उत्तर खण्ड · अध्याय 249
श्रीवासुदेव-विवाह-कथन
श्लोक 1 (padma.6.249.1)
श्रीरुद्र उवाच- सत्राजितस्य तनया नाम्ना सत्या यशस्विनी । पृथिव्यंशेन संभूता भार्यां कृष्णस्य वा परा ।
śrīrudra uvāca satrājitasya tanayā nāmnā satyā yaśasvinī pṛthivyaṁśena saṁbhūtā bhāryāṁ kṛṣṇasya vā parā
श्री रुद्र जी ने कहा — सत्राजित की यशस्विनी पुत्री, सत्या नाम से, पृथ्वी के अंश से उत्पन्न, कृष्ण की दूसरी पत्नी बनी।
श्लोक 2 (padma.6.249.2)
वैवस्वती महाभागा कालिंदी नाम नामतः । तृतीया तस्य भार्या सा लीलांशा समुपस्थिता ।
vaivasvatī mahābhāgā kāliṁdī nāma nāmataḥ tṛtīyā tasya bhāryā sā līlāṁśā samupasthitā
सूर्यपुत्री महाभाग्यशाली कालिंदी नाम की, लीला के अंश से प्रकट हुई, उनकी तीसरी पत्नी बनी।
श्लोक 3 (padma.6.249.3)
विंदानुविंदस्य सुतां मित्रविंदां शुचिस्मिताम् । स्वयंवरस्थितां कन्यामुपयेमे जनार्दनः ।
viṁdānuviṁdasya sutāṁ mitraviṁdāṁ śucismitām svayaṁvarasthitāṁ kanyāmupayeme janārdanaḥ
जनार्दन ने विंद-अनुविंद की सुमुस्कान पुत्री मित्रविंदा से, जो अपने स्वयंवर में उपस्थित थी, विवाह किया।
श्लोक 4 (padma.6.249.4)
पाशेनैकेन बद्ध्वा तान् वृषभान्सप्तदुर्मदान् । तां वीर्यशुल्कां जग्राह पद्मपत्रायतेक्षणः ।
pāśenaikena baddhvā tān vṛṣabhānsaptadurmadān tāṁ vīryaśulkāṁ jagrāha padmapatrāyatekṣaṇaḥ
उन सात उन्मत्त बैलों को एक ही रस्सी से बाँधकर, उस कमलपत्र-नेत्र वाले ने उस पराक्रम-मूल्य वाली कन्या को प्राप्त किया।
श्लोक 5 (padma.6.249.5)
सत्राजितो महारत्नं स्यमंताख्यं महीपतिः । अनुजाय ददौ सोऽयं प्रसेनाय महात्मने ।
satrājito mahāratnaṁ syamaṁtākhyaṁ mahīpatiḥ anujāya dadau so'yaṁ prasenāya mahātmane
राजा सत्राजित ने स्यमंतक नामक महारत्न अपने छोटे भाई महात्मा प्रसेन को दे दिया।
श्लोक 6 (padma.6.249.6)
ययाचे तं मणिवरं कदाचिन्मधुसूदनः । उवाच वासुदेवं तं प्रसेनः प्रसभं तदा ।
yayāce taṁ maṇivaraṁ kadācinmadhusūdanaḥ uvāca vāsudevaṁ taṁ prasenaḥ prasabhaṁ tadā
एक बार मधुसूदन ने वह श्रेष्ठ मणि माँगी। तब प्रसेन ने वासुदेव से दृढ़तापूर्वक कहा।
श्लोक 7 (padma.6.249.7)
प्रसेन उवाच- भारानष्टसुवर्णानि नित्यं प्रसवते मणिः । तस्मात्कस्य न दातव्यं स्यमंताख्यमिदं मया ।
prasena uvāca bhārānaṣṭasuvarṇāni nityaṁ prasavate maṇiḥ tasmātkasya na dātavyaṁ syamaṁtākhyamidaṁ mayā
प्रसेन ने कहा — यह मणि नित्य आठ भार सोना उत्पन्न करती है। तो फिर यह स्यमंतक मैं किसी को क्यों दूँ?
श्लोक 8 (padma.6.249.8)
महादेव उवाच- कृष्णस्तु तदभिप्रायं ज्ञात्वा तूष्णीमुवास ह । कदाचिन्मृगयां कर्त्तुं कृष्णः सर्वैर्यदूत्तमैः ।
mahādeva uvāca kṛṣṇastu tadabhiprāyaṁ jñātvā tūṣṇīmuvāsa ha kadācinmṛgayāṁ karttuṁ kṛṣṇaḥ sarvairyadūttamaiḥ
महादेव जी ने कहा — कृष्ण उसका अभिप्राय जानकर मौन रहे। एक बार मृगया के लिए कृष्ण सब यदुश्रेष्ठों सहित —
श्लोक 9 (padma.6.249.9)
प्रविवेश महारण्यं प्रसेनाद्यैर्महाबलैः । प्रत्येकं वै मृगान्हंतुमनुयाताः सहस्रशः ।
praviveśa mahāraṇyaṁ prasenādyairmahābalaiḥ pratyekaṁ vai mṛgānhaṁtumanuyātāḥ sahasraśaḥ
प्रसेन आदि महाबलियों सहित महावन में प्रविष्ट हुए। सब हज़ारों की संख्या में अलग-अलग मृगों का पीछा करने लगे।
श्लोक 10 (padma.6.249.10)
एक एव महारण्ये प्रसेनो दूरमागतः । तं सिंहो दृष्टमासाद्य हत्वा रत्नं जहार सः ।
eka eva mahāraṇye praseno dūramāgataḥ taṁ siṁho dṛṣṭamāsādya hatvā ratnaṁ jahāra saḥ
अकेला ही प्रसेन उस महावन में दूर तक निकल गया। एक सिंह ने उसे देखकर आक्रमण करके मारकर वह मणि छीन ली।
श्लोक 11 (padma.6.249.11)
तं सिंहं जांबबान्हत्वा मणिं गृह्य महाबलः । प्रविवेश बिलं तूर्णं दिव्यस्त्रीभिर्निषेवितम् ।
taṁ siṁhaṁ jāṁbabānhatvā maṇiṁ gṛhya mahābalaḥ praviveśa bilaṁ tūrṇaṁ divyastrībhirniṣevitam
जाम्बवान ने उस सिंह को मारकर, वह मणि लेकर शीघ्र ही दिव्य स्त्रियों से सेवित एक गुफा में प्रवेश किया।
श्लोक 12 (padma.6.249.12)
तस्मिन्नस्तंगते सूर्ये वासुदेवं सहानुगः । चतुर्थ्यामुदितं चंद्रं दृष्ट्वा स्वं पुरमाविशत् ।
tasminnastaṁgate sūrye vāsudevaṁ sahānugaḥ caturthyāmuditaṁ caṁdraṁ dṛṣṭvā svaṁ puramāviśat
सूर्यास्त होने पर वासुदेव अपने अनुगामियों सहित, चतुर्थी को उदित चंद्रमा देखकर अपनी नगरी में लौट आए।
