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उत्तर खण्ड · अध्याय 220

इंद्रप्रस्थ की महिमा

अध्याय 219अध्याय-सूचीअध्याय 221

श्लोक 1 (padma.6.220.1)

नारद उवाच- शिवस्यतीर्थराजस्य प्रयागस्य तवाग्रतः । महिमानं महापुण्यं श्रद्धया वर्णयामि ते

nārada uvāca- śivasyatīrtharājasya prayāgasya tavāgrataḥ mahimānaṁ mahāpuṇyaṁ śraddhayā varṇayāmi te

नारद ने कहा — 'तीर्थराज शिव-स्वरूप प्रयाग की महापुण्यमयी महिमा अब मैं तुम्हारे समक्ष श्रद्धापूर्वक वर्णन करता हूँ।'

श्लोक 2 (padma.6.220.2)

विश्वावसुर्महीपाल गंधर्वो लोकविश्रुतः । एकदा स गतो गातुं सुमेरौ ब्रह्मणः सभाम्

viśvāvasurmahīpāla gaṁdharvo lokaviśrutaḥ ekadā sa gato gātuṁ sumerau brahmaṇaḥ sabhām

'हे महीपाल! विश्वावसु नामक लोकविख्यात गंधर्व एक बार सुमेरु पर्वत पर ब्रह्मा की सभा में गाने के लिए गया।'

श्लोक 3 (padma.6.220.3)

तत्र सर्वैः सुरश्रेष्ठमुपविष्टं सुविष्टरे । जुष्टं सुरगणैर्भूप विश्वावसुरवैक्षत

tatra sarvaiḥ suraśreṣṭhamupaviṣṭaṁ suviṣṭare juṣṭaṁ suragaṇairbhūpa viśvāvasuravaikṣata

'हे भूप! वहाँ देवगणों से सेवित, उत्तम आसन पर बैठे हुए देवश्रेष्ठ ब्रह्मा को विश्वावसु ने देखा।'

श्लोक 4 (padma.6.220.4)

ब्रह्मासनसमीपे तु वरासनगतं नृप । द्वितीयमिव लोकेशमिंद्रप्रस्थं स एक्षत

brahmāsanasamīpe tu varāsanagataṁ nṛpa dvitīyamiva lokeśamiṁdraprasthaṁ sa ekṣata

'हे नृप! उसने ब्रह्मा के आसन के निकट, श्रेष्ठ आसन पर विराजमान, मानो दूसरे लोकेश के समान, इंद्रप्रस्थ को देखा।'

श्लोक 5 (padma.6.220.5)

सुरराजतीर्थराजौ ब्रह्मेंद्रप्रस्थयोर्नृप । चामरोद्धूननं मूर्ध्नि कुर्वंतौ स ददर्श ह

surarājatīrtharājau brahmeṁdraprasthayornṛpa cāmaroddhūnanaṁ mūrdhni kurvaṁtau sa dadarśa ha

'हे नृप! उसने देवराज और तीर्थराज — इंद्र और इंद्रप्रस्थ — दोनों को ब्रह्मा के शीश पर चामर डुलाते हुए देखा।'

श्लोक 6 (padma.6.220.6)

अन्यानि देवतीर्थानि तयोर्दूरे महीपते । स्थितानि तेन दृष्टानि बद्धांजलिपुटानि तु

anyāni devatīrthāni tayordūre mahīpate sthitāni tena dṛṣṭāni baddhāṁjalipuṭāni tu

'हे महीपते! उसने अन्य देव-तीर्थों को उनसे दूर, हाथ जोड़े हुए खड़े देखा।'

श्लोक 7 (padma.6.220.7)

तयोरग्रे जगौ राजन्गांधर्वं रागमुत्तमम् । तीर्थैः सममगात्सत्यलोकं देवान्विसृज्य हि

tayoragre jagau rājangāṁdharvaṁ rāgamuttamam tīrthaiḥ samamagātsatyalokaṁ devānvisṛjya hi

'हे राजन्! उन दोनों के समक्ष उसने गांधर्व राग में एक उत्तम गीत गाया; फिर वह देवताओं को छोड़कर तीर्थों के साथ सत्यलोक को चला गया।'

श्लोक 8 (padma.6.220.8)

