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उत्तर खण्ड · अध्याय 225

ऊर्ध्वपुण्ड्र की महिमा

अध्याय 224अध्याय-सूचीअध्याय 226

श्लोक 1 (padma.6.225.1)

शंकर उवाच- ऊर्द्ध्वपुंड्रस्य माहात्म्यं वक्ष्यामि शुभदर्शने । धारणादेव मुच्येत भवबंधाद्द्विजोत्तमः ।

śaṁkara uvāca ūrddhvapuṁḍrasya māhātṁyaṁ vakṣyāmi śubhadarśane dhāraṇādeva mucyeta bhavabaṁdhāddvijottamaḥ

शंकर ने कहा — हे शुभदर्शने! मैं ऊर्ध्वपुण्ड्र की महिमा बताता हूँ; इसे धारण करने मात्र से द्विज भवबंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (padma.6.225.2)

ऊर्द्ध्वपुंड्रस्य मध्ये तु विशाले सुमनोहरे । लक्ष्म्या सार्द्धं समासीनो देवदेवो जनार्दनः ।

ūrddhvapuṁḍrasya madhye tu viśāle sumanohare lakṣṁyā sārddhaṁ samāsīno devadevo janārdanaḥ

ऊर्ध्वपुण्ड्र के विशाल, सुमनोहर मध्य भाग में लक्ष्मी सहित विराजमान देवदेव जनार्दन रहते हैं।

श्लोक 3 (padma.6.225.3)

तस्माद्यस्य शरीरे तु ऊर्द्ध्वपुंड्रं धृतो भवेत् । तस्यदेहं भगवतो विमलं मंदिरं शुभम् ।

tasmādyasya śarīre tu ūrddhvapuṁḍraṁ dhṛto bhavet tasyadehaṁ bhagavato vimalaṁ maṁdiraṁ śubham

इसलिए जिसके शरीर पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण किया हो, उसका देह भगवान का निर्मल, शुभ मंदिर बन जाता है।

श्लोक 4 (padma.6.225.4)

स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । धारयेदूर्द्ध्वपुंड्रं यो मृदाशुभ्रेण वैष्णवः ।

sa snātaḥ sarvatīrtheṣu sarvayajṁeṣu dīkṣitaḥ dhārayedūrddhvapuṁḍraṁ yo mṛdāśubhreṇa vaiṣṇavaḥ

जो वैष्णव शुभ्र मिट्टी से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, वह सभी तीर्थों में स्नान किए और सभी यज्ञों में दीक्षित माना जाता है।

श्लोक 5 (padma.6.225.5)

ऊर्द्ध्वपुंड्रधरो विप्रः सर्वलोकेषु पूजितः । विमानवरमारुह्य याति विष्णोः परं पदम् ।

ūrddhvapuṁḍradharo vipraḥ sarvalokeṣu pūjitaḥ vimānavaramāruhya yāti viṣṇoḥ paraṁ padam

ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी ब्राह्मण सभी लोकों में पूजित होता है; श्रेष्ठ विमान पर सवार होकर वह विष्णु के परम पद को जाता है।

श्लोक 6 (padma.6.225.6)

धारयेदूर्द्ध्वपुंड्रं तु त्रिसंध्यं तु द्विजोत्तमः । सर्वपापविशुद्ध्यर्थमिष्टापूर्तफलाप्तये ।

dhārayedūrddhvapuṁḍraṁ tu trisaṁdhyaṁ tu dvijottamaḥ sarvapāpaviśuddhyarthamiṣṭāpūrtaphalāptaye

द्विजोत्तम को त्रिकाल संध्या में ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए, समस्त पापों की शुद्धि और इष्टापूर्त के फल की प्राप्ति हेतु।

श्लोक 7 (padma.6.225.7)

ऊर्द्ध्वपुंड्रधरं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते । नमस्कृत्वाथवा भक्त्या सर्वदानफलं लभेत् ।

ūrddhvapuṁḍradharaṁ dṛṣṭvā sarvapāpaiḥ pramucyate namaskṛtvāthavā bhaktyā sarvadānaphalaṁ labhet

ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी को देखने मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिलती है; भक्तिपूर्वक नमस्कार करने से सभी दानों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (padma.6.225.8)

ऊर्द्ध्वपुंड्रधरं विप्रं यः श्राद्धे भोजयिष्यति । आकल्पकोटिपितरस्तस्य तृप्ता न संशयः ।