श्लोक 13 (padma.6.249.13)
ततः सर्वे पुरजनाः कृष्णं प्रोचुः परस्परम् । हत्वा प्रसेनं गोविंदो मृगव्याजेन कानने ।
tataḥ sarve purajanāḥ kṛṣṇaṁ procuḥ parasparam hatvā prasenaṁ goviṁdo mṛgavyājena kānane
तब सब नगरवासी आपस में कृष्ण के बारे में कहने लगे — 'वन में मृगया के बहाने प्रसेन को मारकर गोविंद ने —
श्लोक 14 (padma.6.249.14)
स्यमंतकं मणिवरमग्रहीदविशंकया । तदाकर्ण्य हरिस्तस्मिन्द्वारकाजनभाषितम् ।
syamaṁtakaṁ maṇivaramagrahīdaviśaṁkayā tadākarṇya haristasmindvārakājanabhāṣitam
निःशंक होकर वह श्रेष्ठ मणि स्यमंतक छीन ली।' द्वारका के लोगों की यह बातें सुनकर हरि ने —
श्लोक 15 (padma.6.249.15)
अज्ञलोकभयात्सर्वैर्यदुभिर्गहनं ययौ । दर्शयामास तान्सर्वान्सिंहेन निहतं वने ।
ajñalokabhayātsarvairyadubhirgahanaṁ yayau darśayāmāsa tānsarvānsiṁhena nihataṁ vane
अज्ञानी लोगों के भय से सब यादवों के साथ उस घोर वन में प्रवेश किया। उन्होंने उन सबको सिंह द्वारा मारे गए प्रसेन को दिखाया।
श्लोक 16 (padma.6.249.16)
लब्धात्मशुद्धिस्तत्रैव संस्थाप्य महतीं चमूम् । एकः शार्ङ्गगदापाणिर्जगाम गहनं वनम् ।
labdhātmaśuddhistatraiva saṁsthāpya mahatīṁ camūm ekaḥ śārṅgagadāpāṇirjagāma gahanaṁ vanam
इस प्रकार अपनी निर्दोषता का प्रमाण पाकर, उस विशाल सेना को वहीं ठहराकर, वे अकेले ही शार्ङ्ग-गदा लिए घोर वन में गए।
श्लोक 17 (padma.6.249.17)
दृष्ट्वा महाबिलं कृष्णः प्रविवेश विशंकितः । तत्र नाना मणिवरद्योतिते विमले गृहे ।
dṛṣṭvā mahābilaṁ kṛṣṇaḥ praviveśa viśaṁkitaḥ tatra nānā maṇivaradyotite vimale gṛhe
एक बड़ी गुफा देखकर कृष्ण निर्भय होकर उसमें प्रविष्ट हुए। वहाँ नाना उत्तम मणियों से जगमगाते निर्मल भवन में —
श्लोक 18 (padma.6.249.18)
सुतं जांबवतो धात्री दोलामारोप्य लीलया । दोलामुखे मणिं धृत्वा दोलयन्गायती मुदा ।
sutaṁ jāṁbavato dhātrī dolāmāropya līlayā dolāmukhe maṇiṁ dhṛtvā dolayangāyatī mudā
जाम्बवान के पुत्र को एक धाय झूले में बिठाकर लीलापूर्वक, झूले के सिरे पर वह मणि टाँगकर, हर्षपूर्वक गाते हुए झुला रही थी —
श्लोक 19 (padma.6.249.19)
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जांबवता हतः । सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमंतकः ।
siṁhaḥ prasenamavadhītsiṁho jāṁbavatā hataḥ sukumāraka mā rodīstava hyeṣa syamaṁtakaḥ
'सिंह ने प्रसेन को मारा, सिंह को जाम्बवान ने मारा। हे सुकुमार, मत रो, यह स्यमंतक तो तुम्हारा ही है।'
श्लोक 20 (padma.6.249.20)
तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽथ शंखं दध्मौ प्रतापवान् । तेन नादेन महता निर्जगामात्र जांबवान् ।
tacchrutvā vāsudevo'tha śaṁkhaṁ dadhmau pratāpavān tena nādena mahatā nirjagāmātra jāṁbavān
यह सुनकर उस प्रतापी वासुदेव ने शंख बजाया। उस महाध्वनि से जाम्बवान वहाँ से बाहर निकल आया।
श्लोक 21 (padma.6.249.21)
तयोर्युद्धमभूद्घोरं दशरात्रं निरंतरम् । मुष्टिभिर्वज्रकल्पैश्च सर्वभूतभयावहम् ।
tayoryuddhamabhūdghoraṁ daśarātraṁ niraṁtaram muṣṭibhirvajrakalpaiśca sarvabhūtabhayāvaham
उन दोनों के बीच दस रात तक निरंतर घोर युद्ध हुआ, वज्र-समान मुक्कों से, सब प्राणियों को भयभीत करने वाला।
श्लोक 22 (padma.6.249.22)
कृष्णस्य बलवृद्धिं च तथात्मबलसंक्षयम् । अवेक्ष्य पूर्ववचनं बुबुधे परमात्मनः ।
kṛṣṇasya balavṛddhiṁ ca tathātmabalasaṁkṣayam avekṣya pūrvavacanaṁ bubudhe paramātmanaḥ
कृष्ण के बल की वृद्धि और अपने बल के क्षय को देखकर उसे परमात्मा का पूर्ववचन स्मरण हो आया।
श्लोक 23 (padma.6.249.23)
सोऽयं रामोऽवतीर्णोऽत्र धर्मत्राणाय वै पुनः । स आगतो मम स्वामी दातुं मम मनोरथम् ।
so'yaṁ rāmo'vatīrṇo'tra dharmatrāṇāya vai punaḥ sa āgato mama svāmī dātuṁ mama manoratham
'यही वह राम हैं, जो पुनः धर्म-रक्षा के लिए यहाँ अवतरित हुए हैं। मेरे स्वामी ही मेरी मनोकामना पूरी करने आए हैं।'
श्लोक 24 (padma.6.249.24)
एवं ज्ञात्वाथ ऋक्षेशो निर्वर्त्य रणकर्म तत् । प्रांजलि प्राह गोविंदं को भवानिति विस्मयात् ।
evaṁ jñātvātha ṛkṣeśo nirvartya raṇakarma tat prāṁjali prāha goviṁdaṁ ko bhavāniti vismayāt
यह जानकर ऋक्षराज ने वह युद्ध रोककर, हाथ जोड़कर विस्मय से गोविंद से पूछा — 'आप कौन हैं?'