अथ विश्वावसुर्द्धीमान्दृष्ट्वा तीर्थस्य वैभवम् । इंद्रप्रस्थस्य राजेंद्र हाहामेतदुवाच ह

atha viśvāvasurddhīmāndṛṣṭvā tīrthasya vaibhavam iṁdraprasthasya rājeṁdra hāhāmetaduvāca ha

'हे राजेंद्र! तब बुद्धिमान् विश्वावसु ने इंद्रप्रस्थ तीर्थ के इस ऐश्वर्य को देखकर, विस्मय से यह कहा।'

श्लोक 9 (padma.6.220.9)

विश्वावसुरुवाच- भोभो गंधर्वशार्दूल तीर्थमेतन्महाद्भुतम् । इंद्रप्रस्थाख्यमेतस्मिन्संसारे तीर्थराशिषु

viśvāvasuruvāca- bhobho gaṁdharvaśārdūla tīrthametanmahādbhutam iṁdraprasthākhyametasminsaṁsāre tīrtharāśiṣu

विश्वावसु ने कहा — 'हे गंधर्वशार्दूल! इस संसार के तीर्थ-समूहों में यह इंद्रप्रस्थ नामक तीर्थ अत्यंत अद्भुत है।'

श्लोक 10 (padma.6.220.10)

चराचरगुरुर्ब्रह्मा सुरवंद्य पदांबुजः । तस्यासनसमीपस्थं यदतिष्ठ समासनम्

carācaragururbrahmā suravaṁdya padāṁbujaḥ tasyāsanasamīpasthaṁ yadatiṣṭha samāsanam

'चराचर के गुरु, देवताओं द्वारा वंदित चरण-कमल वाले ब्रह्मा — उन्हीं के आसन के निकट, समान आसन पर यह विराजमान है।'

श्लोक 11 (padma.6.220.11)

तीर्थराजोऽपि पृष्ठस्थश्चामरं यस्य मस्तके । अधुना भृत्यवज्जातस्तीर्थेष्वन्येषु का कथा

tīrtharājo'pi pṛṣṭhasthaścāmaraṁ yasya mastake adhunā bhṛtyavajjātastīrtheṣvanyeṣu kā kathā

'तीर्थराज होते हुए भी यह पीछे खड़ा होकर, इसके सिर पर चामर [डुलाता हुआ], अब भृत्य के समान हो गया है — फिर अन्य तीर्थों की तो बात ही क्या!'

श्लोक 12 (padma.6.220.12)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि त्रिवर्गफलदानि तु । इंद्रप्रस्थमिदं तीर्थं चतुर्वर्गफलप्रदम्

pṛthivyāṁ yāni tīrthāni trivargaphaladāni tu iṁdraprasthamidaṁ tīrthaṁ caturvargaphalapradam

'पृथ्वी पर जो तीर्थ त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) का फल देने वाले हैं, यह इंद्रप्रस्थ तीर्थ उनसे बढ़कर चतुर्वर्ग (मोक्ष सहित) का फल देने वाला है।'

श्लोक 13 (padma.6.220.13)

अत्र स्थितानि तीर्थानि तादृशानि गुणैर्ध्रुवः । शेषेनापि न शक्यंते स्तोतुं तेषां महागुणाः

atra sthitāni tīrthāni tādṛśāni guṇairdhruvaḥ śeṣenāpi na śakyaṁte stotuṁ teṣāṁ mahāguṇāḥ

'यहाँ स्थित तीर्थ ऐसे अटल गुणों वाले हैं कि शेषनाग भी उनके महान् गुणों की स्तुति करने में समर्थ नहीं है।'

श्लोक 14 (padma.6.220.14)

नारद उवाच-। एवं विश्वावसुर्धीमान्दृष्ट्वेंद्रप्रस्थवैभवम् । गत्वा तस्य गृहं राजन्पावनं सर्वकामदम्

nārada uvāca- evaṁ viśvāvasurdhīmāndṛṣṭveṁdraprasthavaibhavam gatvā tasya gṛhaṁ rājanpāvanaṁ sarvakāmadam

नारद ने कहा — 'हे राजन्! इस प्रकार बुद्धिमान् विश्वावसु, इंद्रप्रस्थ के इस ऐश्वर्य को देखकर, उसके पावन, सर्वकामद घर की ओर चला गया।'

श्लोक 15 (padma.6.220.15)

यथा देवेषु सर्वेषु शक्रः श्रेष्ठः शचीपतिः । तस्माद्ब्रह्मा च तीर्थेषु प्रयागोऽयं तथा वरः

yathā deveṣu sarveṣu śakraḥ śreṣṭhaḥ śacīpatiḥ tasmādbrahmā ca tīrtheṣu prayāgo'yaṁ tathā varaḥ

