस महातीर्थ में निवास करते हुए तुम्हारी मृत्यु हुई, तो तुमने पुनः जन्म कैसे पाया? यही मेरा संशय है।'

श्लोक 12 (padma.6.205.12)

मर्यादां यस्य तीर्थस्य त्यक्त्वापि धनलोभतः । राक्षसान्मरणं प्राप्ताः पथिकस्ते च वाहकाः

maryādāṁ yasya tīrthasya tyaktvāpi dhanalobhataḥ rākṣasānmaraṇaṁ prāptāḥ pathikaste ca vāhakāḥ

'जिस तीर्थ की मर्यादा को धन के लोभ के कारण त्यागकर भी, राक्षस के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए वे पथिक और वाहक—'

श्लोक 13 (padma.6.205.13)

यस्य तीर्थवरस्यास्य जलपानाद्दिवंगताः । तथैव राक्षसोऽप्यस्मिन्नपमृत्युमवाप्य सः

yasya tīrthavarasyāsya jalapānāddivaṁgatāḥ tathaiva rākṣaso'pyasminnapamṛtyumavāpya saḥ

'—इस श्रेष्ठ तीर्थ का जल पीने मात्र से स्वर्ग को प्राप्त हो गए; उसी प्रकार वह राक्षस भी यहाँ अपमृत्यु को प्राप्त होकर—'

श्लोक 14 (padma.6.205.14)

नक्रतः स्वेच्छया स्वर्गं जगाम तव पश्यतः । न नूनं तत्र मरणं जातं यज्जन्म दृश्यते

nakrataḥ svecchayā svargaṁ jagāma tava paśyataḥ na nūnaṁ tatra maraṇaṁ jātaṁ yajjanma dṛśyate

'—मगर से मृत्यु पाकर तुम्हारे देखते-देखते स्वेच्छा से स्वर्ग चला गया। निश्चय ही वहाँ मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि उसका पुनः जन्म दिखाई देता है।'

श्लोक 15 (padma.6.205.15)

नारद उवाच- शिवे निशम्य पुत्रस्य शिवशर्मा शुभं वचः । उवाच पूर्ववृत्तांतं कारणं निजजन्मनः

nārada uvāca- śive niśamya putrasya śivaśarmā śubhaṁ vacaḥ uvāca pūrvavṛttāṁtaṁ kāraṇaṁ nijajanmanaḥ

नारद ने कहा — 'हे शिवे! पुत्र विष्णुशर्मा के शुभ वचन सुनकर शिवशर्मा ने अपने जन्म का पूर्व-वृत्तान्त और कारण बताया।'

श्लोक 16 (padma.6.205.16)

शिवशर्मोवाच- विष्णुशर्मन्शृणुष्वेदं कारणं मम जन्मनः । कथयामि तवाग्रेऽहं श्रुत्वा निःसंशयो भव

śivaśarmovāca- viṣṇuśarmanśṛṇuṣvedaṁ kāraṇaṁ mama janmanaḥ kathayāmi tavāgre'haṁ śrutvā niḥsaṁśayo bhava

शिवशर्मा ने कहा — 'हे विष्णुशर्मन्! मेरे जन्म का यह कारण सुनो; मैं तुम्हारे समक्ष कहता हूँ, सुनकर निःसंशय हो जाओ।'

श्लोक 17 (padma.6.205.17)

एकदा विष्णुपूजायां मयि ध्यानं समास्थिते । दुर्वासाः प्रकृतिक्रोधी ममाश्रममुपागतः

ekadā viṣṇupūjāyāṁ mayi dhyānaṁ samāsthite durvāsāḥ prakṛtikrodhī mamāśramamupāgataḥ

'एक बार, विष्णु-पूजा में मेरे ध्यानस्थ रहते हुए, स्वभाव से क्रोधी दुर्वासा मुनि मेरे आश्रम में आ पहुँचे।'

श्लोक 18 (padma.6.205.18)

