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उत्तर खण्ड · अध्याय 227

विष्णु की त्रिपाद्-विभूति

अध्याय 226अध्याय-सूचीअध्याय 228

श्लोक 1 (padma.6.227.1)

पार्वत्युवाच- विस्तरेण मयाचक्ष्व मंत्रार्थपदगौरवम् । ईश्वरस्य स्वरूपं च तद्विभूतिगुणांस्तथा ।

pārvatyuvāca vistareṇa mayācakṣva maṁtrārthapadagauravam īśvarasya svarūpaṁ ca tadvibhūtiguṇāṁstathā

पार्वती ने कहा — मंत्र के पदों का गौरवपूर्ण अर्थ मुझे विस्तार से बताइए, तथा ईश्वर का स्वरूप और उनकी विभूति एवं गुण भी।

श्लोक 2 (padma.6.227.2)

तद्विष्णोः परमं धामव्यूहभेदांस्तथा हरेः । सर्वमाख्याहि तत्त्वेन मम सर्वसुरेश्वर ।

tadviṣṇoḥ paramaṁ dhāmavyūhabhedāṁstathā hareḥ sarvamākhyāhi tattvena mama sarvasureśvara

उस विष्णु के परम धाम को, तथा हरि के व्यूह-भेदों को भी, हे सर्वसुरेश्वर, मुझे तत्त्वतः सब कुछ बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.227.3)

ईश्वर उवाच- शृणु देवि प्रवक्ष्यामि स्वरूपं परमात्मनः । विभूतिगुणसंघातं तदवस्थात्मकं हरेः ।

īśvara uvāca śṛṇu devi pravakṣyāmi svarūpaṁ paramātmanaḥ vibhūtiguṇasaṁghātaṁ tadavasthātmakaṁ hareḥ

ईश्वर ने कहा — हे देवी, सुनिए, मैं परमात्मा का स्वरूप, हरि की विभूति और गुणों का समूह, तथा उनकी अवस्थाएँ बताता हूँ।

श्लोक 4 (padma.6.227.4)

यः परः पुरुषो विष्णुर्नारायण उदाहृतः । स ईश्वरश्च जगतां परमात्मा सनातनः ।

yaḥ paraḥ puruṣo viṣṇurnārāyaṇa udāhṛtaḥ sa īśvaraśca jagatāṁ paramātmā sanātanaḥ

जो परम पुरुष विष्णु नारायण कहे गए हैं — वे ही जगतों के ईश्वर, सनातन परमात्मा हैं।

श्लोक 5 (padma.6.227.5)

विश्वतः पाणिपादश्च चक्षुष्मान्विश्वतः प्रभुः । विश्वानि भुवनान्यस्मिन्धामानि परमाणि वै ।

viśvataḥ pāṇipādaśca cakṣuṣmāṁviśvataḥ prabhuḥ viśvāni bhuvanāṁyasmiṁdhāmāni paramāṇi vai

सब ओर हाथ-पैर वाले, सब ओर नेत्र वाले, सब ओर के प्रभु — जिनमें सभी लोक, सभी परम धाम,

श्लोक 6 (padma.6.227.6)

धारयन्सोऽप्यत्यतिष्ठेन्मनांसि च मनीषिणाम् । एवं बहुस्वरूपः सञ्छ्रीपतिः पुरुषोत्तमः । ईश्वरर्य्या सहभोगार्थं दिव्यमंगलरूपवान् ।

dhārayaṁso'pyatyatiṣṭheṁmanāṁsi ca manīṣiṇām evaṁ bahusvarūpaḥ saṁchrīpatiḥ puruṣottamaḥ īśvararyyā sahabhogārthaṁ divyamaṁgalarūpavān

— उन सबको धारण करते हुए भी वे उन सबसे तथा विद्वानों के मन से भी परे रहते हैं। इस प्रकार बहुरूप श्रीपति पुरुषोत्तम, ईश्वरी के साथ भोग हेतु दिव्य मंगलरूपधारी,

श्लोक 7 (padma.6.227.7)

बृहच्छरीरोऽग्निसमानरूपो युवा कुमारत्वमुपेयिवान्हरिः । रेमे श्रियासौ जगतां जनन्या स्वज्योत्स्नया चंद्रइवामृतांशुः ।

bṛhaccharīro'gnisamānarūpo yuvā kumāratvamupeyivāṁhariḥ reme śriyāsau jagatāṁ janaṁyā svajyotsnayā caṁdraivāmṛtāṁśuḥ

विशाल शरीर वाले, अग्नि के समान रूप वाले, युवा, नित्य कुमारत्व को प्राप्त हरि — जगत् की जननी श्री के साथ वैसे ही रमण करते हैं जैसे चंद्रमा अपनी चाँदनी से।

श्लोक 8 (padma.6.227.8)

अयं च जगदीश्वर्य्या कुमारो नित्ययौवनः । कंदर्प्पकोटिलावण्यः स तस्थे परमे पदे ।

ayaṁ ca jagadīśvaryyā kumāro nityayauvanaḥ kaṁdarppakoṭilāvaṁyaḥ sa tasthe parame pade

और यह नित्ययौवन कुमार, जगदीश्वरी के साथ, करोड़ों कामदेवों से भी अधिक लावण्यवान, परम पद में विराजमान रहे।

श्लोक 9 (padma.6.227.9)

भोगार्थं परमं व्योम लीलार्थमखिलं जगत् । भोगेन क्रीडया विष्णोर्विभूतिद्वयसंस्थितिः ।

bhogārthaṁ paramaṁ vyoma līlārthamakhilaṁ jagat bhogena krīḍayā viṣṇorvibhūtidvayasaṁsthitiḥ

परम व्योम भोग हेतु है, सम्पूर्ण जगत् लीला हेतु है। भोग और क्रीड़ा से विष्णु की द्विविध विभूति स्थित है।

