उत्तर खण्ड · अध्याय 250
बाणासुर-संग्राम-कथन
श्लोक 1 (padma.6.250.1)
श्रीरुद्र उवाच- रुक्मिण्यां कृष्णस्य प्रद्युम्नो मदनांशेन जज्ञे ।
śrīrudra uvāca rukmiṇyāṁ kṛṣṇasya pradyumno madanāṁśena jajñe
श्री रुद्र जी ने कहा — रुक्मिणी से कृष्ण को कामदेव के अंश से प्रद्युम्न उत्पन्न हुए।
श्लोक 2 (padma.6.250.2)
असौ मदनसंभूतो महाबलः शंबरं जघ्निवान् ।
asau madanasaṁbhūto mahābalaḥ śaṁbaraṁ jaghnivān
कामदेव के अंश से उत्पन्न वह महाबली प्रद्युम्न शंबरासुर का वध करने वाला हुआ।
श्लोक 3 (padma.6.250.3)
तस्य रुक्मिणः सुतायामनिरुद्धो जज्ञे ।
tasya rukmiṇaḥ sutāyāmaniruddho jajñe
उससे रुक्मी की पुत्री (प्रद्युम्न की पत्नी) से अनिरुद्ध उत्पन्न हुआ।
श्लोक 4 (padma.6.250.4)
सोऽपि बाणपुत्रीमुषां नाम कन्यामुपयेमे ।
so'pi bāṇaputrīmuṣāṁ nāma kanyāmupayeme
उसने भी बाणासुर की पुत्री उषा नामक कन्या से विवाह किया।
श्लोक 5 (padma.6.250.5)
सा तु स्वप्ने नीलोत्पलदलश्यामं पुंडरीकनिभेक्षणं महाबाहुं विचित्राभरणोपेतं षोडशसमायथावदुपभुज्य प्रबुध्य तं पुरतो न दृष्ट्वा मदनेनपीडिता भ्रांतचित्ता मां तु त्यक्त्वा वयस्कं रक्तारविंदवक्त्रं क्वासि क्व यासीति बहुधा विललाप ।
sā tu svapne nīlotpaladalaśyāmaṁ puṁḍarīkanibhekṣaṇaṁ mahābāhuṁ vicitrābharaṇopetaṁ ṣoḍaśasamāyathāvadupabhujya prabudhya taṁ purato na dṛṣṭvā madanenapīḍitā bhrāṁtacittā māṁ tu tyaktvā vayaskaṁ raktāraviṁdavaktraṁ kvāsi kva yāsīti bahudhā vilalāpa
उसने स्वप्न में नीलकमल-दल के समान श्याम, कमलनयन, महाबाहु, विचित्र आभूषणों से युक्त, सोलह वर्षीय किसी पुरुष के साथ यथोचित भोग करके, जागने पर उसे सामने न पाकर, कामपीड़िता, व्याकुलचित्त होकर 'मुझे छोड़कर, हे लाल कमल-मुख युवक, कहाँ हो, कहाँ चले गए?' कहकर बार-बार विलाप किया।
श्लोक 6 (padma.6.250.6)
ततस्तस्याः सखी चित्रलेखेति नाम कन्यां तादृशीमवस्थां गतां विलोक्य किंनिमित्त विभ्रांतचित्तासीति पप्रच्छ ।
tatastasyāḥ sakhī citralekheti nāma kanyāṁ tādṛśīmavasthāṁ gatāṁ vilokya kiṁnimitta vibhrāṁtacittāsīti papraccha
तब उसकी सखी चित्रलेखा नामक कन्या ने उसे इस दशा में देखकर पूछा — 'किस कारण तुम्हारा मन इतना व्याकुल है?'
श्लोक 7 (padma.6.250.7)
सापि स्वप्नलब्धं पतिं यथावदाचष्ट ।
sāpi svapnalabdhaṁ patiṁ yathāvadācaṣṭa
उसने भी स्वप्न में पाए पति के बारे में यथावत् बताया।
श्लोक 8 (padma.6.250.8)
सापि सकलदेवमानुषादिश्रेष्ठान्पटे विलिख्य तस्यै दर्शयामास ।
sāpi sakaladevamānuṣādiśreṣṭhānpaṭe vilikhya tasyai darśayāmāsa
तब उसने (चित्रलेखा ने) एक पट पर सब श्रेष्ठ देवताओं और मनुष्यों के चित्र बनाकर उसे दिखाए।
श्लोक 9 (padma.6.250.9)
यदुवंशसंभूतान्कृष्णसंकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धादीनपि सम्यङिनवेदयामास ।
yaduvaṁśasaṁbhūtānkṛṣṇasaṁkarṣaṇapradyumnāniruddhādīnapi samyaṅinavedayāmāsa
यदुवंश में उत्पन्न कृष्ण, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध आदि को भी भलीभाँति दिखाया।
श्लोक 10 (padma.6.250.10)
सा तेषां कृष्णमनुमान्य प्रद्युम्नानंतरमनिरुद्धं दृष्ट्वा स इत्येष इत्यालिलिंग ।
sā teṣāṁ kṛṣṇamanumānya pradyumnānaṁtaramaniruddhaṁ dṛṣṭvā sa ityeṣa ityāliliṁga
उनमें से कृष्ण को पहचानकर, फिर प्रद्युम्न के बाद अनिरुद्ध को देखकर, उसने 'यही है, यही है' कहकर उसे आलिंगन किया।
श्लोक 11 (padma.6.250.11)
अथ चित्रलेखा बह्वीभिर्मायावतीभिर्दैत्यस्त्रीभिर्द्वारवतीं गत्वा रात्रावंतःपुरे सुप्तमनिरुद्धं। दृष्ट्वा गृहीत्वा मोहयित्वा माहिष्मत्यां बाणस्यांतःपुरे चैत्यप्रासादादियुक्ते तस्या बाणपुत्र्याः शय्यायां चिक्षेप ।
atha citralekhā bahvībhirmāyāvatībhirdaityastrībhirdvāravatīṁ gatvā rātrāvaṁtaḥpure suptamaniruddhaṁ dṛṣṭvā gṛhītvā mohayitvā māhiṣmatyāṁ bāṇasyāṁtaḥpure caityaprāsādādiyukte tasyā bāṇaputryāḥ śayyāyāṁ cikṣepa
तब चित्रलेखा माया-सिद्ध अनेक दैत्य-स्त्रियों सहित द्वारवती जाकर, रात्रि में अंतःपुर में सोए हुए अनिरुद्ध को देखकर, उसे पकड़कर मोहित करके, माहिष्मती में बाणासुर के अंतःपुर में, चैत्य-प्रासाद आदि से युक्त उस बाणपुत्री की शय्या पर डाल दिया।
