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उत्तर खण्ड · अध्याय 223

दिलीप को मंत्ररत्न का उपदेश

अध्याय 222अध्याय-सूचीअध्याय 224

श्लोक 1 (padma.6.223.1)

शौनक उवाच- सूतसूत महाभाग धन्योसि त्वं भवांबुधौ । यन्नोऽत्यर्थं निमग्नानां पाययस्वमृतोत्करम् ।

śaunaka uvāca sūtasūta mahābhāga dhaṁyosi tvaṁ bhavāṁbudhau yaṁno'tyarthaṁ nimagnānāṁ pāyayasvamṛtotkaram

शौनक जी ने कहा — हे सूतपुत्र महाभाग! आप संसार-सागर में धन्य हैं, क्योंकि इसमें अत्यंत डूबे हुए हम लोगों को आप अमृत-राशि पिला रहे हैं।

श्लोक 2 (padma.6.223.2)

साधोऽत्र भवनिस्तार वांछतां नः समादिश । मंत्ररत्नं भावशुद्धं यन्मयं सचराचरम् ।

sādho'tra bhavanistāra vāṁchatāṁ naḥ samādiśa maṁtraratnaṁ bhāvaśuddhaṁ yaṁmayaṁ sacarācaram

हे साधो! संसार से पार होने की इच्छा रखने वाले हम लोगों को उस भावशुद्ध, चराचरमय मंत्ररत्न का उपदेश दीजिए।

श्लोक 3 (padma.6.223.3)

सूत उवाच- शृणु शौनक वक्ष्यामि मंत्ररत्नं महाद्भुतम् । यद्दिलीपाय गदितं वसिष्ठेन महात्मना ।

sūta uvāca śṛṇu śaunaka vakṣyāmi maṁtraratnaṁ mahādbhutam yaddilīpāya gaditaṁ vasiṣṭhena mahātmanā

सूत जी ने कहा — हे शौनक, सुनिए, मैं वह परम अद्भुत मंत्ररत्न बताता हूँ, जो महात्मा वसिष्ठ ने दिलीप को कहा था।

श्लोक 4 (padma.6.223.4)

एकदा तु दिलीपेन पृष्टमेतद्गुरुं प्रति । वसिष्ठं द्विजशार्दूलं प्रणिपत्य यथा त्वया ।

ekadā tu dilīpena pṛṣṭametadguruṁ prati vasiṣṭhaṁ dvijaśārdūlaṁ praṇipatya yathā tvayā

एक बार दिलीप ने अपने गुरु वसिष्ठ, उस द्विजश्रेष्ठ, को प्रणाम करके यही प्रश्न पूछा था, जैसा आपने मुझसे पूछा है।

श्लोक 5 (padma.6.223.5)

दिलीप उवाच- भगवन्भवता प्रोक्तास्सर्वधर्माविशेषतः । वर्णाश्रमयुता धर्मा नित्यनैमित्तिकाः क्रियाः ।

dilīpa uvāca bhagavaṁbhavatā proktāssarvadharmāviśeṣataḥ varṇāśramayutā dharmā nityanaimittikāḥ kriyāḥ

दिलीप ने कहा — हे भगवन्! आपने मुझे वर्णाश्रम-सहित सभी धर्म, नित्य-नैमित्तिक क्रियाएँ विस्तार से बताई हैं।

श्लोक 6 (padma.6.223.6)

राजधर्म्माश्च यज्ञाश्च तीर्थदानव्रतादिकम् । श्रुता मया मुनिःश्रेष्ठ अक्षय्य स्वर्गभोगदाः ।

rājadharṁmāśca yajṁāśca tīrthadānavratādikam śrutā mayā muniḥśreṣṭha akṣayya svargabhogadāḥ

राजधर्म, यज्ञ, तीर्थ, दान, व्रत आदि — हे मुनिश्रेष्ठ, मैंने आपसे सुने हैं, जो अक्षय स्वर्ग-भोग देने वाले हैं।

श्लोक 7 (padma.6.223.7)

अधुना श्रोतुमिच्छामि मोक्षमार्गं सनातनम् । दिष्ट्याहं येन गच्छामि तद्ब्रह्मन्वक्तुमर्हसि ।

adhunā śrotumicchāmi mokṣamārgaṁ sanātanam diṣṭyāhaṁ yena gacchāmi tadbrahmaṁvaktumarhasi

अब मैं सनातन मोक्षमार्ग सुनना चाहता हूँ, जिससे मैं सौभाग्य से उसे प्राप्त कर सकूँ — हे ब्रह्मन्, वह मुझे बताइए।

श्लोक 8 (padma.6.223.8)

को मंत्रं सर्वमंत्राणां भवरोगैकभेषजम् । सर्वेषामेव देहीनां को हि मोक्षप्रदः परः ।

ko maṁtraṁ sarvamaṁtrāṇāṁ bhavarogaikabheṣajam sarveṣāmeva dehīnāṁ ko hi mokṣapradaḥ paraḥ

सब मंत्रों में वह कौन-सा मंत्र है जो भवरोग की एकमात्र औषधि है? समस्त प्राणियों को परम मोक्ष देने वाला वह श्रेष्ठ मंत्र कौन-सा है?

