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उत्तर खण्ड · अध्याय 38

एकादशी की उत्पत्ति और मुर-वध

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (padma.6.38.1)

महादेव उवाच ।एकस्मिन्समये पुत्र गतोऽहं विष्णुसन्निधौ । तत्र पृष्टं मया पूर्वं माहात्म्यं द्वादशीभवम्

mahādeva uvāca ekasminsamaye putra gato'haṁ viṣṇusannidhau tatra pṛṣṭaṁ mayā pūrvaṁ māhātmyaṁ dvādaśībhavam

महादेव ने कहा — हे पुत्र! एक समय मैं विष्णु के समीप गया था; वहाँ मैंने पहले द्वादशी से संबंधित माहात्म्य पूछा था।

श्लोक 2 (padma.6.38.2)

नारद उवाच कीदृशी स्यान्महादेव महाद्वादशिका परा । तस्या व्रते फलं कीदृग्वद सर्वेश्वर प्रभो

nārada uvāca kīdṛśī syānmahādeva mahādvādaśikā parā tasyā vrate phalaṁ kīdṛgvada sarveśvara prabho

नारद ने कहा — हे महादेव! वह महान् उत्तम द्वादशी कैसी है? हे सर्वेश्वर प्रभो! उसके व्रत का फल कैसा है, बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.38.3)

शिव उवाच ।इयमेकादशी ब्रह्मन्महापुण्यफलप्रदा । ऋक्षयोगैश्च संयुक्ता कर्त्तव्या मुनिसत्तमैः

śiva uvāca iyamekādaśī brahmanmahāpuṇyaphalapradā ṛkṣayogaiśca saṁyuktā karttavyā munisattamaiḥ

शिव ने कहा — हे ब्रह्मन्! यह एकादशी महापुण्यफल देने वाली है; मुनिश्रेष्ठों को इसे नक्षत्र-योगों से युक्त करके करनी चाहिए।

श्लोक 4 (padma.6.38.4)

जया च विजया चैव जयंती पापनाशिनी । सर्वपापहराश्चैताः कर्त्तव्याः फलकांक्षिभिः

jayā ca vijayā caiva jayaṁtī pāpanāśinī sarvapāpaharāścaitāḥ karttavyāḥ phalakāṁkṣibhiḥ

जया, विजया और जयंती — ये पापनाशिनी, सर्व-पाप हरने वाली एकादशियाँ फल की इच्छा रखने वालों को करनी चाहिए।

श्लोक 5 (padma.6.38.5)

एकादश्यां यदा ऋक्षं शुक्लपक्षे पुनर्वसुः । नाम्ना सा च जया ख्याता तिथीनामुत्तमा तिथिः

ekādaśyāṁ yadā ṛkṣaṁ śuklapakṣe punarvasuḥ nāmnā sā ca jayā khyātā tithīnāmuttamā tithiḥ

शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब पुनर्वसु नक्षत्र हो, वह जया नाम से प्रसिद्ध है, तिथियों में उत्तम तिथि।

श्लोक 6 (padma.6.38.6)

तामुपोष्य नरः पापान्मुच्यते नात्र संशयः । यदा च शुक्लद्वादश्यां नक्षत्रं श्रवणं भवेत्

tāmupoṣya naraḥ pāpānmucyate nātra saṁśayaḥ yadā ca śukladvādaśyāṁ nakṣatraṁ śravaṇaṁ bhavet

उसका उपवास करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। और जब शुक्ल द्वादशी को श्रवण नक्षत्र हो,

श्लोक 7 (padma.6.38.7)

विजया सा समाख्याता तिथीनामुत्तमा तिथिः । सहस्रगुणितं दानं यस्यां वै विप्र भोजनम्

vijayā sā samākhyātā tithīnāmuttamā tithiḥ sahasraguṇitaṁ dānaṁ yasyāṁ vai vipra bhojanam