ūrddhvapuṁḍradharaṁ vipraṁ yaḥ śrāddhe bhojayiṣyati ākalpakoṭipitarastasya tṛptā na saṁśayaḥ

जो श्राद्ध में ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी ब्राह्मण को भोजन कराता है — उसके पितर करोड़ों कल्पों तक तृप्त रहते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 9 (padma.6.225.9)

ऊर्द्ध्वपुंड्रधरो यस्तु कुर्याछ्रांद्धं शुभानने । कल्पकोटिसहस्राणि गयाश्राद्धफलं लभेत् ।

ūrddhvapuṁḍradharo yastu kuryāchrāṁddhaṁ śubhānane kalpakoṭisahasrāṇi gayāśrāddhaphalaṁ labhet

और जो ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी स्वयं श्राद्ध करता है, हे शुभानने, वह सहस्रों करोड़ कल्पों तक गया-श्राद्ध का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 10 (padma.6.225.10)

यज्ञदानतपश्चर्या जपहोमादिकं च यत् । ऊर्द्ध्वपुंड्रधरः कुर्यात्तस्य पुण्यमनंतकम् ।

yajṁadānatapaścaryā japahomādikaṁ ca yat ūrddhvapuṁḍradharaḥ kuryāttasya puṁyamanaṁtakam

ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी जो भी यज्ञ, दान, तपस्या, जप-होम आदि करता है, उसका पुण्य अनंत हो जाता है।

श्लोक 11 (padma.6.225.11)

ऊर्द्ध्वपुंड्रविहीनस्तु किंचित्कर्म करोति यः । इष्टापूर्तादिकं सर्वं निष्फलं स्यान्न संशयः ।

ūrddhvapuṁḍravihīnastu kiṁcitkarma karoti yaḥ iṣṭāpūrtādikaṁ sarvaṁ niṣphalaṁ syāṁna saṁśayaḥ

किंतु ऊर्ध्वपुण्ड्र से रहित होकर जो कोई कर्म करता है — उसके सभी इष्टापूर्त आदि कर्म निष्फल हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 12 (padma.6.225.12)

यच्छरीरं मनुष्याणामूर्द्ध्वपुंड्र विवर्जितम् । द्रष्टव्यं नैव तत्किंचित्श्मशानसदृशं भवेत् ।

yaccharīraṁ manuṣyāṇāmūrddhvapuṁḍra vivarjitam draṣṭavyaṁ naiva tatkiṁcitśmaśānasadṛśaṁ bhavet

ऊर्ध्वपुण्ड्र से रहित मनुष्य के शरीर को देखना भी उचित नहीं, वह श्मशान के समान हो जाता है।

श्लोक 13 (padma.6.225.13)

ऊर्द्ध्वपुंड्रविहीनस्तु सन्ध्याकर्मादिकं चरेत् । तत्सर्वं राक्षसैर्नीतं नरकं चावगच्छति ।

ūrddhvapuṁḍravihīnastu saṁdhyākarmādikaṁ caret tatsarvaṁ rākṣasairnītaṁ narakaṁ cāvagacchati

ऊर्ध्वपुण्ड्र से रहित होकर जो संध्या आदि कर्म करता है, वह सब राक्षसों द्वारा हर लिया जाता है और वह नरक को जाता है।

श्लोक 14 (padma.6.225.14)

ऊर्द्ध्वपुंड्रधरोद्विप्रो मृदाशुभ्रेण वैदिकः । न तिर्यग्धारयेद्विद्वानापद्यपि कदाचन ।

ūrddhvapuṁḍradharodvipro mṛdāśubhreṇa vaidikaḥ na tiryagdhārayedvidvānāpadyapi kadācana

शुभ्र मिट्टी से ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी वैदिक ब्राह्मण, विद्वान होते हुए भी, आपत्ति में भी कभी इसे तिरछा धारण न करे।

श्लोक 15 (padma.6.225.15)

विप्राणामूर्द्ध्वपुंड्रं स्यात्तिलकं तु महीभृतः । पट्टाकारं तु वैश्यानां शूद्राणां वै त्रिपुंड्रकम् ।

viprāṇāmūrddhvapuṁḍraṁ syāttilakaṁ tu mahībhṛtaḥ paṭṭākāraṁ tu vaiśyānāṁ śūdrāṇāṁ vai tripuṁḍrakam

ब्राह्मणों के लिए चिह्न ऊर्ध्वपुण्ड्र है; राजाओं के लिए तिलक है; वैश्यों के लिए पट्टाकार है, और शूद्रों के लिए त्रिपुण्ड्र है।