श्लोक 12 (padma.6.250.12)
सोऽपि प्रबुद्धोतिरम्येऽनंगपावके संस्थितामुषां सर्वलक्षणलक्षितां विचित्राभरणवसनगंधमाल्यालंकृतां कांचनवर्णां सुकेशीं सुजातस्तनीं दृष्ट्वा गाढमालिंग्य करिण्या गंधहस्तीव तयातिप्रीतिसंयुक्तया यथासुखं रमयामास ।
so'pi prabuddhotiramye'naṁgapāvake saṁsthitāmuṣāṁ sarvalakṣaṇalakṣitāṁ vicitrābharaṇavasanagaṁdhamālyālaṁkṛtāṁ kāṁcanavarṇāṁ sukeśīṁ sujātastanīṁ dṛṣṭvā gāḍhamāliṁgya kariṇyā gaṁdhahastīva tayātiprītisaṁyuktayā yathāsukhaṁ ramayāmāsa
वह भी जागकर उस अत्यंत रमणीय कामाग्नि-कक्ष में उपस्थित, सब शुभ लक्षणों से युक्त, विचित्र आभूषण-वस्त्र-सुगंध-मालाओं से सजी, स्वर्णवर्णा, सुंदर केशों वाली, सुगठित स्तनों वाली उषा को देखकर, गंधहस्ती जैसे हथिनी को आलिंगन करता है, वैसे ही उसे कसकर आलिंगन करके, अत्यंत प्रीतिपूर्वक यथासुख आनंद करने लगा।
श्लोक 13 (padma.6.250.13)
एवं मासमात्रं निरंतरतयानिरुद्धं रममाणं कदाचिदंतःपुरनिवासिन्यो वृद्धा दैत्यस्त्रियो ज्ञात्वा राज्ञे निवेदयामासुः ।
evaṁ māsamātraṁ niraṁtaratayāniruddhaṁ ramamāṇaṁ kadācidaṁtaḥpuranivāsinyo vṛddhā daityastriyo jñātvā rājñe nivedayāmāsuḥ
इस प्रकार लगातार एक महीने तक अनिरुद्ध आनंद करता रहा। कभी अंतःपुर की वृद्ध दैत्य-स्त्रियों ने यह जानकर राजा को सूचित किया।
श्लोक 14 (padma.6.250.14)
स राजा क्रोधताम्राक्षः परं विस्मयं गत्वा तमिहानयतेति पुरः किंकरान्प्रेषयामास ।
sa rājā krodhatāmrākṣaḥ paraṁ vismayaṁ gatvā tamihānayateti puraḥ kiṁkarānpreṣayāmāsa
वह राजा क्रोध से लाल नेत्र होकर, अत्यंत विस्मित होकर, 'उसे यहाँ लाओ' कहकर तुरंत सेवकों को भेजने लगा।
श्लोक 15 (padma.6.250.15)
तेऽपि तूर्णं नृपप्रासादमारुह्य राजपुत्र्याः शयने संस्थितमनिरुद्धं ग्रहीतुमाजग्मुः ।
te'pi tūrṇaṁ nṛpaprāsādamāruhya rājaputryāḥ śayane saṁsthitamaniruddhaṁ grahītumājagmuḥ
वे भी शीघ्र राजमहल में जाकर राजकुमारी की शय्या पर स्थित अनिरुद्ध को पकड़ने के लिए आ गए।
श्लोक 16 (padma.6.250.16)
स तान्समारब्धान्दृष्ट्वा प्रासादस्तंभमेकं हेलयोत्पाट्य नियुतसंख्याकान् किंकरान्मुहूर्तमात्रणैव स्तंभेन चूर्णितमात्रं चकार ।
sa tānsamārabdhāndṛṣṭvā prāsādastaṁbhamekaṁ helayotpāṭya niyutasaṁkhyākān kiṁkarānmuhūrtamātraṇaiva staṁbhena cūrṇitamātraṁ cakāra
उन्हें आते देखकर उसने महल के एक खंभे को खेल-खेल में उखाड़कर, लाखों सेवकों को उसी खंभे से क्षणभर में चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 17 (padma.6.250.17)
अथ दैत्यपतिर्निहतान्किंकरान्दृष्ट्वा कौतूहलं गत्वा असौ श्रीकृष्णपौत्र इति देवर्षिणा प्रोक्तो धनुरादाय स्वयमेवानिरुद्धं ग्रहीतुं तत्समीपमाजगाम ।
atha daityapatirnihatānkiṁkarāndṛṣṭvā kautūhalaṁ gatvā asau śrīkṛṣṇapautra iti devarṣiṇā prokto dhanurādāya svayamevāniruddhaṁ grahītuṁ tatsamīpamājagāma
तब अपने सेवकों को मारा गया देखकर दैत्यराज, कौतूहलवश जाकर, देवर्षि (नारद) द्वारा 'यह श्रीकृष्ण का पौत्र है' यह बताए जाने पर, धनुष लेकर स्वयं ही अनिरुद्ध को पकड़ने उसके पास आया।
श्लोक 18 (padma.6.250.18)
अनिरुद्धोऽपि योद्भुमायांतं सहस्रबाहुं राजानं दृष्ट्वा तत्परिघं भ्रामयित्वा बाणस्योपरि चिक्षेप ।
aniruddho'pi yodbhumāyāṁtaṁ sahasrabāhuṁ rājānaṁ dṛṣṭvā tatparighaṁ bhrāmayitvā bāṇasyopari cikṣepa
अनिरुद्ध ने भी युद्ध के लिए आते उस सहस्रबाहु राजा को देखकर, अपना परिघ घुमाकर बाणासुर पर फेंका।
श्लोक 19 (padma.6.250.19)
स्वचापनिर्मुक्तेन बाणेन तं परिघं चिच्छेद ।
svacāpanirmuktena bāṇena taṁ parighaṁ ciccheda
उसने अपने धनुष से छूटे बाण से उस परिघ को काट डाला।
श्लोक 20 (padma.6.250.20)
अनंतरमुरगास्त्रेण अनिरुद्धं निबिडं बद्ध्वा स्वांतःपुरे निवेशयामास ।
anaṁtaramuragāstreṇa aniruddhaṁ nibiḍaṁ baddhvā svāṁtaḥpure niveśayāmāsa
फिर सर्पास्त्र से अनिरुद्ध को कसकर बाँधकर उसे अपने अंतःपुर में डाल दिया।
श्लोक 21 (padma.6.250.21)
अथ कृष्णोप्येवंविधमेव देवर्षिणा ज्ञात्वा बलदेवप्रद्युम्नसहितः स्वसेनया विहंगमेंद्रमारुह्य तस्यबाणस्य भुजवनं छेत्तुमाजगाम ।
atha kṛṣṇopyevaṁvidhameva devarṣiṇā jñātvā baladevapradyumnasahitaḥ svasenayā vihaṁgameṁdramāruhya tasyabāṇasya bhujavanaṁ chettumājagāma
