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उत्तर खण्ड · अध्याय 33

दशरथ-कृत शनि-स्तोत्र

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (padma.6.33.1)

नारद उवाच ।शनिपीडा कथं याति तन्मे वद सुरोत्तम । त्वन्मुखाच्छ्रूयते यद्वै तेन जंतुः प्रमुच्यते

nārada uvāca śanipīḍā kathaṁ yāti tanme vada surottama tvanmukhācchrūyate yadvai tena jaṁtuḥ pramucyate

नारद ने कहा — शनि की पीड़ा कैसे दूर होती है? हे देवोत्तम! वह मुझे बताइए; आपके मुख से सुनकर ही प्राणी उससे मुक्त होता है।

श्लोक 2 (padma.6.33.2)

महादेव उवाच ।देवर्षे शृणु वृत्तांतं तेन मुच्येत बंधनात् । ग्रहाणां ग्रहराजोऽयं सौरिः सर्वमहेश्वरः

mahādeva uvāca devarṣe śṛṇu vṛttāṁtaṁ tena mucyeta baṁdhanāt grahāṇāṁ graharājo'yaṁ sauriḥ sarvamaheśvaraḥ

महादेव ने कहा — हे देवर्षे! सुनो वह वृत्तांत, जिससे बंधन से मुक्ति मिलती है। यह ग्रहों में ग्रहराज, सौरि, सबका महेश्वर है।

श्लोक 3 (padma.6.33.3)

अयं तु देवो विख्यातः कालरूपी महाग्रहः । जटिलो वज्ररोमा च दानवानां भयंकरः

ayaṁ tu devo vikhyātaḥ kālarūpī mahāgrahaḥ jaṭilo vajraromā ca dānavānāṁ bhayaṁkaraḥ

यह देव विख्यात है, काल के रूप वाला महाग्रह है, जटाधारी और वज्र-रोमा, दानवों के लिए भयंकर।

श्लोक 4 (padma.6.33.4)

तस्याख्यानं च लोकेऽस्मिन्प्रथितं नास्ति वै प्रभो । मया गुप्तं विशेषेण नोक्तं हि कस्यचित्कदा

tasyākhyānaṁ ca loke'sminprathitaṁ nāsti vai prabho mayā guptaṁ viśeṣeṇa noktaṁ hi kasyacitkadā

हे प्रभो! उसकी कथा इस लोक में विख्यात नहीं है; मैंने इसे विशेष रूप से गुप्त रखा है, कभी किसी को नहीं बताई।

श्लोक 5 (padma.6.33.5)

रघुवंशेऽति विख्यातो राजा दशरथः पुरा । चक्रवर्ती महावीरः सप्तद्वीपाधिपोऽभवत्

raghuvaṁśe'ti vikhyāto rājā daśarathaḥ purā cakravartī mahāvīraḥ saptadvīpādhipo'bhavat

रघुवंश में पहले दशरथ नाम के अत्यंत विख्यात राजा थे, चक्रवर्ती महावीर, सातों द्वीपों के अधिपति।

श्लोक 6 (padma.6.33.6)

कृत्तिकांते शनिं ज्ञात्वा दैवज्ञैर्ज्ञापितो हि सः । रोहिणीं भेदयित्वा च शनिर्यास्यति सांप्रतम्

kṛttikāṁte śaniṁ jñātvā daivajñairjñāpito hi saḥ rohiṇīṁ bhedayitvā ca śaniryāsyati sāṁpratam

कृत्तिका के अंत में शनि को जानकर, ज्योतिषियों द्वारा सूचित किया गया कि रोहिणी को भेदकर अब शनि जाएँगे,

श्लोक 7 (padma.6.33.7)

शाकटं भेदमत्युग्रं सुरासुरभयंकरम् । द्वादशाब्दं तु दुर्भिक्षं भविष्यति सुदारुणम्

śākaṭaṁ bhedamatyugraṁ surāsurabhayaṁkaram dvādaśābdaṁ tu durbhikṣaṁ bhaviṣyati sudāruṇam