श्लोक 9 (padma.6.223.9)

तत्समाख्याहि तत्त्वेन मयि वात्सल्यगौरवात् ।

tatsamākhyāhi tattvena mayi vātsalyagauravāt

मुझ पर वात्सल्य के गौरव से वह मुझे यथार्थ रूप में बताइए।

श्लोक 10 (padma.6.223.10)

वसिष्ठ उवाच- साधुपृष्टं त्वया राजन्सर्वलोकहितैषिणा । वक्ष्यामि परमं गुह्यमेकं संसारतारकम् ।

vasiṣṭha uvāca sādhupṛṣṭaṁ tvayā rājaṁsarvalokahitaiṣiṇā vakṣyāmi paramaṁ guhyamekaṁ saṁsāratārakam

वसिष्ठ जी ने कहा — हे राजन्! सर्वलोकहितैषी आपने अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं वह परम गुह्य, संसार से तारने वाला एक मंत्र बताता हूँ।

श्लोक 11 (padma.6.223.11)

पुरा महर्षयः सर्वे यज्ञदानपराः शुभाः । पप्रच्छुर्ब्रह्मणः पुत्रं नारदं मुनिसत्तमम् ।

purā maharṣayaḥ sarve yajṁadānaparāḥ śubhāḥ papracchurbrahmaṇaḥ putraṁ nāradaṁ munisattamam

पूर्वकाल में यज्ञ-दान में तत्पर सभी शुभ महर्षियों ने ब्रह्मा के पुत्र मुनिश्रेष्ठ नारद से यह पूछा था।

श्लोक 12 (padma.6.223.12)

महर्षय ऊचुः - भगवन्केन मंत्रेण गच्छामः परमं पदम् । तन्नो ब्रूहि महाभाग प्रसादं कर्तुमर्हसि ।

maharṣaya ūcuḥ bhagavaṁkena maṁtreṇa gacchāmaḥ paramaṁ padam taṁno brūhi mahābhāga prasādaṁ kartumarhasi

महर्षियों ने कहा — हे भगवन्! किस मंत्र से हम परम पद को प्राप्त करें? हे महाभाग, वह हमें बताकर कृपा कीजिए।

श्लोक 13 (padma.6.223.13)

नारद उवाच-। पितामहं पुरा सर्वे योगिनः सनकादयः । पप्रच्छुरेकमेकांते मोक्षमार्गं सुदुर्ल्लभम् ।

nārada uvāca pitāmahaṁ purā sarve yoginaḥ sanakādayaḥ papracchurekamekāṁte mokṣamārgaṁ sudurllabham

नारद जी ने कहा — पूर्वकाल में सभी योगियों, सनक आदि ने, एकांत में पितामह ब्रह्मा से इस अत्यंत दुर्लभ मोक्षमार्ग के विषय में पूछा था।

श्लोक 14 (padma.6.223.14)

ब्रह्मोवाच-। शृणुध्वं योगिनः सर्वे रहस्यमिदमद्भुतम् ।

brahmovāca śṛṇudhvaṁ yoginaḥ sarve rahasyamidamadbhutam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे योगियों! तुम सब यह अद्भुत रहस्य सुनो।

श्लोक 15 (padma.6.223.15)

न जानंति सुराः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः । सर्गादौ प्रोक्तवान्देवो मह्यं नारायणोऽव्ययः ।

na jānaṁti surāḥ sarve ṛṣayaśca tapodhanāḥ sargādau proktavāṁdevo mahyaṁ nārāyaṇo'vyayaḥ

इसे सभी देवता और तपोधन ऋषि भी नहीं जानते। सृष्टि के आरंभ में अव्यय देव नारायण ने यह मुझे बताया था।

श्लोक 16 (padma.6.223.16)

ईश्वर्या सह देव्या च सम्यक्संपूजितो मया । ततः प्रसन्नो भगवान्मम नारायणोऽव्ययः ।

īśvaryā saha devyā ca saṁyaksaṁpūjito mayā tataḥ prasaṁno bhagavāṁmama nārāyaṇo'vyayaḥ

देवी ईश्वरी (लक्ष्मी) सहित उनकी भलीभाँति पूजा करने पर, अव्यय भगवान नारायण मुझ पर प्रसन्न हुए।

श्लोक 17 (padma.6.223.17)

प्राजापत्यं ददौ मह्यं श्रुतिजं सर्ववाङ्मयम् । प्रकाशकानि मंत्राणि व्यापकाव्यापकानि च ।

prājāpatyaṁ dadau mahyaṁ śrutijaṁ sarvavāṁmayam prakāśakāni maṁtrāṇi vyāpakāvyāpakāni ca

उन्होंने मुझे प्राजापत्य पद, श्रुतिजनित संपूर्ण वाङ्मय, तथा व्यापक और अव्यापक — सत्य को प्रकाशित करने वाले मंत्र प्रदान किए।

श्लोक 18 (padma.6.223.18)

ततस्तमब्रुवं देवं पुराणपुरुषोत्तमम् । भगवन्केन मंत्रेण संसारोत्तारणं नृणाम् ।

tatastamabruvaṁ devaṁ purāṇapuruṣottamam bhagavaṁkena maṁtreṇa saṁsārottāraṇaṁ nṛṇām

तब मैंने उस पुराणपुरुषोत्तम देव से कहा — हे भगवन्! किस मंत्र से मनुष्यों का संसार से उद्धार होता है?