तब कृष्ण ने भी देवर्षि से यह पूरी बात जानकर, बलदेव-प्रद्युम्न सहित अपनी सेना के साथ गरुड़ पर सवार होकर, उस बाणासुर की भुजाओं के वन को काटने के लिए वहाँ पहुँचे।
श्लोक 22 (padma.6.250.22)
बलिपुत्रेण पुरा शंकरोऽर्चितः प्रसन्नो वरं वृणीष्वेत्युवाच ।
baliputreṇa purā śaṁkaro'rcitaḥ prasanno varaṁ vṛṇīṣvetyuvāca
पहले बलि-पुत्र (बाणासुर) द्वारा शंकर की पूजा किए जाने पर, प्रसन्न होकर उन्होंने 'वर माँगो' कहा था।
श्लोक 23 (padma.6.250.23)
तमीश्वरं बाणो मम पुरद्वारिरक्षार्थं सर्वदोपविश्य समागतं परसैन्यं जहीत्येवं वरमयाचत ।
tamīśvaraṁ bāṇo mama puradvārirakṣārthaṁ sarvadopaviśya samāgataṁ parasainyaṁ jahītyevaṁ varamayācata
बाणासुर ने उन ईश्वर से यह वर माँगा — 'मेरी रक्षा के लिए आप सदा मेरे नगर-द्वार पर विराजें और आने वाली शत्रु-सेना को मार डालें।'
श्लोक 24 (padma.6.250.24)
तं तथेत्युक्त्वा शंकरोऽपि तस्य पुरद्वारि सायुधः सपुत्रः सगणः समासीनस्तस्मिन्नेव काले रुषा स्वसेनया समागतं वासुदेवं दृष्ट्वा वृषमारुह्य सर्वायुधोपेतः स्वपुत्रगणसंवृतो योद्धुं निश्चक्राम ।
taṁ tathetyuktvā śaṁkaro'pi tasya puradvāri sāyudhaḥ saputraḥ sagaṇaḥ samāsīnastasminneva kāle ruṣā svasenayā samāgataṁ vāsudevaṁ dṛṣṭvā vṛṣamāruhya sarvāyudhopetaḥ svaputragaṇasaṁvṛto yoddhuṁ niścakrāma
'ऐसा ही हो' कहकर शंकर भी उसके नगर-द्वार पर अपने पुत्रों और गणों सहित सशस्त्र होकर विराजमान रहते थे। उसी समय अपनी सेना सहित क्रोधपूर्वक आते वासुदेव को देखकर, अपने बैल पर सवार होकर, सब आयुधों से युक्त, अपने पुत्रों-गणों से घिरे हुए वे युद्ध के लिए निकल पड़े।
श्लोक 25 (padma.6.250.25)
कृष्णोऽपि तं भूतपतिं गजचर्मकपालभस्मधरं ज्वलितोरगाकल्पं पिंगलं त्रिलोचनं त्रिशूलधरं सर्वभूतगणसंहृतिकर्त्तारं सर्वभूतभयावहं संवर्त्ताग्निप्रभं पुत्रद्वयसमन्वितं समस्तगणावृतं त्रिपुरांतकं दृष्ट्वा सेनां सुदूरे पृष्ठतो निवेश्य बलभद्र प्रद्युम्नसहितस्तेन रुद्रे ण सह प्रहसन्निव योद्धुमारेभे ।
kṛṣṇo'pi taṁ bhūtapatiṁ gajacarmakapālabhasmadharaṁ jvalitoragākalpaṁ piṁgalaṁ trilocanaṁ triśūladharaṁ sarvabhūtagaṇasaṁhṛtikarttāraṁ sarvabhūtabhayāvahaṁ saṁvarttāgniprabhaṁ putradvayasamanvitaṁ samastagaṇāvṛtaṁ tripurāṁtakaṁ dṛṣṭvā senāṁ sudūre pṛṣṭhato niveśya balabhadra pradyumnasahitastena rudre ṇa saha prahasanniva yoddhumārebhe
गजचर्म, कपाल और भस्म धारण किए, प्रज्वलित सर्पों से अलंकृत, पिंगल वर्ण, त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी, समस्त प्राणियों के संहारकर्ता, सब भूतों को भयभीत करने वाले, प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी, अपने दोनों पुत्रों सहित, समस्त गणों से घिरे, त्रिपुरांतक उस भूतपति शिव को देखकर, कृष्ण ने अपनी सेना को बहुत पीछे स्थापित करके, बलभद्र और प्रद्युम्न सहित, मानो हँसते हुए ही उस रुद्र के साथ युद्ध आरंभ किया।
श्लोक 26 (padma.6.250.26)
प्रथमं तदभूद्घोरं कृष्णशंकरयोस्तदा । पिनाकशार्ङ्गनिर्मुक्तैर्बाणैः संवर्त्तकोपमैः ।
prathamaṁ tadabhūdghoraṁ kṛṣṇaśaṁkarayostadā pinākaśārṅganirmuktairbāṇaiḥ saṁvarttakopamaiḥ
तब पहले कृष्ण और शंकर के बीच पिनाक और शार्ङ्ग धनुषों से छूटे, प्रलयाग्नि के समान बाणों से घोर युद्ध हुआ।
श्लोक 27 (padma.6.250.27)
रामोऽपि चक्रे बाणेन प्रद्युम्नः षण्मुखेन च । युयुधाते महावीर्यौ सिंहाविव बलोत्कटौ ।
rāmo'pi cakre bāṇena pradyumnaḥ ṣaṇmukhena ca yuyudhāte mahāvīryau siṁhāviva balotkaṭau
राम ने बाणासुर से, और प्रद्युम्न ने षण्मुख (कार्तिकेय) से युद्ध किया; वे दोनों महापराक्रमी जोड़े बल में उन्मत्त सिंहों की भाँति लड़ने लगे।
श्लोक 28 (padma.6.250.28)
विनायकः स्वदंतेन जघानोरसि यादवम् । रामो मुशलमादाय तस्य दंतमताडयत् ।
vināyakaḥ svadaṁtena jaghānorasi yādavam rāmo muśalamādāya tasya daṁtamatāḍayat
गणेश ने अपने दाँत से यादव (राम) के वक्षस्थल पर प्रहार किया। राम ने मूसल लेकर उनके दाँत पर ही प्रहार किया।
श्लोक 29 (padma.6.250.29)
निर्भिन्नदंतः सहसा प्रदुद्रावाखुवाहनः । तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन्हतदंतो गणेश्वरः ।