श्लोक 16 (padma.6.225.16)

ऊर्द्ध्वपुंड्रं मृदा कार्यं कस्तूर्य्यास्तिलकं तथा । पट्टाकारं तु गंधेन भस्मनैव त्रिपुंड्रकम् ।

ūrddhvapuṁḍraṁ mṛdā kāryaṁ kastūryyāstilakaṁ tathā paṭṭākāraṁ tu gaṁdhena bhasmanaiva tripuṁḍrakam

ऊर्ध्वपुण्ड्र मिट्टी से बनाना चाहिए; तिलक कस्तूरी से; पट्टाकार चंदन से; और त्रिपुण्ड्र केवल भस्म से।

श्लोक 17 (padma.6.225.17)

ऊर्द्ध्वपुंड्रं तु सर्वेषां न निषिद्धं कदाचन । धारयेत्क्षत्रियाद्योऽपि विष्णुभक्तो भवेद्यदि ।

ūrddhvapuṁḍraṁ tu sarveṣāṁ na niṣiddhaṁ kadācana dhārayetkṣatriyādyo'pi viṣṇubhakto bhavedyadi

ऊर्ध्वपुण्ड्र किसी के लिए भी कभी वर्जित नहीं है; क्षत्रिय आदि भी इसे धारण कर सकता है, यदि वह विष्णुभक्त हो।

श्लोक 18 (padma.6.225.18)

विप्राणां नैव कार्य्यं स्यात्तिर्य्यक्पट्टादिधारणम् । नारायणात्परेशानादन्येषामर्चनं न तु ।

viprāṇāṁ naiva kāryyaṁ syāttiryyakpaṭṭādidhāraṇam nārāyaṇātpareśānādaṁyeṣāmarcanaṁ na tu

ब्राह्मणों को तिरछे चिह्न, पट्टा आदि कभी धारण नहीं करने चाहिए; और परमेश्वर नारायण के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 19 (padma.6.225.19)

ब्राह्मणः कुलजो विद्वान्भस्मधारी भवेद्यदि । वर्जयेत्तादृशं देवि मद्योच्छिष्टं घटं यथा ।

brāhmaṇaḥ kulajo vidvāṁbhasmadhārī bhavedyadi varjayettādṛśaṁ devi madyocchiṣṭaṁ ghaṭaṁ yathā

यदि कोई कुलीन, विद्वान ब्राह्मण भस्मधारी बन जाए, तो हे देवी, ऐसे व्यक्ति का त्याग वैसे ही करना चाहिए जैसे मद्य के जूठे घड़े का।

श्लोक 20 (padma.6.225.20)

त्रिपुंड्रं शूद्रकल्पानां शूद्राणां च विधिस्तथा । त्रिपुंड्र धारणाद्विप्रः पतितः स्यान्न संशयः ।

tripuṁḍraṁ śūdrakalpānāṁ śūdrāṇāṁ ca vidhistathā tripuṁḍra dhāraṇādvipraḥ patitaḥ syāṁna saṁśayaḥ

त्रिपुण्ड्र शूद्रकल्पों और शूद्रों का विधान है; त्रिपुण्ड्र धारण करने से ब्राह्मण पतित हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 21 (padma.6.225.21)

एकांतिनो महाभागाः सर्वभूतहिते रताः । सांतरालं प्रकुर्वीरन्पुंड्रं हरिपदाकृतिम् ।

ekāṁtino mahābhāgāḥ sarvabhūtahite ratāḥ sāṁtarālaṁ prakurvīraṁpuṁḍraṁ haripadākṛtim

एकांतभक्त, महाभाग, सर्वभूतहित में रत जन, हरि के चरण के आकार वाला पुण्ड्र मध्य में छिद्र सहित बनाएँ।

श्लोक 22 (padma.6.225.22)

हरेः पादाकृतिं कुर्यादूर्द्ध्वपुंड्रं विधानतः । मध्यछिद्रेण संयुक्तं तद्धि वै मंदिरं हरेः ।

hareḥ pādākṛtiṁ kuryādūrddhvapuṁḍraṁ vidhānataḥ madhyachidreṇa saṁyuktaṁ taddhi vai maṁdiraṁ hareḥ

विधिपूर्वक हरि के पैर के आकार का ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाना चाहिए, जिसके मध्य में छिद्र हो; वही वस्तुतः हरि का मंदिर है।

