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उत्तर खण्ड · अध्याय 24

प्रयाग माहात्म्य

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (padma.6.24.1)

महादेवउवाच ।प्रयागतीर्थमाहात्म्यं प्रवक्ष्यामि यथा श्रुतम् । महादानपराः पुण्यकर्माणो यत्र संति हि

mahādevauvāca prayāgatīrthamāhātmyaṁ pravakṣyāmi yathā śrutam mahādānaparāḥ puṇyakarmāṇo yatra saṁti hi

महादेव ने कहा — मैं प्रयाग-तीर्थ की महिमा बताऊँगा, जैसी सुनी गई है, जहाँ महादान में तत्पर, पुण्यकर्मी लोग निवास करते हैं।

श्लोक 2 (padma.6.24.2)

यत्र गंगा च यमुना यत्र चैव सरस्वती । तं देवतीर्थप्रवरं देवानामपि दुर्लभम्

yatra gaṁgā ca yamunā yatra caiva sarasvatī taṁ devatīrthapravaraṁ devānāmapi durlabham

जहाँ गंगा है, यमुना है, और सरस्वती भी है — वह देवताओं का श्रेष्ठ तीर्थ है, देवताओं के लिए भी दुर्लभ।

श्लोक 3 (padma.6.24.3)

ईदृशं त्रिषु लोकेषु भूतं न च भविष्यति । ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी

īdṛśaṁ triṣu lokeṣu bhūtaṁ na ca bhaviṣyati grahāṇāṁ ca yathā sūryo nakṣatrāṇāṁ yathā śaśī

ऐसा तीनों लोकों में न कभी हुआ है, न होगा; जैसे ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा श्रेष्ठ है,

श्लोक 4 (padma.6.24.4)

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् । प्रातःकाले तु भो विद्वन्प्रयागे स्नानमाचरेत्

tīrthānāmuttamaṁ tīrthaṁ prayāgākhyamanuttamam prātaḥkāle tu bho vidvanprayāge snānamācaret

वैसे ही तीर्थों में सर्वोत्तम, अनुपम तीर्थ प्रयाग है। हे विद्वन्! प्रातःकाल में प्रयाग में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 5 (padma.6.24.5)

महापापाद्विनिर्मुक्तः स याति परमं पदम् । देयं किंचिद्यथाशक्ति दारिद्र्याभावमिच्छता

mahāpāpādvinirmuktaḥ sa yāti paramaṁ padam deyaṁ kiṁcidyathāśakti dāridryābhāvamicchatā

महापाप से मुक्त होकर वह परम पद को प्राप्त होता है। दरिद्रता के अभाव की इच्छा रखने वाले को अपनी शक्ति के अनुसार कुछ न कुछ दान करना चाहिए।

श्लोक 6 (padma.6.24.6)

यो नरस्तत्र गत्वा वै प्रयागे स्नानमाचरेत् । धनिको दीर्घजीवी च जायते नात्र संशयः

yo narastatra gatvā vai prayāge snānamācaret dhaniko dīrghajīvī ca jāyate nātra saṁśayaḥ

जो मनुष्य वहाँ जाकर प्रयाग में स्नान करता है, वह निश्चय ही धनवान और दीर्घजीवी होता है।

श्लोक 7 (padma.6.24.7)

यत्र वटस्याक्षयस्य दर्शनं कुरुते नरः । तेन दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्या विनश्यति

yatra vaṭasyākṣayasya darśanaṁ kurute naraḥ tena darśanamātreṇa brahmahatyā vinaśyati

जो मनुष्य वहाँ अक्षयवट का दर्शन करता है, उस दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 8 (padma.6.24.8)

स चाक्षयवटः ख्यातः कल्पांतेपि च दृश्यते । शेते विष्णुर्यस्य पत्रे अतोयमव्ययः स्मृतः

sa cākṣayavaṭaḥ khyātaḥ kalpāṁtepi ca dṛśyate śete viṣṇuryasya patre atoyamavyayaḥ smṛtaḥ

