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उत्तर खण्ड · अध्याय 252

श्रीकृष्ण-स्वधामगमन-निरूपण

अध्याय 251अध्याय-सूचीअध्याय 253

श्लोक 1 (padma.6.252.1)

श्रीरुद्र उवाच- अथ मगधाधिपः कंसवधानंतरं द्विषन्नेव यादवान्सदा पीडयामास ते दुःखिताः कृष्णमूचुः ।

śrīrudra uvāca atha magadhādhipaḥ kaṁsavadhānaṁtaraṁ dviṣanneva yādavānsadā pīḍayāmāsa te duḥkhitāḥ kṛṣṇamūcuḥ

श्री रुद्र जी ने कहा — कंस के वध के बाद मगधाधिपति जरासंध द्वेषवश यादवों को सदा पीड़ित करता रहा; वे दुःखी होकर कृष्ण से बोले।

श्लोक 2 (padma.6.252.2)

स च भीमार्जुनावाहूय संमंत्रयामास कृष्णः अनेन रुद्र पूःजितस्तत्प्रसादाच्छस्त्रैरवध्यः परं केनापिप्रकारेण हंतव्य इति ।

sa ca bhīmārjunāvāhūya saṁmaṁtrayāmāsa kṛṣṇaḥ anena rudra pūḥjitastatprasādācchastrairavadhyaḥ paraṁ kenāpiprakāreṇa haṁtavya iti

कृष्ण ने भीम और अर्जुन को बुलाकर मंत्रणा की — 'इसने रुद्र की पूजा की है, उनकी कृपा से यह शस्त्रों से अवध्य है, फिर भी किसी न किसी उपाय से इसे मारना ही होगा।'

श्लोक 3 (padma.6.252.3)

अथ विचार्य भीममाह एनं प्रतिमल्लयुद्धं कुरु तत्तेन प्रतिज्ञातम् ।

atha vicārya bhīmamāha enaṁ pratimallayuddhaṁ kuru tattena pratijñātam

तब विचार करके उन्होंने भीम से कहा — 'इससे मल्लयुद्ध करो' — और उन्होंने वह स्वीकार किया।

श्लोक 4 (padma.6.252.4)

अथ सकल चराचरजगद्वंद्यो वासुदेवो भीमार्जुनसहितो जरासंधस्य पुरीं गत्वा विप्रवेषेण तस्यांतःपुरमवाप ।

atha sakala carācarajagadvaṁdyo vāsudevo bhīmārjunasahito jarāsaṁdhasya purīṁ gatvā vipraveṣeṇa tasyāṁtaḥpuramavāpa

तब समस्त चराचर जगत द्वारा वंदनीय वासुदेव भीम-अर्जुन सहित जरासंध की नगरी में जाकर विप्र-वेष में उसके अंतःपुर में पहुँचे।

श्लोक 5 (padma.6.252.5)

सोऽपि महावीर्यान्क्षत्त्रियान्युद्धे निर्जित्य बलाद्गृहीत्वा स्ववेश्मनि निरुध्य मासिमासि कृष्णचतुर्दश्यामेकैकं हत्वा तद्रक्तेनैव बलिं भैरवायाकरोत् ।

so'pi mahāvīryānkṣattriyānyuddhe nirjitya balādgṛhītvā svaveśmani nirudhya māsimāsi kṛṣṇacaturdaśyāmekaikaṁ hatvā tadraktenaiva baliṁ bhairavāyākarot

वह महापराक्रमी क्षत्रियों को युद्ध में जीतकर बलपूर्वक पकड़कर अपने घर में बंद रखता था, और हर मास कृष्ण-चतुर्दशी को एक-एक को मारकर उसी रक्त से भैरव को बलि चढ़ाता था।

श्लोक 6 (padma.6.252.6)

एवंविधं सकलजनपार्थिववधं कुर्वतो जरासंधस्य समुद्यमानो भीमार्जुनसहितस्तस्य गृहे विप्रवेषेणैव प्रविवेश ।

evaṁvidhaṁ sakalajanapārthivavadhaṁ kurvato jarāsaṁdhasya samudyamāno bhīmārjunasahitastasya gṛhe vipraveṣeṇaiva praviveśa

इस प्रकार सब देशों के राजाओं का वध करते हुए उस जरासंध के घर में भीम-अर्जुन सहित वे विप्र-वेष में ही प्रविष्ट हुए।

श्लोक 7 (padma.6.252.7)

स तु तान्दृष्ट्वा दंडवत्प्रणतो भूत्वा यथोचितासनेषु निवेश्य मधुपर्कविधानेन संपूज्य धन्योस्मि कृतकृत्योस्मि किमर्थं भवन्तो मे समीप आगतास्तद्वक्तव्यमहं तत्सर्वं भवद्भ्यो दास्यामीत्युवाच ।

sa tu tāndṛṣṭvā daṁḍavatpraṇato bhūtvā yathocitāsaneṣu niveśya madhuparkavidhānena saṁpūjya dhanyosmi kṛtakṛtyosmi kimarthaṁ bhavanto me samīpa āgatāstadvaktavyamahaṁ tatsarvaṁ bhavadbhyo dāsyāmītyuvāca

उन्हें देखकर उसने दंडवत् प्रणाम किया, उचित आसनों पर बिठाकर मधुपर्क-विधि से पूजा करके कहा — 'मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। आप किस उद्देश्य से मेरे पास आए हैं, बताइए, मैं वह सब आपको दूँगा।'

श्लोक 8 (padma.6.252.8)

तेषां वासुदेवः प्रहसन्पार्थिवं तमुवाच कृष्णभीमार्जुना युद्धार्थमागताः स्म अस्माकमन्यतमं द्वंद्वयुद्धार्थं वृणीष्वेत्यवदत् ।

teṣāṁ vāsudevaḥ prahasanpārthivaṁ tamuvāca kṛṣṇabhīmārjunā yuddhārthamāgatāḥ sma asmākamanyatamaṁ dvaṁdvayuddhārthaṁ vṛṇīṣvetyavadat

वासुदेव ने हँसते हुए उस राजा से कहा — 'हम कृष्ण, भीम और अर्जुन युद्ध के लिए आए हैं; हममें से किसी एक को द्वंद्वयुद्ध के लिए चुनो।'

श्लोक 9 (padma.6.252.9)

सोऽपि तथेत्यवदत्ततो द्वंद्वयुद्धार्थं मारुतिं वरयामास ।

so'pi tathetyavadattato dvaṁdvayuddhārthaṁ mārutiṁ varayāmāsa

उसने भी स्वीकार किया और द्वंद्वयुद्ध के लिए मारुति (भीम) को चुना।

श्लोक 10 (padma.6.252.10)

ततो भीमजरासंधयोरभितो भयंकरं मल्लयुद्धं निरंतरं पंचविंशतिवासरमभूत् ।

tato bhīmajarāsaṁdhayorabhito bhayaṁkaraṁ mallayuddhaṁ niraṁtaraṁ paṁcaviṁśativāsaramabhūt

तब भीम और जरासंध के बीच लगातार पच्चीस दिनों तक भयंकर मल्लयुद्ध हुआ।

श्लोक 11 (padma.6.252.11)

ततः कृष्णेनैव संचोदितो वायुपुत्रस्तस्य शरीरं द्विधाकृत्य भूमौ निपातयामास ।। एवं जरासंधं पांडुपुत्रेण हत्वा तान्जरासंधनिरोधितान्वासुदेवोऽपि पार्थिवान्मोचयामास ।

tataḥ kṛṣṇenaiva saṁcodito vāyuputrastasya śarīraṁ dvidhākṛtya bhūmau nipātayāmāsa evaṁ jarāsaṁdhaṁ pāṁḍuputreṇa hatvā tānjarāsaṁdhanirodhitānvāsudevo'pi pārthivānmocayāmāsa

तब कृष्ण द्वारा ही प्रेरित होकर वायुपुत्र ने उसके शरीर को दो भागों में करके भूमि पर गिरा दिया। इस प्रकार जरासंध को पांडुपुत्र से मरवाकर वासुदेव ने उसके द्वारा बंदी बनाए गए उन राजाओं को भी मुक्त कराया।

श्लोक 12 (padma.6.252.12)

निहत्य वायुपुत्रेण जरांसंधं यदूद्वहः । तद्गृहे सन्निरुद्धांस्तु मोचयामास पार्थिवान् ।

nihatya vāyuputreṇa jarāṁsaṁdhaṁ yadūdvahaḥ tadgṛhe sanniruddhāṁstu mocayāmāsa pārthivān

वायुपुत्र से जरासंध को मरवाकर यदुश्रेष्ठ ने उसके घर में बंद राजाओं को मुक्त कराया।

श्लोक 13 (padma.6.252.13)

ते च तत्र नमस्कृत्य स्तुत्वा च मधुसूदनम् । स्वान्स्वान्जनपदान्सर्वे जग्मुः कृष्णेन रक्षिताः ।

te ca tatra namaskṛtya stutvā ca madhusūdanam svānsvānjanapadānsarve jagmuḥ kṛṣṇena rakṣitāḥ

वे सब वहाँ मधुसूदन को नमस्कार और स्तुति करके, कृष्ण द्वारा रक्षित होकर अपने-अपने राज्यों को चले गए।

श्लोक 14 (padma.6.252.14)

अथ ताभ्यामिंद्रप्रस्थं गत्वा वासुदेवस्तत्र महाक्रतुं राजसूयं युधिष्ठिरं कारयामास ।

atha tābhyāmiṁdraprasthaṁ gatvā vāsudevastatra mahākratuṁ rājasūyaṁ yudhiṣṭhiraṁ kārayāmāsa