श्लोक 23 (padma.6.225.23)

ऊर्द्ध्वपुंड्रमृजुं सौम्यं सुपार्श्वं सुमनोहरम् । दंडाकारं सुशोभाढ्यं मध्येछिद्रं प्रकल्पयेत् ।

ūrddhvapuṁḍramṛjuṁ sauṁyaṁ supārśvaṁ sumanoharam daṁḍākāraṁ suśobhāḍhyaṁ madhyechidraṁ prakalpayet

ऊर्ध्वपुण्ड्र सीधा, सौम्य, सुपार्श्व, सुमनोहर, दंडाकार, शोभायुक्त तथा मध्य में छिद्रयुक्त बनाना चाहिए।

श्लोक 24 (padma.6.225.24)

तस्माच्छिद्रान्वितं पुंड्रं दण्डाकारं सुशोभनम् । विप्राणां सततं कार्यं स्त्रीणां च शुभदर्शने ।

tasmācchidrāṁvitaṁ puṁḍraṁ daṁḍākāraṁ suśobhanam viprāṇāṁ satataṁ kāryaṁ strīṇāṁ ca śubhadarśane

इसलिए, हे शुभदर्शने, ब्राह्मणों और स्त्रियों को सदा छिद्रयुक्त, दंडाकार, सुशोभित पुण्ड्र धारण करना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.6.225.25)

ऊर्ध्वपुण्ड्रस्य मध्ये तु विशाले सुमनोहरे । सान्तराले समासीनो हरिरस्ति श्रिया सह ।

ūrdhvapuṁḍrasya madhye tu viśāle sumanohare sāṁtarāle samāsīno harirasti śriyā saha

ऊर्ध्वपुण्ड्र के विशाल, सुमनोहर मध्य भाग में, उस छिद्र में श्री सहित हरि विराजमान रहते हैं।

श्लोक 26 (padma.6.225.26)

निरन्तरालं यः कुर्यादूर्द्ध्वपुंड्रं द्विजाधमः । स हि तत्रस्थितं विष्णुं श्रियं चैव व्यपोहति ।

niraṁtarālaṁ yaḥ kuryādūrddhvapuṁḍraṁ dvijādhamaḥ sa hi tatrasthitaṁ viṣṇuṁ śriyaṁ caiva vyapohati

जो निकृष्ट द्विज बिना छिद्र के ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाता है, वह वहाँ विराजमान विष्णु और श्री को दूर हटा देता है।

श्लोक 27 (padma.6.225.27)

अच्छिद्रमूर्द्ध्वपुंड्रं तु ये कुर्वंति द्विजाधमाः । तेषां ललाटे सततं शुनःपादो न संशयः ।

acchidramūrddhvapuṁḍraṁ tu ye kurvaṁti dvijādhamāḥ teṣāṁ lalāṭe satataṁ śunaḥpādo na saṁśayaḥ

जो निकृष्ट द्विज बिना छिद्र के ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाते हैं — उनके ललाट पर सदा कुत्ते का पदचिह्न रहता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 28 (padma.6.225.28)

तस्माच्छिद्रान्वितं पुंड्रं सहरिद्रं शुभान्वितम् । धारयेद्ब्राह्मणो नित्यं हरिसालोक्यसिद्धये ।

tasmācchidrāṁvitaṁ puṁḍraṁ saharidraṁ śubhāṁvitam dhārayedbrāhmaṇo nityaṁ harisālokyasiddhaye

इसलिए ब्राह्मण को सदा छिद्रयुक्त, हल्दी सहित शुभ पुण्ड्र धारण करना चाहिए, हरि-सालोक्य की प्राप्ति हेतु।

श्लोक 29 (padma.6.225.29)

आदाय परया भक्त्या वेङ्कटाद्रौ हृदे मृदम् । धारयेदूर्ध्वपुण्ड्राणि हरिसायुज्यसिद्धये ।

ādāya parayā bhaktyā veṁkaṭādrau hṛde mṛdam dhārayedūrdhvapuṁḍrāṇi harisāyujyasiddhaye

परम भक्ति से वेंकटाद्रि के हृद (कुण्ड) की मिट्टी लेकर, हरि-सायुज्य की सिद्धि हेतु ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए।

श्लोक 30 (padma.6.225.30)

श्रीकृष्णतुलसीमूले मृदमादाय भक्तिमान् । धारयेदूर्द्ध्वपुंड्राणि हरिस्तत्र प्रसीदति ।

