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उत्तर खण्ड · अध्याय 211

चंडक नाई की गति

अध्याय 210अध्याय-सूचीअध्याय 212

श्लोक 1 (padma.6.211.1)

नारद उवाच- शिवे तवपुरः सर्वं मुकंदाख्यानमुत्तमम् । कथितं चंडकस्यापि नापितस्य शृणुष्व मे

nārada uvāca- śive tavapuraḥ sarvaṁ mukaṁdākhyānamuttamam kathitaṁ caṁḍakasyāpi nāpitasya śṛṇuṣva me

नारद ने कहा — 'हे शिवे! तुम्हारे समक्ष मुकुंद का यह संपूर्ण उत्तम आख्यान कहा गया; अब मुझसे चंडक नाई की भी कथा सुनो।'

श्लोक 2 (padma.6.211.2)

यस्मिन्दिने मुकुंदस्तु ब्राह्मणस्तेन घातितः । चंडकेन तदा राजंस्तद्वृत्तं नागरैः श्रुतम्

yasmindine mukuṁdastu brāhmaṇastena ghātitaḥ caṁḍakena tadā rājaṁstadvṛttaṁ nāgaraiḥ śrutam

'हे राजन्! जिस दिन ब्राह्मण मुकुंद उस चंडक द्वारा मारा गया, उसी दिन यह वृत्तांत नगरवासियों ने सुना।'

श्लोक 3 (padma.6.211.3)

श्रुत्वा तैस्तन्नृपस्याग्रे निवेदितमिति स्फुटम् । नागरा ऊचुः । चंडकेन हतो राजन्मुकुंदो ब्राह्मणोत्तमः

śrutvā taistannṛpasyāgre niveditamiti sphuṭam nāgarā ūcuḥ caṁḍakena hato rājanmukuṁdo brāhmaṇottamaḥ

'सुनकर उन्होंने यह स्पष्ट रूप से राजा के समक्ष निवेदन किया। नगरवासियों ने कहा — "हे राजन्! चंडक द्वारा ब्राह्मणश्रेष्ठ मुकुंद मारा गया है—"'

श्लोक 4 (padma.6.211.4)

नीतं च तद्धनं भूरि यद्युक्तं तद्विधीयताम् । त्वमस्माकं प्रजानां हि रक्षकः शासकोऽसताम्

nītaṁ ca taddhanaṁ bhūri yadyuktaṁ tadvidhīyatām tvamasmākaṁ prajānāṁ hi rakṣakaḥ śāsako'satām

'"—और उसका बहुत सा धन भी ले जाया गया है। जो उचित हो वह कीजिए; आप ही हम प्रजाजनों के रक्षक और दुष्टों के दंडदाता हैं।"'

श्लोक 5 (padma.6.211.5)

नारद उवाच- इत्याकर्ण्य स भूपालो मंत्रिणं पार्श्ववर्तिनम् । उवाच कोपरक्ताक्षः किमेभिः कथ्यते शृणु

nārada uvāca- ityākarṇya sa bhūpālo maṁtriṇaṁ pārśvavartinam uvāca koparaktākṣaḥ kimebhiḥ kathyate śṛṇu

नारद ने कहा — 'यह सुनकर वह राजा क्रोध से लाल नेत्रों वाला होकर, अपने पास खड़े मंत्री से बोला — "सुनो, ये क्या कह रहे हैं?"'

श्लोक 6 (padma.6.211.6)

शीघ्रमानयतं पापं नोचेत्त्वां घातयाम्यहम् । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ पापिष्ठ साधूनां शं विधीयताम्

śīghramānayataṁ pāpaṁ nocettvāṁ ghātayāmyaham uttiṣṭhottiṣṭha pāpiṣṭha sādhūnāṁ śaṁ vidhīyatām

'"उस पापी को शीघ्र लाओ, नहीं तो मैं तुम्हें ही मरवा डालूँगा। उठो, उठो, हे पापिष्ठ! साधुओं का कल्याण किया जाए।"'

श्लोक 7 (padma.6.211.7)

पीड्यंते विषये यस्य प्रजा दस्युभिरुल्बणैः । स नृपो नरकं याति तेभ्यस्ताश्चेन्न रक्षति

pīḍyaṁte viṣaye yasya prajā dasyubhirulbaṇaiḥ sa nṛpo narakaṁ yāti tebhyastāścenna rakṣati