तब उन दोनों (भीम-अर्जुन) के साथ इंद्रप्रस्थ जाकर वासुदेव ने वहाँ युधिष्ठिर से राजसूय महायज्ञ करवाया।

श्लोक 15 (padma.6.252.15)

तत्र समाप्ते क्रतौ अग्रपूजां भीष्मानुमतेन कृष्णाय दत्तवान् ।

tatra samāpte kratau agrapūjāṁ bhīṣmānumatena kṛṣṇāya dattavān

वहाँ यज्ञ समाप्त होने पर भीष्म की सहमति से युधिष्ठिर ने अग्रपूजा कृष्ण को दी।

श्लोक 16 (padma.6.252.16)

तत्र शिशुपालः कृष्णं बहून्याक्षेपवाक्यान्युक्तवान् ।

tatra śiśupālaḥ kṛṣṇaṁ bahūnyākṣepavākyānyuktavān

वहाँ शिशुपाल ने कृष्ण के प्रति अनेक निंदा-वचन कहे।

श्लोक 17 (padma.6.252.17)

कृष्णोऽपि सुदर्शनेन तस्य शिरश्चिच्छेद ।

kṛṣṇo'pi sudarśanena tasya śiraściccheda

कृष्ण ने भी सुदर्शन से उसका सिर काट डाला।

श्लोक 18 (padma.6.252.18)

असौ जन्मत्रयावसाने हरेः सारूप्यमगमत् ।

asau janmatrayāvasāne hareḥ sārūpyamagamat

वह तीन जन्मों के अंत में हरि के समान रूप को प्राप्त हुआ।

श्लोक 19 (padma.6.252.19)

अथ शिशुपालं निहतं श्रुत्वा दंतवक्त्रः कृष्णेन योद्धुं मथुरामाजगाम ।

atha śiśupālaṁ nihataṁ śrutvā daṁtavaktraḥ kṛṣṇena yoddhuṁ mathurāmājagāma

तब शिशुपाल के मारे जाने की बात सुनकर दंतवक्त्र कृष्ण से युद्ध करने मथुरा आया।

श्लोक 20 (padma.6.252.20)

कृष्णस्तु तच्छ्रुत्वा रथमारुह्य तेन योद्धुं मथुरामाययौ ।

kṛṣṇastu tacchrutvā rathamāruhya tena yoddhuṁ mathurāmāyayau

कृष्ण भी यह सुनकर रथ पर सवार होकर उससे युद्ध करने मथुरा गए।

श्लोक 21 (padma.6.252.21)

दंतवक्त्रवासुदेवयोरहोरात्रं मथुरापुरद्वारि यमुनातीरे संग्रामः समवर्त्तत कृष्णस्तु गदया तं जघान ।

daṁtavaktravāsudevayorahorātraṁ mathurāpuradvāri yamunātīre saṁgrāmaḥ samavarttata kṛṣṇastu gadayā taṁ jaghāna

दंतवक्त्र और वासुदेव के बीच मथुरा के नगर-द्वार पर, यमुना के तट पर रात-दिन युद्ध हुआ; कृष्ण ने उसे गदा से मार डाला।

श्लोक 22 (padma.6.252.22)

स तु चूर्णितसर्वांगो वज्रनिर्भिन्न महीधर इव गतासुरवनितले पपात ।

sa tu cūrṇitasarvāṁgo vajranirbhinna mahīdhara iva gatāsuravanitale papāta

वह पूरी तरह चूर-चूर होकर, वज्र से विदीर्ण पर्वत की भाँति, प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 23 (padma.6.252.23)

सोऽपि हरेः सायुज्यं योगिगम्यं नित्यानंदसुखं शाश्वतं परमं पदमवाप ।

so'pi hareḥ sāyujyaṁ yogigamyaṁ nityānaṁdasukhaṁ śāśvataṁ paramaṁ padamavāpa

वह भी हरि का सारूप्य, योगिगम्य, नित्यानंदमय, शाश्वत परम पद प्राप्त कर गया।

श्लोक 24 (padma.6.252.24)

इत्थं जयविजयौ सनकादिशापव्याजेन केवलं भगवतोलीलार्थं संसृताववतीर्य जन्मत्रयेऽपि तेनैव निहतौ जन्मत्रयावसाने मुक्तिमवाप्तौ ।

itthaṁ jayavijayau sanakādiśāpavyājena kevalaṁ bhagavatolīlārthaṁ saṁsṛtāvavatīrya janmatraye'pi tenaiva nihatau janmatrayāvasāne muktimavāptau

इस प्रकार जय-विजय, सनकादि के शाप के बहाने से, केवल भगवान् की लीला के लिए संसार में अवतरित होकर, तीनों जन्मों में भी उन्हीं द्वारा मारे जाकर, तीनों जन्मों के अंत में मुक्ति को प्राप्त हुए।

श्लोक 25 (padma.6.252.25)

कृष्णोऽपि तं हत्वा यमुनामुत्तीर्य नंदव्रजं गत्वा प्राक्तनौ पितरावभिवाद्य आश्वास्य ताभ्यां साश्रुकंठमालिगितः सकलगोपवृद्धान्प्रणम्याश्वास्य रत्नाभरणादिभिस्तत्रस्थान्संतर्पयामास ।

kṛṣṇo'pi taṁ hatvā yamunāmuttīrya naṁdavrajaṁ gatvā prāktanau pitarāvabhivādya āśvāsya tābhyāṁ sāśrukaṁṭhamāligitaḥ sakalagopavṛddhānpraṇamyāśvāsya ratnābharaṇādibhistatrasthānsaṁtarpayāmāsa

कृष्ण भी उसे मारकर यमुना पार करके नंद-व्रज जाकर, अपने पूर्व माता-पिता को प्रणाम कर सांत्वना दी, उन दोनों के अश्रुपूर्ण आलिंगन को प्राप्त हुए, सब वृद्ध गोपों को प्रणाम-सांत्वना देकर, वहाँ उपस्थित सबको रत्न-आभूषण आदि से संतुष्ट किया।

श्लोक 26 (padma.6.252.26)

कालिंद्याः पुलिने रम्ये पुण्यवृक्षसमावृते । गोपनारीभिरनिशं क्रीडयामास केशवः ।

kāliṁdyāḥ puline ramye puṇyavṛkṣasamāvṛte gopanārībhiraniśaṁ krīḍayāmāsa keśavaḥ

यमुना के रमणीय, पवित्र वृक्षों से घिरे तट पर केशव गोपियों के साथ निरंतर क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 27 (padma.6.252.27)

रम्यकेलिसुखेनैव गोपवेषधरो हरिः । बद्धप्रेमरसेनात्र मासद्वयमुवास ह ।

ramyakelisukhenaiva gopaveṣadharo hariḥ baddhapremarasenātra māsadvayamuvāsa ha

गोप-वेष धारण किए हरि रमणीय क्रीड़ा-सुख से, प्रेमरस में बँधकर वहाँ दो मास तक रहे।

श्लोक 28 (padma.6.252.28)

अथ तत्रस्था नंदगोपादयः सर्वेजनाः पुत्रदारसहिताः पशुपक्षिमृगादयश्च वासुदेवप्रसादेन दिव्यरूपधरा विमानमारूढाः परमं वैकुंठलोकमवापुः ।

atha tatrasthā naṁdagopādayaḥ sarvejanāḥ putradārasahitāḥ paśupakṣimṛgādayaśca vāsudevaprasādena divyarūpadharā vimānamārūḍhāḥ paramaṁ vaikuṁṭhalokamavāpuḥ

तब वहाँ के नंदगोप आदि सब लोग, पुत्र-पत्नियों सहित, तथा पशु-पक्षी-मृग आदि भी वासुदेव की कृपा से दिव्य रूप धारण करके विमान पर चढ़कर परम वैकुंठलोक को प्राप्त हुए।

श्लोक 29 (padma.6.252.29)

कृष्णस्तु नंदगोपव्रजौकसां सर्वेषां परमं निरामयं स्वपदं दत्वा दिवि देवगणैः संस्तूयमानो द्वारवतीं श्रीमतीं विवेश ।

kṛṣṇastu naṁdagopavrajaukasāṁ sarveṣāṁ paramaṁ nirāmayaṁ svapadaṁ datvā divi devagaṇaiḥ saṁstūyamāno dvāravatīṁ śrīmatīṁ viveśa

कृष्ण ने नंद-व्रजवासी सबको अपना परम, निर्दोष पद देकर, स्वर्ग में देवगणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, श्रीमती द्वारवती में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 30 (padma.6.252.30)

तत्र वसुदेवोग्रसेनसंकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धाक्रूरादिभिः प्रत्यहं संपूजित षोडशसहस्रभार्याभिरष्टाभिर्दिव्यमहिषीभिश्च विश्वरूपधरो दिव्यरत्नमय नानागृहांतरेषु सुतकुसुमांचित श्लक्ष्णतरपर्यंकेषु रमयामास ।

tatra vasudevograsenasaṁkarṣaṇapradyumnāniruddhākrūrādibhiḥ pratyahaṁ saṁpūjita ṣoḍaśasahasrabhāryābhiraṣṭābhirdivyamahiṣībhiśca viśvarūpadharo divyaratnamaya nānāgṛhāṁtareṣu sutakusumāṁcita ślakṣṇataraparyaṁkeṣu ramayāmāsa

