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उत्तर खण्ड · अध्याय 238

नृसिंह-प्रादुर्भाव

अध्याय 237अध्याय-सूचीअध्याय 239

श्लोक 1 (padma.6.238.1)

रुद्र उवाच- भ्रातरं निहतं ज्ञात्वा हिरण्यकशिपुस्ततः । तपस्तेपे महादैत्यो मेरोः पार्श्वे च मां प्रति ।

rudra uvāca bhrātaraṁ nihataṁ jñātvā hiraṇyakaśipustataḥ tapastepe mahādaityo meroḥ pārśve ca māṁ prati

रुद्र जी ने कहा — भाई के मारे जाने की बात जानकर उस महादैत्य हिरण्यकशिपु ने मेरु पर्वत के पास मुझे लक्ष्य करके तप किया।

श्लोक 2 (padma.6.238.2)

दिव्यवर्षसहस्राणि वायुभक्षो महाबलः । जपन्पंचाक्षरं मंत्रं पूजयामास मां शुभे ।

divyavarṣasahasrāṇi vāyubhakṣo mahābalaḥ japanpaṁcākṣaraṁ maṁtraṁ pūjayāmāsa māṁ śubhe

हे शुभे, वह महाबली हज़ारों दिव्य वर्षों तक केवल वायु पीकर, पंचाक्षर मंत्र का जप करते हुए मेरी पूजा करता रहा।

श्लोक 3 (padma.6.238.3)

ततः प्रहृष्टमनसा तमवोचं महासुरम् । वरं वृणीष्व दैतेय यत्ते मनसि वर्त्तते । ततः प्रोवाच दैतेयो मां प्रसन्नं शुभानने ।

tataḥ prahṛṣṭamanasā tamavocaṁ mahāsuram varaṁ vṛṇīṣva daiteya yatte manasi varttate tataḥ provāca daiteyo māṁ prasannaṁ śubhānane

तब मैंने प्रसन्नचित्त होकर उस महादैत्य से कहा — 'हे दैत्यराज, जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो।' तब उस दैत्य ने प्रसन्न मुझसे कहा, हे शुभानने।

श्लोक 4 (padma.6.238.4)

हिरण्यकशिपुरुवाच- देवासुरमनुष्याणां गंधर्वोरगरक्षसाम् । पशुपक्षिमृगाणां च सिद्धानां वै महात्मनाम् ।

hiraṇyakaśipuruvāca devāsuramanuṣyāṇāṁ gaṁdharvoragarakṣasām paśupakṣimṛgāṇāṁ ca siddhānāṁ vai mahātmanām

हिरण्यकशिपु ने कहा — देव, असुर, मनुष्य, गंधर्व, नाग, राक्षस, पशु-पक्षी-मृग, सिद्ध महात्माओं,

श्लोक 5 (padma.6.238.5)

यक्षविद्याधराणां च किन्नराणां तथैव च । सर्वेषामेव रोगाणामायुधानां तथैव च । सर्वेषामृषिमुख्यानामवध्यत्वं प्रयच्छ मे ।

yakṣavidyādharāṇāṁ ca kinnarāṇāṁ tathaiva ca sarveṣāmeva rogāṇāmāyudhānāṁ tathaiva ca sarveṣāmṛṣimukhyānāmavadhyatvaṁ prayaccha me

यक्ष, विद्याधर, तथा किन्नरों, समस्त रोगों और अस्त्र-शस्त्रों से, तथा समस्त प्रमुख ऋषियों से भी मुझे अवध्य कर दीजिए।

श्लोक 6 (padma.6.238.6)

रुद्र उवाच- एवमस्त्विति तद्रक्षस्त्वब्रुवं प्रियदर्शने । मत्तो महद्वरं प्राप्य स दैतेयो महाबलः ।

rudra uvāca evamastviti tadrakṣastvabruvaṁ priyadarśane matto mahadvaraṁ prāpya sa daiteyo mahābalaḥ

रुद्र जी ने कहा — हे प्रियदर्शने, मैंने उस राक्षस से 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। मुझसे यह महान वर पाकर वह महाबली दैत्य —

श्लोक 7 (padma.6.238.7)

जित्वा महेंद्रं देवांश्च स त्रैलोक्येश्वरोऽभवत् । सर्वांश्च यज्ञभागांश्च स्वयमेवाग्रहीद्बलात् ।

jitvā maheṁdraṁ devāṁśca sa trailokyeśvaro'bhavat sarvāṁśca yajñabhāgāṁśca svayamevāgrahīdbalāt

महेंद्र और देवताओं को जीतकर तीनों लोकों का स्वामी बन गया। उसने बलपूर्वक सब यज्ञ-भाग स्वयं ही ग्रहण करने लगा।

श्लोक 8 (padma.6.238.8)

त्रातारं नाधिगच्छंति देवतास्तेन निर्जिताः । तस्यैव किंकराः सर्वे गंधर्वा देवदानवाः ।

trātāraṁ nādhigacchaṁti devatāstena nirjitāḥ tasyaiva kiṁkarāḥ sarve gaṁdharvā devadānavāḥ

उससे पराजित देवताओं को कोई रक्षक न मिला। गंधर्व, देव-दानव, यक्ष, नाग, सिद्ध और साध्य — सब उसी के दास बनकर उसके अधीन हो गए।

श्लोक 9 (padma.6.238.9)

यक्षाश्चनागाः सिद्धाश्च साध्याश्च वशवर्तिनः । उत्तानपादस्य सुतां कल्याणीं नाम कन्यकाम् ।

yakṣāścanāgāḥ siddhāśca sādhyāśca vaśavartinaḥ uttānapādasya sutāṁ kalyāṇīṁ nāma kanyakām

उस महाबली दैत्यराज ने उत्तानपाद की पुत्री कल्याणी नामक कन्या से विधिपूर्वक विवाह किया।

श्लोक 10 (padma.6.238.10)

उपयेमे विधानेन दैत्यराजो महाबलः । तस्यां जातो महातेजाः प्रह्लादो दैत्यराट्शुभे ।

upayeme vidhānena daityarājo mahābalaḥ tasyāṁ jāto mahātejāḥ prahlādo daityarāṭśubhe

उस पत्नी से हे शुभे, महातेजस्वी प्रह्लाद नामक दैत्यराजकुमार का जन्म हुआ।

श्लोक 11 (padma.6.238.11)

अनुरक्तो हृषीकेशे गर्भवासेऽपि यो हरौ । सर्वावस्थासु कृत्येषु मनोवाक्कायकर्म्मभिः ।

anurakto hṛṣīkeśe garbhavāse'pi yo harau sarvāvasthāsu kṛtyeṣu manovākkāyakarmmabhiḥ

वह गर्भ में रहते हुए भी हृषीकेश हरि में अनुरक्त था। सभी अवस्थाओं और कर्मों में, मन, वाणी, शरीर से,

श्लोक 12 (padma.6.238.12)

नान्यं जानाति देवेशात्प्रसन्नात्मा सनातनात् । स कालेऽपि विनीतः सन्गुरुगेहे वसत्सुधीः ।

nānyaṁ jānāti deveśātprasannātmā sanātanāt sa kāle'pi vinītaḥ sangurugehe vasatsudhīḥ

वह प्रसन्नचित्त, सनातन देवेश के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानता था। समय आने पर विनम्र होकर वह बुद्धिमान बालक गुरुकुल में रहा,

श्लोक 13 (padma.6.238.13)

अधीत्य सर्ववेदांश्च शास्त्राणि विविधानि च । कस्यचित्त्वथ कालस्य गुरुणा सह दैत्यजः ।

adhītya sarvavedāṁśca śāstrāṇi vividhāni ca kasyacittvatha kālasya guruṇā saha daityajaḥ

सब वेदों और विविध शास्त्रों का अध्ययन करके, कुछ काल पश्चात् वह दैत्यपुत्र अपने गुरु के साथ —

श्लोक 14 (padma.6.238.14)

पितुः समीपमागत्य ववंदे विनयान्वितः । तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तनयं शुभलक्षणम् । अंके निधाय दैत्येंद्रः प्रोवाचेदं सुविस्मितम् ।

pituḥ samīpamāgatya vavaṁde vinayānvitaḥ taṁ pariṣvajya bāhubhyāṁ tanayaṁ śubhalakṣaṇam aṁke nidhāya daityeṁdraḥ provācedaṁ suvismitam

पिता के पास आकर विनयपूर्वक प्रणाम किया। दैत्येंद्र ने उस शुभलक्षण पुत्र को दोनों भुजाओं से आलिंगन करके, गोद में बिठाकर अत्यंत विस्मित होकर यह कहा।

श्लोक 15 (padma.6.238.15)

हिरण्यकशिपुरुवाच- प्रह्लाद चिरकालं त्वं गुरुगेहे निवेशितः । यदुक्ता गुरुणा विद्या तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।

hiraṇyakaśipuruvāca prahlāda cirakālaṁ tvaṁ gurugehe niveśitaḥ yaduktā guruṇā vidyā tanmamācakṣva suvrata

हिरण्यकशिपु ने कहा — हे प्रह्लाद, हे सुव्रत, तुम बहुत काल गुरुकुल में रहे; गुरु ने तुम्हें जो विद्या सिखाई है, वह मुझे सुनाओ।

श्लोक 16 (padma.6.238.16)

रुद्र उवाच- इति पृष्टः स्वपित्रा वै प्रह्लादो जन्मवैष्णवः । प्राह दैत्येश्वरं प्रीत्या वचनं कलुषापहम् ।

rudra uvāca iti pṛṣṭaḥ svapitrā vai prahlādo janmavaiṣṇavaḥ prāha daityeśvaraṁ prītyā vacanaṁ kaluṣāpaham

रुद्र जी ने कहा — पिता द्वारा यह पूछे जाने पर जन्म से ही वैष्णव प्रह्लाद ने प्रेमपूर्वक दैत्येश्वर से पाप-नाशक वचन कहे।

श्लोक 17 (padma.6.238.17)

प्रह्लाद उवाच- यो वै सर्वोपनिषदामर्थः पुरुष ईश्वरः । तं वै सर्वगतं विष्णुं नमस्कृत्वा ब्रवीमि ते ।

prahlāda uvāca yo vai sarvopaniṣadāmarthaḥ puruṣa īśvaraḥ taṁ vai sarvagataṁ viṣṇuṁ namaskṛtvā bravīmi te

प्रह्लाद ने कहा — जो सब उपनिषदों का अर्थ हैं, वे ईश्वर पुरुष — उन्हीं सर्वव्यापी विष्णु को नमस्कार करके मैं आपसे कहता हूँ।

श्लोक 18 (padma.6.238.18)

रुद्र उवाच-। इति विष्णुस्तुतिं श्रुत्वा दैत्यराड् विस्मयान्वितः । उवाच तं गुरुं रोषात्किं त्वयोक्तं ममात्मजे ।

rudra uvāca iti viṣṇustutiṁ śrutvā daityarāḍ vismayānvitaḥ uvāca taṁ guruṁ roṣātkiṁ tvayoktaṁ mamātmaje

रुद्र जी ने कहा — यह विष्णु-स्तुति सुनकर दैत्यराज विस्मित होकर क्रोध से गुरु से बोला — तुमने मेरे पुत्र को क्या सिखाया है?

