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उत्तर खण्ड · अध्याय 221

इन्द्रप्रस्थ में प्रयाग-माहात्म्य

अध्याय 220अध्याय-सूचीअध्याय 222

श्लोक 1 (padma.6.221.1)

नारद उवाच- इत्युक्ता सा कला राजंस्तया नृपतिभार्यया । स्वकोशात्स्वर्णमंजूषामानाय्य विदधे पुरः ।

nārada uvāca ityuktā sā kalā rājaṁstayā nṛpatibhāryayā svakośātsvarṇamaṁjūṣāmānāyya vidadhe puraḥ

नारद जी ने कहा — हे राजन्! राजा की पत्नी के ऐसा कहने पर उस दासी कला ने अपने भण्डार से एक स्वर्ण-मंजूषा लाकर उसके सम्मुख रख दी।

श्लोक 2 (padma.6.221.2)

उवाच च महाराज भार्येऽस्यामहदद्भुतम् । पुस्तकं वर्तते देवि तत्र चित्राणि संति वै ।

uvāca ca mahārāja bhārye'syāmahadadbhutam pustakaṁ vartate devi tatra citrāṇi saṁti vai

उसने कहा — हे महाराज! हे देवी, इसमें एक अद्भुत वस्तु है — एक पुस्तक, और उसमें चित्र भी हैं।

श्लोक 3 (padma.6.221.3)

उद्धाट्य दृश्यतां किंचित्किं किमस्त्यत्र पुस्तके । रंस्यते ते मनो नूनं तत्रस्था लेख्यदर्शने ।

uddhāṭya dṛśyatāṁ kiṁcitkiṁ kimastyatra pustake raṁsyate te mano nūnaṁ tatrasthā lekhyadarśane

इसे खोलकर देखिए कि इस पुस्तक में क्या है; उन चित्रों को देखकर निश्चय ही आपका मन प्रसन्न होगा।

श्लोक 4 (padma.6.221.4)

इत्युक्त्वा भूपपत्नी सा दास्या तामुदघाटयत् । मंजूषां तत्र संस्थं च पुस्तकं पाणिनाऽग्रहीत् ।

ityuktvā bhūpapatnī sā dāsyā tāmudaghāṭayat maṁjūṣāṁ tatra saṁsthaṁ ca pustakaṁ pāṇinā'grahīt

यह कहकर राजा की पत्नी ने दासी से उसे खुलवाया; वहाँ रखी मंजूषा और उसमें की पुस्तक उसने अपने हाथ में ले ली।

श्लोक 5 (padma.6.221.5)

तत्रावलोकयामास सावतारान्समासतः । पूर्वं ततस्तु भूगोलं पंचाशत्कोटियोजनम् ।

tatrāvalokayāmāsa sāvatārāṁsamāsataḥ pūrvaṁ tatastu bhūgolaṁ paṁcāśatkoṭiyojanam

वहाँ उसने क्रमशः भगवान् के अवतारों को देखा — पहले पचास करोड़ योजन विस्तार वाले भूमण्डल को।

श्लोक 6 (padma.6.221.6)

तत्रांधकारसंयुक्ता भूमिर्दृष्टाथ कांचनी । एतयोरंतरे राजँल्लोकालोकश्च पर्वतः ।

tatrāṁdhakārasaṁyuktā bhūmirdṛṣṭātha kāṁcanī etayoraṁtare rāja~llokālokaśca parvataḥ

वहाँ उसने अंधकारयुक्त एक भूमि देखी और उसके आगे स्वर्णमयी भूमि; इन दोनों के मध्य लोकालोक पर्वत था।

श्लोक 7 (padma.6.221.7)

सप्तद्वीपास्ततो दृष्ट्वा समुद्रैः सप्तभिर्वृताः । एतेषु नद्यः शैलाश्च खंडानि तु महामते ।

saptadvīpāstato dṛṣṭvā samudraiḥ saptabhirvṛtāḥ eteṣu nadyaḥ śailāśca khaṁḍāni tu mahāmate

