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उत्तर खण्ड · अध्याय 229

विष्णु-व्यूहभेद वर्णन

अध्याय 228अध्याय-सूचीअध्याय 230

श्लोक 1 (padma.6.229.1)

पार्वत्युवाच- विस्तरेण ममाख्याहि देवसर्गमनुत्तमम् । ब्रह्मादि त्रिदिवश्रेष्ठाः कथं जाताः सनातनाः । ईश्वरस्यावतारांश्च विस्तरेण वदस्व मे ।

pārvatyuvāca vistareṇa mamākhyāhi devasargamanuttamam brahmādi tridivaśreṣṭhāḥ kathaṁ jātāḥ sanātanāḥ īśvarasyāvatārāṁśca vistareṇa vadasva me

पार्वती ने कहा — मुझे विस्तार से देवसर्ग बताइए; ब्रह्मा आदि त्रिलोक के सनातन श्रेष्ठ जन कैसे उत्पन्न हुए? ईश्वर के अवतारों को भी विस्तार से बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.229.2)

रुद्र उवाच- आकाशानिलतेजोंबु भुवः सृष्टा यथाक्रमम् । तासां मध्येऽसृजद्ब्रह्मा अगाधजलमर्णवम् ।

rudra uvāca ākāśānilatejoṁbu bhuvaḥ sṛṣṭā yathākramam tāsāṁ madhye'sṛjadbrahmā agādhajalamarṇavam

रुद्र ने कहा — आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी क्रमशः सृजित हुए; उनके मध्य ब्रह्मा ने अगाध जल का सागर रचा।

श्लोक 3 (padma.6.229.3)

अस्मिन्नेकार्णवीभूते जलमायावटच्छदे । आदाय सर्व्वभूतानि योगनिद्रां ययौ हरिः ।

asmiṁnekārṇavībhūte jalamāyāvaṭacchade ādāya sarvvabhūtāni yoganidrāṁ yayau hariḥ

इस एकार्णव में, माया के आवरण से ढके जल में, हरि सभी भूतों को समेटकर योगनिद्रा में चले गए।

श्लोक 4 (padma.6.229.4)

स जगत्स्रष्टुकामस्तु योगनिद्रामुपेयिवान् । तया रेमे चिरं कालं मायया मधुसूदनः ।

sa jagatsraṣṭukāmastu yoganidrāmupeyivān tayā reme ciraṁ kālaṁ māyayā madhusūdanaḥ

जगत् की सृष्टि की इच्छा से वे योगनिद्रा में गए; उस माया से मधुसूदन दीर्घकाल तक रमण करते रहे।

श्लोक 5 (padma.6.229.5)

तस्यां तु जनयामास कालात्मानमनुत्तमम् । कलाकाष्ठादि भूता ये पक्षमासादिरूपिणः ।

tasyāṁ tu janayāmāsa kālātmānamanuttamam kalākāṣṭhādi bhūtā ye pakṣamāsādirūpiṇaḥ

उस निद्रा में उन्होंने काल के परम तत्त्व को उत्पन्न किया — कला-काष्ठा आदि, पक्ष-मास आदि रूपों में।

श्लोक 6 (padma.6.229.6)

तस्मिन्काले हरेर्न्नाभिपंकजं मुकुलाकृति । विकसत्सर्वजगतो बीजभूतं सुवर्चसम् ।

tasmiṁkāle harerṁnābhipaṁkajaṁ mukulākṛti vikasatsarvajagato bījabhūtaṁ suvarcasam

उस काल में हरि के नाभिकमल से, कली के आकार का, सम्पूर्ण जगत् का बीजभूत, तेजस्वी विकसित होता हुआ कमल —

श्लोक 7 (padma.6.229.7)

उदस्थादुदभूत्तत्र ब्रह्मा च सुमहामतिः । स जगत्स्रष्टुकामस्तु रजोगुणविचोदितः । तुष्टाव योगनिद्रायां शयानं परमेश्वरम् ।

udasthādudabhūttatra brahmā ca sumahāmatiḥ sa jagatsraṣṭukāmastu rajoguṇavicoditaḥ tuṣṭāva yoganidrāyāṁ śayānaṁ parameśvaram

— वहाँ उठा, और उससे महाबुद्धिमान ब्रह्मा उत्पन्न हुए। जगत् की सृष्टि की इच्छा से, रजोगुण से प्रेरित होकर, उन्होंने योगनिद्रा में शयन करते परमेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 8 (padma.6.229.8)

ब्रह्मोवाच- नमोस्तु विष्णवे तुभ्यं सर्गस्थित्यंतहेतवे । जगद्भूषणभूषाय श्रीमते विश्वरूपिणे ।

brahmovāca namostu viṣṇave tubhyaṁ sargasthityaṁtahetave jagadbhūṣaṇabhūṣāya śrīmate viśvarūpiṇe

ब्रह्मा ने कहा — सर्ग-स्थिति-अंत के हेतु विष्णु, आपको नमस्कार; जगत् के भूषणों के भूषण, श्रीमान, विश्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 9 (padma.6.229.9)

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविंदाय नमोनमः ।

namo brahmaṁyadevāya gobrāhmaṇahitāya ca jagaddhitāya kṛṣṇāya goviṁdāya namonamaḥ

ब्रह्मण्यदेव, गो-ब्राह्मण के हितकारी को नमस्कार; जगत्हितकारी कृष्ण, गोविंद को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 10 (padma.6.229.10)

प्रधानकालरूपाय पुरुषायेश्वराय च । नमः प्रपंचरूपाय निष्प्रपंचस्वरूपिणे ।

pradhānakālarūpāya puruṣāyeśvarāya ca namaḥ prapaṁcarūpāya niṣprapaṁcasvarūpiṇe

प्रधान-काल-रूप, पुरुष, ईश्वर आपको नमस्कार; प्रपंचरूप, निष्प्रपंच-स्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 11 (padma.6.229.11)

नारायणाय विश्वाय विश्वेशाय नमोनमः । श्रीभूलीलाधिपतये ब्रह्मणे परमात्मने ।

nārāyaṇāya viśvāya viśveśāya namonamaḥ śrībhūlīlādhipataye brahmaṇe paramātmane

नारायण, विश्व, विश्वेश आपको बार-बार नमस्कार; श्री-भू की लीला के अधिपति ब्रह्म, परमात्मा को नमस्कार।

श्लोक 12 (padma.6.229.12)

नमोस्तु वासुदेवाय विश्वरूपाय शार्ङ्गिणे । त्रयीनाथाय हरये विश्वनाथस्वरूपिणे ।

namostu vāsudevāya viśvarūpāya śārṁgiṇe trayīnāthāya haraye viśvanāthasvarūpiṇe

वासुदेव, विश्वरूप, शार्ङ्गधारी आपको नमस्कार; त्रयीनाथ हरि, विश्वनाथस्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 13 (padma.6.229.13)

अनंतकल्याणगुणपरिपूर्णाय ते नमः । जगच्च सर्व्वं स्वपिति त्वयि सुप्ते जगन्मये ।

anaṁtakalyāṇaguṇaparipūrṇāya te namaḥ jagacca sarvvaṁ svapiti tvayi supte jagaṁmaye

अनंत कल्याण गुणों से परिपूर्ण आपको नमस्कार। जगन्मय आप जब सोते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् भी सो जाता है।

श्लोक 14 (padma.6.229.14)

वृतं सर्वं जगन्नाथ प्रपंचे सचराचरम् । त्वमेव कारणं कर्त्ता कार्य्यं च त्रिगुणोद्भवम् ।

vṛtaṁ sarvaṁ jagaṁnātha prapaṁce sacarācaram tvameva kāraṇaṁ karttā kāryyaṁ ca triguṇodbhavam

यह सम्पूर्ण चराचर जगत्, हे जगन्नाथ, प्रपंच में आवृत है। आप ही कारण, कर्ता और त्रिगुणोद्भव कार्य हैं।

श्लोक 15 (padma.6.229.15)

स्रष्टा ध्याता विधाता च त्वमेव परमेश्वरः । जागर्षिशुद्धसत्वस्थस्तवनिद्रा कुतःप्रभो । देवत्वयि स्थितालोकाः समाधिष्ठाः सनातनाः ।

sraṣṭā dhyātā vidhātā ca tvameva parameśvaraḥ jāgarṣiśuddhasatvasthastavanidrā kutaḥprabho devatvayi sthitālokāḥ samādhiṣṭhāḥ sanātanāḥ

आप ही स्रष्टा, ध्याता और विधाता, परमेश्वर हैं। जाग्रत, शुद्धसत्त्वस्थ — हे प्रभो, आपकी निद्रा कैसी? आपमें स्थित लोक सनातन, समाधिस्थ हैं।

श्लोक 16 (padma.6.229.16)

शिव उवाच- एवमुक्तो हृषीकेशो ब्रह्मणा परमेश्वरः । उत्तस्थौ शयनात्तस्माद्विमुक्तो योगनिद्रया ।

śiva uvāca evamukto hṛṣīkeśo brahmaṇā parameśvaraḥ uttasthau śayanāttasmādvimukto yoganidrayā

शिव ने कहा — ब्रह्मा के ऐसा कहने पर हृषीकेश परमेश्वर उस शय्या से उठे, योगनिद्रा से मुक्त होकर।

श्लोक 17 (padma.6.229.17)

नियम्य योगनिद्रां तां जगत्स्रष्टुं प्रचक्रमे । अचिंत्यस्तत्क्षणाद्देवो जगतां प्रभुरच्युतः ।

niyaṁya yoganidrāṁ tāṁ jagatsraṣṭuṁ pracakrame aciṁtyastatkṣaṇāddevo jagatāṁ prabhuracyutaḥ

उस योगनिद्रा को नियंत्रित करके उन्होंने जगत् की सृष्टि आरंभ की। वह अचिंत्य देव, जगतों के अच्युत प्रभु, उसी क्षण—

श्लोक 18 (padma.6.229.18)

चिंतयित्वा जगत्सर्वमसृजत्स पुमांस्ततः । लोकान्सर्व्वांस्तदा ह्यप्सु गतमंडं हिरण्मयम् ।

ciṁtayitvā jagatsarvamasṛjatsa pumāṁstataḥ lokāṁsarvvāṁstadā hyapsu gatamaṁḍaṁ hiraṁmayam

— सम्पूर्ण जगत् का चिंतन करके उस पुरुष ने सभी लोकों की रचना की; फिर जल में गया हिरण्मय अंड—

श्लोक 19 (padma.6.229.19)

सप्तद्वीपान्समुद्रांतान्मेदिनी भूधरैर्युतान् । सहैकाण्डकटाहेन नाभिपद्मेऽसृजत्प्रभुः ।

saptadvīpāṁsamudrāṁtāṁmedinī bhūdharairyutān sahaikāṁḍakaṭāhena nābhipadme'sṛjatprabhuḥ

— सप्तद्वीपों और समुद्रों सहित, पर्वतों से युक्त पृथ्वी को, एक अंडकटाह सहित, प्रभु ने अपने नाभिकमल में रचा।

श्लोक 20 (padma.6.229.20)

तदण्डमध्ये चास्थानमीश्वरः कृतवान्हरिः । अथ नारायणंकस्तु दध्यावध्यात्मचेतसा ।

tadaṁḍamadhye cāsthānamīśvaraḥ kṛtavāṁhariḥ atha nārāyaṇaṁkastu dadhyāvadhyātmacetasā

उस अंड के भीतर ईश्वर हरि ने अपना स्थान बनाया। फिर उन्होंने अध्यात्म-चित्त से नारायण का ध्यान किया।

श्लोक 21 (padma.6.229.21)

ध्यानांते तस्य भालात्तु स्वेदबिंदुरजायत । स बिंदुर्बुद्बुदाकारः पृथिव्यामपतत्क्षणात् ।

dhyānāṁte tasya bhālāttu svedabiṁdurajāyata sa biṁdurbudbudākāraḥ pṛthivyāmapatatkṣaṇāt

उस ध्यान के अंत में उनके भाल से स्वेद-बिंदु उत्पन्न हुआ। वह बुद्बुदाकार बिंदु उसी क्षण पृथ्वी पर गिरा।

श्लोक 22 (padma.6.229.22)

तस्मात्तु बुद्बुदात्सोऽहमुत्पन्नोस्मि वरानने । त्र्यक्षस्त्रिशूलहस्तोऽहं जटामुकुटमंडितः ।

tasmāttu budbudātso'hamutpaṁnosmi varānane tryakṣastriśūlahasto'haṁ jaṭāmukuṭamaṁḍitaḥ