श्लोक 19 (padma.6.238.19)

ममात्मजस्य दुर्बुद्धे हरिसंस्तवमीदृशम् । किमर्थमुक्तवान्जाड्यमकार्य्यं ब्राह्मणोचितम् ।

mamātmajasya durbuddhe harisaṁstavamīdṛśam kimarthamuktavānjāḍyamakāryyaṁ brāhmaṇocitam

हे मूर्ख, मेरे पुत्र को ऐसी हरि-स्तुति क्यों सिखाई, यह जड़ता तथा ब्राह्मण के अयोग्य अकार्य क्यों किया?

श्लोक 20 (padma.6.238.20)

अश्राव्यं मदमित्रस्य स्तवमेतं ममाग्रतः । बालेनापिकृतंत्वेतत्त्वत्प्रसादाद्दिवजाधम ।

aśrāvyaṁ madamitrasya stavametaṁ mamāgrataḥ bālenāpikṛtaṁtvetattvatprasādāddivajādhama

मेरे शत्रु की यह स्तुति मेरे सामने अश्राव्य है। हे नीच द्विज, तुम्हारी कृपा से यह बालक द्वारा भी किया गया है।

श्लोक 21 (padma.6.238.21)

इत्युक्त्वा परितो वीक्ष्य दैत्यराट्क्रोधमूर्च्छितः । उवाच दैत्यमेकं तु बंधयैनं द्विजाधमम् ।

ityuktvā parito vīkṣya daityarāṭkrodhamūrcchitaḥ uvāca daityamekaṁ tu baṁdhayainaṁ dvijādhamam

ऐसा कहकर, क्रोध से मूर्च्छित दैत्यराज ने चारों ओर देखकर एक दैत्य से कहा — इस नीच द्विज को बांध लो।

श्लोक 22 (padma.6.238.22)

इतिराजवचः श्रुत्वा स बबंध भृगोः सुतम् । बध्यमानं गुरुं दृष्ट्वा प्रह्लादो ब्राह्मणप्रियः । उवाच पितरं तात इदं मे नोक्तवान्गुरुः ।

itirājavacaḥ śrutvā sa babaṁdha bhṛgoḥ sutam badhyamānaṁ guruṁ dṛṣṭvā prahlādo brāhmaṇapriyaḥ uvāca pitaraṁ tāta idaṁ me noktavānguruḥ

राजा की यह बात सुनकर उसने भृगु के पुत्र (गुरु) को बांध लिया। गुरु को बंधा देखकर ब्राह्मण-प्रिय प्रह्लाद ने पिता से कहा — हे तात, गुरु ने मुझे यह नहीं सिखाया।

श्लोक 23 (padma.6.238.23)

कृपया देवदेवस्य शिक्षितोस्मि हरेः प्रभो । नान्यो गुरुर्मे भवति स एव प्रेरको हरिः ।

kṛpayā devadevasya śikṣitosmi hareḥ prabho nānyo gururme bhavati sa eva prerako hariḥ

हे प्रभु, मैं तो देवाधिदेव हरि की ही कृपा से शिक्षित हूँ। मेरा कोई अन्य गुरु नहीं है — वे हरि ही मेरे प्रेरक हैं।

श्लोक 24 (padma.6.238.24)

श्रोता मंता तथा वक्ता द्रष्टा सर्वग ईश्वरः । हरिरेवाक्षयः कर्त्ता नियंता सर्वदेहिनाम् । तस्मादनागसो विप्रो मोक्तव्योऽयं गुरुः प्रभो ।

śrotā maṁtā tathā vaktā draṣṭā sarvaga īśvaraḥ harirevākṣayaḥ karttā niyaṁtā sarvadehinām tasmādanāgaso vipro moktavyo'yaṁ guruḥ prabho

वे ही सुनने वाले, सोचने वाले, बोलने वाले, देखने वाले, सर्वव्यापी ईश्वर हैं। हरि ही सब देहधारियों के अक्षय कर्ता और नियंता हैं। इसलिए हे प्रभु, यह निर्दोष ब्राह्मण गुरु मुक्त किया जाए।

श्लोक 25 (padma.6.238.25)

रुद्र उवाच- इति पुत्रवचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुस्ततः । तं ब्राह्मणं मोचयित्वा स्वसुतं प्राह विस्मयात् ।

rudra uvāca iti putravacaḥ śrutvā hiraṇyakaśipustataḥ taṁ brāhmaṇaṁ mocayitvā svasutaṁ prāha vismayāt

रुद्र जी ने कहा — पुत्र की यह बात सुनकर हिरण्यकशिपु ने विस्मित होकर उस ब्राह्मण को मुक्त कर दिया, और अपने पुत्र से कहा —

श्लोक 26 (padma.6.238.26)

किं वत्स त्वं भ्रमस्येवं मिथ्यावाक्यैर्द्विजन्मनः । को विष्णुः किं तु तद्रूपं कुत्रासौ संस्थितो हरिः ।

kiṁ vatsa tvaṁ bhramasyevaṁ mithyāvākyairdvijanmanaḥ ko viṣṇuḥ kiṁ tu tadrūpaṁ kutrāsau saṁsthito hariḥ

हे वत्स, तुम इस द्विज के मिथ्या वचनों से क्यों भ्रमित हो रहे हो? विष्णु कौन है? उसका रूप क्या है? वह हरि कहाँ स्थित है?

श्लोक 27 (padma.6.238.27)

अहमेवेश्वरो लोके त्रैलोक्याधिपतिर्यतः । मामेवार्च्चय गोविंदं त्यज शत्रुं दुरासदम् ।

ahameveśvaro loke trailokyādhipatiryataḥ māmevārccaya goviṁdaṁ tyaja śatruṁ durāsadam

संसार में मैं ही ईश्वर हूँ, क्योंकि मैं ही तीनों लोकों का स्वामी हूँ। मुझ गोविंद की ही पूजा करो, इस दुर्जेय शत्रु को त्याग दो।

श्लोक 28 (padma.6.238.28)

अथवा शंकरं देवं रुद्रं लोकगुरुं प्रभुम् । अर्च्चयस्वासुराध्यक्षं सर्वैश्वर्य्यप्रदं शिवम् ।

athavā śaṁkaraṁ devaṁ rudraṁ lokaguruṁ prabhum arccayasvāsurādhyakṣaṁ sarvaiśvaryyapradaṁ śivam

अथवा शंकर देव को, लोकगुरु प्रभु रुद्र को — असुरों के अधिपति, सब ऐश्वर्य देने वाले शिव को — पूजो।

श्लोक 29 (padma.6.238.29)

त्रिपुंड्रधारणं कृत्वा भस्मना दैत्यपूजितम् । पूजयित्वा महादेवं पाशुपत्योक्तमार्गतः ।

tripuṁḍradhāraṇaṁ kṛtvā bhasmanā daityapūjitam pūjayitvā mahādevaṁ pāśupatyoktamārgataḥ

त्रिपुंड्र धारण करके, भस्म से युक्त, दैत्यों द्वारा पूजित उस महादेव की पाशुपत-मार्ग से पूजा करके —

श्लोक 30 (padma.6.238.30)

रुद्र उवाच- इति दैत्यपतेर्वाक्यं श्रुत्वा दैत्यपुरोहिताः ।

rudra uvāca iti daityapatervākyaṁ śrutvā daityapurohitāḥ

रुद्र जी ने कहा — यह दैत्यपति का वचन सुनकर दैत्यों के पुरोहितों ने —

श्लोक 31 (padma.6.238.31)

पुरोहिता ऊचुः- एवमेव महाभाग कुरुष्व वचनं पितुः । त्यज शत्रुं कैटभारिं पूजयस्व त्रिलोचनम् ।

purohitā ūcuḥ evameva mahābhāga kuruṣva vacanaṁ pituḥ tyaja śatruṁ kaiṭabhāriṁ pūjayasva trilocanam

पुरोहितों ने कहा — हे महाभाग, ऐसा ही करो, पिता का वचन मानो। कैटभ के शत्रु (विष्णु) को त्याग दो, त्रिलोचन शिव की पूजा करो।

श्लोक 32 (padma.6.238.32)

रुद्रात्परतरो देवो नास्ति सर्वप्रदो नॄणाम् । पिता तवापि तस्यैव प्रसादादीश्वरोऽभवत् ।

rudrātparataro devo nāsti sarvaprado nṝṇām pitā tavāpi tasyaiva prasādādīśvaro'bhavat

रुद्र से बढ़कर, मनुष्यों को सब कुछ देने वाला कोई देवता नहीं है। तुम्हारे पिता भी उन्हीं की कृपा से ईश्वर बने हैं।

श्लोक 33 (padma.6.238.33)

रुद्र उवाच- इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रह्लादो जन्मवैष्णवं ।

rudra uvāca iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā prahlādo janmavaiṣṇavaṁ

रुद्र जी ने कहा — जन्म से वैष्णव प्रह्लाद ने उनकी यह बात सुनकर —

श्लोक 34 (padma.6.238.34)

प्रह्लाद उवाच- अहो भगवतः श्रेष्ठा यन्माया मोहितं जगत् । अहो वेदांतविदुषः सर्वलोकेषु पूजिताः ।

prahlāda uvāca aho bhagavataḥ śreṣṭhā yanmāyā mohitaṁ jagat aho vedāṁtaviduṣaḥ sarvalokeṣu pūjitāḥ

प्रह्लाद ने कहा — आश्चर्य है कि भगवान् की माया से यह जगत कैसा मोहित है! आश्चर्य है कि वेदांत के ज्ञाता कहलाने वाले, सब लोकों में पूजित —

श्लोक 35 (padma.6.238.35)

ब्राह्मणा अपि चापल्याद्वदंत्येवं मदान्विताः । नारायणः परं ब्रह्म तत्वं नारायणः परम् ।

brāhmaṇā api cāpalyādvadaṁtyevaṁ madānvitāḥ nārāyaṇaḥ paraṁ brahma tatvaṁ nārāyaṇaḥ param

ब्राह्मण भी चपलतावश, मद से युक्त होकर ऐसा बोलते हैं! नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तत्त्व हैं,

श्लोक 36 (padma.6.238.36)

नारायणः परो ध्याता ध्यानं नारयणः परम् । गतिर्विश्वस्य जगतः शाश्वतं शिवमच्युतः ।

nārāyaṇaḥ paro dhyātā dhyānaṁ nārayaṇaḥ param gatirviśvasya jagataḥ śāśvataṁ śivamacyutaḥ

नारायण ही परम ध्याता हैं, नारायण ही परम ध्यान हैं। वे ही जगत की सनातन, शाश्वत, मंगलमय, अच्युत गति हैं।

श्लोक 37 (padma.6.238.37)

धाता विधाता जगतो वासुदेवः सनातनः । विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ।

dhātā vidhātā jagato vāsudevaḥ sanātanaḥ viśvamevedaṁ puruṣastadviśvamupajīvati

वे ही जगत के धाता और विधाता, सनातन वासुदेव हैं। यह समस्त विश्व वही पुरुष है, और यह विश्व उन्हीं पर आश्रित जीवन बिताता है।

श्लोक 38 (padma.6.238.38)

हिरण्मयवपुर्नित्यःपुंडरीकनिभेक्षणः । श्रीभूलीलापतिः सौम्योनिर्म्मलः शुभविग्रहः ।

hiraṇmayavapurnityaḥpuṁḍarīkanibhekṣaṇaḥ śrībhūlīlāpatiḥ saumyonirmmalaḥ śubhavigrahaḥ