तमागतमविज्ञाय विष्णुध्यानपरायणः । तस्थिवांस्तदवस्थोऽहं चिरं तं नामसंस्मरन्

tamāgatamavijñāya viṣṇudhyānaparāyaṇaḥ tasthivāṁstadavastho'haṁ ciraṁ taṁ nāmasaṁsmaran

'विष्णु-ध्यान में तल्लीन होने के कारण उनके आगमन को न जानते हुए, मैं उसी अवस्था में देर तक उन्हीं के नाम का स्मरण करता रहा।'

श्लोक 19 (padma.6.205.19)

समुहूर्तं मुनिः स्थित्वा ममाग्रे क्रोधमूर्छितः । आत्मनात्मानमाहेदमुच्चैरारक्तलोचनः

samuhūrtaṁ muniḥ sthitvā mamāgre krodhamūrchitaḥ ātmanātmānamāhedamuccairāraktalocanaḥ

'मुहूर्त भर मेरे सामने खड़े रहकर, क्रोध से मूर्छित वे मुनि, लाल आँखों वाले होकर, ऊँचे स्वर में स्वयं ही अपने आप से यह कहने लगे—'

श्लोक 20 (padma.6.205.20)

दुर्वासा उवाच- अहो अत्रेरहं पुत्रोऽनसूयागर्भसंभवः । शिवांशो मानुषेणालमवज्ञातोऽमुना भवम्

durvāsā uvāca- aho atrerahaṁ putro'nasūyāgarbhasaṁbhavaḥ śivāṁśo mānuṣeṇālamavajñāto'munā bhavam

दुर्वासा ने कहा — 'अरे! मैं अत्रि का पुत्र, अनसूया के गर्भ से उत्पन्न, शिव का अंश — और इस मनुष्य ने मेरी अवहेलना कर दी!'

श्लोक 21 (padma.6.205.21)

त्रिलोकीराज्यतः शक्रो मया येन प्रपातितः । तं मामपि मनुष्योऽयमवजानाति दुर्मतिः

trilokīrājyataḥ śakro mayā yena prapātitaḥ taṁ māmapi manuṣyo'yamavajānāti durmatiḥ

'जिस मैंने इंद्र को त्रिलोकी के राज्य से गिरा दिया था, उसी मुझे भी यह दुर्बुद्धि मनुष्य तुच्छ समझता है!'

श्लोक 22 (padma.6.205.22)

यो बिभेति न कः सोसि मत्तः कालानलादिव । मुक्त्वा देवत्रयीं लोके यतः सार्हत्तमा मम

yo bibheti na kaḥ sosi mattaḥ kālānalādiva muktvā devatrayīṁ loke yataḥ sārhattamā mama

'तीनों लोकों में, प्रलय-अग्नि के समान मुझसे कौन नहीं डरता? देवत्रयी को छोड़कर संसार में वे ही मेरे लिए सर्वाधिक आदरणीय हैं।'

श्लोक 23 (padma.6.205.23)

यामसौ ध्यायते मूढो देवतां ध्यानमास्थितः । न कथं बोधयत्येनं सेति मूर्त्तिस्थितो यमः

yāmasau dhyāyate mūḍho devatāṁ dhyānamāsthitaḥ na kathaṁ bodhayatyenaṁ seti mūrttisthito yamaḥ

'जिस देवता का यह मूढ़ ध्यान में बैठा हुआ चिन्तन कर रहा है, वह इसे जगाती क्यों नहीं? मानो यम ही इसकी इस मूर्ति में स्थित होकर बैठा है।'

श्लोक 24 (padma.6.205.24)

नूनं नारायणं देवं ध्यायत्येष जगद्गुरुम् । यद्ध्यानामृततृप्तो हि न बाह्यज्ञानवानयम्

nūnaṁ nārāyaṇaṁ devaṁ dhyāyatyeṣa jagadgurum yaddhyānāmṛtatṛpto hi na bāhyajñānavānayam

'निश्चय ही यह जगद्गुरु भगवान् नारायण का ध्यान कर रहा है; उस ध्यान के अमृत से तृप्त होने के कारण ही इसे बाह्य ज्ञान नहीं है।'

श्लोक 25 (padma.6.205.25)

हरिं वा ब्रह्म वा शंभुमन्यं वा ध्यायतामहम् । मयायं सर्वथा दंड्यो मदवज्ञाकरो ह्ययम्

hariṁ vā brahma vā śaṁbhumanyaṁ vā dhyāyatāmaham mayāyaṁ sarvathā daṁḍyo madavajñākaro hyayam

'चाहे वह हरि का ध्यान करे, चाहे ब्रह्मा का, चाहे शंभु का अथवा किसी अन्य का — मेरी अवहेलना करने वाला यह हर हाल में मुझसे दंडनीय है!'