'"जिस राजा के राज्य में प्रजा प्रचंड डाकुओं से पीड़ित होती है, वह राजा नरक में जाता है, यदि वह उन्हें उनसे नहीं बचाता।"'

श्लोक 8 (padma.6.211.8)

नारद उवाच- निशम्येति वचो राज्ञः सचिवः स शिवे नृपः । वेगेन हयमारुह्य पदातिशतसंयुतः

nārada uvāca- niśamyeti vaco rājñaḥ sacivaḥ sa śive nṛpaḥ vegena hayamāruhya padātiśatasaṁyutaḥ

नारद ने कहा — 'हे शिवे! राजा का यह वचन सुनकर, वह मंत्री शीघ्रता से घोड़े पर सवार होकर, सौ पैदल सैनिकों के साथ—'

श्लोक 9 (padma.6.211.9)

ययौ गृहे मुकुंदस्य तस्य बंधूनपृच्छत । मुकुंदः केन निहतः सत्यं ब्रूत ममाग्रतः

yayau gṛhe mukuṁdasya tasya baṁdhūnapṛcchata mukuṁdaḥ kena nihataḥ satyaṁ brūta mamāgrataḥ

'—मुकुंद के घर गया, और उसके बंधुजनों से पूछा — "मुकुंद किसके द्वारा मारा गया? मेरे सामने सत्य कहो।"'

श्लोक 10 (padma.6.211.10)

तं पापं निहनिष्यामि शासनाद्भूपतेरहम् । नारद उवाच- श्रुत्वेति मंत्रिणो वाक्यं प्रत्यूचुर्विप्रबांधवाः

taṁ pāpaṁ nihaniṣyāmi śāsanādbhūpateraham nārada uvāca- śrutveti maṁtriṇo vākyaṁ pratyūcurviprabāṁdhavāḥ

'"मैं राजा की आज्ञा से उस पापी का वध करूँगा।"' नारद ने कहा — 'मंत्री का यह वचन सुनकर ब्राह्मण-बंधुओं ने उत्तर दिया।'

श्लोक 11 (padma.6.211.11)

विप्रबांधवा ऊचुः - चंडकेन हतो मंत्रिन्मुकुंदो नापितेन हि । इदं पलायमानस्य तस्योष्णीषं पपात वै

viprabāṁdhavā ūcuḥ - caṁḍakena hato maṁtrinmukuṁdo nāpitena hi idaṁ palāyamānasya tasyoṣṇīṣaṁ papāta vai

ब्राह्मण-बंधुओं ने कहा — 'हे मंत्रिन्! मुकुंद निश्चय ही चंडक नाई के द्वारा मारा गया है; भागते हुए उसकी यह पगड़ी गिरी थी।'

श्लोक 12 (padma.6.211.12)

दृष्टः स्वचक्षुषा वध्वा मुकुंदस्यैव सोघकृत् । किं कुर्मस्तेन पापेन मज्जिताः शोकसागरे

dṛṣṭaḥ svacakṣuṣā vadhvā mukuṁdasyaiva soghakṛt kiṁ kurmastena pāpena majjitāḥ śokasāgare

'यह पाप-कर्म करने वाला मुकुंद की बहू द्वारा स्वयं अपनी आँखों से देखा गया। उस पापी के कारण शोक-सागर में डूबे हुए हम क्या करें?'

श्लोक 13 (padma.6.211.13)

नारद उवाच - इत्याकर्ण्य वचस्तेषां बंधूनां ब्राह्मणस्य हि । स मंत्री तस्य पापस्य नापितस्य गृहं ययौ

nārada uvāca - ityākarṇya vacasteṣāṁ baṁdhūnāṁ brāhmaṇasya hi sa maṁtrī tasya pāpasya nāpitasya gṛhaṁ yayau

नारद ने कहा — 'उस ब्राह्मण के बंधुओं के इस वचन को सुनकर, वह मंत्री उस पापी नाई के घर गया।'

श्लोक 14 (padma.6.211.14)

अश्वादुत्तीर्य तरसा तद्गृहं स्वयमाविशत् । कतिभिः पत्तिभिः सार्द्धं शयानं च ददर्श ह

aśvāduttīrya tarasā tadgṛhaṁ svayamāviśat katibhiḥ pattibhiḥ sārddhaṁ śayānaṁ ca dadarśa ha