उसी बुद्बुद से मैं उत्पन्न हुआ, हे वरानने। तीन नेत्रों वाला, त्रिशूलधारी, जटामुकुट से मंडित —

श्लोक 23 (padma.6.229.23)

किंकरोमीति देवेशमवोचं विनयान्वितः । ततो नारायणो देवो मामित्याह मुदान्वितः ।

kiṁkaromīti deveśamavocaṁ vinayāṁvitaḥ tato nārāyaṇo devo māmityāha mudāṁvitaḥ

— मैंने विनयपूर्वक देवेश से पूछा, 'मैं क्या करूँ?' तब देव नारायण ने प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा —

श्लोक 24 (padma.6.229.24)

कर्त्तासि जगतो रुद्र संहारं भीमदर्शनम् । साक्षात्संकर्षणांशेन संहारार्थे वरानने ।

karttāsi jagato rudra saṁhāraṁ bhīmadarśanam sākṣātsaṁkarṣaṇāṁśena saṁhārārthe varānane

'हे रुद्र, तुम भयंकर जगत्-संहार के कर्ता हो' — मैं साक्षात् संकर्षण के अंश से, संहार हेतु उत्पन्न हुआ, हे वरानने।

श्लोक 25 (padma.6.229.25)

तस्मान्नारायणाद्देवि उत्पन्नोस्मि भयंकरः । नियोज्य मां तु संहारे पुनरेव जनार्दनः ।

tasmāṁnārāyaṇāddevi utpaṁnosmi bhayaṁkaraḥ niyojya māṁ tu saṁhāre punareva janārdanaḥ

इसलिए, हे देवी, मैं भयंकर उस नारायण से उत्पन्न हुआ। मुझे संहार में नियुक्त करके जनार्दन ने पुनः—

श्लोक 26 (padma.6.229.26)

नेत्राभ्यामसृजच्चंद्रसूर्य्यौ ध्वांतापहारिणौ । वायुं दिशश्च श्रोत्राभ्यामिंद्राग्नीमुखतोऽसृजत् ।

netrābhyāmasṛjaccaṁdrasūryyau dhvāṁtāpahāriṇau vāyuṁ diśaśca śrotrābhyāmiṁdrāgnīmukhato'sṛjat

— अपने दोनों नेत्रों से अंधकार-नाशक चंद्र-सूर्य की रचना की; कानों से वायु और दिशाएँ; मुख से इंद्र-अग्नि की।

श्लोक 27 (padma.6.229.27)

नासाभ्यां वरुणं मित्रमसृजत्पंकजेक्षणः । बाहुभ्यामखिलान्देवान्ससाध्यान्समरुद्गणान् ।

nāsābhyāṁ varuṇaṁ mitramasṛjatpaṁkajekṣaṇaḥ bāhubhyāmakhilāṁdevāṁsasādhyāṁsamarudgaṇān

उस कमलनयन ने नासिका से वरुण-मित्र को रचा; भुजाओं से साध्यों और मरुद्गणों सहित सभी देवताओं को।

श्लोक 28 (padma.6.229.28)

समस्तरोमकूपेभ्यो रत्नान्योषधयस्तथा । त्वचि शैलान्समुद्राश्च गवाद्याः पशवस्तथा ।

samastaromakūpebhyo ratnāṁyoṣadhayastathā tvaci śailāṁsamudrāśca gavādyāḥ paśavastathā

समस्त रोमकूपों से रत्न और औषधियाँ; त्वचा से पर्वत और समुद्र; तथा गौ आदि पशु भी।

श्लोक 29 (padma.6.229.29)

मुखतो ब्राह्मणः सृष्टो बाहुभ्यां क्षत्रियस्तथा । ऊर्व्वोर्वैश्यस्ततः पद्भ्यां शूद्रश्चैवमजायत ।

mukhato brāhmaṇaḥ sṛṣṭo bāhubhyāṁ kṣatriyastathā ūrvvorvaiśyastataḥ padbhyāṁ śūdraścaivamajāyata

मुख से ब्राह्मण सृजित हुआ; भुजाओं से क्षत्रिय; ऊरुओं से वैश्य; और पैरों से इस प्रकार शूद्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 30 (padma.6.229.30)

एवं सृष्ट्वा जगत्सर्व्वमचेतनमवस्थितम् । विश्वरूपेण देवेशो यस्यांतरमधिष्ठितः ।

evaṁ sṛṣṭvā jagatsarvvamacetanamavasthitam viśvarūpeṇa deveśo yasyāṁtaramadhiṣṭhitaḥ

इस प्रकार सम्पूर्ण अचेतन जगत् की रचना करके। विश्वरूप देवेश, जिनके भीतर यह सब स्थित है —

श्लोक 31 (padma.6.229.31)

शक्त्या विना हरेस्तस्य नोन्मेषो विद्यते यतः । तस्मात्सर्वजगत्प्राणो विष्णुरेव सनातनः ।

śaktyā vinā harestasya noṁmeṣo vidyate yataḥ tasmātsarvajagatprāṇo viṣṇureva sanātanaḥ

— क्योंकि उस हरि की शक्ति के बिना कोई उन्मेष नहीं होता। इसलिए सनातन विष्णु ही सम्पूर्ण जगत् के प्राण हैं।

श्लोक 32 (padma.6.229.32)

स एवाव्यक्तरूपः सन्परमात्मा व्यवस्थितः । सर्गस्थितिलयं ब्रह्मा स्वयमेव प्रवर्त्तते ।

sa evāvyaktarūpaḥ saṁparamātmā vyavasthitaḥ sargasthitilayaṁ brahmā svayameva pravarttate

वे ही अव्यक्तरूप होकर परमात्मा के रूप में स्थित हैं। ब्रह्मा स्वयं सृष्टि, स्थिति और लय करते हैं।

श्लोक 33 (padma.6.229.33)

षाड्गुण्यपरिपूर्णोऽसौ वासुदेवः सनातनः । त्रिगुणादात्मनोरूपं चतुर्द्धा कुरुते जगत् ।

ṣāḍguṁyaparipūrṇo'sau vāsudevaḥ sanātanaḥ triguṇādātmanorūpaṁ caturddhā kurute jagat

यह षाड्गुण्यपरिपूर्ण सनातन वासुदेव अपने त्रिगुण से जगत् को चतुर्विध करते हैं।

श्लोक 34 (padma.6.229.34)

प्रद्युम्नमूर्त्तिर्भगवान्सर्वैश्वर्य्यसमन्वितः । विधेः प्रजापतीनां च कालस्य च जनस्य च ।

pradyuṁnamūrttirbhagavāṁsarvaiśvaryyasamaṁvitaḥ vidheḥ prajāpatīnāṁ ca kālasya ca janasya ca

प्रद्युम्न-मूर्ति भगवान, सर्वैश्वर्य से युक्त, विधि (ब्रह्मा), प्रजापतियों, काल और जनों के—

श्लोक 35 (padma.6.229.35)

अंतर्य्यामित्वमापन्नो सर्गं सम्यक्करोति हि । सेतिहासांस्ततो वेदान्ददौ तस्मै महात्मने ।

aṁtaryyāmitvamāpaṁno sargaṁ saṁyakkaroti hi setihāsāṁstato vedāṁdadau tasmai mahātmane

— अंतर्यामी बनकर भलीभाँति सृष्टि करते हैं। उन्होंने उस महात्मा (ब्रह्मा) को इतिहास और वेद प्रदान किए।

श्लोक 36 (padma.6.229.36)

प्रद्युम्नस्यांशभागोऽसौ ब्रह्मा लोकपितामहः । जगत्सर्गस्थितिं सर्व्वं प्रकरोत्यंशसंभवः ।

pradyuṁnasyāṁśabhāgo'sau brahmā lokapitāmahaḥ jagatsargasthitiṁ sarvvaṁ prakarotyaṁśasaṁbhavaḥ

लोकपितामह ब्रह्मा प्रद्युम्न के अंशभाग हैं; अंशसंभव होकर वे जगत् की सम्पूर्ण सृष्टि-स्थिति करते हैं।

श्लोक 37 (padma.6.229.37)

अनिरुद्धश्च भगवाञ्छक्तितेजः समन्वितः । मनूनां पार्थिवानां च कालस्य च जनस्य च ।

aniruddhaśca bhagavāṁchaktitejaḥ samaṁvitaḥ manūnāṁ pārthivānāṁ ca kālasya ca janasya ca

और भगवान अनिरुद्ध, शक्ति-तेज से युक्त, मनुओं, राजाओं, काल और जनों की—

श्लोक 38 (padma.6.229.38)

स्थितिं करोति भगवानंतर्य्यामित्वमास्थितः । संकर्षणो महाविष्णुर्विद्याबलसमन्वितः ।

sthitiṁ karoti bhagavānaṁtaryyāmitvamāsthitaḥ saṁkarṣaṇo mahāviṣṇurvidyābalasamaṁvitaḥ

— अंतर्यामी बनकर स्थिति करते हैं। महाविष्णु संकर्षण, विद्या-बल से युक्त—

श्लोक 39 (padma.6.229.39)

कालस्य सर्वभूतानां रुद्रस्य च यमस्य च । अंतर्य्यामित्वमास्थाय जगत्संहरते प्रभुः ।

kālasya sarvabhūtānāṁ rudrasya ca yamasya ca aṁtaryyāmitvamāsthāya jagatsaṁharate prabhuḥ

— काल, सर्वभूत, रुद्र और यम के अंतर्यामी बनकर प्रभु जगत् का संहार करते हैं।

श्लोक 40 (padma.6.229.40)

इत्यंतर्य्याम्यवस्थायामंतर्य्यामित्वमात्मनः । मत्स्यः कूर्म्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः ।

ityaṁtaryyāṁyavasthāyāmaṁtaryyāmitvamātmanaḥ matsyaḥ kūrṁmo varāhaśca narasiṁho'tha vāmanaḥ

इस प्रकार अंतर्यामी अवस्था में यह आत्मा की अंतर्यामिता है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, फिर वामन,

श्लोक 41 (padma.6.229.41)

रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की च ते दश । एते तु विभवावस्था ब्रह्मणः परमात्मनः ।

rāmo rāmaśca kṛṣṇaśca buddhaḥ kalkī ca te daśa ete tu vibhavāvasthā brahmaṇaḥ paramātmanaḥ

राम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि — ये दस। ये परमात्मा ब्रह्म की विभवावस्थाएँ हैं।

श्लोक 42 (padma.6.229.42)

नृसिंहरामकृष्णेषु षाड्गुण्यं परिकीर्तितम् । परावस्था तु देवस्य दीपादुत्पन्न दीपवत् ।

nṛsiṁharāmakṛṣṇeṣu ṣāḍguṁyaṁ parikīrtitam parāvasthā tu devasya dīpādutpaṁna dīpavat

नृसिंह, राम, कृष्ण में षाड्गुण्य कहा गया है। किंतु देव की परावस्था दीप से उत्पन्न दीप के समान है।

श्लोक 43 (padma.6.229.43)

सा ह्यवस्था हरेरस्य शृणुष्व गिरिजे शुभे । वैकुंठं परमं लोकं विष्णुलोकमनुत्तमम् ।

sā hyavasthā harerasya śṛṇuṣva girije śubhe vaikuṁṭhaṁ paramaṁ lokaṁ viṣṇulokamanuttamam

हरि की वह अवस्था — सुनिए, हे शुभे गिरिजे। वैकुण्ठ, परम लोक, अनुपम विष्णुलोक;

श्लोक 44 (padma.6.229.44)

श्वेतदीपं स्वरूपं तु क्षीरसागरमुत्तमम् । एवं चतुर्द्धा व्यूहं तु सम्यगुक्तं महर्षिभिः ।

śvetadīpaṁ svarūpaṁ tu kṣīrasāgaramuttamam evaṁ caturddhā vyūhaṁ tu saṁyaguktaṁ maharṣibhiḥ

श्वेतद्वीप, उसी स्वरूप का; और उत्तम क्षीरसागर — इस प्रकार महर्षियों द्वारा भलीभाँति चतुर्विध व्यूह कहा गया है।

श्लोक 45 (padma.6.229.45)