श्लोक 26 (padma.6.205.26)

शिवशर्मोवाच- एवं विचिंतयित्वा स सुमतिं मामबोधयत् । शशाप च विबुद्धं मामितिक्रोधारुणेक्षणः

śivaśarmovāca- evaṁ viciṁtayitvā sa sumatiṁ māmabodhayat śaśāpa ca vibuddhaṁ māmitikrodhāruṇekṣaṇaḥ

शिवशर्मा ने कहा — 'ऐसा विचार कर उन्होंने मुझे, सुमति को, जगाया; और जागते ही क्रोध से लाल नेत्रों वाले उन्होंने मुझे यह शाप दिया—'

श्लोक 27 (padma.6.205.27)

मामवज्ञाय यश्चित्ते ध्यानकाले मनोरथः । कुतस्तेन भवेह्यस्मिन्भविष्यति हि सर्वथा

māmavajñāya yaścitte dhyānakāle manorathaḥ kutastena bhavehyasminbhaviṣyati hi sarvathā

'—मेरी अवहेलना करके ध्यान के समय तुम्हारे मन में जो कामना थी, वही अवश्य ही इस जन्म में तुम्हें प्राप्त होगी।'

श्लोक 28 (padma.6.205.28)

इत्युक्त्वा स यदा तात चलितो मुनिरत्रिजः । तदा मया चरणयोर्गृहीतोभयभीरुणा

ityuktvā sa yadā tāta calito muniratrijaḥ tadā mayā caraṇayorgṛhītobhayabhīruṇā

'हे तात! ऐसा कहकर जब अत्रि-पुत्र मुनि चलने लगे, तब भयभीत होकर मैंने उनके चरण पकड़ लिए।'

श्लोक 29 (padma.6.205.29)

इत्युक्तश्च मुनिश्रेष्ठ क्षम्यतां रुड्विमुच्यताम् । मादृशा न विजानंति सम्यक्कर्म भवादृशाम्

ityuktaśca muniśreṣṭha kṣamyatāṁ ruḍvimucyatām mādṛśā na vijānaṁti samyakkarma bhavādṛśām

'और कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! क्षमा करें, यह शाप वापस लिया जाए; मुझ जैसे लोग आप जैसों के आचरण को भलीभाँति नहीं समझ पाते।'

श्लोक 30 (padma.6.205.30)

शापं त्वं दत्तवान्घोरं सांप्रतं मे निरेनसः । प्रसीद मम नम्रस्य शापांते कुर्वनुग्रहम्

śāpaṁ tvaṁ dattavānghoraṁ sāṁprataṁ me nirenasaḥ prasīda mama namrasya śāpāṁte kurvanugraham

'आपने मुझ निष्पाप को अभी घोर शाप दे दिया है; कृपया प्रसन्न हों और नम्र मुझ पर शाप के अंत में अनुग्रह करें।'

श्लोक 31 (padma.6.205.31)

इत्युक्तः कोपमुत्सृज्य दुर्वासा शीतलोभवत् । किमेतन्नोचितं तात स यतश्चंद्रशेखरः

ityuktaḥ kopamutsṛjya durvāsā śītalobhavat kimetannocitaṁ tāta sa yataścaṁdraśekharaḥ

'ऐसा कहे जाने पर दुर्वासा क्रोध त्यागकर शांत हो गए — क्योंकि वे चंद्रशेखर के भक्त थे — और बोले, हे तात, यह उचित नहीं—'

श्लोक 32 (padma.6.205.32)