श्लोक 10 (padma.6.227.10)

भोगे नित्यस्थितिस्तस्य लीलां संहरते कदा । भोगो लीला उभौस्तस्य धार्य्येते शक्तिमत्तया ।

bhoge nityasthitistasya līlāṁ saṁharate kadā bhogo līlā ubhaustasya dhāryyete śaktimattayā

भोग में उनकी नित्य स्थिति है; लीला को वे कभी संहृत करते हैं। भोग और लीला दोनों उनकी शक्ति से धारण किए जाते हैं।

श्लोक 11 (padma.6.227.11)

त्रिपाद्व्याप्तिः परे धाम्नि पादोस्येहाभवत्पुनः । त्रिपाद्विभूतिर्नित्या स्यादनित्यं पादमैश्वरम् ।

tripādvyāptiḥ pare dhāṁni pādosyehābhavatpunaḥ tripādvibhūtirnityā syādanityaṁ pādamaiśvaram

उनकी त्रिपाद व्याप्ति परम धाम में है; उनका एक पाद यहाँ हुआ। त्रिपाद्-विभूति नित्य है; ऐश्वर्य का वह एक पाद अनित्य है।

श्लोक 12 (padma.6.227.12)

नित्यं तद्रूपमीशस्य परे धाम्नि स्थितं शुभम् । अच्युतं शाश्वतं दिव्यं सदा यौवनमाश्रितम् ।

nityaṁ tadrūpamīśasya pare dhāṁni sthitaṁ śubham acyutaṁ śāśvataṁ divyaṁ sadā yauvanamāśritam

ईश का वह नित्य, शुभ रूप, परम धाम में स्थित, अच्युत, शाश्वत, दिव्य, सदा यौवनयुक्त है,

श्लोक 13 (padma.6.227.13)

नित्यं संभोगमीश्वर्या श्रिया भूम्या च संवृतम् । नित्यैवेषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी ।

nityaṁ saṁbhogamīśvaryā śriyā bhūṁyā ca saṁvṛtam nityaiveṣā jagaṁmātā viṣṇoḥ śrīranapāyinī

अपनी ईश्वरी के साथ नित्य संभोगयुक्त, श्री और भूमि से घिरा हुआ। यह जगन्माता, विष्णु की श्री, नित्य और अविनाशी है।

श्लोक 14 (padma.6.227.14)

यथा सर्वगतो विष्णुस्तथा लक्ष्मीश्शुभानने । ईशाना सर्वजगतो विष्णुपत्नी सदा शिवा ।

yathā sarvagato viṣṇustathā lakṣmīśśubhānane īśānā sarvajagato viṣṇupatnī sadā śivā

जैसे विष्णु सर्वव्यापी हैं, वैसे ही, हे शुभानने, लक्ष्मी भी — सम्पूर्ण जगत् की ईश्वरी, विष्णुपत्नी, सदा शिवा।

श्लोक 15 (padma.6.227.15)

सर्वतः पाणिपादांता सर्वतोऽक्षिशिरोमुखी । नारायणी जगन्माता समस्तजगदाश्रया ।

sarvataḥ pāṇipādāṁtā sarvato'kṣiśiromukhī nārāyaṇī jagaṁmātā samastajagadāśrayā

सब ओर हाथ-पैर, सब ओर नेत्र-सिर-मुख वाली नारायणी, जगन्माता, सम्पूर्ण जगत् की आश्रयभूता —

श्लोक 16 (padma.6.227.16)

यदपाङ्गाश्रितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । जगत्स्थितिलयौ यस्या उन्मीलननिमीलनात् ।

yadapāṁgāśritaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṁgamam jagatsthitilayau yasyā uṁmīlananimīlanāt

जिनकी कटाक्ष-दृष्टि से चराचर जगत् आश्रित है; जिनके नेत्र खुलने-बंद होने से जगत् की स्थिति और लय होती है।

श्लोक 17 (padma.6.227.17)

सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी । लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता ।

sarvasyādyā mahālakṣmīstriguṇā parameśvarī lakṣyālakṣyasvarūpā sā vyāpya kṛtsnaṁ vyavasthitā

सबकी आद्या महालक्ष्मी, त्रिगुणा परमेश्वरी, लक्ष्य-अलक्ष्य स्वरूपा — वे संपूर्ण को व्याप्त करके स्थित हैं।

श्लोक 18 (padma.6.227.18)

शून्यं तदखिलं विश्वं विलोक्य परमेश्वरी । शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा ।

śūṁyaṁ tadakhilaṁ viśvaṁ vilokya parameśvarī śūṁyaṁ tadakhilaṁ svena pūrayāmāsa tejasā

उस सम्पूर्ण शून्य विश्व को देखकर परमेश्वरी ने उस समस्त शून्य को अपने तेज से भर दिया।

श्लोक 19 (padma.6.227.19)

सा लक्ष्मीर्धरणी चैव नीलादेवीति विश्रुता । आधारभूता जगतः पृथिवीरूपमाश्रिता ।

sā lakṣmīrdharaṇī caiva nīlādevīti viśrutā ādhārabhūtā jagataḥ pṛthivīrūpamāśritā

वह लक्ष्मी ही धरणी है, नीला देवी के नाम से विख्यात है; जगत् की आधारभूता, पृथ्वी-रूप में आश्रित।

श्लोक 20 (padma.6.227.20)

तोयादिरसरूपेण सैव नीलावपुर्भवेत् । लक्ष्मीरूपत्वमापन्ना धनवाग्रूपिणी हि सा ।

toyādirasarūpeṇa saiva nīlāvapurbhavet lakṣmīrūpatvamāpaṁnā dhanavāgrūpiṇī hi sā

जल आदि रस-रूप में वह स्वयं नीला की देह बनती है; लक्ष्मी-रूप प्राप्त करके वह प्रधान धन-स्वरूपा है।