nirbhinnadaṁtaḥ sahasā pradudrāvākhuvāhanaḥ tadāprabhṛti loke'sminhatadaṁto gaṇeśvaraḥ
उनका दाँत टूट गया, और वह चूहे-सवार सहसा भाग खड़े हुए। तभी से इस लोक में गणेश्वर 'हतदंत' —
श्लोक 30 (padma.6.250.30)
देवदानवगंधर्वैरेकदंतइतीरितः । प्रद्युम्नेन समं युद्धं चकार शिखिवाहनः ।
devadānavagaṁdharvairekadaṁtaitīritaḥ pradyumnena samaṁ yuddhaṁ cakāra śikhivāhanaḥ
देवों, दानवों और गंधर्वों द्वारा 'एकदंत' कहलाने लगे। मयूर-सवार (कार्तिकेय) ने प्रद्युम्न के साथ समान रूप से युद्ध किया।
श्लोक 31 (padma.6.250.31)
गणान्विद्रावयामास मुशलेन हलायुधः । कृष्णेन सुचिरं कालं युद्धासौ नीललोहितः ।
gaṇānvidrāvayāmāsa muśalena halāyudhaḥ kṛṣṇena suciraṁ kālaṁ yuddhāsau nīlalohitaḥ
हलायुध (बलराम) ने मूसल से गणों को तितर-बितर कर दिया। कृष्ण उस नीललोहित (रुद्र) के साथ बहुत देर तक युद्ध करते रहे।
श्लोक 32 (padma.6.250.32)
तापज्वरं महादीप्तमस्मिन्संयोज्य सायके । कोपान्मुमोच तदसौ भृशं संरक्तलोचनः ।
tāpajvaraṁ mahādīptamasminsaṁyojya sāyake kopānmumoca tadasau bhṛśaṁ saṁraktalocanaḥ
उन्होंने अपने बाण में महातेजस्वी तापज्वर जोड़कर, क्रोधवश, अत्यंत लाल नेत्र होकर उसे छोड़ दिया।
श्लोक 33 (padma.6.250.33)
तदस्त्रं वारयामास कृष्णः शीतज्वरेण तु । ताभ्यां हरिहराभ्यां तु विसृष्टौ ताविमौ ज्वरौ ।
tadastraṁ vārayāmāsa kṛṣṇaḥ śītajvareṇa tu tābhyāṁ hariharābhyāṁ tu visṛṣṭau tāvimau jvarau
कृष्ण ने उस अस्त्र को शीतज्वर से रोका। हरि और हर द्वारा छोड़े गए वे दोनों ज्वर —
श्लोक 34 (padma.6.250.34)
विशतुर्मानुषे लोके तयोरेवाज्ञया भृशम् । हरिशंकरयोर्युद्धं ये तु शृण्वंति मानवाः ।
viśaturmānuṣe loke tayorevājñayā bhṛśam hariśaṁkarayoryuddhaṁ ye tu śṛṇvaṁti mānavāḥ
उन्हीं दोनों की आज्ञा से मनुष्य-लोक में प्रवेश कर गए। जो मनुष्य हरि-शंकर के इस युद्ध को सुनते हैं,
श्लोक 35 (padma.6.250.35)
ते सर्वे ज्वरनिर्मुक्ताः प्राप्नुवंति निरामयम् । ततः स तु हृषीकेशो मोहनास्त्रं दुरासदम् ।
te sarve jvaranirmuktāḥ prāpnuvaṁti nirāmayam tataḥ sa tu hṛṣīkeśo mohanāstraṁ durāsadam
वे सब ज्वर से मुक्त होकर स्वस्थता प्राप्त करते हैं। तब उस हृषीकेश ने दुर्जय मोहनास्त्र —
श्लोक 36 (padma.6.250.36)
नियुज्य बाणं भूतेशे मुमोच मधुसूदनः । मुहुर्मुहुर्व्यजृंभद्वै तेनास्त्रेण विमोहितः ।
niyujya bāṇaṁ bhūteśe mumoca madhusūdanaḥ muhurmuhurvyajṛṁbhadvai tenāstreṇa vimohitaḥ
बाण में जोड़कर भूतेश (शिव) पर छोड़ दिया। उस अस्त्र से मोहित होकर वे बार-बार जँभाई लेने लगे,
श्लोक 37 (padma.6.250.37)
पपात मूर्च्छितो भूमौ शंकरस्त्रिदशेश्वरः । पितरं मोहितं दृष्ट्वा शक्तिमुद्यम्य वीर्यवान् ।
papāta mūrcchito bhūmau śaṁkarastridaśeśvaraḥ pitaraṁ mohitaṁ dṛṣṭvā śaktimudyamya vīryavān
और देवेश्वर शंकर मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। अपने पिता को मोहित देखकर वह पराक्रमी षड्मुख —
श्लोक 38 (padma.6.250.38)
योद्धुमभ्याययौ कृष्णं षण्मुखः शिखिवाहनः । हुंकारेणैव तं कृष्णश्चकारात्र पराङ्मुखम् ।
yoddhumabhyāyayau kṛṣṇaṁ ṣaṇmukhaḥ śikhivāhanaḥ huṁkāreṇaiva taṁ kṛṣṇaścakārātra parāṅmukham
मयूर-सवार कार्तिकेय शक्ति उठाकर कृष्ण से युद्ध करने आगे आया। कृष्ण ने केवल हुंकार मात्र से उसे पीछे हटा दिया।
श्लोक 39 (padma.6.250.39)
एवं जित्वा यदुश्रेष्ठः शूलपाणिं त्रिलोचनम् । महास्वनं पांचजन्यं शंखं दध्मौ प्रतापवान् ।
evaṁ jitvā yaduśreṣṭhaḥ śūlapāṇiṁ trilocanam mahāsvanaṁ pāṁcajanyaṁ śaṁkhaṁ dadhmau pratāpavān
इस प्रकार त्रिशूलधारी त्रिनेत्र शिव को जीतकर उस प्रतापी यदुश्रेष्ठ ने महाध्वनि वाला पांचजन्य शंख बजाया।
श्लोक 40 (padma.6.250.40)
कृष्णेन निर्जितं श्रुत्वा सात्मजं शंकरं तदा । बाणः स्यंदनमास्थाय ययौ युद्धाय केशवम् ।
kṛṣṇena nirjitaṁ śrutvā sātmajaṁ śaṁkaraṁ tadā bāṇaḥ syaṁdanamāsthāya yayau yuddhāya keśavam
शंकर को अपने पुत्रों सहित कृष्ण द्वारा पराजित सुनकर, बाणासुर रथ पर सवार होकर केशव से युद्ध करने चला।
श्लोक 41 (padma.6.250.41)
स दृष्ट्वा सहसा कृष्णं गरुडोपरिसंस्थितम् । छादयामास गोविंदं बहुशस्त्रास्त्रवृष्टिभिः ।