फिर उसने सात समुद्रों से घिरे सात द्वीप देखे; हे महामते! इनमें नदियाँ, पर्वत और खण्ड (प्रदेश) भी थे।

श्लोक 8 (padma.6.221.8)

एतद्भारतखंडं सा पश्यंती भूपतिप्रिया । यमुनाजाह्नवी मुख्या सरितः समवैक्षत ।

etadbhāratakhaṁḍaṁ sā paśyaṁtī bhūpatipriyā yamunājāhnavī mukhyā saritaḥ samavaikṣata

इस भारतखण्ड को देखती हुई उस राजप्रिया ने नदियों को देखा, जिनमें यमुना और जाह्नवी (गंगा) प्रमुख थीं।

श्लोक 9 (padma.6.221.9)

यमुनातीरगं राजन्निंद्रप्रस्थमिदं शुभम् । ददर्श सा महाभागा तीर्थं व्रजयुतं नृप ।

yamunātīragaṁ rājaṁniṁdraprasthamidaṁ śubham dadarśa sā mahābhāgā tīrthaṁ vrajayutaṁ nṛpa

यमुना के तट पर स्थित इस शुभ इन्द्रप्रस्थ को, हे राजन्, उस महाभागा ने देखा, और तीर्थयात्रियों से भरे इस तीर्थ को भी देखा, हे नृप।

श्लोक 10 (padma.6.221.10)

अत्र तीर्थमिदं दृष्ट्वा प्रयागं ब्रह्मनिर्मितम् । पूर्वजन्मकृतं कर्म सा सस्मार मनस्विनी ।

atra tīrthamidaṁ dṛṣṭvā prayāgaṁ brahmanirmitam pūrvajaṁmakṛtaṁ karma sā sasmāra manasvinī

ब्रह्मा द्वारा निर्मित इस प्रयाग तीर्थ को देखकर उस विचारशील स्त्री को पूर्वजन्म का कोई कर्म स्मरण हो आया।

श्लोक 11 (padma.6.221.11)

ततस्तूष्णीं समुत्थाय तूर्णं सा स्वगृहं ययौ । निश्चित्येति न भोक्ष्यामि ततः प्रस्थाय तीर्थकम् ।

tatastūṣṇīṁ samutthāya tūrṇaṁ sā svagṛhaṁ yayau niścityeti na bhokṣyāmi tataḥ prasthāya tīrthakam

तब वह चुपचाप उठकर शीघ्र ही अपने घर गई और यह निश्चय करके — 'मैं भोजन नहीं करूँगी' — तीर्थ की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 12 (padma.6.221.12)

तदैव सा तु हेमांगी सहगंतुमसुप्रियम् । वीरवर्माणमाहेदं तीर्थराजं प्रिया सती ।

tadaiva sā tu hemāṁgī sahagaṁtumasupriyam vīravarmāṇamāhedaṁ tīrtharājaṁ priyā satī

उसी क्षण उस स्वर्णांगी, पतिव्रता हेमांगी ने अपने प्रिय पति वीरवर्मा से तीर्थराज (प्रयाग) को साथ चलने के विषय में यह कहा।

श्लोक 13 (padma.6.221.13)

हेमांग्युवाच- भो भो प्राणपते वाक्यं मदीयं शृणु धर्मदम् । विधेहि च महाभाग तूर्णं पूर्णो भविष्यति ।

hemāṁgyuvāca bho bho prāṇapate vākyaṁ madīyaṁ śṛṇu dharmadam vidhehi ca mahābhāga tūrṇaṁ pūrṇo bhaviṣyati

हेमांगी ने कहा — हे प्राणनाथ! मेरी यह धर्मयुक्त बात सुनिए और उसे पूर्ण कीजिए, हे महाभाग, यह शीघ्र ही पूर्ण होगी।

श्लोक 14 (padma.6.221.14)

पुराहं मोहिनी नाम वेश्या च बहुपापकृत् । यौवने वार्द्धके किंचिद्धर्मे जाता मतिर्मम ।

purāhaṁ mohinī nāma veśyā ca bahupāpakṛt yauvane vārddhake kiṁciddharme jātā matirmama