वह विजया नाम से जानी जाती है, तिथियों में उत्तम तिथि। उसमें दिया गया दान और ब्राह्मण-भोजन सहस्रगुणित फल देते हैं।

श्लोक 8 (padma.6.38.8)

होमस्तथोपवासश्च सहस्राधिफलप्रदः । यदा च शुक्लद्वादश्यां प्राजापत्यं हि जायते

homastathopavāsaśca sahasrādhiphalapradaḥ yadā ca śukladvādaśyāṁ prājāpatyaṁ hi jāyate

होम और उपवास सहस्र से अधिक फल देने वाले हैं। और जब शुक्ल द्वादशी को प्राजापत्य (रोहिणी) नक्षत्र होता है,

श्लोक 9 (padma.6.38.9)

जयंती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापहरा तिथिः । सप्तजन्मकृतं पापं स्वल्पं वा यदि वा बहु

jayaṁtī nāma sā proktā sarvapāpaharā tithiḥ saptajanmakṛtaṁ pāpaṁ svalpaṁ vā yadi vā bahu

वह जयंती नाम से कही गई है, सर्वपाप हरने वाली तिथि। सात जन्मों में किया गया पाप, चाहे थोड़ा हो या बहुत,

श्लोक 10 (padma.6.38.10)

प्रक्षालयति गोविंदस्तस्यामभ्यर्चितो ध्रुवम् । यदा वै शुक्लद्वादश्यां पुष्यं भवति कर्हिचित्

prakṣālayati goviṁdastasyāmabhyarcito dhruvam yadā vai śukladvādaśyāṁ puṣyaṁ bhavati karhicit

उसमें पूजित गोविंद उसे निश्चय ही धो देते हैं। और जब शुक्ल द्वादशी को पुष्य नक्षत्र होता है,

श्लोक 11 (padma.6.38.11)

तदा तु सा महापुण्या भविता पापनाशिनी । यो ददाति तिलप्रस्थं नित्यं संवत्सरं प्रति

tadā tu sā mahāpuṇyā bhavitā pāpanāśinī yo dadāti tilaprasthaṁ nityaṁ saṁvatsaraṁ prati

तब वह अत्यंत पुण्यमयी, पापनाशिनी होगी। जो हर वर्ष प्रति वर्ष नित्य तिल-प्रस्थ का दान देता है,

श्लोक 12 (padma.6.38.12)

उपवासं च यस्तस्यां करोत्येतत्समं स्मृतम् । तस्यां जगत्पतिर्देवस्तुष्टः सर्वेश्वरो हरिः

upavāsaṁ ca yastasyāṁ karotyetatsamaṁ smṛtam tasyāṁ jagatpatirdevastuṣṭaḥ sarveśvaro hariḥ

और जो उसमें उपवास करता है, वह इसके समान माना गया है। उसमें जगत्पति देव, सर्वेश्वर हरि प्रसन्न होकर,

श्लोक 13 (padma.6.38.13)

प्रत्यक्षतां प्रयात्येव तत्रानंतफलं स्मृतम् । सगरेण ककुत्स्थेन नहुषेण च साधितः

pratyakṣatāṁ prayātyeva tatrānaṁtaphalaṁ smṛtam sagareṇa kakutsthena nahuṣeṇa ca sādhitaḥ

साक्षात् प्रकट हो जाते हैं; उसमें अनंत फल कहा गया है। सगर, ककुत्स्थ और नहुष ने,

श्लोक 14 (padma.6.38.14)

तस्यामाराधितः कृष्णो दत्तवानखिलं भुवि । वाचिकान्मानसाद्वापि कायजाच्च विशेषतः

tasyāmārādhitaḥ kṛṣṇo dattavānakhilaṁ bhuvi vācikānmānasādvāpi kāyajācca viśeṣataḥ

उसमें कृष्ण की आराधना करके पृथ्वी पर सब कुछ प्राप्त किया। वाणी, मन अथवा शरीर से किए गए पाप से,