'घोड़े से शीघ्र उतरकर वह स्वयं उसके घर में घुसा, और कुछ सैनिकों सहित उसे सोया हुआ देखा।'

श्लोक 15 (padma.6.211.15)

पत्तयस्तु तदाज्ञप्ताः केशेष्वाकृष्य तत्क्षणात् । तल्पादुत्थापयामासुस्तं पापं नापिताधमम्

pattayastu tadājñaptāḥ keśeṣvākṛṣya tatkṣaṇāt talpādutthāpayāmāsustaṁ pāpaṁ nāpitādhamam

'उसकी आज्ञा से सैनिकों ने तुरंत उस पापी, अधम नाई को केशों से पकड़कर शय्या से उठा दिया।'

श्लोक 16 (padma.6.211.16)

किं किमित्येव संजल्पन्नेत्रे उन्मीलयत्यसौ । यावत्स नापितः पापस्तावत्तं ददृशे पुरः

kiṁ kimityeva saṁjalpannetre unmīlayatyasau yāvatsa nāpitaḥ pāpastāvattaṁ dadṛśe puraḥ

'"क्या हुआ, क्या हुआ" ऐसा बड़बड़ाते हुए उसने आँखें खोलीं; और ज्यों ही उस पापी नाई ने देखा, त्यों ही उसे अपने सामने पाया।'

श्लोक 17 (padma.6.211.17)

संस्मरंतं निजं कर्म रात्रौ यत्कृतवानघम् । अधोमुखः क्षणं तस्थौ पश्यन्मूर्ध्नि स्थितं यमम्

saṁsmaraṁtaṁ nijaṁ karma rātrau yatkṛtavānagham adhomukhaḥ kṣaṇaṁ tasthau paśyanmūrdhni sthitaṁ yamam

'रात्रि में किया गया अपना ही वह पाप-कर्म स्मरण करते हुए, वह क्षण भर सिर झुकाए खड़ा रहा, मानो अपने सिर पर साक्षात् यम को खड़ा देख रहा हो।'

श्लोक 18 (padma.6.211.18)

ग्राहयित्वा च सचिवस्तं पापं च स्वपत्तिभिः । निनाय नृपतेः पार्श्वमिति चोवाच भूपतिम्

grāhayitvā ca sacivastaṁ pāpaṁ ca svapattibhiḥ nināya nṛpateḥ pārśvamiti covāca bhūpatim

'मंत्री ने उस पापी को अपने सैनिकों से बंदी बनवाकर राजा के समीप ले जाकर, राजा से यह कहा।'

श्लोक 19 (padma.6.211.19)

आनीतो ब्रह्महा राजन्नयं चंडक नापितः । यदाज्ञापयसि स्वामिंस्तरसा तत्करोम्यहम्

ānīto brahmahā rājannayaṁ caṁḍaka nāpitaḥ yadājñāpayasi svāmiṁstarasā tatkaromyaham

'"हे राजन्! यह ब्रह्महत्यारा चंडक नाई लाया गया है। हे स्वामिन्! जो आप आज्ञा दें, वह मैं तुरंत करता हूँ।"'

श्लोक 20 (padma.6.211.20)

राजोवाच- धर्मज्ञ सचिवश्रेष्ठ शृणु त्वं वचनं मम । इयं सरिद्वरा युष्मंश्चंद्रभागात्र निर्मलाः

rājovāca- dharmajña sacivaśreṣṭha śṛṇu tvaṁ vacanaṁ mama iyaṁ saridvarā yuṣmaṁścaṁdrabhāgātra nirmalāḥ

राजा ने कहा — 'हे धर्मज्ञ मंत्रिश्रेष्ठ! मेरी बात सुनो। यहाँ की यह श्रेष्ठ, निर्मल चंद्रभागा नदी—'

श्लोक 21 (padma.6.211.21)

त्यजंति येऽत्र वै प्राणाल्लँभंते ते सुरास्पदम् । अत एष न हंतव्यः पापात्मा ह्यत्र नापितः

tyajaṁti ye'tra vai prāṇālla~bhaṁte te surāspadam ata eṣa na haṁtavyaḥ pāpātmā hyatra nāpitaḥ

'—यहाँ जो प्राण त्यागते हैं, वे देवलोक को प्राप्त करते हैं। अतः इस पापात्मा नाई को यहाँ नहीं मारा जाना चाहिए।'