श्लोक 19 (padma.6.223.19)

तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वलोकहिताय वै । को मन्त्रः सर्वमन्त्राणां पुरश्चरणवर्जितः ।

taṁmamācakṣva tattvena sarvalokahitāya vai ko maṁtraḥ sarvamaṁtrāṇāṁ puraścaraṇavarjitaḥ

वह मुझे तत्त्वतः बताइए, सर्वलोक के हित के लिए — सब मंत्रों में वह कौन-सा मंत्र है जो पुरश्चरण से रहित है,

श्लोक 20 (padma.6.223.20)

सकृदुच्चारणान्नृणां ददाति परमं पदम् । श्रीभगवानुवाच- साधुपृष्टं महाभाग सर्वलोकहितैषिणा ।

sakṛduccāraṇāṁnṛṇāṁ dadāti paramaṁ padam śrībhagavānuvāca sādhupṛṣṭaṁ mahābhāga sarvalokahitaiṣiṇā

और मनुष्यों को केवल एक बार उच्चारण से ही परम पद प्रदान करता है? श्रीभगवान ने कहा — हे महाभाग, सर्वलोकहितैषी आपने अच्छा पूछा है।

श्लोक 21 (padma.6.223.21)

तस्माद्वक्ष्यामि ते गुह्यं येन मामाप्नुयुर्नराः ।

tasmādvakṣyāmi te guhyaṁ yena māmāpnuyurnarāḥ

इसलिए मैं वह गुह्य रहस्य बताता हूँ जिससे मनुष्य मुझे प्राप्त कर सकें।

श्लोक 22 (padma.6.223.22)

सर्वेषामेव मंत्राणां मंत्ररत्नं शुभावहम् । सकृत्स्मरणमात्रेण ददाति परमं पदम् ।

sarveṣāmeva maṁtrāṇāṁ maṁtraratnaṁ śubhāvaham sakṛtsmaraṇamātreṇa dadāti paramaṁ padam

सभी मंत्रों में यह शुभकारी मंत्ररत्न है, जो केवल एक बार स्मरण करने मात्र से परम पद प्रदान करता है।

श्लोक 23 (padma.6.223.23)

मंत्ररत्नद्वयं न्यासं प्रयतिः शरणागतिः । लक्ष्मीनारायणमिति मन्त्रः सर्वफलप्रदः ।

maṁtraratnadvayaṁ ṁyāsaṁ prayatiḥ śaraṇāgatiḥ lakṣmīnārāyaṇamiti maṁtraḥ sarvaphalapradaḥ

मंत्ररत्न-द्वय है — न्यास, प्रपत्ति और शरणागति सहित 'लक्ष्मीनारायण' — यह सर्वफलप्रद मंत्र है।

श्लोक 24 (padma.6.223.24)

नामानि मंत्ररत्नस्य पर्य्यायेण निबोधत । तस्योच्चारणमात्रेण परितुष्टोस्मि नित्यशः ।

nāmāni maṁtraratnasya paryyāyeṇa nibodhata tasyoccāraṇamātreṇa parituṣṭosmi nityaśaḥ

अब इस मंत्ररत्न के नामों को क्रमशः सुनो; इसके उच्चारण मात्र से मैं सदा संतुष्ट रहता हूँ।

श्लोक 25 (padma.6.223.25)

कुलजो वा तपस्वी वा वेदवेदांगपारगः । यज्ञदानपरो वापि सर्वतीर्थोपसेवकः ।

kulajo vā tapasvī vā vedavedāṁgapāragaḥ yajṁadānaparo vāpi sarvatīrthopasevakaḥ

चाहे कोई कुलीन हो, तपस्वी हो, वेद-वेदांगपारंगत हो, यज्ञ-दान में तत्पर हो, या सभी तीर्थों का सेवक हो,

श्लोक 26 (padma.6.223.26)

व्रती वा सत्यवादी वा यतिर्वा ज्ञानवानपि । मन्त्राधिकारी न भवेत्तं प्रयत्नेन वर्जयेत् ।

vratī vā satyavādī vā yatirvā jṁānavānapi maṁtrādhikārī na bhavettaṁ prayatnena varjayet

चाहे व्रती हो, सत्यवादी हो, यति हो, अथवा ज्ञानवान भी हो — यदि वह मंत्र का अधिकारी न हो, तो उसे यत्नपूर्वक वर्जित करना चाहिए।

श्लोक 27 (padma.6.223.27)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या स्त्रियः शूद्रास्तथेतराः । तस्याधिकारिणः सर्वे मम भक्तास्तु ते यदि ।

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā striyaḥ śūdrāstathetarāḥ tasyādhikāriṇaḥ sarve mama bhaktāstu te yadi

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्रियाँ, शूद्र तथा अन्य सभी — यदि वे मेरे भक्त हों, तो सभी इसके अधिकारी हैं।

श्लोक 28 (padma.6.223.28)

अनन्यशरणानां च तथैवानन्यसेविनाम् । अनन्यसाधकानां च वक्तव्यो मन्त्र उत्तमः ।

anaṁyaśaraṇānāṁ ca tathaivānaṁyasevinām anaṁyasādhakānāṁ ca vaktavyo maṁtra uttamaḥ

जो अनन्यशरण हैं, अनन्यसेवी हैं, और अनन्यसाधक हैं — उन्हें ही यह श्रेष्ठ मंत्र बताना चाहिए।

श्लोक 29 (padma.6.223.29)

आर्तानामाशु फलदस्सकृदेव कृतो ह्यसौ । दृप्तानामपि जन्तूनां देहान्तरनिवारणः ।

ārtānāmāśu phaladassakṛdeva kṛto hyasau dṛptānāmapi jaṁtūnāṁ dehāṁtaranivāraṇaḥ

यह आर्त (दुःखी) जनों को तुरंत फल देने वाला है, केवल एक बार करने पर भी। यह अहंकारी प्राणियों के भी पुनर्जन्म को रोकने वाला है।

श्लोक 30 (padma.6.223.30)

आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी वापि प्रजापतिः । सकृन्मां शरणं याति ततः कामानवाप्नुयात् ।

ārtto jijṁāsurarthārthī jṁānī vāpi prajāpatiḥ sakṛṁmāṁ śaraṇaṁ yāti tataḥ kāmānavāpnuyāt

दुःखी, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी अथवा स्वयं प्रजापति भी — जो एक बार मेरी शरण लेता है, वह अपनी कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 31 (padma.6.223.31)