श्लोक 15 (padma.6.38.15)

सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः । तामेकां समुपोष्याथ पुण्यनक्षत्रसंयुताम्

saptajanmakṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ tāmekāṁ samupoṣyātha puṇyanakṣatrasaṁyutām

सात जन्मों में किए गए पाप से मनुष्य मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। पुण्य-नक्षत्र से युक्त उस एक (एकादशी) का उपवास करके,

श्लोक 16 (padma.6.38.16)

एकादशीसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः । स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम्

ekādaśīsahasrasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ snānaṁ dānaṁ japo homaḥ svādhyāyo devatārcanam

मनुष्य एक हज़ार एकादशियों का फल प्राप्त करता है। स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, देवता-पूजन —

श्लोक 17 (padma.6.38.17)

यत्तस्यां क्रियते किंचित्तदक्षयफलं स्मृतम् । तस्मादेषा प्रकर्तव्या यत्नेन फलकांक्षिभिः

yattasyāṁ kriyate kiṁcittadakṣayaphalaṁ smṛtam tasmādeṣā prakartavyā yatnena phalakāṁkṣibhiḥ

उसमें जो भी थोड़ा-सा भी किया जाता है, वह अक्षय-फल देने वाला माना गया है। इसलिए फल की इच्छा रखने वालों को इसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक 18 (padma.6.38.18)

पंचमेनाश्वमेधेन यदि स्नातो युधिष्ठिरः । पर्यपृच्छत धर्मात्मा कृष्णं यदुकुलोद्वहम्

paṁcamenāśvamedhena yadi snāto yudhiṣṭhiraḥ paryapṛcchata dharmātmā kṛṣṇaṁ yadukulodvaham

पाँचवें अश्वमेध में स्नान करके धर्मात्मा युधिष्ठिर ने यदुकुल-श्रेष्ठ कृष्ण से पूछा —

श्लोक 19 (padma.6.38.19)

युधिष्ठिर उवाच ।उपवासस्य नक्तस्य त्वेकभुक्तस्य मे प्रभो । किं पुण्यं किं फलं तस्य ब्रूहि सर्वं जनार्दन

yudhiṣṭhira uvāca upavāsasya naktasya tvekabhuktasya me prabho kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tasya brūhi sarvaṁ janārdana

युधिष्ठिर ने कहा — हे प्रभो! उपवास, रात्रि-भोजन और एक-समय भोजन का जो पुण्य और फल है, वह मुझे पूरा बताइए, हे जनार्दन!

श्लोक 20 (padma.6.38.20)

श्रीभगवानुवाच ।हेमंते चैव संप्राप्ते मासे मार्गे च शोभने । कृष्णपक्षे च या पार्थ द्वादशी तामुपोषयेत् । दशम्यां चैकभक्तश्च शुद्धचित्तो दृढव्रतः

śrībhagavānuvāca hemaṁte caiva saṁprāpte māse mārge ca śobhane kṛṣṇapakṣe ca yā pārtha dvādaśī tāmupoṣayet daśamyāṁ caikabhaktaśca śuddhacitto dṛḍhavrataḥ

श्रीभगवान ने कहा — हेमंत ऋतु में मार्गशीर्ष के शुभ मास में, हे पार्थ! कृष्ण पक्ष की जो द्वादशी है, उसका उपवास करना चाहिए। दशमी को एक बार भोजन करके, शुद्ध चित्त से दृढ़-व्रती होकर,

श्लोक 21 (padma.6.38.21)

नक्तं चैव तथा ज्ञात्वा दशम्यां नियतः सदा । दिवसस्याष्टमे भागे मंदीभूते दिवाकरे

naktaṁ caiva tathā jñātvā daśamyāṁ niyataḥ sadā divasasyāṣṭame bhāge maṁdībhūte divākare