'जैसे समस्त देवताओं में शचीपति इंद्र श्रेष्ठ हैं, और उनसे भी ब्रह्मा श्रेष्ठ हैं, वैसे ही तीर्थों में यह प्रयाग श्रेष्ठ है।'

श्लोक 16 (padma.6.220.16)

तस्मादपि महाराज शक्रप्रस्थमिदं वरम् । अस्यांतरगतो योऽयं प्रयागो नृप दृश्यते

tasmādapi mahārāja śakraprasthamidaṁ varam asyāṁtaragato yo'yaṁ prayāgo nṛpa dṛśyate

'हे महाराज! उससे भी बढ़कर यह शक्रप्रस्थ श्रेष्ठ है, क्योंकि हे नृप! इसके भीतर ही स्थित यह प्रयाग दिखाई देता है।'

श्लोक 17 (padma.6.220.17)

कथयाम्यत्र यद्वृत्तं मोहिन्याः पण्ययोषितः । नर्मदासरितस्तीरे पुरी माहिष्मती नृप

kathayāmyatra yadvṛttaṁ mohinyāḥ paṇyayoṣitaḥ narmadāsaritastīre purī māhiṣmatī nṛpa

'हे नृप! मोहिनी नामक एक वेश्या का जो वृत्तांत यहाँ घटित हुआ, वह मैं कहता हूँ। नर्मदा नदी के तट पर माहिष्मती नामक नगरी थी।'

श्लोक 18 (padma.6.220.18)

मोहिनीनाम तत्रासीद्वेश्या बहुधनान्विता । रूपयौवनसंपन्ना निष्णाता नृत्यगीतयोः

mohinīnāma tatrāsīdveśyā bahudhanānvitā rūpayauvanasaṁpannā niṣṇātā nṛtyagītayoḥ

'वहाँ मोहिनी नाम की, बहुत धन से युक्त, रूप-यौवन से संपन्न, नृत्य-गीत में निपुण एक वेश्या रहती थी।'

श्लोक 19 (padma.6.220.19)

तया बहूनि पापानि कृतानि धनलुब्धया । ब्रह्महत्याः कृताः सप्त दास्यश्च बहवो हताः

tayā bahūni pāpāni kṛtāni dhanalubdhayā brahmahatyāḥ kṛtāḥ sapta dāsyaśca bahavo hatāḥ

'धन-लोभी उस स्त्री ने बहुत से पाप किए — सात ब्रह्महत्याएँ कीं, और अपनी बहुत सी दासियों को भी मार डाला।'

श्लोक 20 (padma.6.220.20)

तासां च पातिता गर्भाः बहुशः पापया तया । एवं तया सुतारुण्यं गमितं पापकर्मभिः

tāsāṁ ca pātitā garbhāḥ bahuśaḥ pāpayā tayā evaṁ tayā sutāruṇyaṁ gamitaṁ pāpakarmabhiḥ

'उस पापिनी ने उन दासियों के गर्भों को भी बार-बार गिराया। इस प्रकार उसने अपना युवावस्था पाप-कर्मों में ही बिता दी।'

श्लोक 21 (padma.6.220.21)

ततो जरा कियत्काले तद्देहे समपद्यत । जराग्रस्तशरीरा सा निवृत्तविषयस्पृहा

tato jarā kiyatkāle taddehe samapadyata jarāgrastaśarīrā sā nivṛttaviṣayaspṛhā

'फिर कुछ समय बाद उसके शरीर में वृद्धावस्था आ गई; वृद्धावस्था से ग्रस्त शरीर वाली वह विषय-वासना से निवृत्त हो गई।'

श्लोक 22 (padma.6.220.22)

न चक्रे मानसं यूनां ते च तां पतिभूपते । पापार्जितं धनं स्वीयं न विश्वसिति कस्यचित्

na cakre mānasaṁ yūnāṁ te ca tāṁ patibhūpate pāpārjitaṁ dhanaṁ svīyaṁ na viśvasiti kasyacit

'हे भूपते! युवकों का मन भी उसकी ओर नहीं गया, और न उसका उनकी ओर; अपने पाप-अर्जित धन पर उसे किसी का विश्वास नहीं था।'

श्लोक 23 (padma.6.220.23)