पूर्वकाल में मैं मोहिनी नामक एक वेश्या थी, जो अनेक पापों में लिप्त थी; यौवन में और कुछ वृद्धावस्था में भी मेरे मन में धर्म के प्रति रुचि जागी।

श्लोक 15 (padma.6.221.15)

पापेनोपार्जितां वित्तं धर्मेण व्ययितं मया । निर्द्धनाहं यदा राजन्निर्गता निजपत्तनात् ।

pāpenopārjitāṁ vittaṁ dharmeṇa vyayitaṁ mayā nirddhanāhaṁ yadā rājaṁnirgatā nijapattanāt

पाप से अर्जित धन मैंने धर्म में व्यय कर दिया; जब मैं निर्धन हो गई, हे राजन्, तब मैं अपने नगर से निकल पड़ी।

श्लोक 16 (padma.6.221.16)

तदा मां निर्जनेऽरण्ये यांती जघ्नुस्तु तस्कराः । वृथा दारिद्र्यसंतप्ता पापा धनजिघृक्षया ।

tadā māṁ nirjane'raṁye yāṁtī jaghnustu taskarāḥ vṛthā dāridryasaṁtaptā pāpā dhanajighṛkṣayā

तब निर्जन वन में जाते हुए मुझे चोरों ने मार डाला — वे दरिद्रता से संतप्त, धन के लोभी पापी थे।

श्लोक 17 (padma.6.221.17)

शितशस्त्रक्षतांगीं मां श्वसंतीं गतचेतनाम् । विसृज्य तस्करास्तत्र गता हतमनोरथाः ।

śitaśastrakṣatāṁgīṁ māṁ śvasaṁtīṁ gatacetanām visṛjya taskarāstatra gatā hatamanorathāḥ

तीक्ष्ण शस्त्रों से घायल शरीर वाली, हाँफती और चेतनाशून्य मुझे छोड़कर वे चोर निराश होकर चले गए।

श्लोक 18 (padma.6.221.18)

ततो वैखानसो ह्येकः प्रयागस्य जलं वहन् । इंद्रप्रस्थगतस्यैव वने तत्र समागतः ।

tato vaikhānaso hyekaḥ prayāgasya jalaṁ vahan iṁdraprasthagatasyaiva vane tatra samāgataḥ

तभी प्रयाग का जल लिए हुए एक वानप्रस्थ (तपस्वी), जो इन्द्रप्रस्थ से आया था, उस वन में वहाँ पहुँचा।

श्लोक 19 (padma.6.221.19)

तत्र मां पतितां दृष्ट्वा तदवस्थां स तापसः । का त्वं कुतः किमर्थं वा हता केनेति पृष्टवान् ।

tatra māṁ patitāṁ dṛṣṭvā tadavasthāṁ sa tāpasaḥ kā tvaṁ kutaḥ kimarthaṁ vā hatā keneti pṛṣṭavān

वहाँ मुझे उस अवस्था में गिरा देखकर उस तपस्वी ने पूछा — 'तुम कौन हो, कहाँ से आई हो, किसलिए और किसने तुम्हें मारा है?'

श्लोक 20 (padma.6.221.20)

तदा किमपि नोक्तं मे प्रार्थितं पुण्यमंबु तत् । तेन तन्मे मुखे क्षिप्तं ततोऽहं देहमत्यजम् ।

tadā kimapi noktaṁ me prārthitaṁ puṁyamaṁbu tat tena taṁme mukhe kṣiptaṁ tato'haṁ dehamatyajam

उस समय मैं कुछ भी न कह सकी, केवल उस पवित्र जल की याचना की। उसने वह जल मेरे मुख में डाला, और तब मैंने अपना शरीर त्याग दिया।

श्लोक 21 (padma.6.221.21)

प्राणप्रयाणकाले तु वारितत्सर्वकामदम् । श्रुत्वेति वांच्छितवती महिषी स्यामिति प्रभो ।

prāṇaprayāṇakāle tu vāritatsarvakāmadam śrutveti vāṁcchitavatī mahiṣī syāmiti prabho