जलावरणमध्ये तु वैकुंठं कारणं शुभम् । कोटिवैश्वानरप्रख्यं सर्वं धर्म्मवदव्ययम् ।

jalāvaraṇamadhye tu vaikuṁṭhaṁ kāraṇaṁ śubham koṭivaiśvānaraprakhyaṁ sarvaṁ dharṁmavadavyayam

जलावरण के मध्य में वैकुण्ठ, कारण, शुभ, करोड़ों अग्नियों के समान, धर्मवत् अव्यय —

श्लोक 46 (padma.6.229.46)

आमोदमंदारकरैर्वृक्षैर्वह्निभिरास्थितम् । नानामणिमयं दिव्यं विमानकोटिभिर्य्युतम् ।

āmodamaṁdārakarairvṛkṣairvahnibhirāsthitam nānāmaṇimayaṁ divyaṁ vimānakoṭibhiryyutam

— सुगंधित मंदार वृक्षों और यज्ञाग्नियों से युक्त, नाना मणिमय, दिव्य, करोड़ों विमानों से युक्त।

श्लोक 47 (padma.6.229.47)

यदुक्तं परमं धाम तादृक्लक्षणसंस्थितम् । तस्मिन्वैकुंठनगरे नानारत्नसमुज्ज्वले ।

yaduktaṁ paramaṁ dhāma tādṛklakṣaṇasaṁsthitam tasmiṁvaikuṁṭhanagare nānāratnasamujjvale

जो परम धाम कहा गया, वैसे ही लक्षणों से युक्त — उस नाना रत्नों से उज्ज्वल वैकुण्ठ नगरी में,

श्लोक 48 (padma.6.229.48)

मध्ये देवजयारामं पुरं रम्यमनुत्तमम् । चतुर्द्वारसमायुक्तं हेमप्राकारतोरणम् ।

madhye devajayārāmaṁ puraṁ raṁyamanuttamam caturdvārasamāyuktaṁ hemaprākāratoraṇam

— मध्य में देवजयाराम नामक रमणीय, अनुपम पुर है, चार द्वारों वाला, स्वर्ण-प्राकार-तोरण से युक्त,

श्लोक 49 (padma.6.229.49)

चंडादिद्वारपालाद्यैः कुमुदाद्यैश्च रक्षितम् । नानामणिमयैर्दिव्यैर्गृहैः पंक्तिभिरावृतम् ।

caṁḍādidvārapālādyaiḥ kumudādyaiśca rakṣitam nānāmaṇimayairdivyairgṛhaiḥ paṁktibhirāvṛtam

— चंड आदि तथा कुमुद आदि द्वारपालों से रक्षित, नाना दिव्य मणिमय गृह-पंक्तियों से आवृत,

श्लोक 50 (padma.6.229.50)

विततं पंचपद्माभिर्योजनैश्च समंततः । सहस्रयोजनोत्तुंगैः प्रासादैः कोटिभिर्वृतम् ।

vitataṁ paṁcapadmābhiryojanaiśca samaṁtataḥ sahasrayojanottuṁgaiḥ prāsādaiḥ koṭibhirvṛtam

— सब ओर पाँच पद्म योजन विस्तृत, सहस्र योजन ऊँचे करोड़ों प्रासादों से घिरा,

श्लोक 51 (padma.6.229.51)

आरूढयौवनैर्द्दिव्यैः पुंभिः स्त्रीभिश्च शोभितम् । स्त्रियश्च पुरुषाश्चास्मिन्सर्वलक्षणशोभिताः ।

ārūḍhayauvanairddivyaiḥ puṁbhiḥ strībhiśca śobhitam striyaśca puruṣāścāsmiṁsarvalakṣaṇaśobhitāḥ

— यौवन-आरूढ़ दिव्य नर-नारियों से सुशोभित। और इसमें सभी शुभ लक्षणों से सुशोभित नर-नारी,

श्लोक 52 (padma.6.229.52)

समरूपाश्च श्रीविष्णोः सर्व्वालंकारभूषिताः । दिव्यस्रग्वस्त्रसंछन्ना दिव्यचंदनभूषिताः ।

samarūpāśca śrīviṣṇoḥ sarvvālaṁkārabhūṣitāḥ divyasragvastrasaṁchaṁnā divyacaṁdanabhūṣitāḥ

— श्रीविष्णु के समान रूप वाले, सभी आभूषणों से भूषित, दिव्य माला-वस्त्र से आच्छादित, दिव्य चंदन से अलंकृत,

श्लोक 53 (padma.6.229.53)

मोदंते तत्र देवेश भक्त्या त्वात्ममनोरमे । मंत्राष्टाक्षरसंसिद्धा भक्त्या षोडशरूपया ।

modaṁte tatra deveśa bhaktyā tvātmamanorame maṁtrāṣṭākṣarasaṁsiddhā bhaktyā ṣoḍaśarūpayā

— हे देवेश, वहाँ भक्तिपूर्वक अपने मन को प्रिय उस स्थान में आनंदित होते हैं। अष्टाक्षर मंत्र से सिद्ध, सोलह प्रकार की भक्ति से,

श्लोक 54 (padma.6.229.54)

वृतास्तत्पदमाविश्य मोदंते मनसीप्सितम् । गत्वास्मिन्न निवर्तंते विष्णुना सह संस्थिताः ।

vṛtāstatpadamāviśya modaṁte manasīpsitam gatvāsmiṁna nivartaṁte viṣṇunā saha saṁsthitāḥ

— युक्त होकर उस पद में प्रवेश कर मन-वांछित आनंद पाते हैं। वहाँ जाकर विष्णु के साथ स्थित होकर लौटते नहीं।

श्लोक 55 (padma.6.229.55)

अविच्छिन्नात्मना ते वै विष्णुना संगताः शुभाः । तत्समानसुखं नित्यं प्राप्नुवंति मनीषिणः ।

avicchiṁnātmanā te vai viṣṇunā saṁgatāḥ śubhāḥ tatsamānasukhaṁ nityaṁ prāpnuvaṁti manīṣiṇaḥ

अविच्छिन्न आत्मभाव से विष्णु से युक्त शुभ जन, ज्ञानीजन उन्हीं के समान नित्य सुख प्राप्त करते हैं।

श्लोक 56 (padma.6.229.56)

यत्रतत्र हरेर्लोकानाविश्य शुभचेतसः । प्राप्नुवंति पुनः स्वर्गं स्वर्गस्थाइव जंतवः ।

yatratatra harerlokānāviśya śubhacetasaḥ prāpnuvaṁti punaḥ svargaṁ svargasthāiva jaṁtavaḥ

जहाँ-तहाँ शुभचित्त हरि-लोकों में प्रवेश कर, स्वर्गवासी प्राणियों की भाँति, बार-बार स्वर्ग प्राप्त करते हैं।

श्लोक 57 (padma.6.229.57)

यथा सौमित्रि भरतौ यथा संकर्षणादयः । तथा तेपि च जायंते सत्यलोके यथेच्छया ।

yathā saumitri bharatau yathā saṁkarṣaṇādayaḥ tathā tepi ca jāyaṁte satyaloke yathecchayā

जैसे सौमित्रि (लक्ष्मण) और भरत, जैसे संकर्षण आदि, वैसे ही वे भी इच्छानुसार सत्यलोक में जन्म लेते हैं,

श्लोक 58 (padma.6.229.58)

पुनस्तेनैव यास्यंति तत्पदं शाश्वतं परम् । न कर्म्मबंधनं जन्म वैष्णवानां च विद्यते ।

punastenaiva yāsyaṁti tatpadaṁ śāśvataṁ param na karṁmabaṁdhanaṁ jaṁma vaiṣṇavānāṁ ca vidyate

— और उसी से पुनः उस शाश्वत परम पद को जाते हैं। वैष्णवों के लिए कर्मबंधन और जन्म नहीं होता।

श्लोक 59 (padma.6.229.59)

विष्णोरनुचरत्वं हि मोक्षयाहुर्मनीषिणः । न दास्यममरेशस्य बंधनं परिकीर्तितम् ।

viṣṇoranucaratvaṁ hi mokṣayāhurmanīṣiṇaḥ na dāsyamamareśasya baṁdhanaṁ parikīrtitam

विद्वान विष्णु के अनुचरत्व को ही मोक्ष कहते हैं। अमरेश्वर का दास्य बंधन नहीं कहा गया है।

श्लोक 60 (padma.6.229.60)

सर्वबंधननिर्मुक्ता हरिदासा निरामयाः । आब्रह्मभुवनाँ लोकाः पुनरावृत्तिलक्षणाः ।

sarvabaṁdhananirmuktā haridāsā nirāmayāḥ ābrahmabhuvanā~ lokāḥ punarāvṛttilakṣaṇāḥ

सभी बंधनों से मुक्त हरि के दास निरामय हैं। ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावृत्ति-लक्षण वाले हैं,

श्लोक 61 (padma.6.229.61)

कर्मबंधमया दुःखमित्रासख्यभयप्रदाः । बह्वाया सफला देवि जनिनाशकहेतवः ।

karmabaṁdhamayā duḥkhamitrāsakhyabhayapradāḥ bahvāyā saphalā devi janināśakahetavaḥ

— कर्मबंधनमय दुःख, वैर-मित्रता-भय देने वाले हैं। दीर्घ आयु भी, हे देवी, फलस्वरूप जन्म-नाश का ही हेतु है।

श्लोक 62 (padma.6.229.62)

सुखभोगस्तु यन्नॄणां विषमिश्राशनं यथा । स्वर्गसंस्थान्नरान्दृष्ट्वा क्षीणे कर्म्मणि देवताः ।

sukhabhogastu yaṁnṝṇāṁ viṣamiśrāśanaṁ yathā svargasaṁsthāṁnarāṁdṛṣṭvā kṣīṇe karṁmaṇi devatāḥ

मनुष्यों का सुखभोग विषमिश्रित भोजन के समान है। स्वर्गस्थ मनुष्यों को देखकर, कर्म क्षीण होने पर, देवता —

श्लोक 63 (padma.6.229.63)

कुपिताः पातयन्त्येव संसृतौ कार्य्यबंधने । तस्मात्स्वर्गसुखं देवि बहुधायाससाधनम् ।

kupitāḥ pātayaṁtyeva saṁsṛtau kāryyabaṁdhane tasmātsvargasukhaṁ devi bahudhāyāsasādhanam

— क्रुद्ध होकर उन्हें पुनः संसार के कर्मबंधन में गिरा देते हैं। इसलिए, हे देवी, बहु परिश्रम-साध्य स्वर्गसुख,

श्लोक 64 (padma.6.229.64)

अनित्यं कुटिलं दुःखमिश्रं योगी परित्यजेत् । सततं संस्मरेद्विष्णुं सर्वदुःखौघनाशनम् ।

anityaṁ kuṭilaṁ duḥkhamiśraṁ yogī parityajet satataṁ saṁsmaredviṣṇuṁ sarvaduḥkhaughanāśanam

— अनित्य, कुटिल, दुःखमिश्रित है; योगी को इसका त्याग करना चाहिए। सर्वदुःख-समूह-नाशक विष्णु का सतत स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 65 (padma.6.229.65)

नामोच्चारणमात्रेण प्राप्नुवंति परं पदम् । तस्मात्तु वैष्णवं लोकं गौरि संप्रार्थयेत्सुधीः ।

nāmoccāraṇamātreṇa prāpnuvaṁti paraṁ padam tasmāttu vaiṣṇavaṁ lokaṁ gauri saṁprārthayetsudhīḥ

उनके नाम के उच्चारण मात्र से परम पद प्राप्त होता है। इसलिए, हे गौरि, सुधी जन उस वैष्णव लोक की प्रार्थना करें।

श्लोक 66 (padma.6.229.66)

भक्त्या त्वनन्यया देवं भजेत करुणांबुधिम् । स सर्वज्ञानगुणवान्रक्षत्येव न संशयः ।

bhaktyā tvanaṁyayā devaṁ bhajeta karuṇāṁbudhim sa sarvajṁānaguṇavāṁrakṣatyeva na saṁśayaḥ

अनन्य भक्ति से करुणासागर देव का भजन करना चाहिए। वे सर्वज्ञानगुणवान अवश्य रक्षा करते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 67 (padma.6.229.67)

तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रं जप्त्वा सुखतरं शुभम् । संप्राप्नोति परं लोकं वैष्णवं सर्वकामदम् ।

tasmādaṣṭākṣaraṁ maṁtraṁ japtvā sukhataraṁ śubham saṁprāpnoti paraṁ lokaṁ vaiṣṇavaṁ sarvakāmadam