श्लोक 25 (padma.6.249.25)
निवर्त्य कदनं शौरिः प्रोचे गंभीरया गिरा । श्रीकृष्ण उवाच- पुत्रोऽहं वसुदेवस्य वासुदेव इतीरितः ।
nivartya kadanaṁ śauriḥ proce gaṁbhīrayā girā śrīkṛṣṇa uvāca putro'haṁ vasudevasya vāsudeva itīritaḥ
युद्ध रोककर शौरि ने गंभीर वाणी में कहा। श्रीकृष्ण ने कहा — मैं वसुदेव का पुत्र हूँ, वासुदेव कहलाता हूँ।
श्लोक 26 (padma.6.249.26)
ममरत्नं स्यमंताख्यं हृतवांस्त्वं सुनिर्भयः । तद्दीयतां च शीघ्रं मे अन्यथा वधमेष्यसि ।
mamaratnaṁ syamaṁtākhyaṁ hṛtavāṁstvaṁ sunirbhayaḥ taddīyatāṁ ca śīghraṁ me anyathā vadhameṣyasi
तुमने निर्भय होकर मेरी वह मणि स्यमंतक छीन ली है। वह मुझे शीघ्र दे दो, नहीं तो तुम मृत्यु को प्राप्त होगे।
श्लोक 27 (padma.6.249.27)
महादेव उवाच- तच्छ्रुत्वा जांबवान्हृष्टः प्रणनामाथ दंडवत् । परिणीय नमस्कृत्य विनयात्प्राह केशवम् ।
mahādeva uvāca tacchrutvā jāṁbavānhṛṣṭaḥ praṇanāmātha daṁḍavat pariṇīya namaskṛtya vinayātprāha keśavam
महादेव जी ने कहा — यह सुनकर जाम्बवान अत्यंत प्रसन्न होकर दंडवत् प्रणाम करने लगा। परिक्रमा और नमस्कार करके उसने विनयपूर्वक केशव से कहा।
श्लोक 28 (padma.6.249.28)
जांबवानुवाच- धन्योस्मि कृतकृत्योस्मि तव संदर्शनात्प्रभो । दासोऽहं पूर्वभावेन तव देवकिनंदन ।
jāṁbavānuvāca dhanyosmi kṛtakṛtyosmi tava saṁdarśanātprabho dāso'haṁ pūrvabhāvena tava devakinaṁdana
जाम्बवान ने कहा — हे प्रभु, आपके दर्शन से मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। हे देवकीनंदन, पूर्वभाव से मैं आपका दास हूँ।
श्लोक 29 (padma.6.249.29)
दत्तवानसि गोविंद कदनं पूर्वकांक्षितम् । मयेदं कदनं मोहाद्यत्कृतं स्वामिना त्वया । तत्क्षम्यतां जगन्नाथ करुणाकर शाश्वत ।
dattavānasi goviṁda kadanaṁ pūrvakāṁkṣitam mayedaṁ kadanaṁ mohādyatkṛtaṁ svāminā tvayā tatkṣamyatāṁ jagannātha karuṇākara śāśvata
हे गोविंद, आपने मुझे पूर्व-वांछित युद्ध का सुख दिया है। हे जगन्नाथ, हे शाश्वत करुणानिधि, अपने ही स्वामी से मोहवश जो यह युद्ध मैंने किया, उसे क्षमा कीजिए।
श्लोक 30 (padma.6.249.30)
महादेव उवाच- इत्युक्त्वा प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य पुनः पुनः । नानारत्नमये पीठे निवेश्य विनयात्प्रभुम् ।
mahādeva uvāca ityuktvā praṇato bhūtvā namaskṛtya punaḥ punaḥ nānāratnamaye pīṭhe niveśya vinayātprabhum
महादेव जी ने कहा — ऐसा कहकर, बार-बार प्रणाम करके, नाना रत्नों से जड़े सिंहासन पर विनयपूर्वक प्रभु को बिठाकर —
श्लोक 31 (padma.6.249.31)
शारदाब्जनिभौ पादौ प्रक्षाल्य शुभवारिणा । मधुपर्कविधानेन पूजयित्वा यदूद्वहम् ।
śāradābjanibhau pādau prakṣālya śubhavāriṇā madhuparkavidhānena pūjayitvā yadūdvaham
शरद-कमल जैसे उनके चरणों को शुभ जल से धोकर, उसने मधुपर्क-विधि से यदुश्रेष्ठ की पूजा की।
श्लोक 32 (padma.6.249.32)
वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैः पूजयित्वा विधानतः । पुत्रीं जांबवतीं नाम कन्यां लावण्यसंयुताम् ।
vastrairābharaṇairdivyaiḥ pūjayitvā vidhānataḥ putrīṁ jāṁbavatīṁ nāma kanyāṁ lāvaṇyasaṁyutām
दिव्य वस्त्र-आभूषणों से विधिपूर्वक पूजा करके, अपनी सौंदर्यसंपन्न पुत्री जाम्बवती नामक कन्या को —
श्लोक 33 (padma.6.249.33)
कन्यारत्नं ददौ तस्मै भार्यार्थममितौजसे । अन्यैश्च मणिमुख्यैश्च स्यमंताख्यं ददौ मणिम् ।
kanyāratnaṁ dadau tasmai bhāryārthamamitaujase anyaiśca maṇimukhyaiśca syamaṁtākhyaṁ dadau maṇim
वह कन्यारत्न उन अमित तेजस्वी को पत्नी के रूप में दे दिया। अन्य श्रेष्ठ रत्नों सहित उसने स्यमंतक मणि भी दे दी।
श्लोक 34 (padma.6.249.34)
तत्रैवोद्वाह्य तां कन्यां प्रहृष्टपरवीरहा । ददौ तस्मै परां मुक्तिं प्रीत्या जांबवते हरिः ।
tatraivodvāhya tāṁ kanyāṁ prahṛṣṭaparavīrahā dadau tasmai parāṁ muktiṁ prītyā jāṁbavate hariḥ
वहीं उस कन्या से विवाह करके, प्रसन्न शत्रुनाशक हरि ने प्रेमपूर्वक जाम्बवान को परम मुक्ति भी प्रदान की।
श्लोक 35 (padma.6.249.35)
गृहीत्वा तनयां तस्य कन्यां जांबवतीं मुदा । विनिर्गत्य बिलात्तस्मात्प्रययौ द्वारकां पुरीम् ।
gṛhītvā tanayāṁ tasya kanyāṁ jāṁbavatīṁ mudā vinirgatya bilāttasmātprayayau dvārakāṁ purīm
जाम्बवान की पुत्री कन्या जाम्बवती को हर्षपूर्वक लेकर, उस गुफा से निकलकर वे द्वारका नगरी को चल पड़े।
श्लोक 36 (padma.6.249.36)
सत्राजिते ददौ रत्नं स्यमंताख्यं यदूत्तमः । दुहित्रे प्रददौसोऽपि कन्यायै मणिमुत्तमम् ।
satrājite dadau ratnaṁ syamaṁtākhyaṁ yadūttamaḥ duhitre pradadauso'pi kanyāyai maṇimuttamam
यदुश्रेष्ठ ने सत्राजित को वह स्यमंतक मणि दे दी; उसने भी वह श्रेष्ठ मणि अपनी पुत्री को दे दी [उसके साथ ही उसे कृष्ण को भी सौंप दिया]।
श्लोक 37 (padma.6.249.37)
मासि भाद्रपदे शुक्ले चतुर्थ्यां चंद्रदर्शनम् । मिथ्याभिदूषणं प्राहुस्तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ।
māsi bhādrapade śukle caturthyāṁ caṁdradarśanam mithyābhidūṣaṇaṁ prāhustasmāttatparivarjayet
भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र-दर्शन को मिथ्या-दोष कहा गया है, इसलिए उसे त्याग देना चाहिए।
श्लोक 38 (padma.6.249.38)
प्राप्यते दर्शनं तत्र चतुर्थ्यां शीतगोर्नरः । स्यमंतस्य कथां श्रुत्वा मिथ्यावादात्प्रमुच्यते ।
prāpyate darśanaṁ tatra caturthyāṁ śītagornaraḥ syamaṁtasya kathāṁ śrutvā mithyāvādātpramucyate
यदि कोई मनुष्य उस चतुर्थी को चंद्र-दर्शन कर ले, तो स्यमंतक की यह कथा सुनकर वह मिथ्या-अपवाद से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 39 (padma.6.249.39)