प्राण जाते समय, सब कामनाएँ पूर्ण करने वाले उस जल की महिमा सुनकर, हे प्रभो, मैंने यह इच्छा की कि 'मैं महारानी बनूँ।'

श्लोक 22 (padma.6.221.22)

तस्य तीर्थांभसो राजन्प्रसादात्ते गृहेश्वरी । जाताहं सत्कुलाचारा शीलया परयो निधेः ।

tasya tīrthāṁbhaso rājaṁprasādātte gṛheśvarī jātāhaṁ satkulācārā śīlayā parayo nidheḥ

उस तीर्थजल की कृपा से, हे राजन्, मैं आपकी पत्नी बनी, उत्तम कुल और शीलवती स्वभाव से युक्त।

श्लोक 23 (padma.6.221.23)

सांप्रतं द्रष्टुमिच्छामि शक्रप्रस्थगतं नृप । प्रयागं तीर्थराजं तं भवता सह कामदम् ।

sāṁprataṁ draṣṭumicchāmi śakraprasthagataṁ nṛpa prayāgaṁ tīrtharājaṁ taṁ bhavatā saha kāmadam

अब, हे राजन्, मैं शक्रप्रस्थ (इन्द्रप्रस्थ) में स्थित उस कामनापूर्ण करने वाले तीर्थराज प्रयाग को आपके साथ जाकर देखना चाहती हूँ।

श्लोक 24 (padma.6.221.24)

प्रस्थास्येहं यदा राजन् तीर्थराजं प्रति प्रभो । तदाहमन्नं भोक्ष्यामि मयेति विहितः पणः ।

prasthāsyehaṁ yadā rājan tīrtharājaṁ prati prabho tadāhamaṁnaṁ bhokṣyāmi mayeti vihitaḥ paṇaḥ

जब मैं, हे राजन्, उस तीर्थराज की ओर प्रस्थान करूँगी, तभी मैं अन्न ग्रहण करूँगी — यह प्रण मैंने ले लिया है।

श्लोक 25 (padma.6.221.25)

राजोवाच- कथमेतद्विजानीयां त्वदुक्तं चललोचने । प्रतीतं कुरु मे भद्रे त्वदुक्तं करवाण्यहम् ।

rājovāca kathametadvijānīyāṁ tvaduktaṁ calalocane pratītaṁ kuru me bhadre tvaduktaṁ karavāṁyaham

राजा ने कहा — हे चंचल नेत्रों वाली! मैं इसे सत्य कैसे जानूँ? हे भद्रे, मुझे इसका विश्वास दिलाओ, मैं वैसा ही करूँगा जैसा तुम कहती हो।

श्लोक 26 (padma.6.221.26)

नारद उवाच- इत्युक्ते तेन भूपेन खे वागित्यभवत्तदा । आकाशवागुवाच- सत्यमुक्तं वचो राजन्ननया तव भार्यया ।

nārada uvāca ityukte tena bhūpena khe vāgityabhavattadā ākāśavāguvāca satyamuktaṁ vaco rājaṁnanayā tava bhāryayā

नारद जी ने कहा — राजा के ऐसा कहने पर तभी आकाश में एक वाणी हुई। आकाशवाणी ने कहा —

श्लोक 27 (padma.6.221.27)

इंद्रप्रस्थे गते पुण्ये प्रयागे तीर्थपुंगवे । तत्र गत्वा कुरु स्नानं लप्स्यसे यद्यदिच्छसि ।

iṁdraprasthe gate puṁye prayāge tīrthapuṁgave tatra gatvā kuru snānaṁ lapsyase yadyadicchasi

हे राजन्! तुम्हारी पत्नी ने जो सत्य वचन कहा है, वह सत्य है। पुण्यमय इन्द्रप्रस्थ में, तीर्थश्रेष्ठ प्रयाग में जाकर स्नान करो, तुम्हें जो भी इच्छित हो वह प्राप्त होगा।

श्लोक 28 (padma.6.221.28)