इसलिए अष्टाक्षर मंत्र का जप करके, सुखपूर्वक, सर्वकामद परम वैष्णव लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 68 (padma.6.229.68)

तस्मिन्मणिमये तल्पे सहस्रसूर्य्यरश्मिनि । विमाने शुशुभे दिव्ये संस्थितो भगवान्हरिः ।

tasmiṁmaṇimaye talpe sahasrasūryyaraśmini vimāne śuśubhe divye saṁsthito bhagavāṁhariḥ

उस सहस्र सूर्य-किरण तुल्य मणिमय शय्या पर, दिव्य विमान में, भगवान हरि सुशोभित होकर विराजमान थे।

श्लोक 69 (padma.6.229.69)

तत्र चाधारशक्त्यादि धृते पीठे हिरण्मये । नानारत्नमये दिव्ये नानावर्णसमन्विते ।

tatra cādhāraśaktyādi dhṛte pīṭhe hiraṁmaye nānāratnamaye divye nānāvarṇasamaṁvite

वहाँ आधारशक्ति आदि से धृत उस हिरण्मय पीठ पर, नाना रत्नमय, दिव्य, नानावर्णयुक्त,

श्लोक 70 (padma.6.229.70)

तस्मिन्नष्टदले पद्मे मंत्राक्षरपदे शुभे । कर्णिकायां सुरम्यायां लक्ष्मीबीजशुभाक्षरे ।

tasmiṁnaṣṭadale padme maṁtrākṣarapade śubhe karṇikāyāṁ suraṁyāyāṁ lakṣmībījaśubhākṣare

— उस अष्टदल कमल पर, मंत्राक्षर पद में, शुभ, सुरम्य कर्णिका में, लक्ष्मी-बीज के शुभ अक्षर पर,

श्लोक 71 (padma.6.229.71)

तस्मिन्वालार्कसाहस्रकोटितुल्य समप्रभे । दिव्ये नारायणः श्रीमानासीनः पंकजासने ।

tasmiṁvālārkasāhasrakoṭitulya samaprabhe divye nārāyaṇaḥ śrīmānāsīnaḥ paṁkajāsane

— हजारों करोड़ उगते सूर्यों के समान प्रभा वाले, दिव्य श्रीमान नारायण पद्मासन पर विराजमान थे।

श्लोक 72 (padma.6.229.72)

तस्य दक्षिणके पार्श्वे जगन्माता हिरण्मयी । गृहीत्वा चामरान्दिव्यान् दिव्यमाल्यविभूषणा ।

tasya dakṣiṇake pārśve jagaṁmātā hiraṁmayī gṛhītvā cāmarāṁdivyān divyamālyavibhūṣaṇā

उनके दाहिने पार्श्व में हिरण्मयी जगन्माता, दिव्य चामर धारण किए, दिव्य माल्य-आभूषण से युक्त,

श्लोक 73 (padma.6.229.73)

वसुपात्रं मातुलुंगं स्वर्णपद्मं धृतं करैः । वामतः पृथिवीदेवी नीलोत्पलदलद्युतिः ।

vasupātraṁ mātuluṁgaṁ svarṇapadmaṁ dhṛtaṁ karaiḥ vāmataḥ pṛthivīdevī nīlotpaladaladyutiḥ

— हाथों में धनपात्र, मातुलुंग, स्वर्णपद्म धारण किए थीं। वाम में नीलकमल-दल की द्युति वाली पृथ्वीदेवी,

श्लोक 74 (padma.6.229.74)

नानाभरणसंयुक्ता विचित्रांबरभूषिता । सा धृत्वा चोर्द्ध्वबाहुभ्यां रम्यं रक्तोत्पलद्वयम् ।

nānābharaṇasaṁyuktā vicitrāṁbarabhūṣitā sā dhṛtvā corddhvabāhubhyāṁ raṁyaṁ raktotpaladvayam

— नाना आभूषणों से युक्त, विचित्र वस्त्रों से भूषित — उन्होंने ऊर्ध्व भुजाओं से रम्य लाल कमल-युगल धारण किया;

श्लोक 75 (padma.6.229.75)

इतराभ्यां धृतं देव्या धान्यपात्रयुगं तथा । गृहीत्वा चामरान्दिव्यान्शक्तयो विमलादिकाः ।

itarābhyāṁ dhṛtaṁ devyā dhāṁyapātrayugaṁ tathā gṛhītvā cāmarāṁdivyāṁśaktayo vimalādikāḥ

— और अन्य दोनों से धान्यपात्र-युगल धारण किया। दिव्य चामर धारण किए विमला आदि शक्तियाँ,

श्लोक 76 (padma.6.229.76)

दलाग्रेषु समासीनाः सर्वलक्षणशोभिताः । तासां मध्ये समासीनो भगवानच्युतो हरिः ।

dalāgreṣu samāsīnāḥ sarvalakṣaṇaśobhitāḥ tāsāṁ madhye samāsīno bhagavānacyuto hariḥ

— दलों के अग्रभाग में विराजमान, सभी शुभ लक्षणों से सुशोभित। उनके मध्य में भगवान अच्युत हरि विराजमान थे,

श्लोक 77 (padma.6.229.77)

शंखचक्रगदापद्मपाणिभिर्दिव्यभूषणैः । केयूरांगदहाराद्यैर्भूषणै रूपशोभितः ।

śaṁkhacakragadāpadmapāṇibhirdivyabhūṣaṇaiḥ keyūrāṁgadahārādyairbhūṣaṇai rūpaśobhitaḥ

— शंख-चक्र-गदा-पद्म हाथों में धारण किए, दिव्य आभूषणों से युक्त, केयूर-अंगद-हार आदि से रूपशोभित,

श्लोक 78 (padma.6.229.78)

प्रातरुद्यत्सहस्रांशु कुण्डलाभ्यां विराजितः । पूर्वोक्तैस्त्रिदशैर्न्नित्यैः सेवितः परमेश्वरः ।

prātarudyatsahasrāṁśu kuṁḍalābhyāṁ virājitaḥ pūrvoktaistridaśairṁnityaiḥ sevitaḥ parameśvaraḥ

— प्रातःकालीन सहस्ररश्मि सूर्य समान कुंडलों से सुशोभित, पूर्वोक्त नित्य त्रिदेवगणों द्वारा सेवित वह परमेश्वर,

श्लोक 79 (padma.6.229.79)

आस्ते वैकुण्ठनगरे नित्ये सत्ये च भोगवान् । श्रीमदष्टाक्षरं मंत्रं सिद्धानां वै मनीषिणाम् ।

āste vaikuṁṭhanagare nitye satye ca bhogavān śrīmadaṣṭākṣaraṁ maṁtraṁ siddhānāṁ vai manīṣiṇām

— नित्य, सत्य वैकुण्ठ नगरी में भोगवान होकर विराजमान हैं। सिद्ध विद्वानों के लिए ही ज्ञात श्रीमन् अष्टाक्षर मंत्र —

श्लोक 80 (padma.6.229.80)

गम्यं तद्वैष्णवं लोकं नेतरेषां कथंचन । इत्येवं प्रथमं व्यूहं कथितं ते वरानने ।

gaṁyaṁ tadvaiṣṇavaṁ lokaṁ netareṣāṁ kathaṁcana ityevaṁ prathamaṁ vyūhaṁ kathitaṁ te varānane

— उसी से वह वैष्णव लोक सुलभ है, अन्य किसी उपाय से किसी को नहीं। इस प्रकार, हे वरानने, यह प्रथम व्यूह बताया गया।

श्लोक 81 (padma.6.229.81)

द्वितीयं वैष्णवं लोकं शृणु वक्ष्यामि सुव्रते । योऽयं नित्य इति ख्यातो लोकाग्र्यो वैष्णवः स्मृतः ।

dvitīyaṁ vaiṣṇavaṁ lokaṁ śṛṇu vakṣyāmi suvrate yo'yaṁ nitya iti khyāto lokāgryo vaiṣṇavaḥ smṛtaḥ

अब, हे सुव्रते, द्वितीय वैष्णव लोक सुनिए जो मैं बताऊँगा। जो 'नित्य' नाम से प्रख्यात, वैष्णव लोकों में अग्रगण्य कहा गया है —

श्लोक 82 (padma.6.229.82)

तं लोकं विपुलं पुण्यं शुद्धं सत्वमयं शुभम् । मध्याह्नसूर्य्यसाहस्रयुगपद्भासितं तदा ।

taṁ lokaṁ vipulaṁ puṁyaṁ śuddhaṁ satvamayaṁ śubham madhyāhnasūryyasāhasrayugapadbhāsitaṁ tadā

— वह विशाल, पुण्यमय, शुद्ध सत्त्वमय, शुभ लोक, मानो एक साथ सहस्र मध्याह्न सूर्यों से प्रकाशित है।

श्लोक 83 (padma.6.229.83)

कल्पांतेऽपि न लीयेत तत्वलोकं महत्तरम् । मम ब्रह्मादिदेवानां न द्रष्टुमपि शक्यते ।

kalpāṁte'pi na līyeta tatvalokaṁ mahattaram mama brahmādidevānāṁ na draṣṭumapi śakyate

कल्पांत में भी वह लीन नहीं होता — वह महत्तर सत्यलोक। मुझसे, ब्रह्मा और अन्य देवताओं से भी उसे देखना संभव नहीं।

श्लोक 84 (padma.6.229.84)

सर्वं कल्पद्रुमवनैः परिपूर्णं समंततः । सुधाम्बुपरिपूर्णाभिर्दीर्घिकाभिः समन्वितम् ।

sarvaṁ kalpadrumavanaiḥ paripūrṇaṁ samaṁtataḥ sudhāṁbuparipūrṇābhirdīrghikābhiḥ samaṁvitam

यह सब ओर कल्पवृक्षों के वनों से परिपूर्ण है, अमृतजल से भरी दीर्घिकाओं से युक्त,

श्लोक 85 (padma.6.229.85)

स्वर्णरत्नमयैर्दिव्यैः पंकजैरुपशोभितम् । जलदग्निनिभैर्दिव्यैर्भूषणैः कोटिभिर्वृतम् ।

svarṇaratnamayairdivyaiḥ paṁkajairupaśobhitam jaladagninibhairdivyairbhūṣaṇaiḥ koṭibhirvṛtam

— स्वर्ण-रत्नमय दिव्य कमलों से सुशोभित, मेघ-अग्नि समान करोड़ों दिव्य आभूषणों से घिरा,

श्लोक 86 (padma.6.229.86)

निरंतरं सामभिश्च कूजितैः कोकिलादिभिः । ऊह्यमानैर्गन्धर्वृक्षैः पुष्पकैरपि शोभितम् ।

niraṁtaraṁ sāmabhiśca kūjitaiḥ kokilādibhiḥ ūhyamānairgaṁdharvṛkṣaiḥ puṣpakairapi śobhitam

— निरंतर सामगान और कोकिल आदि की कूक से युक्त, झूमते गंधर्व-वृक्षों और पुष्पित वृक्षों से भी सुशोभित।

श्लोक 87 (padma.6.229.87)

ऊनषोडशवर्षाब्दैर्दिव्यनारीनरैर्वृतम् । सर्वलक्षणशोभाढ्यैर्दिव्यकल्पविभूषणैः ।

ūnaṣoḍaśavarṣābdairdivyanārīnarairvṛtam sarvalakṣaṇaśobhāḍhyairdivyakalpavibhūṣaṇaiḥ

यह लगभग सोलह वर्ष की आयु वाले दिव्य नर-नारियों से युक्त है, सभी शुभ लक्षणों और दिव्य कल्प आभूषणों से समृद्ध।

श्लोक 88 (padma.6.229.88)

तत्रप्रदेशे रम्येषु देशेषु कमलापतिम् । मुदितैः पतिभिः सार्द्धमर्चयंति स्म योषितः ।

tatrapradeśe raṁyeṣu deśeṣu kamalāpatim muditaiḥ patibhiḥ sārddhamarcayaṁti sma yoṣitaḥ

उसके रमणीय प्रदेशों में स्त्रियाँ अपने प्रसन्न पतियों सहित कमलापति की पूजा करती हैं।

श्लोक 89 (padma.6.229.89)