शाकट-भेद अत्यंत भीषण, देव-असुरों के लिए भयंकर होगा; बारह वर्षों का अत्यंत भयानक अकाल पड़ेगा।

श्लोक 8 (padma.6.33.8)

एतच्छ्रुत्वा ततो वाक्यं मंत्रिभिः सह पार्थिवः । मंत्रयामास किमिदं भयंकरमुपस्थितम्

etacchrutvā tato vākyaṁ maṁtribhiḥ saha pārthivaḥ maṁtrayāmāsa kimidaṁ bhayaṁkaramupasthitam

यह सुनकर राजा ने मंत्रियों सहित विचार किया — 'यह कैसी भयंकर बात आ खड़ी हुई है!'

श्लोक 9 (padma.6.33.9)

आकुलं च जगद्दृष्ट्वा पौरजानपदादिकम् । ब्रुवंति सर्वतो लोकाः क्षय एष समागतः

ākulaṁ ca jagaddṛṣṭvā paurajānapadādikam bruvaṁti sarvato lokāḥ kṣaya eṣa samāgataḥ

नगरवासियों और देशवासियों सहित समूचे संसार को व्याकुल देखकर सब ओर लोग कहने लगे — 'यह विनाश आ पहुँचा है।'

श्लोक 10 (padma.6.33.10)

देशाः सनगरा ग्रामा भयभीताः समंततः । पप्रच्छ प्रयतो राजा वसिष्ठप्रमुखान्द्विजान्

deśāḥ sanagarā grāmā bhayabhītāḥ samaṁtataḥ papraccha prayato rājā vasiṣṭhapramukhāndvijān

नगरों और गाँवों सहित सभी देश सब ओर से भयभीत हो गए। सावधान राजा ने वसिष्ठ आदि द्विजों से पूछा —

श्लोक 11 (padma.6.33.11)

संविधानं किमत्रास्ति ब्रूत मां हि द्विजोत्तमाः

saṁvidhānaṁ kimatrāsti brūta māṁ hi dvijottamāḥ

'इसका क्या उपाय है? हे द्विजोत्तमो! मुझे बताइए।'

श्लोक 12 (padma.6.33.12)

वसिष्ठ उवाच ।प्राजापत्यमृक्षमिदं तस्मिन्भिन्ने कुतः प्रजाः । अयं योगोह्यसाध्यस्तु ब्रह्मशक्रादिभिस्तथा

vasiṣṭha uvāca prājāpatyamṛkṣamidaṁ tasminbhinne kutaḥ prajāḥ ayaṁ yogohyasādhyastu brahmaśakrādibhistathā

वसिष्ठ ने कहा — 'यह प्रजापति का नक्षत्र है; इसके भेदन पर प्रजा कहाँ से रहेगी? यह योग तो ब्रह्मा-इंद्र आदि के लिए भी असाध्य है।'

श्लोक 13 (padma.6.33.13)

इति संचिंत्य मनसा साहसं परमं महत् । समादाय धनुर्दिव्यं दिव्यायुधसमन्वितम्

iti saṁciṁtya manasā sāhasaṁ paramaṁ mahat samādāya dhanurdivyaṁ divyāyudhasamanvitam

मन में इस प्रकार सोचकर, अत्यंत बड़ा साहस करके, दिव्य आयुधों से युक्त दिव्य धनुष लेकर,

श्लोक 14 (padma.6.33.14)

रथमारुह्य वेगेन गतो नक्षत्रमंडलम् । सपादं योजनं लक्षं सूर्यस्योपरि संस्थितम्

rathamāruhya vegena gato nakṣatramaṁḍalam sapādaṁ yojanaṁ lakṣaṁ sūryasyopari saṁsthitam

रथ पर सवार होकर वेगपूर्वक नक्षत्र-मंडल की ओर गए, सूर्य से सवा लाख योजन ऊपर स्थित,

श्लोक 15 (padma.6.33.15)