श्लोक 21 (padma.6.227.21)

एवं देवीस्वरूपा सा जगतः श्रीः श्रीताहरिम् । समस्तविद्याभेदा स्युर्लक्ष्मीरूपा वरानने ।

evaṁ devīsvarūpā sā jagataḥ śrīḥ śrītāharim samastavidyābhedā syurlakṣmīrūpā varānane

इस प्रकार देवीस्वरूपा वह जगत् की श्री, हरि की शरणागता है। समस्त विद्याभेद, हे वरानने, लक्ष्मी के ही रूप हैं।

श्लोक 22 (padma.6.227.22)

श्रीरूपमखिलं सर्वं तस्या हि वपुरुच्यते । सौंदर्यं शीलवृत्तं च सौभाग्यं स्त्रीषु संस्थितम् । तस्या रूपं च गिरिजे सर्वासां मूर्ध्नि योषिताम् ।

śrīrūpamakhilaṁ sarvaṁ tasyā hi vapurucyate sauṁdaryaṁ śīlavṛttaṁ ca saubhāgyaṁ strīṣu saṁsthitam tasyā rūpaṁ ca girije sarvāsāṁ mūrdhni yoṣitām

सभी श्री-रूप उन्हीं का शरीर कहा जाता है। स्त्रियों में स्थित सौंदर्य, शील-आचरण और सौभाग्य, हे गिरिजे, उन्हीं का रूप है, सभी नारियों में शिखर पर।

श्लोक 23 (padma.6.227.23)

यस्याः कटाक्षाय तमोग्रदृष्ट्या ब्रह्माशिवस्स्वर्गपतिर्महेंद्रः । चंद्रश्च सूर्यो धनदोपमोग्निः प्रभूतमैश्वर्यमवाप्नुवंति ।

yasyāḥ kaṭākṣāya tamogradṛṣṭyā brahmāśivassvargapatirmaheṁdraḥ caṁdraśca sūryo dhanadopamogniḥ prabhūtamaiśvaryamavāpnuvaṁti

जिनकी कटाक्ष-दृष्टि से, चाहे वह तमोग्र दृष्टि ही क्यों न हो, ब्रह्मा, शिव, स्वर्गपति महेंद्र, चंद्र, सूर्य, कुबेरतुल्य अग्नि — प्रभूत ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं।

श्लोक 24 (padma.6.227.24)

लक्ष्मीः श्रीः कमला विद्या माता विष्णुप्रिया सती । पद्मालया पद्महस्ता पद्माक्षी लोकसुंदरी ।

lakṣmīḥ śrīḥ kamalā vidyā mātā viṣṇupriyā satī padmālayā padmahastā padmākṣī lokasuṁdarī

लक्ष्मी, श्री, कमला, विद्या, माता, विष्णुप्रिया सती, पद्मालया, पद्महस्ता, पद्माक्षी, लोकसुंदरी,

श्लोक 25 (padma.6.227.25)

भूतानामीश्वरी नित्या सह्या सर्वगता शुभा । विष्णुपत्नी महादेवी क्षीरोदतनया रमा ।

bhūtānāmīśvarī nityā sahyā sarvagatā śubhā viṣṇupatnī mahādevī kṣīrodatanayā ramā

भूतों की नित्य ईश्वरी, सह्या, सर्वगता, शुभा, विष्णुपत्नी महादेवी, क्षीरोदतनया रमा,

श्लोक 26 (padma.6.227.26)

अनंता लोकमाता भूर्नीला सर्वसुखप्रदा । रुक्मिणी च तथा सीता सर्ववेदवती शुभा ।

anaṁtā lokamātā bhūrnīlā sarvasukhapradā rukmiṇī ca tathā sītā sarvavedavatī śubhā

अनंता, लोकमाता भू, नीला, सर्वसुखप्रदा, तथा रुक्मिणी, सीता, सर्ववेदवती शुभा,

श्लोक 27 (padma.6.227.27)

सती सरस्वती गौरी शांतिः स्वाहा स्वधा रतिः । नारायणी वरारोहा विष्णोर्नित्यानपायिनी ।

satī sarasvatī gaurī śāṁtiḥ svāhā svadhā ratiḥ nārāyaṇī varārohā viṣṇornityānapāyinī

सती, सरस्वती, गौरी, शांति, स्वाहा, स्वधा, रति, नारायणी, वरारोहा — विष्णु से नित्य अविनाशिनी।

श्लोक 28 (padma.6.227.28)

एतानि पुण्यनामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् । स महाश्रियमाप्नोति धनधान्यमकल्मषम् ।

etāni puṁyanāmāni prātarutthāya yaḥ paṭhet sa mahāśriyamāpnoti dhanadhāṁyamakalmaṣam

जो प्रातः उठकर इन पुण्य नामों का पाठ करता है, वह महान श्री, निष्कलंक धन-धान्य प्राप्त करता है।

श्लोक 29 (padma.6.227.29)

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतः स्रजाम् । चंद्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं विष्णोरनपगामिनीम् ।

hiraṁyavarṇāṁ hariṇīṁ suvarṇarajataḥ srajām caṁdrāṁ hiraṁmayīṁ lakṣmīṁ viṣṇoranapagāminīm

[वैदिक मंत्र] 'सुवर्णवर्णा, हरिणी, स्वर्ण-रजत की माला वाली, चंद्रवत्, हिरण्मयी लक्ष्मी, विष्णु से कभी अलग न होने वाली —'

श्लोक 30 (padma.6.227.30)

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।

gaṁdhadvārāṁ durādharṣāṁ nityapuṣṭāṁ karīṣiṇīm īśvarīṁ sarvabhūtānāṁ tāmihopahvaye śriyam