नारद उवाच- निशम्येति ततो वाणीं नृपो गगनसंभवाम् । दंडवत्पतितो भूमौ तद्वक्तारं नमाम्यहम् ।

nārada uvāca niśaṁyeti tato vāṇīṁ nṛpo gaganasaṁbhavām daṁḍavatpatito bhūmau tadvaktāraṁ namāṁyaham

नारद जी ने कहा — आकाश से उठी उस वाणी को सुनकर राजा दण्डवत् भूमि पर गिर पड़ा और उस वक्ता को प्रणाम किया।

श्लोक 29 (padma.6.221.29)

अथ मंत्रिणमाहूय राज्यमारोप्य तत्र वै । तया सह समारुह्य रथं तीर्थवरं ययौ ।

atha maṁtriṇamāhūya rājyamāropya tatra vai tayā saha samāruhya rathaṁ tīrthavaraṁ yayau

फिर मंत्री को बुलाकर, राज्य का भार उसे सौंपकर, वह उसके साथ रथ पर सवार होकर उस श्रेष्ठ तीर्थ की ओर चल पड़ा।

श्लोक 30 (padma.6.221.30)

कतिभिर्वासरैरत्र हेमांग्या सह आययौ । उपजहृ तीर्थराजे क्षीरं भार्यायुतो नृपः ।

katibhirvāsarairatra hemāṁgyā saha āyayau upajahṛ tīrtharāje kṣīraṁ bhāryāyuto nṛpaḥ

कुछ दिनों में वह हेमांगी के साथ वहाँ पहुँचा; पत्नीसहित राजा ने तीर्थराज में दूध अर्पित किया।

श्लोक 31 (padma.6.221.31)

सस्नतुस्तौ शिवे तीर्थे दंपती तत्र कामदे । प्रयागे तेन वपुषा वैकुंठप्राप्तिरस्तु मे ।

sasnatustau śive tīrthe daṁpatī tatra kāmade prayāge tena vapuṣā vaikuṁṭhaprāptirastu me

वहाँ उस कल्याणकारी, कामनापूर्ण तीर्थ में उस दम्पति ने स्नान किया — 'इसी शरीर से, इस प्रयाग में, मुझे वैकुण्ठ की प्राप्ति हो।'

श्लोक 32 (padma.6.221.32)

प्रतीच्छया स्नानमात्रे मिथुने तत्र भूपते । आगतौ सुरशार्दूलौ हंसपक्षींद्रवाहनौ ।

pratīcchayā snānamātre mithune tatra bhūpate āgatau suraśārdūlau haṁsapakṣīṁdravāhanau

जब वे दोनों श्रद्धापूर्वक वहाँ स्नान कर रहे थे, हे राजन्, तभी हंस और गरुड़ पर सवार दो श्रेष्ठ देव वहाँ पधारे।

श्लोक 33 (padma.6.221.33)

आगतौ तौ समालोक्य वीरवर्मा स भूपतिः । प्रणम्य शिरसा देवौ तुष्टावैकाग्रमानसः ।

āgatau tau samālokya vīravarmā sa bhūpatiḥ praṇaṁya śirasā devau tuṣṭāvaikāgramānasaḥ

उन दोनों को आते देखकर राजा वीरवर्मा ने सिर झुकाकर उन देवताओं को प्रणाम किया और एकाग्रचित्त होकर उनकी स्तुति की।

श्लोक 34 (padma.6.221.34)

राजोवाच- नमो वां सुरशार्दूलौ बिभ्रद्भ्यामसितारुणे । वपुषी क्षौमवासांसि हेमसिंदूरभानि च ।

rājovāca namo vāṁ suraśārdūlau bibhradbhyāmasitāruṇe vapuṣī kṣaumavāsāṁsi hemasiṁdūrabhāni ca

राजा ने कहा — काले और लाल वर्ण के शरीर धारण करने वाले, स्वर्ण और सिन्दूर के समान कान्तिमय रेशमी वस्त्र पहने हुए, हे श्रेष्ठ देवो, आप दोनों को नमस्कार है।

श्लोक 35 (padma.6.221.35)