रोहिणीपृष्ठमास्थाय राजा दशरथः पुरा । रथे तु कांचने दिव्ये मणिरत्नविभूषिते

rohiṇīpṛṣṭhamāsthāya rājā daśarathaḥ purā rathe tu kāṁcane divye maṇiratnavibhūṣite

रोहिणी की पीठ पर पहुँचकर राजा दशरथ, अपने स्वर्ण, मणि-रत्न से सजे दिव्य रथ पर,

श्लोक 16 (padma.6.33.16)

हंसवर्णहयैर्युक्ते महाकेतुसमुच्छ्रये । दीप्यमानो महारत्नैः किरीटमुकुटोज्ज्वलः

haṁsavarṇahayairyukte mahāketusamucchraye dīpyamāno mahāratnaiḥ kirīṭamukuṭojjvalaḥ

हंस-वर्ण के घोड़ों से जुते, महाध्वज से ऊँचे, महारत्नों से दीप्तिमान, किरीट-मुकुट से उज्ज्वल —

श्लोक 17 (padma.6.33.17)

बभ्राज स तदाकाशे द्वितीय इव भास्करः । आकर्णपूर्णा चापे तु संहारास्त्रं न्ययोजयत्

babhrāja sa tadākāśe dvitīya iva bhāskaraḥ ākarṇapūrṇā cāpe tu saṁhārāstraṁ nyayojayat

वे आकाश में दूसरे सूर्य के समान शोभित हुए। कानों तक खींचे धनुष पर उन्होंने संहार-अस्त्र चढ़ाया।

श्लोक 18 (padma.6.33.18)

संहारास्त्रं शनिर्दृष्ट्वा सुरासुरभयंकरम् । हसित्वा तद्भयात्सौरिरिदं वचनमब्रवीत्

saṁhārāstraṁ śanirdṛṣṭvā surāsurabhayaṁkaram hasitvā tadbhayātsauriridaṁ vacanamabravīt

देव-असुरों के लिए भयंकर उस संहार-अस्त्र को देखकर शनि ने हँसते हुए, उसी भय से यह वचन कहा —

श्लोक 19 (padma.6.33.19)

शनिरुवाच ।पौरुषं तव राजेंद्र परं रिपुभयंकरम् । देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः

śaniruvāca pauruṣaṁ tava rājeṁdra paraṁ ripubhayaṁkaram devāsuramanuṣyāśca siddhavidyādharoragāḥ

शनि ने कहा — 'हे राजेंद्र! आपका पौरुष शत्रुओं के लिए अत्यंत भयंकर है; देव, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और उरग —

श्लोक 20 (padma.6.33.20)

मया विलोकिता राजन्भस्मसाच्च भवंतिते । तुष्टोऽहं तव राजेंद्र तपसा पौरुषेण च । वरं ब्रूहि प्रदास्यामि मनसा यत्किमिच्छसि

mayā vilokitā rājanbhasmasācca bhavaṁtite tuṣṭo'haṁ tava rājeṁdra tapasā pauruṣeṇa ca varaṁ brūhi pradāsyāmi manasā yatkimicchasi

मेरी दृष्टि मात्र से भस्म हो जाते हैं, हे राजन्! हे राजेंद्र! आपके तप और पौरुष से मैं प्रसन्न हूँ; वर माँगिए, आपके मन में जो भी हो, मैं दूँगा।'

श्लोक 21 (padma.6.33.21)

दशरथ उवाच ।रोहिणीं भेदयित्वा तु न गंतव्यं कदाचन । सरितः सागरा यावत्यावच्चंद्रार्कमेदिनी

daśaratha uvāca rohiṇīṁ bhedayitvā tu na gaṁtavyaṁ kadācana saritaḥ sāgarā yāvatyāvaccaṁdrārkamedinī

दशरथ ने कहा — 'रोहिणी को भेदकर आपको कभी आगे नहीं जाना चाहिए — जब तक नदियाँ और सागर हैं, जब तक चंद्र-सूर्य और पृथ्वी हैं,

श्लोक 22 (padma.6.33.22)