श्लोक 22 (padma.6.211.22)

पंचकोशांतरे ह्यस्या मर्यादाया बहिर्यदि । नरकान्दारुणान्ह्येष ब्रह्महा यातु मा चिरम्

paṁcakośāṁtare hyasyā maryādāyā bahiryadi narakāndāruṇānhyeṣa brahmahā yātu mā ciram

'यदि इसकी मर्यादा से पाँच कोस के बाहर ले जाया जाए, तो यह ब्रह्महत्यारा बिना विलंब भयंकर नरकों को जाए।'

श्लोक 23 (padma.6.211.23)

नारदोवाच- इत्युक्तस्तेन वै राज्ञा स राजन्मंत्रिसत्तमः । श्वपचान्प्रेरयामास हंतुं तं भूपशासनात्

nāradovāca- ityuktastena vai rājñā sa rājanmaṁtrisattamaḥ śvapacānprerayāmāsa haṁtuṁ taṁ bhūpaśāsanāt

नारद ने कहा — 'हे राजन्! राजा के ऐसा कहने पर, वह श्रेष्ठ मंत्री राजा की आज्ञा से उसे मारने के लिए चांडालों को भेजा।'

श्लोक 24 (padma.6.211.24)

श्वपचास्ते तमुन्नीय चंद्रभागापरे तटे । योजनद्वयभूभागं चिच्छिदुस्तस्य मस्तकम्

śvapacāste tamunnīya caṁdrabhāgāpare taṭe yojanadvayabhūbhāgaṁ cicchidustasya mastakam

'उन चांडालों ने उसे चंद्रभागा के दूसरे तट पर, दो योजन दूर की भूमि में ले जाकर उसका सिर काट डाला।'

श्लोक 25 (padma.6.211.25)

स पापो मारवे देशे सर्पोऽभूत्कालविग्रहः । धवकोटरमध्यस्थो विषज्वालाकराननः

sa pāpo mārave deśe sarpo'bhūtkālavigrahaḥ dhavakoṭaramadhyastho viṣajvālākarānanaḥ

'वह पापी मरुभूमि में एक सर्प हो गया, मानो साक्षात् काल का शरीर हो, धव वृक्ष की खोह में रहने वाला, विषज्वालायुक्त मुख वाला।'

श्लोक 26 (padma.6.211.26)

स शुष्को धववृक्षस्तु तस्य फूत्कारवह्निना । तथा तपनतापेन सरसोऽपि यथा ह्रदः

sa śuṣko dhavavṛkṣastu tasya phūtkāravahninā tathā tapanatāpena saraso'pi yathā hradaḥ

'वह धव वृक्ष उसके फुफकार की अग्नि से वैसे ही सूख गया, जैसे सूर्य के ताप से भरा हुआ सरोवर भी सूख जाता है।'

श्लोक 27 (padma.6.211.27)

गमनात्तस्य पापस्य सर्वतो वृक्षमूषरम् । उच्छिद्य तृणजातादि जातं पश्वहितं तदा

gamanāttasya pāpasya sarvato vṛkṣamūṣaram ucchidya tṛṇajātādi jātaṁ paśvahitaṁ tadā

'उस पापी के विचरण मात्र से चारों ओर की वृक्ष-भूमि ऊसर हो गई, घास आदि सब नष्ट होकर पशुओं के लिए भी हानिकारक हो गई।'

श्लोक 28 (padma.6.211.28)

तत्र जातु समायातः सार्थो दक्षिणदेशतः । नारायणाश्रमं गच्छन्बदर्याख्यं शिवे नृप

tatra jātu samāyātaḥ sārtho dakṣiṇadeśataḥ nārāyaṇāśramaṁ gacchanbadaryākhyaṁ śive nṛpa

'हे शिवे, हे राजन्! वहाँ एक बार दक्षिण देश से एक यात्री-दल आया, जो बदरी नामक नारायण के आश्रम की ओर जा रहा था।'

श्लोक 29 (padma.6.211.29)

तत्रैको ब्राह्मणः कश्चित्सार्थेसंमीलितः पथि । निश्छिद्रां काष्ठमंजूषां पितृमात्रस्थिसंयुताम्

tatraiko brāhmaṇaḥ kaścitsārthesaṁmīlitaḥ pathi niśchidrāṁ kāṣṭhamaṁjūṣāṁ pitṛmātrasthisaṁyutām