सुलक्ष्मणां नाग्नजितीं सुशीलां च यशस्विनीम् । मद्रराजसुतास्तिस्रः कन्यकास्ताः शुभाननाः ।
sulakṣmaṇāṁ nāgnajitīṁ suśīlāṁ ca yaśasvinīm madrarājasutāstisraḥ kanyakāstāḥ śubhānanāḥ
सुलक्ष्मणा, नाग्नजिती और यशस्विनी सुशीला — मद्रराज की ये तीन शुभमुखी कन्याएँ —
श्लोक 40 (padma.6.249.40)
स्वयंवरस्थास्ताः कृष्णं वरयामासुरुज्ज्वलाः । एकस्मिन्दिवसे तास्तु उपयेमे यदूद्वहः ।
svayaṁvarasthāstāḥ kṛṣṇaṁ varayāmāsurujjvalāḥ ekasmindivase tāstu upayeme yadūdvahaḥ
अपने स्वयंवर में उपस्थित होकर उन देदीप्यमान कन्याओं ने कृष्ण को वर लिया। यदुश्रेष्ठ ने एक ही दिन उन सबसे विवाह किया।
श्लोक 41 (padma.6.249.41)
अष्टौ महिष्यस्ताः सर्वा रुक्मिण्याद्या महात्मनः । रुक्मिणी सत्यभामा च कालिंदी च शुचिस्मिता ।
aṣṭau mahiṣyastāḥ sarvā rukmiṇyādyā mahātmanaḥ rukmiṇī satyabhāmā ca kāliṁdī ca śucismitā
उस महात्मा की ये सब आठ पटरानियाँ हैं, रुक्मिणी आदि — रुक्मिणी, सत्यभामा, सुमुस्कान कालिंदी,
श्लोक 42 (padma.6.249.42)
मित्रविंदा जांबवती नाग्नजित्यः सुलक्ष्मणा । सुशीला नाम तन्वंगी महिषी चाष्टमी स्मृता ।
mitraviṁdā jāṁbavatī nāgnajityaḥ sulakṣmaṇā suśīlā nāma tanvaṁgī mahiṣī cāṣṭamī smṛtā
मित्रविंदा, जाम्बवती, नाग्नजिती, सुलक्ष्मणा, और तन्वंगी सुशीला नामक आठवीं महारानी मानी गई है।
श्लोक 43 (padma.6.249.43)
भूमिपुत्रो महावीर्यो नरको नाम राक्षसः । जित्वा देवपतिं शक्रं सर्वांश्चैव सुरान्रणे ।
bhūmiputro mahāvīryo narako nāma rākṣasaḥ jitvā devapatiṁ śakraṁ sarvāṁścaiva surānraṇe
भूमि-पुत्र, महापराक्रमी नरकासुर नामक राक्षस ने देवराज इंद्र और सब देवताओं को युद्ध में जीतकर,
श्लोक 44 (padma.6.249.44)
अदित्या देवमातुश्च कुंडले च सुवर्चसी । बलाज्जग्राह देवानां रत्नानि विविधानि च ।
adityā devamātuśca kuṁḍale ca suvarcasī balājjagrāha devānāṁ ratnāni vividhāni ca
देवमाता अदिति के तेजस्वी दोनों कुंडल तथा देवताओं के नाना रत्न बलपूर्वक छीन लिए,
श्लोक 45 (padma.6.249.45)
ऐरावतं महेंद्रस्य तथैवोच्चैःश्रवं हयम् । माणिक्यादि धनेशस्य शंखपद्मनिधिं तथा ।
airāvataṁ maheṁdrasya tathaivoccaiḥśravaṁ hayam māṇikyādi dhaneśasya śaṁkhapadmanidhiṁ tathā
महेंद्र का ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा नामक अश्व, कुबेर के माणिक्य आदि रत्न, शंख-पद्म निधियाँ —
श्लोक 46 (padma.6.249.46)
स्त्रियश्चाप्सरसश्चैव हृतवान्क्षितिनंदनः । वज्रादिहेतीस्तेषां च बलाद्धृत्वा दिवौकसाम् ।
striyaścāpsarasaścaiva hṛtavānkṣitinaṁdanaḥ vajrādihetīsteṣāṁ ca balāddhṛtvā divaukasām
तथा स्त्रियों और अप्सराओं को भी उस पृथ्वी-पुत्र ने हर लिया, और देवताओं के वज्र आदि अस्त्र भी बलपूर्वक छीन लिए।
श्लोक 47 (padma.6.249.47)
तैरेव स सुरान्हत्वा सभां मयविनिर्मिताम् । उवास व्योमगो दिव्यो नगर्यां विमलेंबरे ।
taireva sa surānhatvā sabhāṁ mayavinirmitām uvāsa vyomago divyo nagaryāṁ vimaleṁbare
उन्हीं अस्त्रों से देवताओं को हराकर वह मय द्वारा निर्मित सभा में, आकाश में विचरण करता हुआ दिव्य नगरी में निर्मल आकाश में रहने लगा।
श्लोक 48 (padma.6.249.48)
ततो देवगणाः सर्वे पुरस्कृत्य शचीपतिम् । भयार्ताः शरणं जग्मुः कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ।
tato devagaṇāḥ sarve puraskṛtya śacīpatim bhayārtāḥ śaraṇaṁ jagmuḥ kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam
तब सब देवगण शचीपति इंद्र को आगे करके, भयभीत होकर, अथक कर्ता कृष्ण की शरण में गए।
श्लोक 49 (padma.6.249.49)
कृष्णोऽपि तदुपश्रुत्य सर्वं नरकचेष्टितम् । देवानामभयं दत्वा वैनतेयं व्यचिंतयत् ।
kṛṣṇo'pi tadupaśrutya sarvaṁ narakaceṣṭitam devānāmabhayaṁ datvā vainateyaṁ vyaciṁtayat
कृष्ण भी नरकासुर के सारे कृत्य सुनकर, देवताओं को अभय देकर, गरुड़ का स्मरण करने लगे।
श्लोक 50 (padma.6.249.50)
तस्मिन्क्षणे हरेस्तस्य वैनतेयो महाबलः । प्रांजलिः पुरतस्तस्थौ सर्वदेवनमस्कृतः । तमारुह्य द्विजश्रेष्ठं सत्यया सह केशवः । संस्तूयमानो मुनिभिः प्रययौ राक्षसालयम् ।
tasminkṣaṇe harestasya vainateyo mahābalaḥ prāṁjaliḥ puratastasthau sarvadevanamaskṛtaḥ tamāruhya dvijaśreṣṭhaṁ satyayā saha keśavaḥ saṁstūyamāno munibhiḥ prayayau rākṣasālayam
उसी क्षण उन हरि के सामने वह महाबली गरुड़ हाथ जोड़कर आ खड़ा हुआ, सब देवताओं द्वारा नमस्कृत। उस श्रेष्ठ पक्षी पर आरूढ़ होकर, सत्या सहित केशव मुनियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए राक्षस के निवास की ओर चल पड़े।
श्लोक 51 (padma.6.249.51)
प्रदीप्यमानमाकाशे यथा सूर्यस्य मंडलम् । राक्षसैर्बहुभिर्युक्तं दिव्यैराभरणैर्युतम् ।
pradīpyamānamākāśe yathā sūryasya maṁḍalam rākṣasairbahubhiryuktaṁ divyairābharaṇairyutam
आकाश में सूर्य-मंडल के समान देदीप्यमान, अनेक राक्षसों से युक्त, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित —
श्लोक 52 (padma.6.249.52)
ददर्श तत्पुरं कृष्णो दुर्भेद्यं त्रिदशैरपि । तदावरणानि भगवान्वीक्ष्य चक्रेण वीर्यवान् ।
dadarśa tatpuraṁ kṛṣṇo durbhedyaṁ tridaśairapi tadāvaraṇāni bhagavānvīkṣya cakreṇa vīryavān
देवताओं के लिए भी दुर्भेद्य उस नगरी को कृष्ण ने देखा। उसके परकोटों को देखकर वे बलवान प्रभु चक्र से —
श्लोक 53 (padma.6.249.53)
चिच्छेद तेजसा दीप्त्या तमांसि च दिवाकरः । ततस्ते राक्षसाः सर्वे शतशोऽथ सहस्रशः ।
ciccheda tejasā dīptyā tamāṁsi ca divākaraḥ tataste rākṣasāḥ sarve śataśo'tha sahasraśaḥ
अपने तेज से उन्हें वैसे ही काट डाला जैसे सूर्य अंधकार को दूर करता है। तब वे सब राक्षस सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में —