याचितं तु मया सौरे नान्यमिच्छामि ते वरम् । एवमस्तु शनिः प्राह वरं दत्त्वा तु शाश्वतम्

yācitaṁ tu mayā saure nānyamicchāmi te varam evamastu śaniḥ prāha varaṁ dattvā tu śāśvatam

यही मैं आपसे माँगता हूँ, हे सौरि! और कोई वर नहीं चाहता।' 'ऐसा ही हो' — शनि ने यह शाश्वत वर देकर कहा।

श्लोक 23 (padma.6.33.23)

पुनरेवाब्रवीत्तुष्टो वरं वरय सुव्रत । प्रार्थयामास हृष्टात्मा वरमन्यं शनेस्तदा

punarevābravīttuṣṭo varaṁ varaya suvrata prārthayāmāsa hṛṣṭātmā varamanyaṁ śanestadā

प्रसन्न होकर उन्होंने फिर कहा — 'हे सुव्रत! और वर माँगो।' प्रसन्न मन से उन्होंने तब शनि से एक और वर माँगा —

श्लोक 24 (padma.6.33.24)

न भेत्तव्यं हि शकटं त्वया भास्करनंदन । द्वादशाब्दं तु दुर्भिक्षं न कर्तव्यं कदाचन

na bhettavyaṁ hi śakaṭaṁ tvayā bhāskaranaṁdana dvādaśābdaṁ tu durbhikṣaṁ na kartavyaṁ kadācana

'हे भास्कर-नंदन! आपको शाकट को भी कभी नहीं भेदना चाहिए; बारह वर्षों का अकाल कभी नहीं होना चाहिए।'

श्लोक 25 (padma.6.33.25)

शनिरुवाच ।द्वादशाब्दं तु दुर्भिक्षं न कदाचिद्भविष्यति । कीर्तिरेषा त्वदीया च त्रैलोक्ये विचरिष्यति

śaniruvāca dvādaśābdaṁ tu durbhikṣaṁ na kadācidbhaviṣyati kīrtireṣā tvadīyā ca trailokye vicariṣyati

शनि ने कहा — 'बारह वर्षों का अकाल कभी नहीं होगा; और आपकी यह कीर्ति तीनों लोकों में विचरण करेगी।'

श्लोक 26 (padma.6.33.26)

वरद्वयं तु संप्राप्य हृष्टरोमा च पार्थिवः । रथोपरि धनुर्मुक्त्वा भूत्वा चैव कृताञ्जलि

varadvayaṁ tu saṁprāpya hṛṣṭaromā ca pārthivaḥ rathopari dhanurmuktvā bhūtvā caiva kṛtāñjali

दो वर पाकर, रोमांचित होकर वह राजा, रथ पर धनुष को नीचे रखकर, हाथ जोड़कर,

श्लोक 27 (padma.6.33.27)

ध्यात्वा सरस्वतीं देवीं गणनाथं विनायकम् । राजा दशरथः स्तोत्रं सौरेरिदमथाब्रवीत्

dhyātvā sarasvatīṁ devīṁ gaṇanāthaṁ vināyakam rājā daśarathaḥ stotraṁ saureridamathābravīt

देवी सरस्वती और गणनाथ विनायक का ध्यान करके, राजा दशरथ ने तब सौरि की यह स्तुति कही —

श्लोक 28 (padma.6.33.28)

दशरथ उवाच ।नमः कृष्णाय नीलाय शितिकंठनिभाय च । नमः कालाग्निरूपाय कृतांताय च वै नमः

daśaratha uvāca namaḥ kṛṣṇāya nīlāya śitikaṁṭhanibhāya ca namaḥ kālāgnirūpāya kṛtāṁtāya ca vai namaḥ

दशरथ ने कहा — 'कृष्ण को नमस्कार, नीले को, नीलकंठ के समान को नमस्कार; कालाग्नि-रूप को नमस्कार, कृतांत (यम) को भी नमस्कार।

श्लोक 29 (padma.6.33.29)

नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च । नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते

namo nirmāṁsadehāya dīrghaśmaśrujaṭāya ca namo viśālanetrāya śuṣkodarabhayākṛte

मांसरहित देह वाले को, लंबी दाढ़ी-जटा वाले को नमस्कार; विशाल नेत्रों वाले, सूखे पेट के भयानक रूप वाले को नमस्कार।

श्लोक 30 (padma.6.33.30)

नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः । नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोस्तु ते

namaḥ puṣkalagātrāya sthūlaromṇe'tha vai namaḥ namo dīrghāya śuṣkāya kāladaṁṣṭra namostu te

विशाल अंगों वाले को नमस्कार, स्थूल केशों वाले को नमस्कार; लंबे, सूखे को नमस्कार — हे काल-दंष्ट्र! तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 31 (padma.6.33.31)

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः । नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने

namaste koṭarākṣāya durnirīkṣyāya vai namaḥ namo ghorāya raudrāya bhīṣaṇāya kapāline

धँसी आँखों वाले तुम्हें नमस्कार, दुर्दृश्य को नमस्कार; भयानक, रौद्र, भीषण, कपाल धारण करने वाले को नमस्कार।

श्लोक 32 (padma.6.33.32)

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नमोस्तु ते । सूर्यपुत्र नमस्तेस्तु भास्करे भयदाय च

namaste sarvabhakṣāya valīmukha namostu te sūryaputra namastestu bhāskare bhayadāya ca

सर्वभक्षक तुम्हें नमस्कार, वलीमुख (झुर्रीदार-मुख) तुम्हें नमस्कार; हे सूर्यपुत्र! तुम्हें नमस्कार, भास्कर के लिए भी भयदायक।

श्लोक 33 (padma.6.33.33)

अधोदृष्टे नमस्तेस्तु संवर्तक नमोस्तु ते । नमो मंदगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोस्तु ते

adhodṛṣṭe namastestu saṁvartaka namostu te namo maṁdagate tubhyaṁ nistriṁśāya namostu te

नीचे देखने वाले तुम्हें नमस्कार, हे संवर्तक! तुम्हें नमस्कार; मंद-गति वाले तुम्हें नमस्कार, निर्दयी तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 34 (padma.6.33.34)

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च । नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः

tapasā dagdhadehāya nityaṁ yogaratāya ca namo nityaṁ kṣudhārtāya atṛptāya ca vai namaḥ

तप से जले हुए शरीर वाले, नित्य योग में रत को; नित्य क्षुधा-पीड़ित को नमस्कार, कभी तृप्त न होने वाले को भी नमस्कार।

श्लोक 35 (padma.6.33.35)

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेस्तु कश्यपात्मजसूनवे । तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्

jñānacakṣurnamastestu kaśyapātmajasūnave tuṣṭo dadāsi vai rājyaṁ ruṣṭo harasi tatkṣaṇāt

ज्ञान-नेत्र वाले, कश्यप के पुत्र (सूर्य) के पुत्र, तुम्हें नमस्कार; प्रसन्न होकर तुम राज्य देते हो, क्रुद्ध होकर तत्काल हर लेते हो।

श्लोक 36 (padma.6.33.36)

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः । त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यांति समूलतः

devāsuramanuṣyāśca siddhavidyādharoragāḥ tvayā vilokitāḥ sarve nāśaṁ yāṁti samūlataḥ

देव, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और उरग — तुम्हारे द्वारा देखे जाने पर सभी जड़ सहित नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 37 (padma.6.33.37)

प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः । एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः

prasādaṁ kuru me deva varārho'hamupāgataḥ evaṁ stutastadā saurirgraharājo mahābalaḥ

हे देव! मुझ पर प्रसन्न हों, मैं वर के योग्य होकर आया हूँ।' इस प्रकार स्तुत होकर, महाबली ग्रहराज सौरि ने,

श्लोक 38 (padma.6.33.38)