वहाँ वसुदेव, उग्रसेन, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, अक्रूर आदि द्वारा प्रतिदिन पूजित होकर, विश्वरूपधारी वे सोलह हज़ार पत्नियों और आठ दिव्य महारानियों के साथ, दिव्य रत्नजड़ित नाना भवनों में, पुष्पों से सुसज्जित मुलायम शय्याओं पर आनंद करते रहे।

श्लोक 31 (padma.6.252.31)

अथ रामकृष्णसतीर्थ्यो विप्रो बालसखा सदात्यंतदारिद्र्यपीडितो मुष्टिमात्रान्याचनाप्तपृथुकाञ्जीर्णवाससि निबध्य वासुदेवं द्रष्टुं श्रीमतीं द्वारकानगरीमाजगाम ।

atha rāmakṛṣṇasatīrthyo vipro bālasakhā sadātyaṁtadāridryapīḍito muṣṭimātrānyācanāptapṛthukāñjīrṇavāsasi nibadhya vāsudevaṁ draṣṭuṁ śrīmatīṁ dvārakānagarīmājagāma

तब राम-कृष्ण का सहपाठी, बाल्यसखा एक विप्र, सदा अत्यंत दरिद्रता से पीड़ित, भीख से पाए मुट्ठीभर चिवड़े को अपने फटे वस्त्र के कोने में बाँधकर, वासुदेव को देखने श्रीमती द्वारका नगरी में आया।

श्लोक 32 (padma.6.252.32)

स तु रुक्मिण्यंतःपुरद्वारि क्षणं तूष्णीं तस्थौ ।

sa tu rukmiṇyaṁtaḥpuradvāri kṣaṇaṁ tūṣṇīṁ tasthau

वह रुक्मिणी के अंतःपुर-द्वार पर क्षणभर मौन खड़ा रहा।

श्लोक 33 (padma.6.252.33)

कृष्णोऽपि समागतं ब्राह्मणं ज्ञात्वा प्रद्युम्नेन नमस्कृत्वा वामकरं गृहीत्वा गृहांतरे स्वासने निवेश्य भयाद्वेपमानं तं रुक्मिणीहस्तगतसुवर्णकलशजलेन पादौ प्रक्षाल्य मधुपर्केण पूजयामास ।

kṛṣṇo'pi samāgataṁ brāhmaṇaṁ jñātvā pradyumnena namaskṛtvā vāmakaraṁ gṛhītvā gṛhāṁtare svāsane niveśya bhayādvepamānaṁ taṁ rukmiṇīhastagatasuvarṇakalaśajalena pādau prakṣālya madhuparkeṇa pūjayāmāsa

कृष्ण ने भी उस ब्राह्मण के आगमन को जानकर, प्रद्युम्न द्वारा प्रणाम कराकर, उसका बायाँ हाथ पकड़कर, घर में अपने ही आसन पर बिठाकर, भय से काँपते उसके पैरों को रुक्मिणी के हाथ के स्वर्ण-कलश के जल से धोकर मधुपर्क-विधि से पूजा की।

श्लोक 34 (padma.6.252.34)

सुधामृतोपमैरन्नपानाद्यैस्तर्पयित्वा तस्य जीर्णवस्त्रांतरे याचनाप्तपृथुकान्स्वयमेव हस्तेन गृहीत्वा प्रहसन्जग्रास ।

sudhāmṛtopamairannapānādyaistarpayitvā tasya jīrṇavastrāṁtare yācanāptapṛthukānsvayameva hastena gṛhītvā prahasanjagrāsa

अमृत-सुधा जैसे अन्न-पान से उसे तृप्त करके, उसके फटे वस्त्र के कोने में बंधे भीख के चिवड़े को स्वयं ही अपने हाथ से लेकर हँसते हुए खा लिया।

श्लोक 35 (padma.6.252.35)

कृष्णेन पृथुके भक्षिते तस्मिन्नेव क्षणे तस्य बहुधनधान्यवस्त्राभरणसंभूतं महदैश्वर्यमभूत् ।

kṛṣṇena pṛthuke bhakṣite tasminneva kṣaṇe tasya bahudhanadhānyavastrābharaṇasaṁbhūtaṁ mahadaiśvaryamabhūt

कृष्ण द्वारा वह चिवड़ा खाए जाने पर उसी क्षण उसके घर में बहुत धन-धान्य-वस्त्र-आभूषणों से युक्त महान ऐश्वर्य उत्पन्न हो गया।

श्लोक 36 (padma.6.252.36)

स तु कृष्णेन विसृष्टो मम किंचिद्वस्त्रं वा धनं वा कृष्णेन न दत्तमिति मन्यमानः स्वपुरं विवेश ।

sa tu kṛṣṇena visṛṣṭo mama kiṁcidvastraṁ vā dhanaṁ vā kṛṣṇena na dattamiti manyamānaḥ svapuraṁ viveśa

वह कृष्ण से विदा लेकर, 'मुझे कृष्ण ने न वस्त्र दिया न धन' — यह सोचते हुए अपने नगर में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 37 (padma.6.252.37)

अथ बहुधनधान्ययुतं स्वगृहं दृष्ट्वा तत्प्रसादादिदं लब्धमिति वदन्प्रहृष्टेनांतरात्मना दिव्य वस्त्राभरणादिना भार्यया सह सर्वान्कामान्भुक्त्वा हरिसंतुष्ट्यै बहुयज्ञानिष्ट्वा तत्प्रसादेन परमं नित्यं स्वर्गसुखमवाप ।

atha bahudhanadhānyayutaṁ svagṛhaṁ dṛṣṭvā tatprasādādidaṁ labdhamiti vadanprahṛṣṭenāṁtarātmanā divya vastrābharaṇādinā bhāryayā saha sarvānkāmānbhuktvā harisaṁtuṣṭyai bahuyajñāniṣṭvā tatprasādena paramaṁ nityaṁ svargasukhamavāpa

फिर अपने घर को बहुत धन-धान्य से भरा देखकर, 'यह उन्हीं की कृपा से मिला है' कहते हुए, प्रसन्नचित्त होकर, दिव्य वस्त्र-आभूषणों सहित पत्नी के साथ सब कामनाएँ भोगकर, हरि की प्रसन्नता के लिए अनेक यज्ञ करके, उनकी कृपा से परम, नित्य स्वर्ग-सुख को प्राप्त किया।

श्लोक 38 (padma.6.252.38)

अथ धृतराष्ट्रतनयो दुर्योधनः पांडुतनयान्कपटद्यूतव्याजेन राज्यमपहृत्य स्वराष्ट्राद्विवासयामास ।

atha dhṛtarāṣṭratanayo duryodhanaḥ pāṁḍutanayānkapaṭadyūtavyājena rājyamapahṛtya svarāṣṭrādvivāsayāmāsa

तब धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन ने कपटपूर्ण द्यूत के बहाने पांडु-पुत्रों से राज्य छीनकर उन्हें अपने राज्य से निर्वासित कर दिया।

श्लोक 39 (padma.6.252.39)

ते तु युधिष्ठिरभीमार्जुननकुलसहदेवाः सुपत्न्या द्रौ पद्या सह महारण्यं गत्वा तत्र द्वादशाब्दान्स्थित्वा संवत्सरपर्यंतमज्ञाताः सर्वे मत्स्यदेशाधिपतेर्विराटस्य निवेशने स्थित्वा वासुदेवेन सहायेन धार्तराष्ट्रान्योद्धुमाजग्मुः ।

te tu yudhiṣṭhirabhīmārjunanakulasahadevāḥ supatnyā drau padyā saha mahāraṇyaṁ gatvā tatra dvādaśābdānsthitvā saṁvatsaraparyaṁtamajñātāḥ sarve matsyadeśādhipatervirāṭasya niveśane sthitvā vāsudevena sahāyena dhārtarāṣṭrānyoddhumājagmuḥ

युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव अपनी सुपत्नी द्रौपदी सहित महावन में जाकर, वहाँ बारह वर्ष रहकर, फिर एक वर्ष अज्ञातवास में, मत्स्य देश के राजा विराट के घर रहकर, वासुदेव को सहायक बनाकर धार्तराष्ट्रों से युद्ध करने आए।

श्लोक 40 (padma.6.252.40)

तेषां धार्तराष्ट्रपांडुपुत्राणां नानादेशाधिपनृपैः कुरुक्षेत्रमहापुण्ये देवानामपि भयंकरो महासंग्रामोऽभवत् ।

teṣāṁ dhārtarāṣṭrapāṁḍuputrāṇāṁ nānādeśādhipanṛpaiḥ kurukṣetramahāpuṇye devānāmapi bhayaṁkaro mahāsaṁgrāmo'bhavat

उन धार्तराष्ट्रों और पांडु-पुत्रों तथा नाना देशों के राजाओं के बीच अत्यंत पुण्यमय कुरुक्षेत्र में देवताओं को भी भयभीत करने वाला महासंग्राम हुआ।

श्लोक 41 (padma.6.252.41)

अथ श्रीकृष्णोऽप्यर्जुनसारथ्यं कुर्वन्नर्जुने स्वशक्तिमावेश्य तेन दुर्योधनभीष्मद्रो- णप्रमुखान्सर्वान्पार्थिवानेकादशाक्षौहिणीबलसहितान्कुरुक्षेत्रे हत्वा पांडवान्राज्ये स्थापयित्वा निःशेषेण सर्वभूभारमपास्य स्वां पुरीं प्रविवेश ।

atha śrīkṛṣṇo'pyarjunasārathyaṁ kurvannarjune svaśaktimāveśya tena duryodhanabhīṣmadro- ṇapramukhānsarvānpārthivānekādaśākṣauhiṇībalasahitānkurukṣetre hatvā pāṁḍavānrājye sthāpayitvā niḥśeṣeṇa sarvabhūbhāramapāsya svāṁ purīṁ praviveśa