'— सुगंध की द्वार, दुर्धर्ष, नित्यपुष्टा, गोधन से युक्त, सब भूतों की ईश्वरी — उस श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।'

श्लोक 31 (padma.6.227.31)

एवं ऋक्संहितायां तु स्तूयमाना महेश्वरी । सर्वैश्वर्यसुखं प्रादाच्छिवादीनां दिवौकसाम् ।

evaṁ ṛksaṁhitāyāṁ tu stūyamānā maheśvarī sarvaiśvaryasukhaṁ prādācchivādīnāṁ divaukasām

इस प्रकार ऋक्संहिता में स्तुत होकर महेश्वरी ने शिव आदि देवताओं को सर्वैश्वर्य का सुख प्रदान किया।

श्लोक 32 (padma.6.227.32)

अस्येशाना हि जगतो विष्णुपत्नी सनातनी । यदपाङ्गाश्रितं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् ।

asyeśānā hi jagato viṣṇupatnī sanātanī yadapāṁgāśritaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṁgamam

वे ही इस जगत् की सनातन ईश्वरी, विष्णुपत्नी हैं, जिनकी कटाक्ष-दृष्टि से चराचर जगत् आश्रित है।

श्लोक 33 (padma.6.227.33)

यस्य वक्षसि सा देवी प्रभाग्नाविव तिष्ठति । स वै सर्वेश्वरः साक्षादक्षरः पुरुषोऽव्ययः ।

yasya vakṣasi sā devī prabhāgnāviva tiṣṭhati sa vai sarveśvaraḥ sākṣādakṣaraḥ puruṣo'vyayaḥ

जिनके वक्षस्थल पर वह देवी अग्नि में प्रभा के समान स्थित रहती हैं — वे ही साक्षात् सर्वेश्वर, अक्षर, अव्यय पुरुष हैं।

श्लोक 34 (padma.6.227.34)

स वै नारायणः श्रीमान्वात्सल्यगुणसागरः । स्वामी सुशीलः सुभगः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।

sa vai nārāyaṇaḥ śrīmāṁvātsalyaguṇasāgaraḥ svāmī suśīlaḥ subhagaḥ sarvajṁaḥ sarvaśaktimān

वे ही श्रीमान नारायण हैं, वात्सल्यगुण के सागर; स्वामी, सुशील, सुभग, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान,

श्लोक 35 (padma.6.227.35)

नित्यं संपूर्णकामश्च नैसर्गिकसुहृत्सखा । कृपापीयूषजलधिः शरणं सर्वदेहिनाम् ।

nityaṁ saṁpūrṇakāmaśca naisargikasuhṛtsakhā kṛpāpīyūṣajaladhiḥ śaraṇaṁ sarvadehinām

सदा पूर्णकाम, स्वाभाविक सुहृद्-सखा, कृपा के अमृत-सागर, समस्त प्राणियों की शरण।

श्लोक 36 (padma.6.227.36)

स्वर्गापवर्गसुखदो भक्तानां करुणाकरः । श्रीमते विष्णवे तस्मै दास्यं सर्वं करोम्यहम् ।

svargāpavargasukhado bhaktānāṁ karuṇākaraḥ śrīmate viṣṇave tasmai dāsyaṁ sarvaṁ karoṁyaham

स्वर्ग और मोक्ष का सुख देने वाले, भक्तों के लिए करुणा के आकर — उन श्रीमान विष्णु के प्रति मैं सम्पूर्ण दास्य करता हूँ।

श्लोक 37 (padma.6.227.37)

देशकालाद्यवस्था तु सर्वासु कमलापतेः । इति स्वरूपं संसिद्धं सुखं दास्यमवाप्नुयात् ।

deśakālādyavasthā tu sarvāsu kamalāpateḥ iti svarūpaṁ saṁsiddhaṁ sukhaṁ dāsyamavāpnuyāt

देश-काल आदि सभी अवस्थाओं में 'मैं कमलापति का दास हूँ' — यह स्वरूप निश्चित करके सुखपूर्ण दास्य प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (padma.6.227.38)

एवं विदित्वा मंत्रार्थं तद्भक्तिं सम्यगाचरेत् । दासभूतमिदं तस्य जगत्स्थावरजंगमम् ।

evaṁ viditvā maṁtrārthaṁ tadbhaktiṁ saṁyagācaret dāsabhūtamidaṁ tasya jagatsthāvarajaṁgamam

इस प्रकार मंत्रार्थ जानकर उनकी भक्ति भलीभाँति करनी चाहिए। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उन्हीं का दास है।

श्लोक 39 (padma.6.227.39)

श्रीमन्नारायणः स्वामी जगतां प्रभुरीश्वरः । माता पिता सुतो बंधुर्निवासः शरणं गतिः ।

śrīmaṁnārāyaṇaḥ svāmī jagatāṁ prabhurīśvaraḥ mātā pitā suto baṁdhurnivāsaḥ śaraṇaṁ gatiḥ

श्रीमन्नारायण ही स्वामी, जगतों के प्रभु ईश्वर हैं; वे माता, पिता, पुत्र, बंधु, निवास, शरण और गति हैं।

श्लोक 40 (padma.6.227.40)

कल्याणगुणवान्श्रीशः सर्वकामफलप्रदः । योऽसौ निर्गुण इत्युक्तः शास्त्रेषु जगदीश्वरः ।

kalyāṇaguṇavāṁśrīśaḥ sarvakāmaphalapradaḥ yo'sau nirguṇa ityuktaḥ śāstreṣu jagadīśvaraḥ

कल्याणगुणवान, श्रीश, सर्वकामफलप्रद — जो शास्त्रों में 'निर्गुण' कहे गए जगदीश्वर हैं—