न दत्ते न स्वयं भुंक्ते न निक्षिपति वै क्वचित् । एकदा सा निशीथे तु विबुध्येति विचिंतयत्

na datte na svayaṁ bhuṁkte na nikṣipati vai kvacit ekadā sā niśīthe tu vibudhyeti viciṁtayat

'न वह उसे देती, न स्वयं भोगती, न कहीं रखती। एक बार आधी रात को जागकर उसने यह विचार किया—'

श्लोक 24 (padma.6.220.24)

मृतायां मयि कस्येदं धनं पापैरुपार्जितम् । तं नयिष्यति मां घोरं नरकं भृशदारुणम्

mṛtāyāṁ mayi kasyedaṁ dhanaṁ pāpairupārjitam taṁ nayiṣyati māṁ ghoraṁ narakaṁ bhṛśadāruṇam

'—"मेरे मरने पर, पापों से अर्जित यह धन किसका होगा? यह मुझे अत्यंत भयंकर, घोर नरक में ले जाएगा।"'

श्लोक 25 (padma.6.220.25)

दास्यस्तासां च भर्त्तारस्तद्भोक्ष्यंति धनं मम । मयैव सद्गतिस्तस्य कथं न क्रियतेऽधुना

dāsyastāsāṁ ca bharttārastadbhokṣyaṁti dhanaṁ mama mayaiva sadgatistasya kathaṁ na kriyate'dhunā

'"इन दासियों के पति इस मेरे धन को भोगेंगे; तो फिर मैं स्वयं इससे अपनी सद्गति क्यों न कर लूँ?"'

श्लोक 26 (padma.6.220.26)

एवं विचिंत्य सा धर्मे विधाय मतिमुत्तमाम् । चकारारामसरसि वापीकूपसुरालयान्

evaṁ viciṁtya sā dharme vidhāya matimuttamām cakārārāmasarasi vāpīkūpasurālayān

'ऐसा विचार कर, धर्म में अपनी उत्तम बुद्धि लगाकर, उसने उद्यान, सरोवर, बावड़ी, कुएँ और देवालय बनवाए।'

श्लोक 27 (padma.6.220.27)

अभितः पुरमाधत्ते प्रपाः पथिकहेतवे । निदाघे च महाराज तेभ्योऽन्नं प्रददौ च सा

abhitaḥ puramādhatte prapāḥ pathikahetave nidāghe ca mahārāja tebhyo'nnaṁ pradadau ca sā

'हे महाराज! उसने नगर के चारों ओर पथिकों के लिए जल-शालाएँ बनवाईं, और गर्मी में उन्हें अन्न भी दिया।'

श्लोक 28 (padma.6.220.28)

धर्मशालां गृहाभ्याशे निवासाय विदेशिनाम् । विदधे सा पुनस्तेभ्यो ददावाहारमुत्तमम्

dharmaśālāṁ gṛhābhyāśe nivāsāya videśinām vidadhe sā punastebhyo dadāvāhāramuttamam

'अपने घर के निकट विदेशियों के निवास के लिए एक धर्मशाला बनवाई, और फिर उन्हें भी उत्तम भोजन दिया।'

श्लोक 29 (padma.6.220.29)

एवं प्रवर्त्तमाना हि धर्मे सा भूपमोहिनी । ज्वरातुराभवत्काले क्वचिच्चेति विचिंतयत्

evaṁ pravarttamānā hi dharme sā bhūpamohinī jvarāturābhavatkāle kvacicceti viciṁtayat

'इस प्रकार धर्म में प्रवृत्त होते हुए, वह भूप-मोहिनी एक बार, समय पड़ने पर, ज्वर से पीड़ित हो गई, और उसने यह विचार किया।'

श्लोक 30 (padma.6.220.30)

धर्मार्थे हि मया वित्तं व्ययितं भूरि यद्यपि । तथापि स्वर्णरूप्यादि प्रचुरं वर्त्तते परम्

dharmārthe hi mayā vittaṁ vyayitaṁ bhūri yadyapi tathāpi svarṇarūpyādi pracuraṁ varttate param

'"यद्यपि मैंने धर्म के लिए बहुत सा धन व्यय किया है, फिर भी सोना-चाँदी आदि प्रचुर मात्रा में अभी बचा हुआ है।"'

श्लोक 31 (padma.6.220.31)