वंदे युवां सत्वरजः प्रधानौ चराचरस्य स्थितिसर्गहेतू । वैकुंठसत्याद्भुतलोकनाथौ चतुर्द्विबाहू खगराजवाहौ ।

vaṁde yuvāṁ satvarajaḥ pradhānau carācarasya sthitisargahetū vaikuṁṭhasatyādbhutalokanāthau caturdvibāhū khagarājavāhau

हे सत्त्व और रज के प्रधान रूप, चराचर जगत् की स्थिति और सृष्टि के कारण, सत्य और अद्भुत वैकुण्ठलोक के स्वामी, चार भुजा और दो भुजा वाले, गरुड़वाहन — मैं आप दोनों की वन्दना करता हूँ।

श्लोक 36 (padma.6.221.36)

वैराग्यसंरागवतां जनानां सन्मुक्तिभुक्तिप्रतिपादिकौ च । वृंदारके वंदितपादपद्मौ सद्भावनम्रेण नमामि मूर्ध्ना ।

vairāgyasaṁrāgavatāṁ janānāṁ saṁmuktibhuktipratipādikau ca vṛṁdārake vaṁditapādapadmau sadbhāvanaṁreṇa namāmi mūrdhnā

वैराग्य और अनुराग रखने वाले जनों को क्रमशः मुक्ति और भोग प्रदान करने वाले, देवगणों द्वारा वन्दित चरणकमल वाले, हे पूज्यो, सच्चे भाव से नत मस्तक होकर मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 37 (padma.6.221.37)

गोविंदवृंदारकवंद्यपाद न कोऽपि जानाति तव स्वरूपम् । यतः परस्त्वं प्रकृतेश्च पुंसो मनोवचोभ्यामपि दूरवर्ती ।

goviṁdavṛṁdārakavaṁdyapāda na ko'pi jānāti tava svarūpam yataḥ parastvaṁ prakṛteśca puṁso manovacobhyāmapi dūravartī

हे गोविन्द, देवगणों से वन्दित चरणों वाले, आपके वास्तविक स्वरूप को कोई नहीं जानता, क्योंकि आप प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हैं, मन और वाणी की पहुँच से भी अत्यंत दूर हैं।

श्लोक 38 (padma.6.221.38)

धन्यः सलोके पुरुषः परात्मन्यो विश्वमेतत्क्षणिकं विचिंत्य । अनन्यचेता भजति त्वदीय पादारविंदं मुनिवृंदवंद्यम् ।

dhaṁyaḥ saloke puruṣaḥ parātmaṁyo viśvametatkṣaṇikaṁ viciṁtya anaṁyacetā bhajati tvadīya pādāraviṁdaṁ munivṛṁdavaṁdyam

इस संसार को क्षणभंगुर जानकर जो पुरुष अनन्य चित्त से मुनिगणों द्वारा वन्दित आपके चरणकमल का भजन करता है, वह संसार में सचमुच धन्य है।

श्लोक 39 (padma.6.221.39)

त्वत्पादसेवनंनाम तीर्थमेतच्च दुर्लभम् । जनानां भजमानानां वांछितार्थफलप्रदम् ।

tvatpādasevanaṁnāma tīrthametacca durlabham janānāṁ bhajamānānāṁ vāṁchitārthaphalapradam

आपके चरणों की यह सेवा ही एक दुर्लभ तीर्थ है, जो भजन करने वाले जनों को इच्छित फल प्रदान करती है।

श्लोक 40 (padma.6.221.40)

तथाप्येतद्द्वयं सेव्यं मुक्तये नान्यलब्धये । अन्यकामनया यस्तु सेवते स तु वंचितः ।

tathāpyetaddvayaṁ sevyaṁ muktaye nāṁyalabdhaye aṁyakāmanayā yastu sevate sa tu vaṁcitaḥ

फिर भी यह दोनों (तीर्थ और आपकी भक्ति) केवल मुक्ति के लिए ही सेवनीय हैं, किसी अन्य प्राप्ति के लिए नहीं; जो अन्य कामना से इनकी सेवा करता है, वह वस्तुतः ठगा जाता है।

