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उत्तर खण्ड · अध्याय 23

तुलसी-शालग्राम माहात्म्य

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (padma.6.23.1)

महादेवउवाच ।शृणु नारद वक्ष्यामि माहात्म्यं तुलसीभवम् । यच्छ्रुत्वा मुच्यते पापादाजन्ममरणांतिकात्

mahādevauvāca śṛṇu nārada vakṣyāmi māhātmyaṁ tulasībhavam yacchrutvā mucyate pāpādājanmamaraṇāṁtikāt

महादेव ने कहा — हे नारद! सुनो, मैं तुलसी से उत्पन्न महिमा का वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक के पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (padma.6.23.2)

पत्रं पुष्पं फलं मूलं शाखा त्वक्स्कंधसंज्ञितम् । तुलसी संभवं सर्वं पावनं मृत्तिकादिकम्

patraṁ puṣpaṁ phalaṁ mūlaṁ śākhā tvakskaṁdhasaṁjñitam tulasī saṁbhavaṁ sarvaṁ pāvanaṁ mṛttikādikam

पत्ता, फूल, फल, जड़, शाखा, छाल और तना — तुलसी से उत्पन्न सब कुछ पवित्र है, यहाँ तक कि उसकी मिट्टी भी।

श्लोक 3 (padma.6.23.3)

शरीरं दह्यते येषां तुलसीकाष्ठवह्निना । दत्वा च तुलसीकाष्ठं सर्वांगेषु मृतस्य वै

śarīraṁ dahyate yeṣāṁ tulasīkāṣṭhavahninā datvā ca tulasīkāṣṭhaṁ sarvāṁgeṣu mṛtasya vai

जिनका शरीर तुलसी-काष्ठ की अग्नि से जलाया जाता है, और मृतक के सभी अंगों पर तुलसी-काष्ठ रखकर,

श्लोक 4 (padma.6.23.4)

पश्चाद्यः कुरुते दाहं सोऽपि पापात्प्रमुच्यते । मरणे यस्य संप्राप्तं कीर्तनं स्मरणं हरेः

paścādyaḥ kurute dāhaṁ so'pi pāpātpramucyate maraṇe yasya saṁprāptaṁ kīrtanaṁ smaraṇaṁ hareḥ

जो व्यक्ति बाद में दाह-संस्कार करता है, वह भी पाप से मुक्त हो जाता है। जिसकी मृत्यु के समय हरि का कीर्तन-स्मरण हुआ हो,

श्लोक 5 (padma.6.23.5)

तुलसीदारुणा दाहो न तस्य पुनरावृतिः । यद्येकं तुलसीकाष्ठं मध्ये काष्ठशतस्य हि

tulasīdāruṇā dāho na tasya punarāvṛtiḥ yadyekaṁ tulasīkāṣṭhaṁ madhye kāṣṭhaśatasya hi

तुलसी-काष्ठ से दाह होने पर उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यदि सौ काष्ठों के बीच एक भी तुलसी-काष्ठ हो,

श्लोक 6 (padma.6.23.6)

दाहकाले भवेन्मुक्तिः कोटिपापायुतस्य च । गंगांभसाभिषेकेण यांति पुण्यानि पुण्यताम्

dāhakāle bhavenmuktiḥ koṭipāpāyutasya ca gaṁgāṁbhasābhiṣekeṇa yāṁti puṇyāni puṇyatām

तो दाह के समय करोड़ों पापों वाले व्यक्ति को भी मुक्ति मिल जाती है। जैसे गंगाजल के अभिषेक से पुण्य और भी पुण्यमय हो जाते हैं,

श्लोक 7 (padma.6.23.7)

तुलसीकाष्ठमिश्राणि यांति दारूणि पुण्यताम् । तुलसीकाष्ठसंमिश्रा यावत्प्रज्वलते चिता

tulasīkāṣṭhamiśrāṇi yāṁti dārūṇi puṇyatām tulasīkāṣṭhasaṁmiśrā yāvatprajvalate citā

वैसे ही तुलसी-काष्ठ मिलने से साधारण लकड़ियाँ भी पुण्यमय बन जाती हैं। जब तक तुलसी-काष्ठ मिली हुई चिता जलती रहती है,

श्लोक 8 (padma.6.23.8)

