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उत्तर खण्ड · अध्याय 246

मुचुकुंद-मोक्ष

अध्याय 245अध्याय-सूचीअध्याय 247

श्लोक 1 (padma.6.246.1)

श्रीमहेश्वर उवाच- अथोपनयनं नाम चकारानकदुंदुभिः । पुत्रयोर्वेदविधिना तस्मिन्वै रामकृष्णयोः ।

śrīmaheśvara uvāca athopanayanaṁ nāma cakārānakaduṁdubhiḥ putrayorvedavidhinā tasminvai rāmakṛṣṇayoḥ

श्री महेश्वर जी ने कहा — तब आनकदुंदुभि (वसुदेव) ने वेदविधि से अपने दोनों पुत्रों राम-कृष्ण का उपनयन संस्कार किया।

श्लोक 2 (padma.6.246.2)

आचार्येण हि गर्गेण संस्कृतौ रामकेशवौ । पंडितैर्वैष्णवैर्दिव्यैः स्नापनैर्विमलैः शुभैः ।

ācāryeṇa hi gargeṇa saṁskṛtau rāmakeśavau paṁḍitairvaiṣṇavairdivyaiḥ snāpanairvimalaiḥ śubhaiḥ

आचार्य गर्ग द्वारा राम-केशव संस्कारित हुए, दिव्य वैष्णव पंडितों द्वारा निर्मल शुभ स्नानों से।

श्लोक 3 (padma.6.246.3)

कृतसंस्कारकर्माणौ रामकृष्णौ महाबलौ । सांदीपनेर्गृहं गत्वा नमस्कृत्य महात्मनः ।

kṛtasaṁskārakarmāṇau rāmakṛṣṇau mahābalau sāṁdīpanergṛhaṁ gatvā namaskṛtya mahātmanaḥ

संस्कार-कर्म पूर्ण करके वे महाबली राम-कृष्ण सांदीपनि के घर जाकर उस महात्मा को प्रणाम करके —

श्लोक 4 (padma.6.246.4)

अधीत्य वेदशास्त्राणि तस्मात्तौ द्विजपुंगवात् । मृतं पुत्रं समानीय ददतुस्तस्य दक्षिणाम् ।

adhītya vedaśāstrāṇi tasmāttau dvijapuṁgavāt mṛtaṁ putraṁ samānīya dadatustasya dakṣiṇām

उस श्रेष्ठ द्विज से वेद-शास्त्रों का अध्ययन करके, उनके मृत पुत्र को [यमलोक से] लाकर उन्हें गुरु-दक्षिणा में दे दिया।

श्लोक 5 (padma.6.246.5)

आशिषो वचनं लब्ध्वा गुरोस्तस्मान्महात्मनः । तस्मै प्रणम्य मथुरां जग्मतुर्यदुपुंगवौ ।

āśiṣo vacanaṁ labdhvā gurostasmānmahātmanaḥ tasmai praṇamya mathurāṁ jagmaturyadupuṁgavau

उस महात्मा गुरु से आशीर्वचन पाकर, उन्हें प्रणाम करके वे दोनों यदुश्रेष्ठ मथुरा चले गए।

श्लोक 6 (padma.6.246.6)

अथ कृष्णेन निहतं श्रुत्वा कंसं दुरासदम् । श्वशुरस्तस्य नृपतेर्जरासंधो महाबलः ।

atha kṛṣṇena nihataṁ śrutvā kaṁsaṁ durāsadam śvaśurastasya nṛpaterjarāsaṁdho mahābalaḥ

इसके बाद दुर्जय कंस के कृष्ण द्वारा मारे जाने की बात सुनकर उस राजा का ससुर, महाबली जरासंध —

श्लोक 7 (padma.6.246.7)

अक्षौहिणीसहस्रैस्तु सेनानीकैर्महाबलैः । कृष्णं हंतुं समागत्य रुरोध मथुरां पुरीम् ।

akṣauhiṇīsahasraistu senānīkairmahābalaiḥ kṛṣṇaṁ haṁtuṁ samāgatya rurodha mathurāṁ purīm

हज़ारों अक्षौहिणी महाबली सेनाओं सहित कृष्ण को मारने के लिए आकर मथुरा नगरी को घेर लिया।

श्लोक 8 (padma.6.246.8)

रामकृष्णौ महावीर्यौ विनिर्गत्य पुरोत्तमात् । गजवाजिसमाकीर्णं तद्बलौघमपश्यताम् ।

rāmakṛṣṇau mahāvīryau vinirgatya purottamāt gajavājisamākīrṇaṁ tadbalaughamapaśyatām

महापराक्रमी राम-कृष्ण उस श्रेष्ठ नगरी से बाहर निकलकर, हाथी-घोड़ों से भरी उस सेना को देखने लगे।

श्लोक 9 (padma.6.246.9)