श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन का सारथ्य करते हुए, अर्जुन में अपनी शक्ति डालकर, उसके द्वारा दुर्योधन-भीष्म-द्रोण आदि सब राजाओं को, ग्यारह अक्षौहिणी सेना सहित, कुरुक्षेत्र में मरवाकर, पांडवों को राज्य में स्थापित करके, संपूर्ण पृथ्वी-भार उतारकर अपनी नगरी में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 42 (padma.6.252.42)

कस्यचित्त्वथकालस्य कतिपयाहनि वैदिको ब्राह्मणो मृतं पंचवार्षिकं बालमादाय राजद्वारि निधाय बहुशो विलपन्बहून्याक्रोशवाक्यानि कृष्णं जगाद ।

kasyacittvathakālasya katipayāhani vaidiko brāhmaṇo mṛtaṁ paṁcavārṣikaṁ bālamādāya rājadvāri nidhāya bahuśo vilapanbahūnyākrośavākyāni kṛṣṇaṁ jagāda

कुछ काल पश्चात्, किसी दिन एक वैदिक ब्राह्मण अपने मृत पाँच वर्षीय बालक को लेकर राजद्वार पर रखकर, बहुत विलाप करते हुए कृष्ण को अनेक निंदा-वचन कहने लगा।

श्लोक 43 (padma.6.252.43)

कृष्णस्तमाक्रोशं श्रुत्वा तूष्णीमुवास ।

kṛṣṇastamākrośaṁ śrutvā tūṣṇīmuvāsa

कृष्ण उस निंदा को सुनकर मौन रहे।

श्लोक 44 (padma.6.252.44)

स तु मम पंचपुत्राः पूर्वं हता अयं तु षष्ठः एनं कृष्णो न जीवयिष्यति तर्हि राजद्वारि मरिष्यामीत्युवाच ।

sa tu mama paṁcaputrāḥ pūrvaṁ hatā ayaṁ tu ṣaṣṭhaḥ enaṁ kṛṣṇo na jīvayiṣyati tarhi rājadvāri mariṣyāmītyuvāca

उसने कहा — 'मेरे पाँच पुत्र पहले मारे गए, यह छठा है। यदि कृष्ण इसे जीवित नहीं करेंगे, तो मैं राजद्वार पर ही मर जाऊँगा।'

श्लोक 45 (padma.6.252.45)

तस्मिन्काले अर्जुनः कृष्णं द्रष्टुमागतस्तथाविधं तं पुत्रशोकेन विलपंतं ददर्श ।

tasminkāle arjunaḥ kṛṣṇaṁ draṣṭumāgatastathāvidhaṁ taṁ putraśokena vilapaṁtaṁ dadarśa

उसी समय अर्जुन कृष्ण को देखने आए और उन्हें पुत्र-शोक में इस प्रकार विलाप करते देखा।

श्लोक 46 (padma.6.252.46)

अर्जुनोऽपि कालधर्ममुपागतं पंचवार्षिकं बालकं दृष्ट्वा कृपयाविष्टस्तव पुत्रमहंजीवयिष्यामीति ब्राह्मणायाभयं दत्वा प्रतिश्रुतवान् ।

arjuno'pi kāladharmamupāgataṁ paṁcavārṣikaṁ bālakaṁ dṛṣṭvā kṛpayāviṣṭastava putramahaṁjīvayiṣyāmīti brāhmaṇāyābhayaṁ datvā pratiśrutavān

अर्जुन भी उस असमय मृत पाँच वर्षीय बालक को देखकर करुणा से भरकर, 'मैं तुम्हारे पुत्र को जीवित करूँगा' कहकर ब्राह्मण को अभय देकर वचन दिया।

श्लोक 47 (padma.6.252.47)

ब्राह्मणस्तु तेनाश्वासितो हृष्टवान् ।

brāhmaṇastu tenāśvāsito hṛṣṭavān

उससे आश्वस्त होकर ब्राह्मण प्रसन्न हो गया।

श्लोक 48 (padma.6.252.48)

अथैतं ब्राह्मणशिशुं बहुभिः संजीविनास्त्रैरभिमंत्र्य अलब्धजीवितं दृष्ट्वा वृथा प्रतिज्ञामवाप्य बहुशोकसमन्वितस्तेनैव प्राणांस्त्यक्तुमैच्छत् ।

athaitaṁ brāhmaṇaśiśuṁ bahubhiḥ saṁjīvināstrairabhimaṁtrya alabdhajīvitaṁ dṛṣṭvā vṛthā pratijñāmavāpya bahuśokasamanvitastenaiva prāṇāṁstyaktumaicchat

फिर उस ब्राह्मण-शिशु पर अनेक संजीवनी अस्त्रों का मंत्रोच्चार करके, जीवन न मिलता देख, अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ जानकर, अत्यंत शोक से भरकर, उसी कारण अपने प्राण त्यागने की इच्छा करने लगे।

श्लोक 49 (padma.6.252.49)

कृष्णस्तु तत्सर्वं ज्ञात्वांतःपुराद्विनिष्क्रम्य तं वैदिकं प्राह तवपुत्रान्सर्वानहं दास्यामीत्युक्त्वाश्वास्य वैनतेयमारुह्यार्जुनसहितो वैष्णवं लोकमाजगाम ।

kṛṣṇastu tatsarvaṁ jñātvāṁtaḥpurādviniṣkramya taṁ vaidikaṁ prāha tavaputrānsarvānahaṁ dāsyāmītyuktvāśvāsya vainateyamāruhyārjunasahito vaiṣṇavaṁ lokamājagāma

कृष्ण यह सब जानकर अंतःपुर से बाहर निकलकर उस वैदिक ब्राह्मण से बोले — 'मैं तुम्हारे सब पुत्र लौटा दूँगा' — ऐसा कहकर सांत्वना देकर, गरुड़ पर सवार होकर अर्जुन सहित वैष्णव लोक को चल पड़े।

श्लोक 50 (padma.6.252.50)

तत्र दिव्यमणिमंडपोद्देशे देव्या सह समासीनं नारायणं दृष्ट्वा कृष्णार्जुनौ नमश्चक्रतुः । स तौ बाहुभ्यां परिष्वज्य किमर्थमागतावित्युवाच ।

tatra divyamaṇimaṁḍapoddeśe devyā saha samāsīnaṁ nārāyaṇaṁ dṛṣṭvā kṛṣṇārjunau namaścakratuḥ sa tau bāhubhyāṁ pariṣvajya kimarthamāgatāvityuvāca

वहाँ एक दिव्य रत्नमंडप में देवी सहित विराजमान नारायण को देखकर कृष्ण-अर्जुन ने नमस्कार किया। उन्होंने दोनों को बाहों से आलिंगन करके पूछा — 'किस उद्देश्य से आए हो?'

श्लोक 51 (padma.6.252.51)

कृष्णश्च भगवन्वैदिकस्य तनयान्मम देहीत्युवाच ।

kṛṣṇaśca bhagavanvaidikasya tanayānmama dehītyuvāca

कृष्ण ने कहा — 'हे भगवन्, उस वैदिक ब्राह्मण के पुत्र मुझे दीजिए।'

श्लोक 52 (padma.6.252.52)

स तु नारायणस्तादृग्वयसि संस्थितान्ब्राह्मणपुत्रान्कृष्णाय संददौ ।

sa tu nārāyaṇastādṛgvayasi saṁsthitānbrāhmaṇaputrānkṛṣṇāya saṁdadau

तब नारायण ने उसी आयु में स्थित उन ब्राह्मण-पुत्रों को कृष्ण को दे दिया।

श्लोक 53 (padma.6.252.53)

श्रीकृष्णोऽपि तान्वैनतेयस्कंधे समारोप्य हर्षसमन्वितोऽर्जुनसहितः स्वयमप्यारुह्य दिवि देवगणैः संस्तूयमानो द्वारवतीमाविवेश ।

śrīkṛṣṇo'pi tānvainateyaskaṁdhe samāropya harṣasamanvito'rjunasahitaḥ svayamapyāruhya divi devagaṇaiḥ saṁstūyamāno dvāravatīmāviveśa

श्रीकृष्ण भी उन्हें गरुड़ के कंधे पर बिठाकर, हर्षपूर्वक अर्जुन सहित स्वयं भी सवार होकर, स्वर्ग में देवगणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए द्वारवती में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 54 (padma.6.252.54)

तस्मै ब्राह्मणाय पंचवर्षवयःस्थान्षट्पुत्रान्ददौ सोऽप्यत्यंतर्हषसमन्वितः कृष्णं वर्द्धयस्वेत्याशिषं प्रायच्छत् ।

tasmai brāhmaṇāya paṁcavarṣavayaḥsthānṣaṭputrāndadau so'pyatyaṁtarhaṣasamanvitaḥ kṛṣṇaṁ varddhayasvetyāśiṣaṁ prāyacchat

उन्होंने उस ब्राह्मण को पाँच वर्ष की आयु वाले छहों पुत्र दे दिए। वह भी अत्यंत हर्षित होकर 'कृष्ण, तुम्हारा उत्कर्ष हो' यह आशीर्वाद देने लगा।

श्लोक 55 (padma.6.252.55)