śrīkṛṣṇatulasīmūle mṛdamādāya bhaktimān dhārayedūrddhvapuṁḍrāṇi haristatra prasīdati

श्रीकृष्ण की तुलसी के मूल की मिट्टी लेकर भक्त ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे; इससे हरि प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 31 (padma.6.225.31)

द्वारवत्यां शुभे रम्ये वासुदेवहृदे तथा । तत्रोद्भवां मृदं रम्यामादाय द्विजसत्तमः ।

dvāravatyāṁ śubhe raṁye vāsudevahṛde tathā tatrodbhavāṁ mṛdaṁ raṁyāmādāya dvijasattamaḥ

शुभ, रमणीय द्वारवती में, वासुदेव-हृद पर भी, वहाँ की सुंदर मिट्टी लेकर वह द्विजसत्तम—

श्लोक 32 (padma.6.225.32)

धारयेदूर्द्ध्वपुंड्रांणि सर्वकामफलाप्तये । आदाय परया भक्त्या गंगातीरोद्भवां मृदम् ।

dhārayedūrddhvapuṁḍrāṁṇi sarvakāmaphalāptaye ādāya parayā bhaktyā gaṁgātīrodbhavāṁ mṛdam

— सभी कामनाओं के फल की प्राप्ति हेतु ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे। परम भक्ति से गंगातट की मिट्टी लेकर,

श्लोक 33 (padma.6.225.33)

तया धृतोर्द्ध्वपुंड्राणि सर्वयज्ञफलो लभेत् । चंदनं च हरिद्रा च तथा भस्माग्निहोत्रजम् ।

tayā dhṛtorddhvapuṁḍrāṇi sarvayajṁaphalo labhet caṁdanaṁ ca haridrā ca tathā bhasmāgnihotrajam

उससे ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने वाला सभी यज्ञों का फल पाता है। चंदन, हल्दी, तथा अग्निहोत्र से उत्पन्न भस्म —

श्लोक 34 (padma.6.225.34)

सर्ववश्यकरं प्रोक्तमूर्द्ध्वपुंड्रस्य धारणात् । यत्र पुण्यं हरिक्षेत्रं तत्र वै मृदमाहरेत् ।

sarvavaśyakaraṁ proktamūrddhvapuṁḍrasya dhāraṇāt yatra puṁyaṁ harikṣetraṁ tatra vai mṛdamāharet

ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण से सर्ववशकर कहे गए हैं। जहाँ भी हरि का पुण्यक्षेत्र हो, वहीं से मिट्टी लेनी चाहिए।

श्लोक 35 (padma.6.225.35)

पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले जलाशये । सिंधुतीरे च वल्मीके हरिक्षेत्रे विशेषतः ।

parvatāgre nadītīre bilvamūle jalāśaye siṁdhutīre ca valmīke harikṣetre viśeṣataḥ

पर्वत के शिखर पर, नदी तट पर, बिल्व वृक्ष के मूल में, जलाशय में, सिंधु तट पर तथा वल्मीक (बाँबी) पर, विशेषतः हरिक्षेत्र में —

श्लोक 36 (padma.6.225.36)

विष्णोः स्नानोदकं यत्र प्रवाहयति नित्यशः । पुंड्राणां धारणार्थाय गृह्णीयात्तत्र मृत्तिकाम् ।

viṣṇoḥ snānodakaṁ yatra pravāhayati nityaśaḥ puṁḍrāṇāṁ dhāraṇārthāya gṛhṇīyāttatra mṛttikām

जहाँ विष्णु का स्नान-जल सदा प्रवाहित होता है, वहीं से पुण्ड्र धारण के लिए मिट्टी लेनी चाहिए।

श्लोक 37 (padma.6.225.37)

श्रीरङ्गे वेङ्कटाद्रौ च श्रीकूर्मे द्वारके शुभे । प्रयागेनारसिंहाद्रौ वाराहे तुलसीवने ।

śrīraṁge veṁkaṭādrau ca śrīkūrme dvārake śubhe prayāgenārasiṁhādrau vārāhe tulasīvane

श्रीरंग में, वेंकटाद्रि में, श्रीकूर्म में, शुभ द्वारका में, प्रयाग में, नारसिंहाद्रि में, वाराह में, तुलसीवन में —

श्लोक 38 (padma.6.225.38)

