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उत्तर खण्ड · अध्याय 226

मंत्रार्थ का उपदेश

अध्याय 225अध्याय-सूचीअध्याय 227

श्लोक 1 (padma.6.226.1)

शंकर उवाच - न्यासेवाप्यर्चने वापि मंत्रमेकांतिनः श्रयेत् । अवैष्णवोपदिष्टेन मंत्रेण न परा गतिः ।

śaṁkara uvāca ṁyāsevāpyarcane vāpi maṁtramekāṁtinaḥ śrayet avaiṣṇavopadiṣṭena maṁtreṇa na parā gatiḥ

शंकर ने कहा — न्यास में या पूजा में, एकांतभक्त को इसी मंत्र का आश्रय लेना चाहिए। अवैष्णव द्वारा दिए गए मंत्र से परम गति नहीं मिलती।

श्लोक 2 (padma.6.226.2)

अवैष्णवोपदिष्टंचेत्पूर्वमंत्रवरंद्वयम् । पुनश्च विधिना सम्यक्वैष्णवाद्ग्राहयेद्गुरोः ।

avaiṣṇavopadiṣṭaṁcetpūrvamaṁtravaraṁdvayam punaśca vidhinā saṁyakvaiṣṇavādgrāhayedguroḥ

यदि पूर्व में श्रेष्ठ द्वय मंत्र किसी अवैष्णव से प्राप्त हुआ हो, तो पुनः विधिपूर्वक किसी वैष्णव गुरु से भलीभाँति उसे ग्रहण करना चाहिए।

श्लोक 3 (padma.6.226.3)

सहस्रशाखाध्यायी वा सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । कुले महति जातोऽपि न गुरुः स्यादवैष्णवः ।

sahasraśākhādhyāyī vā sarvayajṁeṣu dīkṣitaḥ kule mahati jāto'pi na guruḥ syādavaiṣṇavaḥ

चाहे कोई सहस्र शाखाओं का अध्येता हो, सभी यज्ञों में दीक्षित हो, अथवा महान कुल में जन्मा हो — अवैष्णव गुरु नहीं हो सकता।

श्लोक 4 (padma.6.226.4)

यस्तु मंत्रद्वयं सम्यगध्यापयति वैष्णवः । स आचार्यस्तु विज्ञेयो भवबंधविदारकः ।

yastu maṁtradvayaṁ saṁyagadhyāpayati vaiṣṇavaḥ sa ācāryastu vijṁeyo bhavabaṁdhavidārakaḥ

किंतु जो वैष्णव द्वय मंत्र भलीभाँति सिखाता है, वही सच्चा आचार्य जानना चाहिए, जो भवबंधन का विदारक है।

श्लोक 5 (padma.6.226.5)

आचार्यं संश्रयित्वाथ वत्सरं सेवयेद्दिवजः । तस्य वृत्तिं परिज्ञात्वा मंत्रमध्यापयेद्गुरुः ।

ācāryaṁ saṁśrayitvātha vatsaraṁ sevayeddivajaḥ tasya vṛttiṁ parijṁātvā maṁtramadhyāpayedguruḥ

आचार्य की शरण लेकर द्विज को एक वर्ष तक उसकी सेवा करनी चाहिए; उसका आचरण जानकर गुरु उसे मंत्र सिखाए।

श्लोक 6 (padma.6.226.6)

कृत्वा तापादिसंस्कारान्पश्चान्मंत्रमुदीरयेत् । तापं पुंड्रं तथा नाम कृत्वा वै विधिना गुरुः ।

kṛtvā tāpādisaṁskārāṁpaścāṁmaṁtramudīrayet tāpaṁ puṁḍraṁ tathā nāma kṛtvā vai vidhinā guruḥ

ताप आदि संस्कार करके ही मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। विधिपूर्वक ताप, पुण्ड्र और वैष्णव नाम देकर गुरु—

श्लोक 7 (padma.6.226.7)

पश्चादध्यापयेन्मंत्रं शिष्यं निर्मलचेतसम् । चक्रेण विधिना तप्तं ताप इत्यभिधीयते ।

paścādadhyāpayeṁmaṁtraṁ śiṣyaṁ nirmalacetasam cakreṇa vidhinā taptaṁ tāpa ityabhidhīyate

— तत्पश्चात् निर्मलचित्त शिष्य को मंत्र सिखाए। जो चक्र से विधिपूर्वक तपाया जाता है, वह 'ताप' कहलाता है।

श्लोक 8 (padma.6.226.8)

पुंड्रमूर्द्ध्वं तथा प्रोक्तं नाम वैष्णवमुच्यते । ततो मंत्रं विधानेन शिष्यमध्यापयेद्गुरुः ।

puṁḍramūrddhvaṁ tathā proktaṁ nāma vaiṣṇavamucyate tato maṁtraṁ vidhānena śiṣyamadhyāpayedguruḥ

ऊर्ध्व चिह्न पुण्ड्र कहा गया है, और दिया गया नाम वैष्णव नाम कहलाता है। फिर गुरु विधिपूर्वक शिष्य को मंत्र सिखाए।

श्लोक 9 (padma.6.226.9)

न्यासमष्टाक्षरं मंत्रमन्यं वा वैष्णवं मनुम् । न्यासमेवात्र परमं वैष्णवानां शुभानने ।

ṁyāsamaṣṭākṣaraṁ maṁtramaṁyaṁ vā vaiṣṇavaṁ manum ṁyāsamevātra paramaṁ vaiṣṇavānāṁ śubhānane

न्यास, अष्टाक्षर मंत्र अथवा अन्य वैष्णव मंत्र सिखाए। किंतु, हे शुभानने, वैष्णवों के लिए यहाँ न्यास ही परम है।

श्लोक 10 (padma.6.226.10)

तस्मात्तु न्यासमेवैषामतिरिक्तमिहोच्यते । न्यासविद्यापरो यस्तु ब्राह्मणः श्रेष्ठ उच्यते ।

tasmāttu ṁyāsamevaiṣāmatiriktamihocyate ṁyāsavidyāparo yastu brāhmaṇaḥ śreṣṭha ucyate

इसलिए न्यास ही इनमें उनके लिए सर्वोत्कृष्ट कहा गया है। जो ब्राह्मण न्यास-विद्या में तत्पर है, वही श्रेष्ठ कहा गया है।

श्लोक 11 (padma.6.226.11)

न्यासात्परतरं नास्ति मन्त्रं सत्यं ब्रवीमि ते । न्यासं द्वयं प्रपत्तिः स्यात्पर्यायेण निबोध मे ।