अर्जुनस्तु सफलां प्रतिज्ञामवाप्य कृष्णं नमस्कृत्य युधिष्ठिरपालितां स्वां पुरीमाजगाम ।

arjunastu saphalāṁ pratijñāmavāpya kṛṣṇaṁ namaskṛtya yudhiṣṭhirapālitāṁ svāṁ purīmājagāma

अर्जुन भी अपनी प्रतिज्ञा सफल होते देख, कृष्ण को नमस्कार करके युधिष्ठिर द्वारा पालित अपनी नगरी को चला गया।

श्लोक 56 (padma.6.252.56)

कृष्णस्य षोडशसहस्रभार्यास्वयुतसाहस्रपुत्रा जज्ञिरे तेषां पुत्रपौत्रसंख्यां वक्तुं न शक्यते ।

kṛṣṇasya ṣoḍaśasahasrabhāryāsvayutasāhasraputrā jajñire teṣāṁ putrapautrasaṁkhyāṁ vaktuṁ na śakyate

कृष्ण की सोलह हज़ार पत्नियों से अनगिनत पुत्र उत्पन्न हुए, उनके पुत्र-पौत्रों की गिनती करना संभव नहीं है।

श्लोक 57 (padma.6.252.57)

अत्रापि श्लोकः । अष्टौशतानि पुत्राणां सहस्राण्ययुतं तथा । प्रद्युम्नः प्रथमस्तेषां सर्वेषां रुक्मिणीसुतः ।

atrāpi ślokaḥ aṣṭauśatāni putrāṇāṁ sahasrāṇyayutaṁ tathā pradyumnaḥ prathamasteṣāṁ sarveṣāṁ rukmiṇīsutaḥ

यहाँ भी एक श्लोक है — पुत्रों की संख्या आठ सौ [हज़ार] और दस हज़ार थी; उन सबमें प्रथम रुक्मिणी-पुत्र प्रद्युम्न थे।

श्लोक 58 (padma.6.252.58)

असंख्यैस्तैर्यादवैरियं पृथिवी संवृताऽभवत् ।

asaṁkhyaistairyādavairiyaṁ pṛthivī saṁvṛtā'bhavat

उन असंख्य यादवों से यह पृथ्वी भर गई।

श्लोक 59 (padma.6.252.59)

पुनरप्यवनीभारशंकया कृष्णस्तु तानृषिशापव्याजेन संहर्तुमैच्छत् ।

punarapyavanībhāraśaṁkayā kṛṣṇastu tānṛṣiśāpavyājena saṁhartumaicchat

फिर से पृथ्वी के भार की आशंका से कृष्ण ने ऋषि-शाप के बहाने उन्हें संहार करने की इच्छा की।

श्लोक 60 (padma.6.252.60)

कदाचित्सर्वे कुमारा नर्मदायां विहर्तुमाजग्मुः ।

kadācitsarve kumārā narmadāyāṁ vihartumājagmuḥ

एक बार सब राजकुमार नर्मदा नदी में क्रीड़ा करने गए।

श्लोक 61 (padma.6.252.61)

तत्र तपंतं कण्वं महर्षिं दृष्ट्वा जांबवत्याः । पुत्रं योषिद्वेषं कृत्वा तस्योदरे कात्वायसं मुसलं बद्ध्वा ऋषेः । समीपमागत्य सर्वे नमस्कृत्वा पत्नीरूपं सांबं कुमारं तस्य पुरतो निधाय । अस्या गर्भे स्त्री वा पुरुषो वा भविष्तीति ब्रूहीत्यूचुः ।

tatra tapaṁtaṁ kaṇvaṁ maharṣiṁ dṛṣṭvā jāṁbavatyāḥ putraṁ yoṣidveṣaṁ kṛtvā tasyodare kātvāyasaṁ musalaṁ baddhvā ṛṣeḥ samīpamāgatya sarve namaskṛtvā patnīrūpaṁ sāṁbaṁ kumāraṁ tasya purato nidhāya asyā garbhe strī vā puruṣo vā bhaviṣtīti brūhītyūcuḥ

वहाँ तपस्या करते महर्षि कण्व को देखकर, जाम्बवती के पुत्र सांब को स्त्री-वेष धारण करवाकर, उसके पेट में लोहे का मूसल बाँधकर, ऋषि के पास जाकर सब प्रणाम करके, उस पत्नी-रूप सांब कुमार को उनके सामने रखकर पूछा — 'इसके गर्भ में स्त्री होगी या पुरुष, बताइए।'

श्लोक 62 (padma.6.252.62)

स तु मनसा तद्विज्ञाय तानमर्षमाणः सर्वाननेन मुसलेन यूयं सर्वे निहता भवतेत्युवाच ।

sa tu manasā tadvijñāya tānamarṣamāṇaḥ sarvānanena musalena yūyaṁ sarve nihatā bhavatetyuvāca

वे मन से यह छल जानकर, क्रोधित होकर सबसे बोले — 'तुम सब इसी मूसल से मारे जाओगे।'

श्लोक 63 (padma.6.252.63)

सर्वे समुद्विग्नमनसः कृष्णं समेत्य महर्षिणोक्तं तत्कर्म निवेदयामासुः ।

sarve samudvignamanasaḥ kṛṣṇaṁ sametya maharṣiṇoktaṁ tatkarma nivedayāmāsuḥ

सब चिंतित मन से कृष्ण के पास जाकर महर्षि का कहा वह वृत्तांत सुनाने लगे।

श्लोक 64 (padma.6.252.64)

कृष्णोऽपि तदायसं मुसलं चूर्णीभूतं ह्रदे निपातयामास ।

kṛṣṇo'pi tadāyasaṁ musalaṁ cūrṇībhūtaṁ hrade nipātayāmāsa

कृष्ण ने उस लोहे के मूसल को चूर-चूर कराकर एक सरोवर में डलवा दिया।

श्लोक 65 (padma.6.252.65)

तदयश्चूर्णीभूतबीजसमुद्भूता वज्रसन्निभा महाकाशाः संबभूवुः ।

tadayaścūrṇībhūtabījasamudbhūtā vajrasannibhā mahākāśāḥ saṁbabhūvuḥ

उस चूर्ण किए लोहे के बीज से वज्र जैसे कठोर विशाल नरकुल (सरकंडे) उत्पन्न हो गए।

श्लोक 66 (padma.6.252.66)

तत्र तं मुसलावशिष्टं कनिष्ठांगुलिमात्रं मत्स्यो जग्रास तं मत्स्यं निषादो गृहीत्वा तदुदरस्थं मुशलखण्डमादाय बाणाग्रे फलकमकरोत् ।

tatra taṁ musalāvaśiṣṭaṁ kaniṣṭhāṁgulimātraṁ matsyo jagrāsa taṁ matsyaṁ niṣādo gṛhītvā tadudarasthaṁ muśalakhaṇḍamādāya bāṇāgre phalakamakarot

मूसल का जो शेष अंश छोटी उंगली जितना बचा था, उसे एक मछली निगल गई; उस मछली को एक निषाद (शिकारी) ने पकड़कर, उसके पेट में मिले मूसल के टुकड़े को लेकर बाण के अगले भाग में लगा लिया।

श्लोक 67 (padma.6.252.67)

कदाचित्सर्वे यादवा रामकृष्णप्रद्युम्नादयो मघवता प्रेषितां वारुणीं पीत्वा मत्ता बभूवुः ।

kadācitsarve yādavā rāmakṛṣṇapradyumnādayo maghavatā preṣitāṁ vāruṇīṁ pītvā mattā babhūvuḥ

एक बार सब यादव — राम, कृष्ण, प्रद्युम्न आदि — इंद्र द्वारा भेजी गई मदिरा पीकर मत्त हो गए।

श्लोक 68 (padma.6.252.68)

परस्परं वीरणं नीत्वा बहून्याक्रोशवाक्यानि वदंतो युद्धं चक्रुः क्षयं च गताः ।

parasparaṁ vīraṇaṁ nītvā bahūnyākrośavākyāni vadaṁto yuddhaṁ cakruḥ kṣayaṁ ca gatāḥ

परस्पर वे नरकुल हाथ में लेकर, बहुत निंदा-वचन कहते हुए युद्ध करने लगे, और नष्ट हो गए।

श्लोक 69 (padma.6.252.69)

कृष्णस्तु युद्धश्रांतः कल्पतरुच्छायायां शयनं चकार स निषादो धनुर्बाणं गृहीत्वा खेटकवृत्तिं जगाम ।

kṛṣṇastu yuddhaśrāṁtaḥ kalpatarucchāyāyāṁ śayanaṁ cakāra sa niṣādo dhanurbāṇaṁ gṛhītvā kheṭakavṛttiṁ jagāma

कृष्ण युद्ध से थककर एक कल्पवृक्ष की छाया में लेट गए। वह निषाद धनुष-बाण लेकर शिकार के लिए निकल पड़ा।

श्लोक 70 (padma.6.252.70)

एवं निःशेषं त्यक्तजीविता बभूवुस्ते सर्वे स्वान्स्वांस्त्रिदशान्प्रपेदिरे ।

evaṁ niḥśeṣaṁ tyaktajīvitā babhūvuste sarve svānsvāṁstridaśānprapedire

इस प्रकार वे सब पूर्णतः प्राण त्यागकर अपने-अपने देव-रूप को प्राप्त हुए।

श्लोक 71 (padma.6.252.71)