तत्प्रसादोपलभ्यं वै सुखमश्नन्ति सर्वदा । गायंति परमानंदं कृष्णस्य चरितं महत् ।

tatprasādopalabhyaṁ vai sukhamaśnaṁti sarvadā gāyaṁti paramānaṁdaṁ kṛṣṇasya caritaṁ mahat

वे सदा उनकी कृपा से प्राप्त सुख का भोग करती हैं; वे परमानंद से कृष्ण के महान चरित्र गाती हैं।

श्लोक 90 (padma.6.229.90)

पद्मेक्षणाः पद्महस्ताः पद्मया सदृशः शुभाः । दिव्यस्रग्वसनोपेताः क्रीडंति स्म सुयोषितः ।

padmekṣaṇāḥ padmahastāḥ padmayā sadṛśaḥ śubhāḥ divyasragvasanopetāḥ krīḍaṁti sma suyoṣitaḥ

कमलनयना, पद्महस्ता, पद्मा (लक्ष्मी) के समान शुभ स्त्रियाँ, दिव्य माला-वस्त्र से युक्त, वहाँ क्रीड़ा करती हैं;

श्लोक 91 (padma.6.229.91)

शंखचक्रगदापद्मधरा भूषणभूषिताः । स्रग्विणः पीतवसनाः पुरुषास्तत्र संस्थिताः ।

śaṁkhacakragadāpadmadharā bhūṣaṇabhūṣitāḥ sragviṇaḥ pītavasanāḥ puruṣāstatra saṁsthitāḥ

और वहाँ शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी, आभूषणभूषित, मालाधारी, पीतवस्त्रधारी पुरुष निवास करते हैं।

श्लोक 92 (padma.6.229.92)

अनन्यस्पर्शनात्तत्र स्त्रीपुंसोः क्रीडमानयोः । भवत्यनुदिनं वृद्धं हरिभक्तिसुखं रसम् ।

anaṁyasparśanāttatra strīpuṁsoḥ krīḍamānayoḥ bhavatyanudinaṁ vṛddhaṁ haribhaktisukhaṁ rasam

क्रीड़ारत स्त्री-पुरुष के उस अनन्य स्पर्श से हरिभक्ति के सुख का रस प्रतिदिन बढ़ता है।

श्लोक 93 (padma.6.229.93)

तन्मध्येंतःपुरं रम्यं वासुदेवस्य शोभितम् । चंदनागुरुकर्प्पूरकुंकुमोदकसंयुतम् ।

taṁmadhyeṁtaḥpuraṁ raṁyaṁ vāsudevasya śobhitam caṁdanāgurukarppūrakuṁkumodakasaṁyutam

उनके मध्य में वासुदेव का रमणीय, सुशोभित अंतःपुर है, चंदन-अगरु-कर्पूर-कुंकुम जल से युक्त,

श्लोक 94 (padma.6.229.94)

नानापुष्पविमानाद्यैः सर्वतः समलंकृतम् । तन्मध्ये कल्पवृक्षस्य च्छायायां कमलासने ।

nānāpuṣpavimānādyaiḥ sarvataḥ samalaṁkṛtam taṁmadhye kalpavṛkṣasya cchāyāyāṁ kamalāsane

— सब ओर नाना पुष्प, विमान आदि से अलंकृत। उसके मध्य में कल्पवृक्ष की छाया में, कमलासन पर,

श्लोक 95 (padma.6.229.95)

विचित्रश्लक्ष्णपर्यंके शुभास्तरणसंवृते । दिव्यगंधसुशोभाढ्यैर्नानापुष्पपरिच्छदैः ।

vicitraślakṣṇaparyaṁke śubhāstaraṇasaṁvṛte divyagaṁdhasuśobhāḍhyairnānāpuṣpaparicchadaiḥ

— विचित्र, चिकने पर्यंक पर, शुभ आस्तरण से आवृत, दिव्य सुगंध से युक्त, नाना पुष्प-परिच्छदों से समृद्ध,

श्लोक 96 (padma.6.229.96)

तस्मिन्मनोरमे दिव्ये समासीनः श्रिया सह । ईश्वर्य्या सह देवेशो वासुदेवः सनातनः ।

tasmiṁmanorame divye samāsīnaḥ śriyā saha īśvaryyā saha deveśo vāsudevaḥ sanātanaḥ

— उस मनोरम, दिव्य शय्या पर, श्री सहित, ईश्वरी सहित, सनातन देवेश वासुदेव विराजमान हैं —

श्लोक 97 (padma.6.229.97)

सुधांशुकोटिसंकाशो दिव्याभरणभूषितः । सुवर्णशुभ्रयुगल श्लक्ष्णनासांचिताननः ।

sudhāṁśukoṭisaṁkāśo divyābharaṇabhūṣitaḥ suvarṇaśubhrayugala ślakṣṇanāsāṁcitānanaḥ

— करोड़ों चंद्रमाओं के समान प्रभावान, दिव्य आभूषणों से युक्त, स्वर्ण-शुभ्र चिकनी नासिका से अंचित मुख वाले,

श्लोक 98 (padma.6.229.98)

स्निग्धायतसुलावण्यकपोलाभ्यां विराजितः । नीलकुंचितकेशाढ्यो रक्ताब्जदललोचनः ।

snigdhāyatasulāvaṁyakapolābhyāṁ virājitaḥ nīlakuṁcitakeśāḍhyo raktābjadalalocanaḥ

— स्निग्ध, विशाल, सुंदर कपोलों से सुशोभित, नीले घुँघराले केशों से युक्त, लाल कमलदल समान नेत्रों वाले,

श्लोक 99 (padma.6.229.99)

मंदारकेतकीजाती कैरवीकृतशेखरः । स्निग्धबिम्बफलाभौष्ठः सुस्मिताननपंकजः ।

maṁdāraketakījātī kairavīkṛtaśekharaḥ snigdhabiṁbaphalābhauṣṭhaḥ susmitānanapaṁkajaḥ

— मंदार-केतकी-जाती और कैरव पुष्पों से युक्त शिखा वाले, स्निग्ध बिम्बफल समान अधरों वाले, मुस्कुराते मुखकमल वाले,

श्लोक 100 (padma.6.229.100)

अनर्घ्यमौक्तिकाभासदंतावलिविराजितः । हरिचंदनलिप्तांगः कस्तूरीतिलकांकितः ।

anarghyamauktikābhāsadaṁtāvalivirājitaḥ haricaṁdanaliptāṁgaḥ kastūrītilakāṁkitaḥ

— अमूल्य मोतियों समान दंतपंक्ति से सुशोभित, हरिचंदन-लिप्त देह वाले, कस्तूरी-तिलक से अंकित,

श्लोक 101 (padma.6.229.101)

उन्नतांसभुजैर्दीर्घैश्चतुर्भिरुपशोभितः । जपाकुसुमसंकाशकरपल्लवशोभितः ।

uṁnatāṁsabhujairdīrghaiścaturbhirupaśobhitaḥ japākusumasaṁkāśakarapallavaśobhitaḥ

— उन्नत कंधों और चार लंबी भुजाओं से सुशोभित, जपाकुसुम समान करपल्लव से सुशोभित,

श्लोक 102 (padma.6.229.102)

श्रीवत्सकौस्तुभाभ्यां च शोभितः पृथुवक्षसा ।

śrīvatsakaustubhābhyāṁ ca śobhitaḥ pṛthuvakṣasā

— श्रीवत्स और कौस्तुभ से सुशोभित, विशाल वक्षस्थल से युक्त —

श्लोक 103 (padma.6.229.103)

मुक्तामयैः सुशोभाढ्यैर्दिव्यस्रग्भिरलंकृतः । बालार्कसदृशज्योत्स्ना पीतवस्त्रेण वेष्टितः ।

muktāmayaiḥ suśobhāḍhyairdivyasragbhiralaṁkṛtaḥ bālārkasadṛśajyotsnā pītavastreṇa veṣṭitaḥ

— मोतियों से समृद्ध दिव्य मालाओं से सुसज्जित, उगते सूर्य समान पीतवस्त्र धारण किए,

श्लोक 104 (padma.6.229.104)

माणिक्यनूपुरोपेत पद्मपत्रविराजितः । अकलंकितचंद्राभ नखपंक्तिविराजितः ।

māṇikyanūpuropeta padmapatravirājitaḥ akalaṁkitacaṁdrābha nakhapaṁktivirājitaḥ

— माणिक्य नूपुरों से युक्त कमलपत्र समान चरणों वाले, निष्कलंक चंद्रमा समान नखपंक्ति से सुशोभित,

श्लोक 105 (padma.6.229.105)

रक्तोत्पलनिभश्लक्ष्ण शुभ्रांघ्रिकरपंकजः । पांचजन्यरथांगाभ्यां बाहुयुग्मविराजितः ।

raktotpalanibhaślakṣṇa śubhrāṁghrikarapaṁkajaḥ pāṁcajaṁyarathāṁgābhyāṁ bāhuyugmavirājitaḥ

— लाल कमल समान चिकने हाथ-पैर वाले, पांचजन्य शंख और चक्र से सुशोभित भुजा-युगल वाले,

श्लोक 106 (padma.6.229.106)

इतराभ्यां श्रियो गात्रमाश्लिष्यन्निजवक्षसि । श्लिष्यद्विद्युल्लतोद्गीथ शिताभ्र इव राजते ।

itarābhyāṁ śriyo gātramāśliṣyaṁnijavakṣasi śliṣyadvidyullatodgītha śitābhra iva rājate

— और अन्य दो भुजाओं से श्री के शरीर को अपने वक्ष से आलिंगन किए, श्वेत मेघ पर चिपकी बिजली-रेखा के समान सुशोभित,

श्लोक 107 (padma.6.229.107)

सप्तजांबूनदश्लक्ष्ण शुभांघ्रियुगपंजकः । अत्र क्रीडति देवेशो वासुदेवः सनातनः ।

saptajāṁbūnadaślakṣṇa śubhāṁghriyugapaṁjakaḥ atra krīḍati deveśo vāsudevaḥ sanātanaḥ

— तपे स्वर्ण समान सुंदर चरण-युगल वाले — वहाँ सनातन देवेश वासुदेव क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 108 (padma.6.229.108)

तप्तकांचनसंकाशा सर्वाभरणभूषिता । सुस्निग्धनीलकुटिलचंद्रराविविराजिता ।

taptakāṁcanasaṁkāśā sarvābharaṇabhūṣitā susnigdhanīlakuṭilacaṁdrarāvivirājitā

तपे स्वर्ण के समान वर्ण वाली, सभी आभूषणों से भूषित, स्निग्ध नील घुँघराले केशों वाली श्री,

श्लोक 109 (padma.6.229.109)

मंदारपारिजातादि दिव्यपुष्पविराजिता । कर्णावतंस शोभाढ्या चिकुरांतालिसन्निभा ।

maṁdārapārijātādi divyapuṣpavirājitā karṇāvataṁsa śobhāḍhyā cikurāṁtālisaṁnibhā

— मंदार-पारिजात आदि दिव्य पुष्पों से सुशोभित, सुंदर कर्णाभूषणों वाली, भ्रमरों समान घुँघराली अलकों वाली,

श्लोक 110 (padma.6.229.110)

पीनोन्नतस्तनाभ्यां च पीडंति हरिवक्षसि । केयूरांगदहाराद्यैर्भूषणैरुपशोभिता ।

pīnoṁnatastanābhyāṁ ca pīḍaṁti harivakṣasi keyūrāṁgadahārādyairbhūṣaṇairupaśobhitā

— पुष्ट-उन्नत स्तनों से हरि के वक्ष से सटी हुई, केयूर-अंगद-हार आदि से सुशोभित,

श्लोक 111 (padma.6.229.111)

आरूढयौवना नित्यं सर्वलोकेशसुंदरी । तत्र क्रीडति लोकेश पत्या सह निरंतरम् ।

ārūḍhayauvanā nityaṁ sarvalokeśasuṁdarī tatra krīḍati lokeśa patyā saha niraṁtaram

— सदा यौवनयुक्त, सर्वलोकेश की सुंदरी — वहाँ वे निरंतर अपने पति लोकेश के साथ क्रीड़ा करती हैं।

श्लोक 112 (padma.6.229.112)

स एव वासुदेवोऽत्र सर्वभूतमनोहरः । क्रीडते सर्वलोकेस्मिन्सर्वकामप्रदो नृणाम् ।

sa eva vāsudevo'tra sarvabhūtamanoharaḥ krīḍate sarvalokesmiṁsarvakāmaprado nṛṇām