श्लोक 41 (padma.6.227.41)

प्राकृतैर्हेयसंयुक्तैर्गुणैर्हीनत्वमुच्यते । यत्र मिथ्या प्रपञ्चत्वं वाक्यैर्वेदांतगोचरैः ।

prākṛtairheyasaṁyuktairguṇairhīnatvamucyate yatra mithyā prapaṁcatvaṁ vākyairvedāṁtagocaraiḥ

— यह 'निर्गुणत्व' केवल हेय प्राकृत गुणों से रहितता का सूचक है। जहाँ वेदांत के वाक्यों से इस दृश्यमान जगत् को मिथ्या कहा जाता है —

श्लोक 42 (padma.6.227.42)

दृश्यमानमिदं सर्वमनित्यमिति चोच्यते । अत्रापि प्राकृतं रूपमण्डस्यैव विनाशनम् ।

dṛśyamānamidaṁ sarvamanityamiti cocyate atrāpi prākṛtaṁ rūpamaṁḍasyaiva vināśanam

— यह सब दृश्यमान अनित्य कहा जाता है — यहाँ भी अंड के केवल प्राकृत रूप का ही विनाश होता है।

श्लोक 43 (padma.6.227.43)

प्राकृतानां हि रूपाणामनित्यत्वं तथोच्यते । इममर्थं महादेवि प्रकृतेरुद्भवं हरेः ।

prākṛtānāṁ hi rūpāṇāmanityatvaṁ tathocyate imamarthaṁ mahādevi prakṛterudbhavaṁ hareḥ

प्राकृत रूपों की ही अनित्यता कही गई है। यह अर्थ, हे महादेवी — हरि की प्रकृति से उद्भव को —

श्लोक 44 (padma.6.227.44)

क्रीडार्थं देवदेवस्य विष्णोर्लीलाधिकारिणः । लोकैश्चतुर्भिर्दशभिः सागरैर्द्वीपसंयुतैः ।

krīḍārthaṁ devadevasya viṣṇorlīlādhikāriṇaḥ lokaiścaturbhirdaśabhiḥ sāgarairdvīpasaṁyutaiḥ

देवदेव, लीलाधिकारी विष्णु की क्रीड़ा हेतु — चौदह लोकों, द्वीपयुक्त सागरों से युक्त,

श्लोक 45 (padma.6.227.45)

भूतैश्चतुर्विधैश्चापि भूधरैश्च महोच्छ्रयैः । परिपूर्णमिदं रम्यमंडं प्रकृतिसंभवम् ।

bhūtaiścaturvidhaiścāpi bhūdharaiśca mahocchrayaiḥ paripūrṇamidaṁ raṁyamaṁḍaṁ prakṛtisaṁbhavam

चार प्रकार के प्राणियों, महान पर्वतों से युक्त — यह रमणीय, परिपूर्ण अंड, प्रकृति से उत्पन्न,

श्लोक 46 (padma.6.227.46)

दशोत्तरगुणोपेतं सप्तावरणसंवृतम् । कलाकाष्ठादिरूपेण यः कालं परिवर्तते ।

daśottaraguṇopetaṁ saptāvaraṇasaṁvṛtam kalākāṣṭhādirūpeṇa yaḥ kālaṁ parivartate

दस-दस गुणा परतों से युक्त, सात आवरणों से आवृत, जिसमें काल कला-काष्ठा आदि रूप में परिवर्तित होता है,

श्लोक 47 (padma.6.227.47)

कालेनैव जगत्सर्गस्थितिसंहरणं भवेत् । चतुर्युगसहस्रं वै ब्रह्मणो दिवसो भवेत् ।

kālenaiva jagatsargasthitisaṁharaṇaṁ bhavet caturyugasahasraṁ vai brahmaṇo divaso bhavet

काल से ही जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहार होते हैं। चार युगों के सहस्र चक्र ब्रह्मा का एक दिन होता है।

श्लोक 48 (padma.6.227.48)

तावंति रात्रिवर्षाणि ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । क्षये तु ब्रह्मणः प्राप्ते सर्वसंहारको भवेत् ।

tāvaṁti rātrivarṣāṇi brahmaṇo'vyaktajaṁmanaḥ kṣaye tu brahmaṇaḥ prāpte sarvasaṁhārako bhavet

उतने ही रात्रि-वर्ष अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा के होते हैं। ब्रह्मा का क्षय आने पर सर्वसंहार होता है।

श्लोक 49 (padma.6.227.49)

अंडमंडगता लोका दह्यंते कालवह्निना । सर्वात्मानस्तथा विष्णोः प्रकृतौ विनिवेशिताः ।

aṁḍamaṁḍagatā lokā dahyaṁte kālavahninā sarvātmānastathā viṣṇoḥ prakṛtau viniveśitāḥ

अंड और उसके भीतर के लोक काल की अग्नि से जल जाते हैं; और सभी आत्माएँ विष्णु की प्रकृति में पुनः स्थापित हो जाती हैं।

श्लोक 50 (padma.6.227.50)

अंडावरणभूतानि प्रकृतौ लयमाप्नुयुः । सा सर्वजगदाधारा प्रकृतिर्हरिसंश्रिता ।

aṁḍāvaraṇabhūtāni prakṛtau layamāpnuyuḥ sā sarvajagadādhārā prakṛtirharisaṁśritā

अंड के आवरण उसी प्रकृति में लय को प्राप्त होते हैं — वह सम्पूर्ण जगत् की आधारभूत प्रकृति हरि के आश्रित है।

श्लोक 51 (padma.6.227.51)

तया जगत्सर्गलयौ करोति भगवान्सदा । क्रीडार्थं देवदेवेन सृष्टा माया जगन्मयी ।

tayā jagatsargalayau karoti bhagavāṁsadā krīḍārthaṁ devadevena sṛṣṭā māyā jagaṁmayī