ṁyāsātparataraṁ nāsti maṁtraṁ satyaṁ bravīmi te ṁyāsaṁ dvayaṁ prapattiḥ syātparyāyeṇa nibodha me

न्यास से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है — यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ। न्यास, द्वय और प्रपत्ति — क्रमशः जानो मुझसे।

श्लोक 12 (padma.6.226.12)

द्वयोपदेशपूर्वं तु सर्वकर्मसमाचरेत् । द्वयाधिकारी न भवेत्सर्वकर्मसु नार्हति ।

dvayopadeśapūrvaṁ tu sarvakarmasamācaret dvayādhikārī na bhavetsarvakarmasu nārhati

द्वय का उपदेश पाकर ही सभी कर्म करने चाहिए। द्वय का अधिकारी न होने वाला किसी भी कर्म का अधिकारी नहीं होता।

श्लोक 13 (padma.6.226.13)

तस्माद्वयमधीत्येव पश्चान्मंत्रमनुत्तमम् । श्रीमदष्टाक्षरं सम्यगभ्यसेद्दिवजसत्तमः ।

tasmādvayamadhītyeva paścāṁmaṁtramanuttamam śrīmadaṣṭākṣaraṁ saṁyagabhyaseddivajasattamaḥ

इसलिए द्वय सीखकर ही द्विजसत्तम को पश्चात् उस उत्तम, श्रीमय अष्टाक्षर मंत्र का भलीभाँति अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 14 (padma.6.226.14)

मंत्रमष्टाक्षरं प्रोक्तं प्रणवस्यैव संग्रहात् । नैसर्गप्रणवाद्यन्तु मंत्रमित्युच्यतेबुधैः ।

maṁtramaṣṭākṣaraṁ proktaṁ praṇavasyaiva saṁgrahāt naisargapraṇavādyaṁtu maṁtramityucyatebudhaiḥ

प्रणव को सम्मिलित करने से मंत्र अष्टाक्षर कहा गया है। जो मंत्र स्वाभाविक प्रणव से आरंभ होता है, उसे ही विद्वान मंत्र कहते हैं।

श्लोक 15 (padma.6.226.15)

नान्यत्र सर्वमंत्रेषु प्रणवस्वस्वभावतः । पूर्वं तु सर्वमंत्राणां योजयेत्प्रणवं शुभम् ।

nāṁyatra sarvamaṁtreṣu praṇavasvasvabhāvataḥ pūrvaṁ tu sarvamaṁtrāṇāṁ yojayetpraṇavaṁ śubham

प्रणव के स्वभाव से यह अन्य मंत्रों में नहीं होता। सभी मंत्रों के आरंभ में शुभ प्रणव लगाना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.6.226.16)

ॐकारः प्रणवं ब्रह्म सर्वमंत्रेषु नायकः । आदौ सर्वत्र युंजीत मंत्राणां तु शुभानने ।

oṁkāraḥ praṇavaṁ brahma sarvamaṁtreṣu nāyakaḥ ādau sarvatra yuṁjīta maṁtrāṇāṁ tu śubhānane

ॐकार, प्रणव, ब्रह्म है, सभी मंत्रों में अग्रणी है। हे शुभानने, इसे सर्वत्र मंत्रों के आरंभ में जोड़ना चाहिए।

श्लोक 17 (padma.6.226.17)

स्वभावात्प्रणवन्तस्मिन्मूलमंत्रे प्रतिष्ठितम् । ओमित्येकाक्षरं पूर्वं द्व्यक्षरं नम इत्यथ ।

svabhāvātpraṇavaṁtasmiṁmūlamaṁtre pratiṣṭhitam omityekākṣaraṁ pūrvaṁ dvyakṣaraṁ nama ityatha

स्वभाव से प्रणव उस मूल मंत्र में प्रतिष्ठित है। पहला एक अक्षर 'ॐ', फिर दो अक्षर 'नमः',

श्लोक 18 (padma.6.226.18)

ततो नारायणायेति पंचार्णानि यथाक्रमम् । एवमष्टाक्षरो मंत्रो ज्ञेयः सर्वार्थसाधकः ।

tato nārāyaṇāyeti paṁcārṇāni yathākramam evamaṣṭākṣaro maṁtro jṁeyaḥ sarvārthasādhakaḥ

फिर 'नारायणाय', क्रमशः पाँच अक्षर। इस प्रकार अष्टाक्षर मंत्र जानना चाहिए, जो सभी अर्थों का साधक है,

श्लोक 19 (padma.6.226.19)

सर्वदुःखहरः श्रीमान्सर्वमंत्रात्मकः शुभः । ऋषिर्नारायणस्तस्य देवता श्रीश एव च ।

sarvaduḥkhaharaḥ śrīmāṁsarvamaṁtrātmakaḥ śubhaḥ ṛṣirnārāyaṇastasya devatā śrīśa eva ca

सर्वदुःखहर, श्रीमान, सर्वमंत्रस्वरूप, शुभ। इसके ऋषि नारायण हैं और देवता स्वयं श्रीश हैं।

श्लोक 20 (padma.6.226.20)

छंदस्तु देवी गायत्री प्रणवो बीजमुच्यते । नित्यानपायिनी देवी शक्तिः श्रीरुच्यते मनोः ।

chaṁdastu devī gāyatrī praṇavo bījamucyate nityānapāyinī devī śaktiḥ śrīrucyate manoḥ

इसका छंद देवी गायत्री है; प्रणव इसका बीज कहा जाता है; नित्य अविनाशी देवी श्री इसकी शक्ति कही जाती है।

श्लोक 21 (padma.6.226.21)

प्रथमं पदमोङ्कार द्वितीयं नम उच्यते । तृतीयं नारायणायेति पदत्रयमुदाहृतम् ।

prathamaṁ padamoṁkāra dvitīyaṁ nama ucyate tṛtīyaṁ nārāyaṇāyeti padatrayamudāhṛtam

पहला पद 'ॐकार' है; दूसरा 'नमः' कहा जाता है; तीसरा 'नारायणाय' — इस प्रकार तीन पद कहे गए हैं।

श्लोक 22 (padma.6.226.22)

अकारश्चाप्युकारश्च मकारश्च ततः परम् । वेदत्रयात्मकं प्रोक्तं प्रणवं ब्रह्मणः पदम् ।

akāraścāpyukāraśca makāraśca tataḥ param vedatrayātmakaṁ proktaṁ praṇavaṁ brahmaṇaḥ padam

'अ', फिर 'उ', और फिर 'म' — यह प्रणव, ब्रह्मपद, तीनों वेदों से युक्त कहा गया है।

श्लोक 23 (padma.6.226.23)