नादीक्षिताय वक्तव्यं नाभक्ताय च मानिने । नास्तिकाय न लुब्धाय न श्रद्धाविमुखाय च ।

nādīkṣitāya vaktavyaṁ nābhaktāya ca mānine nāstikāya na lubdhāya na śraddhāvimukhāya ca

यह अदीक्षित को, अभक्त अभिमानी को, नास्तिक को, लोभी को और श्रद्धाहीन को नहीं बताना चाहिए।

श्लोक 32 (padma.6.223.32)

न चाशुश्रूषवे वाच्यं नासंवत्सरवासिने । कामक्रोधविमुक्तस्तु दंभलोभविवर्जितः ।

na cāśuśrūṣave vācyaṁ nāsaṁvatsaravāsine kāmakrodhavimuktastu daṁbhalobhavivarjitaḥ

न सेवा न करने वाले को, न एक वर्ष तक साथ न रहने वाले को बताना चाहिए। किंतु जो काम-क्रोध से मुक्त, दंभ-लोभ से रहित है,

श्लोक 33 (padma.6.223.33)

मां च यो व्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । वक्तव्य तस्य विधिवन्मंत्ररत्नमनुत्तमम् ।

māṁ ca yo vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate vaktavya tasya vidhivaṁmaṁtraratnamanuttamam

और जो निष्कपट भक्तियोग से मेरी सेवा करता है — उसे ही विधिपूर्वक यह अनुपम मंत्ररत्न बताना चाहिए।

श्लोक 34 (padma.6.223.34)

देशकालादिनियमानरिमित्रादि शोधनम् । न्यासमुद्रादिकं तस्य पुरश्चरणसंयुतम् ।

deśakālādiniyamānarimitrādi śodhanam ṁyāsamudrādikaṁ tasya puraścaraṇasaṁyutam

देश-काल आदि के नियम, शत्रु-मित्र आदि की शुद्धि, न्यास-मुद्रा आदि, पुरश्चरण सहित —

श्लोक 35 (padma.6.223.35)

मच्चक्रांकितदेहत्वं मदीयाराधनं तथा । मयि सन्यस्तकर्मत्वं मदनन्यशरण्यतता ।

maccakrāṁkitadehatvaṁ madīyārādhanaṁ tathā mayi saṁyastakarmatvaṁ madanaṁyaśaraṁyatatā

मेरे चक्र से अंकित शरीर होना, मेरी आराधना, मुझ पर कर्मों का समर्पण, मेरे अतिरिक्त अन्य शरण न मानना,

श्लोक 36 (padma.6.223.36)

मयि सर्वफलन्यासो महाविश्वासपूर्वकम् । अनन्यसाधनो यत्नस्त्वकिंचनत्वमात्मनः ।

mayi sarvaphalaṁyāso mahāviśvāsapūrvakam anaṁyasādhano yatnastvakiṁcanatvamātmanaḥ

मुझ पर महाविश्वासपूर्वक सभी फलों का न्यास, अनन्य साधन में यत्न, तथा अपनी अकिंचनता का भाव —

श्लोक 37 (padma.6.223.37)

अवैष्णवानां संभाषा वंदनादि विवर्जनम् । अनन्यदेवतानां च वन्दनं पूजनं तथा ।

avaiṣṇavānāṁ saṁbhāṣā vaṁdanādi vivarjanam anaṁyadevatānāṁ ca vaṁdanaṁ pūjanaṁ tathā

अवैष्णवों से बातचीत और उन्हें वंदन आदि का त्याग, तथा अन्य देवताओं के वंदन-पूजन का त्याग —

श्लोक 38 (padma.6.223.38)

एवमाद्यादि नियमां प्रपन्नस्य प्रकीर्तिताः । इत्यादिगुणयुक्तस्य वक्तव्यं मंत्रमुत्तमम् ।

evamādyādi niyamāṁ prapaṁnasya prakīrtitāḥ ityādiguṇayuktasya vaktavyaṁ maṁtramuttamam

— शरणागत के लिए ये ही आदि नियम कहे गए हैं। ऐसे गुणों से युक्त व्यक्ति को ही यह श्रेष्ठ मंत्र बताना चाहिए।

श्लोक 39 (padma.6.223.39)

तस्य नारायणश्चाहमृषिर्विष्णुः सनातनः । देवता च श्रिया सार्द्धमहं वात्सल्यसागरः ।

tasya nārāyaṇaścāhamṛṣirviṣṇuḥ sanātanaḥ devatā ca śriyā sārddhamahaṁ vātsalyasāgaraḥ

उसके लिए मैं नारायण ही ऋषि हूँ, सनातन विष्णु छंद हैं; और श्री सहित मैं ही देवता हूँ — वात्सल्य का सागर।

श्लोक 40 (padma.6.223.40)

सर्वलोकेश्वरः श्रीमान्सुशीलः सुभगस्तथा । सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च सदापूर्णमनोरथः ।

sarvalokeśvaraḥ śrīmāṁsuśīlaḥ subhagastathā sarvajṁaḥ sarvaśaktiśca sadāpūrṇamanorathaḥ

सर्वलोकेश्वर, श्रीमान, सुशील, सुभग, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सदा पूर्णमनोरथ,

श्लोक 41 (padma.6.223.41)

सर्वगः सर्वबंधुश्च कृपापीयूषसागरः । श्रीमन्नारायणश्चाहं देवता समुदाहृतः ।

sarvagaḥ sarvabaṁdhuśca kṛpāpīyūṣasāgaraḥ śrīmaṁnārāyaṇaścāhaṁ devatā samudāhṛtaḥ

सर्वगामी, सबका बंधु, कृपा के अमृत का सागर — मैं ही श्रीमन्नारायण, इस मंत्र का देवता कहा गया हूँ।

श्लोक 42 (padma.6.223.42)