वह अक्षयवट प्रसिद्ध है और कल्प के अंत में भी दिखाई देता है; उसके पत्ते पर विष्णु शयन करते हैं — इसीलिए वह जलरहित, अविनाशी माना जाता है।

श्लोक 9 (padma.6.24.9)

तत्र पूजां प्रकुर्वंति मानवा विष्णुवल्लभाः । सूत्रेणाच्छादितं कृत्वा पूजां चैव तु कारयेत्

tatra pūjāṁ prakurvaṁti mānavā viṣṇuvallabhāḥ sūtreṇācchāditaṁ kṛtvā pūjāṁ caiva tu kārayet

वहाँ विष्णु-भक्त मनुष्य पूजा करते हैं; सूत्र से ढककर उसकी पूजा करानी चाहिए।

श्लोक 10 (padma.6.24.10)

माधवाख्यस्तत्र देवः सुखं तिष्ठति नित्यशः । तस्य वै दर्शनं कार्यं महापापैः प्रमुच्यते

mādhavākhyastatra devaḥ sukhaṁ tiṣṭhati nityaśaḥ tasya vai darśanaṁ kāryaṁ mahāpāpaiḥ pramucyate

वहाँ माधव नामक देव सदा सुखपूर्वक निवास करते हैं; उनका दर्शन करना चाहिए — इससे महापापों से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 11 (padma.6.24.11)

यत्र देवाश्च ऋषयो मनुष्याश्चापि सर्वशः । स्वस्वस्थानं समाश्रित्य तत्र तिष्ठंति नित्यशः

yatra devāśca ṛṣayo manuṣyāścāpi sarvaśaḥ svasvasthānaṁ samāśritya tatra tiṣṭhaṁti nityaśaḥ

जहाँ देवता, ऋषि और मनुष्य भी सब प्रकार से अपने-अपने स्थान का आश्रय लेकर सदा निवास करते हैं।

श्लोक 12 (padma.6.24.12)

गोघ्नो वापि च चांडालो दुष्टो वा दुष्टचेतनः । बालघाती तथाऽविद्वान्म्रियते तत्र वै तदा

goghno vāpi ca cāṁḍālo duṣṭo vā duṣṭacetanaḥ bālaghātī tathā'vidvānmriyate tatra vai tadā

गोहत्यारा, या चांडाल, या दुष्ट, या दुष्ट-मन वाला, बालघाती या अज्ञानी भी, यदि वहाँ मृत्यु को प्राप्त होता है,

श्लोक 13 (padma.6.24.13)

स वै चतुर्भुजो भूत्वा वैकुंठे वसते चिरम् । प्रयागे तु नरो यस्तु माघस्नानं करोति च

sa vai caturbhujo bhūtvā vaikuṁṭhe vasate ciram prayāge tu naro yastu māghasnānaṁ karoti ca

वह चतुर्भुज होकर वैकुंठ में दीर्घकाल तक निवास करता है। और जो मनुष्य प्रयाग में माघ-स्नान करता है,

श्लोक 14 (padma.6.24.14)

न तस्य फलसंख्यास्ति शृणु देवर्षिसत्तम । आपो नारा इति प्रोक्ता सर्वलोकेषु शुश्रुम

na tasya phalasaṁkhyāsti śṛṇu devarṣisattama āpo nārā iti proktā sarvalokeṣu śuśruma

हे देवर्षिश्रेष्ठ! सुनिए, उसके पुण्य की कोई गिनती नहीं है। 'जल को नार कहा गया है' — ऐसा हमने सभी लोकों में सुना है,

श्लोक 15 (padma.6.24.15)

तेन नारायणः प्रोक्तः स्नातानां भुक्तिमुक्तिदः । ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी

tena nārāyaṇaḥ proktaḥ snātānāṁ bhuktimuktidaḥ grahāṇāṁ ca yathā sūryo nakṣatrāṇāṁ yathā śaśī

और इसीलिए स्नान करने वालों को भोग और मोक्ष देने वाले नारायण कहलाते हैं। जैसे ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा श्रेष्ठ है,

श्लोक 16 (padma.6.24.16)