श्लोक 54 (padma.6.249.54)
उद्यम्य शूलानि तदा युद्धायाभिमुखं ययुः । ततस्तु तोमरैर्दिव्यैर्भिण्डिपालैः सुपट्टिशैः ।
udyamya śūlāni tadā yuddhāyābhimukhaṁ yayuḥ tatastu tomarairdivyairbhiṇḍipālaiḥ supaṭṭiśaiḥ
त्रिशूल उठाकर युद्ध के लिए सामने आ गए। फिर दिव्य तोमरों, भिंडिपालों और उत्तम पट्टिशों से —
श्लोक 55 (padma.6.249.55)
केशवं ताडयामासुः पलालैरिव पावकम् । ततस्तु शार्ङ्गमादाय भगवान्गरुडध्वजः ।
keśavaṁ tāḍayāmāsuḥ palālairiva pāvakam tatastu śārṅgamādāya bhagavāngaruḍadhvajaḥ
उन्होंने केशव पर वैसे ही प्रहार किया जैसे पुआल से अग्नि पर किया जाए। तब गरुड़ध्वज प्रभु ने शार्ङ्ग धनुष उठाकर —
श्लोक 56 (padma.6.249.56)
दिव्यशस्त्राणि चिच्छेद बाणैरग्निशिखोपमैः । तेषां शिरोधरा नागानश्वांश्चैव तरस्विनः ।
divyaśastrāṇi ciccheda bāṇairagniśikhopamaiḥ teṣāṁ śirodharā nāgānaśvāṁścaiva tarasvinaḥ
उनके दिव्य अस्त्रों को अग्नि-शिखा जैसे बाणों से काट डाला। उनकी गर्दनों, हाथियों और वेगवान घोड़ों को भी —
श्लोक 57 (padma.6.249.57)
चक्रेणैव प्रचिच्छेद वीर्यवान्पुरुषोत्तमः । केचिच्चक्रेण संछिन्नास्तथान्ये शरताडिताः ।
cakreṇaiva praciccheda vīryavānpuruṣottamaḥ keciccakreṇa saṁchinnāstathānye śaratāḍitāḥ
बलवान पुरुषोत्तम ने चक्र से ही काट डाला। कुछ चक्र से कट गए, तो कुछ बाणों से बिंध गए,
श्लोक 58 (padma.6.249.58)
गदया निहताः केचिद्राक्षसास्तद्रणाजिरे । एवं ते राक्षसाः सर्वे पातिता धरणीतले ।
gadayā nihatāḥ kecidrākṣasāstadraṇājire evaṁ te rākṣasāḥ sarve pātitā dharaṇītale
कुछ राक्षस उस युद्धभूमि में गदा से मार गिराए गए। इस प्रकार वे सब राक्षस पृथ्वी पर गिरा दिए गए,
श्लोक 59 (padma.6.249.59)
शक्रोत्सृष्टेन वज्रेण निर्भिन्ना इव भूधराः । निहत्य दानवान्सर्वान्पुंडरीकायतेक्षणः ।
śakrotsṛṣṭena vajreṇa nirbhinnā iva bhūdharāḥ nihatya dānavānsarvānpuṁḍarīkāyatekṣaṇaḥ
जैसे इंद्र के छोड़े वज्र से पर्वत टूट-टूट कर गिरते हों। सब दानवों को मारकर उस कमलनयन ने —
श्लोक 60 (padma.6.249.60)
पाञ्चजन्यं महाशंखं प्रदध्मौ पुरुषोत्तमः । ततः स नरको दैत्यो धनुरादाय वीर्यवान् ।
pāñcajanyaṁ mahāśaṁkhaṁ pradadhmau puruṣottamaḥ tataḥ sa narako daityo dhanurādāya vīryavān
पुरुषोत्तम ने पांचजन्य नामक महाशंख बजाया। तब वह दैत्य नरकासुर पराक्रमी होकर धनुष उठाकर —
श्लोक 61 (padma.6.249.61)
दिव्यं स्यंदनमारुह्य ययौ युद्धाय केशवम् । तयोर्युद्धमभूद्घोरं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
divyaṁ syaṁdanamāruhya yayau yuddhāya keśavam tayoryuddhamabhūdghoraṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam
दिव्य रथ पर सवार होकर केशव से युद्ध करने चला। उन दोनों के बीच बालों को खड़ा कर देने वाला भयंकर, कोलाहलपूर्ण युद्ध हुआ,
श्लोक 62 (padma.6.249.62)
बहुभिर्बाणसाहस्रैर्मेघयोरिव वर्षतोः । ततोऽर्द्धचंद्र बाणेन वासुदेवः सनातनः ।
bahubhirbāṇasāhasrairmeghayoriva varṣatoḥ tato'rddhacaṁdra bāṇena vāsudevaḥ sanātanaḥ
जैसे दो मेघ हज़ारों बाणों से वर्षा कर रहे हों। तब अर्धचंद्र बाण से सनातन वासुदेव ने —
श्लोक 63 (padma.6.249.63)
तस्य राक्षसमुख्यस्य धनुश्चिच्छेद वीर्यवान् । ससर्जास्त्रं महादिव्यं नरकस्य महोरसि ।
tasya rākṣasamukhyasya dhanuściccheda vīryavān sasarjāstraṁ mahādivyaṁ narakasya mahorasi
उस राक्षसश्रेष्ठ का धनुष काट डाला। फिर उन्होंने नरकासुर के विशाल वक्षस्थल पर एक महादिव्य अस्त्र छोड़ा।
श्लोक 64 (padma.6.249.64)
स तेन भिन्नहृदयः पपातोर्व्यां महासुरः । शक्रवज्रेण निर्भिन्नो महाचल इवोन्नदन् ।
sa tena bhinnahṛdayaḥ papātorvyāṁ mahāsuraḥ śakravajreṇa nirbhinno mahācala ivonnadan
उससे हृदय बिंधकर वह महासुर पृथ्वी पर गिर पड़ा, जैसे इंद्र के वज्र से बिंधा हुआ कोई महापर्वत गरजते हुए गिर पड़े।
श्लोक 65 (padma.6.249.65)
उपगम्य ततः कृष्णः समीपं तस्य रक्षसः । भूम्या संप्रार्थितः प्राह वरं वृण्विति राक्षसम् । स चाह राक्षसः कृष्णं गरुडोपरि संस्थितम् ।
upagamya tataḥ kṛṣṇaḥ samīpaṁ tasya rakṣasaḥ bhūmyā saṁprārthitaḥ prāha varaṁ vṛṇviti rākṣasam sa cāha rākṣasaḥ kṛṣṇaṁ garuḍopari saṁsthitam
तब कृष्ण उस राक्षस के पास पहुँचे। पृथ्वी (उसकी माता) की प्रार्थना पर उन्होंने उस राक्षस से 'वर माँगो' कहा। और गरुड़ पर बैठे कृष्ण से उस राक्षस ने कहा —
श्लोक 66 (padma.6.249.66)
न मे कृत्यं वरेणास्ति नरकोऽहं तथापि च । अन्यलोकहितार्थाय वृणेऽहं वरमुत्तमम् ।
na me kṛtyaṁ vareṇāsti narako'haṁ tathāpi ca anyalokahitārthāya vṛṇe'haṁ varamuttamam
'मुझे वर से कोई प्रयोजन नहीं — मैं तो नरक ही हूँ [अपने नाम से भी]। फिर भी अन्य लोकों के हित के लिए मैं एक उत्तम वर माँगता हूँ।
श्लोक 67 (padma.6.249.67)
मृताहनि तु मे कृष्ण सर्वभूतेश्वरेश्वर । ये नरा मंगलस्नानं कुर्वंति मधुसूदन । न तेषां निरयप्राप्तिर्भवत्वेवं भयापह ।
mṛtāhani tu me kṛṣṇa sarvabhūteśvareśvara ye narā maṁgalasnānaṁ kurvaṁti madhusūdana na teṣāṁ nirayaprāptirbhavatvevaṁ bhayāpaha
हे कृष्ण, हे सब भूतेश्वरों के ईश्वर, मेरी मृत्यु के दिन जो मनुष्य मंगल-स्नान करें, हे मधुसूदन, हे भयनाशक, उन्हें नरक की प्राप्ति न हो।'
श्लोक 68 (padma.6.249.68)
महादेव उवाच- एवमस्त्विति गोविंदो ददौ तस्मै वरं प्रभुः । ततः पश्यन्हरेः साक्षाच्छरदंबुज सन्निभौ ।
mahādeva uvāca evamastviti goviṁdo dadau tasmai varaṁ prabhuḥ tataḥ paśyanhareḥ sākṣāccharadaṁbuja sannibhau
महादेव जी ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर प्रभु गोविंद ने उसे वह वर दे दिया। तब हरि के, शरद-कमल जैसे साक्षात् उन दोनों चरणों को देखकर —