सस्मार वासुदेवस्तु पूर्वं रूपं सनातनम् । तस्य स्मरणमात्रेण दारुको विष्णुसारथिः ।

sasmāra vāsudevastu pūrvaṁ rūpaṁ sanātanam tasya smaraṇamātreṇa dāruko viṣṇusārathiḥ

तब वासुदेव ने अपने पूर्व सनातन रूप का स्मरण किया। उस स्मरण मात्र से विष्णु के सारथि दारुक —

श्लोक 10 (padma.6.246.10)

सुग्रीवपुष्पकं नाम समानीय महारथम् । वाजिभिर्दिव्यपुष्पाद्यैरुह्यमानं सनातनम् ।

sugrīvapuṣpakaṁ nāma samānīya mahāratham vājibhirdivyapuṣpādyairuhyamānaṁ sanātanam

सुग्रीव-पुष्पक नामक उस महारथ को, दिव्य [अश्व] पुष्प आदि से खींचे जाते हुए, उस सनातन रथ को लाकर —

श्लोक 11 (padma.6.246.11)

दिव्यायुधैरुपेतं तं शंखचक्रगदादिभिः । वैनतेयपताकेन शोभितं देवदुर्जयम् ।

divyāyudhairupetaṁ taṁ śaṁkhacakragadādibhiḥ vainateyapatākena śobhitaṁ devadurjayam

शंख-चक्र-गदा आदि दिव्य आयुधों से युक्त, गरुड़-पताका से सुशोभित, देवताओं के लिए भी दुर्जय उस रथ को —

श्लोक 12 (padma.6.246.12)

अवनीं प्राप्य गोविंदं प्रणम्य हरिसारथिः । प्रददौ स्यंदनं शुभ्रं सायुधाश्वसमन्वितम् ।

avanīṁ prāpya goviṁdaṁ praṇamya harisārathiḥ pradadau syaṁdanaṁ śubhraṁ sāyudhāśvasamanvitam

धरती पर पहुँचकर, गोविंद को प्रणाम करके, हरि के सारथि ने वह शुभ्र रथ आयुध-अश्वों सहित अर्पित कर दिया।

श्लोक 13 (padma.6.246.13)

दृष्ट्वा हर्षेण कृष्णोऽपि परिणीय महारथम् । आरुरोहाग्रजेनैव स्तूयमानो मरुद्गणैः ।

dṛṣṭvā harṣeṇa kṛṣṇo'pi pariṇīya mahāratham ārurohāgrajenaiva stūyamāno marudgaṇaiḥ

उसे देखकर हर्षित कृष्ण ने भी उस महारथ की परिक्रमा करके, अपने बड़े भाई के साथ ही, मरुद्गणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए उस पर आरोहण किया।

श्लोक 14 (padma.6.246.14)

चतुर्भुजं वपुर्भूत्वा शंखचक्रगदासिभृत् । किरीटी कुंडली स्रग्वी संग्रामाभिमुखं ययौ ।

caturbhujaṁ vapurbhūtvā śaṁkhacakragadāsibhṛt kirīṭī kuṁḍalī sragvī saṁgrāmābhimukhaṁ yayau

चतुर्भुज रूप धारण करके, शंख-चक्र-गदा-खड्गधारी, मुकुटधारी, कुंडलधारी, माला से युक्त होकर वे युद्ध की ओर चले।

श्लोक 15 (padma.6.246.15)

बलदेवोऽपि मुशलं लांगलं गृह्य वीर्यवान् । तत्सैन्यं हंतुमारेभे महेश्वर इवापरः ।

baladevo'pi muśalaṁ lāṁgalaṁ gṛhya vīryavān tatsainyaṁ haṁtumārebhe maheśvara ivāparaḥ

बलदेव भी बलपूर्वक मूसल और हल लेकर, दूसरे महेश्वर की भाँति उस सेना का संहार करने लगे।

श्लोक 16 (padma.6.246.16)

दारुकश्च रथं शीघ्रं नोदयामास तद्रणे । तृणगुल्मलताक्रांते काननेऽग्निमिवानिलः ।

dārukaśca rathaṁ śīghraṁ nodayāmāsa tadraṇe tṛṇagulmalatākrāṁte kānane'gnimivānilaḥ

दारुक ने रथ को शीघ्रता से उस युद्ध में हाँका, जैसे वायु घास-झाड़ी-लताओं से भरे वन में अग्नि को हाँकती है।

श्लोक 17 (padma.6.246.17)

ततो गदाभिः परिघैः शक्तिभिर्मुद्गरैस्तथा । तद्रथं छादयामासुर्जरासंधस्य सैनिकाः ।

tato gadābhiḥ parighaiḥ śaktibhirmudgaraistathā tadrathaṁ chādayāmāsurjarāsaṁdhasya sainikāḥ

तब जरासंध के सैनिकों ने गदाओं, परिघों, शक्तियों और मुद्गरों से उस रथ को ढक दिया।

श्लोक 18 (padma.6.246.18)