दह्यंति तस्य पापानि कल्पकोटिकृतानि वै । दह्यमानं नरं दृष्ट्वा तुलसीकाष्ठवह्निना

dahyaṁti tasya pāpāni kalpakoṭikṛtāni vai dahyamānaṁ naraṁ dṛṣṭvā tulasīkāṣṭhavahninā

तब तक उस व्यक्ति के करोड़ों कल्पों के पाप जलते रहते हैं। तुलसी-काष्ठ की अग्नि से जलते हुए मनुष्य को देखकर —

श्लोक 9 (padma.6.23.9)

नयंति तं विष्णुदूता न च वै यमकिंकराः । जन्मकोटिसहस्रैस्तु मुक्तो याति जनार्दनम्

nayaṁti taṁ viṣṇudūtā na ca vai yamakiṁkarāḥ janmakoṭisahasraistu mukto yāti janārdanam

विष्णु के दूत ही उसे ले जाते हैं, यमदूत नहीं। वह मुक्त होकर, मानो हज़ार करोड़ जन्मों के बाद, जनार्दन को प्राप्त होता है।

श्लोक 10 (padma.6.23.10)

दह्यंते ये नरा लोके तुलसीकाष्ठवह्निना । तान्विमानस्थितान्देवाः क्षिपंति कुसुमांजलिम्

dahyaṁte ye narā loke tulasīkāṣṭhavahninā tānvimānasthitāndevāḥ kṣipaṁti kusumāṁjalim

जो मनुष्य इस लोक में तुलसी-काष्ठ की अग्नि से दग्ध होते हैं, विमानों में खड़े देवता उन पर पुष्पांजलि बरसाते हैं।

श्लोक 11 (padma.6.23.11)

नृत्यंत्यप्सरसः सर्वा गीतं गायंति गायकाः । जायंते वीक्ष्य तं विष्णुः संतुष्टः शंभुना सह

nṛtyaṁtyapsarasaḥ sarvā gītaṁ gāyaṁti gāyakāḥ jāyaṁte vīkṣya taṁ viṣṇuḥ saṁtuṣṭaḥ śaṁbhunā saha

सभी अप्सराएँ नाचती हैं, गायक गीत गाते हैं; उसे देखकर विष्णु, शंभु सहित, अत्यंत संतुष्ट होते हैं,

श्लोक 12 (padma.6.23.12)

गृहीत्वा तं करे शौरिर्गृहं नीत्वास्य चांगतः । मार्जयेत्सर्वपापानि पश्यतां त्रिदिवौकसाम्

gṛhītvā taṁ kare śaurirgṛhaṁ nītvāsya cāṁgataḥ mārjayetsarvapāpāni paśyatāṁ tridivaukasām

और शौरि (विष्णु) उसे हाथ पकड़कर अपने ही धाम ले जाते हैं, देवताओं के देखते-देखते उसके सभी पाप मिटाते हुए।

श्लोक 13 (padma.6.23.13)

महोत्सवं कारयित्वा जयशब्दपुरःसरम् । ज्वलते यत्र चाज्येन तुलसीकाष्ठपावकः

mahotsavaṁ kārayitvā jayaśabdapuraḥsaram jvalate yatra cājyena tulasīkāṣṭhapāvakaḥ

जय-जयकार के साथ महोत्सव कराकर — जहाँ घी से युक्त तुलसी-काष्ठ की अग्नि जलती है,

श्लोक 14 (padma.6.23.14)

अग्न्यगारे श्मशाने वा दह्यते पातकं नृणाम् । होमं कुर्वंति ये विप्रास्तुलसीकाष्ठवह्निना । सिक्ते सिक्ते तिले वापि अग्निष्टोमफलं लभेत्

agnyagāre śmaśāne vā dahyate pātakaṁ nṛṇām homaṁ kurvaṁti ye viprāstulasīkāṣṭhavahninā sikte sikte tile vāpi agniṣṭomaphalaṁ labhet

चाहे अग्नि-गृह में हो या श्मशान में, मनुष्यों का पाप वहाँ जल जाता है। जो ब्राह्मण तुलसी-काष्ठ की अग्नि से होम करते हैं, बार-बार तिल छिड़ककर, उन्हें अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 15 (padma.6.23.15)

यो ददाति हरेर्धूपं तुलसीकाष्ठसंभवम् । शतक्रतुसमं पुण्यं लभते गोशतं फलम्

yo dadāti harerdhūpaṁ tulasīkāṣṭhasaṁbhavam śatakratusamaṁ puṇyaṁ labhate gośataṁ phalam