गृहीत्वा मृत्तिकां भक्त्या विष्णुपादजलैः सह । धृत्वा पुंड्राणि चांगेषु विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।

gṛhītvā mṛttikāṁ bhaktyā viṣṇupādajalaiḥ saha dhṛtvā puṁḍrāṇi cāṁgeṣu viṣṇusāyujyamāpnuyāt

— भक्तिपूर्वक मिट्टी और विष्णुपाद-जल लेकर, अंगों पर पुण्ड्र धारण करके, विष्णु-सायुज्य प्राप्त होता है।

श्लोक 39 (padma.6.225.39)

यस्मिन्कस्मिन्महाभागा वैष्णवा धारयंति वै । तस्मिन्वै मृत्तिका ग्राह्या ऊर्द्ध्वपुंड्रस्य धारणे ।

yasmiṁkasmiṁmahābhāgā vaiṣṇavā dhārayaṁti vai tasmiṁvai mṛttikā grāhyā ūrddhvapuṁḍrasya dhāraṇe

जहाँ भी महाभाग वैष्णवजन स्वयं तिलक धारण करते हैं, वहीं से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण हेतु मिट्टी लेनी चाहिए।

श्लोक 40 (padma.6.225.40)

श्यामं शांतिकरं प्रोक्तं रक्तं वश्यकरं तथा । श्रीकरं पीतमित्याहुः श्वेतं मोक्षकरं शुभम् ।

śyāmaṁ śāṁtikaraṁ proktaṁ raktaṁ vaśyakaraṁ tathā śrīkaraṁ pītamityāhuḥ śvetaṁ mokṣakaraṁ śubham

श्याम मिट्टी शांतिकारक कही गई है; लाल मिट्टी वशीकरण करने वाली है; पीली श्रीकारक कही जाती है; और शुभ श्वेत मिट्टी मोक्षकारक है।

श्लोक 41 (padma.6.225.41)

वर्तुलं तिर्यगछिद्रं ह्रस्वं दीर्घं ततं तनुम् । वक्रं विरूपं बद्धाग्रं छिन्नमूलं पदच्युतम् ।

vartulaṁ tiryagachidraṁ hrasvaṁ dīrghaṁ tataṁ tanum vakraṁ virūpaṁ baddhāgraṁ chiṁnamūlaṁ padacyutam

गोल, तिरछा, छिद्रहीन, छोटा, बहुत लंबा, अत्यधिक फैला, अत्यंत पतला, टेढ़ा, विरूप, कुंठित अग्र, टूटे मूल वाला, या स्थान से च्युत —

श्लोक 42 (padma.6.225.42)

अशुभं रूक्षमासक्तं तथानंगुलिकल्पितम् । विगंधमवसह्यं च पुंड्रमाहुरनर्थकम् ।

aśubhaṁ rūkṣamāsaktaṁ tathānaṁgulikalpitam vigaṁdhamavasahyaṁ ca puṁḍramāhuranarthakam

— अशुभ, रूखा, फैला हुआ, अंगुली के बिना बनाया गया, दुर्गंधित अथवा असह्य — ऐसा पुण्ड्र निष्फल कहा गया है।

श्लोक 43 (padma.6.225.43)

आरभ्य नासिकामूलं ललाटं तं लिखेन्मृदा । समारभ्य भ्रुवोर्मध्यमंतरालं प्रकल्पयेत् ।

ārabhya nāsikāmūlaṁ lalāṭaṁ taṁ likheṁmṛdā samārabhya bhruvormadhyamaṁtarālaṁ prakalpayet

नासिका के मूल से आरंभ करके ललाट तक मिट्टी से रेखा खींचनी चाहिए; भौंहों के मध्य से आरंभ करके अंतराल (छिद्र) बनाना चाहिए।

श्लोक 44 (padma.6.225.44)

अंतरालं द्व्यंगुलं स्यात्पार्श्वावंगुलिमात्रकौ । मृदा शुभ्रेण विलिखेत्पुण्ड्रं ऋजुतरं शुभम् ।

aṁtarālaṁ dvyaṁgulaṁ syātpārśvāvaṁgulimātrakau mṛdā śubhreṇa vilikhetpuṁḍraṁ ṛjutaraṁ śubham

अंतराल दो अंगुल का होना चाहिए, और दोनों ओर की रेखाएँ एक-एक अंगुल की; शुभ्र मिट्टी से अत्यंत सीधा, शुभ पुण्ड्र खींचना चाहिए।

श्लोक 45 (padma.6.225.45)