चक्रेणैव हरिस्तूर्णं तानि चिच्छेद लीलया । बहूनि तृणकाष्ठानि महावह्निरिवार्चिषा ।

cakreṇaiva haristūrṇaṁ tāni ciccheda līlayā bahūni tṛṇakāṣṭhāni mahāvahnirivārciṣā

हरि ने चक्र से ही उन्हें तुरंत लीलामात्र में काट डाला, जैसे महाअग्नि अपनी ज्वाला से अनेक तिनके-लकड़ियाँ भस्म कर दे।

श्लोक 19 (padma.6.246.19)

ततः शार्ङ्गं समादाय सायकैरक्षयैः शितैः । चिच्छेद तानि सैन्यानि न प्राज्ञायत किंचन ।

tataḥ śārṅgaṁ samādāya sāyakairakṣayaiḥ śitaiḥ ciccheda tāni sainyāni na prājñāyata kiṁcana

फिर शार्ङ्ग धनुष उठाकर तीक्ष्ण, अक्षय बाणों से उन सेनाओं को काट डाला — कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।

श्लोक 20 (padma.6.246.20)

चक्रच्छिन्नास्यकमलाः केचित्तत्र महाबलाः । गदया चूर्णिताः केचित्केचिदन्यैर्महारणे ।

cakracchinnāsyakamalāḥ kecittatra mahābalāḥ gadayā cūrṇitāḥ kecitkecidanyairmahāraṇe

वहाँ कुछ महाबली योद्धाओं के मुख-कमल चक्र से कट गए, कुछ गदा से चूर हो गए, कुछ अन्यों से उस महासंग्राम में —

श्लोक 21 (padma.6.246.21)

केचिच्चैवासिनाछिन्नास्तथान्ये शरताडिताः । लांगलाग्रहतग्रीवा मुशलाहतमस्तकाः ।

keciccaivāsināchinnāstathānye śaratāḍitāḥ lāṁgalāgrahatagrīvā muśalāhatamastakāḥ

कुछ तलवार से कट गए, कुछ बाणों से बिंध गए; हल के अग्रभाग से गर्दन कट गई, मूसल से सिर कुचल गए।

श्लोक 22 (padma.6.246.22)

क्षणेन तद्बलं सर्वं निहत्य मधुसूदनः । शंखं दध्मौ यदुश्रेष्ठो लयाशनि निभस्वनम् ।

kṣaṇena tadbalaṁ sarvaṁ nihatya madhusūdanaḥ śaṁkhaṁ dadhmau yaduśreṣṭho layāśani nibhasvanam

क्षणभर में उस पूरी सेना का संहार करके यदुश्रेष्ठ मधुसूदन ने प्रलयकाल की गर्जना जैसा शंख बजाया।

श्लोक 23 (padma.6.246.23)

शंखरावविनिर्भिन्नहृदयास्ते महाबलाः । योधाः साश्वाः सनागाश्च पतितास्त्यक्तजीविताः ।

śaṁkharāvavinirbhinnahṛdayāste mahābalāḥ yodhāḥ sāśvāḥ sanāgāśca patitāstyaktajīvitāḥ

शंखनाद से हृदय विदीर्ण होकर वे महाबली योद्धा, अपने घोड़ों-हाथियों सहित, प्राण त्यागकर गिर पड़े।

श्लोक 24 (padma.6.246.24)

अक्षौहिणीसहस्रं तु साश्वं सरथकुंजरम् । कृष्णेनैकेन निहतं निःशेषं तदभूद्बलम् ।

akṣauhiṇīsahasraṁ tu sāśvaṁ sarathakuṁjaram kṛṣṇenaikena nihataṁ niḥśeṣaṁ tadabhūdbalam

अश्व-रथ-हाथियों सहित वह हज़ार अक्षौहिणियों की सेना, अकेले कृष्ण द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दी गई —

श्लोक 25 (padma.6.246.25)

निहतं वासुदेवेन प्रहरार्द्धेन शार्ङ्गिणा । ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरचेतसः ।

nihataṁ vāsudevena praharārddhena śārṅgiṇā tato devagaṇāḥ sarve harṣanirbharacetasaḥ

शार्ङ्गधारी वासुदेव द्वारा आधे प्रहर में ही मार डाली गई। तब सब देवगण हर्ष से भरे मन से —

श्लोक 26 (padma.6.246.26)

ववृषुः पुष्पवर्षाणि साधुसाध्विति चाब्रुवन् । सर्वमप्यवनीभारं विमुच्य धरणीधरः ।

vavṛṣuḥ puṣpavarṣāṇi sādhusādhviti cābruvan sarvamapyavanībhāraṁ vimucya dharaṇīdharaḥ

पुष्पों की वर्षा करने लगे और 'साधु-साधु' कहने लगे। समूचे पृथ्वी-भार को उतारकर धरणीधर कृष्ण —