वे स्वर्णिम शरीर वाले, नित्य, कमल के समान नेत्रों वाले हैं। श्री और भू के साथ लीला करने वाले, सौम्य, निर्मल, शुभ स्वरूप हैं।

श्लोक 39 (padma.6.238.39)

तेनैव सृष्टौ ब्रह्मेशौ सर्गे देवोत्तमौ विभू । तस्यैवाज्ञां पुरस्कृत्य वर्त्तेते ब्रह्मशंकरौ ।

tenaiva sṛṣṭau brahmeśau sarge devottamau vibhū tasyaivājñāṁ puraskṛtya varttete brahmaśaṁkarau

उन्हीं की [शक्ति] से ब्रह्मा और ईश (शिव) सृष्टि में देवोत्तम, समर्थ हैं; उन्हीं की आज्ञा को शिरोधार्य कर ब्रह्मा और शंकर कार्यरत रहते हैं।

श्लोक 40 (padma.6.238.40)

भीषास्माद्वाति पवनो भीषोदेति दिवाकरः । भीषास्मादग्निश्चंद्रोऽथ मृत्युर्धावति पंचमः ।

bhīṣāsmādvāti pavano bhīṣodeti divākaraḥ bhīṣāsmādagniścaṁdro'tha mṛtyurdhāvati paṁcamaḥ

उनके भय से वायु बहता है, उनके भय से सूर्य उदय होता है। उनके भय से अग्नि और चंद्रमा, और पाँचवें मृत्यु भी दौड़ते हैं।

श्लोक 41 (padma.6.238.41)

आसीदेको हरिर्दिव्यो देवो नारायणः परः । ब्रह्मा नेंद्रो न चेशानो न च चंद्र दिवाकरौ ।

āsīdeko harirdivyo devo nārāyaṇaḥ paraḥ brahmā neṁdro na ceśāno na ca caṁdra divākarau

आदि में एक ही दिव्य देव हरि, परम नारायण थे — न ब्रह्मा थे, न इंद्र, न ईशान, न चंद्र-सूर्य,

श्लोक 42 (padma.6.238.42)

न वा द्यावापृथिव्यौ च नक्षत्राणि दिवौकसः । तस्य विष्णोः परं धाम सदा पश्यंति सूरयः ।

na vā dyāvāpṛthivyau ca nakṣatrāṇi divaukasaḥ tasya viṣṇoḥ paraṁ dhāma sadā paśyaṁti sūrayaḥ

न आकाश-पृथ्वी, न नक्षत्र, न स्वर्गवासी देवता। उन्हीं विष्णु के परम धाम को ज्ञानीजन सदा देखते हैं।

श्लोक 43 (padma.6.238.43)

एवं सर्वोपनिषदामर्थं हित्वा द्विजोत्तमाः । रागाल्लोभाद्भयाद्वापि किं ब्रवीथ ममाग्रतः ।

evaṁ sarvopaniṣadāmarthaṁ hitvā dvijottamāḥ rāgāllobhādbhayādvāpi kiṁ bravītha mamāgrataḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो, इस प्रकार सब उपनिषदों के अर्थ को त्यागकर, राग, लोभ या भय से तुम मेरे सामने क्या कह रहे हो?

श्लोक 44 (padma.6.238.44)

तं सर्वरक्षकं देवं त्यक्त्वा सर्वेश्वरं हरिम् । कथं पाषंडमाश्रित्य पूजयामि च शंकरम् ।

taṁ sarvarakṣakaṁ devaṁ tyaktvā sarveśvaraṁ harim kathaṁ pāṣaṁḍamāśritya pūjayāmi ca śaṁkaram

उस सबके रक्षक, सर्वेश्वर हरि को त्यागकर मैं पाखंड का आश्रय लेकर शंकर की पूजा कैसे करूँ?

श्लोक 45 (padma.6.238.45)

लक्ष्मीपतिं देवदेवमनंतं पुरुषोत्तमम् । इंदीवरदलश्यामं पद्मपत्रायतेक्षणम् ।

lakṣmīpatiṁ devadevamanaṁtaṁ puruṣottamam iṁdīvaradalaśyāmaṁ padmapatrāyatekṣaṇam

लक्ष्मीपति, देवाधिदेव, अनंत पुरुषोत्तम — नीलकमल-दल के समान श्याम, कमल-पत्र जैसे विशाल नेत्रों वाले,

श्लोक 46 (padma.6.238.46)

श्रीवत्सलक्षितोरस्कं सर्व्वाभरणभूषितम् । सदा कुमारं सर्व्वेशं नित्यानन्दसुखप्रदम् ।

śrīvatsalakṣitoraskaṁ sarvvābharaṇabhūṣitam sadā kumāraṁ sarvveśaṁ nityānandasukhapradam

श्रीवत्स चिह्न से अंकित वक्ष वाले, सब आभूषणों से भूषित, सदा कुमार, सर्वेश्वर, नित्यानंद-सुख देने वाले —

श्लोक 47 (padma.6.238.47)

कृष्णं दध्युर्महात्मानो योगिनः सनकादयः । यमर्चयंति ब्रह्मेश शक्राद्या देवतागणाः ।

kṛṣṇaṁ dadhyurmahātmāno yoginaḥ sanakādayaḥ yamarcayaṁti brahmeśa śakrādyā devatāgaṇāḥ

उन्हीं कृष्ण का ध्यान महात्मा सनकादि योगीजन करते हैं, जिनकी ब्रह्मा-शिव सहित इंद्र आदि देवगण पूजा करते हैं।

श्लोक 48 (padma.6.238.48)

यस्य पत्न्याः कटाक्षार्द्धदृष्ट्या दृष्टा दिवौकसः । ब्रह्मेंद्र रुद्र वरुण यम सोम धनाधिपाः ।

yasya patnyāḥ kaṭākṣārddhadṛṣṭyā dṛṣṭā divaukasaḥ brahmeṁdra rudra varuṇa yama soma dhanādhipāḥ

जिनकी पत्नी (लक्ष्मी) के आधे कटाक्ष मात्र से ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, वरुण, यम, सोम, कुबेर आदि स्वर्गवासी देखे जाते हैं —

श्लोक 49 (padma.6.238.49)

यन्नामस्मरणादेव पापिनामपि सत्वरम् । मुक्तिर्भवति जंतूनां ब्रह्मादीनां सुदुर्लभा ।

yannāmasmaraṇādeva pāpināmapi satvaram muktirbhavati jaṁtūnāṁ brahmādīnāṁ sudurlabhā

जिनके नाम के स्मरण मात्र से पापियों को भी शीघ्र मुक्ति मिल जाती है, जो ब्रह्मादि के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 50 (padma.6.238.50)

स एवं रक्षकः श्रीशो देवानामपि सर्वदा । तमेव पूजयिष्यामि लक्ष्म्या संयुतमच्युतम् ।

sa evaṁ rakṣakaḥ śrīśo devānāmapi sarvadā tameva pūjayiṣyāmi lakṣmyā saṁyutamacyutam

वे ही श्रीपति सदा देवताओं के भी रक्षक हैं। उन्हीं लक्ष्मी-सहित अच्युत की मैं पूजा करूँगा।

श्लोक 51 (padma.6.238.51)

प्राप्स्यामि सुसुखेनैव तद्विष्णोः परमं पदम् । रुद्र उवाच- इति तस्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुस्ततः ।

prāpsyāmi susukhenaiva tadviṣṇoḥ paramaṁ padam rudra uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā hiraṇyakaśipustataḥ

और सहज सुख से ही उन विष्णु के परम पद को प्राप्त करूँगा। रुद्र जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर हिरण्यकशिपु —

श्लोक 52 (padma.6.238.52)

क्रोधेन महताविष्टो जज्वालाग्निरिवापरः । परितो वीक्ष्य दैतेयानित्याह क्रोधमूर्छितः ।

krodhena mahatāviṣṭo jajvālāgnirivāparaḥ parito vīkṣya daiteyānityāha krodhamūrchitaḥ

महान क्रोध से भरकर, मानो दूसरी आग की तरह जल उठा। दैत्यों की ओर चारों तरफ देखकर, क्रोध से मूर्च्छित होकर कहा।

श्लोक 53 (padma.6.238.53)

हिरण्यकशिपुरुवाच - भीषणैः शस्त्रसंघातैः प्रह्लादं पापकारिणम् । ममाज्ञया घातयध्वं शत्रुपूजनतत्परम् ।

hiraṇyakaśipuruvāca bhīṣaṇaiḥ śastrasaṁghātaiḥ prahlādaṁ pāpakāriṇam mamājñayā ghātayadhvaṁ śatrupūjanatatparam

हिरण्यकशिपु ने कहा — भयंकर शस्त्रों के समूह से, शत्रु की पूजा में तत्पर इस पापी प्रह्लाद को मेरी आज्ञा से मार डालो।

श्लोक 54 (padma.6.238.54)

रक्षिता हरिरेवेति रक्षते तेन वात्सलात् । अद्यैव सफलं तस्य पश्येयं हरिरक्षणम् ।

rakṣitā harireveti rakṣate tena vātsalāt adyaiva saphalaṁ tasya paśyeyaṁ harirakṣaṇam

वह 'हरि ही रक्षक है' कहकर स्नेहवश उसकी रक्षा करता है — आज ही मैं उसकी उस हरि-रक्षा का फल देखूँगा।

श्लोक 55 (padma.6.238.55)

रुद्र उवाच- तदोद्यतास्त्रा दैतेया हंतुं दैत्येश्वरात्मजम् । परिवार्य महात्मानं तस्थुर्दैत्येश्वराज्ञया ।

rudra uvāca tadodyatāstrā daiteyā haṁtuṁ daityeśvarātmajam parivārya mahātmānaṁ tasthurdaityeśvarājñayā

रुद्र जी ने कहा — तब अस्त्र उठाए दैत्यगण उस दैत्यराजपुत्र को मारने के लिए, दैत्यराज की आज्ञा से उस महात्मा को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 56 (padma.6.238.56)

प्रह्लादोऽपि तथा विष्णुं ध्यात्वा हृदयपंकजे । जपन्नष्टाक्षरं मंत्रं तस्थौ गिरिरिवापरः ।

prahlādo'pi tathā viṣṇuṁ dhyātvā hṛdayapaṁkaje japannaṣṭākṣaraṁ maṁtraṁ tasthau giririvāparaḥ

प्रह्लाद भी हृदय-कमल में विष्णु का ध्यान करते हुए, अष्टाक्षर मंत्र का जप करते हुए, दूसरे पर्वत की भाँति स्थिर खड़ा रहा।

श्लोक 57 (padma.6.238.57)

तं जघ्नुः परितो वीराः शूलतोमरशक्तिभिः । प्रह्लादस्य वपुस्तत्र हरिसंस्मरणाच्छुभे ।

taṁ jaghnuḥ parito vīrāḥ śūlatomaraśaktibhiḥ prahlādasya vapustatra harisaṁsmaraṇācchubhe

वीरों ने चारों ओर से उसे शूल, तोमर और शक्ति से आघात किया। किंतु हे शुभे, हरि-स्मरण से प्रह्लाद का शरीर वहाँ —

श्लोक 58 (padma.6.238.58)

विष्णोः प्रभावाद्दुद्धर्षाद्वज्रभूतमभूद्भृशम् । ततः संप्राप्य तद्गात्रं महास्त्राणि सुरद्विषाम् ।

viṣṇoḥ prabhāvādduddharṣādvajrabhūtamabhūdbhṛśam tataḥ saṁprāpya tadgātraṁ mahāstrāṇi suradviṣām