sa dṛṣṭvā sahasā kṛṣṇaṁ garuḍoparisaṁsthitam chādayāmāsa goviṁdaṁ bahuśastrāstravṛṣṭibhiḥ
गरुड़ पर विराजमान कृष्ण को सहसा देखकर उसने गोविंद को अनेक शस्त्रास्त्रों की वर्षा से ढक दिया —
श्लोक 42 (padma.6.250.42)
गदाभिः परिघैः शूलैः शक्तिभिस्तोमरैरपि । भिंडिपालैश्च खङ्गैश्च चक्रैर्बाणैर्निरंतरम् ।
gadābhiḥ parighaiḥ śūlaiḥ śaktibhistomarairapi bhiṁḍipālaiśca khaṅgaiśca cakrairbāṇairniraṁtaram
गदाओं, परिघों, त्रिशूलों, शक्तियों, तोमरों, भिंडिपालों, तलवारों, चक्रों और बाणों से निरंतर।
श्लोक 43 (padma.6.250.43)
तानि सर्वाणि चिच्छेद चक्रेणैव जनार्दनः । ससर्ज तस्य बाहूनां छेदनार्थं सुदर्शनम् ।
tāni sarvāṇi ciccheda cakreṇaiva janārdanaḥ sasarja tasya bāhūnāṁ chedanārthaṁ sudarśanam
जनार्दन ने उन सबको चक्र से ही काट डाला। उन्होंने उसकी भुजाओं को काटने के लिए सुदर्शन चक्र छोड़ दिया।
श्लोक 44 (padma.6.250.44)
मुक्तं दनुजराजस्य सहस्रारं सुदर्शनम् । तद्बाहुकाननं तूर्णं छिन्नं चक्रे सहस्रधा ।
muktaṁ danujarājasya sahasrāraṁ sudarśanam tadbāhukānanaṁ tūrṇaṁ chinnaṁ cakre sahasradhā
उस दानवराज पर छोड़ा गया सहस्रार सुदर्शन चक्र, उसकी भुजाओं के उस वन को तुरंत ही हज़ार टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 45 (padma.6.250.45)
एतस्मिन्नंतरे देवि पार्वती संशितव्रता । हरेः समीपमागत्य कृतांजलिरभाषत ।
etasminnaṁtare devi pārvatī saṁśitavratā hareḥ samīpamāgatya kṛtāṁjalirabhāṣata
इसी बीच, हे देवी, कठोर व्रतधारी पार्वती जी हरि के समीप आकर हाथ जोड़कर बोलीं।
श्लोक 46 (padma.6.250.46)
पार्वत्युवाच- कृष्णकृष्ण जगन्नाथ नारायण दयानिधे । दास्यस्मि तव देवेश पूर्वभावे यदूत्तम ।
pārvatyuvāca kṛṣṇakṛṣṇa jagannātha nārāyaṇa dayānidhe dāsyasmi tava deveśa pūrvabhāve yadūttama
पार्वती जी ने कहा — हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे जगन्नाथ, हे नारायण, हे दयानिधि! हे देवेश, हे यदुश्रेष्ठ, पूर्वभाव में मैं आपकी दासी हूँ।
श्लोक 47 (padma.6.250.47)
त्वया दत्तं वरं मह्यं तदा कौशलपर्वते । सौभाग्यं शाश्वतं सौम्य प्रसन्नेन महात्मना ।
tvayā dattaṁ varaṁ mahyaṁ tadā kauśalaparvate saubhāgyaṁ śāśvataṁ saumya prasannena mahātmanā
हे सौम्य, प्रसन्न महात्मा, आपने ही तब कौशल पर्वत पर मुझे शाश्वत सौभाग्य का वर दिया था —
श्लोक 48 (padma.6.250.48)
तव मुख्यं सहस्रस्य नाम्नामन्यतमं विभो । गौरीसौभाग्यदातेति मुनिभिः परिकीर्तितम् ।
tava mukhyaṁ sahasrasya nāmnāmanyatamaṁ vibho gaurīsaubhāgyadāteti munibhiḥ parikīrtitam
हे विभु, आपके सहस्र नामों में से एक मुख्य नाम 'गौरी-सौभाग्यदाता' मुनियों द्वारा कहा जाता है।
श्लोक 49 (padma.6.250.49)
तत्सत्यं कुरु गोविंद गरुडारूढ शाश्वत । तस्मान्मम पतिं देव त्वं जीवयितुमर्हसि ।
tatsatyaṁ kuru goviṁda garuḍārūḍha śāśvata tasmānmama patiṁ deva tvaṁ jīvayitumarhasi
हे शाश्वत, गरुड़ारूढ़ गोविंद, उसे सत्य कीजिए। इसलिए हे देव, आपको मेरे पति को जीवित करना उचित है।
श्लोक 50 (padma.6.250.50)
रुद्र उवाच- एवमुक्तस्ततो देव्या कृष्णः कमललोचनः । अस्त्रं संहारयामास येनासौ मोहितः पतिः । कृष्णास्त्रेण विनिर्मुक्तः सर्वभूतपतिः शिवः । उत्थाय प्रांजलिर्भूत्वा तुष्टाव जगतां पतिम् ।
rudra uvāca evamuktastato devyā kṛṣṇaḥ kamalalocanaḥ astraṁ saṁhārayāmāsa yenāsau mohitaḥ patiḥ kṛṣṇāstreṇa vinirmuktaḥ sarvabhūtapatiḥ śivaḥ utthāya prāṁjalirbhūtvā tuṣṭāva jagatāṁ patim
रुद्र जी ने कहा — देवी द्वारा ऐसा कहे जाने पर, कमलनयन कृष्ण ने वह अस्त्र वापस ले लिया जिससे उनके पति मोहित हुए थे। कृष्णास्त्र से मुक्त होकर सर्वभूतपति शिव उठकर हाथ जोड़कर जगत्पति की स्तुति करने लगे।
श्लोक 51 (padma.6.250.51)
शंकर उवाच- कृष्णकृष्ण जगन्नाथ भगवन्पुरुषोत्तम । परेश परमेशान अनादिनिधनाव्यय ।
śaṁkara uvāca kṛṣṇakṛṣṇa jagannātha bhagavanpuruṣottama pareśa parameśāna anādinidhanāvyaya
शंकर जी ने कहा — हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे जगन्नाथ, हे भगवान पुरुषोत्तम! हे परेश, हे परमेशान, हे आदि-अंत-रहित अव्यय!