रात्रि-भोजन को जानते हुए दशमी को सदा नियमपूर्वक रहना चाहिए। दिन के आठवें भाग में, जब सूर्य मंद हो जाए,

श्लोक 22 (padma.6.38.22)

नक्तं च तद्विजानीयान्न नक्तं निशिभोजनम् । नक्षत्रदर्शनान्नक्तं गृहस्थस्य विधीयते

naktaṁ ca tadvijānīyānna naktaṁ niśibhojanam nakṣatradarśanānnaktaṁ gṛhasthasya vidhīyate

उसे नक्त (रात्रि-भोजन) जानना चाहिए, यह नक्त-भोजन नहीं है। नक्षत्र-दर्शन तक का समय गृहस्थ के लिए नक्त-काल विधान है।

श्लोक 23 (padma.6.38.23)

यतेर्दिनाष्टमे भागे रात्रौ तस्य निषेधनम् । ततः प्रभातसमये कृत्वा च नियमं व्रती

yaterdināṣṭame bhāge rātrau tasya niṣedhanam tataḥ prabhātasamaye kṛtvā ca niyamaṁ vratī

संन्यासी के लिए दिन के आठवें भाग तक ही; रात्रि में उसके लिए यह निषिद्ध है। फिर प्रातःकाल के समय व्रती नियम धारण करके,

श्लोक 24 (padma.6.38.24)

मध्याह्ने च तथा पार्थ स्नानं शुचिः समाचरेत् । अधमं कूपके स्नानं वाप्यां स्नानं च मध्यमम्

madhyāhne ca tathā pārtha snānaṁ śuciḥ samācaret adhamaṁ kūpake snānaṁ vāpyāṁ snānaṁ ca madhyamam

हे पार्थ! मध्याह्न में शुद्ध होकर स्नान करे। कुएँ में स्नान निकृष्ट है, बावली में स्नान मध्यम है,

श्लोक 25 (padma.6.38.25)

तडागे चोत्तमं स्नानं नद्यां स्नानं ततः परम् । पीड्यंते जंतवो यत्र जलमध्ये व्यवस्थिते

taḍāge cottamaṁ snānaṁ nadyāṁ snānaṁ tataḥ param pīḍyaṁte jaṁtavo yatra jalamadhye vyavasthite

तालाब में स्नान उत्तम है, नदी में स्नान उससे भी श्रेष्ठ है। जहाँ जल के भीतर स्थित जीव पीड़ित होते हैं,

श्लोक 26 (padma.6.38.26)

तत्र स्नाने कृते पार्थ पापं पुण्यं समं भवेत् । गृहे चैवोत्तमं स्नानं जलं चैव विशोधयेत्

tatra snāne kṛte pārtha pāpaṁ puṇyaṁ samaṁ bhavet gṛhe caivottamaṁ snānaṁ jalaṁ caiva viśodhayet

वहाँ स्नान करने से, हे पार्थ! पाप और पुण्य बराबर हो जाते हैं। घर में ही उत्तम स्नान है, जल को शुद्ध कर लेना चाहिए।

श्लोक 27 (padma.6.38.27)

तस्मात्तु पांडवश्रेष्ठ गृहे स्नानं समाचरेत् । अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे

tasmāttu pāṁḍavaśreṣṭha gṛhe snānaṁ samācaret aśvakrāṁte rathakrāṁte viṣṇukrāṁte vasuṁdhare

इसलिए, हे पांडव-श्रेष्ठ! घर में ही स्नान करना चाहिए — 'हे अश्व-क्रांत, रथ-क्रांत, विष्णु-क्रांत वसुंधरे!