अकारेणोच्यते विष्णुः श्रीरुकारेण चोच्यते । मकारस्त्वनयोर्दासः पंचविंशः प्रकीर्तितः ।

akāreṇocyate viṣṇuḥ śrīrukāreṇa cocyate makārastvanayordāsaḥ paṁcaviṁśaḥ prakīrtitaḥ

'अ' कार से विष्णु कहे जाते हैं, 'उ' कार से श्री कही जाती हैं; और 'म' कार इन दोनों का दास है, जो पच्चीसवाँ तत्त्व कहा गया है।

श्लोक 24 (padma.6.226.24)

वासुदेवस्वरूपं तदकारेणोच्यतै बुधैः । उकारेण श्रियो देव्या रूपं मुनिभिरुच्यते ।

vāsudevasvarūpaṁ tadakāreṇocyatai budhaiḥ ukāreṇa śriyo devyā rūpaṁ munibhirucyate

वासुदेव का वह स्वरूप 'अ' कार से कहा जाता है, ऐसा विद्वान कहते हैं। 'उ' कार से देवी श्री का स्वरूप कहा जाता है, ऐसा मुनि कहते हैं।

श्लोक 25 (padma.6.226.25)

मकारेणोच्यते जीवः पंचविंशोदितः पुमान् । भूतानि च कवर्गेण चवर्गणेन्द्रियाणि च ।

makāreṇocyate jīvaḥ paṁcaviṁśoditaḥ pumān bhūtāni ca kavargeṇa cavargaṇeṁdriyāṇi ca

'म' कार से जीव कहा जाता है, जो पच्चीसवाँ पुरुष कहा गया है। भूत क-वर्ग से और इंद्रियाँ च-वर्ग से कही जाती हैं;

श्लोक 26 (padma.6.226.26)

ट वर्गेण तवर्गेण ज्ञानं धादयस्तथा । मनः पकारेणैवोक्तं फकारेण त्वहंकृतिः ।

ṭa vargeṇa tavargeṇa jṁānaṁ dhādayastathā manaḥ pakāreṇaivoktaṁ phakāreṇa tvahaṁkṛtiḥ

ट-वर्ग और त-वर्ग से ज्ञान तथा ध आदि कहे जाते हैं। मन 'प' कार से और अहंकार 'फ' कार से कहा जाता है।

श्लोक 27 (padma.6.226.27)

बकारेण भकारेण महान्प्रकृतिरुच्यते । आत्मा तु स मकारः स्यात्पंचविंशः प्रकीर्तितः ।

bakāreṇa bhakāreṇa mahāṁprakṛtirucyate ātmā tu sa makāraḥ syātpaṁcaviṁśaḥ prakīrtitaḥ

'ब' और 'भ' से महत् और प्रकृति कही जाती है। और आत्मा, पच्चीसवाँ तत्त्व, वही 'म' कार है।

श्लोक 28 (padma.6.226.28)

देहेंद्रियमनः प्राणादिभ्योन्योऽनन्यसाधनः । भगवच्छेषभूतोऽसौ मकाराख्यः स चेतनः ।

deheṁdriyamanaḥ prāṇādibhyoṁyo'naṁyasādhanaḥ bhagavaccheṣabhūto'sau makārākhyaḥ sa cetanaḥ

देह, इंद्रिय, मन, प्राण आदि से भिन्न, अनन्य साधन वाला — 'म' कार नामक वह चेतन, भगवान का शेषभूत है।

श्लोक 29 (padma.6.226.29)

अवधारणवाच्येवमुकारः कैश्चिदुच्यते । श्रीतत्वमपि तत्पक्षे वकारेणैव चोच्यते ।

avadhāraṇavācyevamukāraḥ kaiściducyate śrītatvamapi tatpakṣe vakāreṇaiva cocyate

कुछ लोग 'उ' कार को अवधारणवाची (निश्चयसूचक) कहते हैं; उस मत में श्री-तत्त्व 'व' कार से कहा जाता है।

श्लोक 30 (padma.6.226.30)

भास्करस्य प्रभा यद्वत्तस्य नित्यानपायिनी । आकारेणोच्यते विष्णुः कल्याणगुणसागरः ।

bhāskarasya prabhā yadvattasya nityānapāyinī ākāreṇocyate viṣṇuḥ kalyāṇaguṇasāgaraḥ

जैसे सूर्य की प्रभा उससे नित्य अविच्छिन्न है, वैसे ही श्री विष्णु से। 'अ' कार से कल्याणगुणों के सागर विष्णु कहे जाते हैं,

श्लोक 31 (padma.6.226.31)

श्रीशः सर्वात्मनां शेषो जगद्बीजं परः पुमान् । जगत्कर्त्ता जगद्भर्त्ता ईश्वरो लोकबांधवः ।

śrīśaḥ sarvātmanāṁ śeṣo jagadbījaṁ paraḥ pumān jagatkarttā jagadbharttā īśvaro lokabāṁdhavaḥ

श्रीश, सर्वात्माओं के परम शेषी, जगत्बीज, परम पुरुष, जगत्कर्ता, जगद्भर्ता, ईश्वर, लोकबांधव।

श्लोक 32 (padma.6.226.32)

जगतामीश्वरी नित्या विष्णोरनपगामिनी । माता सर्वस्य जगतः पत्नी विष्णोर्मनोरमा ।

jagatāmīśvarī nityā viṣṇoranapagāminī mātā sarvasya jagataḥ patnī viṣṇormanoramā

जगत् की नित्य ईश्वरी, विष्णु से कभी अलग न होने वाली, समस्त जगत् की माता, विष्णु की मनोरमा पत्नी —

श्लोक 33 (padma.6.226.33)

जगदाधारभूता श्रीरुकारेणात्र चोच्यते । मकारेण तयोर्दासः क्षेत्रज्ञः प्रोच्यते बुधैः ।

jagadādhārabhūtā śrīrukāreṇātra cocyate makāreṇa tayordāsaḥ kṣetrajṁaḥ procyate budhaiḥ

जगत् का आधार श्री यहाँ 'उ' कार से कही जाती है। 'म' कार से उन दोनों के दास, क्षेत्रज्ञ, विद्वानों द्वारा कहे जाते हैं।

श्लोक 34 (padma.6.226.34)

ज्ञानाश्रमो ज्ञानगुणश्चेतनः प्रकृतेः परः । न जडो निर्विकारश्च एकरूप स्वरूपभाक् ।

jṁānāśramo jṁānaguṇaścetanaḥ prakṛteḥ paraḥ na jaḍo nirvikāraśca ekarūpa svarūpabhāk