छंदस्तु देवी गायत्री पंचविंशाक्षरात्मिका । द्विस्सप्तषट्त्रिपंचद्विषडंगानि नियोजयेत् ।

chaṁdastu devī gāyatrī paṁcaviṁśākṣarātmikā dvissaptaṣaṭtripaṁcadviṣaḍaṁgāni niyojayet

इसका छंद देवी गायत्री है, जो पच्चीस अक्षरों वाली है। इसके अंगों का न्यास दो-सात-छह-तीन-पाँच-दो-छह के क्रम से करना चाहिए।

श्लोक 43 (padma.6.223.43)

लक्ष्म्या मदनपायिन्या मां ध्यायेद्विश्वरूपिणम् । चक्रशंखगदापद्मपाणिनं दिव्यरूपिणम् ।

lakṣṁyā madanapāyiṁyā māṁ dhyāyedviśvarūpiṇam cakraśaṁkhagadāpadmapāṇinaṁ divyarūpiṇam

मुझसे कभी अलग न होने वाली लक्ष्मी सहित मुझ विश्वरूप का ध्यान करना चाहिए — चक्र, शंख, गदा, पद्म हाथों में लिए दिव्यरूप।

श्लोक 44 (padma.6.223.44)

वामांकस्थश्रिया सार्द्धं पूजयेत्प्रयतं शुचिः । अनेन मंत्ररत्नेन गंधपुष्पनिवेदनैः । सकृत्संपूज्यमानोऽपि संतुष्टोस्मि प्रजापते ।

vāmāṁkasthaśriyā sārddhaṁ pūjayetprayataṁ śuciḥ anena maṁtraratnena gaṁdhapuṣpanivedanaiḥ sakṛtsaṁpūjyamāno'pi saṁtuṣṭosmi prajāpate

वाम अंक में स्थित श्री सहित मुझे, विनीत और शुद्ध होकर, इस मंत्ररत्न से गंध-पुष्प निवेदन द्वारा पूजना चाहिए — एक बार भी पूजित होने पर मैं संतुष्ट हो जाता हूँ, हे प्रजापते।

श्लोक 45 (padma.6.223.45)

ब्रह्मोवाच- सम्यगुक्तं त्वया नाथ रहस्यमिदमुत्तमम् । मंत्ररत्नप्रभावश्च सर्वसिद्धिप्रदो नृणाम् ।

brahmovāca saṁyaguktaṁ tvayā nātha rahasyamidamuttamam maṁtraratnaprabhāvaśca sarvasiddhiprado nṛṇām

ब्रह्मा जी ने कहा — हे नाथ! आपने यह उत्तम रहस्य भलीभाँति बताया। यह मंत्ररत्न का प्रभाव मनुष्यों को सभी सिद्धियाँ देने वाला है।

श्लोक 46 (padma.6.223.46)

पिता त्वं सर्वलोकानां माता त्वं गुरुरेव च । त्वं च स्वामी सखा भ्राता गतिस्त्वं शरणं सुहृत् ।

pitā tvaṁ sarvalokānāṁ mātā tvaṁ gurureva ca tvaṁ ca svāmī sakhā bhrātā gatistvaṁ śaraṇaṁ suhṛt

आप ही सब लोकों के पिता हैं, आप ही माता हैं और गुरु भी। आप ही स्वामी, सखा, भ्राता, गति, शरण और सुहृद् हैं।

श्लोक 47 (padma.6.223.47)

अहं तु तव देवेश दासश्शिष्यस्तथा सुहृत् । तस्मान्मम दयासिंधो प्रोक्तवानिदमुत्तमम् ।

ahaṁ tu tava deveśa dāsaśśiṣyastathā suhṛt tasmāṁmama dayāsiṁdho proktavānidamuttamam

हे देवेश! मैं तो आपका दास, शिष्य और सुहृद् हूँ। इसीलिए, हे दयासिंधु, आपने मुझे यह उत्तम रहस्य बताया है।

श्लोक 48 (padma.6.223.48)

अधुना मंत्ररत्नस्य दीक्षां सम्यग्विधानतः । ब्रूहि सर्वत्र तत्वेन लोकानां हितकाम्यया ।

adhunā maṁtraratnasya dīkṣāṁ saṁyagvidhānataḥ brūhi sarvatra tatvena lokānāṁ hitakāṁyayā

अब मंत्ररत्न की दीक्षा-विधि भलीभाँति बताइए, लोकों के हित की कामना से सर्वत्र तत्त्वतः।

श्लोक 49 (padma.6.223.49)

श्रीभगवानुवाच - शणु वत्स प्रवक्ष्यामि मंत्र दीक्षाविधिं परम् । आचार्यं संश्रयेत्पूर्वं मदाश्रयणसिद्धये ।

śrībhagavānuvāca śaṇu vatsa pravakṣyāmi maṁtra dīkṣāvidhiṁ param ācāryaṁ saṁśrayetpūrvaṁ madāśrayaṇasiddhaye

श्रीभगवान ने कहा — हे वत्स! सुनो, मैं मंत्र-दीक्षा की परम विधि बताता हूँ। सर्वप्रथम मुझ पर आश्रय की सिद्धि हेतु आचार्य का आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 50 (padma.6.223.50)

आचार्यो वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः । मंत्रज्ञो मन्त्रभक्तश्च सदा मंत्राश्रयः शुचिः ।

ācāryo vedasaṁpaṁno viṣṇubhakto vimatsaraḥ maṁtrajṁo maṁtrabhaktaśca sadā maṁtrāśrayaḥ śuciḥ

आचार्य वेदसंपन्न, विष्णुभक्त, ईर्ष्यारहित, मंत्रज्ञ, मंत्रभक्त, सदा मंत्र का आश्रय लेने वाला और शुद्ध होना चाहिए।