श्लोक 28 (padma.6.38.28)

मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसंचितम् । क्रोधलोभौ परित्यज्य चैकचित्तो दृढव्रतः

mṛttike hara me pāpaṁ yanmayā pūrvasaṁcitam krodhalobhau parityajya caikacitto dṛḍhavrataḥ

हे मिट्टी! मेरा पूर्वसंचित पाप हर लो।' क्रोध और लोभ को त्यागकर, एकाग्रचित्त, दृढ़-व्रती होकर,

श्लोक 29 (padma.6.38.29)

नालापेतांत्यजं चैव तथा पाखंडिनो नरान् । मिथ्यावादरतांश्चैव तथा ब्राह्मणनिंदकान्

nālāpetāṁtyajaṁ caiva tathā pākhaṁḍino narān mithyāvādaratāṁścaiva tathā brāhmaṇaniṁdakān

चांडाल से बातचीत न करे, तथा पाखंडी लोगों से भी नहीं; मिथ्या-वाद में रत लोगों से और ब्राह्मण-निंदकों से भी नहीं।

श्लोक 30 (padma.6.38.30)

अन्यांश्चैव दुराचारानगम्यागमनेरतान् । परद्रव्यापहारांश्च परदाराभिगामिनः

anyāṁścaiva durācārānagamyāgamaneratān paradravyāpahārāṁśca paradārābhigāminaḥ

अन्य दुराचारियों से भी नहीं, अगम्यगमन में रत लोगों से भी नहीं; पर-द्रव्य हरने वालों से और पर-स्त्रीगामियों से भी नहीं।

श्लोक 31 (padma.6.38.31)

केशवं पूजयित्वा तु नैवेद्यं तत्र कारयेत् । दीपं दद्याद्गृहे तत्र भक्तियुक्तेन चेतसा

keśavaṁ pūjayitvā tu naivedyaṁ tatra kārayet dīpaṁ dadyādgṛhe tatra bhaktiyuktena cetasā

केशव की पूजा करके वहीं नैवेद्य अर्पित करना चाहिए; घर में भक्तियुक्त मन से दीप जलाना चाहिए।

श्लोक 32 (padma.6.38.32)

तद्दिने वर्जयेत्पार्थ निद्रां चैव तु मैथुनम् । धर्मशास्त्रविनोदेन दिनं सर्वं निवारयेत्

taddine varjayetpārtha nidrāṁ caiva tu maithunam dharmaśāstravinodena dinaṁ sarvaṁ nivārayet

उस दिन, हे पार्थ! निद्रा और मैथुन का त्याग करना चाहिए; धर्मशास्त्र की चर्चा से पूरा दिन बिताना चाहिए।

श्लोक 33 (padma.6.38.33)

रात्रौ जागरणं कृत्वा भक्तियुक्तो नृपोत्तम । विप्रेभ्यो दक्षिणां दद्यात्प्रणिपत्य क्षमापयेत्

rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā bhaktiyukto nṛpottama viprebhyo dakṣiṇāṁ dadyātpraṇipatya kṣamāpayet

रात्रि में जागरण करके, भक्तियुक्त होकर, हे नृपोत्तम! ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर, प्रणाम करके क्षमा माँगे।

श्लोक 34 (padma.6.38.34)

यथा कृष्णा तथा शुक्ला विधिनैवं प्रकारयेत् । एकादशीं द्विजः पार्थ विभेदं नैव कारयेत्

yathā kṛṣṇā tathā śuklā vidhinaivaṁ prakārayet ekādaśīṁ dvijaḥ pārtha vibhedaṁ naiva kārayet

जैसी कृष्ण-पक्ष की विधि है, वैसी ही शुक्ल-पक्ष की भी करानी चाहिए। हे पार्थ! द्विज को एकादशी में भेद नहीं करना चाहिए।

श्लोक 35 (padma.6.38.35)

एवं हि कुरुते यस्तु शृणु तस्य हि यत्फलम् । शंखोद्धारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं गदाधरम्

evaṁ hi kurute yastu śṛṇu tasya hi yatphalam śaṁkhoddhāre naraḥ snātvā dṛṣṭvā devaṁ gadādharam

जो इस प्रकार करता है, सुनो उसका फल क्या है। शंखोद्धार में स्नान करके, गदाधर देव के दर्शन करके,