उवाचेति समां धीमांस्तं भूत्वा ब्राह्मणोत्तमः । अत्रैव मरणं प्राप्य न भूयो जन्म लप्स्यसे

uvāceti samāṁ dhīmāṁstaṁ bhūtvā brāhmaṇottamaḥ atraiva maraṇaṁ prāpya na bhūyo janma lapsyase

'—यह कहा उस बुद्धिमान् ब्राह्मणश्रेष्ठ ने, शांत होकर — "यहीं मृत्यु पाकर तुम्हें पुनः जन्म नहीं मिलेगा।"'

श्लोक 33 (padma.6.205.33)

इति मामनुगृह्याथ स जगाम दिगंबरः । उषित्वा तद्दिनं तात मया सत्कारपूजितः

iti māmanugṛhyātha sa jagāma digaṁbaraḥ uṣitvā taddinaṁ tāta mayā satkārapūjitaḥ

'ऐसा कहकर मुझ पर अनुग्रह करके वे दिगंबर मुनि चले गए। हे तात! उस दिन वहाँ ठहरकर, मेरे द्वारा सत्कार-पूजित होकर—'

श्लोक 34 (padma.6.205.34)

न मुनेर्भाषितं मिथ्या चिंतयित्वाहमित्यपि

na munerbhāṣitaṁ mithyā ciṁtayitvāhamityapi

'—और यह भी सोचते हुए कि मुनि का वचन मिथ्या नहीं होता—'

श्लोक 35 (padma.6.205.35)

जगाम स्वगृहं चित्ते पश्चात्तापं वहन्निति । अहो मे ध्यायतो नित्यं स तीर्थाश्रमिणस्तथा

jagāma svagṛhaṁ citte paścāttāpaṁ vahanniti aho me dhyāyato nityaṁ sa tīrthāśramiṇastathā

'—मैं पश्चाताप हृदय में लिए अपने घर चला गया, यह सोचते हुए — "अहो! नित्य ध्यान करते हुए भी और तीर्थ-आश्रम में रहते हुए भी—"'

श्लोक 36 (padma.6.205.36)

दर्शनं दुर्लभं जातं श्रीपतेरिह जन्मनि । चातकस्येव मेघस्य शुचौ संतापकारिणि

darśanaṁ durlabhaṁ jātaṁ śrīpateriha janmani cātakasyeva meghasya śucau saṁtāpakāriṇi

'—इस जन्म में श्रीपति का दर्शन दुर्लभ हो गया, जैसे तपते हुए संतापकारी ग्रीष्म में चातक पक्षी के लिए मेघ का दर्शन दुर्लभ होता है।'

श्लोक 37 (padma.6.205.37)

कुतोऽयमागतो मह्यं वैकुंठगतिरोधकः । जनस्य प्रस्थितस्येव जलदो कालवारिमुक्

kuto'yamāgato mahyaṁ vaikuṁṭhagatirodhakaḥ janasya prasthitasyeva jalado kālavārimuk

'यह वैकुंठ-गति में बाधक कहाँ से मुझ पर आ पड़ा — जैसे यात्रा पर निकले हुए मनुष्य के लिए असमय वर्षा करने वाला मेघ बाधक बन जाता है।'

श्लोक 38 (padma.6.205.38)

न दोषोऽस्ति मुनेर्नूनं तस्यैवेच्छाहरेः खलु । सुदर्शनं हि दत्त्वापि ममजन्मांतरं कृतम्

na doṣo'sti munernūnaṁ tasyaivecchāhareḥ khalu sudarśanaṁ hi dattvāpi mamajanmāṁtaraṁ kṛtam

'निश्चय ही मुनि का कोई दोष नहीं है, यह तो निश्चय ही स्वयं हरि की इच्छा है — क्योंकि सुदर्शन देकर भी उन्होंने मेरा एक और जन्म रच दिया।'

श्लोक 39 (padma.6.205.39)

मया संसारभीतेन ग्राह्यं पादांबुजंहरेः । निदाघातपतप्तेन पथिकेनेव पादपः

mayā saṁsārabhītena grāhyaṁ pādāṁbujaṁhareḥ nidāghātapataptena pathikeneva pādapaḥ