श्लोक 41 (padma.6.221.41)

संतो भवंतमासेव्य तीर्थमेतच्च मुक्तिदम् । नान्यमिच्छंत्यतिक्रम्य सर्वलोकान्जिजीषवः ।

saṁto bhavaṁtamāsevya tīrthametacca muktidam nāṁyamicchaṁtyatikraṁya sarvalokāṁjijīṣavaḥ

सन्त पुरुष आपकी और इस मुक्तिदायक तीर्थ की सेवा करके अन्य कुछ नहीं चाहते, वे समस्त लोकों को लांघकर विजय पाने की इच्छा रखते हैं।

श्लोक 42 (padma.6.221.42)

नारद उवाच- इत्यभिष्टूय देवेशं लोकेशं स च भूपतिः । तस्थौ यदा तदा राजन्हेमांगी सा जगाद ह ।

nārada uvāca ityabhiṣṭūya deveśaṁ lokeśaṁ sa ca bhūpatiḥ tasthau yadā tadā rājaṁhemāṁgī sā jagāda ha

नारद जी ने कहा — इस प्रकार देवेश्वर और लोकेश्वर की स्तुति करके जब वह राजा मौन हो गया, तब हेमांगी ने यह कहा —

श्लोक 43 (padma.6.221.43)

पद्मापते पद्मपलाशलोचन ब्रह्मन्करालासन भारती गुरो । नमो युवाभ्यां यदि दीनचेतसे प्रसीदतां तारयतां भवाब्धेः ।

padmāpate padmapalāśalocana brahmaṁkarālāsana bhāratī guro namo yuvābhyāṁ yadi dīnacetase prasīdatāṁ tārayatāṁ bhavābdheḥ

हे लक्ष्मीपते, हे कमलदल-लोचन; हे भयंकर आसन पर विराजमान ब्रह्मन्, हे वाणी के स्वामी गुरो — आप दोनों को नमस्कार है। यदि दीनचित्त पर प्रसन्न हों, तो कृपा करके भवसागर से पार कराएँ।

श्लोक 44 (padma.6.221.44)

तीर्थस्यास्य प्रसादेन जाताहं महिषी प्रभो । युवयोर्दर्शनं जातं देवानामपि दुर्लभम् ।

tīrthasyāsya prasādena jātāhaṁ mahiṣī prabho yuvayordarśanaṁ jātaṁ devānāmapi durlabham

इस तीर्थ की कृपा से मैं महारानी बनी, हे प्रभो; आप दोनों का दर्शन तो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 45 (padma.6.221.45)

युवामखिलचित्तज्ञौ दत्तं नौ मानसेप्सितम् । स्नानकाले यदावाभ्यां विहितं पारमार्थिकम् ।

yuvāmakhilacittajṁau dattaṁ nau mānasepsitam snānakāle yadāvābhyāṁ vihitaṁ pāramārthikam

सबके मन को जानने वाले आप दोनों ने हमें वही दिया है जो हमारे मन को अभीष्ट था — स्नान के समय आप दोनों ने जो परमार्थ हेतु विधान किया था।

श्लोक 46 (padma.6.221.46)

एवं ताभ्यामुभाभ्यां तौ संस्तुतौ देवपुंगवौ । प्रसन्नवदनौ भूत्वा प्रोचतुर्दंपती प्रति ।

evaṁ tābhyāmubhābhyāṁ tau saṁstutau devapuṁgavau prasaṁnavadanau bhūtvā procaturdaṁpatī prati

इस प्रकार उन दोनों द्वारा स्तुति किए जाने पर, वे दोनों श्रेष्ठ देव प्रसन्नमुख होकर उस दम्पति से बोले।

श्लोक 47 (padma.6.221.47)

हरिब्रह्माणावूचतुः । धन्या त्वमसि हेमांगि यतोऽयं तारितः पतिः । त्वया राज्यसुखासक्त चित्तोप्येतत्समागमात् ।

haribrahmāṇāvūcatuḥ dhaṁyā tvamasi hemāṁgi yato'yaṁ tāritaḥ patiḥ tvayā rājyasukhāsakta cittopyetatsamāgamāt