यह ज्ञानाश्रय, ज्ञानगुणयुक्त, चेतन, प्रकृति से परे है; जड़ नहीं, निर्विकार, एकरूप स्वरूप वाला;

श्लोक 35 (padma.6.226.35)

अणुर्नित्यो व्याप्तिशीलश्चिदानंदात्मकस्तथा । अहमर्थोऽव्ययः क्षेत्री भिन्नरूपं सनातनः ।

aṇurnityo vyāptiśīlaścidānaṁdātmakastathā ahamartho'vyayaḥ kṣetrī bhiṁnarūpaṁ sanātanaḥ

अणु, नित्य, व्याप्तिशील, चिदानंदस्वरूप; 'अहं' का अर्थ, अव्यय, क्षेत्री, भिन्नरूप, सनातन;

श्लोक 36 (padma.6.226.36)

अदाह्योच्छेद्यो ह्यक्लैद्यस्त्वशोष्योक्षर एव च । एवमादिगुणोपेतश्शेषभूतः परस्य वै ।

adāhyocchedyo hyaklaidyastvaśoṣyokṣara eva ca evamādiguṇopetaśśeṣabhūtaḥ parasya vai

अदाह्य, अच्छेद्य, अक्लेद्य, अशोष्य, तथा अक्षर। ऐसे गुणों से युक्त, परमात्मा का शेषभूत —

श्लोक 37 (padma.6.226.37)

मकारेणोच्यते जीवः क्षेत्रज्ञः परवान्सदा । दासभूतो हरेरेव नान्यस्य तु कदाचन ।

makāreṇocyate jīvaḥ kṣetrajṁaḥ paravāṁsadā dāsabhūto harereva nāṁyasya tu kadācana

'म' कार से जीव कहा जाता है, क्षेत्रज्ञ, सदा परतंत्र, केवल हरि का दास, कभी किसी अन्य का नहीं।

श्लोक 38 (padma.6.226.38)

एवं दासत्वमेवास्य मध्यमेवावधार्यते । इत्येवं प्रणवस्यार्थो ज्ञातव्योक्तो मयानघे ।

evaṁ dāsatvamevāsya madhyamevāvadhāryate ityevaṁ praṇavasyārtho jṁātavyokto mayānaghe

इस प्रकार इसका दासत्व ही मध्यम अर्थ निश्चित किया जाता है। इस प्रकार प्रणव का यह अर्थ, हे अनघे, मैंने बताया है।

श्लोक 39 (padma.6.226.39)

विवृतिः प्रणवस्यार्थ मन्त्रशेषेण वै शुभे । परस्य दासभूतस्य स्वातन्त्र्यं नेह विद्यते ।

vivṛtiḥ praṇavasyārtha maṁtraśeṣeṇa vai śubhe parasya dāsabhūtasya svātaṁtryaṁ neha vidyate

प्रणव के अर्थ का विवरण मंत्र के शेष भाग से होता है, हे शुभे। परमात्मा के दास के लिए यहाँ कोई स्वतंत्रता नहीं है।

श्लोक 40 (padma.6.226.40)

तस्मान्महदहंकारौ मनसा विनिवर्त्तयेत् । स्वोपायबुद्ध्या यत्कृत्यं तदपि प्रतिषिध्यते ।

tasmāṁmahadahaṁkārau manasā vinivarttayet svopāyabuddhyā yatkṛtyaṁ tadapi pratiṣidhyate

इसलिए महत् और अहंकार (स्वतंत्र कर्तृत्व) से मन को हटा लेना चाहिए। स्वोपाय-बुद्धि से किया गया कर्म भी निषिद्ध है।

श्लोक 41 (padma.6.226.41)

अहंकृतिर्मकारः स्यान्नकारस्तन्निषेधकः । तस्मात्तु मनसैवास्य अहंकारविमोचनम् ।

ahaṁkṛtirmakāraḥ syāṁnakārastaṁniṣedhakaḥ tasmāttu manasaivāsya ahaṁkāravimocanam

अहंकृति 'म' कार है; और उसका निषेधक 'न' कार है। इसलिए इसका अहंकार-विमोचन मन से ही होता है।

श्लोक 42 (padma.6.226.42)

मनसा सर्वसिद्धिः स्यादन्यथा नाशमाप्नुयात् । नमसा सहितं किंचित्तदहंकार उच्यते ।

manasā sarvasiddhiḥ syādaṁyathā nāśamāpnuyāt namasā sahitaṁ kiṁcittadahaṁkāra ucyate

मन से ही सर्वसिद्धि होती है, अन्यथा नाश होता है। 'मैंने किया' के भाव सहित जो कुछ हो, वही अहंकार कहलाता है।

श्लोक 43 (padma.6.226.43)

अहंकारेण युक्तस्य सुखं किंचिन्न विद्यते । अहंकारविमूढात्मा अंधे तमसि मज्जति ।

ahaṁkāreṇa yuktasya sukhaṁ kiṁciṁna vidyate ahaṁkāravimūḍhātmā aṁdhe tamasi majjati

अहंकार से युक्त व्यक्ति को कोई सुख प्राप्त नहीं होता। अहंकार से मोहित आत्मा अंध तमस में डूब जाती है।

श्लोक 44 (padma.6.226.44)

तस्मान्न मनसा चात्र स्वातंत्र्यं प्रतिषिध्यते । भगवत्परतंत्रोऽसौ तदायत्तश्च जीवति ।

tasmāṁna manasā cātra svātaṁtryaṁ pratiṣidhyate bhagavatparataṁtro'sau tadāyattaśca jīvati

इसलिए मन में यहाँ स्वतंत्रता का त्याग करना चाहिए। यह जीव भगवान पर परतंत्र है और उन्हीं के अधीन जीता है।

श्लोक 45 (padma.6.226.45)

तस्मात्साधनकर्तृत्वं चेतनस्य न विद्यते । ईश्वरस्यैव संकल्पाद्वर्त्तते स्वचराचरम् ।

tasmātsādhanakartṛtvaṁ cetanasya na vidyate īśvarasyaiva saṁkalpādvarttate svacarācaram

इसलिए चेतन का साधन में भी कर्तृत्व नहीं है। ईश्वर के संकल्प से ही चराचर जगत् चलता है।

श्लोक 46 (padma.6.226.46)

तस्मात्स्वसामर्थ्यविधिं त्यजेत्सर्वमशेषतः । ईश्वरस्य तु सामर्थ्यान्नालभ्यं तस्य विद्यते ।

tasmātsvasāmarthyavidhiṁ tyajetsarvamaśeṣataḥ īśvarasya tu sāmarthyāṁnālabhyaṁ tasya vidyate