मासानां हि तथा माघः श्रेष्ठः सर्वेषु कर्मसु । मकरस्थे रवौ माघे प्रातःकाले तथामले

māsānāṁ hi tathā māghaḥ śreṣṭhaḥ sarveṣu karmasu makarasthe ravau māghe prātaḥkāle tathāmale

वैसे ही महीनों में माघ सभी कर्मों के लिए श्रेष्ठ है। माघ में सूर्य मकर राशि में हो, और शुद्ध प्रातःकाल हो,

श्लोक 17 (padma.6.24.17)

गोःपदेऽपि जले स्नानं स्वर्गदं पापिनामपि । योगोऽयं दुर्लभो विद्वन्त्रैलोक्ये सचराचरे

goḥpade'pi jale snānaṁ svargadaṁ pāpināmapi yogo'yaṁ durlabho vidvantrailokye sacarācare

तो गाय के खुर बराबर जल में भी स्नान पापियों को भी स्वर्ग देने वाला है; हे विद्वन्! यह योग चराचर त्रिलोक में अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 18 (padma.6.24.18)

अस्मिन्यो यत्नमापन्नः स्नायादपि दिनत्रयम् । पंच वा सप्त वाप्यत्र स्नानं कुर्वन्प्रयागजम्

asminyo yatnamāpannaḥ snāyādapi dinatrayam paṁca vā sapta vāpyatra snānaṁ kurvanprayāgajam

जो कोई इसमें प्रयत्नशील होकर तीन दिन, पाँच दिन, या सात दिन तक भी प्रयाग में स्नान करता है,

श्लोक 19 (padma.6.24.19)

चंद्रवद्वर्द्धते सोऽपि कुले वाडवसत्तम । चराचराश्च ये जीवास्तथैव मनुजादयः

caṁdravadvarddhate so'pi kule vāḍavasattama carācarāśca ye jīvāstathaiva manujādayaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! वह अपने कुल में चंद्रमा की भाँति बढ़ता है। और जो भी चराचर प्राणी हैं, तथा मनुष्य आदि भी,

श्लोक 20 (padma.6.24.20)

प्रयागं तीर्थमाश्रित्य वैकुंठं यांति तेऽचिरात् । ये वसिष्ठादयस्तत्र ऋषयः सनकादयः

prayāgaṁ tīrthamāśritya vaikuṁṭhaṁ yāṁti te'cirāt ye vasiṣṭhādayastatra ṛṣayaḥ sanakādayaḥ

प्रयाग तीर्थ का आश्रय लेकर वे शीघ्र ही वैकुंठ जाते हैं। जो वसिष्ठ आदि ऋषि, सनक आदि वहाँ हैं,

श्लोक 21 (padma.6.24.21)

तेऽपि प्रयागजं तीर्थं सेवंते च पुनःपुनः । यत्र विष्णुश्च रुद्रश्च यत्रेंद्रश्च तथा पुनः

te'pi prayāgajaṁ tīrthaṁ sevaṁte ca punaḥpunaḥ yatra viṣṇuśca rudraśca yatreṁdraśca tathā punaḥ

वे भी प्रयाग-तीर्थ की बार-बार सेवा करते हैं। जहाँ विष्णु, रुद्र, और इंद्र भी बार-बार,

श्लोक 22 (padma.6.24.22)

तेऽपि सर्वे वसंतीह प्रयागे तीर्थसत्तमे । दानं तत्र प्रशंसंति नियमांश्च तथैव च

te'pi sarve vasaṁtīha prayāge tīrthasattame dānaṁ tatra praśaṁsaṁti niyamāṁśca tathaiva ca

वे सभी यहाँ, प्रयाग नामक श्रेष्ठ तीर्थ में, निवास करते हैं। वहाँ लोग दान और नियमों की भी प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 23 (padma.6.24.23)

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च पुनर्जन्म न विद्यते

tatra snātvā ca pītvā ca punarjanma na vidyate

वहाँ स्नान करके और जल पीकर मनुष्य का फिर से जन्म नहीं होता।

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