विष्णु के दुर्धर्ष प्रभाव से मानो वज्र के समान हो गया। तब उन दैत्यों के महान अस्त्र उसके शरीर से टकराकर —

श्लोक 59 (padma.6.238.59)

नीलोत्पलदलानीव पेतुश्चिछन्नाः क्षितौ शुभे । अल्पमप्यस्य तद्गात्रं भेत्तुं दैत्या न च क्षमाः ।

nīlotpaladalānīva petuścichannāḥ kṣitau śubhe alpamapyasya tadgātraṁ bhettuṁ daityā na ca kṣamāḥ

नीलकमल-दल के समान टुकड़े-टुकड़े होकर भूमि पर गिर पड़े। दैत्य उस शरीर को थोड़ा भी भेद न सके।

श्लोक 60 (padma.6.238.60)

विस्मितावाङ्मुखास्तस्थुर्दैत्य राजांतिके भटाः । तादृग्विधं महात्मानं दृष्ट्वा पुत्रं महाबलम् ।

vismitāvāṅmukhāstasthurdaitya rājāṁtike bhaṭāḥ tādṛgvidhaṁ mahātmānaṁ dṛṣṭvā putraṁ mahābalam

विस्मित और मुख नीचे किए हुए वे योद्धा दैत्यराज के पास खड़े रह गए। अपने पुत्र को इस प्रकार महाबली देखकर —

श्लोक 61 (padma.6.238.61)

विस्मयं परमं गत्वा दैत्यराट्क्रोधमूर्छितः । आदिदेश ततः सर्वान्दंदशूकान्महाविषान् ।

vismayaṁ paramaṁ gatvā daityarāṭkrodhamūrchitaḥ ādideśa tataḥ sarvāndaṁdaśūkānmahāviṣān

परम आश्चर्य से भरकर, क्रोध से मूर्च्छित दैत्यराज ने तब सब बड़े विषैले सर्पों को —

श्लोक 62 (padma.6.238.62)

वासुकिप्रभृतीन्भीमान्खादयध्वमिति क्रुधा । आदिष्टास्तेन राज्ञाथ ते नागाः सुमहाबलाः ।

vāsukiprabhṛtīnbhīmānkhādayadhvamiti krudhā ādiṣṭāstena rājñātha te nāgāḥ sumahābalāḥ

वासुकि आदि भयंकर सर्पों को क्रोधवश आज्ञा दी — 'इसे डस डालो।' राजा की इस आज्ञा से वे महाबली नाग —

श्लोक 63 (padma.6.238.63)

ज्वलितास्या महाभीमास्तं च खादुर्महाबलम् । गरुडध्वजभक्तं तं विदश्य गरलायुधाः ।

jvalitāsyā mahābhīmāstaṁ ca khādurmahābalam garuḍadhvajabhaktaṁ taṁ vidaśya garalāyudhāḥ

प्रज्वलित मुख वाले, अत्यंत भयंकर, विषास्त्रधारी सर्पों ने उस गरुड़ध्वज (विष्णु) के भक्त, महाबली को डस लिया।

श्लोक 64 (padma.6.238.64)

निर्विषाश्च्छिन्नदशना बभूवुरनिलाशनाः । वैनतेयसहस्रेण छिन्नगात्राः सुविह्वलाः ।

nirviṣāścchinnadaśanā babhūvuranilāśanāḥ vainateyasahasreṇa chinnagātrāḥ suvihvalāḥ

किंतु वे निर्विष हो गए, उनके दाँत टूट गए, वे केवल वायु खाने वाले रह गए। गरुड़-पुत्रों के समान हज़ारों प्रकार से कटे शरीर वाले, अत्यंत व्याकुल होकर —

श्लोक 65 (padma.6.238.65)

प्रदुद्रुवुर्दिशः सर्वावमंतो रुधिरं भृशम् । तादृग्विधान्महासर्पान्दृष्ट्वा दैत्यपतिस्तदा ।

pradudruvurdiśaḥ sarvāvamaṁto rudhiraṁ bhṛśam tādṛgvidhānmahāsarpāndṛṣṭvā daityapatistadā

वे सब दिशाओं में भागने लगे, अत्यधिक रक्त वमन करते हुए। उन महासर्पों को उस दशा में देखकर दैत्यपति ने तब —

श्लोक 66 (padma.6.238.66)

आदिदेश ततः क्रुद्धो दिग्गजान्सुमदान्वितान् । निर्दिष्टास्तेन राज्ञाथ दिग्गजाश्च मदोद्धताः ।

ādideśa tataḥ kruddho diggajānsumadānvitān nirdiṣṭāstena rājñātha diggajāśca madoddhatāḥ

क्रोधित होकर मदमत्त दिग्गजों को आज्ञा दी। राजा की आज्ञा से वे मदोन्मत्त दिग्गज —

श्लोक 67 (padma.6.238.67)

परिवार्याथ तं जघ्नुर्दंतैः पृथुतरैर्भृशम् । अथ दिग्गजदंताश्च छिन्नमूलाः पतन्भुवि ।

parivāryātha taṁ jaghnurdaṁtaiḥ pṛthutarairbhṛśam atha diggajadaṁtāśca chinnamūlāḥ patanbhuvi

उसे घेरकर अपने विशाल दाँतों से बारंबार जोर से प्रहार करने लगे। किंतु दिग्गजों के वे दाँत ही जड़ से कटकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 68 (padma.6.238.68)

दंतैर्विनाकृता नागा भयार्ता वै प्रदुद्रुवुः । तान्दृष्ट्वाथ महानागान्दैत्येंद्रः कुपितो बली ।

daṁtairvinākṛtā nāgā bhayārtā vai pradudruvuḥ tāndṛṣṭvātha mahānāgāndaityeṁdraḥ kupito balī

दाँतों से रहित हुए वे हाथी भयभीत होकर भाग गए। उन महागजों को देखकर बलवान दैत्येंद्र क्रोधित हुआ,

श्लोक 69 (padma.6.238.69)

प्रज्वाल्य च महावह्निं चिक्षेप सुतमात्मनः । जलशायिप्रियं दृष्ट्वा प्रह्लादं हव्यवाहनः ।

prajvālya ca mahāvahniṁ cikṣepa sutamātmanaḥ jalaśāyipriyaṁ dṛṣṭvā prahlādaṁ havyavāhanaḥ

और महान अग्नि प्रज्वलित करवाकर अपने पुत्र को उसमें फेंकवा दिया। जल में शयन करने वाले विष्णु के प्रिय प्रह्लाद को देखकर अग्नि —

श्लोक 70 (padma.6.238.70)

न ददाह च तं धीरं सुशीतः समभूच्छिखी । अदह्यमानं तं बालं दृष्ट्वा राजा सुविस्मितः ।

na dadāha ca taṁ dhīraṁ suśītaḥ samabhūcchikhī adahyamānaṁ taṁ bālaṁ dṛṣṭvā rājā suvismitaḥ

उस धीर बालक को नहीं जला सकी, बल्कि वह शिखा अत्यंत शीतल हो गई। उस अदाह्य बालक को देखकर राजा अत्यंत विस्मित हुआ,

श्लोक 71 (padma.6.238.71)

प्रादात्तस्मै विषं घोरं सर्वभूतहितं तदा । तस्य विष्णोः प्रभावाच्च विषमस्यामृतं भवेत् ।

prādāttasmai viṣaṁ ghoraṁ sarvabhūtahitaṁ tadā tasya viṣṇoḥ prabhāvācca viṣamasyāmṛtaṁ bhavet

और उसे सब प्राणियों के लिए घातक भयंकर विष पिला दिया। किंतु विष्णु के प्रभाव से वह विष उसके लिए अमृत हो गया।

श्लोक 72 (padma.6.238.72)

अर्पणात्तस्य देवस्य विषं चामृतमश्नुते । एवमाद्यैर्वधोपायैर्घोररूपैः सुदारुणैः ।

arpaṇāttasya devasya viṣaṁ cāmṛtamaśnute evamādyairvadhopāyairghorarūpaiḥ sudāruṇaiḥ

उस देव को अर्पित करने मात्र से विष भी अमृत बन जाता है। इस प्रकार आदि अनेक भयंकर, अत्यंत क्रूर वध-उपायों से —

श्लोक 73 (padma.6.238.73)

मोहयित्वात्मजं राजा तस्यावध्यत्वमीक्ष्य च । ततः साम्ना सुतं प्राह दैत्यराड्विस्मयाकुलः ।

mohayitvātmajaṁ rājā tasyāvadhyatvamīkṣya ca tataḥ sāmnā sutaṁ prāha daityarāḍvismayākulaḥ

अपने पुत्र को कष्ट पहुँचाकर भी, उसे अवध्य देखकर राजा ने सांत्वना से पुत्र से कहा, विस्मय से व्याकुल दैत्यराज ने।

श्लोक 74 (padma.6.238.74)

हिरण्यकशिपुरुवाच- त्वया विष्णोः परत्वं च सम्यगुक्तं ममाग्रतः । व्यापित्वात्सर्वभूतानां विष्णुरित्यभिधीयते ।

hiraṇyakaśipuruvāca tvayā viṣṇoḥ paratvaṁ ca samyaguktaṁ mamāgrataḥ vyāpitvātsarvabhūtānāṁ viṣṇurityabhidhīyate

हिरण्यकशिपु ने कहा — तुमने मेरे सामने विष्णु की श्रेष्ठता ठीक ही कही है — क्योंकि वे सब भूतों में व्याप्त हैं, इसीलिए विष्णु कहलाते हैं।

श्लोक 75 (padma.6.238.75)

योऽसौ सर्वगतो देवः स एव परमेश्वरः । तस्य सर्वगतत्वं वै प्रत्यक्षं दर्शयस्व मे ।

yo'sau sarvagato devaḥ sa eva parameśvaraḥ tasya sarvagatatvaṁ vai pratyakṣaṁ darśayasva me

जो यह सर्वव्यापी देव है, वही परमेश्वर है। उसकी उस सर्वव्यापकता को मुझे प्रत्यक्ष दिखाओ।

श्लोक 76 (padma.6.238.76)

ऐश्वर्यशक्तितेजांसि ज्ञानवीर्यबलानि च । परस्य तस्य परमं रूपं गुणविभूतयः ।

aiśvaryaśaktitejāṁsi jñānavīryabalāni ca parasya tasya paramaṁ rūpaṁ guṇavibhūtayaḥ

ऐश्वर्य, शक्ति, तेज, ज्ञान, वीर्य और बल — उस परम पुरुष के परम रूप और गुण-विभूतियों को —

श्लोक 77 (padma.6.238.77)

सम्यग्दृष्ट्वा प्रयत्नेन विष्णुं मन्ये दिवौकसाम् । मम प्रतिबलो लोके नास्ति देवेषु कश्चन ।

samyagdṛṣṭvā prayatnena viṣṇuṁ manye divaukasām mama pratibalo loke nāsti deveṣu kaścana

भलीभाँति प्रयत्नपूर्वक देखकर ही मैं विष्णु को स्वर्गवासियों में [श्रेष्ठ] मानूँगा। संसार में देवताओं में मेरे समान बलवान कोई नहीं है।

श्लोक 78 (padma.6.238.78)

ईशानवरदानेन सर्वभूतेष्ववध्यताम् । प्राप्तवान्सर्वभूतानांनदुर्जयत्वं च मानद । ईश्वरत्वं लभेद्विष्णुर्मां जित्वा बलवीर्यतः ।