एवं मुशलेन संहृत्य सर्वं स्वयमेको देवो बहुगुल्मसमाकीर्णमहाद्रुमछायायां सुप्तश्चतुर्विधव्यूहगतं वासुदेवात्मकमात्मानं चिंतयञ्जानूपरिपदं निधायात्मनो मानुषंवपुस्त्यक्तुमनुनिषसाद ।

evaṁ muśalena saṁhṛtya sarvaṁ svayameko devo bahugulmasamākīrṇamahādrumachāyāyāṁ suptaścaturvidhavyūhagataṁ vāsudevātmakamātmānaṁ ciṁtayañjānūparipadaṁ nidhāyātmano mānuṣaṁvapustyaktumanuniṣasāda

इस प्रकार मूसल से सबका संहार करके, स्वयं अकेले वह देव, घनी झाड़ियों से भरे एक महावृक्ष की छाया में सोए हुए, अपने को चतुर्व्यूह वासुदेव-स्वरूप मानते हुए, एक पैर घुटने पर रखकर, अपना मानव-शरीर त्यागने के लिए बैठ गए।

श्लोक 72 (padma.6.252.72)

एतस्मिनन्तरे मृगयाजीविको हरेः स तदा कालप्रभावेन चक्रवज्रध्वजांकुशादिचिह्नितमतिरक्ततमं हरेः पादकमलं दृष्ट्वा विव्याध ।

etasminantare mṛgayājīviko hareḥ sa tadā kālaprabhāvena cakravajradhvajāṁkuśādicihnitamatiraktatamaṁ hareḥ pādakamalaṁ dṛṣṭvā vivyādha

इसी बीच वह शिकार पर निर्भर निषाद, काल के प्रभाव से, चक्र-वज्र-ध्वज-अंकुश आदि चिह्नों से युक्त, अत्यंत लाल हरि के चरण-कमल को देखकर उसे बींध दिया।

श्लोक 73 (padma.6.252.73)

तदनंतरं श्रीकृष्णं ज्ञात्वा सुमहाभयार्तः प्रवेपमानः कृतांजलिपुटो महदपराधः सकलोपह्रियतामिति तं प्रणनाम ।

tadanaṁtaraṁ śrīkṛṣṇaṁ jñātvā sumahābhayārtaḥ pravepamānaḥ kṛtāṁjalipuṭo mahadaparādhaḥ sakalopahriyatāmiti taṁ praṇanāma

इसके बाद श्रीकृष्ण को पहचानकर, अत्यंत भयभीत, काँपते हुए, हाथ जोड़कर, 'महान अपराध हुआ, सब क्षमा किया जाए' कहते हुए उसने उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 74 (padma.6.252.74)

श्रीकृष्णस्तथाभूतं दृष्ट्वा सुधामयकराभ्यां तमुत्थाप्य भवतानापराद्धं कृतमिति वदन्महाभयपीडितमाश्वासयन्नुवाच ।

śrīkṛṣṇastathābhūtaṁ dṛṣṭvā sudhāmayakarābhyāṁ tamutthāpya bhavatānāparāddhaṁ kṛtamiti vadanmahābhayapīḍitamāśvāsayannuvāca

श्रीकृष्ण ने उसे इस दशा में देखकर, अमृत जैसे अपने हाथों से उठाकर, 'तुमसे कोई अपराध नहीं हुआ' कहते हुए, अत्यंत भयभीत उसे सांत्वना देते हुए कहा।

श्लोक 75 (padma.6.252.75)

ततो योगिगम्यमपुनरावृत्तिशाश्वतं सर्वोपनिषदमयं वैष्णवं लोकं प्रददौ ।

tato yogigamyamapunarāvṛttiśāśvataṁ sarvopaniṣadamayaṁ vaiṣṇavaṁ lokaṁ pradadau

फिर उन्होंने उसे योगिगम्य, पुनरावृत्ति-रहित, शाश्वत, सब उपनिषदों के सारभूत वैष्णव लोक प्रदान किया।

श्लोक 76 (padma.6.252.76)

असौ तस्मिन्नेव मुहूर्ते मानुषं रूपं विहाय पंचोपनिषन्मयं सकलपुत्रदारसहितो दीप्तिमयं वैष्णवं लोकं दिव्यं विमानमास्थाय सहस्रार्कद्युतिसदृशं दिव्याप्सरोगणाकीर्णं हिरण्मयं वासुदेवेत्येकं जगाम ।

asau tasminneva muhūrte mānuṣaṁ rūpaṁ vihāya paṁcopaniṣanmayaṁ sakalaputradārasahito dīptimayaṁ vaiṣṇavaṁ lokaṁ divyaṁ vimānamāsthāya sahasrārkadyutisadṛśaṁ divyāpsarogaṇākīrṇaṁ hiraṇmayaṁ vāsudevetyekaṁ jagāma

वे उसी क्षण मानव-रूप त्यागकर, पाँच उपनिषदों के सारभूत, सब पुत्र-पत्नियों सहित, देदीप्यमान वैष्णव-लोक-रूप दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, हज़ार सूर्यों की कांति के समान, दिव्य अप्सराओं से घिरे, स्वर्णिम, वासुदेव नामक उस एकमात्र [परम धाम] को चले गए।

श्लोक 77 (padma.6.252.77)

तस्मिन्काले दारुको रथमारुह्य विष्णोः समीपं विवेश ।

tasminkāle dāruko rathamāruhya viṣṇoḥ samīpaṁ viveśa

उसी समय दारुक रथ पर सवार होकर विष्णु के समीप पहुँचा।

श्लोक 78 (padma.6.252.78)

कृष्णोऽपि मत्स्वरूपमर्जुनं पूर्वमानयस्वेति प्रेषयामास ।

kṛṣṇo'pi matsvarūpamarjunaṁ pūrvamānayasveti preṣayāmāsa

कृष्ण ने भी उसे भेजा — 'पहले मेरे ही स्वरूप अर्जुन को ले आओ।'

श्लोक 79 (padma.6.252.79)

स तु मनोजवस्यंदनमारुह्यार्जुनसमीपमाजगाम ।

sa tu manojavasyaṁdanamāruhyārjunasamīpamājagāma

वह मन के समान वेगवान रथ पर सवार होकर अर्जुन के पास पहुँचा।

श्लोक 80 (padma.6.252.80)

एतस्मिन्नंतरे देव्यर्जुनस्तदारुह्य परिणीय नमस्कृत्वा किं करोमीति पुटांजलिरुवाच ।

etasminnaṁtare devyarjunastadāruhya pariṇīya namaskṛtvā kiṁ karomīti puṭāṁjaliruvāca

इस बीच, हे देवी, अर्जुन उस रथ पर चढ़कर, परिक्रमा और नमस्कार करके, हाथ जोड़कर बोले — 'मुझे क्या करना है?'

श्लोक 81 (padma.6.252.81)

कृष्णस्तु तमाह पार्थाहं स्वलोकं यास्यामि त्वं तु द्वारवतीं गत्वा तत्रस्था रुक्मिण्याद्यष्टभार्या आनीय मम शरीरे प्रेषय ।

kṛṣṇastu tamāha pārthāhaṁ svalokaṁ yāsyāmi tvaṁ tu dvāravatīṁ gatvā tatrasthā rukmiṇyādyaṣṭabhāryā ānīya mama śarīre preṣaya

कृष्ण ने उससे कहा — 'हे पार्थ, मैं अपने लोक जा रहा हूँ। तुम द्वारवती जाकर वहाँ स्थित रुक्मिणी आदि आठ पत्नियों को लाकर मेरे शरीर के पास भेज दो।'

श्लोक 82 (padma.6.252.82)

स दारुकेण सहितो नगरीमाजगाम ।

sa dārukeṇa sahito nagarīmājagāma

वह दारुक सहित नगरी में पहुँच गया।

श्लोक 83 (padma.6.252.83)

एतस्मिन्नंतरे देवा विमानस्था नभसि संस्थिताः स्वर्लोकं यियान्तं कृष्णं दृष्ट्वा ऋषिभिः सार्द्धं स्तुत्वा पुष्पवर्षाणि ववृषुः ।

etasminnaṁtare devā vimānasthā nabhasi saṁsthitāḥ svarlokaṁ yiyāntaṁ kṛṣṇaṁ dṛṣṭvā ṛṣibhiḥ sārddhaṁ stutvā puṣpavarṣāṇi vavṛṣuḥ

इस बीच आकाश में विमानों पर स्थित देवगण स्वर्गलोक जाते कृष्ण को देखकर, ऋषियों सहित स्तुति करके पुष्पवर्षा करने लगे।

श्लोक 84 (padma.6.252.84)

कृष्णोऽपि मानुषदेहं- संन्यस्यसकलजगत्स्थितिसंहारहेतुभूतं सकलक्षेत्रज्ञमंतर्यामियोगिध्येयमनामयं वासुदेवात्मकं देहं धृत्वा वैनतेयमारुह्य महर्षिभिस्तूयमानो जगाम ।

kṛṣṇo'pi mānuṣadehaṁ- saṁnyasyasakalajagatsthitisaṁhārahetubhūtaṁ sakalakṣetrajñamaṁtaryāmiyogidhyeyamanāmayaṁ vāsudevātmakaṁ dehaṁ dhṛtvā vainateyamāruhya maharṣibhistūyamāno jagāma

कृष्ण भी अपना मानव-देह त्यागकर, समस्त जगत की स्थिति और संहार के कारणभूत, सर्वक्षेत्रज्ञ, अंतर्यामी, योगियों के ध्येय, निर्विकार वासुदेव-स्वरूप देह धारण करके, गरुड़ पर सवार होकर, महर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए चले गए।

श्लोक 85 (padma.6.252.85)