श्लोक 51 (padma.6.223.51)

सत्संप्रदायसंयुक्तो ब्रह्मविद्याविशारदः । अनन्यसाधनश्चैव तथानन्यप्रयोजनः ।

satsaṁpradāyasaṁyukto brahmavidyāviśāradaḥ anaṁyasādhanaścaiva tathānaṁyaprayojanaḥ

वह सत्संप्रदाय से युक्त, ब्रह्मविद्या में निपुण, अनन्य-साधन वाला और अनन्य-प्रयोजन वाला होना चाहिए।

श्लोक 52 (padma.6.223.52)

ब्राह्मणो वीतरागश्च क्रोधलोभविवर्जितः । सद्वृत्तौ शासिता चैव मुमुक्षुः परमात्मवित् ।

brāhmaṇo vītarāgaśca krodhalobhavivarjitaḥ sadvṛttau śāsitā caiva mumukṣuḥ paramātmavit

वह ब्राह्मण, वीतराग, क्रोध-लोभ से रहित, सद्वृत्ति का शासक, मुमुक्षु और परमात्मा का ज्ञाता होना चाहिए।

श्लोक 53 (padma.6.223.53)

एवमादिगुणेपेत आचार्यः स मुदा सुहृत् । आचाराञ्शासयेद्यस्तु स आचार्य इतीरितः ।

evamādiguṇepeta ācāryaḥ sa mudā suhṛt ācārāṁśāsayedyastu sa ācārya itīritaḥ

ऐसे गुणों से युक्त आचार्य ही प्रसन्नचित्त सुहृद् होता है। जो सदाचार में शिक्षा दे, वही आचार्य कहलाता है।

श्लोक 54 (padma.6.223.54)

यस्त्वाचार्यपराधीनस्सद्वृत्तौ शास्यते यदि । शासने स्थिरवृत्तश्च शिष्यः सद्भिरुदाहृतः ।

yastvācāryaparādhīnassadvṛttau śāsyate yadi śāsane sthiravṛttaśca śiṣyaḥ sadbhirudāhṛtaḥ

जो आचार्य के अधीन रहकर सद्वृत्ति में शिक्षा ग्रहण करता है और उस अनुशासन में स्थिरचित्त रहता है, उसे विद्वान लोग शिष्य कहते हैं।

श्लोक 55 (padma.6.223.55)

एवं लक्षणसंयुक्तं शिष्यं सर्वगुणान्वितम् । अध्यापयेद्विधानेन मन्त्ररत्ननुत्तमम् ।

evaṁ lakṣaṇasaṁyuktaṁ śiṣyaṁ sarvaguṇāṁvitam adhyāpayedvidhānena maṁtraratnanuttamam

इन लक्षणों से युक्त, सभी गुणों से संपन्न शिष्य को ही विधिपूर्वक यह उत्तम मंत्ररत्न सिखाना चाहिए।

श्लोक 56 (padma.6.223.56)

द्वादश्यां श्रवणे वापि कर्हिचिद्वैष्णवे दिने । सदाचार्योपसंप्रीतौ तत्र दीक्षां समाचेत् ।

dvādaśyāṁ śravaṇe vāpi karhicidvaiṣṇave dine sadācāryopasaṁprītau tatra dīkṣāṁ samācet

द्वादशी अथवा श्रवण नक्षत्र में, अथवा किसी भी वैष्णव पर्व दिन में, आचार्य की प्रसन्नता होने पर वहाँ दीक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 57 (padma.6.223.57)

सुदर्शनं पांचजन्यं सुवर्णेन प्रकारयेत् । रौप्येण वापि ताम्रेण कांस्येनापि प्रकारयेत् ।

sudarśanaṁ pāṁcajaṁyaṁ suvarṇena prakārayet raupyeṇa vāpi tāṁreṇa kāṁsyenāpi prakārayet

सुदर्शन चक्र और पांचजन्य शंख सोने से बनवाने चाहिए, अथवा चाँदी, ताँबे या काँसे से भी बनवाए जा सकते हैं।

श्लोक 58 (padma.6.223.58)

स्नाप्य पंचामृतैः शुद्धैरर्चयेत्पुरतो मम । अर्च्चयेद्गंधपुष्पाद्यैस्तन्मंत्रेण विधानतः ।

snāpya paṁcāmṛtaiḥ śuddhairarcayetpurato mama arccayedgaṁdhapuṣpādyaistaṁmaṁtreṇa vidhānataḥ

उन्हें शुद्ध पंचामृत से स्नान कराकर मेरे सम्मुख पूजा करनी चाहिए — गंध-पुष्प आदि से, विधिपूर्वक उसी मंत्र से।

श्लोक 59 (padma.6.223.59)

तत्र संस्थापयेदग्नि स्वगृह्योक्त विधानतः । आचार्यो जुहुयादाज्यं मंत्रेणाथ द्विजोत्तमः ।

tatra saṁsthāpayedagni svagṛhyokta vidhānataḥ ācāryo juhuyādājyaṁ maṁtreṇātha dvijottamaḥ

वहाँ अपने गृह्यसूत्र में कहे विधान के अनुसार अग्नि स्थापित करनी चाहिए। तब आचार्य, वह द्विजश्रेष्ठ, मंत्र से घृत की आहुति दे।

श्लोक 60 (padma.6.223.60)

अष्टोत्तरसहस्रं वा शतमष्टोत्तरं तु वा । जुहुयान्मंत्ररत्नेन तथान्यैर्वैष्णवैः शुभैः ।

aṣṭottarasahasraṁ vā śatamaṣṭottaraṁ tu vā juhuyāṁmaṁtraratnena tathāṁyairvaiṣṇavaiḥ śubhaiḥ