जो तुलसी-काष्ठ से बना धूप हरि को अर्पित करता है, उसे सौ यज्ञों के समान पुण्य और सौ गायों के दान का फल मिलता है।

श्लोक 16 (padma.6.23.16)

नैवेद्यं पच्यते यस्तु तुलसीकाष्ठवह्निना । मेरुतुल्यं भवेद्दत्तं तदन्नं केशवस्य हि

naivedyaṁ pacyate yastu tulasīkāṣṭhavahninā merutulyaṁ bhaveddattaṁ tadannaṁ keśavasya hi

जो तुलसी-काष्ठ की अग्नि से नैवेद्य पकाता है, वह अन्न केशव को अर्पित होने पर मेरु पर्वत के समान महान फलदायी हो जाता है।

श्लोक 17 (padma.6.23.17)

तुलसीपावकेनाथ यो दीपं कुरुते हरेः । दीपलक्षसहस्राणां पुण्यं स लभते फलम्

tulasīpāvakenātha yo dīpaṁ kurute hareḥ dīpalakṣasahasrāṇāṁ puṇyaṁ sa labhate phalam

तुलसी की अग्नि से जो हरि के लिए दीप जलाता है, उसे लाखों-हज़ारों दीपों के दान का पुण्य-फल मिलता है।

श्लोक 18 (padma.6.23.18)

न तेन सदृशो लोके वैष्णवो भुवि दृश्यते । यः प्रयच्छति कृष्णस्य तुलसीकाष्ठचंदनम्

na tena sadṛśo loke vaiṣṇavo bhuvi dṛśyate yaḥ prayacchati kṛṣṇasya tulasīkāṣṭhacaṁdanam

संसार में उसके समान कोई वैष्णव नहीं दिखाई देता, जो कृष्ण को तुलसी-काष्ठ का चंदन अर्पित करता है —

श्लोक 19 (padma.6.23.19)

स जायते कृपापात्रं विष्णोर्वाडवसत्तम

sa jāyate kṛpāpātraṁ viṣṇorvāḍavasattama

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! वह विष्णु की कृपा का पात्र बन जाता है।

श्लोक 20 (padma.6.23.20)

तुलसीदारुजातेन चंदनेन कलौ हरिम् । विलिप्य भक्तितो नित्यं रमते हरिसन्निधौ

tulasīdārujātena caṁdanena kalau harim vilipya bhaktito nityaṁ ramate harisannidhau

तुलसी-काष्ठ से बने चंदन से कलियुग में हरि का भक्तिपूर्वक नित्य विलेपन करने वाला सदा हरि के समीप ही रमण करता है।

श्लोक 21 (padma.6.23.21)

तुलसीपंकलिप्तांगः कुरुते विष्णुपूजनम् । पूजाशतदिनैकाह्ना लभ्यते गोशतं फलम्

tulasīpaṁkaliptāṁgaḥ kurute viṣṇupūjanam pūjāśatadinaikāhnā labhyate gośataṁ phalam

तुलसी की मिट्टी से लिपे शरीर वाला जो विष्णु-पूजन करता है, उसे एक ही दिन की पूजा से सौ दिनों की पूजा के समान फल और सौ गायों का फल मिलता है।

श्लोक 22 (padma.6.23.22)

विलेपार्थे तु कृष्णस्य तुलसीकाष्ठचंदनम् । मंदिरे तिष्ठते यावत्तावत्पुण्यफलं शृणु

vilepārthe tu kṛṣṇasya tulasīkāṣṭhacaṁdanam maṁdire tiṣṭhate yāvattāvatpuṇyaphalaṁ śṛṇu

जब तक कृष्ण के विलेपन के लिए तुलसी-काष्ठ का चंदन मंदिर में रहता है, तब तक का पुण्य-फल सुनो —

श्लोक 23 (padma.6.23.23)

तिलप्रस्थाष्टकं दत्वा यत्पुण्यं प्राप्नुयान्नरः । तत्फलं जायते पुंसां प्रसादाच्चक्रपाणिनः

tilaprasthāṣṭakaṁ datvā yatpuṇyaṁ prāpnuyānnaraḥ tatphalaṁ jāyate puṁsāṁ prasādāccakrapāṇinaḥ

आठ प्रस्थ तिल दान करने से मनुष्य को जो पुण्य मिलता है, वही फल चक्रपाणि की कृपा से मनुष्यों को मिलता है।