श्रोत्रियेभ्यो ददाम्येतज्ज्ञानेनेति व्यचिंतयत् । विचिंत्येति समाहूता मोहिन्या नगरद्विजाः

śrotriyebhyo dadāmyetajjñāneneti vyaciṁtayat viciṁtyeti samāhūtā mohinyā nagaradvijāḥ

'"यह मैं ज्ञानपूर्वक श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दूँगी" — ऐसा उसने विचार किया। ऐसा विचार कर मोहिनी ने नगर के ब्राह्मणों को बुलवाया।'

श्लोक 32 (padma.6.220.32)

नागतास्ते महीपाल ज्ञात्वा घोरं प्रतिग्रहम् । यदा तदा द्विभागं च चक्रे तत्तु धनं स्वकम्

nāgatāste mahīpāla jñātvā ghoraṁ pratigraham yadā tadā dvibhāgaṁ ca cakre tattu dhanaṁ svakam

'हे महीपाल! उस भयंकर [पाप-अर्जित] दान को जानकर वे नहीं आए। तब उसने अपने उस धन के दो भाग कर दिए।'

श्लोक 33 (padma.6.220.33)

एको भागस्तु दासीनां दत्तोन्यश्च विदेशिनाम् । स्वयं तु निर्द्धना राजन्नभवत्सा तु मोहिनी

eko bhāgastu dāsīnāṁ dattonyaśca videśinām svayaṁ tu nirddhanā rājannabhavatsā tu mohinī

'एक भाग दासियों को दिया, और दूसरा विदेशियों को; हे राजन्! वह मोहिनी स्वयं तब निर्धन हो गई।'

श्लोक 34 (padma.6.220.34)

तथा समागतं मृत्युं विज्ञायांतिकमंतिके । मुक्त्वा दास्यो धनं नीत्वा यथेष्टगतयोऽभवत्

tathā samāgataṁ mṛtyuṁ vijñāyāṁtikamaṁtike muktvā dāsyo dhanaṁ nītvā yatheṣṭagatayo'bhavat

'इस प्रकार अपनी मृत्यु को निकट-निकट आती जानकर, उसकी दासियाँ, मुक्त होकर, धन लेकर अपनी इच्छानुसार चली गईं।'

श्लोक 35 (padma.6.220.35)

इति मत्वा यदा ह्येषा ज्वरमुक्ता भविष्यति । तदानीं यद्धनं दत्तं नूनमादास्यते हि तत्

iti matvā yadā hyeṣā jvaramuktā bhaviṣyati tadānīṁ yaddhanaṁ dattaṁ nūnamādāsyate hi tat

'यह सोचकर कि "जब यह ज्वर से मुक्त हो जाएगी, तब जो धन दिया गया है, वह निश्चय ही वापस ले लेगी।"'

श्लोक 36 (padma.6.220.36)

अथ सा लंघनान्यष्टादशकृत्वा महीपते । निजायुषस्तु शेषेण ज्वरमुक्ता तदाभवत्

atha sā laṁghanānyaṣṭādaśakṛtvā mahīpate nijāyuṣastu śeṣeṇa jvaramuktā tadābhavat

'हे महीपते! फिर वह अठारह बार उपवास कर, अपनी शेष आयु के बल पर ज्वर से मुक्त हो गई।'

श्लोक 37 (padma.6.220.37)

एका जरद्गवानाम सखी तस्या महीपते । सा तामुपचचाराशु पथ्यादिभिरतंद्रिता

ekā jaradgavānāma sakhī tasyā mahīpate sā tāmupacacārāśu pathyādibhirataṁdritā

'हे महीपते! उसकी जरद्गवा नामक एक सखी थी; उसने उसकी पथ्य आदि से अथकभाव से सेवा की।'

श्लोक 38 (padma.6.220.38)

कियद्भिर्वासरैः सा तु पूर्णाहारा व्यजायत । तस्या जरद्गवायास्तु गृहे भुक्तं स्म लज्जया

kiyadbhirvāsaraiḥ sā tu pūrṇāhārā vyajāyata tasyā jaradgavāyāstu gṛhe bhuktaṁ sma lajjayā

'कुछ ही दिनों में वह पूर्ण आहार लेने लगी; परंतु उस जरद्गवा के घर में ही उसने लज्जावश भोजन किया।'

श्लोक 39 (padma.6.220.39)