वह मंत्ररत्न से एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार, तथा अन्य शुभ वैष्णव मंत्रों से भी आहुति दे।

श्लोक 61 (padma.6.223.61)

मंत्रैः पुरुषसूक्ताद्यैर्जुहुयाघृतपायसम् । तस्मिन्नग्नौ क्षिपेच्चक्रं शंखं च द्विजत्तमः ।

maṁtraiḥ puruṣasūktādyairjuhuyāghṛtapāyasam tasmiṁnagnau kṣipeccakraṁ śaṁkhaṁ ca dvijattamaḥ

पुरुषसूक्त आदि मंत्रों से घृत और खीर की आहुति दे। उस अग्नि में वह द्विजश्रेष्ठ चक्र और शंख डाले।

श्लोक 62 (padma.6.223.62)

षडक्षरेण जुहुयादाज्यं विंशतिसंख्यया । प्रतप्तं चक्रमादाय मंत्रैणैव तथा गुरुः ।

ṣaḍakṣareṇa juhuyādājyaṁ viṁśatisaṁkhyayā prataptaṁ cakramādāya maṁtraiṇaiva tathā guruḥ

षडक्षर मंत्र से बीस बार घृत की आहुति दे। फिर गुरु उसी मंत्र से तपाए गए चक्र को लेकर,

श्लोक 63 (padma.6.223.63)

शंखेनैवांकनं कुर्याद्बाह्वोर्दक्षिणसव्ययोः । होमशेषं समाप्याथ पुनः पूजां समाचरेत् ।

śaṁkhenaivāṁkanaṁ kuryādbāhvordakṣiṇasavyayoḥ homaśeṣaṁ samāpyātha punaḥ pūjāṁ samācaret

शंख से भी, दाहिनी और बाईं भुजाओं पर चिह्न (अंकन) करे। होम शेष पूर्ण करके पुनः पूजा करे।

श्लोक 64 (padma.6.223.64)

ततः कलशमादाय पवित्रोदकपूरितम् । मंत्रेणैवाभिमंत्र्याथ तस्य मूर्ध्न्यभिषेचयेत् ।

tataḥ kalaśamādāya pavitrodakapūritam maṁtreṇaivābhimaṁtryātha tasya mūrdhṁyabhiṣecayet

फिर पवित्र जल से भरा कलश लेकर, उसी मंत्र से अभिमंत्रित करके उसे शिष्य के सिर पर अभिषेक करे।

श्लोक 65 (padma.6.223.65)

सितवस्त्रधरं सम्यगाचांतं विनयान्वितम् । ऊर्द्ध्वपुण्ड्रधरं शिष्यं मंत्रमध्यापयेद्गुरुः ।

sitavastradharaṁ saṁyagācāṁtaṁ vinayāṁvitam ūrddhvapuṁḍradharaṁ śiṣyaṁ maṁtramadhyāpayedguruḥ

श्वेत वस्त्र धारण किए, भलीभाँति आचमन किए, विनययुक्त और ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण किए शिष्य को गुरु मंत्र सिखाए।

श्लोक 66 (padma.6.223.66)

मंत्रार्थश्च प्रवक्तव्यो वृत्तिश्चैव विशेषतः । लब्धमंत्रस्तदाचार्यं पूजयेद्भूषणादिभिः ।

maṁtrārthaśca pravaktavyo vṛttiścaiva viśeṣataḥ labdhamaṁtrastadācāryaṁ pūjayedbhūṣaṇādibhiḥ

मंत्र का अर्थ और विशेष रूप से उसकी साधना-विधि भी बतानी चाहिए। मंत्र प्राप्त कर लेने पर शिष्य आचार्य को आभूषण आदि से पूजे।

श्लोक 67 (padma.6.223.67)

अनेन विधिना मंत्रं योऽधीते वैष्णवाद्गुरोः । ततः स वैष्णवं याति नान्यथा सुरसत्तम ।

anena vidhinā maṁtraṁ yo'dhīte vaiṣṇavādguroḥ tataḥ sa vaiṣṇavaṁ yāti nāṁyathā surasattama

इस विधि से जो वैष्णव गुरु से मंत्र सीखता है, वह वैष्णव पद को प्राप्त करता है, अन्यथा नहीं, हे सुरश्रेष्ठ।

श्लोक 68 (padma.6.223.68)

नारद उवाच- एवमुक्त्त्वा विधातारं देवदेवो हरिः पिता । स्वचक्रेणांकयित्वा तु तस्मै मंत्रं ददौ स्वयम् ।

nārada uvāca evamukttvā vidhātāraṁ devadevo hariḥ pitā svacakreṇāṁkayitvā tu tasmai maṁtraṁ dadau svayam

नारद जी ने कहा — इस प्रकार विधाता (ब्रह्मा) से कहकर देवदेव पिता हरि ने स्वयं अपने चक्र से अंकित करके उन्हें मंत्र प्रदान किया।

श्लोक 69 (padma.6.223.69)

सर्वलोकेश्वरो देवो ब्रह्मा मम पिता प्रभुः । ममापि विधिवन्मंत्रं स ददौ मुनिसत्तमाः ।

sarvalokeśvaro devo brahmā mama pitā prabhuḥ mamāpi vidhivaṁmaṁtraṁ sa dadau munisattamāḥ

सर्वलोकेश्वर देव, मेरे पिता प्रभु ब्रह्मा ने भी मुझे विधिपूर्वक वही मंत्र दिया, हे मुनिश्रेष्ठो।

श्लोक 70 (padma.6.223.70)