श्लोक 24 (padma.6.23.24)

यो ददाति पितॄणां तु पिंडे तुलसिसंभवम् । दलं संजायते तृप्तिः पत्रे पत्रे शताब्दिका

yo dadāti pitṝṇāṁ tu piṁḍe tulasisaṁbhavam dalaṁ saṁjāyate tṛptiḥ patre patre śatābdikā

जो पितरों के पिंड में तुलसी से उत्पन्न एक पत्ता भी अर्पित करता है, उस प्रत्येक पत्ते से सौ वर्षों तक की तृप्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 25 (padma.6.23.25)

तुलसीमूलमृत्स्नैव स्नानं कुर्याद्विशेषतः । तेन तीर्थे कृतं स्नानं यावच्चांगे च मृत्तिका

tulasīmūlamṛtsnaiva snānaṁ kuryādviśeṣataḥ tena tīrthe kṛtaṁ snānaṁ yāvaccāṁge ca mṛttikā

विशेष रूप से तुलसी की जड़ की मिट्टी से स्नान करना चाहिए; जब तक वह मिट्टी शरीर पर रहती है, तब तक वह तीर्थ में किए स्नान के समान है।

श्लोक 26 (padma.6.23.26)

तदीय यातु मंजर्या पूजनं च करोति यः । नानापुष्पैः कृता पूजा यावच्चंद्रदिवाकरौ

tadīya yātu maṁjaryā pūjanaṁ ca karoti yaḥ nānāpuṣpaiḥ kṛtā pūjā yāvaccaṁdradivākarau

जो उसकी मंजरी से पूजा करता है, उसकी विविध फूलों से की गई पूजा सूर्य-चंद्र के रहने तक के समान फल देने वाली होती है।

श्लोक 27 (padma.6.23.27)

यस्मिन्गृहेऽवतिष्ठेत तुलसी वृक्षवाटिका । दर्शनात्स्पर्शनाच्चैव ब्रह्महत्यादिपातकम् । तत्सर्वं विलयं याति दर्शनेनैव नारद

yasmingṛhe'vatiṣṭheta tulasī vṛkṣavāṭikā darśanātsparśanāccaiva brahmahatyādipātakam tatsarvaṁ vilayaṁ yāti darśanenaiva nārada

जिस घर में तुलसी के वृक्षों की वाटिका होती है, उसके दर्शन और स्पर्श मात्र से ब्रह्महत्या आदि पाप — हे नारद! वह सब उसी दर्शन से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 28 (padma.6.23.28)

महादेव उवाच ।अथान्यत्ते प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः । न कस्यापि च कथितं शृणु देवर्षिसत्तम

mahādeva uvāca athānyatte pravakṣyāmi śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ na kasyāpi ca kathitaṁ śṛṇu devarṣisattama

महादेव ने कहा — अब मैं तुम्हें एक और बात बताऊँगा, एकाग्र मन से सुनो; यह किसी और से नहीं कहा गया है — सुनो, हे देवर्षिश्रेष्ठ!

श्लोक 29 (padma.6.23.29)

यत्र यत्र गृहे ग्रामे वने वा तुलसी भवेत् । तत्र तत्र जगत्स्वामी प्रीतात्मा च वसेद्धरिः

yatra yatra gṛhe grāme vane vā tulasī bhavet tatra tatra jagatsvāmī prītātmā ca vaseddhariḥ

जहाँ भी घर में, गाँव में या वन में तुलसी हो, वहाँ जगत के स्वामी हरि प्रसन्न मन से निवास करते हैं।

श्लोक 30 (padma.6.23.30)

गृहे तस्मिन्न दारिद्र्यं नायोगो बंधुसंभवः । न दुःखं न भयं रोगस्तुलसी यत्र तिष्ठति

gṛhe tasminna dāridryaṁ nāyogo baṁdhusaṁbhavaḥ na duḥkhaṁ na bhayaṁ rogastulasī yatra tiṣṭhati

उस घर में न दरिद्रता होती है, न बंधुजनों का अनिष्ट होता है; जहाँ तुलसी होती है, वहाँ न दुःख होता है, न भय, न रोग।

श्लोक 31 (padma.6.23.31)

सर्वत्र तुलसी पुण्या पुण्यक्षेत्रे विशेषतः । संनिधौ तस्य देवस्य रोपणात्पृथिवीतले

sarvatra tulasī puṇyā puṇyakṣetre viśeṣataḥ saṁnidhau tasya devasya ropaṇātpṛthivītale