मया स्थितं सुखेनात्र दुःखमद्य समागतम् । दारिद्र्यान्न मया स्थेयं सचिंत्येति गतान्यतः

mayā sthitaṁ sukhenātra duḥkhamadya samāgatam dāridryānna mayā stheyaṁ saciṁtyeti gatānyataḥ

'"मैं यहाँ सुखपूर्वक रहती थी, आज दुःख मुझ पर आ पड़ा है; दरिद्रता के कारण मुझे यहाँ नहीं रहना चाहिए" — ऐसा सोचकर वह वहाँ से अन्यत्र चली गई।'

श्लोक 40 (padma.6.220.40)

गच्छती सा वने राजन्मोहिनी पुरतस्करैः । इति मत्वा विनिहता गृहीत्वा यात्यसौ धनम्

gacchatī sā vane rājanmohinī purataskaraiḥ iti matvā vinihatā gṛhītvā yātyasau dhanam

'हे राजन्! वन में जाती हुई उस मोहिनी को, नगर के चोरों ने [धनी समझकर] मार डाला।'

श्लोक 41 (padma.6.220.41)

धनमप्राप्य तैस्तस्याः सकाशात्पुरतस्करैः । श्वसती सा परित्यक्ता तस्मिन्नेव वने नृप

dhanamaprāpya taistasyāḥ sakāśātpurataskaraiḥ śvasatī sā parityaktā tasminneva vane nṛpa

'उन नगर-चोरों को उससे कोई धन प्राप्त न होने पर, साँस लेती हुई उस [अभागिन] को उसी वन में छोड़कर वे चले गए।'

श्लोक 42 (padma.6.220.42)

अथ वैखानसः कश्चित्प्रयागस्यास्य वै जलम् । बिभ्रत्कमंडलौ राजन्नत्रारण्ये समाययौ

atha vaikhānasaḥ kaścitprayāgasyāsya vai jalam bibhratkamaṁḍalau rājannatrāraṇye samāyayau

'हे राजन्! तब एक वानप्रस्थ तपस्वी, अपने कमंडलु में इंद्रप्रस्थ में स्थित इस प्रयाग का ही जल लिए हुए, उस वन में आ पहुँचा।'

श्लोक 43 (padma.6.220.43)

अथ तां पतितां वीक्ष्य शस्त्रविक्षतविग्रहाम् । याचमानामिदं राजन् जीवनं हस्तसंज्ञया

atha tāṁ patitāṁ vīkṣya śastravikṣatavigrahām yācamānāmidaṁ rājan jīvanaṁ hastasaṁjñayā

'हे राजन्! शस्त्रों से घायल शरीर वाली, गिरी हुई, हाथ के इशारे से जीवन की भीख माँगती उस स्त्री को देखकर—'

श्लोक 44 (padma.6.220.44)

वैखानस उवाच- का त्वं केन शितैः शस्त्रैः सक्षतीकृतविग्रहा । एकाकिनी किमर्थं वा निर्जनारण्यमागता

vaikhānasa uvāca- kā tvaṁ kena śitaiḥ śastraiḥ sakṣatīkṛtavigrahā ekākinī kimarthaṁ vā nirjanāraṇyamāgatā

वानप्रस्थ ने कहा — 'तुम कौन हो, किन तीक्ष्ण शस्त्रों से तुम्हारा शरीर इस प्रकार घायल हुआ है, और तुम अकेली इस निर्जन वन में किसलिए आई हो?'

श्लोक 45 (padma.6.220.45)

इंद्रप्रस्थगतस्येदं प्रयागस्य जले शुभे । भाग्योदयेन केनापि प्रापितं प्रियकाम्यया

iṁdraprasthagatasyedaṁ prayāgasya jale śubhe bhāgyodayena kenāpi prāpitaṁ priyakāmyayā

'इंद्रप्रस्थ में स्थित इस शुभ प्रयाग का यह जल, किसी भाग्योदय से, दया की कामना से उसके लिए ले आया गया।'

श्लोक 46 (padma.6.220.46)

इत्युक्ता तेन सा वक्तुमक्षमा व्याददे मुखम् । पातुं तद्वारिमहिषी भवेयमिति वांछया

ityuktā tena sā vaktumakṣamā vyādade mukham pātuṁ tadvārimahiṣī bhaveyamiti vāṁchayā

'उसके ऐसा कहने पर, बोलने में असमर्थ वह मुख फैलाने लगी — इस इच्छा से कि उस जल को पीकर वह महारानी बन जाए।'

श्लोक 47 (padma.6.220.47)