श्लोक 36 (padma.6.38.36)

एकादश्युपवासस्य कलां नार्हति षोडशीम् । संक्रांतिषु चतुर्लक्षं यो ददाति नृपोत्तम

ekādaśyupavāsasya kalāṁ nārhati ṣoḍaśīm saṁkrāṁtiṣu caturlakṣaṁ yo dadāti nṛpottama

मनुष्य एकादशी-उपवास के सोलहवें अंश के भी योग्य नहीं होता। हे नृपोत्तम! संक्रांतियों में जो चार लाख का दान देता है,

श्लोक 37 (padma.6.38.37)

एकादश्युपवासस्य कलां नार्हति षोडशीम् । प्रभासक्षेत्रे यत्पुण्यं ग्रहणे चंद्र सूर्ययोः

ekādaśyupavāsasya kalāṁ nārhati ṣoḍaśīm prabhāsakṣetre yatpuṇyaṁ grahaṇe caṁdra sūryayoḥ

वह भी एकादशी-उपवास के सोलहवें अंश के योग्य नहीं होता। प्रभास-क्षेत्र में जो पुण्य है, चंद्र-सूर्य ग्रहण में जो पुण्य है,

श्लोक 38 (padma.6.38.38)

तत्फलं जायते नूनमेकादश्युपवासिनः । केदारे चोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते

tatphalaṁ jāyate nūnamekādaśyupavāsinaḥ kedāre codakaṁ pītvā punarjanma na vidyate

वह फल निश्चय ही एकादशी-व्रती को मिलता है। केदार में जल पीकर पुनः जन्म नहीं होता,

श्लोक 39 (padma.6.38.39)

तथा चैकादशी पार्थ गर्भवासक्षयंकरी । अश्वमेधस्य यज्ञस्य पृथिव्यां यत्फलं लभेत्

tathā caikādaśī pārtha garbhavāsakṣayaṁkarī aśvamedhasya yajñasya pṛthivyāṁ yatphalaṁ labhet

वैसे ही, हे पार्थ! एकादशी गर्भवास का क्षय करने वाली है। अश्वमेध यज्ञ से पृथ्वी पर जो फल मिलता है,

श्लोक 40 (padma.6.38.40)

तस्माच्छतगुणं पुण्यमेकादश्युपवासिनः । तपस्विनो गृहे यस्य भुंजते च द्विजोत्तमाः

tasmācchataguṇaṁ puṇyamekādaśyupavāsinaḥ tapasvino gṛhe yasya bhuṁjate ca dvijottamāḥ

उससे सौ गुना पुण्य एकादशी-व्रती को मिलता है। जिसके घर में तपस्वी और श्रेष्ठ द्विज भोजन करते हैं,

श्लोक 41 (padma.6.38.41)

तत्फलं जायते नूनमेकादश्युपवासिनः । गोसहस्रेण यत्पुण्यं दत्वा वेदांतपारगे

tatphalaṁ jāyate nūnamekādaśyupavāsinaḥ gosahasreṇa yatpuṇyaṁ datvā vedāṁtapārage

वह फल निश्चय ही एकादशी-व्रती को प्राप्त होता है। वेदांत-पारंगत को हज़ार गायें दान देने से जो पुण्य मिलता है,

श्लोक 42 (padma.6.38.42)

तस्माच्छतगुणं पुण्यमेकादश्युपवासिनः । येषां देहे त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः

tasmācchataguṇaṁ puṇyamekādaśyupavāsinaḥ yeṣāṁ dehe trayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ

उससे सौ गुना पुण्य एकादशी-व्रती को मिलता है। जिनके शरीर में तीनों देव — ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर —

श्लोक 43 (padma.6.38.43)