तुलसी सर्वत्र पुण्यमय है, परंतु पुण्य-क्षेत्र में विशेष रूप से; उस देवता की उपस्थिति में, पृथ्वी पर उसे रोपने से —

श्लोक 32 (padma.6.23.32)

तेषां विष्णुपदं नित्यं तुलस्यारोपणे कृते । उत्पादान्दारुणान्रोगान्दुर्निमित्तान्यनेकशः । तुलस्याभ्यर्चिते भक्त्या हंत शांतिकरो हरिः

teṣāṁ viṣṇupadaṁ nityaṁ tulasyāropaṇe kṛte utpādāndāruṇānrogāndurnimittānyanekaśaḥ tulasyābhyarcite bhaktyā haṁta śāṁtikaro hariḥ

तुलसी रोपने पर वह स्थान सदा विष्णु का ही पद बन जाता है। भीषण उत्पात, रोग और अनेक अपशकुनों को — भक्तिपूर्वक तुलसी की पूजा किए जाने पर हरि शांत कर देते हैं।

श्लोक 33 (padma.6.23.33)

तुलसीगंधमाघ्राय यत्र गच्छति मारुतः । दिशो दश च ताः पूता भूतग्रामश्चतुर्विधः

tulasīgaṁdhamāghrāya yatra gacchati mārutaḥ diśo daśa ca tāḥ pūtā bhūtagrāmaścaturvidhaḥ

जहाँ भी वायु तुलसी की सुगंध सूँघकर जाती है, वे सभी दस दिशाएँ पवित्र हो जाती हैं, और चारों प्रकार के प्राणी-समूह भी।

श्लोक 34 (padma.6.23.34)

यस्मिन्गृहे मुनिश्रेष्ठ तुलसीमूलमृत्तिका । सर्वदा तत्र तिष्ठंति देवताश्च शिवो हरिः

yasmingṛhe muniśreṣṭha tulasīmūlamṛttikā sarvadā tatra tiṣṭhaṁti devatāśca śivo hariḥ

हे मुनिश्रेष्ठ! जिस घर में तुलसी की जड़ की मिट्टी होती है, वहाँ सदा देवता, शिव और हरि निवास करते हैं।

श्लोक 35 (padma.6.23.35)

तुलसीवनजा छाया यत्र यत्र भवेद्दिवज । तर्पणं कुरुते तत्र पितॄणां दत्तमक्षयम्

tulasīvanajā chāyā yatra yatra bhaveddivaja tarpaṇaṁ kurute tatra pitṝṇāṁ dattamakṣayam

हे द्विज! जहाँ भी तुलसी के वन की छाया पड़ती है, वहाँ किया गया पितरों का तर्पण अक्षय हो जाता है।

श्लोक 36 (padma.6.23.36)

तस्य मूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः । मंजर्यां वसते रुद्रः तुलसी तेन पावनी

tasya mūle sthito brahmā madhye devo janārdanaḥ maṁjaryāṁ vasate rudraḥ tulasī tena pāvanī

उसकी जड़ में ब्रह्मा स्थित हैं, मध्य में देव जनार्दन, और मंजरी में रुद्र निवास करते हैं — इसीलिए तुलसी पावन है।

श्लोक 37 (padma.6.23.37)

विना यस्तुलसीं कुर्यात्संध्याकाले तु मार्जनम् । तत्सर्वं राक्षसहृतं नरकं च प्रयच्छति

vinā yastulasīṁ kuryātsaṁdhyākāle tu mārjanam tatsarvaṁ rākṣasahṛtaṁ narakaṁ ca prayacchati

जो तुलसी के बिना संध्याकाल में शुद्धि-कर्म करता है, वह सब राक्षसों द्वारा हर लिया जाता है और नरक देता है।

श्लोक 38 (padma.6.23.38)

तुलसीपत्रगलितं तोयं यः शिरसावहेत् । गंगाफलमवाप्नोति शतधेनुफलं लभेत्

tulasīpatragalitaṁ toyaṁ yaḥ śirasāvahet gaṁgāphalamavāpnoti śatadhenuphalaṁ labhet

जो तुलसी-पत्ते से टपके जल को अपने सिर पर धारण करता है, उसे गंगा के समान फल और सौ गायों के दान का फल मिलता है।