'संसार से भयभीत मुझे हरि के चरण-कमल का ही आश्रय लेना चाहिए — जैसे ग्रीष्म की धूप से संतप्त पथिक वृक्ष की छाया का आश्रय लेता है।'

श्लोक 40 (padma.6.205.40)

किं धनापत्ययोषिद्भिरनित्यैश्चान्यबंधुभिः । गोविंदपरमानंद रामेति ममजल्पतः

kiṁ dhanāpatyayoṣidbhiranityaiścānyabaṁdhubhiḥ goviṁdaparamānaṁda rāmeti mamajalpataḥ

'मुझे, जो केवल "गोविंद, परमानंद, राम" जपता हूँ, धन, संतान, पत्नी और अन्य अनित्य बंधुओं से क्या प्रयोजन?'

श्लोक 41 (padma.6.205.41)

उदासीनवदासीनः कुंटुबेषु हरिं भजन् । प्रारब्धमेव भोक्ष्यामि कर्माण्यन्यान्यतर्जयन्

udāsīnavadāsīnaḥ kuṁṭubeṣu hariṁ bhajan prārabdhameva bhokṣyāmi karmāṇyanyānyatarjayan

'परिवार के बीच उदासीन-सा रहकर, हरि का भजन करते हुए, मैं केवल प्रारब्ध कर्म का ही भोग करूँगा, अन्य कर्मों की उपेक्षा करते हुए।'

श्लोक 42 (padma.6.205.42)

चिंतयन्नित्यहं तात कियद्भिर्वासरैरहम् । प्राप्तवान्स्वगृहं स्नात्वा हरिपादोदकांतरे

ciṁtayannityahaṁ tāta kiyadbhirvāsarairaham prāptavānsvagṛhaṁ snātvā haripādodakāṁtare

'हे तात! ऐसा सोचते हुए न जाने कितने दिनों में मैं हरि के चरणोदक में स्नान करके अपने घर पहुँचा।'

श्लोक 43 (padma.6.205.43)

पितुर्मरणमाख्यातं मात्रे बंधुभ्य एव च । श्रुत्वा तेऽपि शुचं चक्रुर्नाविंदन्निममस्थिरम्

piturmaraṇamākhyātaṁ mātre baṁdhubhya eva ca śrutvā te'pi śucaṁ cakrurnāviṁdannimamasthiram

'पिता की मृत्यु का समाचार माता और बंधुओं को सुनाया गया। सुनकर वे भी शोकाकुल हुए, किंतु इस जगत् की अनित्यता को स्थिर रूप से नहीं समझ सके।'

श्लोक 44 (padma.6.205.44)

सत्यलोकादि लोकेषु निस्पृहोऽहं गृहे वसन् । मरणं प्राप्तवान्कूले गंगाया मुनिसेविते

satyalokādi lokeṣu nispṛho'haṁ gṛhe vasan maraṇaṁ prāptavānkūle gaṁgāyā munisevite

'सत्यलोक आदि लोकों से भी निस्पृह होकर, घर में रहते हुए ही, मुनियों द्वारा सेवित गंगा-तट पर मुझे मृत्यु प्राप्त हुई।'

श्लोक 45 (padma.6.205.45)

मुनेर्दुर्वाससः शापाज्जातोऽहं वैष्णवे कुले । मरणं चात्र सत्तीर्थे लब्ध्वा प्राप्स्ये हरेः पदम्

munerdurvāsasaḥ śāpājjāto'haṁ vaiṣṇave kule maraṇaṁ cātra sattīrthe labdhvā prāpsye hareḥ padam

'मुनि दुर्वासा के शाप से मैं वैष्णव कुल में जन्मा; और अब इस सत्तीर्थ में मृत्यु पाकर मैं हरि के परमधाम को प्राप्त करूँगा।'

श्लोक 46 (padma.6.205.46)