श्लोक 69 (padma.6.249.69)
चरणौ वज्रवैडूर्य्यनूपुराभ्यां विराजितौ । अर्चितौ विधिरुद्राद्यैस्त्रिदशैर्मुनिभिस्तथा ।
caraṇau vajravaiḍūryyanūpurābhyāṁ virājitau arcitau vidhirudrādyaistridaśairmunibhistathā
जो वज्र-वैडूर्य के नूपुरों से सुशोभित थे, तथा ब्रह्मा-रुद्र आदि देवताओं और मुनियों द्वारा भी पूजित थे —
श्लोक 70 (padma.6.249.70)
त्यक्त्वा प्राणान्महीपुत्रः सारूप्यमगमद्धरेः । ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
tyaktvā prāṇānmahīputraḥ sārūpyamagamaddhareḥ tato devagaṇāḥ sarve harṣanirbharamānasāḥ
उस भूमिपुत्र ने प्राण त्यागकर हरि के समान रूप को प्राप्त किया। तब सब देवगण हर्ष से भरे मन से —
श्लोक 71 (padma.6.249.71)
ववृषुः पुष्पवर्षाणि तुष्टुवुश्च महर्षयः । प्रविश्य नगरं तस्य कृष्णः कमललोचनः ।
vavṛṣuḥ puṣpavarṣāṇi tuṣṭuvuśca maharṣayaḥ praviśya nagaraṁ tasya kṛṣṇaḥ kamalalocanaḥ
पुष्पों की वर्षा करने लगे, और महर्षियों ने उनकी स्तुति की। उस नगरी में प्रवेश करके कमलनयन कृष्ण ने —
श्लोक 72 (padma.6.249.72)
बलात्तेन गृहीतानि रत्नानि त्रिदिवौकसाम् । कुंडले देवमातुश्च तथैवोच्चैःश्रवो हयम् ।
balāttena gṛhītāni ratnāni tridivaukasām kuṁḍale devamātuśca tathaivoccaiḥśravo hayam
उसके द्वारा बलपूर्वक छीने गए देवताओं के रत्न वापस लिए — देवमाता के कुंडल, तथा उच्चैःश्रवा अश्व,
श्लोक 73 (padma.6.249.73)
ऐरावतं गजश्रेष्ठं प्रदीप्तं मणिपर्वतम् । सर्वमेतद्यदुश्रेष्ठो ददौ शक्राय वज्रिणे ।
airāvataṁ gajaśreṣṭhaṁ pradīptaṁ maṇiparvatam sarvametadyaduśreṣṭho dadau śakrāya vajriṇe
ऐरावत गजश्रेष्ठ, तथा वह देदीप्यमान रत्न-पर्वत — यह सब यदुश्रेष्ठ ने वज्रधारी इंद्र को लौटा दिया।
श्लोक 74 (padma.6.249.74)
पार्थिवान्सर्वराष्ट्रेभ्यो जित्वाऽसौ नरको बली । कन्याषोडशसाहस्रं हृतवान्नरकस्तदा ।
pārthivānsarvarāṣṭrebhyo jitvā'sau narako balī kanyāṣoḍaśasāhasraṁ hṛtavānnarakastadā
सब राष्ट्रों के राजाओं को जीतकर वह बलवान नरकासुर सोलह हज़ार कन्याओं को हरकर ले आया था।
श्लोक 75 (padma.6.249.75)
सन्निरुद्धास्तु ताः सर्वा नरकांतःपुरे तदा । दृष्ट्वा कृष्णं महावीर्यं कंदर्पशतसंनिभम् ।
sanniruddhāstu tāḥ sarvā narakāṁtaḥpure tadā dṛṣṭvā kṛṣṇaṁ mahāvīryaṁ kaṁdarpaśatasaṁnibham
वे सब तब नरकासुर के अंतःपुर में बंदी थीं। महापराक्रमी, सैकड़ों कामदेवों के समान कृष्ण को देखकर —
श्लोक 76 (padma.6.249.76)
भर्तारं वव्रिरे सर्वाः पतिं विश्वस्य सर्वगम् । एतस्मिन्नेव काले तु गोविंदोऽनंतरूपवान् ।
bhartāraṁ vavrire sarvāḥ patiṁ viśvasya sarvagam etasminneva kāle tu goviṁdo'naṁtarūpavān
उन सबने उन्हें ही अपना पति चुन लिया — विश्व के सर्वव्यापी स्वामी को। ठीक उसी समय अनंतरूपधारी गोविंद ने —
श्लोक 77 (padma.6.249.77)
तासां करग्रहं चक्रे विधिना पुरुषोत्तमः । नरकस्य सुताः सर्वे पुरस्कृत्य महीं तदा ।
tāsāṁ karagrahaṁ cakre vidhinā puruṣottamaḥ narakasya sutāḥ sarve puraskṛtya mahīṁ tadā
विधिपूर्वक उन सबका पाणिग्रहण किया, वे पुरुषोत्तम। तब नरकासुर के सब पुत्र, पृथ्वी को आगे करके —
श्लोक 78 (padma.6.249.78)
गोविंदं शरणं जग्मुस्तानरक्षद्घृणानिधिः । तद्राज्ये स्थाप्य तान्सर्वान्पृथिव्या वाक्य गौरवात् ।
goviṁdaṁ śaraṇaṁ jagmustānarakṣadghṛṇānidhiḥ tadrājye sthāpya tānsarvānpṛthivyā vākya gauravāt
गोविंद की शरण में गए, और उन दयानिधि ने उनकी रक्षा की। पृथ्वी की विनती के सम्मान में उन्हें उसी राज्य में स्थापित करके —
श्लोक 79 (padma.6.249.79)
ऐन्द्रं विमानमारोप्य ताश्च सर्वा वरस्त्रियः । देवदूतैर्महाभागैर्द्वारवत्यां न्यवेशयत् ।
aindraṁ vimānamāropya tāśca sarvā varastriyaḥ devadūtairmahābhāgairdvāravatyāṁ nyaveśayat
उन सब श्रेष्ठ स्त्रियों को इंद्र के विमान पर बिठाकर, महान भाग्यशाली देवदूतों द्वारा द्वारवती में बसा दिया।
श्लोक 80 (padma.6.249.80)
वैनतेयं समारुह्य सत्यया सह केशवः । स्वर्लोकं प्रययौ तूर्णं द्रष्टुं तां देवमातरम् ।
vainateyaṁ samāruhya satyayā saha keśavaḥ svarlokaṁ prayayau tūrṇaṁ draṣṭuṁ tāṁ devamātaram
गरुड़ पर सवार होकर, सत्या सहित केशव उस देवमाता (अदिति) को देखने के लिए शीघ्र स्वर्गलोक चल पड़े।
श्लोक 81 (padma.6.249.81)
प्रविश्य नगरीं तत्र देवराज्ञो जनार्दनः । अवरुह्य द्विजश्रेष्ठात्पत्न्या सह महाबलः ।
praviśya nagarīṁ tatra devarājño janārdanaḥ avaruhya dvijaśreṣṭhātpatnyā saha mahābalaḥ
वहाँ देवराज की नगरी में प्रवेश करके, महाबली जनार्दन उस श्रेष्ठ पक्षी से अपनी पत्नी सहित उतरकर —
श्लोक 82 (padma.6.249.82)
ववंदे मातरं तत्र वंद्यां तां त्रिदिवौकसाम् । संपरिष्वज्य बाहुभ्यामदितिः पुत्रवत्सला ।
vavaṁde mātaraṁ tatra vaṁdyāṁ tāṁ tridivaukasām saṁpariṣvajya bāhubhyāmaditiḥ putravatsalā
वहाँ स्वर्गवासियों द्वारा वंदनीय अपनी माता को प्रणाम किया। पुत्रवत्सला अदिति ने उन्हें दोनों भुजाओं से आलिंगन करके —
श्लोक 83 (padma.6.249.83)
निवेश्यासनमुख्ये तु पूजयामास भक्तितः । आदित्या वसवो रुद्राः शतक्रतुपुरोगमाः ।
niveśyāsanamukhye tu pūjayāmāsa bhaktitaḥ ādityā vasavo rudrāḥ śatakratupurogamāḥ
मुख्य आसन पर बिठाकर भक्तिपूर्वक पूजा की। आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, इंद्र आदि —
श्लोक 84 (padma.6.249.84)
तत्र संपूजयामासुर्यथार्हं परमेश्वरम् । शचीगृहं समागम्य सत्यभामा यशस्विनी ।
tatra saṁpūjayāmāsuryathārhaṁ parameśvaram śacīgṛhaṁ samāgamya satyabhāmā yaśasvinī
वहाँ उन परमेश्वर की यथोचित पूजा करने लगे। शची के घर आकर यशस्विनी सत्यभामा —