श्लोक 39 (padma.6.23.39)

शिवालये विशेषेण रोपयेत्तुलसीं यदि । बीजसंख्या वसेत्स्वर्गे प्रत्येकं युगसंख्यया

śivālaye viśeṣeṇa ropayettulasīṁ yadi bījasaṁkhyā vasetsvarge pratyekaṁ yugasaṁkhyayā

यदि कोई शिव-मंदिर में विशेष रूप से तुलसी रोपे, तो वह उतने ही युगों तक स्वर्ग में निवास करता है जितने उसमें बीज हों।

श्लोक 40 (padma.6.23.40)

उमया तु पुरा देवि शंकरार्थं हिमालये । रोपिताः शतवृक्षास्तु तुलस्याः प्रणतोऽस्म्यहम्

umayā tu purā devi śaṁkarārthaṁ himālaye ropitāḥ śatavṛkṣāstu tulasyāḥ praṇato'smyaham

हे देवी! पहले हिमालय पर उमा ने शंकर के लिए सौ तुलसी-वृक्ष रोपे थे — मैं उस तुलसी को प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 41 (padma.6.23.41)

पर्वण्यवसरे यस्तु श्रावणे चाथ रोपयेत् । संक्रांतिदिवसे चैव तुलसी चातिपुण्यदा

parvaṇyavasare yastu śrāvaṇe cātha ropayet saṁkrāṁtidivase caiva tulasī cātipuṇyadā

जो पर्व के अवसर पर, श्रावण मास में, या संक्रांति के दिन तुलसी रोपता है, उसे तुलसी अत्यंत पुण्य देती है।

श्लोक 42 (padma.6.23.42)

तुलसीं पूजयेन्नित्यं दरिद्र ईश्वरो भवेत् । सर्वसिद्धिकरामूर्तिः कृष्णः कीर्तिं ददाति च

tulasīṁ pūjayennityaṁ daridra īśvaro bhavet sarvasiddhikarāmūrtiḥ kṛṣṇaḥ kīrtiṁ dadāti ca

जो नित्य तुलसी की पूजा करता है, वह दरिद्र भी होकर स्वामी बन जाता है; सर्व-सिद्धि देने वाली मूर्ति कृष्ण उसे कीर्ति भी देते हैं।

श्लोक 43 (padma.6.23.43)

शालग्रामशिला यत्र तत्र संनिहितो हरिः । तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्यां शताधिकम्

śālagrāmaśilā yatra tatra saṁnihito hariḥ tatra snānaṁ ca dānaṁ ca vārāṇasyāṁ śatādhikam

जहाँ शालग्राम-शिला होती है, वहाँ हरि सचमुच उपस्थित हैं; वहाँ किया गया स्नान और दान वाराणसी से सौ गुना अधिक फलदायी है,

श्लोक 44 (padma.6.23.44)

कुरुक्षेत्रं प्रयागं च नैमिषारण्यमेव च । तस्य कोटिगुणं पुण्यं शालग्रामशिलार्चनात्

kurukṣetraṁ prayāgaṁ ca naimiṣāraṇyameva ca tasya koṭiguṇaṁ puṇyaṁ śālagrāmaśilārcanāt

कुरुक्षेत्र, प्रयाग और नैमिषारण्य से भी; शालग्राम-शिला की पूजा से उसका पुण्य करोड़ गुना है।

श्लोक 45 (padma.6.23.45)

शालग्राममयी मुद्रा संस्थिता यत्र हि क्वचित् । वाराणस्यां च यत्पुण्यं सर्वं तत्रैव तद्भवेत्

śālagrāmamayī mudrā saṁsthitā yatra hi kvacit vārāṇasyāṁ ca yatpuṇyaṁ sarvaṁ tatraiva tadbhavet

जहाँ भी शालग्राम की मूर्ति स्थापित हो, वाराणसी में जो भी पुण्य है, वह सब वहीं प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 46 (padma.6.23.46)

ब्रह्महत्यादिकं पापं यत्किंचित्कुरुते नरः । तत्सर्वं नाशयेदाशु शालग्रामशिलार्चनात्

brahmahatyādikaṁ pāpaṁ yatkiṁcitkurute naraḥ tatsarvaṁ nāśayedāśu śālagrāmaśilārcanāt

मनुष्य जो भी ब्रह्महत्या आदि पाप करता है, वह सब शालग्राम-शिला की पूजा से शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

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