इसलिए स्वसामर्थ्य के विधान का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। किंतु ईश्वर के सामर्थ्य से उसके लिए कुछ भी अलभ्य नहीं है।

श्लोक 47 (padma.6.226.47)

तस्मिन्न्यस्तभरः श्रीशे तत्कर्मैव समाचरेत् । परमात्मा हरिस्स्वामी स्वमहं तस्य सर्वदा ।

tasmiṁṁyastabharaḥ śrīśe tatkarmaiva samācaret paramātmā harissvāmī svamahaṁ tasya sarvadā

उस श्रीश पर सारा भार रखकर उन्हीं का कर्म करना चाहिए। परमात्मा हरि स्वामी हैं; मैं सदा उन्हीं का हूँ।

श्लोक 48 (padma.6.226.48)

इच्छाया विनियोक्तव्यस्तस्यैवात्मेश्वरस्य हि । इत्येवं मनसा त्यक्तमहंता ममतोर्जितम् ।

icchāyā viniyoktavyastasyaivātmeśvarasya hi ityevaṁ manasā tyaktamahaṁtā mamatorjitam

उस आत्मेश्वर की इच्छा से ही नियुक्त होना चाहिए। इस प्रकार मन से दृढ़ अहंता-ममता का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 49 (padma.6.226.49)

देहेष्वहं मतिर्मूलं संसृतौ कर्मबंधने । तस्मान्महदहंकारौ मनसा वर्जयेद्बुधः ।

deheṣvahaṁ matirmūlaṁ saṁsṛtau karmabaṁdhane tasmāṁmahadahaṁkārau manasā varjayedbudhaḥ

देह में 'मैं' का भाव ही संसार में कर्मबंधन की जड़ है। इसलिए विद्वान मन से महत् और अहंकार का त्याग करे।

श्लोक 50 (padma.6.226.50)

अथ नारायणपदं वक्ष्यामि गिरजे शुभे । नारा इत्यात्मनां संघास्तेषां गतिरसौ पुमान् ।

atha nārāyaṇapadaṁ vakṣyāmi giraje śubhe nārā ityātmanāṁ saṁghāsteṣāṁ gatirasau pumān

अब, हे शुभे गिरिजे, मैं 'नारायण' पद बताता हूँ। 'नाराः' अर्थात् आत्माओं का समूह; वह पुरुष उनकी गति हैं।

श्लोक 51 (padma.6.226.51)

त एव चायनं तस्य तस्मान्नारायणः स्मृतः । सर्वं हि चिदचिद्वस्तु श्रूयते दृश्यते जगत् ।

ta eva cāyanaṁ tasya tasmāṁnārāyaṇaḥ smṛtaḥ sarvaṁ hi cidacidvastu śrūyate dṛśyate jagat

और वे ही उनका अयन (आश्रय) हैं, इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। यह सम्पूर्ण चिद्-अचिद् जगत् जो सुना और देखा जाता है —

श्लोक 52 (padma.6.226.52)

योऽसौ व्याप्यस्थितो नित्यं स वै नारायणः स्मृतः । नाराश्चेति सर्वपुंसां समूहाः परिकीर्तिताः ।

yo'sau vyāpyasthito nityaṁ sa vai nārāyaṇaḥ smṛtaḥ nārāśceti sarvapuṁsāṁ samūhāḥ parikīrtitāḥ

जो इसमें नित्य व्याप्त होकर स्थित हैं, वे ही नारायण कहलाते हैं। और 'नाराः' समस्त पुरुषों के समूह कहे गए हैं।

श्लोक 53 (padma.6.226.53)

गतिरालंबनं तेषां तस्मान्नारायणः स्मृतः । नराज्जातानि तत्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः ।

gatirālaṁbanaṁ teṣāṁ tasmāṁnārāyaṇaḥ smṛtaḥ narājjātāni tatvāni nārāṇīti vidurbudhāḥ

उनकी गति और आलंबन वे ही हैं, इसलिए नारायण कहलाते हैं। नर से उत्पन्न तत्त्वों को विद्वान 'नाराणि' कहते हैं।

श्लोक 54 (padma.6.226.54)

तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणस्स्मृतः । कल्पांतेपि जगत्कृत्स्नं ग्रसित्वा येन धार्यते ।

tāṁyeva cāyanaṁ tasya tena nārāyaṇassmṛtaḥ kalpāṁtepi jagatkṛtsnaṁ grasitvā yena dhāryate

और वे ही उनका अयन हैं, इसलिए नारायण कहलाते हैं। कल्पांत में सम्पूर्ण जगत् को निगलकर जिनके द्वारा वह धारण किया जाता है,

श्लोक 55 (padma.6.226.55)

पुनः संसृज्यते येन स वै नारायणः स्मृतः । चराचरं जगत्कृत्स्नं नार इत्यभि धीयते ।

punaḥ saṁsṛjyate yena sa vai nārāyaṇaḥ smṛtaḥ carācaraṁ jagatkṛtsnaṁ nāra ityabhi dhīyate

और जिनके द्वारा पुनः सृजित होता है — वे ही नारायण कहलाते हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत् 'नार' कहलाता है।

श्लोक 56 (padma.6.226.56)

तस्य वासं गतिर्येन तेन नारायणः स्मृतः । नारो नराणां संघातस्तस्यासावयनं गतिः ।

tasya vāsaṁ gatiryena tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ nāro narāṇāṁ saṁghātastasyāsāvayanaṁ gatiḥ

जिनके द्वारा इसका निवास और गति है, वे ही नारायण कहलाते हैं। 'नार' मनुष्यों का समूह है; वे उनका आश्रय, उनकी गति हैं।

श्लोक 57 (padma.6.226.57)

तेनासौ मुनिभिर्नित्यं नारायण इतीरितः । प्रभवन्ति यतो लोका महाब्धौ पृथुफेनवत् ।

tenāsau munibhirnityaṁ nārāyaṇa itīritaḥ prabhavaṁti yato lokā mahābdhau pṛthuphenavat

इसलिए मुनियों द्वारा वे सदा नारायण कहे जाते हैं। जिनसे लोक उत्पन्न होते हैं, जैसे महासागर पर विशाल फेन,

श्लोक 58 (padma.6.226.58)

पुनर्यस्मात्प्रलीयन्ते तस्मान्नारायणः स्मृतः । यो वै नित्यपदे नित्यो नित्यमुक्तैकभोगवान् ।

punaryasmātpralīyaṁte tasmāṁnārāyaṇaḥ smṛtaḥ yo vai nityapade nityo nityamuktaikabhogavān