श्लोक 85 (padma.6.249.85)
तया समर्चिता देव्या समासीना सुखासने । तस्मिन्काले सुपुष्पाणि पारिजातस्य किंकराः ।
tayā samarcitā devyā samāsīnā sukhāsane tasminkāle supuṣpāṇi pārijātasya kiṁkarāḥ
उस देवी शची द्वारा सम्मानित होकर सुखासन पर बैठ गईं। उसी समय पारिजात के सेवकों ने उत्तम फूल —
श्लोक 86 (padma.6.249.86)
शच्यै देव्यै ददुः प्रीत्या सहस्राक्षेण चोदिताः । प्रगृह्य तानि पुष्पाणि शचीदेवी सुमध्यमा ।
śacyai devyai daduḥ prītyā sahasrākṣeṇa coditāḥ pragṛhya tāni puṣpāṇi śacīdevī sumadhyamā
इंद्र द्वारा भेजे जाकर प्रेमपूर्वक देवी शची को दिए। उन फूलों को लेकर सुमध्यमा शचीदेवी ने —
श्लोक 87 (padma.6.249.87)
नीलनिर्मलकेशे च बबंध स्वस्य मूर्धनि । अवमान्य शची तत्र सत्यभामां यशस्विनीम् ।
nīlanirmalakeśe ca babaṁdha svasya mūrdhani avamānya śacī tatra satyabhāmāṁ yaśasvinīm
अपने नीले, निर्मल केशों में, अपने ही सिर पर बाँध लिया। वहाँ शची ने यशस्विनी सत्यभामा का अपमान करते हुए —
श्लोक 88 (padma.6.249.88)
अनर्हा मानुषी चेयं देवार्हं कुसुमं शुभम् । इति कृत्वा मतिं तस्यै न ददौ कुसुमानि सा ।
anarhā mānuṣī ceyaṁ devārhaṁ kusumaṁ śubham iti kṛtvā matiṁ tasyai na dadau kusumāni sā
'यह मानवी इस शुभ, देवोचित फूल की अधिकारिणी नहीं है' — ऐसा सोचकर उसे वे फूल नहीं दिए।
श्लोक 89 (padma.6.249.89)
विनिष्क्रम्य पुरात्तस्मात्सत्या कोपसमन्विता । समेत्य कृष्णं भर्त्तारमुवाच कमलेक्षणा ।
viniṣkramya purāttasmātsatyā kopasamanvitā sametya kṛṣṇaṁ bharttāramuvāca kamalekṣaṇā
उस नगरी से बाहर निकलकर क्रोध से भरी कमलनयन सत्या ने अपने पति कृष्ण के पास जाकर कहा।
श्लोक 90 (padma.6.249.90)
सत्योवाच- एषा शची यदुश्रेष्ठ पारिजातेन गर्विता । अदत्त्वा मम गोविंद बबंध स्वस्य मूर्द्धनि ।
satyovāca eṣā śacī yaduśreṣṭha pārijātena garvitā adattvā mama goviṁda babaṁdha svasya mūrddhani
सत्या ने कहा — हे यदुश्रेष्ठ, इस शची ने पारिजात के अभिमान में, हे गोविंद, मुझे कुछ दिए बिना ही अपने सिर पर बाँध लिया।
श्लोक 91 (padma.6.249.91)
महादेव उवाच-। सत्यया भाषितं श्रुत्वा वासुदेवो महाबलः । उत्पाट्य पारिजातं तु निवेश्य गरुडोपरि ।
mahādeva uvāca satyayā bhāṣitaṁ śrutvā vāsudevo mahābalaḥ utpāṭya pārijātaṁ tu niveśya garuḍopari
महादेव जी ने कहा — सत्या की यह बात सुनकर महाबली वासुदेव ने पारिजात वृक्ष को ही उखाड़कर गरुड़ पर रखवा दिया।
श्लोक 92 (padma.6.249.92)
आरुह्य सत्यया तूर्णं वैनतेयं महाबलम् । प्रययौ द्वारकां रम्यां नगरीं देवकीसुतः ।
āruhya satyayā tūrṇaṁ vainateyaṁ mahābalam prayayau dvārakāṁ ramyāṁ nagarīṁ devakīsutaḥ
सत्या सहित शीघ्र उस महाबली गरुड़ पर आरूढ़ होकर देवकीपुत्र रमणीय द्वारका नगरी को चल पड़े।
श्लोक 93 (padma.6.249.93)
ततः कोपसमाविष्टो देवराजः शतक्रतुः । रुद्रैर्वसुभिरादित्यैः साध्यैश्च मरुतां गणैः ।
tataḥ kopasamāviṣṭo devarājaḥ śatakratuḥ rudrairvasubhirādityaiḥ sādhyaiśca marutāṁ gaṇaiḥ
तब क्रोध से भरे देवराज इंद्र, रुद्र-वसु-आदित्य-साध्यगणों तथा मरुद्गणों सहित —
श्लोक 94 (padma.6.249.94)
ऐरावतं समारुह्य ययौ युद्धाय केशवम् । ततो देवगणाः सर्वे परिवार्य्य जनार्दनम् ।
airāvataṁ samāruhya yayau yuddhāya keśavam tato devagaṇāḥ sarve parivāryya janārdanam
ऐरावत पर सवार होकर केशव से युद्ध करने चले। तब सब देवगण जनार्दन को घेरकर —
श्लोक 95 (padma.6.249.95)
ववृषुः शस्त्रवर्षाणि मेघा इव महाचलम् । कृष्णश्चिच्छेद चक्रेण तान्यस्त्राणि दिवौकसाम् ।
vavṛṣuḥ śastravarṣāṇi meghā iva mahācalam kṛṣṇaściccheda cakreṇa tānyastrāṇi divaukasām
वैसे ही अस्त्रों की वर्षा करने लगे जैसे मेघ किसी महापर्वत पर करते हैं। कृष्ण ने चक्र से उन देवताओं के अस्त्रों को काट डाला।
श्लोक 96 (padma.6.249.96)
वैनतयस्तु संक्रुद्धः पक्षपातेन वीर्यवान् । पातयामास तान्देवान्पलालानीव मारुतः ।
vainatayastu saṁkruddhaḥ pakṣapātena vīryavān pātayāmāsa tāndevānpalālānīva mārutaḥ
बलवान गरुड़ ने अत्यंत क्रोधित होकर अपने पंखों के प्रहार से उन देवताओं को वैसे ही गिरा दिया जैसे वायु पुआल को उड़ा देती है।
श्लोक 97 (padma.6.249.97)
ततः क्रुद्धः सहस्राक्षो देवानामीश्वरः प्रभुः । मुमोच सहसा दीप्तं वज्रं कृष्णजिघांसया ।
tataḥ kruddhaḥ sahasrākṣo devānāmīśvaraḥ prabhuḥ mumoca sahasā dīptaṁ vajraṁ kṛṣṇajighāṁsayā
तब क्रोधित इंद्र, देवताओं के स्वामी प्रभु ने कृष्ण को मारने की इच्छा से सहसा अपना देदीप्यमान वज्र छोड़ दिया।
श्लोक 98 (padma.6.249.98)
जग्राह कृष्णस्तं वज्रं हस्तेनैकेन लीलया । ततो भीतः सहस्राक्षो नागेंद्रादवरुह्य सः ।
jagrāha kṛṣṇastaṁ vajraṁ hastenaikena līlayā tato bhītaḥ sahasrākṣo nāgeṁdrādavaruhya saḥ
कृष्ण ने वह वज्र एक ही हाथ से लीलामात्र में पकड़ लिया। तब भयभीत इंद्र उस गजराज से उतरकर —
श्लोक 99 (padma.6.249.99)
प्रांजलिः पुरतः स्थित्वा नमस्कृत्वा जनार्दनम् । प्राह गद्गदया वाचा स्तुत्वा स्तुतिभिरेव च । इंद्र उवाच- देवयोग्यमिदं कृष्ण पारिजातं त्वया पुरा । दत्तो मम सुराणां च कथं स्थास्यति मानुषे ।
prāṁjaliḥ purataḥ sthitvā namaskṛtvā janārdanam prāha gadgadayā vācā stutvā stutibhireva ca iṁdra uvāca devayogyamidaṁ kṛṣṇa pārijātaṁ tvayā purā datto mama surāṇāṁ ca kathaṁ sthāsyati mānuṣe
हाथ जोड़कर सामने खड़े होकर, जनार्दन को नमस्कार करके, गद्गद वाणी में स्तोत्रों से स्तुति करते हुए कहने लगे। इंद्र ने कहा — हे कृष्ण, यह पारिजात तो देवताओं के योग्य है, पहले आपने ही यह मुझे और देवताओं को दिया था — यह मनुष्य-लोक में कैसे रह सकता है?