तस्माद्यूयं मुनिश्रेष्ठा धारयित्वा सुदर्शनम् । नारायणपदं द्वंद्वं गच्छध्वं शरणं द्विजाः ।

tasmādyūyaṁ muniśreṣṭhā dhārayitvā sudarśanam nārāyaṇapadaṁ dvaṁdvaṁ gacchadhvaṁ śaraṇaṁ dvijāḥ

इसलिए, हे मुनिश्रेष्ठो, तुम भी सुदर्शन धारण करके 'नारायण' इस युग्म पद की शरण में जाओ, हे द्विजो।

श्लोक 71 (padma.6.223.71)

वसिष्ठ उवाच- इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे नारदेन सुरर्षिणा । द्वयाधिकारिणः सर्वे याता विष्णोः परं पदम् ।

vasiṣṭha uvāca ityuktvā munayaḥ sarve nāradena surarṣiṇā dvayādhikāriṇaḥ sarve yātā viṣṇoḥ paraṁ padam

वसिष्ठ जी ने कहा — देवर्षि नारद के ऐसा कहने पर सभी मुनि, द्वय मंत्र के अधिकारी बनकर, विष्णु के परम पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 72 (padma.6.223.72)

तस्मात्त्वमपि राजर्षे विष्णुसायुज्यमिच्छसि । दीक्षामार्गविधानेन धारयित्वा सुदर्शनम् ।

tasmāttvamapi rājarṣe viṣṇusāyujyamicchasi dīkṣāmārgavidhānena dhārayitvā sudarśanam

इसलिए, हे राजर्षि, यदि आप भी विष्णु-सायुज्य चाहते हैं, तो दीक्षा-मार्ग की विधि से सुदर्शन धारण करके,

श्लोक 73 (padma.6.223.73)

नारायणपदद्वंद्वं तदेकं शरणं व्रज । सर्वलोकेश्वरः साक्षाद्ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः ।

nārāyaṇapadadvaṁdvaṁ tadekaṁ śaraṇaṁ vraja sarvalokeśvaraḥ sākṣādbrahmā tribhuvaneśvaraḥ

उस 'नारायण' युग्म पद की ही शरण में जाइए। सर्वलोकेश्वर, साक्षात् त्रिभुवनेश्वर ब्रह्मा ने—

श्लोक 74 (padma.6.223.74)

ममापि नारदस्यापि प्रोक्तवान्मंत्रमुत्तमम् । शौनकादि महर्षीणां नैमिषारण्यवासिनाम् ।

mamāpi nāradasyāpi proktavāṁmaṁtramuttamam śaunakādi maharṣīṇāṁ naimiṣāraṁyavāsinām

मुझे और नारद को भी यह उत्तम मंत्र बताया था। नैमिषारण्यवासी शौनक आदि महर्षियों को—

श्लोक 75 (padma.6.223.75)

नारदः प्रददौ मंत्रं प्रपत्तिं शरणागतिम् । एतद्गुह्यतमं राजन्न जानंति महर्षयः ।

nāradaḥ pradadau maṁtraṁ prapattiṁ śaraṇāgatim etadguhyatamaṁ rājaṁna jānaṁti maharṣayaḥ

— नारद ने प्रपत्ति और शरणागति का यह मंत्र प्रदान किया। हे राजन्, यह अत्यंत गुह्य रहस्य महर्षि भी नहीं जानते,

श्लोक 76 (padma.6.223.76)

देवाताश्च न जानंति सिद्धा साध्याश्च दानवाः । मयापि प्रापितो मंत्रं शक्तिपुत्रः पराशरः ।

devātāśca na jānaṁti siddhā sādhyāśca dānavāḥ mayāpi prāpito maṁtraṁ śaktiputraḥ parāśaraḥ

न देवता जानते हैं, न सिद्ध, साध्य और दानव। मेरे द्वारा भी शक्तिपुत्र पराशर को यह मंत्र प्राप्त कराया गया।

श्लोक 77 (padma.6.223.77)

इदं रहस्यं परमं लक्ष्मीनारायणं द्वयम् । राजंस्तवापि वक्ष्यामि प्रपत्ति शरणागतिम् ।

idaṁ rahasyaṁ paramaṁ lakṣmīnārāyaṇaṁ dvayam rājaṁstavāpi vakṣyāmi prapatti śaraṇāgatim

यह परम रहस्य, 'लक्ष्मीनारायण' द्वय — हे राजन्, आपको भी मैं यह प्रपत्ति और शरणागति बताता हूँ।

श्लोक 78 (padma.6.223.78)

द्वयात्परतरं मन्त्रं नास्ति सत्यं ब्रवीमि ते । अस्मात्परतरं धर्म्मं नास्ति लोकेषु किंचन ।

dvayātparataraṁ maṁtraṁ nāsti satyaṁ bravīmi te asmātparataraṁ dharṁmaṁ nāsti lokeṣu kiṁcana

द्वय से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है, यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ। इससे बढ़कर लोकों में कोई धर्म नहीं है।

श्लोक 79 (padma.6.223.79)

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं ब्रह्मणा कथितं पुरा । नारायणात्परो देवो नास्ति मुक्तिप्रदो नृणाम् ।

satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ brahmaṇā kathitaṁ purā nārāyaṇātparo devo nāsti muktiprado nṛṇām

सत्य, सत्य, फिर सत्य — यह पूर्वकाल में ब्रह्मा ने कहा था: नारायण से बढ़कर मनुष्यों को मुक्ति देने वाला कोई देव नहीं है।

श्लोक 80 (padma.6.223.80)

तत्सेवैव भवेन्मोक्षः सर्वकर्म निकृंतनः ।

tatsevaiva bhaveṁmokṣaḥ sarvakarma nikṛṁtanaḥ

उन्हीं की सेवा ही मोक्ष है, जो समस्त कर्मों का उच्छेदक है।

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