वे ही वासुदेव, सर्वभूतमनोहर, उस लोक में क्रीड़ा करते हैं, मनुष्यों को सर्वकाम देने वाले।

श्लोक 113 (padma.6.229.113)

अत्राष्टशक्तयो लक्ष्म्यास्तनवः परितः स्थिताः । रमा च रुक्मिणी सीता पद्मा पद्मालया शिवा ।

atrāṣṭaśaktayo lakṣṁyāstanavaḥ paritaḥ sthitāḥ ramā ca rukmiṇī sītā padmā padmālayā śivā

वहाँ लक्ष्मी की आठ शक्तियाँ, उनकी ही तनुएँ, सब ओर स्थित हैं: रमा, रुक्मिणी, सीता, पद्मा, पद्मालया, शिवा,

श्लोक 114 (padma.6.229.114)

सुलक्षणा सुशीला च रतिकामप्रदाश्च ताः । शंखचक्रगदापद्म शार्ङ्गाद्यैर्हेतिभिस्तथा ।

sulakṣaṇā suśīlā ca ratikāmapradāśca tāḥ śaṁkhacakragadāpadma śārṁgādyairhetibhistathā

सुलक्षणा और सुशीला — ये रति-काम प्रदान करने वाली हैं। शंख-चक्र-गदा-पद्म-शार्ङ्ग आदि आयुधों से—

श्लोक 115 (padma.6.229.115)

परितः पुष्कराकारैस्तं लोकं परिरक्षते । एवं द्वितीयं रूपं च सम्यक्ते शुभदर्शने ।

paritaḥ puṣkarākāraistaṁ lokaṁ parirakṣate evaṁ dvitīyaṁ rūpaṁ ca saṁyakte śubhadarśane

— सब ओर पुष्करकार होकर वे उस लोक की रक्षा करती हैं। इस प्रकार यह द्वितीय रूप भलीभाँति—

श्लोक 116 (padma.6.229.116)

संक्षेपतो मया प्रोक्तं न शक्यं विस्तरेण हि । द्वादशाक्षरमंत्रं वै ये जपंति सुखाह्वयम् ।

saṁkṣepato mayā proktaṁ na śakyaṁ vistareṇa hi dvādaśākṣaramaṁtraṁ vai ye japaṁti sukhāhvayam

— संक्षेप में आपको बताया गया, हे शुभदर्शने; विस्तार से कहना संभव नहीं। जो द्वादशाक्षर, सुखदायी मंत्र जपते हैं —

श्लोक 117 (padma.6.229.117)

ते प्राप्नुवंति सततं शाश्वतं शुभमक्षयम् । न वेदाध्ययनैर्यज्ञैर्न व्रतैर्नोपवासतः ।

te prāpnuvaṁti satataṁ śāśvataṁ śubhamakṣayam na vedādhyayanairyajṁairna vratairnopavāsataḥ

— वे सतत उस शाश्वत, शुभ, अक्षय पद को प्राप्त होते हैं। न वेदाध्ययन से, न यज्ञ से, न व्रत से, न उपवास से,

श्लोक 118 (padma.6.229.118)

न प्राप्यं वैष्णवं लोकं विना दास्येन कुत्रचित् । तस्माद्दास्यं हरेर्भक्तं भजेतानन्यमानसः ।

na prāpyaṁ vaiṣṇavaṁ lokaṁ vinā dāsyena kutracit tasmāddāsyaṁ harerbhaktaṁ bhajetānaṁyamānasaḥ

— वह वैष्णव लोक दास्य के बिना कहीं भी प्राप्य नहीं। इसलिए अनन्यचित्त होकर हरिभक्तों का दास्य ग्रहण करना चाहिए;

श्लोक 119 (padma.6.229.119)

प्राप्नोति परमां सिद्धिं कर्मबंधविमोचनीम् । एवं संप्रोच्यते देवि द्वितीयं व्यूहमव्ययम् ।

prāpnoti paramāṁ siddhiṁ karmabaṁdhavimocanīm evaṁ saṁprocyate devi dvitīyaṁ vyūhamavyayam

— वह कर्मबंध से मुक्त करने वाली परम सिद्धि प्राप्त करता है। इस प्रकार, हे देवी, यह द्वितीय अव्यय व्यूह कहा गया।

श्लोक 120 (padma.6.229.120)

तृतीयं तु परं व्यूहं शृणु वक्ष्यामि पार्वति । तोयाब्धेरुत्तरं कूलं श्वेतद्वीपे महामते ।

tṛtīyaṁ tu paraṁ vyūhaṁ śṛṇu vakṣyāmi pārvati toyābdheruttaraṁ kūlaṁ śvetadvīpe mahāmate

अब, हे पार्वती, तृतीय परम व्यूह सुनिए जो मैं बताऊँगा। जलसागर के उत्तरी तट पर, श्वेतद्वीप में, हे महामते,

श्लोक 121 (padma.6.229.121)

संदर्शनाय योगानां सनकादि महात्मनाम् । सनकश्च सनंदश्च तृतीयश्च सनातनः ।

saṁdarśanāya yogānāṁ sanakādi mahātmanām sanakaśca sanaṁdaśca tṛtīyaśca sanātanaḥ

— सनक आदि योगी महात्माओं के दर्शनार्थ — सनक, सनंदन, और तीसरे सनातन,

श्लोक 122 (padma.6.229.122)

सनत्कुमारजाताश्च वोढुः पंचशिखस्तथा । सप्तैते ब्रह्मणः पुत्रा योगिनः सुमहौजसः ।

sanatkumārajātāśca voḍhuḥ paṁcaśikhastathā saptaite brahmaṇaḥ putrā yoginaḥ sumahaujasaḥ

— सनत्कुमार, तथा पाँचवें वोढु, और पंचशिख — ब्रह्मा के ये सात पुत्र, महातेजस्वी योगी,

श्लोक 123 (padma.6.229.123)

विरक्ताः सर्वभोगेषु शुद्धाः सत्वगुणाः सदा । भगवद्दर्शनोद्भूतसुखैकरससेविनः ।

viraktāḥ sarvabhogeṣu śuddhāḥ satvaguṇāḥ sadā bhagavaddarśanodbhūtasukhaikarasasevinaḥ

— सभी भोगों से विरक्त, शुद्ध, सदा सत्त्वगुणी, भगवद्दर्शनजनित सुख के एकरस के सेवी —

श्लोक 124 (padma.6.229.124)

नरनारायणाद्याश्च श्वेतद्वीपे वसंति ये । तेषां संदर्शनार्थाय तत्र संनिहितो हरिः ।

naranārāyaṇādyāśca śvetadvīpe vasaṁti ye teṣāṁ saṁdarśanārthāya tatra saṁnihito hariḥ

— नर-नारायण आदि उस श्वेतद्वीप में निवास करते हैं। उनके दर्शनार्थ हरि वहाँ संनिहित हैं,

श्लोक 125 (padma.6.229.125)

शुभ्रांशुकोटिसंकाशे नानारत्नमयोज्ज्वले । श्वेतद्वीपे महायोगि सेविते भयवर्जिते ।

śubhrāṁśukoṭisaṁkāśe nānāratnamayojjvale śvetadvīpe mahāyogi sevite bhayavarjite

— करोड़ों श्वेत किरणों समान प्रभा वाले, नाना रत्नों से उज्ज्वल, महायोगियों द्वारा सेवित, भयरहित श्वेतद्वीप में।

श्लोक 126 (padma.6.229.126)

तत्रोद्यानानि रम्याणि पारिजातसमानि वै । संतानकलताकीर्णं चन्दनद्रुममंडितम् ।

tatrodyānāni raṁyāṇi pārijātasamāni vai saṁtānakalatākīrṇaṁ caṁdanadrumamaṁḍitam

वहाँ पारिजात समान रमणीय उद्यान हैं, संतानक लताओं से व्याप्त, चंदन वृक्षों से सुशोभित,

श्लोक 127 (padma.6.229.127)

फुल्लपद्मोत्पलोपेतं नानातोयालयैर्युतम् । तन्मध्ये नगरी रम्या नाम्ना चैरावती शुभा ।

phullapadmotpalopetaṁ nānātoyālayairyutam taṁmadhye nagarī raṁyā nāṁnā cairāvatī śubhā

— खिले कमल-उत्पलों से युक्त, नाना जलाशयों से युक्त। उनके मध्य में ऐरावती नामक रमणीय शुभ नगरी है,

श्लोक 128 (padma.6.229.128)

नानारत्नमयैर्दिव्यैर्विमानैरुपशोभिता । दिव्यस्त्रीपुंभिराक्रांता बहुप्रासादसंकुला ।

nānāratnamayairdivyairvimānairupaśobhitā divyastrīpuṁbhirākrāṁtā bahuprāsādasaṁkulā

— नाना रत्नमय दिव्य विमानों से सुशोभित, दिव्य नर-नारियों से व्याप्त, अनेक प्रासादों से भरी।

श्लोक 129 (padma.6.229.129)

तन्मध्येऽन्तपुरं रम्यं रत्नद्रुमसमाकुलम् । बालसूर्यनिभैस्तुंगैः प्रासादैर्बहुभिर्वृतम् ।

taṁmadhye'ṁtapuraṁ raṁyaṁ ratnadrumasamākulam bālasūryanibhaistuṁgaiḥ prāsādairbahubhirvṛtam

उसके मध्य में रमणीय अंतःपुर है, रत्नवृक्षों से भरा, बालसूर्य समान अनेक ऊँचे प्रासादों से घिरा।

श्लोक 130 (padma.6.229.130)

तन्मध्ये मंडपं दिव्यं मणिकांचनशोभितम् । चंदनागुरुकर्पूरकुंकुमामोदवाशितम् ।

taṁmadhye maṁḍapaṁ divyaṁ maṇikāṁcanaśobhitam caṁdanāgurukarpūrakuṁkumāmodavāśitam

उसके मध्य में एक दिव्य मंडप है, मणि-कांचन से सुशोभित, चंदन-अगरु-कर्पूर-कुंकुम की सुगंध से युक्त,

श्लोक 131 (padma.6.229.131)

नानाकुसुमशोभाढ्यैर्वितानैः समलंकृतम् । दिव्याप्सरः समाकीर्णं सामगानोपशोभितम् ।

nānākusumaśobhāḍhyairvitānaiḥ samalaṁkṛtam divyāpsaraḥ samākīrṇaṁ sāmagānopaśobhitam

— नाना पुष्पों से समृद्ध वितानों से अलंकृत, दिव्य अप्सराओं से व्याप्त, सामगान से सुशोभित।

श्लोक 132 (padma.6.229.132)

मध्ये सिंहासनं तत्र सूर्यवैश्वानरप्रभम् । तन्मध्येऽष्टदलं पद्मं चंद्रबिंबमिवापरम् ।

madhye siṁhāsanaṁ tatra sūryavaiśvānaraprabham taṁmadhye'ṣṭadalaṁ padmaṁ caṁdrabiṁbamivāparam

उसके मध्य में सूर्य-अग्नि समान प्रभा वाला सिंहासन है; उसके मध्य में अष्टदल कमल है, मानो दूसरा चंद्रबिंब।

श्लोक 133 (padma.6.229.133)

तन्मध्ये कर्णिकायां तु समासीनो जनार्दनः । शुद्धजांबूनदप्रख्यो मुक्ताहारविभूषितः ।

taṁmadhye karṇikāyāṁ tu samāsīno janārdanaḥ śuddhajāṁbūnadaprakhyo muktāhāravibhūṣitaḥ

उसके मध्य कर्णिका में जनार्दन विराजमान हैं, शुद्ध स्वर्ण के समान वर्ण वाले, मुक्ताहार से भूषित,

श्लोक 134 (padma.6.229.134)

शंखचक्रगदापद्मशक्तिहस्तचतुष्टयः । हारकेयूरकटकैरंगुलीयैश्च शोभितः ।

śaṁkhacakragadāpadmaśaktihastacatuṣṭayaḥ hārakeyūrakaṭakairaṁgulīyaiśca śobhitaḥ

— शंख-चक्र-गदा-पद्म-शक्ति धारण किए चार हाथों वाले, हार-केयूर-कटक-अंगूठियों से सुशोभित,

श्लोक 135 (padma.6.229.135)

सुवर्णपंकजप्रख्यः पदयुग्मविराजितः । संतानकनिभैः शुभ्रैर्नखपंक्तिविराजितः ।

suvarṇapaṁkajaprakhyaḥ padayugmavirājitaḥ saṁtānakanibhaiḥ śubhrairnakhapaṁktivirājitaḥ