श्लोक 27 (padma.6.246.27)

संस्तूयमानस्त्रिदशैर्बभौ संग्राममूर्द्धनि । निहतं स्वबलं दृष्ट्वा जरासंधोऽतिवीर्यवान् ।

saṁstūyamānastridaśairbabhau saṁgrāmamūrddhani nihataṁ svabalaṁ dṛṣṭvā jarāsaṁdho'tivīryavān

देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए युद्धभूमि के शीर्ष पर सुशोभित हुए। अपनी सेना का संहार देखकर अत्यंत पराक्रमी जरासंध —

श्लोक 28 (padma.6.246.28)

योद्धुमभ्याययौ तूर्णं बलदेवेन दुर्मतिः । तयोर्युद्धमभूद्धोरं संग्रामेष्वनिवर्तिनोः ।

yoddhumabhyāyayau tūrṇaṁ baladevena durmatiḥ tayoryuddhamabhūddhoraṁ saṁgrāmeṣvanivartinoḥ

वह दुर्बुद्धि शीघ्र ही बलदेव से युद्ध करने के लिए आ गया। युद्ध में कभी पीछे न हटने वाले उन दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ।

श्लोक 29 (padma.6.246.29)

रामो लांगलमादाय रथं तस्य ससारथिम् । विनिपात्य रणे शूरो गृहीत्वा तं महाबलम् ।

rāmo lāṁgalamādāya rathaṁ tasya sasārathim vinipātya raṇe śūro gṛhītvā taṁ mahābalam

राम ने हल लेकर उसके सारथि सहित रथ को गिराकर, युद्ध में उस वीर ने उस महाबली को पकड़ लिया,

श्लोक 30 (padma.6.246.30)

उद्यम्य मुशलं तूर्णं तं हंतुमुपचक्रमे । प्राणसंशयमापन्नं जरासंधं नृपोत्तमम् ।

udyamya muśalaṁ tūrṇaṁ taṁ haṁtumupacakrame prāṇasaṁśayamāpannaṁ jarāsaṁdhaṁ nṛpottamam

मूसल उठाकर तुरंत ही उसे मारने लगे। प्राणसंकट में पड़े उस श्रेष्ठ राजा जरासंध की वह दशा —

श्लोक 31 (padma.6.246.31)

कृतं रामेण बलिना सिंहेनेव महागजम् । दृष्ट्वा कृष्णोग्रजं प्राह न हंतव्य इति प्रभुः ।

kṛtaṁ rāmeṇa balinā siṁheneva mahāgajam dṛṣṭvā kṛṣṇograjaṁ prāha na haṁtavya iti prabhuḥ

बलवान राम ने वैसे ही कर दी जैसे सिंह किसी महागज को कर देता है। यह देखकर प्रभु कृष्ण ने अपने बड़े भाई से कहा, 'इसे मत मारो।'

श्लोक 32 (padma.6.246.32)

मोचयामास धर्मात्मा जरासंधं महामतिः । विमुच्य कृष्णवाक्येन शत्रुं संकर्षणोऽव्ययः ।

mocayāmāsa dharmātmā jarāsaṁdhaṁ mahāmatiḥ vimucya kṛṣṇavākyena śatruṁ saṁkarṣaṇo'vyayaḥ

उस धर्मात्मा महामति ने जरासंध को छोड़ दिया। कृष्ण के वचन से शत्रु को मुक्त करके अविनाशी संकर्षण —

श्लोक 33 (padma.6.246.33)

सानुजो रथमारुह्य मथुरां प्रविवेश ह । स कालयवनं प्राप्य महावीर्यं बलान्वितम् ।

sānujo rathamāruhya mathurāṁ praviveśa ha sa kālayavanaṁ prāpya mahāvīryaṁ balānvitam

अपने छोटे भाई सहित रथ पर सवार होकर मथुरा में प्रविष्ट हुआ। वह जरासंध महापराक्रमी, महाबली कालयवन के पास जाकर —

श्लोक 34 (padma.6.246.34)

पुत्रयोर्वसुदेवस्य समाचष्ट पराक्रमम् । दानवानां वधं चैव कंसस्य निधनं तथा ।

putrayorvasudevasya samācaṣṭa parākramam dānavānāṁ vadhaṁ caiva kaṁsasya nidhanaṁ tathā

वसुदेव के दोनों पुत्रों का पराक्रम कह सुनाया — दानवों का वध और कंस की मृत्यु,

श्लोक 35 (padma.6.246.35)

अक्षौहिणीनां च वधं तथा स्वस्य पराजयम् । सर्वं निवेदयामास कृष्णस्य चरितं महत् ।

akṣauhiṇīnāṁ ca vadhaṁ tathā svasya parājayam sarvaṁ nivedayāmāsa kṛṣṇasya caritaṁ mahat