और जिनमें वे पुनः लीन होते हैं — इसलिए वे नारायण कहे गए हैं। जो नित्यपद में नित्य, नित्यमुक्त, एकमात्र भोक्ता हैं,

श्लोक 59 (padma.6.226.59)

ईशः सर्वस्य जगतः स वै नारायणः स्मृतः । नारायणः परंब्रह्म तत्वं नारायणः परम् ।

īśaḥ sarvasya jagataḥ sa vai nārāyaṇaḥ smṛtaḥ nārāyaṇaḥ paraṁbrahma tatvaṁ nārāyaṇaḥ param

सम्पूर्ण जगत् के ईश्वर — वे ही नारायण कहे जाते हैं। नारायण परब्रह्म हैं; नारायण परम तत्त्व हैं।

श्लोक 60 (padma.6.226.60)

यच्च किंचिज्जगत्यस्मिन्दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अंतर्बंहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ।

yacca kiṁcijjagatyasmiṁdṛśyate śrūyate'pi vā aṁtarbaṁhiśca tatsarvaṁ vyāpya nārāyaṇaḥ sthitaḥ

और इस जगत् में जो कुछ भी देखा या सुना जाता है — उस सबमें, भीतर-बाहर, नारायण व्याप्त होकर स्थित हैं।

श्लोक 61 (padma.6.226.61)

अपहतपाप्मा पुरुषः सर्वभूतांतरस्थितः । दिव्यएकस्सदा नित्यो हरिर्नारायणोऽच्युतः ।

apahatapāpmā puruṣaḥ sarvabhūtāṁtarasthitaḥ divyaekassadā nityo harirnārāyaṇo'cyutaḥ

समस्त पाप से रहित पुरुष, सभी प्राणियों के भीतर स्थित, एक दिव्य, सदा नित्य हरि नारायण अच्युत —

श्लोक 62 (padma.6.226.62)

यस्तु द्रष्टा च द्रष्टव्यं श्रोता श्रोतव्यमेव च । स्प्रष्टा च स्पर्शितव्यश्च ध्याता ध्यातव्यमेव च ।

yastu draṣṭā ca draṣṭavyaṁ śrotā śrotavyameva ca spraṣṭā ca sparśitavyaśca dhyātā dhyātavyameva ca

जो द्रष्टा और दृश्य, श्रोता और श्रव्य, स्पर्श करने वाला और स्पृश्य, ध्याता और ध्येय हैं,

श्लोक 63 (padma.6.226.63)

वक्ता च वाच्यं ज्ञाता च ज्ञातव्यं चिदचिज्जगत् । तच्च सर्वं हरिः श्रीशो नारायण उदाहृतः ।

vaktā ca vācyaṁ jṁātā ca jṁātavyaṁ cidacijjagat tacca sarvaṁ hariḥ śrīśo nārāyaṇa udāhṛtaḥ

वक्ता और वाच्य, ज्ञाता और ज्ञेय — चिद्-अचिद् जगत् — वह सब हरि, श्रीश नारायण ही कहे गए हैं।

श्लोक 64 (padma.6.226.64)

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स लोकान्सर्वतो व्याप्य अत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ।

sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt sa lokāṁsarvato vyāpya atyatiṣṭhaddaśāṁgulam

सहस्रशीर्ष, सहस्राक्ष, सहस्रचरण पुरुष — लोकों को सब ओर से व्याप्त करके भी दस अंगुल शेष रहकर उन्हें लाँघ गए।

श्लोक 65 (padma.6.226.65)

यद्भूतं यच्च भव्यं तत्सर्वं नारायणो हरिः । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेन विराट्पुमान् ।

yadbhūtaṁ yacca bhavyaṁ tatsarvaṁ nārāyaṇo hariḥ utāmṛtatvasyeśāno yadaṁnena virāṭpumān

जो हुआ और जो होगा — वह सब नारायण हरि ही हैं; और वे अमरत्व के स्वामी, अन्न के द्वारा विराट पुरुष हैं।

श्लोक 66 (padma.6.226.66)

स एव पुरुषो विष्णुर्वासुदेवोऽच्युतो हरिः । हिरण्मयोऽथ भगवान्सोऽमृतः शाश्वतः शिवः ।

sa eva puruṣo viṣṇurvāsudevo'cyuto hariḥ hiraṁmayo'tha bhagavāṁso'mṛtaḥ śāśvataḥ śivaḥ

वे ही पुरुष, विष्णु, वासुदेव, अच्युत, हरि, हिरण्मय, भगवान, अमृत, शाश्वत, शिव हैं,

श्लोक 67 (padma.6.226.67)

पतिर्विश्वस्य जगतः सर्वलोकेश्वरं प्रभुः । हिरण्यगर्भाः सविता अनंतोऽसौ महेश्वरः ।

patirviśvasya jagataḥ sarvalokeśvaraṁ prabhuḥ hiraṁyagarbhāḥ savitā anaṁto'sau maheśvaraḥ

समस्त विश्व के पति, प्रभु, सर्वलोकेश्वर, हिरण्यगर्भ, सविता, अनंत, महेश्वर।

श्लोक 68 (padma.6.226.68)

भगवानिति शब्दोऽयं तथा पुरुष इत्यपि । वर्त्तते निरुपाधिश्च वासुदेवोऽखिलात्मनि ।

bhagavāniti śabdo'yaṁ tathā puruṣa ityapi varttate nirupādhiśca vāsudevo'khilātmani

यह 'भगवान' शब्द तथा 'पुरुष' शब्द भी निरुपाधि रूप से केवल सर्वात्मा वासुदेव में ही सार्थक है।

श्लोक 69 (padma.6.226.69)

ईश्वरो भगवान्विष्णुः परमात्मा जगत्सुहृत् । शास्ता चराचरस्यैको यतीनां परमा गतिः ।

īśvaro bhagavāṁviṣṇuḥ paramātmā jagatsuhṛt śāstā carācarasyaiko yatīnāṁ paramā gatiḥ

ईश्वर, भगवान विष्णु, परमात्मा, जगत्सुहृद्, चराचर के एकमात्र शासक, यतियों की परम गति —

श्लोक 70 (padma.6.226.70)

यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदांते च प्रतिष्ठितः । तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ।

yo vedādau svaraḥ prokto vedāṁte ca pratiṣṭhitaḥ tasya prakṛtilīnasya yaḥ paraḥ sa maheśvaraḥ

जो वेद के आरंभ में स्वर कहे गए और वेदांत में प्रतिष्ठित हैं — जो प्रकृतिलीन से भी परे हैं — वे महेश्वर हैं।