अर्जुनो वसुदेवोग्रसेनाभ्यां रुक्मिण्यादिमहिषीभ्यस्तत्सर्वं कथयामास ।

arjuno vasudevograsenābhyāṁ rukmiṇyādimahiṣībhyastatsarvaṁ kathayāmāsa

अर्जुन ने वसुदेव-उग्रसेन को और रुक्मिणी आदि महारानियों को यह सब बता दिया।

श्लोक 86 (padma.6.252.86)

तच्छ्रुत्वा सर्वे पौरजनाः स्त्रियश्च द्वारवतीमुत्सृज्यांतःपुराद्बहिर्निष्क्रम्य सर्वास्ताः कृष्णवल्लभा वसुदेवोग्रसेनसहिताः शीघ्रमेव हरेः समीपं जग्मुः ।

tacchrutvā sarve paurajanāḥ striyaśca dvāravatīmutsṛjyāṁtaḥpurādbahirniṣkramya sarvāstāḥ kṛṣṇavallabhā vasudevograsenasahitāḥ śīghrameva hareḥ samīpaṁ jagmuḥ

यह सुनकर सब नगरवासी और स्त्रियाँ द्वारवती को त्यागकर, अंतःपुर से बाहर निकलकर, कृष्ण की वे सब प्रिय पत्नियाँ वसुदेव-उग्रसेन सहित शीघ्र ही हरि के समीप चली गईं।

श्लोक 87 (padma.6.252.87)

ते सर्वे वसुदेवोग्रसेनाक्रूराः सर्वे यदुवृद्धा वपुस्त्यक्त्वा सनातनवासुदेवं समाजग्मुः ।

te sarve vasudevograsenākrūrāḥ sarve yaduvṛddhā vapustyaktvā sanātanavāsudevaṁ samājagmuḥ

वसुदेव, उग्रसेन, अक्रूर तथा सब यदुवृद्ध, सब अपना शरीर त्यागकर सनातन वासुदेव में समा गए।

श्लोक 88 (padma.6.252.88)

रेवतीच बलभद्रशरीरं परिष्वज्याग्निं प्रविश्य तस्मिन्देहं प्राप्य दिव्यविमानारूढा भर्तुः स्थानं संकर्षणलोकं दिव्यमवाप ।

revatīca balabhadraśarīraṁ pariṣvajyāgniṁ praviśya tasmindehaṁ prāpya divyavimānārūḍhā bhartuḥ sthānaṁ saṁkarṣaṇalokaṁ divyamavāpa

रेवती ने बलभद्र के शरीर को आलिंगन करके अग्नि में प्रवेश किया, उसमें [दिव्य] शरीर पाकर, दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर अपने पति के धाम, संकर्षणलोक को प्राप्त हुई।

श्लोक 89 (padma.6.252.89)

तथैव प्रद्युम्नेन सह रुक्मपुत्री तथानिरुद्धेनोषापि सर्वाश्च यादवस्त्रियः स्वस्वभर्तुः शरीराणि संपूज्याग्निप्रवेशं चक्रुः ।

tathaiva pradyumnena saha rukmaputrī tathāniruddhenoṣāpi sarvāśca yādavastriyaḥ svasvabhartuḥ śarīrāṇi saṁpūjyāgnipraveśaṁ cakruḥ

इसी प्रकार रुक्म-पुत्री प्रद्युम्न के साथ, उषा अनिरुद्ध के साथ, तथा सब यादव-स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों के शरीरों की पूजा करके अग्नि-प्रवेश कर गईं।

श्लोक 90 (padma.6.252.90)

तेषां सर्वेषामर्जुनऔर्द्ध्वदैहिकं कृतवान् ।

teṣāṁ sarveṣāmarjunaaurddhvadaihikaṁ kṛtavān

अर्जुन ने उन सबका अंत्येष्टि-संस्कार किया।

श्लोक 91 (padma.6.252.91)

तस्मिन्काले दिव्यवाजिसमायुक्तं सुग्रीवाख्यकं सर्वरत्नोपेतं दिव्यं स्यंदनमारुह्य दारुकोप्याजगाम ।

tasminkāle divyavājisamāyuktaṁ sugrīvākhyakaṁ sarvaratnopetaṁ divyaṁ syaṁdanamāruhya dārukopyājagāma

उसी समय दिव्य अश्वों से युक्त, सुग्रीव नामक, सब रत्नों से जड़ित वह दिव्य रथ लेकर दारुक भी चला गया।

श्लोक 92 (padma.6.252.92)

पारिजाततरुर्देवसभासुधर्मात्रिदशेंद्रलोकमयाताम् ।

pārijātatarurdevasabhāsudharmātridaśeṁdralokamayātām

पारिजात वृक्ष, देवसभा 'सुधर्मा' — दोनों इंद्रलोक को लौट गए।

श्लोक 93 (padma.6.252.93)

तस्मिन्समये द्वारवतीपुरी महोदधौ निमग्नाभूत् ।

tasminsamaye dvāravatīpurī mahodadhau nimagnābhūt

उसी समय द्वारवती नगरी महासागर में डूब गई।

श्लोक 94 (padma.6.252.94)

ततः सर्वाः षोडशसहस्रभार्य्या अर्जुनेनसहेंद्रप्रस्थं गच्छंतीर्दस्यवो जगृहुः ।

tataḥ sarvāḥ ṣoḍaśasahasrabhāryyā arjunenasaheṁdraprasthaṁ gacchaṁtīrdasyavo jagṛhuḥ

तब वे सोलह हज़ार पत्नियाँ अर्जुन के साथ इंद्रप्रस्थ जाती हुई, डाकुओं द्वारा पकड़ ली गईं।

श्लोक 95 (padma.6.252.95)

पूर्वं देवगंधर्वयोषितो ह्यष्टावक्रं महामुनिं दृष्ट्वा जहसुस्ततस्तेन शप्ता वेश्या भविष्यथ ततस्ताभि प्रसादितः पूजितश्च तत्प्रसादात्सर्वलोकैश्च नमस्कृतं वासुदेवं भर्तारमवाप्यापि तेनैव दस्युहस्तं गता अभवन् ।

pūrvaṁ devagaṁdharvayoṣito hyaṣṭāvakraṁ mahāmuniṁ dṛṣṭvā jahasustatastena śaptā veśyā bhaviṣyatha tatastābhi prasāditaḥ pūjitaśca tatprasādātsarvalokaiśca namaskṛtaṁ vāsudevaṁ bhartāramavāpyāpi tenaiva dasyuhastaṁ gatā abhavan

पहले देव-गंधर्व-स्त्रियों ने महामुनि अष्टावक्र को देखकर उनका उपहास किया था, तब उनके शाप से 'तुम वेश्याएँ बनोगी' यह हुआ; फिर उन्होंने उन्हें प्रसन्न और पूजित करके, उनकी कृपा से सब लोकों द्वारा नमस्कृत वासुदेव को पति के रूप में पाया, फिर भी उसी शाप के फलस्वरूप वे अंततः डाकुओं के हाथ पड़ गईं।

श्लोक 96 (padma.6.252.96)

अर्जुनोऽपि दस्युभिर्निर्जितः शोकसमाविष्टो मम भुजबलं सवीर्यं कृष्णेनैव सह सर्वमैश्वर्यं निर्यातमिति मत्वा अद्य मम भाग्य क्षय इति वदन्सायं संध्यारविरिव निःशेषविनष्टतेजाः स्वां पुरीं समाजगाम ।

arjuno'pi dasyubhirnirjitaḥ śokasamāviṣṭo mama bhujabalaṁ savīryaṁ kṛṣṇenaiva saha sarvamaiśvaryaṁ niryātamiti matvā adya mama bhāgya kṣaya iti vadansāyaṁ saṁdhyāraviriva niḥśeṣavinaṣṭatejāḥ svāṁ purīṁ samājagāma

अर्जुन भी डाकुओं से पराजित होकर शोक में डूब गए — 'मेरा भुजबल और पराक्रम, सब ऐश्वर्य कृष्ण के साथ ही चला गया' — यह सोचकर, 'आज मेरा भाग्य समाप्त हो गया' कहते हुए, संध्या के सूर्य की भाँति पूरी तरह निस्तेज होकर अपनी नगरी लौट गए।

श्लोक 97 (padma.6.252.97)

एवं हितार्थाय सर्वदेवानां समस्तभूभारविनाशाय यदुवंशेऽवतीर्य सकलराक्षसविनाशं कृत्वा महांतमपि चोर्वीभारं नाशयित्वा नंदव्रजद्वारकामथुरानिवासिनः सर्वान्स्थावरजंगमान्कालभवबंधैर्मोचयित्वा परमैश्वर्गे शाश्वते योगिगम्ये हिरण्मये रम्ये सात्विके संस्थाप्य नित्यं दिव्यमहिष्यादिसंसेव्यमानो वासुदेव उवास ।

evaṁ hitārthāya sarvadevānāṁ samastabhūbhāravināśāya yaduvaṁśe'vatīrya sakalarākṣasavināśaṁ kṛtvā mahāṁtamapi corvībhāraṁ nāśayitvā naṁdavrajadvārakāmathurānivāsinaḥ sarvānsthāvarajaṁgamānkālabhavabaṁdhairmocayitvā paramaiśvarge śāśvate yogigamye hiraṇmaye ramye sātvike saṁsthāpya nityaṁ divyamahiṣyādisaṁsevyamāno vāsudeva uvāsa