ललाटे केशवं ध्यायेन्नारायणमथोदरे । वक्षस्थले माधवं च गोविंदं कंठकूबरे ।

lalāṭe keśavaṁ dhyāyeṁnārāyaṇamathodare vakṣasthale mādhavaṁ ca goviṁdaṁ kaṁṭhakūbare

ललाट पर केशव का ध्यान करना चाहिए; उदर पर नारायण का; वक्षस्थल पर माधव का; और कंठकूप पर गोविंद का।

श्लोक 46 (padma.6.225.46)

विष्णुं च दक्षिणे कुक्षौ बाहौ च मधुसूदनम् । त्रिविक्रमं कंधरे तु वामनं वामपार्श्वके ।

viṣṇuṁ ca dakṣiṇe kukṣau bāhau ca madhusūdanam trivikramaṁ kaṁdhare tu vāmanaṁ vāmapārśvake

दाहिनी कुक्षि पर विष्णु का, भुजा पर मधुसूदन का; कंधे पर त्रिविक्रम का, तथा वाम पार्श्व में वामन का।

श्लोक 47 (padma.6.225.47)

श्रीधरं बाहुके वामे हृषीकेशं तु कंधरे । पृष्ठे वै पद्मनाभं तु त्रिके दामोदरं न्यसेत् ।

śrīdharaṁ bāhuke vāme hṛṣīkeśaṁ tu kaṁdhare pṛṣṭhe vai padmanābhaṁ tu trike dāmodaraṁ ṁyaset

वाम भुजा पर श्रीधर का, कंधे पर हृषीकेश का; पीठ पर पद्मनाभ का, और कटि पर दामोदर का न्यास करना चाहिए।

श्लोक 48 (padma.6.225.48)

तत्प्रक्षालनतोयेन वासुदेवं तु मूर्द्धनि । ललाटे भुजयुग्मे तु पृष्ठयोः कंठकूबरे ।

tatprakṣālanatoyena vāsudevaṁ tu mūrddhani lalāṭe bhujayugme tu pṛṣṭhayoḥ kaṁṭhakūbare

उस प्रक्षालन जल से मस्तक पर वासुदेव का न्यास होता है। ललाट पर, दोनों भुजाओं पर, पीठ के दोनों ओर और कंठकूप पर —

श्लोक 49 (padma.6.225.49)

धारयेदूर्द्ध्वपुंड्रं तु चतुरंगुलमात्रतः । कुक्षौ तत्पार्श्वयोः प्रोक्तमायतं तु दशांगुलम् ।

dhārayedūrddhvapuṁḍraṁ tu caturaṁgulamātrataḥ kukṣau tatpārśvayoḥ proktamāyataṁ tu daśāṁgulam

— चार अंगुल मात्रा का ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए। उदर और उसके दोनों पार्श्वों पर यह दस अंगुल लंबा कहा गया है।

श्लोक 50 (padma.6.225.50)

बाह्वोर्वक्षस्थले पुंड्रंमष्टांगुलमुदाहृतम् । एवं द्वादशपुंड्राणि ब्राह्मणः सततं धरेत् ।

bāhvorvakṣasthale puṁḍraṁmaṣṭāṁgulamudāhṛtam evaṁ dvādaśapuṁḍrāṇi brāhmaṇaḥ satataṁ dharet

भुजाओं और वक्षस्थल पर पुण्ड्र आठ अंगुल का कहा गया है। इस प्रकार ब्राह्मण को सदा बारह पुण्ड्र धारण करने चाहिए।

श्लोक 51 (padma.6.225.51)

तत्तत्पुण्ड्राणि तन्मूर्तीर्ध्यात्वा मंत्रेण धारयेत् । अंतरालेषु सर्वेषु हरिद्रां धारयेच्छ्रियाम् ।

tattatpuṁḍrāṇi taṁmūrtīrdhyātvā maṁtreṇa dhārayet aṁtarāleṣu sarveṣu haridrāṁ dhārayecchriyām

प्रत्येक पुण्ड्र को उसकी संबंधित मूर्ति का ध्यान करते हुए, मंत्र सहित धारण करना चाहिए। सभी अंतरालों में श्री हेतु हल्दी लगानी चाहिए।

श्लोक 52 (padma.6.225.52)

चत्वारि भूभृतामाहुः पुंड्राणि द्वे विशां स्मृते । एकपुंड्रं तु नारीणां शूद्राणां च विधीयते ।

catvāri bhūbhṛtāmāhuḥ puṁḍrāṇi dve viśāṁ smṛte ekapuṁḍraṁ tu nārīṇāṁ śūdrāṇāṁ ca vidhīyate