अपनी अक्षौहिणियों का संहार तथा अपनी स्वयं की पराजय — कृष्ण के उस महान चरित्र को उसने पूरी तरह बता दिया।

श्लोक 36 (padma.6.246.36)

तच्छ्रुत्वा यवनः क्रुद्धो महाबलपराक्रमैः । म्लेच्छकोटिसहस्रैस्तु संवृतो मदसंयुतैः ।

tacchrutvā yavanaḥ kruddho mahābalaparākramaiḥ mlecchakoṭisahasraistu saṁvṛto madasaṁyutaiḥ

यह सुनकर वह यवन क्रोधित हो उठा, और महाबली-पराक्रमी, मदमत्त करोड़ों-हज़ारों म्लेच्छों से घिरा हुआ —

श्लोक 37 (padma.6.246.37)

मगधाधिपतेस्तस्य सहायार्थं महाबलः । तेनैव सहितस्तूर्णं जगाम मथुरां पुरीम् ।

magadhādhipatestasya sahāyārthaṁ mahābalaḥ tenaiva sahitastūrṇaṁ jagāma mathurāṁ purīm

वह महाबली उस मगधाधिपति की सहायता के लिए, उसी के साथ शीघ्रता से मथुरा नगरी की ओर चल पड़ा।

श्लोक 38 (padma.6.246.38)

बलैराच्छाद्य पृथिवीं नानाजनपदान्विताम् । संनिवेश्य महासैन्यं रुरोध मथुरां पुरीम् ।

balairācchādya pṛthivīṁ nānājanapadānvitām saṁniveśya mahāsainyaṁ rurodha mathurāṁ purīm

नाना जनपदों से युक्त पृथ्वी को अपनी सेनाओं से ढककर, महासेना स्थापित करके उसने मथुरा नगरी को घेर लिया।

श्लोक 39 (padma.6.246.39)

कृष्णोऽपि चिंतयित्वाऽथ पौराणां कुशलं तदा । ययाचे सागरं भूमिं निवासार्थं जनस्य च ।

kṛṣṇo'pi ciṁtayitvā'tha paurāṇāṁ kuśalaṁ tadā yayāce sāgaraṁ bhūmiṁ nivāsārthaṁ janasya ca

तब कृष्ण ने नगरवासियों के कल्याण की चिंता करके, अपनी प्रजा के निवास के लिए समुद्र से भूमि माँगी।

श्लोक 40 (padma.6.246.40)

त्रिंशद्योजनविस्तीर्णां ददौ कृष्णस्य सागरः । असृजत्पयसां मध्ये तत्र द्वारवतीं पुरीम् ।

triṁśadyojanavistīrṇāṁ dadau kṛṣṇasya sāgaraḥ asṛjatpayasāṁ madhye tatra dvāravatīṁ purīm

समुद्र ने कृष्ण को तीस योजन विस्तृत भूमि दी। उन्होंने जल के मध्य वहाँ द्वारवती नगरी बनाई,

श्लोक 41 (padma.6.246.41)

बहुप्रासादसंयुक्तां हेमप्राकारतोरणाम् । नानामणिमयैर्दिव्यैर्गृहपंक्तिभिरावृताम् ।

bahuprāsādasaṁyuktāṁ hemaprākāratoraṇām nānāmaṇimayairdivyairgṛhapaṁktibhirāvṛtām

अनेक महलों से युक्त, स्वर्ण-प्राचीरों और तोरणों से युक्त, नाना रत्नों से जड़े दिव्य घरों की पंक्तियों से घिरी हुई,

श्लोक 42 (padma.6.246.42)

उद्यानैश्च तथा रम्यैस्तडागैर्बहुभिर्युताम् । असृजत्पुंडरीकाक्षो यथेंद्रस्यामरावतीम् ।

udyānaiśca tathā ramyaistaḍāgairbahubhiryutām asṛjatpuṁḍarīkākṣo yatheṁdrasyāmarāvatīm

तथा मनोहर उद्यानों और अनेक तालाबों से युक्त — उन कमलनयन ने उसे वैसे ही रचा जैसे इंद्र की अमरावती।

श्लोक 43 (padma.6.246.43)

सुषुप्तान्मथुरायां तु पौरांस्तत्र जनार्दनः । उद्धृत्य सहसा रात्रौ द्वारावत्यां निवेशयत् ।

suṣuptānmathurāyāṁ tu paurāṁstatra janārdanaḥ uddhṛtya sahasā rātrau dvārāvatyāṁ niveśayat

मथुरा में सोए हुए नगरवासियों को जनार्दन ने रात्रि में सहसा उठाकर द्वारवती में बसा दिया।

श्लोक 44 (padma.6.246.44)

प्रबुद्धास्ते जनाः सर्वे पुत्रदारसमन्विताः । हेमहर्म्यतलेविष्टा विस्मयं परमं ययुः ।

prabuddhāste janāḥ sarve putradārasamanvitāḥ hemaharmyataleviṣṭā vismayaṁ paramaṁ yayuḥ