नारद उवाच- एवं सुराचार्यविनिर्मिते तदा तीर्थे महाभाग पुराकृतानि तौ । द्विजोत्तमौ प्रोच्य मिथः सुतस्थतुर्विचिंतयंतौ हरिपादपल्लवम्

nārada uvāca- evaṁ surācāryavinirmite tadā tīrthe mahābhāga purākṛtāni tau dvijottamau procya mithaḥ sutasthaturviciṁtayaṁtau haripādapallavam

नारद ने कहा — 'हे महाभाग! इस प्रकार देवगुरु द्वारा निर्मित उस तीर्थ में, वे दोनों द्विजश्रेष्ठ अपने-अपने पूर्वजन्म के वृत्तांत एक-दूसरे को सुनाकर, हरि के चरण-कमल का ध्यान करते हुए मौन बैठ गए।'

श्लोक 47 (padma.6.205.47)

विचिंतयंतौ हरिमब्जलोचनं चतुर्भुजं नीरदनीलविग्रहम् । निजायुधालंकरणावभासितं स्मृत्वात्र सारूप्यमवापतुर्हरेः

viciṁtayaṁtau harimabjalocanaṁ caturbhujaṁ nīradanīlavigraham nijāyudhālaṁkaraṇāvabhāsitaṁ smṛtvātra sārūpyamavāpaturhareḥ

'कमल-नेत्र, चतुर्भुज, मेघ के समान श्याम वर्ण वाले तथा अपने आयुधों के अलंकरण से देदीप्यमान हरि का ध्यान करते हुए, उन दोनों ने वहीं उनकी सारूप्य-मुक्ति प्राप्त कर ली।'

श्लोक 48 (padma.6.205.48)

यस्य क्षेत्रमिमं पुण्यमिंद्रप्रस्थाख्यमुत्तमम् । तस्योपाख्यानमाख्यातं फलमस्य शिवे शृणु

yasya kṣetramimaṁ puṇyamiṁdraprasthākhyamuttamam tasyopākhyānamākhyātaṁ phalamasya śive śṛṇu

'हे शिवे! जिनका यह पुण्य क्षेत्र इंद्रप्रस्थ नामक उत्तम स्थान है, उनका यह उपाख्यान कहा गया; अब इसका फल सुनो।'

श्लोक 49 (padma.6.205.49)

गंगास्नानेन यत्पुण्यं कन्यादानोद्भवं च यत् । श्रवणादस्य तत्पुण्यं श्रद्धया लभते नरः

gaṁgāsnānena yatpuṇyaṁ kanyādānodbhavaṁ ca yat śravaṇādasya tatpuṇyaṁ śraddhayā labhate naraḥ

'गंगा-स्नान से जो पुण्य मिलता है और कन्यादान से जो पुण्य उत्पन्न होता है, वही पुण्य मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसे सुनने मात्र से प्राप्त कर लेता है।'

श्लोक 50 (padma.6.205.50)

पुत्रे जाते तु गोदानात्सिंहगे च बृहस्पतौ । गोदावरीजले स्नानाद्यत्फलं भुवि जायते

putre jāte tu godānātsiṁhage ca bṛhaspatau godāvarījale snānādyatphalaṁ bhuvi jāyate

'पुत्र जन्म पर गोदान से, तथा बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर गोदावरी के जल में स्नान से, भूमि पर जो फल प्राप्त होता है—'

श्लोक 51 (padma.6.205.51)

तत्फलं श्रवणादस्य जायते नात्र संशयः । अतस्तीर्थोत्तमादन्यत्तीर्थं नास्त्यखिलार्थदम् । यस्मिन्मरणतो नूनं तिर्यंचोऽपि चतुर्भुजाः

tatphalaṁ śravaṇādasya jāyate nātra saṁśayaḥ atastīrthottamādanyattīrthaṁ nāstyakhilārthadam yasminmaraṇato nūnaṁ tiryaṁco'pi caturbhujāḥ

'—वही फल इसके श्रवण मात्र से प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है। अतः इस श्रेष्ठ तीर्थ से बढ़कर सभी अर्थों को देने वाला अन्य कोई तीर्थ नहीं है, जिसमें मरने पर पशु-पक्षी भी निश्चय ही चतुर्भुज हो जाते हैं।'

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206