उसी से भगवान सदा जगत् की सृष्टि और लय करते हैं। क्रीड़ा हेतु देवदेव ने जगन्मयी माया की रचना की —

श्लोक 52 (padma.6.227.52)

अविद्या प्रकृतिर्माया गुणत्रयमयी सदा । सर्गस्थितिलयानां सा हेतुभूता सनातनी ।

avidyā prakṛtirmāyā guṇatrayamayī sadā sargasthitilayānāṁ sā hetubhūtā sanātanī

अविद्या, प्रकृति, माया — सदा त्रिगुणमयी; वह सनातनी सृष्टि-स्थिति-लय का हेतु है।

श्लोक 53 (padma.6.227.53)

योगनिद्रा महामाया प्रकृतिस्त्रिगुणान्विता । अव्यक्ता च प्रधानं च विष्णोर्लीलाविकारिणः ।

yoganidrā mahāmāyā prakṛtistriguṇāṁvitā avyaktā ca pradhānaṁ ca viṣṇorlīlāvikāriṇaḥ

योगनिद्रा, महामाया, त्रिगुणान्विता प्रकृति, अव्यक्त और प्रधान — ये लीलाविकारी विष्णु की हैं।

श्लोक 54 (padma.6.227.54)

जगत्सर्गलयौ स्यातां प्रकृतेरेव सर्वदा । असंख्यप्रकृतेः स्थानं निबिडध्वान्तमव्ययम् ।

jagatsargalayau syātāṁ prakṛtereva sarvadā asaṁkhyaprakṛteḥ sthānaṁ nibiḍadhvāṁtamavyayam

जगत् की सृष्टि और लय सदा प्रकृति के ही होते हैं। असंख्य प्रकृति का स्थान सघन, अव्यय अंधकार है।

श्लोक 55 (padma.6.227.55)

ऊर्ध्वं तु सीम्नि विरजा निस्सीमाधस्सनातनी । तयादृतं जगत्सर्वं स्थूलसूक्ष्माद्यवस्थया ।

ūrdhvaṁ tu sīṁni virajā nissīmādhassanātanī tayādṛtaṁ jagatsarvaṁ sthūlasūkṣmādyavasthayā

ऊपर उसकी सीमा पर विरजा नदी है; नीचे असीम सनातन अंधकार है। उसी से सम्पूर्ण जगत् स्थूल-सूक्ष्म आदि अवस्था से घिरा है।

श्लोक 56 (padma.6.227.56)

विकाससंकोचावस्थे तस्यां सर्गलयौ स्मृतौ । एवं सर्वाणि भूतानि प्रकृत्यंतर्गतानि वै ।

vikāsasaṁkocāvasthe tasyāṁ sargalayau smṛtau evaṁ sarvāṇi bhūtāni prakṛtyaṁtargatāni vai

विकास और संकोच उसकी दो अवस्थाएँ हैं, जो सृष्टि और लय कही गई हैं। इस प्रकार सभी भूत प्रकृति के भीतर स्थित हैं।

श्लोक 57 (padma.6.227.57)

ततः शून्यमिदं सर्वं प्रकृत्यंतर्गतं महत् । एवं प्रकृतिरूपाया विभूते रूपमुत्तमम् ।

tataḥ śūṁyamidaṁ sarvaṁ prakṛtyaṁtargataṁ mahat evaṁ prakṛtirūpāyā vibhūte rūpamuttamam

उससे परे यह सम्पूर्ण महान, प्रकृति के भीतर का, शून्य है। इस प्रकार प्रकृति-रूपा विभूति का उत्तम रूप कहा गया।

श्लोक 58 (padma.6.227.58)

त्रिपाद्विभूतिरूपं तु शृणु भूधरनंदिनि । प्रधान परमव्योम्नोरंतरे विरजा नदी ।

tripādvibhūtirūpaṁ tu śṛṇu bhūdharanaṁdini pradhāna paramavyoṁnoraṁtare virajā nadī

अब, हे भूधरनंदिनी, त्रिपाद्-विभूति का रूप सुनिए। प्रधान और परम व्योम के मध्य विरजा नदी बहती है,

श्लोक 59 (padma.6.227.59)

वेदांगस्वेदजनिततोयैः प्रस्राविता शुभा । तस्याः पारे परे व्योम्नि त्रिपाद्भूतिस्सनातनी ।

vedāṁgasvedajanitatoyaiḥ prasrāvitā śubhā tasyāḥ pāre pare vyoṁni tripādbhūtissanātanī

शुभ, वेद के अंगों के स्वेद से उत्पन्न जल से प्रवाहित। उसके पार, परम व्योम में, वह सनातन त्रिपाद्-विभूति है —

श्लोक 60 (padma.6.227.60)

अमृतं शाश्वतं नित्यमनन्तं परमं पदम् । शुद्धं सत्वमयं दिव्यमक्षरं ब्रह्मणः पदम् ।

amṛtaṁ śāśvataṁ nityamanaṁtaṁ paramaṁ padam śuddhaṁ satvamayaṁ divyamakṣaraṁ brahmaṇaḥ padam

अमृत, शाश्वत, नित्य, अनंत, परम पद; शुद्ध, सत्त्वमय, दिव्य, अक्षर, ब्रह्म का पद;

श्लोक 61 (padma.6.227.61)

अनेककोटिसूर्याग्नि तुल्य वर्चसमव्ययम् । सर्ववेदमयं शुद्धं सर्गप्रलयवर्जितम् ।

anekakoṭisūryāgni tulya varcasamavyayam sarvavedamayaṁ śuddhaṁ sargapralayavarjitam

अनेक करोड़ सूर्य-अग्नि के समान तेजयुक्त, अव्यय, सर्ववेदमय, शुद्ध, सर्ग-प्रलय से रहित;