जागने पर वे सब लोग, अपने पुत्र-पत्नियों सहित, स्वर्ण-महलों के आँगन में बैठे पाकर परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 45 (padma.6.246.45)

बहुभिर्धनधान्यैश्च दिव्यवस्त्रविभूषणैः । परिपूर्णैरिवाभोगैर्गृहमुख्यैः समावृताः ।

bahubhirdhanadhānyaiśca divyavastravibhūṣaṇaiḥ paripūrṇairivābhogairgṛhamukhyaiḥ samāvṛtāḥ

अनेक धन-धान्य, दिव्य वस्त्र-आभूषणों और भरपूर भोग-सामग्री से युक्त श्रेष्ठ घरों से घिरे हुए —

श्लोक 46 (padma.6.246.46)

तस्मिन्प्रहृष्टाः संतस्थुर्दिवि देवगणा इव । यवनेन तदा योद्धुं रामकृष्णौ महाबलौ ।

tasminprahṛṣṭāḥ saṁtasthurdivi devagaṇā iva yavanena tadā yoddhuṁ rāmakṛṣṇau mahābalau

वे वहाँ स्वर्ग के देवताओं की भाँति अत्यंत हर्षित होकर रहने लगे। तब उस यवन से युद्ध करने के लिए महाबली राम-कृष्ण —

श्लोक 47 (padma.6.246.47)

विनिर्ययतुरात्मेशौ मथुराया बहिस्तदा । रामो लांगलमादाय मुशलं च महारथः ।

viniryayaturātmeśau mathurāyā bahistadā rāmo lāṁgalamādāya muśalaṁ ca mahārathaḥ

वे दोनों आत्मेश्वर मथुरा से बाहर निकले। महारथी राम ने हल और मूसल उठाकर —

श्लोक 48 (padma.6.246.48)

जघान समरे क्रुद्धो यवनानां महद्बलम् । कृष्णस्तु शार्ङ्गमासज्य बाणैरग्निशिखोपमैः ।

jaghāna samare kruddho yavanānāṁ mahadbalam kṛṣṇastu śārṅgamāsajya bāṇairagniśikhopamaiḥ

क्रोधित होकर युद्ध में यवनों की विशाल सेना का संहार किया। कृष्ण ने शार्ङ्ग धनुष चढ़ाकर, अग्नि-शिखा जैसे बाणों से —

श्लोक 49 (padma.6.246.49)

निर्ददाह बलं सर्वं म्लेच्छानां देवकीसुतः । निहतं स्वबलं दृष्ट्वा स कालयवनो बली ।

nirdadāha balaṁ sarvaṁ mlecchānāṁ devakīsutaḥ nihataṁ svabalaṁ dṛṣṭvā sa kālayavano balī

देवकीपुत्र ने म्लेच्छों की सारी सेना जला डाली। अपनी सेना नष्ट होते देखकर वह बलवान कालयवन —

श्लोक 50 (padma.6.246.50)

युयुधे वासुदेवेन गदया यवनेश्वरः । कृष्णोऽपि कदनं तेन कृत्वा चिरमनामयः । विमुखः प्राद्रवत्तस्मात्संग्रामात्कमलेक्षणः । सोनुयातोऽतिवेगेन तिष्ठतिष्ठेति चाब्रुवन् ।

yuyudhe vāsudevena gadayā yavaneśvaraḥ kṛṣṇo'pi kadanaṁ tena kṛtvā ciramanāmayaḥ vimukhaḥ prādravattasmātsaṁgrāmātkamalekṣaṇaḥ sonuyāto'tivegena tiṣṭhatiṣṭheti cābruvan

वह यवनराज वासुदेव से गदा-युद्ध करने लगा। कृष्ण ने भी उससे बहुत देर तक युद्ध करके, स्वस्थचित्त रहते हुए भी, कमलनयन ने उस संग्राम से मुँह मोड़कर भागना शुरू किया, और वह तेजी से उनके पीछे 'ठहरो, ठहरो' कहते हुए दौड़ा।

श्लोक 51 (padma.6.246.51)

वेगात्कृष्णो गिरिगुहां प्रविवेश महामतिः । तत्र प्रसुप्तो राजाऽसौ मुचुकुंदो महामुनिः ।

vegātkṛṣṇo giriguhāṁ praviveśa mahāmatiḥ tatra prasupto rājā'sau mucukuṁdo mahāmuniḥ

तेज़ी से महामति कृष्ण एक पर्वत-गुफा में प्रविष्ट हो गए। वहाँ सोए हुए थे राजा महामुनि मुचुकुंद।

श्लोक 52 (padma.6.246.52)