श्लोक 52 (padma.6.250.52)
तीव्रवीर्यं मनुष्येषु शरीरग्रहणात्मिका । सर्वस्य तव चेष्टेयं मानलक्षणमेव तत् ।
tīvravīryaṁ manuṣyeṣu śarīragrahaṇātmikā sarvasya tava ceṣṭeyaṁ mānalakṣaṇameva tat
मनुष्यों में शरीर धारण करने का यह आपका तीव्र पराक्रमी कार्य — यह सब आपकी लीला ही है, और यह मान-लक्षण ही है।
श्लोक 53 (padma.6.250.53)
प्रसीद मे नमस्तुभ्यं प्रसीद मम शाश्वत । प्रसीद मे जगत्स्वामिन्प्रसीदाच्युत केशव ।
prasīda me namastubhyaṁ prasīda mama śāśvata prasīda me jagatsvāminprasīdācyuta keśava
मुझ पर प्रसन्न हों, आपको नमस्कार। हे शाश्वत, मुझ पर प्रसन्न हों। हे जगत्स्वामी, मुझ पर प्रसन्न हों। हे अच्युत केशव, प्रसन्न हों।
श्लोक 54 (padma.6.250.54)
त्वमेव जगतां स्रष्टा धाता हर्त्ता जगद्गुरुः । त्वमेव चिदचिद्वस्तुरूपं ब्रह्म सुरेश्वर ।
tvameva jagatāṁ sraṣṭā dhātā harttā jagadguruḥ tvameva cidacidvasturūpaṁ brahma sureśvara
आप ही जगत के स्रष्टा, धाता, संहारक और जगद्गुरु हैं। हे सुरेश्वर, आप ही चेतन-अचेतन वस्तुरूप ब्रह्म हैं।
श्लोक 55 (padma.6.250.55)
त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमीश्वरः शेष एव च । त्वं महत्त्वं परं ब्रह्म प्रत्यगात्मा त्वमेव हि ।
tvamādistvamanādistvamīśvaraḥ śeṣa eva ca tvaṁ mahattvaṁ paraṁ brahma pratyagātmā tvameva hi
आप ही आदि हैं, आप ही अनादि हैं, आप ही ईश्वर हैं और शेष भी। आप ही महत्तत्त्व, परब्रह्म, तथा प्रत्यगात्मा भी हैं।
श्लोक 56 (padma.6.250.56)
समस्तामरवर्य्यस्त्वममर्त्यस्त्वं सुरेश्वर । त्वं मर्त्त्येशः सयोनिस्त्वं सौशील्येन तव प्रभो ।
samastāmaravaryyastvamamartyastvaṁ sureśvara tvaṁ marttyeśaḥ sayonistvaṁ sauśīlyena tava prabho
आप ही सब अमरों में श्रेष्ठ, अमर हैं, हे सुरेश्वर। आप ही मर्त्यों के स्वामी हैं, अपने सौशील्य से ही सयोनि प्रतीत होते हैं, हे प्रभु।
श्लोक 57 (padma.6.250.57)
तव श्वाससमुत्पन्नौ परजीवौ सनातनौ । ततश्च पाल्यते चैव तव वात्सल्यगौरवात् ।
tava śvāsasamutpannau parajīvau sanātanau tataśca pālyate caiva tava vātsalyagauravāt
आपकी साँस से उत्पन्न परजीव सनातन हैं, और आपके वात्सल्य के गौरव से ही वे पालित होते हैं।
श्लोक 58 (padma.6.250.58)
क्षराक्षरे परे धाम्नि रुचो नित्यं सुराश्रये । अधि विश्वे निधेषि त्वां दास्यकर्मणि नान्यथा ।
kṣarākṣare pare dhāmni ruco nityaṁ surāśraye adhi viśve nidheṣi tvāṁ dāsyakarmaṇi nānyathā
क्षर-अक्षर परम धाम में, सुरों के आश्रय, आपमें ही [हमारी] भक्ति नित्य स्थित है; विश्व से ऊपर आप ही सेवाकर्म में स्थित रहते हैं, अन्यथा नहीं।
श्लोक 59 (padma.6.250.59)
यस्त्वां न वेदलोकेऽस्मिन्स मूढः सर्वभावनः । परावरेश्वरं धाम विदुर्दास्ये मनीषिणः ।
yastvāṁ na vedaloke'sminsa mūḍhaḥ sarvabhāvanaḥ parāvareśvaraṁ dhāma vidurdāsye manīṣiṇaḥ
जो इस लोक में आपको नहीं जानता, वह मूढ़ है, हे सर्वभावन। विवेकीजन दास्यभाव से ही आपको उच्च-निम्न के स्वामी, उस परम धाम के रूप में जानते हैं।
श्लोक 60 (padma.6.250.60)
ते वै समासते युक्तास्तत्पदं त्रिदशैः समम् । सामान्यो भजते दूरेनंतुं नित्यं पदं तव ।
te vai samāsate yuktāstatpadaṁ tridaśaiḥ samam sāmānyo bhajate dūrenaṁtuṁ nityaṁ padaṁ tava
वे साधनायुक्त पुरुष ही देवताओं के साथ उस पद में स्थित होते हैं; सामान्य व्यक्ति दूर ही रहकर आपके उस नित्य पद तक कभी नहीं पहुँच पाता।
श्लोक 61 (padma.6.250.61)
तस्य तुर्या चारुकेशी चावस्था घटते तव । मिथुनानि तवाध्यक्ष ब्रुवते यदुशाश्वत ।
tasya turyā cārukeśī cāvasthā ghaṭate tava mithunāni tavādhyakṣa bruvate yaduśāśvata
हे सुंदरकेशी, उसके लिए ही आपकी वह तुरीय अवस्था प्रकट होती है। हे यदुओं के शाश्वत अधिपति, आपके युगल-स्वरूपों को [सन्त] कहते हैं।
श्लोक 62 (padma.6.250.62)
तव नामानि कर्माणि गुणानि शाश्वतानि च । ऐश्वर्याणि गुणातीत ब्रुवते चोत्तमे इमे ।
tava nāmāni karmāṇi guṇāni śāśvatāni ca aiśvaryāṇi guṇātīta bruvate cottame ime
आपके नाम, कर्म, शाश्वत गुण और ऐश्वर्य को, हे गुणातीत, ये श्रेष्ठ [ऋषिगण] बताते हैं।
श्लोक 63 (padma.6.250.63)
कर्मज्ञानमये रूपे इमे पूर्वोत्तरे श्रुते । ससुतौ युवतीशस्य स्तोतारौ तव केशव ।
karmajñānamaye rūpe ime pūrvottare śrute sasutau yuvatīśasya stotārau tava keśava
कर्म और ज्ञानमय ये दोनों रूप वेद के पूर्व और उत्तर भागों में कहे गए हैं। हे केशव, अपने पुत्रों सहित हम आपकी ही स्तुति करने वाले हैं।
श्लोक 64 (padma.6.250.64)
त्वं प्रज्ञानं परं ब्रह्म त्वया प्राज्ञेन शाश्वत । जीवयैतेन प्रज्ञेन परेणैवात्मना त्वया ।
tvaṁ prajñānaṁ paraṁ brahma tvayā prājñena śāśvata jīvayaitena prajñena pareṇaivātmanā tvayā