हरि और ब्रह्मा ने कहा — हे हेमांगी! तुम धन्य हो, क्योंकि तुम्हारे कारण तुम्हारा पति तर गया — यद्यपि उसका चित्त राज्यसुख में आसक्त था, फिर भी इस मिलन से वह तर गया।

श्लोक 48 (padma.6.221.48)

राज्ञां विषयसक्तानां दुर्लभा मुक्तिरीदृशी । त्वद्भर्तुर्यादृशी जाता तीर्थस्यास्य प्रसादतः ।

rājṁāṁ viṣayasaktānāṁ durlabhā muktirīdṛśī tvadbharturyādṛśī jātā tīrthasyāsya prasādataḥ

विषयासक्त राजाओं के लिए ऐसी मुक्ति दुर्लभ है, किन्तु इस तीर्थ की कृपा से तुम्हारे पति को ऐसी ही मुक्ति प्राप्त हुई।

श्लोक 49 (padma.6.221.49)

नारद उवाच- इत्युक्त्वा तौ समालोक्य गरुडं पक्षिपुंगवम् । जग्मतुस्तौ सुरश्रेष्ठौ सत्यलोकं नरेश्वर ।

nārada uvāca ityuktvā tau samālokya garuḍaṁ pakṣipuṁgavam jagmatustau suraśreṣṭhau satyalokaṁ nareśvara

नारद जी ने कहा — ऐसा कहकर और पक्षिराज गरुड़ की ओर देखकर वे दोनों श्रेष्ठ देव, हे नरेश्वर, सत्यलोक की ओर चले गए।

श्लोक 50 (padma.6.221.50)

तत्र ते ब्रह्मणा सर्वे पूजिता विधिवन्नृप । तस्य चित्तानुरोधेन तस्थुरेकं मुहूर्तकम् ।

tatra te brahmaṇā sarve pūjitā vidhivaṁnṛpa tasya cittānurodhena tasthurekaṁ muhūrtakam

वहाँ ब्रह्मा सहित सभी ने उनका विधिवत सत्कार किया, हे राजन्; और उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए वे सब एक मुहूर्त तक वहाँ ठहरे।

श्लोक 51 (padma.6.221.51)

अथ ताभ्यामुभाभ्यां स दंपतीभ्यां समं हरिः । आरुह्य गरुडं श्रीमद्वैकुंठमगमन्नृप ।

atha tābhyāmubhābhyāṁ sa daṁpatībhyāṁ samaṁ hariḥ āruhya garuḍaṁ śrīmadvaikuṁṭhamagamaṁnṛpa

फिर उस दम्पति के साथ हरि गरुड़ पर सवार होकर, हे राजन्, श्रीमान् वैकुण्ठ को चले गए।

श्लोक 52 (padma.6.221.52)

इत्येतत्कथितं तुभ्यं तीर्थराजस्य वैभवम् । पुण्यं समस्तपापघ्नं यशस्यं सुतदं नृप ।

ityetatkathitaṁ tubhyaṁ tīrtharājasya vaibhavam puṁyaṁ samastapāpaghnaṁ yaśasyaṁ sutadaṁ nṛpa

इस प्रकार, हे राजन्, तुम्हें इस तीर्थराज की महिमा बताई गई — जो पुण्यमय है, समस्त पापों का नाश करने वाली, यशदायिनी और पुत्रप्रद है।

श्लोक 53 (padma.6.221.53)

य एतच्छृणुयान्नित्यं पठेदपि च मानवः । स गच्छेद्वांछितं स्थानं सत्यमेतन्मयोदितम् ।

ya etacchṛṇuyāṁnityaṁ paṭhedapi ca mānavaḥ sa gacchedvāṁchitaṁ sthānaṁ satyametaṁmayoditam

जो कोई इसे नित्य सुनता है, अथवा इसका पाठ भी करता है, वह अपनी इच्छित स्थान को प्राप्त करता है — यह सत्य मैंने कहा है।

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