अदृश्यस्तस्य नृपतेः संस्थितो भगवान्हरिः । यवनोऽपि महावीरो गदामुद्यम्य पाणिना ।

adṛśyastasya nṛpateḥ saṁsthito bhagavānhariḥ yavano'pi mahāvīro gadāmudyamya pāṇinā

उस राजा को अदृश्य रहकर भगवान् हरि वहीं ठहर गए। वह महावीर यवन भी हाथ में गदा उठाए —

श्लोक 53 (padma.6.246.53)

कृष्णं हंतु समारब्धो गुहां तां प्रविवेश ह । दृष्ट्वा शयानं राजानं मत्वा कृष्णं जनार्दनम् ।

kṛṣṇaṁ haṁtu samārabdho guhāṁ tāṁ praviveśa ha dṛṣṭvā śayānaṁ rājānaṁ matvā kṛṣṇaṁ janārdanam

कृष्ण को मारने के लिए उस गुफा में प्रविष्ट हुआ। सोए हुए राजा को देखकर, उसे कृष्ण जनार्दन समझकर —

श्लोक 54 (padma.6.246.54)

पादेन ताडयामास मुचुकुंदं महामुनिम् । ततः प्रबुद्धो भगवान्मुचुकुंदो महामुनिः ।

pādena tāḍayāmāsa mucukuṁdaṁ mahāmunim tataḥ prabuddho bhagavānmucukuṁdo mahāmuniḥ

उसने पैर से महामुनि मुचुकुंद को ठोकर मारी। तब जागे हुए भगवान् महामुनि मुचुकुंद ने —

श्लोक 55 (padma.6.246.55)

क्रोधात्संरक्तनयनो हुंकारं कृतवानसौ । तस्य हुंकारशब्देन तथा क्रोधनिरीक्षणात् ।

krodhātsaṁraktanayano huṁkāraṁ kṛtavānasau tasya huṁkāraśabdena tathā krodhanirīkṣaṇāt

क्रोध से लाल नेत्रों वाले होकर 'हुंकार' किया। उसके हुंकार-शब्द और क्रोधपूर्ण दृष्टि से —

श्लोक 56 (padma.6.246.56)

निर्दग्धो भस्मतां प्राप यवनस्त्यक्तजीवितः । ततस्तु कृष्णो ददृशे राजर्षेः पुरतः प्रभुः ।

nirdagdho bhasmatāṁ prāpa yavanastyaktajīvitaḥ tatastu kṛṣṇo dadṛśe rājarṣeḥ purataḥ prabhuḥ

वह यवन जलकर भस्म हो गया, प्राण त्याग दिया। तब प्रभु कृष्ण उस राजर्षि के सामने प्रकट हुए,

श्लोक 57 (padma.6.246.57)

नीलोत्पलदलश्यामः पुंडरीकनिभेक्षणः । शंखचक्रगदापाणिः पीतवासा जनार्दनः ।

nīlotpaladalaśyāmaḥ puṁḍarīkanibhekṣaṇaḥ śaṁkhacakragadāpāṇiḥ pītavāsā janārdanaḥ

नीलकमल-दल के समान श्याम, कमल जैसे नेत्रों वाले, शंख-चक्र-गदाधारी, पीतांबरधारी जनार्दन।

श्लोक 58 (padma.6.246.58)

दृष्ट्वा तं सहसोत्थाय राजर्षिरमितौजसम् । अहोभाग्यमहोभाग्यमित्युवाच महामुनिः ।

dṛṣṭvā taṁ sahasotthāya rājarṣiramitaujasam ahobhāgyamahobhāgyamityuvāca mahāmuniḥ

उन अमित तेजस्वी को देखकर वह राजर्षि सहसा उठकर 'अहो भाग्य, अहो भाग्य' कहने लगा, वह महामुनि —

श्लोक 59 (padma.6.246.59)

पुलकांकितसर्वांगः सानंदाश्रुजलाकुलः । स्तुवन्वै जयशब्देन प्रणनाम मुहुर्मुहुः ।

pulakāṁkitasarvāṁgaḥ sānaṁdāśrujalākulaḥ stuvanvai jayaśabdena praṇanāma muhurmuhuḥ

रोमांचित शरीर, आनंदाश्रुओं से व्याकुल होकर जय-जयकार से स्तुति करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगा।

श्लोक 60 (padma.6.246.60)

मुचुकुंद उवाच- धन्योस्मि कृतकृत्योस्मि दर्शनात्परमेश्वर । अद्य मे सफलं जन्म जीवितं सफलं मम ।

mucukuṁda uvāca dhanyosmi kṛtakṛtyosmi darśanātparameśvara adya me saphalaṁ janma jīvitaṁ saphalaṁ mama

मुचुकुंद ने कहा — हे परमेश्वर, आपके दर्शन से मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ, मेरा जीवन सफल हुआ।

श्लोक 61 (padma.6.246.61)