श्लोक 71 (padma.6.226.71)

योसावकारो वै विष्णुर्योऽसौ नारायणो हरिः । स एव पुरुषो नित्यः परमात्मा महेश्वरः ।

yosāvakāro vai viṣṇuryo'sau nārāyaṇo hariḥ sa eva puruṣo nityaḥ paramātmā maheśvaraḥ

जो 'अ' कार हैं, वे ही विष्णु हैं; जो नारायण हैं, वे ही हरि हैं। वे ही नित्य पुरुष, परमात्मा, महेश्वर हैं।

श्लोक 72 (padma.6.226.72)

यस्मादुद्भूतमैश्वर्यं यस्मिन्कस्मिंश्च वर्तते । तस्मिन्नीश्वरशब्दोऽपि प्रोच्यते मुनिभिस्तथा । निरुपाधीश्वरत्वं हि वासुदेवे प्रतिष्ठितम् ।

yasmādudbhūtamaiśvaryaṁ yasmiṁkasmiṁśca vartate tasmiṁnīśvaraśabdo'pi procyate munibhistathā nirupādhīśvaratvaṁ hi vāsudeve pratiṣṭhitam

जिससे ऐश्वर्य उत्पन्न होता है, और जिसमें भी वह हो, उसके लिए भी मुनि 'ईश्वर' शब्द कहते हैं; किंतु निरुपाधि ईश्वरत्व वासुदेव में ही प्रतिष्ठित है।

श्लोक 73 (padma.6.226.73)

आत्मेश्वर इति प्रोक्तो वेदवादैः सनातनैः । तस्मान्महेश्वरत्वं तु वासुदेवे प्रतिष्ठितम् ।

ātmeśvara iti prokto vedavādaiḥ sanātanaiḥ tasmāṁmaheśvaratvaṁ tu vāsudeve pratiṣṭhitam

सनातन वेदवाणियों द्वारा वे 'आत्मेश्वर' कहे गए हैं। इसलिए वास्तविक महेश्वरत्व वासुदेव में ही प्रतिष्ठित है।

श्लोक 74 (padma.6.226.74)

असौ त्रिपाद्विभूतेस्तु लीलया अपि चेश्वरः । विभूतिद्वयमैश्वर्यं तस्यैव सकलात्मनः ।

asau tripādvibhūtestu līlayā api ceśvaraḥ vibhūtidvayamaiśvaryaṁ tasyaiva sakalātmanaḥ

वे लीला से त्रिपाद्-विभूति के भी ईश्वर हैं; उन सर्वात्मा के ही दोनों विभूतियों का ऐश्वर्य है।

श्लोक 75 (padma.6.226.75)

श्रीभूनीलापतिर्योसावीश्वरस्स उदाहृतः । तस्मात्सर्वेश्वरत्वं तु वासुदेवे प्रतिष्ठितम् ।

śrībhūnīlāpatiryosāvīśvarassa udāhṛtaḥ tasmātsarveśvaratvaṁ tu vāsudeve pratiṣṭhitam

जो श्री-भू-नीला के पति हैं, वे ही ईश्वर कहे गए हैं। इसलिए सर्वेश्वरत्व वासुदेव में ही प्रतिष्ठित है।

श्लोक 76 (padma.6.226.76)

असौ यज्ञेश्वरो यज्ञो यज्ञभुक्यज्ञकृद्विभुः । यज्ञभुग्यज्ञपुरुषः स एव परमेश्वरः ।

asau yajṁeśvaro yajṁo yajṁabhukyajṁakṛdvibhuḥ yajṁabhugyajṁapuruṣaḥ sa eva parameśvaraḥ

वे यज्ञेश्वर, यज्ञ, यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, विभु हैं; यज्ञभोक्ता, यज्ञपुरुष — वे ही परमेश्वर हैं।

श्लोक 77 (padma.6.226.77)

यज्ञेश्वरो हव्यसमस्तकव्यभोक्ता व्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र । तत्संनिधानादपयांति सद्यो रक्षांस्यशेषाण्यसुराश्च सर्वे ।

yajṁeśvaro havyasamastakavyabhoktā vyayātmā harirīśvaro'tra tatsaṁnidhānādapayāṁti sadyo rakṣāṁsyaśeṣāṁyasurāśca sarve

यज्ञेश्वर, हव्य-कव्य के भोक्ता, अव्यय, हरि — उनकी उपस्थिति मात्र से सभी राक्षस और सभी असुर तुरंत भाग जाते हैं।

श्लोक 78 (padma.6.226.78)

योऽसौ विराट्त्वमापन्नो हरिर्भूतो जनार्दनः । संतर्पयति लोकांस्त्रीन्स एव परमेश्वरः ।

yo'sau virāṭtvamāpaṁno harirbhūto janārdanaḥ saṁtarpayati lokāṁstrīṁsa eva parameśvaraḥ

जो विराट रूप धारण करके, हरि जनार्दन बनकर तीनों लोकों को तृप्त करते हैं — वे ही परमेश्वर हैं।

श्लोक 79 (padma.6.226.79)

येन पूर्णेन हविषा देवा यज्ञमतन्वत । तस्माद्यज्ञात्समुत्पन्ना ये के चोभयादतः ।

yena pūrṇena haviṣā devā yajṁamataṁvata tasmādyajṁātsamutpaṁnā ye ke cobhayādataḥ

उस पूर्ण हवि के द्वारा देवताओं ने यज्ञ किया; उस यज्ञ से जो कुछ भी उत्पन्न हुआ, दोनों प्रकार का —

श्लोक 80 (padma.6.226.80)

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । तस्मादश्वा अजायंत गावश्च पुरुषादयः ।

tasmādyajṁātsarvahuta ṛcaḥ sāmāni jajṁire tasmādaśvā ajāyaṁta gāvaśca puruṣādayaḥ

उस सर्वहुत यज्ञ से ऋचाएँ और साम उत्पन्न हुए; उससे अश्व, गौएँ और मनुष्य आदि उत्पन्न हुए।

श्लोक 81 (padma.6.226.81)

पुरुषस्य तनोरस्य सर्वयज्ञमयस्य वै । हरेः सर्वं समुद्भूतं जगत्स्थावरजंगमम् ।

puruṣasya tanorasya sarvayajṁamayasya vai hareḥ sarvaṁ samudbhūtaṁ jagatsthāvarajaṁgamam

इस सर्वयज्ञमय पुरुष हरि के शरीर से सम्पूर्ण चराचर जगत् उत्पन्न हुआ।

श्लोक 82 (padma.6.226.82)