आप ही प्रज्ञान, परब्रह्म हैं; हे शाश्वत, आप उस सर्वज्ञ, परम आत्मा प्रज्ञान द्वारा ही सबको जीवन देते हैं।
श्लोक 65 (padma.6.250.65)
तस्माच्छरीरादुत्क्रम्य कृपया तव केवलम् । आमुष्मिके परे स्वर्गे त्वया दत्तात्मबोधवान् ।
tasmāccharīrādutkramya kṛpayā tava kevalam āmuṣmike pare svarge tvayā dattātmabodhavān
उस शरीर से ऊपर उठकर, केवल आपकी ही कृपा से, उस परलोक के परम स्वर्ग में, आपके द्वारा दिए आत्मबोध से युक्त होकर —
श्लोक 66 (padma.6.250.66)
प्रज्ञानं चैव विज्ञानं मेधां दृष्टिं तथा धृतिम् । सर्वान्कामानवाप्नोति अमृतं स भवेत्तदा ।
prajñānaṁ caiva vijñānaṁ medhāṁ dṛṣṭiṁ tathā dhṛtim sarvānkāmānavāpnoti amṛtaṁ sa bhavettadā
प्रज्ञान, विज्ञान, मेधा, दृष्टि तथा धृति — वह सब कामनाएँ प्राप्त करके तब अमृतत्व को प्राप्त होता है।
श्लोक 67 (padma.6.250.67)
एतत्संज्ञानमात्मानं यदेतद्धृदि यन्मनः । मनीषा चैव युक्तिश्च स्मृतिः संकल्प एव च ।
etatsaṁjñānamātmānaṁ yadetaddhṛdi yanmanaḥ manīṣā caiva yuktiśca smṛtiḥ saṁkalpa eva ca
यह संज्ञान ही आत्मा है — जो हृदय में है, जो मन है; तथा मनीषा, युक्ति, स्मृति और संकल्प भी —
श्लोक 68 (padma.6.250.68)
तपश्च क्रतवः कामो दश इत्यादि ते प्रभो । भवंति नामधेयानि प्रज्ञानस्य घृणानिधेः ।
tapaśca kratavaḥ kāmo daśa ityādi te prabho bhavaṁti nāmadheyāni prajñānasya ghṛṇānidheḥ
तथा तप, क्रतु और काम — हे प्रभु, ये दस आदि नाम आपके ही, उस करुणानिधि प्रज्ञान के, नामधेय हैं।
श्लोक 69 (padma.6.250.69)
एष त्वं परमं ब्रह्म एष त्वं वै प्रजापतिः । एष त्वमिंद्रो रुद्रश्च एष त्वं सर्वदेवताः ।
eṣa tvaṁ paramaṁ brahma eṣa tvaṁ vai prajāpatiḥ eṣa tvamiṁdro rudraśca eṣa tvaṁ sarvadevatāḥ
आप ही यह परब्रह्म हैं, आप ही निश्चय ही प्रजापति हैं। आप ही इंद्र और रुद्र हैं, आप ही सब देवता हैं।
श्लोक 70 (padma.6.250.70)
एतानि सर्वभूतानि त्वमेव परमेश्वर । सुत मित्राणि जीवायुस्तथान्यानि सनातन ।
etāni sarvabhūtāni tvameva parameśvara suta mitrāṇi jīvāyustathānyāni sanātana
ये सब प्राणी आप ही हैं, हे परमेश्वर — पुत्र, मित्र, प्राण, तथा अन्य सब कुछ, हे सनातन।
श्लोक 71 (padma.6.250.71)
जरायुजाण्डजातानि स्वेदजोद्भिद्यजानि च । अश्वा गावश्च पुरुषा हस्तिनश्चेतराणि च ।
jarāyujāṇḍajātāni svedajodbhidyajāni ca aśvā gāvaśca puruṣā hastinaścetarāṇi ca
जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज प्राणी — घोड़े, गाय, मनुष्य, हाथी और अन्य सब —
श्लोक 72 (padma.6.250.72)
यत्किंचित्प्राणिजातं च जंगमाश्चैव जंतवः । स्थावरा ये च वै नाथ सर्वे त्वत्तो भवंति च ।
yatkiṁcitprāṇijātaṁ ca jaṁgamāścaiva jaṁtavaḥ sthāvarā ye ca vai nātha sarve tvatto bhavaṁti ca
जो भी प्राणी-जाति है, जो भी चलने वाले जीव-जंतु हैं, और जो भी स्थावर हैं, हे नाथ, वे सब आपसे ही उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 73 (padma.6.250.73)
त्वां हि सर्वं गतं चेत्थं वदंति श्रुतयो हरिम् । त्वयैव प्रेरिता लोकाश्चेष्टंते साध्वसाधुषु ।
tvāṁ hi sarvaṁ gataṁ cetthaṁ vadaṁti śrutayo harim tvayaiva preritā lokāśceṣṭaṁte sādhvasādhuṣu
श्रुतियाँ इस प्रकार आप हरि को ही सर्वव्यापी कहती हैं। आप द्वारा ही प्रेरित होकर लोग साधु-असाधु कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक 74 (padma.6.250.74)
तस्मान्मया कृतं यच्च अपराधमिदं प्रभो । क्षमस्व करुणासिंधो गुणैः शुभतमैस्तव ।
tasmānmayā kṛtaṁ yacca aparādhamidaṁ prabho kṣamasva karuṇāsiṁdho guṇaiḥ śubhatamaistava
इसलिए, हे प्रभु, मैंने जो भी अपराध किया है, हे करुणासिंधु, उसे अपने सर्वश्रेष्ठ गुणों से क्षमा कीजिए।
श्लोक 75 (padma.6.250.75)
नमस्ते पुंडरीकाक्ष गोविंदाच्युत माधव । वासुदेव जगद्वंद्य नारायण नमोस्तु ते ।
namaste puṁḍarīkākṣa goviṁdācyuta mādhava vāsudeva jagadvaṁdya nārāyaṇa namostu te
हे कमलनयन, आपको नमस्कार। हे गोविंद, हे अच्युत, हे माधव! हे वासुदेव, हे जगत्वंद्य नारायण, आपको नमस्कार हो।
श्लोक 76 (padma.6.250.76)
नमस्यामि जगत्स्वामिन्नृसिंहकरुणाकर । श्रीश सर्वगत श्रीमन्परमात्मन्नमोस्तु ते ।
namasyāmi jagatsvāminnṛsiṁhakaruṇākara śrīśa sarvagata śrīmanparamātmannamostu te
हे जगत्स्वामी, हे नृसिंह, हे करुणानिधि, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे श्रीश, हे सर्वव्यापी, हे श्रीमान परमात्मा, आपको नमस्कार हो।
श्लोक 77 (padma.6.250.77)
निजावसथवैकुंठ नित्यमुक्तार्चितप्रभो । त्रयीनाथ नमस्तुभ्यं रामराजीवलोचन ।
nijāvasathavaikuṁṭha nityamuktārcitaprabho trayīnātha namastubhyaṁ rāmarājīvalocana