— स्वर्णकमल समान, चरण-युगल से सुशोभित, संतानक पुष्प समान श्वेत नखपंक्ति से सुशोभित,

श्लोक 136 (padma.6.229.136)

षोडशाब्दवयो रूपयौवनेन विराजितः । विशालभालदेशे तु कुंकुमेन सुगंधिना ।

ṣoḍaśābdavayo rūpayauvanena virājitaḥ viśālabhāladeśe tu kuṁkumena sugaṁdhinā

— सोलह वर्ष की आयु, रूप-यौवन से सुशोभित, विशाल भाल-प्रदेश पर सुगंधित कुंकुम से—

श्लोक 137 (padma.6.229.137)

रचितेनोर्ध्वपुंड्रेण सीमंतेनोपशोभितः । मथितामृतफेनाभ शुक्लवस्त्रसुवेष्टितः ।

racitenordhvapuṁḍreṇa sīmaṁtenopaśobhitaḥ mathitāmṛtaphenābha śuklavastrasuveṣṭitaḥ

— रचित ऊर्ध्वपुण्ड्र से सीमंत सुशोभित, मथित अमृत-फेन समान श्वेत वस्त्र से आवृत,

श्लोक 138 (padma.6.229.138)

मुक्तामयाभ्यां शुभ्राभ्यां कुंडलाभ्यां विराजितः । पद्मासनसमासीनो जगन्मोहनविग्रहः ।

muktāmayābhyāṁ śubhrābhyāṁ kuṁḍalābhyāṁ virājitaḥ padmāsanasamāsīno jagaṁmohanavigrahaḥ

— मुक्तामय श्वेत कुंडलों से सुशोभित, पद्मासन में विराजमान, जगन्मोहन विग्रह वाले।

श्लोक 139 (padma.6.229.139)

वामांके संस्थिता देवी तस्य दिव्यस्वरूपिणी । तस्यैव सदृशी लक्ष्मीः शीलसुष्टुगुणादिभिः ।

vāmāṁke saṁsthitā devī tasya divyasvarūpiṇī tasyaiva sadṛśī lakṣmīḥ śīlasuṣṭuguṇādibhiḥ

उनके वामांक में विराजमान देवी, दिव्यस्वरूपा — शील-सुगुण आदि में उन्हीं के समान लक्ष्मी,

श्लोक 140 (padma.6.229.140)

पद्मकिंजल्कसंकाशा यौवनारंभशोभिता । सर्वलक्षणसंपन्ना तप्तकांचनभूषणा ।

padmakiṁjalkasaṁkāśā yauvanāraṁbhaśobhitā sarvalakṣaṇasaṁpaṁnā taptakāṁcanabhūṣaṇā

— पद्मकिंजल्क समान, नवयौवन से सुशोभित, सभी शुभ लक्षणों से संपन्न, तप्त कांचन के आभूषणों से युक्त,

श्लोक 141 (padma.6.229.141)

दिव्यस्रग्वसनोपेता नीलकुंचितमूर्धजा । चतुर्भुजैर्विराजंती केयूराङ्गदभूषिता ।

divyasragvasanopetā nīlakuṁcitamūrdhajā caturbhujairvirājaṁtī keyūrāṁgadabhūṣitā

— दिव्य माला-वस्त्र से युक्त, नील घुँघराले केश वाली, चार भुजाओं से सुशोभित, केयूर-अंगद से भूषित,

श्लोक 142 (padma.6.229.142)

मुक्ताहारैर्विराजंती मंदारांचितशीर्षजा । श्लक्ष्णनासापुटयुता लसद्दंतिवरा जिता ।

muktāhārairvirājaṁtī maṁdārāṁcitaśīrṣajā ślakṣṇanāsāpuṭayutā lasaddaṁtivarā jitā

— मुक्ताहारों से सुशोभित, मंदार पुष्पों से अंचित शीश वाली, चिकनी नासिकापुट वाली, सुंदर दंतपंक्ति से युक्त,

श्लोक 143 (padma.6.229.143)

कस्तूरीतिलकोपेता नासाग्रांचित मौक्तिका । स्वर्णकुंभसमप्रख्य पीनोन्नतपयोधरा ।

kastūrītilakopetā nāsāgrāṁcita mauktikā svarṇakuṁbhasamaprakhya pīnoṁnatapayodharā

— कस्तूरी तिलक से युक्त, नासाग्र पर मोती से अंचित, स्वर्णकुंभ समान पुष्ट-उन्नत पयोधर वाली,

श्लोक 144 (padma.6.229.144)

दिव्यकुंकुमलिप्तांगी पद्ममालोपशोभिता । वस्त्रपात्रं मातुलिड्गं दर्पणं हेमपंकजम् ।

divyakuṁkumaliptāṁgī padmamālopaśobhitā vastrapātraṁ mātuliḍgaṁ darpaṇaṁ hemapaṁkajam

— दिव्य कुंकुम से लिप्त देह, पद्ममाला से सुशोभित; वस्त्र, पात्र, मातुलुंग, दर्पण, स्वर्णकमल —

श्लोक 145 (padma.6.229.145)

करपद्मधृता देवी चेतसाभीष्टदायिनी । तस्यैताः सदृशास्तत्र शक्तयः परितो हरेः ।

karapadmadhṛtā devī cetasābhīṣṭadāyinī tasyaitāḥ sadṛśāstatra śaktayaḥ parito hareḥ

— अपने करकमलों में धारण किए, मन-वांछित फल देने वाली देवी। हरि के चतुर्दिक उनके समान शक्तियाँ हैं —

श्लोक 146 (padma.6.229.146)

ईशावास्या महादेवी जाह्नवी कमलालया । सावित्री सर्वगा पद्मा शक्तयः परिकीर्तिताः ।

īśāvāsyā mahādevī jāhnavī kamalālayā sāvitrī sarvagā padmā śaktayaḥ parikīrtitāḥ

ईशावास्या, महादेवी, जाह्नवी, कमलालया, सावित्री, सर्वगा, पद्मा — ये शक्तियाँ कही गई हैं;

श्लोक 147 (padma.6.229.147)

श्रद्धा मेधा धृतिः प्रज्ञा धारणा शांतिरेव च । श्रुतिस्मृतिर्धृतिर्मेधा वृद्धिर्बुद्धिर्मनीषिणी ।

śraddhā medhā dhṛtiḥ prajṁā dhāraṇā śāṁtireva ca śrutismṛtirdhṛtirmedhā vṛddhirbuddhirmanīṣiṇī

श्रद्धा, मेधा, धृति, प्रज्ञा, धारणा, शांति; श्रुति, स्मृति, धृति, मेधा, वृद्धि, मनीषिणी बुद्धि —

श्लोक 148 (padma.6.229.148)

दास्यस्ते ताः श्रियः प्रोक्ताः सर्वकार्यस्य कारिकाः । अनंतवैनतेयादि देवता नित्यकिंकराः ।

dāsyaste tāḥ śriyaḥ proktāḥ sarvakāryasya kārikāḥ anaṁtavainateyādi devatā nityakiṁkarāḥ

— ये श्रियाँ उनकी दासियाँ कही गई हैं, समस्त कार्यों की कारिका। अनंत, वैनतेय आदि देवता, नित्य किंकर,

श्लोक 149 (padma.6.229.149)

साध्या मरुद्गणाश्चैव सेवंते नित्यदेवताः । प्रासादेषु विमानेषु वनेषु नगरेषु च ।

sādhyā marudgaṇāścaiva sevaṁte nityadevatāḥ prāsādeṣu vimāneṣu vaneṣu nagareṣu ca

— साध्य और मरुद्गण, नित्य देवता, उनकी सेवा करते हैं। प्रासादों, विमानों, वनों, नगरों में,

श्लोक 150 (padma.6.229.150)

तत्प्रसादोपलब्धेषु भोगेष्वत्रानुरंजिताः । क्रीडंती सततं नित्या हेयनिष्फलवर्जिताः ।

tatprasādopalabdheṣu bhogeṣvatrānuraṁjitāḥ krīḍaṁtī satataṁ nityā heyaniṣphalavarjitāḥ

— उनकी कृपा से प्राप्त भोगों में अनुरक्त, वे सदा वहाँ क्रीड़ा करते हैं, नित्य, हेय-निष्फल से रहित।

श्लोक 151 (padma.6.229.151)

ये विष्णुमंत्रजप्तारः सततं श्रद्धयान्विताः । ये द्वादशीव्रते युक्तास्तत्पदं यांति तेऽव्ययम् ।

ye viṣṇumaṁtrajaptāraḥ satataṁ śraddhayāṁvitāḥ ye dvādaśīvrate yuktāstatpadaṁ yāṁti te'vyayam

जो सदा श्रद्धायुक्त विष्णुमंत्र का जप करते हैं, जो द्वादशी-व्रत में युक्त हैं, वे उस अव्यय पद को जाते हैं।

श्लोक 152 (padma.6.229.152)

न वेदैर्न च दानैश्च न यज्ञैर्न व्रतैरपि । प्राप्तुं च शक्यं गिरिजे विष्णुलोकं सनातनम् ।

na vedairna ca dānaiśca na yajṁairna vratairapi prāptuṁ ca śakyaṁ girije viṣṇulokaṁ sanātanam

न वेदों से, न दानों से, न यज्ञों से, न व्रतों से भी, हे गिरिजे, वह सनातन विष्णुलोक प्राप्त होता है;

श्लोक 153 (padma.6.229.153)

भक्त्या चानन्यया प्राप्तुं शक्यं विष्णुपदं नृणाम् । तस्मात्संपूजयेन्नित्यं भक्त्या देवं जनार्दनम् ।

bhaktyā cānaṁyayā prāptuṁ śakyaṁ viṣṇupadaṁ nṛṇām tasmātsaṁpūjayeṁnityaṁ bhaktyā devaṁ janārdanam

अनन्य भक्ति से ही मनुष्यों को विष्णुपद प्राप्त होता है। इसलिए भक्तिपूर्वक नित्य देव जनार्दन की—

श्लोक 154 (padma.6.229.154)

कीर्तनं नाममात्रं च ध्यायन्मंत्रं जपेत्सदा । जुहुयात्तर्पयेद्भक्त्या सर्वगं सर्वकामदम् ।

kīrtanaṁ nāmamātraṁ ca dhyāyaṁmaṁtraṁ japetsadā juhuyāttarpayedbhaktyā sarvagaṁ sarvakāmadam

— कीर्तन, नाममात्र से, ध्यान करते हुए सदा मंत्र जपे; भक्तिपूर्वक सर्वगामी, सर्वकामद देव को होम-तर्पण अर्पित करे।

श्लोक 155 (padma.6.229.155)

एवमुक्तं तृतीयं तु व्यूहं तु परमात्मनः । स्वरूपं तव सुश्रोणि यथाप्रोक्तं पुरातनैः ।

evamuktaṁ tṛtīyaṁ tu vyūhaṁ tu paramātmanaḥ svarūpaṁ tava suśroṇi yathāproktaṁ purātanaiḥ

इस प्रकार परमात्मा का यह तृतीय व्यूह कहा गया — उसका स्वरूप, हे सुश्रोणि, जैसा पूर्वजों ने कहा।

श्लोक 156 (padma.6.229.156)

अतः परं प्रवक्ष्यामि चतुर्थं व्यूहमुत्तमम् । दिवौकसां रक्षणार्थं दुग्धाब्धौ परमेश्वरः ।

ataḥ paraṁ pravakṣyāmi caturthaṁ vyūhamuttamam divaukasāṁ rakṣaṇārthaṁ dugdhābdhau parameśvaraḥ

अब इससे आगे उत्तम चतुर्थ व्यूह बताता हूँ। देवताओं की रक्षा हेतु परमेश्वर क्षीरसागर में,

श्लोक 157 (padma.6.229.157)

सुधांशुकोटिसंकाशः सहस्राक्षेण शोभिते । पुरंदरसयूथैस्तु च्छादिते दुग्धवारिधौ ।

sudhāṁśukoṭisaṁkāśaḥ sahasrākṣeṇa śobhite puraṁdarasayūthaistu cchādite dugdhavāridhau

— करोड़ों चंद्रमाओं समान प्रभा वाले, सहस्राक्ष शेष से सुशोभित, इंद्र के समूहों से आच्छादित उस क्षीरसागर में —