īśānavaradānena sarvabhūteṣvavadhyatām prāptavānsarvabhūtānāṁnadurjayatvaṁ ca mānada īśvaratvaṁ labhedviṣṇurmāṁ jitvā balavīryataḥ

शिव के वरदान से मुझे सब प्राणियों से अवध्यता, तथा हे मानद, सबके लिए अजेयता प्राप्त हुई है। विष्णु यदि बल-पराक्रम से मुझे जीत ले, तभी वह ईश्वरत्व पा सकता है।

श्लोक 79 (padma.6.238.79)

रुद्र उवाच- इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः प्राह विस्मितः । हरेः प्रभावं दैन्यस्य कथयामास सुव्रतः ।

rudra uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā prahlādaḥ prāha vismitaḥ hareḥ prabhāvaṁ dainyasya kathayāmāsa suvrataḥ

रुद्र जी ने कहा — उसकी यह बात सुनकर प्रह्लाद ने विस्मित होकर, उस दीन [पिता] से हरि के प्रभाव को कह सुनाया, वह सुव्रत।

श्लोक 80 (padma.6.238.80)

प्रह्लाद उवाच- योऽसौ नारायणः श्रीमान्परमात्मा सनातनः । वसनात्सर्वभूतेषु वासुदेवः स उच्यते ।

prahlāda uvāca yo'sau nārāyaṇaḥ śrīmānparamātmā sanātanaḥ vasanātsarvabhūteṣu vāsudevaḥ sa ucyate

प्रह्लाद ने कहा — वे जो श्रीमान् नारायण, सनातन परमात्मा हैं, जो सब प्राणियों में वास करने के कारण वासुदेव कहलाते हैं —

श्लोक 81 (padma.6.238.81)

सर्वस्यापि जगद्धाता विष्णुरित्यभिधीयते । न किंचिदस्मादन्यं तु जगत्स्थावर जंगमम् ।

sarvasyāpi jagaddhātā viṣṇurityabhidhīyate na kiṁcidasmādanyaṁ tu jagatsthāvara jaṁgamam

वे ही सबके जगत्कर्ता विष्णु कहलाते हैं। इस चराचर जगत में उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है।

श्लोक 82 (padma.6.238.82)

सर्वत्र चिदचिद्वस्तु रूपं तस्यैव नान्यथा । त्रिपाद्व्याप्तिः परं व्योम्नि पादव्याप्ति कलाद्भुता ।

sarvatra cidacidvastu rūpaṁ tasyaiva nānyathā tripādvyāptiḥ paraṁ vyomni pādavyāpti kalādbhutā

सर्वत्र चेतन-अचेतन वस्तु उन्हीं का रूप है, अन्य कुछ नहीं। परम आकाश में उनकी त्रिपाद-व्याप्ति है, और उनकी अद्भुत एक-पाद व्याप्ति यह सृष्टि है।

श्लोक 83 (padma.6.238.83)

योऽसौ चक्रगदापाणिः पीतवासा जनार्दनः । योगिभिर्दृश्यते भक्त्या नाभक्त्या दृश्यते क्वचित् ।

yo'sau cakragadāpāṇiḥ pītavāsā janārdanaḥ yogibhirdṛśyate bhaktyā nābhaktyā dṛśyate kvacit

जो चक्र-गदाधारी, पीतांबरधारी जनार्दन हैं, वे भक्ति से ही योगियों द्वारा देखे जाते हैं, भक्तिरहित से वे कहीं नहीं देखे जाते।

श्लोक 84 (padma.6.238.84)

द्रष्टुं न शक्यो रोषाच्च मत्सराद्वा जनार्दनः । देवतिर्यङ्मनुष्येषु स्थावरेष्वपि जंतुषु । व्याप्य तिष्ठति सर्व्वेषु क्षुद्रेष्वपि महत्सु च ।

draṣṭuṁ na śakyo roṣācca matsarādvā janārdanaḥ devatiryaṅmanuṣyeṣu sthāvareṣvapi jaṁtuṣu vyāpya tiṣṭhati sarvveṣu kṣudreṣvapi mahatsu ca

क्रोध या ईर्ष्या से जनार्दन को देखा नहीं जा सकता। देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य, तथा स्थावर प्राणियों में भी, छोटे-बड़े सभी में व्याप्त होकर वे सर्वत्र स्थित हैं।

श्लोक 85 (padma.6.238.85)

रुद्र उवाच- इति प्रह्लादवचनं श्रुत्वा दैत्यवरस्तदा । उवाच रोषताम्राक्षो भर्त्सयंश्च सुतं मुहुः ।

rudra uvāca iti prahlādavacanaṁ śrutvā daityavarastadā uvāca roṣatāmrākṣo bhartsayaṁśca sutaṁ muhuḥ

रुद्र जी ने कहा — प्रह्लाद का यह वचन सुनकर, क्रोध से लाल आँखें किए हुए दैत्यश्रेष्ठ ने बार-बार अपने पुत्र को धिक्कारते हुए कहा।

श्लोक 86 (padma.6.238.86)

हिरण्यकशिपुरुवाच- असौ सर्वगतो विष्णुरपि चेत्परमः पुमान् । प्रत्ययं दर्शयस्वाद्य बहुभिः किं च लापितैः ।

hiraṇyakaśipuruvāca asau sarvagato viṣṇurapi cetparamaḥ pumān pratyayaṁ darśayasvādya bahubhiḥ kiṁ ca lāpitaiḥ

हिरण्यकशिपु ने कहा — यदि यह सर्वव्यापी विष्णु सचमुच परम पुरुष है, तो आज ही मुझे उसका प्रमाण दिखाओ — बहुत बकवास करने से क्या लाभ?

श्लोक 87 (padma.6.238.87)

महादेव उवाच-। इत्युक्त्वा सहसा दैत्यः प्रासादस्तंभमात्मनः । ताडयामास हस्तेन प्रह्लादमिदमब्रवीत् ।

mahādeva uvāca ityuktvā sahasā daityaḥ prāsādastaṁbhamātmanaḥ tāḍayāmāsa hastena prahlādamidamabravīt

महादेव जी ने कहा — ऐसा कहकर उस दैत्य ने सहसा अपने महल के खंभे को हाथ से ठोंककर प्रह्लाद से यह कहा।

श्लोक 88 (padma.6.238.88)

हिरण्यकशिपुरुवाच- अस्मिन्दर्शय तं विष्णुं यदि सर्वगतो भवेत् । अन्यथा त्वां वधिष्यामि मिथ्यावाक्यप्रलापिनम् ।

hiraṇyakaśipuruvāca asmindarśaya taṁ viṣṇuṁ yadi sarvagato bhavet anyathā tvāṁ vadhiṣyāmi mithyāvākyapralāpinam

हिरण्यकशिपु ने कहा — यदि विष्णु सचमुच सर्वव्यापी है, तो उसे इस खंभे में दिखाओ; अन्यथा, मिथ्या बकने वाले तुम्हें मैं मार डालूँगा।

श्लोक 89 (padma.6.238.89)

रुद्र उवाच- इत्युक्त्वा सहसा खङ्गमाकृष्य दितिजेश्वरः । प्रह्लादोरसि चिक्षेप हंतुं खङ्गेन तं रुषा ।

rudra uvāca ityuktvā sahasā khaṅgamākṛṣya ditijeśvaraḥ prahlādorasi cikṣepa haṁtuṁ khaṅgena taṁ ruṣā

रुद्र जी ने कहा — ऐसा कहकर उस दैत्येश्वर ने सहसा तलवार खींचकर, क्रोधवश उससे प्रह्लाद के वक्षस्थल पर मारने के लिए प्रहार किया।

श्लोक 90 (padma.6.238.90)

तस्मिन्क्षणे महाशब्दः स्तंभे संश्रूयते भृशम् । संवर्ताशनिसंरावैः खमिव स्फुटितांतरम् ।

tasminkṣaṇe mahāśabdaḥ staṁbhe saṁśrūyate bhṛśam saṁvartāśanisaṁrāvaiḥ khamiva sphuṭitāṁtaram

उसी क्षण उस खंभे में एक महाध्वनि सुनाई दी, प्रलयकालीन वज्रपात के समान, मानो आकाश ही फट पड़ा हो।

श्लोक 91 (padma.6.238.91)

तेन शब्देन महता दैत्यश्रोत्रविघातिना । सर्वे निपातिता भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः ।

tena śabdena mahatā daityaśrotravighātinā sarve nipātitā bhūmau chinnamūlā iva drumāḥ

उस महाध्वनि से, जो दैत्यों के कानों को बेध डालने वाली थी, सब दैत्य भूमि पर गिर पड़े, जैसे जड़ से कटे वृक्ष।

श्लोक 92 (padma.6.238.92)

बिभ्यंतः संप्लुतं दैत्या मेनिरे वै जगत्त्रयम् । ततः स्तंभे महातेजा निष्क्रांतो वै महाहरिः ।

bibhyaṁtaḥ saṁplutaṁ daityā menire vai jagattrayam tataḥ staṁbhe mahātejā niṣkrāṁto vai mahāhariḥ

भयभीत दैत्यों ने मानो तीनों लोक जलमग्न हो गए हों, ऐसा माना। तब उस खंभे से महातेजस्वी महाहरि प्रकट हुए।

श्लोक 93 (padma.6.238.93)

चकार स महाघोरं जगत्क्षयनिभं स्वनम् । तेन नादेन महता तारकाः पतिता भुवि ।

cakāra sa mahāghoraṁ jagatkṣayanibhaṁ svanam tena nādena mahatā tārakāḥ patitā bhuvi

उन्होंने ऐसी अत्यंत भयंकर, प्रलयकाल के समान गर्जना की। उस महानाद से तारे भी भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 94 (padma.6.238.94)

नृसिंहवपुरास्थाय तत्रैवाविरभूद्धरिः । अनेककोटिसूर्य्याग्नि तेजसा स समावृतः ।

nṛsiṁhavapurāsthāya tatraivāvirabhūddhariḥ anekakoṭisūryyāgni tejasā sa samāvṛtaḥ

वहीं हरि नृसिंह के रूप में प्रकट हुए, करोड़ों सूर्यों और अग्नियों के तेज से घिरे हुए।

श्लोक 95 (padma.6.238.95)

मुखे पंचाननप्रख्यः शरीरे मानुषाकृतिः । दंष्ट्राकरालवदनः स्फुरज्जिह्वाम्बरोद्धतः ।

mukhe paṁcānanaprakhyaḥ śarīre mānuṣākṛtiḥ daṁṣṭrākarālavadanaḥ sphurajjihvāmbaroddhataḥ

मुख में सिंह के समान, शरीर में मानव-आकृति वाले, दाढ़ों से भयंकर मुख, चंचल जिह्वा से आकाश को कंपाते हुए,

श्लोक 96 (padma.6.238.96)

ज्वालावलितकेशांतस्तप्तालातेक्षणो विभुः । सहस्रबाहुभिर्दीर्घैः सर्वायुधसमन्वितैः ।

jvālāvalitakeśāṁtastaptālātekṣaṇo vibhuḥ sahasrabāhubhirdīrghaiḥ sarvāyudhasamanvitaiḥ

ज्वालाओं से युक्त केशों के अंत वाले, तपे हुए अंगारे जैसे नेत्रों वाले, प्रभु — हज़ारों लंबी भुजाओं से, सब आयुधों से युक्त,