'उनमें मार्ग में एक ब्राह्मण उस यात्री-दल से मिल गया था, जो अपने माता-पिता की अस्थियों से युक्त एक छिद्ररहित काष्ठ-मंजूषा—'

श्लोक 30 (padma.6.211.30)

स्कंधेन धारयन्याति तानि पातयितुं नृप । गंगांभसि महाभाग पापिनामपि कामदे

skaṁdhena dhārayanyāti tāni pātayituṁ nṛpa gaṁgāṁbhasi mahābhāga pāpināmapi kāmade

'—कंधे पर धारण कर, हे राजन्, हे महाभाग, पापियों को भी कामना देने वाली गंगा के जल में उन्हें प्रवाहित करने जा रहा था।'

श्लोक 31 (padma.6.211.31)

सोऽप्यागतस्तत्र वने यत्रास्ति स भुजंगमः । विविक्ते क्षिप्य मंजूषां शलाकालोहनिर्मिताम्

so'pyāgatastatra vane yatrāsti sa bhujaṁgamaḥ vivikte kṣipya maṁjūṣāṁ śalākālohanirmitām

'वह भी उसी वन में आ पहुँचा जहाँ वह सर्प रहता था; एकांत स्थान में उसने लोहे की सलाई से बनी मंजूषा रख दी।'

श्लोक 32 (padma.6.211.32)

अथागत्य भुजंगोऽसौ शलाकां फणयाघटत् । किंचिदुद्धाटितायां स मंजूषायां समाविशत्

athāgatya bhujaṁgo'sau śalākāṁ phaṇayāghaṭat kiṁciduddhāṭitāyāṁ sa maṁjūṣāyāṁ samāviśat

'तब वह सर्प आकर अपने फण से सलाई से टकराया; मंजूषा कुछ खुल जाने पर वह उसमें घुस गया।'

श्लोक 33 (padma.6.211.33)

पुनः शलाका स्वंस्थानमागताथ स कुंडली । तत्रैव तस्थौ निश्चेष्टो मंजूषायां विषोल्बणः

punaḥ śalākā svaṁsthānamāgatātha sa kuṁḍalī tatraiva tasthau niśceṣṭo maṁjūṣāyāṁ viṣolbaṇaḥ

'फिर सलाई अपने स्थान पर वापस आ गई, और वह विषैला, कुंडली मारे हुआ सर्प उसी मंजूषा में निश्चेष्ट होकर रह गया।'

श्लोक 34 (padma.6.211.34)

अथ प्रभाते सर्वे ते चेलुः स्थानात्ततो नृप । ब्राह्मणः सोऽपि मंजूषां कंबलेन समावृताम्

atha prabhāte sarve te celuḥ sthānāttato nṛpa brāhmaṇaḥ so'pi maṁjūṣāṁ kaṁbalena samāvṛtām

'फिर प्रातःकाल हे राजन्! वे सब उस स्थान से चल पड़े; और वह ब्राह्मण भी उस मंजूषा को कंबल से ढँककर—'

श्लोक 35 (padma.6.211.35)

कृत्वा शिरसि राजेंद्र चचाल प्रति जाह्नवीम् । कतिभिर्वासरैः सार्थः संप्राप्तस्तीर्थगामिनाम्

kṛtvā śirasi rājeṁdra cacāla prati jāhnavīm katibhirvāsaraiḥ sārthaḥ saṁprāptastīrthagāminām

'—हे राजेंद्र! सिर पर रखकर गंगा की ओर चल पड़ा; कुछ दिनों में वह तीर्थ-यात्रियों का दल पहुँच गया—'

श्लोक 36 (padma.6.211.36)

इहैव कोशलायां वै पुनीतायां महीपते । अथ शीतातुरो विप्रः कंबलं चोदघाटयत्

ihaiva kośalāyāṁ vai punītāyāṁ mahīpate atha śītāturo vipraḥ kaṁbalaṁ codaghāṭayat

'—यहीं इस पवित्र कोशला में, हे महीपते! तब शीत से व्याकुल हुए उस ब्राह्मण ने कंबल को खोला—'

श्लोक 37 (padma.6.211.37)