श्लोक 62 (padma.6.227.62)

असंख्यमजरं नित्यं जाग्रत्स्वप्नादिवर्जितम् । हिरण्मयं मोक्षपदं ब्रह्मानंदसुखावहम् ।

asaṁkhyamajaraṁ nityaṁ jāgratsvapnādivarjitam hiraṁmayaṁ mokṣapadaṁ brahmānaṁdasukhāvaham

असंख्य, अजर, नित्य, जाग्रत-स्वप्न आदि से रहित; हिरण्मय, मोक्षपद, ब्रह्मानंद-सुखदायक;

श्लोक 63 (padma.6.227.63)

समानाधिक्यरहितमाद्यंतरहितं शुभम् । तेजसात्यद्भुतं रम्यं नित्यमानंदसागरम् ।

samānādhikyarahitamādyaṁtarahitaṁ śubham tejasātyadbhutaṁ raṁyaṁ nityamānaṁdasāgaram

समता-अधिकता से रहित, आदि-अंत रहित, शुभ, तेज से अत्यंत अद्भुत, रमणीय, नित्य आनंद का सागर।

श्लोक 64 (padma.6.227.64)

एवमादिगुणोपेतं तद्विष्णोः परमं पदम् । न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः ।

evamādiguṇopetaṁ tadviṣṇoḥ paramaṁ padam na tadbhāsayate sūryo na śaśāṁko na pāvakaḥ

ऐसे गुणों से युक्त वह विष्णु का परम पद है। उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चंद्रमा, न अग्नि।

श्लोक 65 (padma.6.227.65)

यद्गत्वा न निवर्तंते तद्धाम परमं हरेः । तद्विष्णोः परमं धाम शाश्वतं नित्यमच्युतम् । न हि वर्णयितुं शक्यं कल्पकोटिशतैरपि ।

yadgatvā na nivartaṁte taddhāma paramaṁ hareḥ tadviṣṇoḥ paramaṁ dhāma śāśvataṁ nityamacyutam na hi varṇayituṁ śakyaṁ kalpakoṭiśatairapi

जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं, वह हरि का परम धाम है। वह विष्णु का परम धाम, शाश्वत, नित्य, अच्युत, सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी वर्णन नहीं किया जा सकता।

श्लोक 66 (padma.6.227.66)

हरेः पदं वर्णयितुं न शक्यं मया च धात्रा च मुनींद्रसङ्घैः । यस्मिन्पदे ह्यच्युत ईश्वरो यः सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ।

hareḥ padaṁ varṇayituṁ na śakyaṁ mayā ca dhātrā ca munīṁdrasaṁghaiḥ yasmiṁpade hyacyuta īśvaro yaḥ so aṁga veda yadi vā na veda

हरि का पद वर्णन नहीं किया जा सकता, न मुझसे, न ब्रह्मा से, न मुनींद्रों के समूह से। [वेद कहता है] 'जिस पद में अच्युत ईश्वर हैं — उसे कोई जाने या न जाने, हे मित्र।'

श्लोक 67 (padma.6.227.67)

यदक्षरं वेदगुह्यं यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तन्नो वेद किमृचा करिष्यति ये तद्विदुस्त इमे समासते ।

yadakṣaraṁ vedaguhyaṁ yasmiṁdevā adhi viśve niṣeduḥ yastaṁno veda kimṛcā kariṣyati ye tadvidusta ime samāsate

'वह अक्षर, वेदों का रहस्य, जिस पर सभी देवता विराजमान हैं — जो इसे नहीं जानता, उसके लिए ऋचाएँ क्या करेंगी? जो इसे जानते हैं, वे ही सच्चे सुख में स्थित हैं।'

श्लोक 68 (padma.6.227.68)

तद्विष्णोः परमं धाम सदा पश्यंति सूरयः । अक्षरं शाश्वतं दिव्यं देवि चक्षुरिवाततम् ।

tadviṣṇoḥ paramaṁ dhāma sadā paśyaṁti sūrayaḥ akṣaraṁ śāśvataṁ divyaṁ devi cakṣurivātatam

'विष्णु के उस परम धाम को विद्वान सदा देखते हैं, अक्षर, शाश्वत, दिव्य, हे देवी, आकाश में नेत्र के समान फैला हुआ।'

श्लोक 69 (padma.6.227.69)

तत्प्रवेष्टुमशक्यं च ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः । ज्ञानेन शास्त्रमार्गेण वीक्ष्यते योगिपुंगवैः ।

tatpraveṣṭumaśakyaṁ ca brahmarudrādidaivataiḥ jṁānena śāstramārgeṇa vīkṣyate yogipuṁgavaiḥ

उसमें ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता भी प्रवेश नहीं कर सकते; उसे ज्ञान और शास्त्रमार्ग से केवल श्रेष्ठ योगी ही देखते हैं।

श्लोक 70 (padma.6.227.70)

अहं ब्रह्मा च देवाश्च न जानंति महर्षयः । सर्वोपनिषदामर्थं दृष्ट्वा वक्ष्यामि सुव्रते ।

ahaṁ brahmā ca devāśca na jānaṁti maharṣayaḥ sarvopaniṣadāmarthaṁ dṛṣṭvā vakṣyāmi suvrate

मैं, ब्रह्मा, देवता, और महर्षि भी इसे पूर्णतः नहीं जानते। सभी उपनिषदों के अर्थ को देखकर, हे सुव्रते, मैं आपको बताता हूँ।

श्लोक 71 (padma.6.227.71)

विष्णोः पदे हि परमे पदे तत्सशुभाह्वयेः । यत्र गावो भूरिशृंगा आसते सुसुखाः प्रजाः ।

viṣṇoḥ pade hi parame pade tatsaśubhāhvayeḥ yatra gāvo bhūriśṛṁgā āsate susukhāḥ prajāḥ