हे स्वयं वैकुंठ-निवासी, नित्यमुक्तों द्वारा पूजित प्रभु! हे त्रयी-नाथ, आपको नमस्कार, हे कमलनयन राम।
श्लोक 78 (padma.6.250.78)
भूभारकविनाशाय कृष्णानंदस्वरूपिणे । विष्णवे जिष्णवे तुभ्यं नमस्ते यदुनंदन ।
bhūbhārakavināśāya kṛṣṇānaṁdasvarūpiṇe viṣṇave jiṣṇave tubhyaṁ namaste yadunaṁdana
पृथ्वी के भार को नष्ट करने के लिए कृष्ण-रूप आनंदस्वरूप को, विष्णु, सदाविजयी आपको नमस्कार, हे यदुनंदन।
श्लोक 79 (padma.6.250.79)
एवं स्तुत्वाथ गोविंदं प्रणिपत्य उमापतिः । प्रांजलिः प्राह भूतेशो वाक्यं गंभीरया गिरा ।
evaṁ stutvātha goviṁdaṁ praṇipatya umāpatiḥ prāṁjaliḥ prāha bhūteśo vākyaṁ gaṁbhīrayā girā
इस प्रकार गोविंद की स्तुति करके, प्रणाम करके, उमापति भूतेश ने हाथ जोड़कर गंभीर वाणी में कहा।
श्लोक 80 (padma.6.250.80)
रुद्र उवाच- मया दत्तवरो ह्येष बाणो बलिसुतः प्रभो । अहं च दत्तवांस्तस्मै पुरानेनार्थितो वरम् ।
rudra uvāca mayā dattavaro hyeṣa bāṇo balisutaḥ prabho ahaṁ ca dattavāṁstasmai purānenārthito varam
रुद्र जी ने कहा — हे प्रभु, इस बलिपुत्र बाणासुर को मैंने ही वर दिया था; पहले इसके द्वारा प्रार्थना किए जाने पर मैंने ही यह वर दिया था —
श्लोक 81 (padma.6.250.81)
अमरत्वं यदुश्रेष्ठ सर्वं कर्तुं त्वमर्हसि । तस्मादेनं बलिसुतं त्रातुमर्हसि मे प्रियम् ।
amaratvaṁ yaduśreṣṭha sarvaṁ kartuṁ tvamarhasi tasmādenaṁ balisutaṁ trātumarhasi me priyam
हे यदुश्रेष्ठ, आप सब कुछ करने में समर्थ हैं, अमरत्व भी। इसलिए इस मेरे प्रिय बलिपुत्र की रक्षा करना आपको उचित है।
श्लोक 82 (padma.6.250.82)
तथेत्युक्त्वा च भगवान्बाणं बलिसुतं तदा । प्राणसंशयमापन्नं च्छिन्नबाहुमसृक्चितम् ।
tathetyuktvā ca bhagavānbāṇaṁ balisutaṁ tadā prāṇasaṁśayamāpannaṁ cchinnabāhumasṛkcitam
'ऐसा ही हो' कहकर, तब उन भगवान् ने प्राणसंकट में पड़े, भुजाएँ कटी, रक्त से लथपथ उस बलिपुत्र बाणासुर को —
श्लोक 83 (padma.6.250.83)
संहृत्य चक्रं गोविंदो मुमोच करुणानिधिः । मोचयित्वा बलिसुतं शंकरः संशितव्रतः ।
saṁhṛtya cakraṁ goviṁdo mumoca karuṇānidhiḥ mocayitvā balisutaṁ śaṁkaraḥ saṁśitavrataḥ
अपना चक्र वापस लेकर, वे करुणानिधि गोविंद, छोड़ दिया। बलिपुत्र को मुक्त कराकर कठोर व्रतधारी शंकर —
श्लोक 84 (padma.6.250.84)
वृषभेंद्रं समारुह्य पार्वत्यासहितः प्रभुः । ययौ च वसतिस्थानं कैलासं धरणीधरम् ।
vṛṣabheṁdraṁ samāruhya pārvatyāsahitaḥ prabhuḥ yayau ca vasatisthānaṁ kailāsaṁ dharaṇīdharam
अपने बैल पर सवार होकर, पार्वती सहित, वे प्रभु अपने निवास-स्थान कैलास पर्वत को चले गए।
श्लोक 85 (padma.6.250.85)
स तु बाणो नमस्कृत्य रामकृष्णौ महाबलौ । ताभ्यां वै नगरीं गत्वा मुमोच मदनात्मजम् ।
sa tu bāṇo namaskṛtya rāmakṛṣṇau mahābalau tābhyāṁ vai nagarīṁ gatvā mumoca madanātmajam
वह बाणासुर महाबली राम-कृष्ण को प्रणाम करके, उन दोनों के साथ नगरी में जाकर, कामदेव के पुत्र (अनिरुद्ध) को मुक्त कर दिया।
श्लोक 86 (padma.6.250.86)
वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैः पूजयित्वा यथार्हतः । उषां संप्रददौ तस्मै कृष्णपौत्राय शौरये ।
vastrairābharaṇairdivyaiḥ pūjayitvā yathārhataḥ uṣāṁ saṁpradadau tasmai kṛṣṇapautrāya śauraye
दिव्य वस्त्र-आभूषणों से यथोचित सम्मान करके, उसने उषा को कृष्ण के पौत्र, शौरि-वंशी अनिरुद्ध को सौंप दिया।
श्लोक 87 (padma.6.250.87)
उद्वाह्य रामकृष्णौ तमनिरुद्धं यथाविधि । बाणेन पूजितौ तत्र प्रद्युम्नसहितौ तदा ।
udvāhya rāmakṛṣṇau tamaniruddhaṁ yathāvidhi bāṇena pūjitau tatra pradyumnasahitau tadā
इस प्रकार अनिरुद्ध का विधिवत् विवाह कराकर, राम-कृष्ण, वहाँ बाणासुर द्वारा प्रद्युम्न सहित पूजित होकर —
श्लोक 88 (padma.6.250.88)
उषयासहितं तत्रानिरुद्धं वै जनार्दनः । आरोप्य स्यंदने दिव्ये ययौ द्वारवतीं तदा ।
uṣayāsahitaṁ tatrāniruddhaṁ vai janārdanaḥ āropya syaṁdane divye yayau dvāravatīṁ tadā
उषा सहित अनिरुद्ध को दिव्य रथ पर बिठाकर, जनार्दन तब द्वारवती की ओर चल पड़े।
श्लोक 89 (padma.6.250.89)
रामप्रद्युम्नसहितः सेनया सहितो हरिः । प्रविवेश पुरीं रम्यां त्रिदशैर्मघवानिव ।
rāmapradyumnasahitaḥ senayā sahito hariḥ praviveśa purīṁ ramyāṁ tridaśairmaghavāniva
राम-प्रद्युम्न और अपनी सेना सहित हरि उस रमणीय नगरी में वैसे ही प्रविष्ट हुए जैसे इंद्र देवताओं सहित स्वर्ग में।
श्लोक 90 (padma.6.250.90)
अनिरुद्धो बाणपुत्र्या नानारत्नमये गृहे । अनिशं रमयामास नानाभोगैर्मुदान्वितः ।
aniruddho bāṇaputryā nānāratnamaye gṛhe aniśaṁ ramayāmāsa nānābhogairmudānvitaḥ
अनिरुद्ध, बाणासुर की पुत्री उषा के साथ नाना रत्नों से जड़े भवन में, नाना भोगों से हर्षित होकर निरंतर आनंद करने लगा।