अथैतस्य प्रयागस्य पातितेंबुनि तन्मुखे । तत्याज जीवितं सा तु मोहिनीगणिका नृप

athaitasya prayāgasya pātiteṁbuni tanmukhe tatyāja jīvitaṁ sā tu mohinīgaṇikā nṛpa

'हे राजन्! फिर इस प्रयाग का जल उसके मुख में डाला जाते ही, वह मोहिनी नामक गणिका अपने प्राण त्याग बैठी।'

श्लोक 48 (padma.6.220.48)

प्राणप्रयाणकाले तु महिषीत्वं च वांच्छयत् । अतः सा महिषी जाता द्राविडे वीरवर्मणः

prāṇaprayāṇakāle tu mahiṣītvaṁ ca vāṁcchayat ataḥ sā mahiṣī jātā drāviḍe vīravarmaṇaḥ

'प्राण-प्रयाण के समय उसने महिषी (रानी) होने की कामना की थी; अतः वह वीरवर्मा की महिषी बनकर द्राविड़ देश में उत्पन्न हुई।'

श्लोक 49 (padma.6.220.49)

संभूय केरलाधीश गृहे तीर्थांबुपानतः । कुलशीलधनैश्वर्यसंयुक्तस्य महीपते

saṁbhūya keralādhīśa gṛhe tīrthāṁbupānataḥ kulaśīladhanaiśvaryasaṁyuktasya mahīpate

'हे महीपते! तीर्थ का जल पीने के प्रभाव से, कुल, शील, धन और ऐश्वर्य से युक्त उस केरलाधीश के घर में जन्म लेकर—'

श्लोक 50 (padma.6.220.50)

हेमगौरं ततः सांगं बभार कमलेक्षणा । अतस्तस्य पिता नाम हेमांगीति चकार ह

hemagauraṁ tataḥ sāṁgaṁ babhāra kamalekṣaṇā atastasya pitā nāma hemāṁgīti cakāra ha

'—उस कमल-नयना ने तब सुवर्ण के समान गौर अंगों वाली एक कन्या को जन्म दिया; इसीलिए उसके पिता ने उसका नाम हेमांगी रखा।'

श्लोक 51 (padma.6.220.51)

एकदा सा तु हेमांगी हेमाभरणभूषिता । कलायाः स्ववयस्याया मंत्रिपुत्र्या गृहं ययौ

ekadā sā tu hemāṁgī hemābharaṇabhūṣitā kalāyāḥ svavayasyāyā maṁtriputryā gṛhaṁ yayau

'एक बार वह हेमांगी, सुवर्ण-आभूषणों से सुशोभित होकर, अपनी सखी मंत्री-पुत्री कला के घर गई।'

श्लोक 52 (padma.6.220.52)

तत्र यावकतैलेन स्नापिता भोजिता च सा । विविधान्नैस्तदा राजन्निविष्टा वरविष्टरे

tatra yāvakatailena snāpitā bhojitā ca sā vividhānnaistadā rājanniviṣṭā varaviṣṭare

'हे राजन्! वहाँ उसे यावक-तैल से स्नान कराया गया, विविध व्यंजनों से भोजन कराया गया, और उत्तम आसन पर बिठाया गया।'

श्लोक 53 (padma.6.220.53)

पुष्पोद्ग्रथित धमिल्ला क्षामक्षौमविभूषिता । कलां प्रोवाच दधती मुखे तांबूलवीटिकाम्

puṣpodgrathita dhamillā kṣāmakṣaumavibhūṣitā kalāṁ provāca dadhatī mukhe tāṁbūlavīṭikām

'पुष्पों से गुंथे केश-जूड़े वाली, महीन रेशमी वस्त्रों से विभूषित, मुख में पान का बीड़ा लिए हुए, उसने कला से यह कहा।'

श्लोक 54 (padma.6.220.54)

हेमांग्युवाच - कले कलय मे वाक्यं कोकिलाकलभाषिणि । गृहे यदद्भुतं वस्तु तव मामभिदर्शय

hemāṁgyuvāca - kale kalaya me vākyaṁ kokilākalabhāṣiṇi gṛhe yadadbhutaṁ vastu tava māmabhidarśaya

हेमांगी ने कहा — 'हे कोकिला-सी मधुर बोलने वाली कले! मेरी बात सुनो; अपने घर की जो भी अद्भुत वस्तु हो, वह मुझे दिखाओ।'

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