[वैदिक मंत्र] 'विष्णु के उस परम पद में, उस शुभ नाम वाले पद में, जहाँ बहुसींगों वाली गौएँ रहती हैं, और प्रजाएँ सुखी रहती हैं—'

श्लोक 72 (padma.6.227.72)

अत्राह तत्परं धाम गोपवेषस्य शार्ङ्गिणः । तद्भाति परमं धाम गोभिर्गोपैस्सुखाह्वयैः ।

atrāha tatparaṁ dhāma gopaveṣasya śārṁgiṇaḥ tadbhāti paramaṁ dhāma gobhirgopaissukhāhvayaiḥ

यहाँ कहा गया कि वह परम धाम शार्ङ्गधारी गोपवेशधारी का है; वह परम धाम गौओं और गोपों से, सुखद संग से सुशोभित है।

श्लोक 73 (padma.6.227.73)

आदित्यवर्णं तमसः परस्ताज्ज्योतिरच्युतम् । आधारो ब्रह्मणो लोकश्शुद्धसत्त्वस्सनातनः ।

ādityavarṇaṁ tamasaḥ parastājjyotiracyutam ādhāro brahmaṇo lokaśśuddhasattvassanātanaḥ

[वैदिक मंत्र] 'आदित्यवर्ण, तम से परे, अच्युत ज्योति' — ब्रह्मलोक का आधार, शुद्ध सत्त्वमय, सनातन।

श्लोक 74 (padma.6.227.74)

सामान्या विभिते भूमिन्तेऽस्मिन्शाश्वते पदे । तस्थतुर्जागरूकेस्मिन्युवानौ श्रीसनातनौ ।

sāmāṁyā vibhite bhūmiṁte'smiṁśāśvate pade tasthaturjāgarūkesmiṁyuvānau śrīsanātanau

उस साझा, विशिष्ट भूमि पर, उस शाश्वत पद में, सदा जागरूक, नित्ययुवा युगल श्री-विष्णु स्थित हैं —

श्लोक 75 (padma.6.227.75)

यतः स्वसारौ युवती भूनीले विष्णुवल्लभे । अत्र पूर्वे ये च साध्या विश्वेदेवास्सनातनाः ।

yataḥ svasārau yuvatī bhūnīle viṣṇuvallabhe atra pūrve ye ca sādhyā viśvedevāssanātanāḥ

— अपनी दो सहोदरा युवती भू और नीला, विष्णु की प्रिय, सहित। यहाँ पूर्वकालीन साध्य और सनातन विश्वेदेव भी—

श्लोक 76 (padma.6.227.76)

ते ह नाकं महिमानस्सचन्ते शुभदर्शनाः । तत्र विज्ञानिनो विप्रा जागृवांसस्समिन्धते ।

te ha nākaṁ mahimānassacaṁte śubhadarśanāḥ tatra vijṁānino viprā jāgṛvāṁsassamiṁdhate

— वे शुभदर्शन महिमावान, उस स्वर्ग का भोग करते हैं। वहाँ विज्ञानी, जागरूक ब्राह्मण उस ज्योति को प्रज्वलित करते हैं।

श्लोक 77 (padma.6.227.77)

तत्पदं ज्ञानिनो विप्रा यांति संवासमिच्छवः । तद्विष्णोः परमं धाम मोक्ष इत्यभिधीयते ।

tatpadaṁ jṁānino viprā yāṁti saṁvāsamicchavaḥ tadviṣṇoḥ paramaṁ dhāma mokṣa ityabhidhīyate

ज्ञानी ब्राह्मण, संवास की इच्छा से, उस पद को प्राप्त होते हैं। विष्णु का वह परम धाम मोक्ष कहलाता है।

श्लोक 78 (padma.6.227.78)

तस्मिन्बंधविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति सुखं पदम् । तत्प्राप्य न निवर्तंते तस्मान्मोक्ष उदाहृतः ।

tasmiṁbaṁdhavinirmuktāḥ prāpnuvaṁti sukhaṁ padam tatprāpya na nivartaṁte tasmāṁmokṣa udāhṛtaḥ

बंधन से मुक्त होकर वहाँ सुखमय पद प्राप्त होता है। उसे प्राप्त करके लौटना नहीं होता, इसलिए उसे मोक्ष कहा गया है।

श्लोक 79 (padma.6.227.79)

मोक्षं परं पदं दिव्यममृतं विष्णुमंदिरम् । अक्षरं परमं धाम वैकुण्ठं शाश्वतं पदम् ।

mokṣaṁ paraṁ padaṁ divyamamṛtaṁ viṣṇumaṁdiram akṣaraṁ paramaṁ dhāma vaikuṁṭhaṁ śāśvataṁ padam

मोक्ष, परम पद, दिव्य, अमृत, विष्णु का मंदिर; अक्षर, परम धाम, वैकुण्ठ, शाश्वत पद;

श्लोक 80 (padma.6.227.80)

नित्यञ्च परमं व्योम सर्वोत्कृष्टं सनातनम् । पर्य्यायवाचकान्यस्य परधाम्नोच्युतस्य च । तस्य त्रिपाद्विभूतेस्तु रूपं वक्ष्यामि विस्तरात् ।

nityaṁca paramaṁ vyoma sarvotkṛṣṭaṁ sanātanam paryyāyavācakāṁyasya paradhāṁnocyutasya ca tasya tripādvibhūtestu rūpaṁ vakṣyāmi vistarāt

नित्य, परम व्योम, सर्वोत्कृष्ट, सनातन — ये अच्युत के परम धाम के पर्यायवाची शब्द हैं। उनकी उस त्रिपाद्-विभूति के रूप का अब मैं विस्तार से वर्णन करूँगा।

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