श्लोक 97 (padma.6.238.97)

वृतो मेरुरिवाभाति बहुशाखानगान्वितः । दिव्यमाल्यांबरधरो दिव्याभरणभूषितः ।

vṛto merurivābhāti bahuśākhānagānvitaḥ divyamālyāṁbaradharo divyābharaṇabhūṣitaḥ

अनेक शाखाओं वाले वृक्षों से घिरे मेरु पर्वत की भाँति सुशोभित। दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य आभूषणों से विभूषित —

श्लोक 98 (padma.6.238.98)

तस्थौ नृकेसरीरूपः संहर्त्तुं सर्वदानवान् । तं दृष्ट्वा घोरसंकाशं नरसिंहं महाबलम् ।

tasthau nṛkesarīrūpaḥ saṁharttuṁ sarvadānavān taṁ dṛṣṭvā ghorasaṁkāśaṁ narasiṁhaṁ mahābalam

वे नृकेसरी-रूप सब दानवों का संहार करने के लिए खड़े हो गए। उस घोर, महाबली नरसिंह को देखकर —

श्लोक 99 (padma.6.238.99)

दग्धाक्षिपक्ष्मो दैत्येंद्रो विह्वलांगः पपात ह । प्रह्लादोऽथ तदा दृष्ट्वा नारसिंहोपमं हरिम् ।

dagdhākṣipakṣmo daityeṁdro vihvalāṁgaḥ papāta ha prahlādo'tha tadā dṛṣṭvā nārasiṁhopamaṁ harim

आँखें, पलकें जल उठीं, दैत्येंद्र व्याकुल होकर गिर पड़ा। तब प्रह्लाद ने उस नरसिंहरूप हरि को देखकर —

श्लोक 100 (padma.6.238.100)

जयशब्देन देवेशं नमश्चक्रे जनार्दनम् । ददर्श तस्य गात्रेषु नृसिंहस्य महात्मनः । लोकान्समुद्रा न्सद्वीपान्सुरगंधर्वमानुषान् । अजांडानां सहस्रं तु सटाग्रे तस्य दृश्यते ।

jayaśabdena deveśaṁ namaścakre janārdanam dadarśa tasya gātreṣu nṛsiṁhasya mahātmanaḥ lokānsamudrā nsadvīpānsuragaṁdharvamānuṣān ajāṁḍānāṁ sahasraṁ tu saṭāgre tasya dṛśyate

जय-जय शब्द के साथ जनार्दन देवेश को नमस्कार किया। उस महात्मा नरसिंह के अंगों में उसने लोकों, समुद्रों, द्वीपों सहित देवता, गंधर्व, मनुष्यों को देखा; उनकी अयाल के अग्रभाग में हज़ारों ब्रह्मांड दिखाई देते थे।

श्लोक 101 (padma.6.238.101)

दृश्यंते तस्य नेत्रेषु सोमसूर्य्यादयस्तथा । कर्णयोरश्विनौ देवौ दिशश्च विदिशस्तथा ।

dṛśyaṁte tasya netreṣu somasūryyādayastathā karṇayoraśvinau devau diśaśca vidiśastathā

उनके नेत्रों में चंद्र-सूर्य आदि दिखाई देते थे, कानों में अश्विनीकुमार देवगण, तथा दिशाएँ और विदिशाएँ भी।

श्लोक 102 (padma.6.238.102)

ललाटे ब्रह्मरुद्रौ च नभो वायुश्च नासिके । इंद्राग्नी तस्य वक्त्रांतेजिह्वायां तु सरस्वती ।

lalāṭe brahmarudrau ca nabho vāyuśca nāsike iṁdrāgnī tasya vaktrāṁtejihvāyāṁ tu sarasvatī

ललाट में ब्रह्मा और रुद्र, नासिका में आकाश और वायु दिखाई देते थे। उनके मुख के दोनों ओर इंद्र और अग्नि, जिह्वा पर सरस्वती —

श्लोक 103 (padma.6.238.103)

दंष्ट्रासु सिंहशार्दूलाः शरभाश्च महोरगाः । कंठे च दृश्यते मेरुः स्कंधेष्वपि महाद्रयः ।

daṁṣṭrāsu siṁhaśārdūlāḥ śarabhāśca mahoragāḥ kaṁṭhe ca dṛśyate meruḥ skaṁdheṣvapi mahādrayaḥ

दाढ़ों में सिंह, व्याघ्र, शरभ और महासर्प दिखाई देते थे। कंठ में मेरु पर्वत दिखाई देता था, कंधों पर भी बड़े-बड़े पर्वत।

श्लोक 104 (padma.6.238.104)

देवतिर्य्यङ्मनुष्याश्च बाहुष्वपि महात्मनः । नाभौ चास्यांतरिक्षं च पादयोः पृथिवीतथा ।

devatiryyaṅmanuṣyāśca bāhuṣvapi mahātmanaḥ nābhau cāsyāṁtarikṣaṁ ca pādayoḥ pṛthivītathā

उस महात्मा की भुजाओं में देव, पशु-पक्षी और मनुष्य दिखाई देते थे। उनकी नाभि में अंतरिक्ष, और चरणों में पृथ्वी —

श्लोक 105 (padma.6.238.105)

रोमस्वोषधयः सर्वाः पादपा नखपंक्तिषु । निःश्वासेषु च वेदाश्च साङ्गोपाङ्गसमन्विताः ।

romasvoṣadhayaḥ sarvāḥ pādapā nakhapaṁktiṣu niḥśvāseṣu ca vedāśca sāṅgopāṅgasamanvitāḥ

उनके रोमों में सब औषधियाँ, नखों की पंक्तियों में वृक्ष दिखाई देते थे। उनकी श्वासों में अंग-उपांगों सहित वेद दिखाई देते थे।

श्लोक 106 (padma.6.238.106)

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः । सर्वाङ्गेषु प्रदृश्यंते गंधर्वाप्सरसश्च ये ।

ādityā vasavo rudrā viśvedevā marudgaṇāḥ sarvāṅgeṣu pradṛśyaṁte gaṁdharvāpsarasaśca ye

आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, और गंधर्व-अप्सराएँ — ये सब उनके समस्त अंगों में दिखाई देते थे।

श्लोक 107 (padma.6.238.107)

इत्थं विभूतयस्तस्य दृश्यंते परमात्मनः । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं वनमालाविभूषितम् ।

itthaṁ vibhūtayastasya dṛśyaṁte paramātmanaḥ śrīvatsakaustubhoraskaṁ vanamālāvibhūṣitam

इस प्रकार उस परमात्मा की विभूतियाँ दिखाई देती थीं — श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि से युक्त वक्षस्थल, वनमाला से विभूषित,

श्लोक 108 (padma.6.238.108)

शंखचक्रगदाखङ्ग शार्ङ्गाद्यैर्हेतिभिर्युतम् । सर्वोपनिषदामर्थं दृष्ट्वा दैत्येश्वरात्मजः ।

śaṁkhacakragadākhaṅga śārṅgādyairhetibhiryutam sarvopaniṣadāmarthaṁ dṛṣṭvā daityeśvarātmajaḥ

शंख, चक्र, गदा, खड्ग, शार्ङ्ग आदि आयुधों से युक्त। सब उपनिषदों के अर्थस्वरूप उन्हें देखकर दैत्येश्वर-पुत्र प्रह्लाद —

श्लोक 109 (padma.6.238.109)

हर्षाश्रुजलसिक्तांगः प्रणनाम मुहुर्मुहुः । दैत्येंद्रस्तु हरिं दृष्ट्वा क्रोधान्मृत्युवशे स्थितः ।

harṣāśrujalasiktāṁgaḥ praṇanāma muhurmuhuḥ daityeṁdrastu hariṁ dṛṣṭvā krodhānmṛtyuvaśe sthitaḥ

हर्ष के आँसुओं से भीगे शरीर वाला होकर बार-बार प्रणाम करने लगा। किंतु हरि को देखकर दैत्येंद्र, क्रोधवश मृत्यु के वश में पड़ा हुआ —

श्लोक 110 (padma.6.238.110)

योद्धुं खङ्गं समुद्यम्य नृसिंहं तमभिद्रवत् । अथ दैत्यगणाः सर्व्वे लब्धसंज्ञा महाबलाः ।

yoddhuṁ khaṅgaṁ samudyamya nṛsiṁhaṁ tamabhidravat atha daityagaṇāḥ sarvve labdhasaṁjñā mahābalāḥ

तलवार उठाकर युद्ध के लिए उस नरसिंह पर टूट पड़ा। तब सब महाबली, चेत में आए दैत्यगण —

श्लोक 111 (padma.6.238.111)

स्वान्यायुधानि चादाय हरिं जघ्नुस्त्वरान्विताः । पलालकाण्डानि यथा वह्नौ क्षिप्तान्यनेकशः ।

svānyāyudhāni cādāya hariṁ jaghnustvarānvitāḥ palālakāṇḍāni yathā vahnau kṣiptānyanekaśaḥ

अपने-अपने अस्त्र लेकर शीघ्रता से हरि पर टूट पड़े। जैसे पुआल के बंडल अनेक बार अग्नि में डाले जाएँ,

श्लोक 112 (padma.6.238.112)

तथैव भस्मतां यांति महास्त्राणि हरेस्तनौ । तान्यनीकानि दैत्यानां दृष्ट्वा नरहरिस्तदा ।

tathaiva bhasmatāṁ yāṁti mahāstrāṇi harestanau tānyanīkāni daityānāṁ dṛṣṭvā naraharistadā

वैसे ही उन दैत्यों के महान अस्त्र हरि के शरीर पर लगकर भस्म हो गए। दैत्यों की उन सेनाओं को देखकर नरहरि ने तब —

श्लोक 113 (padma.6.238.113)

सटैर्ददाह च ज्वालामालाविरचित स्फुटैः । नृकेसरि सटोद्भूतवह्निना दानवा भृशम् ।

saṭairdadāha ca jvālāmālāviracita sphuṭaiḥ nṛkesari saṭodbhūtavahninā dānavā bhṛśam

अपनी अयाल से, ज्वाला-मालाओं से बिखरी हुई चिंगारियों से उन्हें जला डाला। नृकेसरी की अयाल से उठी अग्नि से दानव अत्यंत —

श्लोक 114 (padma.6.238.114)

निर्भस्मिता गणाः सर्वे निःशेषं तदभूद्बलम् । प्रह्लादं सानुगं हित्वा भस्मिते वीक्ष्य तद्बले ।

nirbhasmitā gaṇāḥ sarve niḥśeṣaṁ tadabhūdbalam prahlādaṁ sānugaṁ hitvā bhasmite vīkṣya tadbale

भस्म हो गए, वह समस्त सेना पूरी तरह नष्ट हो गई। अनुचरों सहित प्रह्लाद को छोड़कर अपनी सारी सेना को भस्म हुई देखकर —

श्लोक 115 (padma.6.238.115)

क्रोधाद्दैत्यपतिः खङ्गमाकृष्याभिप्रपद्यत । खङ्गहस्तं तु दैत्येंद्रं जग्राहैकेन बाहुना ।

krodhāddaityapatiḥ khaṅgamākṛṣyābhiprapadyata khaṅgahastaṁ tu daityeṁdraṁ jagrāhaikena bāhunā

क्रोध से दैत्यराज ने तलवार खींचकर उस पर आक्रमण किया। तलवार हाथ में लिए उस दैत्येंद्र को देवेश ने एक ही भुजा से पकड़ लिया,