राजाओं के लिए चार पुण्ड्र कहे गए हैं; वैश्यों के लिए दो कहे गए हैं; और स्त्रियों तथा शूद्रों के लिए एक पुण्ड्र विहित है।

श्लोक 53 (padma.6.225.53)

ललाटे हृदि बाह्वोश्च चतुःपुंड्राणि धारयेत् । ललाटे हृदये द्वे तु फालेत्वेकं विधीयते ।

lalāṭe hṛdi bāhvośca catuḥpuṁḍrāṇi dhārayet lalāṭe hṛdaye dve tu phāletvekaṁ vidhīyate

ललाट, हृदय और दोनों भुजाओं पर चार पुण्ड्र धारण करने चाहिए। ललाट और हृदय पर दो, तथा भाल पर एक विहित है।

श्लोक 54 (padma.6.225.54)

ऊर्द्ध्वपुंड्रं ललाटे तु सर्वेषां प्रथमं स्मृतम् । ललाटादिक्रमेणैव धारणं तु विधीयते ।

ūrddhvapuṁḍraṁ lalāṭe tu sarveṣāṁ prathamaṁ smṛtam lalāṭādikrameṇaiva dhāraṇaṁ tu vidhīyate

सभी के लिए ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र ही प्रथम कहा गया है; ललाट से आरंभ करके ही क्रमशः धारण विहित है।

श्लोक 55 (padma.6.225.55)

मूर्तीस्तु वासुदेवाद्याश्चतुःपुंड्रेषु धारयेत् । द्वयोर्गोविंदकृष्णौ तु एकं नारायणं धरेत् ।

mūrtīstu vāsudevādyāścatuḥpuṁḍreṣu dhārayet dvayorgoviṁdakṛṣṇau tu ekaṁ nārāyaṇaṁ dharet

चार पुण्ड्रों में वासुदेव आदि मूर्तियाँ धारण करनी चाहिए; दो में गोविंद और कृष्ण; एक में नारायण धारण करना चाहिए।

श्लोक 56 (padma.6.225.56)

एवं पुंड्रविधिः प्रोक्तः सर्वेषां गिरिजे मया । अश्वत्थपत्रसंकाशो वेणुपत्राकृतिस्तथा ।

evaṁ puṁḍravidhiḥ proktaḥ sarveṣāṁ girije mayā aśvatthapatrasaṁkāśo veṇupatrākṛtistathā

इस प्रकार, हे गिरिजे, सबके लिए पुण्ड्र-विधि मैंने बताई है। पीपल के पत्ते जैसा आकार, तथा बाँस के पत्ते जैसा आकार भी,

श्लोक 57 (padma.6.225.57)

पद्मकुड्मलसंकाशो मोहनं त्रितयं स्मृतम् । महाभागवतः शुद्धः पुंड्रं हरिपदाकृतिम् ।

padmakuḍmalasaṁkāśo mohanaṁ tritayaṁ smṛtam mahābhāgavataḥ śuddhaḥ puṁḍraṁ haripadākṛtim

और कमल-कली जैसा आकार — ये तीनों मोहक कहे गए हैं। महाभागवत, शुद्ध भक्त को हरि के चरण के आकार वाला पुण्ड्र,

श्लोक 58 (padma.6.225.58)

दंडाकारं तु वा देवि धारयेदूर्द्ध्वपुंड्रकम् । सुदर्शनेनांकितबाहुमूलास्तथोर्द्ध्वपुंड्रांकित सर्वगात्राः ।

daṁḍākāraṁ tu vā devi dhārayedūrddhvapuṁḍrakam sudarśanenāṁkitabāhumūlāstathorddhvapuṁḍrāṁkita sarvagātrāḥ

अथवा, हे देवी, दंडाकार ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए। जिनकी भुजाओं के मूल सुदर्शन से अंकित हैं, तथा जिनका सारा शरीर ऊर्ध्वपुण्ड्र से अंकित है,

श्लोक 59 (padma.6.225.59)

मालारविंदाक्षधरा विशुद्धा रक्षंति लोकान्दुरितौघसंगात् ।

mālāraviṁdākṣadharā viśuddhā rakṣaṁti lokāṁduritaughasaṁgāt

जो कमलाक्ष माला धारण करते हैं, विशुद्ध — वे संसार को दुर्भाग्य के समूह से रक्षा करते हैं।

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