मंजूषावरणं राजन्तत्रायोध्यातटे शुभे । सोऽपि सर्पो निराहारो लब्ध्वा मारुतभोजनम्

maṁjūṣāvaraṇaṁ rājantatrāyodhyātaṭe śubhe so'pi sarpo nirāhāro labdhvā mārutabhojanam

'—मंजूषा के ढक्कन को, हे राजन्, वहाँ अयोध्या के शुभ तट पर; और वह सर्प भी, बिना आहार के, केवल वायु का भक्षण करता हुआ—'

श्लोक 38 (padma.6.211.38)

निश्चक्राम बहिस्तस्मादुत्क्षेप्य सुशलाकिकाम् । तं निःसृतं समालोक्य सर्प्प सर्प इति क्रुधा

niścakrāma bahistasmādutkṣepya suśalākikām taṁ niḥsṛtaṁ samālokya sarppa sarpa iti krudhā

'—उस सुंदर सलाई को ऊपर उठाकर बाहर निकल आया। उसे निकलते देखकर लोग क्रोध से "सर्प, सर्प" कहते हुए—'

श्लोक 39 (padma.6.211.39)

व्याहरंतो जनाः सर्वे लोष्टहस्ताः समभ्ययुः । यावत्पलायते सर्पस्तावदेकेन घातितः

vyāharaṁto janāḥ sarve loṣṭahastāḥ samabhyayuḥ yāvatpalāyate sarpastāvadekena ghātitaḥ

'—सब लोग हाथों में मिट्टी के ढेले लिए दौड़ पड़े; और जब तक वह सर्प भागता, तब तक किसी एक ने उसे मार गिराया।'

श्लोक 40 (padma.6.211.40)

तत्याज स तदा प्राणान्पश्यतां तीर्थगामिनाम् । त्यक्त्वा भुजंगदेहं स देवत्वं प्राप दुर्लभम्

tatyāja sa tadā prāṇānpaśyatāṁ tīrthagāminām tyaktvā bhujaṁgadehaṁ sa devatvaṁ prāpa durlabham

'उसने तब तीर्थयात्रियों के देखते-देखते प्राण त्याग दिए; और सर्प-देह त्यागकर उसने दुर्लभ देवत्व प्राप्त किया।'

श्लोक 41 (padma.6.211.41)

दिव्यं विमानमारुह्य प्रोवाचेदं जनानि ह । सर्प उवाच- भो दाक्षिणात्याः शृणुत ब्राह्मणा वचनं मम

divyaṁ vimānamāruhya provācedaṁ janāni ha sarpa uvāca- bho dākṣiṇātyāḥ śṛṇuta brāhmaṇā vacanaṁ mama

'दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर उसने लोगों से यह कहा। सर्प ने कहा — "हे दाक्षिणात्य ब्राह्मणो! मेरी बात सुनो।"'

श्लोक 42 (padma.6.211.42)

पुरा चंडकनामाहं नापितो ब्रह्महाधमः । ब्रह्महत्याप्रदोषेण सर्पआसं मरुस्थले

purā caṁḍakanāmāhaṁ nāpito brahmahādhamaḥ brahmahatyāpradoṣeṇa sarpaāsaṁ marusthale

'"पहले मैं चंडक नामक ब्रह्महत्यारा अधम नाई था; उसी ब्रह्महत्या के दोष से मैं मरुभूमि में सर्प हो गया।"'

श्लोक 43 (padma.6.211.43)

भुक्त्वा नरकदुःखानि वर्षाणां लक्षपंचकम् । अतीतं सर्पयोनौ मे वर्षाणामयुतद्वयम्

bhuktvā narakaduḥkhāni varṣāṇāṁ lakṣapaṁcakam atītaṁ sarpayonau me varṣāṇāmayutadvayam

'"पाँच लाख वर्षों तक नरक के दुःख भोगकर, फिर बीस हजार वर्ष मुझे सर्प-योनि में बीते।"'

श्लोक 44 (padma.6.211.44)

तीर्थस्यास्य प्रसादेन प्राप्तं देवत्वमुत्तमम् । तस्मादिदं न वै त्याज्यं तीर्थं वै कोशलाभिधम् । सर्वार्थदं यतो नाकः प्राप्तः पापीयसा मया

tīrthasyāsya prasādena prāptaṁ devatvamuttamam tasmādidaṁ na vai tyājyaṁ tīrthaṁ vai kośalābhidham sarvārthadaṁ yato nākaḥ prāptaḥ pāpīyasā mayā