श्लोक 100 (padma.6.249.100)
महादेव उवाच- ततः प्रोवाच भगवान्सहस्राक्षमुपस्थितम् । शच्यावमानिता सत्या तव गेहे सुरेश्वर ।
mahādeva uvāca tataḥ provāca bhagavānsahasrākṣamupasthitam śacyāvamānitā satyā tava gehe sureśvara
महादेव जी ने कहा — तब भगवान् ने वहाँ खड़े इंद्र से कहा — हे सुरेश्वर, आपके घर में शची द्वारा सत्या का अपमान किया गया —
श्लोक 101 (padma.6.249.101)
अदत्त्वा पारिजातानि सत्यायै सा पुलोमजा । स्वयमेव स्वशिरसि धारयामास ते प्रिया ।
adattvā pārijātāni satyāyai sā pulomajā svayameva svaśirasi dhārayāmāsa te priyā
पुलोमजा शची ने सत्या को पारिजात के फूल दिए बिना ही उन्हें स्वयं अपने सिर पर धारण कर लिया, आपकी प्रिया ने।
श्लोक 102 (padma.6.249.102)
अस्या निमित्तं देवेंद्र पारिजातो हृतो मया । अस्यै प्रतिश्रुतं दातुं मया सुरगणेश्वर ।
asyā nimittaṁ deveṁdra pārijāto hṛto mayā asyai pratiśrutaṁ dātuṁ mayā suragaṇeśvara
हे देवेंद्र, उसी के कारण मैंने पारिजात हर लिया; हे सुरगणेश्वर, मैंने उसे यह देने का वचन दिया था।
श्लोक 103 (padma.6.249.103)
तव गेहे पारिजातं स्थापयामीति वासव । तस्मादद्य न दातव्यः पारिजातः सुरेश्वर ।
tava gehe pārijātaṁ sthāpayāmīti vāsava tasmādadya na dātavyaḥ pārijātaḥ sureśvara
'मैं पारिजात को तुम्हारे घर में ही रखूँगा' — यह मैंने कहा था, हे वासव। इसलिए अभी पारिजात नहीं दिया जा सकता, हे सुरेश्वर।
श्लोक 104 (padma.6.249.104)
देवतानां हितार्थाय प्रापयिष्यामि भूतले । तावत्तिष्ठतु देवेंद्र पारिजातो ममालये ।
devatānāṁ hitārthāya prāpayiṣyāmi bhūtale tāvattiṣṭhatu deveṁdra pārijāto mamālaye
देवताओं के हित के लिए मैं इसे धरती पर स्थापित करूँगा। हे देवेंद्र, तब तक पारिजात मेरे ही धाम में रहे।
श्लोक 105 (padma.6.249.105)
मयि स्वर्गं गते शक्र गृहाण त्वं यथेच्छया । महादेव उवाच- एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठस्तस्मै वज्रं ददौ स्वयम् ।
mayi svargaṁ gate śakra gṛhāṇa tvaṁ yathecchayā mahādeva uvāca evamuktvā yaduśreṣṭhastasmai vajraṁ dadau svayam
मेरे स्वर्ग जाने पर, हे शक्र, आप इसे अपनी इच्छानुसार ले लेना। महादेव जी ने कहा — ऐसा कहकर उस यदुश्रेष्ठ ने स्वयं उसे वज्र लौटा दिया।
श्लोक 106 (padma.6.249.106)
एवमस्त्विति गोविंदं नमस्कृत्य स वज्रभृत् । प्रययौ स्वपुरं दिव्यं सह देवगणैर्वृतः ।
evamastviti goviṁdaṁ namaskṛtya sa vajrabhṛt prayayau svapuraṁ divyaṁ saha devagaṇairvṛtaḥ
'ऐसा ही हो' कहकर उस वज्रधारी इंद्र ने गोविंद को नमस्कार करके, देवगणों से घिरे हुए अपनी दिव्य नगरी को प्रस्थान किया।
श्लोक 107 (padma.6.249.107)
कृष्णोऽपि सत्यया देव्या गरुडोपरि संस्थितः । संस्तूयमानो मुनिभिर्द्वारवत्यां विवेश ह ।
kṛṣṇo'pi satyayā devyā garuḍopari saṁsthitaḥ saṁstūyamāno munibhirdvāravatyāṁ viveśa ha
कृष्ण भी देवी सत्या सहित गरुड़ पर बैठे हुए, मुनियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए द्वारवती में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 108 (padma.6.249.108)
सत्यया निकटे स्थाप्य पारिजातं सुरद्रुमम् । रमयामास भार्याभिः सर्वाभिः सर्वगो हरिः ।
satyayā nikaṭe sthāpya pārijātaṁ suradrumam ramayāmāsa bhāryābhiḥ sarvābhiḥ sarvago hariḥ
सत्या के निकट उस देवतरु पारिजात को स्थापित करके, सर्वव्यापी हरि अपनी सब पत्नियों के साथ आनंद करने लगे।
श्लोक 109 (padma.6.249.109)
निशासु तासां सर्वासां गृहेषु मधुसूदनः । विश्वरूपधरः श्रीमानुवास स सुखप्रदः ।
niśāsu tāsāṁ sarvāsāṁ gṛheṣu madhusūdanaḥ viśvarūpadharaḥ śrīmānuvāsa sa sukhapradaḥ
रात्रि में उन सब पत्नियों के घरों में विश्वरूपधारी, श्रीमान, सुखदाता मधुसूदन [एक साथ, बहुरूप में] निवास करते रहे।