श्लोक 158 (padma.6.229.158)

तस्मिन्ननंतपर्यंके शेतेऽसौ विस्तृते शुभे । दिव्यासनसमासीनः पद्मनाभोऽच्युतो हरिः ।

tasmiṁnanaṁtaparyaṁke śete'sau vistṛte śubhe divyāsanasamāsīnaḥ padmanābho'cyuto hariḥ

— उस विस्तृत, शुभ अनंत-शय्या पर वे शयन करते हैं, कमलनाभ, अच्युत हरि,

श्लोक 159 (padma.6.229.159)

नीलजीमूतसंकाशः पद्मपत्रायतेक्षणः । विवस्वत्कोटिसंकाश किरीटेन विराजितः ।

nīlajīmūtasaṁkāśaḥ padmapatrāyatekṣaṇaḥ vivasvatkoṭisaṁkāśa kirīṭena virājitaḥ

— दिव्य आसन पर विराजमान, नीलमेघ समान श्याम, कमलपत्र समान दीर्घ नेत्र वाले, करोड़ों सूर्यों समान प्रभा वाले मुकुट से सुशोभित,

श्लोक 160 (padma.6.229.160)

नानारत्नोज्ज्वलद्दिव्यं कुंडलाभ्यां विराजितः । बालार्कसदृशज्योत्स्ना पीतवस्त्रेण वेष्टितः ।

nānāratnojjvaladdivyaṁ kuṁḍalābhyāṁ virājitaḥ bālārkasadṛśajyotsnā pītavastreṇa veṣṭitaḥ

— नाना रत्नों से उज्ज्वल दो कुंडलों से सुशोभित, बालसूर्य समान द्युति वाले पीतवस्त्र से आवृत,

श्लोक 161 (padma.6.229.161)

स्फुरद्रक्तारविंदाभ हस्तांघ्रितलशोभितः । हारकेयूरकटकैरंगुलीयैर्विराजितः ।

sphuradraktāraviṁdābha hastāṁghritalaśobhitaḥ hārakeyūrakaṭakairaṁgulīyairvirājitaḥ

— स्फुरित लाल कमल समान हस्त-चरणतल से सुशोभित, हार-केयूर-कटक-अंगूठियों से युक्त,

श्लोक 162 (padma.6.229.162)

शंखचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्तैर्विभूषितः । सुपुष्पफलशाखाढ्यकल्पवृक्षैर्विराजितः ।

śaṁkhacakragadāśārṁgakhaḍgahastairvibhūṣitaḥ supuṣpaphalaśākhāḍhyakalpavṛkṣairvirājitaḥ

— शंख-चक्र-गदा-शार्ङ्ग-खड्ग धारण किए हाथों से विभूषित, सुंदर पुष्प-फल-शाखाओं से समृद्ध कल्पवृक्षों से सुशोभित,

श्लोक 163 (padma.6.229.163)

विश्वस्य जन्ममरण नाभिपंकजशोभितः । हरिचंदनलिप्तांगः सर्वाभरणभूषितः ।

viśvasya jaṁmamaraṇa nābhipaṁkajaśobhitaḥ haricaṁdanaliptāṁgaḥ sarvābharaṇabhūṣitaḥ

— विश्व के जन्म-मरण के नाभिकमल से सुशोभित, हरिचंदन-लिप्त देह, सभी आभूषणों से भूषित,

श्लोक 164 (padma.6.229.164)

मंदारपारिजातादि दिव्यपुष्पैर्मनोरमैः । सुस्निग्धनीलकुटिलकबरीकृतकेशवान् ।

maṁdārapārijātādi divyapuṣpairmanoramaiḥ susnigdhanīlakuṭilakabarīkṛtakeśavān

— मंदार-पारिजात आदि मनोरम दिव्य पुष्पों से, स्निग्ध नील घुँघराले गुंथे केशों से युक्त,

श्लोक 165 (padma.6.229.165)

श्लक्ष्णोन्नतसुनासांस जानुयुग्मविराजितः । मणिविद्रुमशाखाढ्य नूपुराङ्घ्रिविराजितः ।

ślakṣṇoṁnatasunāsāṁsa jānuyugmavirājitaḥ maṇividrumaśākhāḍhya nūpurāṁghrivirājitaḥ

— चिकनी, ऊँची, सुंदर नासिका और घुटनों की जोड़ी से सुशोभित, मणि-प्रवाल शाखाओं से युक्त नूपुर-चरणों से सुशोभित,

श्लोक 166 (padma.6.229.166)

अकलंकितचंद्राभ नखपंक्तिविराजितः । अशोकपुष्पसंकाश रक्तोष्ठमुखपंकजः ।

akalaṁkitacaṁdrābha nakhapaṁktivirājitaḥ aśokapuṣpasaṁkāśa raktoṣṭhamukhapaṁkajaḥ

— निष्कलंक चंद्रमा समान नखपंक्ति से सुशोभित, अशोक पुष्प समान लाल अधरों वाले मुखकमल,

श्लोक 167 (padma.6.229.167)

अनर्घ्यमुक्तिकाभास दंतपंक्तिविराजितः । संपूर्णचंद्रप्रतिम स्मितवक्त्रसुशोभितः ।

anarghyamuktikābhāsa daṁtapaṁktivirājitaḥ saṁpūrṇacaṁdrapratima smitavaktrasuśobhitaḥ

— अमूल्य मोतियों समान दंतपंक्ति से सुशोभित, पूर्णचंद्र समान मुस्कुराते मुख से सुशोभित;

श्लोक 168 (padma.6.229.168)

आरूढयौवनः श्रीमान्कोमलावयवोज्ज्वलः । शरण्यः सर्वलोकानां सर्वलोकफलप्रदः ।

ārūḍhayauvanaḥ śrīmāṁkomalāvayavojjvalaḥ śaraṁyaḥ sarvalokānāṁ sarvalokaphalapradaḥ

श्रीमान, यौवन-आरूढ़, कोमल अंगों से उज्ज्वल, सभी लोकों की शरण, सभी लोकों को फल देने वाले।

श्लोक 169 (padma.6.229.169)

सदृशी तस्य देवी तु रूपशीलगुणादिभिः । तप्तकांचनसंकाशा तप्तकांचनभूषणा ।

sadṛśī tasya devī tu rūpaśīlaguṇādibhiḥ taptakāṁcanasaṁkāśā taptakāṁcanabhūṣaṇā

उनके रूप-शील-गुणों में समान उनकी देवी, तप्त कांचन समान वर्ण वाली, तप्त कांचन के आभूषणों से युक्त,

श्लोक 170 (padma.6.229.170)

तरुणी रूपलावण्या कान्तिशीलगुणान्विता । दुग्धाब्धिफेनसंकाश शुभवस्त्रेण वेष्टिता ।

taruṇī rūpalāvaṁyā kāṁtiśīlaguṇāṁvitā dugdhābdhiphenasaṁkāśa śubhavastreṇa veṣṭitā

— युवती, रूप-लावण्य से युक्त, कांति-शील-गुण से संपन्न, क्षीरसागर के फेन समान शुभ वस्त्र से आवृत,

श्लोक 171 (padma.6.229.171)

मंदारकेतकी जाती पुष्पार्चितशिरोरुहा । कस्तूरीतिलकोपेता रत्नसीमंतशोभिता ।

maṁdāraketakī jātī puṣpārcitaśiroruhā kastūrītilakopetā ratnasīmaṁtaśobhitā

— मंदार-केतकी-जाती पुष्पों से अर्चित केशों वाली, कस्तूरी तिलक से युक्त, रत्नों से सुशोभित सीमंत वाली,

श्लोक 172 (padma.6.229.172)

नानावर्णसुशोभाढ्या कर्णभूषणभूषिता । प्रवालसदृशज्योत्स्ना रक्तधारसुविस्मिता ।

nānāvarṇasuśobhāḍhyā karṇabhūṣaṇabhūṣitā pravālasadṛśajyotsnā raktadhārasuvismitā

— नानावर्ण से समृद्ध, कर्णभूषणों से युक्त, प्रवाल समान द्युति, अधरों की लालिमा से विस्मयकारी,

श्लोक 173 (padma.6.229.173)

मत्तभृङ्गोपमैः स्निग्धैरलकैः सुविराजिता । तनुमध्या विशालाक्षी पीनोन्नतपयोधरा ।

mattabhṛṁgopamaiḥ snigdhairalakaiḥ suvirājitā tanumadhyā viśālākṣī pīnoṁnatapayodharā

— मत्त भ्रमरों समान स्निग्ध अलकों से सुशोभित, तनुमध्या, विशालाक्षी, पुष्ट-उन्नत पयोधरा,

श्लोक 174 (padma.6.229.174)

चतुर्हस्तैर्विराजंती सर्वाभरणभूषिता । उद्बाहुभ्यां धृता देवी हेमपद्मयुगं शुभम् ।

caturhastairvirājaṁtī sarvābharaṇabhūṣitā udbāhubhyāṁ dhṛtā devī hemapadmayugaṁ śubham

— चार हाथों से सुशोभित, सभी आभूषणों से भूषित; ऊर्ध्व भुजाओं से देवी ने सुंदर स्वर्णकमल-युगल धारण किया,

श्लोक 175 (padma.6.229.175)

इतराभ्यां समाश्लिष्य भर्तारं निबिडं स्थिता । आलोकयंती सततं त्रिदशांश्च कटाक्षकै ।

itarābhyāṁ samāśliṣya bhartāraṁ nibiḍaṁ sthitā ālokayaṁtī satataṁ tridaśāṁśca kaṭākṣakai

— और अन्य दो से अपने पति को दृढ़ आलिंगन किए, कटाक्षों से निरंतर त्रिदेवगणों को देखती हुई।

श्लोक 176 (padma.6.229.176)

निरीक्षितास्तया देव्या धन्यास्ते सततं शिवे । तत्र देवा विमानस्थाः सिद्धचारणकिन्नराः ।

nirīkṣitāstayā devyā dhaṁyāste satataṁ śive tatra devā vimānasthāḥ siddhacāraṇakiṁnarāḥ

उस देवी द्वारा देखे गए सदा धन्य होते हैं, हे शिवे। वहाँ विमानस्थ देवता, सिद्ध, चारण, किन्नर,

श्लोक 177 (padma.6.229.177)

गायंति सततं देवीमानंदाश्रुपरिप्लुताः । दैतेयैर्बाध्यमानैस्तु ब्रह्मरुद्रादिभिः सुरैः ।

gāyaṁti satataṁ devīmānaṁdāśrupariplutāḥ daiteyairbādhyamānaistu brahmarudrādibhiḥ suraiḥ

— आनंदाश्रुओं में डूबे, निरंतर देवी का गुणगान करते हैं। जब असुरों से पीड़ित ब्रह्मा-रुद्र आदि देवताओं ने—

श्लोक 178 (padma.6.229.178)

संस्तूयमानस्तत्रेशो देवानामभयं ददौ । देवानामभयं दत्त्वा सर्वदेवेश्वरो हरिः ।

saṁstūyamānastatreśo devānāmabhayaṁ dadau devānāmabhayaṁ dattvā sarvadeveśvaro hariḥ

— वहाँ ईश की स्तुति की, उन्होंने देवताओं को अभय प्रदान किया। देवताओं को अभय देकर सर्वदेवेश्वर हरि—

श्लोक 179 (padma.6.229.179)

राक्षसान्हंतुमारेभे जगत्संरक्षणाय वै । एवं चतुर्थं व्यूहं तु हरेः प्रोक्तं तवानघे ।

rākṣasāṁhaṁtumārebhe jagatsaṁrakṣaṇāya vai evaṁ caturthaṁ vyūhaṁ tu hareḥ proktaṁ tavānaghe

— जगत् की रक्षा हेतु राक्षसों का वध करने लगे। इस प्रकार, हे अनघे, हरि का यह चतुर्थ व्यूह आपको बताया गया।

श्लोक 180 (padma.6.229.180)

किमन्यच्छ्रोतुकामासीत्तद्ब्रवीमि वरानने । धन्यासि कृतकृत्यासि भक्तासि पुरुषोत्तमे ।

kimaṁyacchrotukāmāsīttadbravīmi varānane dhaṁyāsi kṛtakṛtyāsi bhaktāsi puruṣottame

और क्या सुनने की इच्छा हो, हे वरानने, वह बताइए। आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, पुरुषोत्तम की भक्त हैं।

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