अब्रवीच्च पुनर्वाक्यं हृष्टरोमा तु भास्करिः । तुष्टोऽहं तव राजेंद्र स्तवेनानेन सुव्रत । वरं ब्रूहि प्रदास्यामि स्वेच्छया रघुनंदन

abravīcca punarvākyaṁ hṛṣṭaromā tu bhāskariḥ tuṣṭo'haṁ tava rājeṁdra stavenānena suvrata varaṁ brūhi pradāsyāmi svecchayā raghunaṁdana

फिर से यह वचन कहा, रोमांचित होकर, भास्कर-पुत्र ने — 'हे राजेंद्र! हे सुव्रत! इस स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ; वर माँगो, हे रघुनंदन! मैं इच्छानुसार दूँगा।'

श्लोक 39 (padma.6.33.39)

दशरथ उवाच ।अद्यप्रभृति ते सौरे पीडा कार्या न कस्यचित् । देवासुरमनुष्याणां पशुपक्षिसरीसृपाम्

daśaratha uvāca adyaprabhṛti te saure pīḍā kāryā na kasyacit devāsuramanuṣyāṇāṁ paśupakṣisarīsṛpām

दशरथ ने कहा — 'हे सौरि! आज से किसी को भी पीड़ा मत दीजिए — देवों, असुरों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों और सरीसृपों को भी।'

श्लोक 40 (padma.6.33.40)

शनिरुवाच ।गृह्णंतीति ग्रहाः सर्वे ग्रहाः पीडाकराः स्मृताः । अदेयं याचितं राजन्किंचिद्युक्तं वदाम्यहम्

śaniruvāca gṛhṇaṁtīti grahāḥ sarve grahāḥ pīḍākarāḥ smṛtāḥ adeyaṁ yācitaṁ rājankiṁcidyuktaṁ vadāmyaham

शनि ने कहा — ''ग्रहण करते हैं' इसलिए ये ग्रह कहलाते हैं — सभी ग्रह पीड़ा देने वाले ही माने जाते हैं; हे राजन्! यह देना संभव नहीं है, मैं आपसे कुछ उचित बात कहता हूँ।

श्लोक 41 (padma.6.33.41)

त्वया प्रोक्तमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति मानवः । एककालं द्विकालं वा पीडामुक्तो भवेत्क्षणात्

tvayā proktamidaṁ stotraṁ yaḥ paṭhiṣyati mānavaḥ ekakālaṁ dvikālaṁ vā pīḍāmukto bhavetkṣaṇāt

आपके द्वारा कहा गया यह स्तोत्र जो मनुष्य एक बार या दो बार पढ़ेगा, वह तत्काल पीड़ा से मुक्त हो जाएगा।

श्लोक 42 (padma.6.33.42)

देवासुरमनुष्याणां सिद्धविद्याध्ररक्षसाम् । मृत्युं मृत्युगतो दद्यां जन्मन्यंते चतुर्थके

devāsuramanuṣyāṇāṁ siddhavidyādhrarakṣasām mṛtyuṁ mṛtyugato dadyāṁ janmanyaṁte caturthake

देव, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और राक्षसों में से मृत्यु के अधीन किसी को भी मैं चौथे जन्म के अंत में ही मृत्यु दूँगा।

श्लोक 43 (padma.6.33.43)

यः पुनः श्रद्धया युक्तः शुचिर्भूत्वा समाहितः । शमीपत्रैः समभ्यर्च्य प्रतिमां लोहजां मम

yaḥ punaḥ śraddhayā yuktaḥ śucirbhūtvā samāhitaḥ śamīpatraiḥ samabhyarcya pratimāṁ lohajāṁ mama

परंतु जो श्रद्धापूर्वक, शुद्ध होकर, एकाग्र मन से शमी के पत्तों से मेरी लोहे की प्रतिमा की पूजा करेगा,

श्लोक 44 (padma.6.33.44)

माषौदनतिलैर्मिश्रं दद्याल्लोहं च दक्षिणाम् । कृष्णां गां वृषभं वापि यो वै दद्याद्दिवजातये

māṣaudanatilairmiśraṁ dadyāllohaṁ ca dakṣiṇām kṛṣṇāṁ gāṁ vṛṣabhaṁ vāpi yo vai dadyāddivajātaye