नमस्ते वासुदेवाय जगन्नाथाय शार्ङ्गिणे । दामोदराय देवाय तेजसां निधये नमः ।

namaste vāsudevāya jagannāthāya śārṅgiṇe dāmodarāya devāya tejasāṁ nidhaye namaḥ

हे वासुदेव, हे जगन्नाथ, हे शार्ङ्गधारी, आपको नमस्कार। हे दामोदर देव, हे तेजों के निधि, आपको नमस्कार।

श्लोक 62 (padma.6.246.62)

अधोक्षजाय हरये नृसिंहवपुषे नमः । राघवाय नमस्तुभ्यं पुंडरीकेक्षणाय च ।

adhokṣajāya haraye nṛsiṁhavapuṣe namaḥ rāghavāya namastubhyaṁ puṁḍarīkekṣaṇāya ca

हे अधोक्षज, हे हरि, नृसिंह-रूप को नमस्कार। हे राघव, आपको नमस्कार, हे कमलनयन आपको नमस्कार।

श्लोक 63 (padma.6.246.63)

अच्युतायाविकाराय तथानंताय ते नमः । गोविंदाय नमस्तुभ्यं विष्णवे जिष्णवे नमः ।

acyutāyāvikārāya tathānaṁtāya te namaḥ goviṁdāya namastubhyaṁ viṣṇave jiṣṇave namaḥ

अच्युत, अविकारी, तथा अनंत आपको नमस्कार। हे गोविंद आपको नमस्कार, विष्णु सदाविजयी को नमस्कार।

श्लोक 64 (padma.6.246.64)

नारायणाय श्रीशाय कृष्णाय परमात्मने । मुकुंदाय नमस्तुभ्यं चतुर्व्यूहाय ते नमः ।

nārāyaṇāya śrīśāya kṛṣṇāya paramātmane mukuṁdāya namastubhyaṁ caturvyūhāya te namaḥ

नारायण, श्रीश, कृष्ण, परमात्मा को नमस्कार। हे मुकुंद आपको नमस्कार, चतुर्व्यूह स्वरूप आपको नमस्कार।

श्लोक 65 (padma.6.246.65)

नमः परमकल्याण नमस्ते परमात्मने । वासुदेवाय शांताय यदूनां पतये नमः ।

namaḥ paramakalyāṇa namaste paramātmane vāsudevāya śāṁtāya yadūnāṁ pataye namaḥ

हे परम कल्याण आपको नमस्कार, हे परमात्मा आपको नमस्कार। शांतस्वरूप वासुदेव, यदुपति को नमस्कार।

श्लोक 66 (padma.6.246.66)

महेश्वर उवाच- एवं स्तुत्वा तु गोविंदं प्रणनाम पुनः पुनः । संतुष्टो भगवान्प्राह मुचुकुंदं महामुनिम् ।

maheśvara uvāca evaṁ stutvā tu goviṁdaṁ praṇanāma punaḥ punaḥ saṁtuṣṭo bhagavānprāha mucukuṁdaṁ mahāmunim

महेश्वर जी ने कहा — इस प्रकार गोविंद की स्तुति करके उसने बार-बार प्रणाम किया। संतुष्ट भगवान् ने महामुनि मुचुकुंद से कहा।

श्लोक 67 (padma.6.246.67)

श्रीभगवानुवाच- वरं वृणीष्व राजर्षे यत्ते मनसि वर्त्तते । महेश्वर उवाच- सोऽपि मुक्तिं ययाचाथ पुनरावृत्तिवर्जिताम् ।

śrībhagavānuvāca varaṁ vṛṇīṣva rājarṣe yatte manasi varttate maheśvara uvāca so'pi muktiṁ yayācātha punarāvṛttivarjitām

श्रीभगवान् ने कहा — हे राजर्षि, जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो। महेश्वर जी ने कहा — तब उसने पुनरावृत्ति-रहित मुक्ति ही माँगी।

श्लोक 68 (padma.6.246.68)

तस्मै ददौ तदा कृष्णो दिव्यं लोकं सनातनम् । राजा तु मानुषं रूपं विहायाथ महामतिः ।

tasmai dadau tadā kṛṣṇo divyaṁ lokaṁ sanātanam rājā tu mānuṣaṁ rūpaṁ vihāyātha mahāmatiḥ

तब कृष्ण ने उसे वह सनातन दिव्य लोक प्रदान किया। और वह महामति राजा मानव-रूप त्यागकर —

श्लोक 69 (padma.6.246.69)

समानं रूपमास्थाय देवस्य परमात्मनः । वैनतेयं समारुह्य शाश्वतं पदमाविशत् ।

samānaṁ rūpamāsthāya devasya paramātmanaḥ vainateyaṁ samāruhya śāśvataṁ padamāviśat

परमात्मा देव के समान रूप धारण करके, गरुड़ पर सवार होकर उस शाश्वत पद में प्रविष्ट हो गया।

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