मुखबाहूरुपादाः स्युस्तस्य वर्णा यथाक्रमम् । पद्भ्यां तु पृथिवी तस्य शिरसा द्यौरजायत ।

mukhabāhūrupādāḥ syustasya varṇā yathākramam padbhyāṁ tu pṛthivī tasya śirasā dyaurajāyata

उनके मुख, भुजा, ऊरु और पैर क्रमशः वर्ण बने। उनके पैरों से पृथ्वी और सिर से आकाश उत्पन्न हुआ।

श्लोक 83 (padma.6.226.83)

मनसश्चंद्रमा जातश्चक्षुषश्च प्रभाकरः । मुखादग्निः सहस्राक्षो वायुः प्राणात्सदागतिः ।

manasaścaṁdramā jātaścakṣuṣaśca prabhākaraḥ mukhādagniḥ sahasrākṣo vāyuḥ prāṇātsadāgatiḥ

उनके मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, नेत्र से सूर्य; मुख से अग्नि, सहस्राक्ष इंद्र और प्राण से सदागति वायु।

श्लोक 84 (padma.6.226.84)

नाभेर्विरिंचिर्गगनं जगत्सर्वं चराचरम् । यस्मात्सर्वं समुद्भूतं जगद्विष्णोः सनातनात् ।

nābherviriṁcirgaganaṁ jagatsarvaṁ carācaram yasmātsarvaṁ samudbhūtaṁ jagadviṣṇoḥ sanātanāt

उनकी नाभि से ब्रह्मा और आकाश उत्पन्न हुए; सम्पूर्ण चराचर जगत्। चूँकि सारा जगत् सनातन विष्णु से उत्पन्न हुआ—

श्लोक 85 (padma.6.226.85)

तस्मात्सर्वमयो विष्णुर्नारायण इतीरितः । एवं सृष्ट्वा जगत्सर्वं पुनः संग्रसते हरिः ।

tasmātsarvamayo viṣṇurnārāyaṇa itīritaḥ evaṁ sṛṣṭvā jagatsarvaṁ punaḥ saṁgrasate hariḥ

— इसलिए सर्वमय विष्णु नारायण कहे जाते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् की रचना करके हरि उसे पुनः निगल जाते हैं।

श्लोक 86 (padma.6.226.86)

निजलीलासमुद्भूतं तान्तवं चोर्णनाभिवत् । ब्रह्माणमिंद्रं रुद्रं च यमं वरुणमेव च ।

nijalīlāsamudbhūtaṁ tāṁtavaṁ corṇanābhivat brahmāṇamiṁdraṁ rudraṁ ca yamaṁ varuṇameva ca

अपनी लीला से उत्पन्न, मकड़ी के जाले के समान इस जगत् को। ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, यम और वरुण को भी—

श्लोक 87 (padma.6.226.87)

निगृह्य हरते यस्मात्तस्माद्धरिरहोच्यते । असावेकार्णवीभूते मायावटतले पुमान् ।

nigṛhya harate yasmāttasmāddharirahocyate asāvekārṇavībhūte māyāvaṭatale pumān

— चूँकि वे इन सबको ग्रस लेते हैं, इसलिए वे 'हरि' कहलाते हैं। जगत् के एकार्णव होने पर वह पुरुष माया के वटवृक्ष तले,

श्लोक 88 (padma.6.226.88)

जगत्स्वजठरे कृत्वा शेते तस्मिन्सनातनः । आसीदेको हि वै चात्र विष्णुर्नारायणोऽच्युतः ।

jagatsvajaṭhare kṛtvā śete tasmiṁsanātanaḥ āsīdeko hi vai cātra viṣṇurnārāyaṇo'cyutaḥ

जगत् को अपने उदर में रखकर वहाँ शयन करते हैं। वहाँ केवल एक ही थे — विष्णु, नारायण, अच्युत।

श्लोक 89 (padma.6.226.89)

न ब्रह्मा न च रुद्रश्च न देवा न महर्षयः । नेमे द्यावापृथिव्यौ च न सोमो न च भास्करः ।

na brahmā na ca rudraśca na devā na maharṣayaḥ neme dyāvāpṛthivyau ca na somo na ca bhāskaraḥ

न ब्रह्मा थे, न रुद्र, न देवता, न महर्षि; न यह द्युलोक-पृथ्वी थे, न चंद्रमा, न सूर्य;

श्लोक 90 (padma.6.226.90)

न नक्षत्राणि लोकाश्च न चांडं महदावृतम् । यस्माज्जगद्वृतं तेन सकलं हरिणा शुभे ।

na nakṣatrāṇi lokāśca na cāṁḍaṁ mahadāvṛtam yasmājjagadvṛtaṁ tena sakalaṁ hariṇā śubhe

न नक्षत्र थे, न लोक, न वह विशाल आवृत अंड। चूँकि जगत् उन्हीं हरि द्वारा आवृत था, हे शुभे—

श्लोक 91 (padma.6.226.91)

सृष्टं पुनस्तथा सर्गे तस्मान्नारायणस्स्मृतः । तस्य दास्यं चतुर्थ्यानु मंत्रे प्रोक्तं तु पार्वति ।

sṛṣṭaṁ punastathā sarge tasmāṁnārāyaṇassmṛtaḥ tasya dāsyaṁ caturthyānu maṁtre proktaṁ tu pārvati

— और पुनः सृष्टि में उन्हीं के द्वारा सृजित होता है, इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। मंत्र में चतुर्थी विभक्ति द्वारा उनका दास्य कहा गया है, हे पार्वती।

श्लोक 92 (padma.6.226.92)

दासभूतमिदं तस्य ब्रह्माद्यं सकलं जगत् । एवमर्थं विदित्वा वै पश्चान्मंत्रं प्रयोजयेत् ।

dāsabhūtamidaṁ tasya brahmādyaṁ sakalaṁ jagat evamarthaṁ viditvā vai paścāṁmaṁtraṁ prayojayet

ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का दास है। इस अर्थ को जानकर ही पश्चात् मंत्र का प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक 93 (padma.6.226.93)

अविदित्वा तु मन्त्रार्थं सिद्धिं नैवाधिगच्छति । न तु भुक्तिं च भक्तिं च न च मुक्तिं वरानने ।

aviditvā tu maṁtrārthaṁ siddhiṁ naivādhigacchati na tu bhuktiṁ ca bhaktiṁ ca na ca muktiṁ varānane

किंतु मंत्रार्थ को जाने बिना कोई सिद्धि प्राप्त नहीं होती — न भुक्ति, न भक्ति, न मुक्ति, हे वरानने।

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