इस प्रकार सब देवताओं के हित के लिए, समस्त पृथ्वी-भार के विनाश के लिए यदुवंश में अवतरित होकर, समस्त राक्षसों का विनाश करके, पृथ्वी के महान भार को भी नष्ट करके, नंद-व्रज, द्वारका और मथुरा के सब स्थावर-जंगम निवासियों को काल और संसार के बंधनों से मुक्त कराकर, परम, शाश्वत, योगिगम्य, स्वर्णिम, रमणीय, सात्त्विक स्वर्ग में स्थापित करके, वासुदेव नित्य अपनी दिव्य महारानियों आदि द्वारा सेवित होते हुए [वहीं] निवास करते हैं।

श्लोक 98 (padma.6.252.98)

अत्र श्लोकाः - अन्ये सर्वेऽवताराः स्युः कृष्णस्य चरितं महत् । भूभारकविनाशाय प्रादुर्भूतो रमापतिः ।

atra ślokāḥ anye sarve'vatārāḥ syuḥ kṛṣṇasya caritaṁ mahat bhūbhārakavināśāya prādurbhūto ramāpatiḥ

यहाँ श्लोक हैं — अन्य सब अवतार [आंशिक] हैं; कृष्ण का यह महान चरित्र [पूर्ण है] — रमापति पृथ्वी के भार को नष्ट करने के लिए प्रकट हुए।

श्लोक 99 (padma.6.252.99)

एतत्कृष्णस्य चरितं दुष्टानां नाशहेतवे । श्रीकृष्णः करुणासिंधुर्वैकुंठे मोदते सदा । अत्यद्भुतमिदं देवि कृष्णस्य चरितं शुभम् । संग्रहेण मयैवोक्तं तव सर्वफलप्रदम् ।

etatkṛṣṇasya caritaṁ duṣṭānāṁ nāśahetave śrīkṛṣṇaḥ karuṇāsiṁdhurvaikuṁṭhe modate sadā atyadbhutamidaṁ devi kṛṣṇasya caritaṁ śubham saṁgraheṇa mayaivoktaṁ tava sarvaphalapradam

दुष्टों के विनाश के लिए यह कृष्ण-चरित्र है। श्रीकृष्ण, वह करुणासिंधु, वैकुंठ में सदा आनंदित रहते हैं। हे देवी, यह अत्यंत अद्भुत, शुभ कृष्ण-चरित्र मैंने संक्षेप में ही तुमसे कहा है, जो सब फल देने वाला है।

श्लोक 100 (padma.6.252.100)

वासुदेवस्य चरितं यः पठेद्धरिसन्निधौ । स्मरेद्वा शृणुयाद्भक्त्या स याति परमं पदम् ।

vāsudevasya caritaṁ yaḥ paṭheddharisannidhau smaredvā śṛṇuyādbhaktyā sa yāti paramaṁ padam

जो वासुदेव के इस चरित्र को हरि के समक्ष पढ़ता है, अथवा भक्तिपूर्वक स्मरण या श्रवण करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 101 (padma.6.252.101)

महापातकयुक्तो वा तथोपपातकसंयुतः । बालकृष्णस्य चरितं श्रुत्वा पापैः प्रमुच्यते ।

mahāpātakayukto vā tathopapātakasaṁyutaḥ bālakṛṣṇasya caritaṁ śrutvā pāpaiḥ pramucyate

महापातकी हो या उपपातकी, बालकृष्ण के इस चरित्र को सुनकर वह पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 102 (padma.6.252.102)

द्वारवत्यां समासीनं रुक्मिणीसहितं हरिम् । स्मरन्वै महदैश्वर्यमनेनाप्नोत्यसंशयः ।

dvāravatyāṁ samāsīnaṁ rukmiṇīsahitaṁ harim smaranvai mahadaiśvaryamanenāpnotyasaṁśayaḥ

द्वारवती में रुक्मिणी सहित विराजमान हरि का स्मरण करते हुए मनुष्य निश्चय ही इसके द्वारा महान ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

श्लोक 103 (padma.6.252.103)

संग्रामे संकटे दुर्गे शत्रुभिः परिवेष्टिते । नेतारं सर्वदेवानां ध्यात्वा सुविजयी भवेत् ।

saṁgrāme saṁkaṭe durge śatrubhiḥ pariveṣṭite netāraṁ sarvadevānāṁ dhyātvā suvijayī bhavet

युद्ध में, संकट में, शत्रुओं से घिरे किले में, सब देवताओं के नायक का ध्यान करके मनुष्य पूर्ण विजयी होता है।

श्लोक 104 (padma.6.252.104)

यः स्मरेद्गोपकन्याभिः क्रीडंतं गोव्रजे शुभे । सर्वकामानवाप्नोति सौभाग्यं चैव विंदति ।

yaḥ smaredgopakanyābhiḥ krīḍaṁtaṁ govraje śubhe sarvakāmānavāpnoti saubhāgyaṁ caiva viṁdati

जो शुभ गोकुल में गोपकन्याओं के साथ क्रीड़ा करते हुए उनका स्मरण करता है, वह सब कामनाएँ प्राप्त करता है और सौभाग्य भी पाता है।

श्लोक 105 (padma.6.252.105)

महोपसर्गरोगाद्यैर्युक्तो यस्तु सनातनम् । जेतारं च महारौद्रीं कृत्यां काशीपुरे स्थिताम् ।

mahopasargarogādyairyukto yastu sanātanam jetāraṁ ca mahāraudrīṁ kṛtyāṁ kāśīpure sthitām

बड़ी विपत्तियों और रोगों आदि से पीड़ित जो व्यक्ति उस सनातन प्रभु को, काशीपुरी में स्थित उस महाभयंकर कृत्या के विजेता को [स्मरण करता है] —

श्लोक 106 (padma.6.252.106)

किमत्र बहुनोक्तेन सर्वकालेषु चाप्सु भे । कृष्णाय नम इत्येवं मंत्रमुच्चारयेद्बुधः ।

kimatra bahunoktena sarvakāleṣu cāpsu bhe kṛṣṇāya nama ityevaṁ maṁtramuccārayedbudhaḥ

यहाँ अधिक कहने से क्या — हे देवी, सर्वदा और जल में भी बुद्धिमान को यह मंत्र उच्चारण करना चाहिए — 'कृष्णाय नमः'।

श्लोक 107 (padma.6.252.107)

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमोनमः ।

kṛṣṇāya vāsudevāya haraye paramātmane praṇataḥ kleśanāśāya goviṁdāya namonamaḥ

'कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः' —

श्लोक 108 (padma.6.252.108)

इमं मंत्रं जपन्देवि भक्त्या प्रतिदिनं नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।

imaṁ maṁtraṁ japandevi bhaktyā pratidinaṁ naraḥ sarvapāpavinirmukto viṣṇulokamavāpnuyāt

हे देवी, इस मंत्र का भक्तिपूर्वक प्रतिदिन जप करने वाला मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 109 (padma.6.252.109)

सर्वेषामेव देवानामीश्वरोऽसौ जनार्दनः । रक्षणाय च लोकानामवस्थांतरमेति वै ।

sarveṣāmeva devānāmīśvaro'sau janārdanaḥ rakṣaṇāya ca lokānāmavasthāṁtarameti vai

वे जनार्दन ही सब देवताओं के ईश्वर हैं; लोकों की रक्षा के लिए ही वे भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को धारण करते हैं।

श्लोक 110 (padma.6.252.110)

त्रिपुरं हंतुकामेन मया संपूजितो हरिः । बुद्धरूपधरः श्रीमान्मोहयामास तद्रिपून् ।

tripuraṁ haṁtukāmena mayā saṁpūjito hariḥ buddharūpadharaḥ śrīmānmohayāmāsa tadripūn

त्रिपुर का वध करने की इच्छा से मैंने हरि की पूजा की; बुद्ध-रूपधारी उन श्रीमान ने उन शत्रुओं को मोहित कर दिया।

श्लोक 111 (padma.6.252.111)

मोहितास्तेन शास्त्रेण सर्वधर्मविवर्जिताः । नारायणास्त्रेण मया निहता देवशत्रवः ।

mohitāstena śāstreṇa sarvadharmavivarjitāḥ nārāyaṇāstreṇa mayā nihatā devaśatravaḥ

उस शास्त्र से मोहित होकर, सब धर्मों से रहित होकर, देवताओं के वे शत्रु मेरे द्वारा नारायणास्त्र से मारे गए।

श्लोक 112 (padma.6.252.112)

अवतीर्य कलावंते ब्राह्मणस्य निवेशने । हनिष्यति तथा रौद्रान्म्लेच्छान्सर्वाञ्जनार्दनः ।

avatīrya kalāvaṁte brāhmaṇasya niveśane haniṣyati tathā raudrānmlecchānsarvāñjanārdanaḥ

कलियुग के अंत में एक ब्राह्मण के घर अवतरित होकर जनार्दन उसी प्रकार सब भयंकर म्लेच्छों का संहार करेंगे।

श्लोक 113 (padma.6.252.113)

तैस्तैर्भावैर्मयावस्थाः सर्वाः प्रोक्ता जगत्पतेः । किमन्यच्छ्रोतुकामासि तद्ब्रवीमि शुभानने ।

taistairbhāvairmayāvasthāḥ sarvāḥ proktā jagatpateḥ kimanyacchrotukāmāsi tadbravīmi śubhānane

इन-इन भावों से जगत्पति की सब अवस्थाएँ मैंने तुमसे कह दीं। हे शुभानने, अब और क्या सुनना चाहती हो? कहो, मैं वह भी कहूँगा।

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