श्लोक 116 (padma.6.238.116)

पातयामास देवेशो यथा शाखां महानिलः । गृहीत्वा पतितं भूमौ महाकायं नृकेसरी ।

pātayāmāsa deveśo yathā śākhāṁ mahānilaḥ gṛhītvā patitaṁ bhūmau mahākāyaṁ nṛkesarī

और उसे नीचे गिरा दिया, जैसे प्रचंड वायु किसी डाल को गिरा दे। भूमि पर गिरे उस विशालकाय दैत्य को पकड़कर नृकेसरी ने —

श्लोक 117 (padma.6.238.117)

स्वोत्संगे स्थापयामास ददर्शासौ मुखं हरेः । विष्णुनिंदाकृतंपापंतथावैष्णवदोषजम् ।

svotsaṁge sthāpayāmāsa dadarśāsau mukhaṁ hareḥ viṣṇuniṁdākṛtaṁpāpaṁtathāvaiṣṇavadoṣajam

अपनी गोद में रख लिया, और उसने हरि का मुख देखा। विष्णु-निंदा से उत्पन्न पाप, तथा वैष्णव-अपराध से उत्पन्न दोष —

श्लोक 118 (padma.6.238.118)

नृसिंहस्पर्शनादेवनिर्भस्मितमभूत्तदा । अथदैत्येश्वरस्याथमहद्गात्रंनृकेसरी ।

nṛsiṁhasparśanādevanirbhasmitamabhūttadā athadaityeśvarasyāthamahadgātraṁnṛkesarī

नरसिंह के स्पर्श मात्र से उसी क्षण भस्म हो गए। तब उस दैत्येश्वर के विशाल शरीर को नृकेसरी ने —

श्लोक 119 (padma.6.238.119)

नखेर्विदारयामासतीक्ष्णैर्वज्रनिभैर्घनैः । सनिर्म्मलात्मादैत्येंद्र पःश्यन्साक्षान्मुखं हरेः ।

nakhervidārayāmāsatīkṣṇairvajranibhairghanaiḥ sanirmmalātmādaityeṁdra paḥśyansākṣānmukhaṁ hareḥ

वज्र के समान तीक्ष्ण, सघन नखों से चीर डाला। उस निर्मल हृदय दैत्येंद्र ने हरि का साक्षात् मुख देखते हुए —

श्लोक 120 (padma.6.238.120)

नखनिर्भिन्नहृदयः कृतार्थो विजहावसून् । तद्गात्रं शतधा भित्त्वा नखैस्तीक्ष्णैर्महाहरिः ।

nakhanirbhinnahṛdayaḥ kṛtārtho vijahāvasūn tadgātraṁ śatadhā bhittvā nakhaistīkṣṇairmahāhariḥ

नखों से हृदय बिंधकर, कृतार्थ होकर प्राण त्याग दिए। महाहरि ने उसके शरीर को तीक्ष्ण नखों से सौ टुकड़ों में विदीर्ण करके —

श्लोक 121 (padma.6.238.121)

आकृष्यांत्राणि दीर्घाणि कंठे संसक्तवान्प्रियान् । अथ देवगणाः सर्व्वे मुनयश्च तपोधनाः ।

ākṛṣyāṁtrāṇi dīrghāṇi kaṁṭhe saṁsaktavānpriyān atha devagaṇāḥ sarvve munayaśca tapodhanāḥ

उसकी लंबी अंतड़ियाँ खींचकर उन्हें प्रिय माला की भाँति अपने कंठ में डाल लिया। तब सब देवगण और तपोधन मुनि —

श्लोक 122 (padma.6.238.122)

ब्रह्मरुद्रौ पुरस्कृत्य शनैः स्तोतुं समाययुः । ते प्रसादयितुं भीता ज्वलंतं विश्वतोमुखम् ।

brahmarudrau puraskṛtya śanaiḥ stotuṁ samāyayuḥ te prasādayituṁ bhītā jvalaṁtaṁ viśvatomukham

ब्रह्मा और रुद्र को आगे करके धीरे-धीरे उनकी स्तुति करने आए। उस सर्वतोमुख, प्रज्वलित देव को प्रसन्न करने के लिए भयभीत होकर —

श्लोक 123 (padma.6.238.123)

मातरं जगतां धात्रीं चिंतयामासुरीश्वरीम् । हिरण्यवर्णां हरिणीं सर्व्वोपद्रवनाशिनीम् ।

mātaraṁ jagatāṁ dhātrīṁ ciṁtayāmāsurīśvarīm hiraṇyavarṇāṁ hariṇīṁ sarvvopadravanāśinīm

वे जगत की माता, धात्री, ईश्वरी का ही चिंतन करने लगे।

श्लोक 124 (padma.6.238.124)

विष्णोर्नित्यानवद्यांगीं ध्यात्वा नारायणीं शुभाम् । देवीसूक्तजपैर्भक्त्या नमश्चक्रुः सनातनीम् ।

viṣṇornityānavadyāṁgīṁ dhyātvā nārāyaṇīṁ śubhām devīsūktajapairbhaktyā namaścakruḥ sanātanīm

स्वर्णवर्णा, मृगनयनी, सब उपद्रवों का नाश करने वाली, विष्णु की सदा निर्दोष अंगों वाली शुभ नारायणी का ध्यान करके —

श्लोक 125 (padma.6.238.125)

तैश्चिंत्यमाना सा देवी तत्रैवाविरभूत्तदा । चतुर्भुजा विशालाक्षी सर्वाभरणभूषिता ।

taiściṁtyamānā sā devī tatraivāvirabhūttadā caturbhujā viśālākṣī sarvābharaṇabhūṣitā

देवीसूक्त का जप करते हुए भक्तिपूर्वक उस सनातनी को नमस्कार किया। इस प्रकार उनके द्वारा ध्यान की गई वह देवी वहीं प्रकट हुईं,

श्लोक 126 (padma.6.238.126)

दुकूलवस्त्रसहितां दिव्यमालानुलेपनाम् । तां दृष्ट्वा देवदेवस्य प्रियां सर्वे दिवौकसः ।

dukūlavastrasahitāṁ divyamālānulepanām tāṁ dṛṣṭvā devadevasya priyāṁ sarve divaukasaḥ

चार भुजाओं वाली, विशाल नेत्रों वाली, सब आभूषणों से विभूषित, दिव्य दुकूल वस्त्र, दिव्य माला और अनुलेपन से युक्त। देवाधिदेव की उस प्रिया को देखकर सब स्वर्गवासी —

श्लोक 127 (padma.6.238.127)

ऊचुः प्रांजलयो देवीं प्रसन्नं कुरुते प्रियम् । त्रैलोक्यस्याभयं स्वामी यथा दद्यात्तथा कुरु ।

ūcuḥ prāṁjalayo devīṁ prasannaṁ kurute priyam trailokyasyābhayaṁ svāmī yathā dadyāttathā kuru

हाथ जोड़कर देवी से कहने लगे — 'प्रिय को प्रसन्न कीजिए। स्वामी जिस प्रकार तीनों लोकों को अभय दें, वैसा ही कीजिए।'

श्लोक 128 (padma.6.238.128)

रुद्र उवाच- इत्युक्ता सहसा देवी प्रियं प्राप्य जनार्दनम् । प्रणिपत्य नमस्कृत्य प्रसीदेति उवाच तम् ।

rudra uvāca ityuktā sahasā devī priyaṁ prāpya janārdanam praṇipatya namaskṛtya prasīdeti uvāca tam

रुद्र जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वह देवी सहसा अपने प्रिय जनार्दन के पास पहुँचकर, प्रणाम करके, उनसे 'प्रसन्न हों' यह कहा।

श्लोक 129 (padma.6.238.129)

तां दृष्ट्वा महिषीं स्वस्य प्रियां सर्व्वेश्वरो हरिः । रक्षःशरीरजं क्रोधं तत्याज प्रीतवत्क्षणात् ।

tāṁ dṛṣṭvā mahiṣīṁ svasya priyāṁ sarvveśvaro hariḥ rakṣaḥśarīrajaṁ krodhaṁ tatyāja prītavatkṣaṇāt

उस अपनी प्रिय पत्नी को देखकर सर्वेश्वर हरि ने राक्षस-शरीर से उत्पन्न अपना क्रोध क्षणभर में प्रेमपूर्वक त्याग दिया।

श्लोक 130 (padma.6.238.130)

अंकमादाय तां देवीं समाश्लिष्य दयानिधिः । कृपासुधार्द्रदृष्ट्या वै निरैक्षत सुरान्हरिः ।

aṁkamādāya tāṁ devīṁ samāśliṣya dayānidhiḥ kṛpāsudhārdradṛṣṭyā vai niraikṣata surānhariḥ

उस दयासिंधु ने देवी को गोद में लेकर आलिंगन किया, और कृपा-सुधा से आर्द्र दृष्टि से देवताओं की ओर देखा।

श्लोक 131 (padma.6.238.131)

ततो जयजयेत्युच्चैः स्तुवतां नमतां तदा । तद्दयादृष्टिदृष्टानां सानंदः संभ्रमोऽभवत् ।

tato jayajayetyuccaiḥ stuvatāṁ namatāṁ tadā taddayādṛṣṭidṛṣṭānāṁ sānaṁdaḥ saṁbhramo'bhavat

तब 'जय-जय' कहकर ऊँचे स्वर से स्तुति और प्रणाम करते हुए उन देवताओं को, उस दयादृष्टि से देखे जाने पर, आनंद और संभ्रम दोनों हुए।

श्लोक 132 (padma.6.238.132)

ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः । ऊचुः प्रांजलयो देवं नमस्कृत्य जगत्पतिम् ।

tato devagaṇāḥ sarve harṣanirbharamānasāḥ ūcuḥ prāṁjalayo devaṁ namaskṛtya jagatpatim

तब सब देवगण, हर्ष से भरे मन से, हाथ जोड़कर जगत्पति देव को नमस्कार करते हुए कहने लगे।

श्लोक 133 (padma.6.238.133)

देवगणा ऊचुः - द्रष्टुमत्यद्भुतं तेजो न शक्तास्ते जगत्पते । अत्यद्भुतमिदं रूपं बहुबाहुपदांकितम् ।

devagaṇā ūcuḥ draṣṭumatyadbhutaṁ tejo na śaktāste jagatpate atyadbhutamidaṁ rūpaṁ bahubāhupadāṁkitam

देवताओं ने कहा — हे जगत्पति, हम आपके अत्यंत अद्भुत तेज को देखने में समर्थ नहीं हैं। अनेक भुजाओं और चरणों से चिह्नित यह अत्यंत अद्भुत रूप —

श्लोक 134 (padma.6.238.134)

जगत्त्रयसमाक्रांतं तेजस्तीक्ष्णतरं तव । द्रष्टुं स्थातुं न शक्ताः स्मः सर्व्व एव दिवौकसः ।

jagattrayasamākrāṁtaṁ tejastīkṣṇataraṁ tava draṣṭuṁ sthātuṁ na śaktāḥ smaḥ sarvva eva divaukasaḥ

जो तीनों लोकों को घेरे हुए है, आपका वह अत्यंत तीक्ष्ण तेज — हम सब स्वर्गवासी उसे देखने और उसके सामने खड़े रहने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 135 (padma.6.238.135)