'"इस तीर्थ की कृपा से मुझे उत्तम देवत्व प्राप्त हुआ है; अतः यह कोशला नामक सर्वार्थदायी तीर्थ कभी त्यागने योग्य नहीं है — क्योंकि मुझ जैसे पापी को भी यहाँ स्वर्ग प्राप्त हुआ।"'

श्लोक 45 (padma.6.211.45)

नारद उवाच- एवं स नापितः पापो योनिं प्राप्य विनिंदिताम् । जगाम द्यां विमानस्थस्तीर्थस्यास्य प्रसादतः

nārada uvāca- evaṁ sa nāpitaḥ pāpo yoniṁ prāpya viniṁditām jagāma dyāṁ vimānasthastīrthasyāsya prasādataḥ

नारद ने कहा — 'इस प्रकार वह पापी नाई निंदित योनि पाकर भी, इस तीर्थ की कृपा से विमानस्थ होकर स्वर्ग को चला गया।'

श्लोक 46 (padma.6.211.46)

ते दाक्षिणात्या यतयो भूत्वा तत्रैव तीर्थके । ऊषुर्गोविंदपादाब्ज मानसा दृष्टवैभवे

te dākṣiṇātyā yatayo bhūtvā tatraiva tīrthake ūṣurgoviṁdapādābja mānasā dṛṣṭavaibhave

'वे दाक्षिणात्य तीर्थयात्री, उसका ऐश्वर्य देखकर, वहीं तपस्वी बनकर, मन में गोविंद के चरण-कमल का ध्यान करते हुए वहीं रह गए।'

श्लोक 47 (padma.6.211.47)

माहात्म्यमस्य तीर्थस्य दृष्ट्वा स ब्राह्मणोत्तमः । तीर्थेऽत्रजातविश्रद्धः पित्रोरस्थीनि सोऽक्षिपत्

māhātmyamasya tīrthasya dṛṣṭvā sa brāhmaṇottamaḥ tīrthe'trajātaviśraddhaḥ pitrorasthīni so'kṣipat

'इस तीर्थ की महिमा देखकर, वह ब्राह्मणश्रेष्ठ भी, इस तीर्थ में उत्पन्न हुई श्रद्धा से, अपने माता-पिता की अस्थियाँ इसमें डाल बैठा।'

श्लोक 48 (padma.6.211.48)

पतितेष्वस्थिखंडेषु पितरौ तस्य तत्क्षणात् । विमानवरमारूढौ दिव्यौ तत्र समागतौ

patiteṣvasthikhaṁḍeṣu pitarau tasya tatkṣaṇāt vimānavaramārūḍhau divyau tatra samāgatau

'अस्थि-खंडों के गिरते ही उसके माता-पिता उसी क्षण, दिव्य होकर, एक उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर वहाँ आ पहुँचे।'

श्लोक 49 (padma.6.211.49)

ऊचतुश्च स्वतनयं शृण्वानेषु जनेषु वै । वत्स जीव चिरं लोके धनधान्यसुखी भव

ūcatuśca svatanayaṁ śṛṇvāneṣu janeṣu vai vatsa jīva ciraṁ loke dhanadhānyasukhī bhava

'और लोगों के सुनते हुए ही उन्होंने अपने पुत्र से कहा — "हे वत्स! संसार में चिरकाल जीवित रह, धन-धान्य से सुखी हो—"'

श्लोक 50 (padma.6.211.50)

आवयोर्मुक्तिदानाच्च मुक्तिं यास्यसि नो मृषा । गंगायां पिंडदानेन यत्फलं स्यात्सुतस्य वै । पितॄणां या गतिश्चात्र द्वयं स्यादस्थिपाततः

āvayormuktidānācca muktiṁ yāsyasi no mṛṣā gaṁgāyāṁ piṁḍadānena yatphalaṁ syātsutasya vai pitṝṇāṁ yā gatiścātra dvayaṁ syādasthipātataḥ

'"—हम दोनों की मुक्ति के दान से तू भी निश्चय ही मुक्ति पाएगा। गंगा में पुत्र द्वारा पिंडदान से जो फल मिलता है, और यहाँ पितरों की जो गति होती है — दोनों ही अस्थि-पतन मात्र से यहाँ प्राप्त हो जाते हैं।"'

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