उड़द-चावल और तिल मिलाकर, लोहा और दक्षिणा देगा, या जो द्विज को काली गाय या बैल देगा,

श्लोक 45 (padma.6.33.45)

मद्दिने तु विशेषेण स्तोत्रेणानेन पूजयेत् । पूजयित्वा जपेत्स्तोत्रं भूत्वा चैव कृतांजलि

maddine tu viśeṣeṇa stotreṇānena pūjayet pūjayitvā japetstotraṁ bhūtvā caiva kṛtāṁjali

विशेष रूप से मेरे दिन (शनिवार) को इस स्तोत्र से पूजा करेगा — पूजा करके हाथ जोड़कर स्तोत्र का जप करके,

श्लोक 46 (padma.6.33.46)

तस्य पीडा न चैवाहं करिष्यामि कदाचन । गोचरे जन्मलग्ने वा दशास्वंतर्दशासु च

tasya pīḍā na caivāhaṁ kariṣyāmi kadācana gocare janmalagne vā daśāsvaṁtardaśāsu ca

उसे मैं कभी पीड़ा नहीं दूँगा — न गोचर में, न जन्म-लग्न में, न दशाओं-अंतर्दशाओं में।

श्लोक 47 (padma.6.33.47)

रक्षामि सततं तस्य पीडां चापि ग्रहस्य च । अनेनैव विधानेन पीडामुक्तं जगद्भवेत्

rakṣāmi satataṁ tasya pīḍāṁ cāpi grahasya ca anenaiva vidhānena pīḍāmuktaṁ jagadbhavet

मैं सदा उसकी रक्षा करूँगा, तथा किसी भी ग्रह की पीड़ा से भी। इसी विधान से संसार पीड़ा-मुक्त हो सकता है।

श्लोक 48 (padma.6.33.48)

एवं युक्त्या मया दत्तो वरस्ते रघुनंदन । वरत्रयं तु संप्राप्य राजा दशरथस्तदा

evaṁ yuktyā mayā datto varaste raghunaṁdana varatrayaṁ tu saṁprāpya rājā daśarathastadā

इस प्रकार तर्कपूर्वक मैंने आपको यह वर दिया है, हे रघुनंदन।' तीनों वर पाकर राजा दशरथ ने तब,

श्लोक 49 (padma.6.33.49)

मेने कृतार्थमात्मानं नमस्कृत्य शनैश्चरम् । शनिना चाभ्यनुज्ञातो रथमारुह्य वेगवान्

mene kṛtārthamātmānaṁ namaskṛtya śanaiścaram śaninā cābhyanujñāto rathamāruhya vegavān

शनैश्चर को नमस्कार करके स्वयं को कृतार्थ माना; शनि की अनुमति पाकर वेगपूर्वक रथ पर सवार होकर,

श्लोक 50 (padma.6.33.50)

स्वस्थानं गतवान्राजा प्राप्तः श्रेयोऽभवत्तदा । य इदं प्रातरुत्थाय शनिवारे स्तवं पठेत्

svasthānaṁ gatavānrājā prāptaḥ śreyo'bhavattadā ya idaṁ prātarutthāya śanivāre stavaṁ paṭhet

राजा अपने स्थान लौट गए, और उस समय उनका कल्याण संपन्न हुआ। जो कोई प्रातःकाल उठकर शनिवार को यह स्तोत्र पढ़ता है,

श्लोक 51 (padma.6.33.51)

पठ्यमानमिदं स्तोत्रं श्रद्धया यः शृणोति च । नरः स मुच्यते पापात्स्वर्गलोके महीयते

paṭhyamānamidaṁ stotraṁ śraddhayā yaḥ śṛṇoti ca naraḥ sa mucyate pāpātsvargaloke mahīyate

तथा जो श्रद्धापूर्वक पढ़े जाते हुए इस स्तोत्र को सुनता है, वह मनुष्य पाप से मुक्त होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

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