महादेव उवाच-। इत्यर्थितस्तु विबुधैस्तेजस्तदतिभीषणम् । उपसंहृत्य देवेशो बभूव सुखदर्शनः ।

mahādeva uvāca ityarthitastu vibudhaistejastadatibhīṣaṇam upasaṁhṛtya deveśo babhūva sukhadarśanaḥ

महादेव जी ने कहा — देवताओं द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, देवेश ने उस अत्यंत भयंकर तेज को समेटकर सुखद दर्शन वाला रूप धारण किया।

श्लोक 136 (padma.6.238.136)

शरत्कोटींदुसंकाशः पुंडरीकनिभेक्षणः । सुधामय सटापुंज विद्युत्कोटिनिभः शुभः ।

śaratkoṭīṁdusaṁkāśaḥ puṁḍarīkanibhekṣaṇaḥ sudhāmaya saṭāpuṁja vidyutkoṭinibhaḥ śubhaḥ

शरद्-पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमाओं के समान, कमल जैसे नेत्रों वाला, अमृतमय अयाल-राशि से करोड़ों बिजलियों के समान शुभ,

श्लोक 137 (padma.6.238.137)

नानारत्नमयैर्दिव्यैः केयूरैः कटकान्वितैः । बाहुभिः कल्पवृक्षस्य शाखौघैरिव सत्फलैः ।

nānāratnamayairdivyaiḥ keyūraiḥ kaṭakānvitaiḥ bāhubhiḥ kalpavṛkṣasya śākhaughairiva satphalaiḥ

नाना रत्नों से जड़े दिव्य केयूर और कंगन से युक्त भुजाओं वाला — जैसे उत्तम फलों से लदी कल्पवृक्ष की शाखाएँ हों,

श्लोक 138 (padma.6.238.138)

चतुर्भिः कोमलैर्दिव्यैरन्वितः परमेश्वरः । जपाकुसुमसंकाशैः शोभितः करपंकजैः ।

caturbhiḥ komalairdivyairanvitaḥ parameśvaraḥ japākusumasaṁkāśaiḥ śobhitaḥ karapaṁkajaiḥ

चार कोमल दिव्य भुजाओं से युक्त परमेश्वर, जपाकुसुम के समान लाल कमल-हस्तों से सुशोभित,

श्लोक 139 (padma.6.238.139)

शंखचक्रगृहीताभ्यामुद्बाहुभ्यां विराजितः । वरदाभयहस्ताभ्यामितराभ्यां नृकेसरी ।

śaṁkhacakragṛhītābhyāmudbāhubhyāṁ virājitaḥ varadābhayahastābhyāmitarābhyāṁ nṛkesarī

शंख और चक्र धारण किए ऊपर की दो भुजाओं से सुशोभित, वरद और अभय मुद्रा में शेष दो भुजाओं से — वह नृकेसरी —

श्लोक 140 (padma.6.238.140)

श्रीवत्सकौस्तुभोरस्को वनमालाविभूषितः । उद्यद्दिनकाराभ्यां च कुण्डलाभ्यां विराजितः ।

śrīvatsakaustubhorasko vanamālāvibhūṣitaḥ udyaddinakārābhyāṁ ca kuṇḍalābhyāṁ virājitaḥ

श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि से युक्त वक्षस्थल, वनमाला से विभूषित, उदीयमान सूर्य के समान कुंडलों से सुशोभित,

श्लोक 141 (padma.6.238.141)

हारकेयूरकटकैर्भूषणैः समलंकृतः । सव्यांगस्थ श्रियायुक्तो राजते नरकेसरी ।

hārakeyūrakaṭakairbhūṣaṇaiḥ samalaṁkṛtaḥ savyāṁgastha śriyāyukto rājate narakesarī

हार, केयूर और कंगन आदि आभूषणों से सुसज्जित — वह नरकेसरी अपने वाम अंग में लक्ष्मी सहित सुशोभित हो रहा था।

श्लोक 142 (padma.6.238.142)

लक्ष्मीनृसिंहं तं दृष्ट्वा देवताः समहर्षयः । आनन्दाश्रुजलैः सिक्ता हर्षनिर्भरचेतसः ।

lakṣmīnṛsiṁhaṁ taṁ dṛṣṭvā devatāḥ samaharṣayaḥ ānandāśrujalaiḥ siktā harṣanirbharacetasaḥ

उस लक्ष्मी-नृसिंह को देखकर देवगण महर्षियों सहित, आनंद के आँसुओं से भीगकर, हर्ष से भरे मन से —

श्लोक 143 (padma.6.238.143)

आनंदसिंधुमग्नास्ते नमश्चक्रुर्निरंतरम् । अर्चयामासुरात्मेशं दिव्यपुष्पसमर्पणैः ।

ānaṁdasiṁdhumagnāste namaścakrurniraṁtaram arcayāmāsurātmeśaṁ divyapuṣpasamarpaṇaiḥ

आनंद-सागर में डूबे हुए वे निरंतर प्रणाम करने लगे। दिव्य पुष्पों की भेंट से उन्होंने आत्मेश्वर की पूजा की।

श्लोक 144 (padma.6.238.144)

रत्नकुंभैः सुधापूर्णैरभिषिच्य सनातनम् । वस्त्रैराभरणैर्गंधैः पुष्पैर्धूपैर्म्मनोरमैः ।

ratnakuṁbhaiḥ sudhāpūrṇairabhiṣicya sanātanam vastrairābharaṇairgaṁdhaiḥ puṣpairdhūpairmmanoramaiḥ

अमृत से भरे रत्न-कलशों से उस सनातन को अभिषेक करके, वस्त्र, आभूषण, सुगंध, पुष्प और मनोहर धूप से,

श्लोक 145 (padma.6.238.145)

दिव्यैर्निवेदितैर्दीपैरर्च्चयित्वा नृकेसरिम् । तुष्टुवुः स्तवनैर्दिव्यैर्नमश्चक्रुर्म्मुहुर्म्महुः ।

divyairniveditairdīpairarccayitvā nṛkesarim tuṣṭuvuḥ stavanairdivyairnamaścakrurmmuhurmmahuḥ

दिव्य नैवेद्य और दीपों से नृकेसरी की पूजा करके, दिव्य स्तोत्रों से उनकी स्तुति की और बार-बार प्रणाम किया।

श्लोक 146 (padma.6.238.146)

ततः प्रसन्नो लक्ष्मीशस्तेषामिष्टान्वरान्ददौ । ततो देवगणैः सार्धं सर्व्वेशो भक्तवत्सलः ।

tataḥ prasanno lakṣmīśasteṣāmiṣṭānvarāndadau tato devagaṇaiḥ sārdhaṁ sarvveśo bhaktavatsalaḥ

तब प्रसन्न होकर लक्ष्मीपति ने उन्हें इच्छित वर दिए। तब भक्तवत्सल सर्वेश्वर ने देवगणों के साथ —

श्लोक 147 (padma.6.238.147)

प्रह्लादं सर्वदैत्यानां चक्रे राजानमव्ययम् । आश्वास्य भक्तं प्रह्लादमभिषिच्य सुरोत्तमैः ।

prahlādaṁ sarvadaityānāṁ cakre rājānamavyayam āśvāsya bhaktaṁ prahlādamabhiṣicya surottamaiḥ

प्रह्लाद को समस्त दैत्यों का अविनाशी राजा बना दिया। भक्त प्रह्लाद को सांत्वना देकर, श्रेष्ठ देवताओं द्वारा उसका अभिषेक करवाकर —

श्लोक 148 (padma.6.238.148)

ददौ तस्मै वरानिष्टान्भक्तिं चाव्यभिचारिणीम् । ततो देवगणैः सर्वैः स्तूयमानो नृकेसरी ।

dadau tasmai varāniṣṭānbhaktiṁ cāvyabhicāriṇīm tato devagaṇaiḥ sarvaiḥ stūyamāno nṛkesarī

उसे इच्छित वर और अटल भक्ति प्रदान की। तब सब देवगणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए वह नृकेसरी —

श्लोक 149 (padma.6.238.149)

विकीर्णपुष्पवपुभिस्तत्रैवांतरधीयत । ततः सुरगणाः सर्वे स्वंस्वं स्थानं प्रपेदिरे ।

vikīrṇapuṣpavapubhistatraivāṁtaradhīyata tataḥ suragaṇāḥ sarve svaṁsvaṁ sthānaṁ prapedire

अपने शरीर पर बिखेरे गए पुष्पों सहित, वहीं अंतर्धान हो गया। तब सब देवगण अपने-अपने स्थान को लौट गए,

श्लोक 150 (padma.6.238.150)

पुनश्च यज्ञभागान्स्वान्बुभुजुः प्रीतमानसाः । ततो देवाः सगंधर्वा निरातंकाभवंस्तदा ।

punaśca yajñabhāgānsvānbubhujuḥ prītamānasāḥ tato devāḥ sagaṁdharvā nirātaṁkābhavaṁstadā

और प्रसन्नचित्त होकर पुनः अपने-अपने यज्ञभाग भोगने लगे। तब देवता गंधर्वों सहित निर्भय हो गए,

श्लोक 151 (padma.6.238.151)

तस्मिन्हते महादैत्ये सर्व एव प्रहर्षिताः । प्रह्लादस्तु तदा चक्रे राज्यं धर्मेण वैष्णवः ।

tasminhate mahādaitye sarva eva praharṣitāḥ prahlādastu tadā cakre rājyaṁ dharmeṇa vaiṣṇavaḥ

उस महादैत्य के मारे जाने पर सभी अत्यंत हर्षित हुए। प्रह्लाद ने तब वैष्णव होकर धर्मपूर्वक राज्य किया।

श्लोक 152 (padma.6.238.152)

हरेः प्रसादाल्लब्धं तु राज्यं वैष्णवसत्तमः । बहुभिर्यज्ञदानाद्यैरर्चयित्वा नृकेसरिम् ।

hareḥ prasādāllabdhaṁ tu rājyaṁ vaiṣṇavasattamaḥ bahubhiryajñadānādyairarcayitvā nṛkesarim

वह श्रेष्ठ वैष्णव हरि की कृपा से प्राप्त राज्य को अनेक यज्ञों और दानों से, नृकेसरी की पूजा करते हुए [चलाता रहा],

श्लोक 153 (padma.6.238.153)

काले हरिपदं प्राप योगिगम्यं सनातनम् । एतत्प्रह्लादचरितं ये तु शृण्वंति नित्यशः ।

kāle haripadaṁ prāpa yogigamyaṁ sanātanam etatprahlādacaritaṁ ye tu śṛṇvaṁti nityaśaḥ

और समय आने पर योगियों के लिए भी दुर्गम, सनातन हरिपद को प्राप्त किया। यह प्रह्लाद-चरित्र जो लोग सदा सुनते हैं,

श्लोक 154 (padma.6.238.154)

ते सर्वेपापनिर्मुक्ता यास्यंति परमां गतिम् । एतत्ते कथितं देवि नृसिंहं वैभवं हरेः । शेषां च वैभवावस्थां शृणु देवि यथाक्रमम् ।

te sarvepāpanirmuktā yāsyaṁti paramāṁ gatim etatte kathitaṁ devi nṛsiṁhaṁ vaibhavaṁ hareḥ śeṣāṁ ca vaibhavāvasthāṁ śṛṇu devi yathākramam

वे सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। हे देवी, यह हरि का नृसिंह-वैभव तुमसे कहा गया। अब शेष की महिमा भी क्रमशः सुनो, हे देवी।

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