वसंति तेषां ते तुल्या एकादश्युपवासिनः । ते नराः पुण्यकर्माणो ये भक्ता हरिपूजकाः

vasaṁti teṣāṁ te tulyā ekādaśyupavāsinaḥ te narāḥ puṇyakarmāṇo ye bhaktā haripūjakāḥ

निवास करते हैं, वे एकादशी-व्रतियों के समान हैं। जो पुण्यकर्मी लोग हरि के भक्त और पूजक हैं,

श्लोक 44 (padma.6.38.44)

एकादशीव्रतस्यापि पुण्यसंख्या न विद्यते । एतत्पुण्यं भवेत्तस्य यत्सुरैरपि दुर्ल्लभम्

ekādaśīvratasyāpi puṇyasaṁkhyā na vidyate etatpuṇyaṁ bhavettasya yatsurairapi durllabham

एकादशी-व्रत का पुण्य भी उनकी गणना में नहीं आता (अर्थात् वह अपार है)। यह वह पुण्य है जो देवताओं को भी दुर्लभ है।

श्लोक 45 (padma.6.38.45)

एतस्मादर्द्धपुण्यं तु प्राप्यते नक्तभोजनात् । नक्तस्यार्द्धं भवेत्पुण्यमेकभक्तेन देहिनाम्

etasmādarddhapuṇyaṁ tu prāpyate naktabhojanāt naktasyārddhaṁ bhavetpuṇyamekabhaktena dehinām

इससे आधा पुण्य नक्त-भोजन से प्राप्त होता है। नक्त के आधे पुण्य के बराबर एक-भुक्त (एक समय भोजन) करने वाले प्राणी को मिलता है।

श्लोक 46 (padma.6.38.46)

तावद्गर्जंति तीर्थानि दानानि नियमानि च । यावन्नोपोषयेज्जंतुर्वासरं विष्णुवल्लभम्

tāvadgarjaṁti tīrthāni dānāni niyamāni ca yāvannopoṣayejjaṁturvāsaraṁ viṣṇuvallabham

जब तक प्राणी विष्णु-प्रिय दिन का उपवास नहीं करता, तब तक तीर्थ, दान और नियम गर्जना ही करते रहते हैं (अर्थात् व्यर्थ रहते हैं)।

श्लोक 47 (padma.6.38.47)

तस्मात्त्वं पांडवश्रेष्ठ व्रतमेतत्समाचर । पुण्यसंख्यां न जानामि यत्त्वं पृच्छसि पांडव

tasmāttvaṁ pāṁḍavaśreṣṭha vratametatsamācara puṇyasaṁkhyāṁ na jānāmi yattvaṁ pṛcchasi pāṁḍava

इसलिए, हे पांडव-श्रेष्ठ! तुम यह व्रत आचरण करो। हे पांडव! तुम जो पूछते हो, मैं उसकी पुण्य-संख्या नहीं जानता,

श्लोक 48 (padma.6.38.48)

एतद्धि कथितं पार्थ यद्गोप्यं व्रतमुत्तमम् । एकादशीसमं नास्ति कृत्वा यज्ञसहस्रकम्

etaddhi kathitaṁ pārtha yadgopyaṁ vratamuttamam ekādaśīsamaṁ nāsti kṛtvā yajñasahasrakam

यही, हे पार्थ! तुमसे कहा गया है — यह गोपनीय उत्तम व्रत है। एकादशी के समान हज़ार यज्ञ करके भी कुछ नहीं है।

श्लोक 49 (padma.6.38.49)

युधिष्ठिर उवाच ।उत्पन्ना सा कथं देव पुण्या चैकादशी तिथिः । कथं पवित्रा विश्वेऽस्मिन्कथं वै देवताप्रिया

yudhiṣṭhira uvāca utpannā sā kathaṁ deva puṇyā caikādaśī tithiḥ kathaṁ pavitrā viśve'sminkathaṁ vai devatāpriyā

युधिष्ठिर ने कहा — हे देव! वह पुण्यमयी एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई? यह इस विश्व में कैसे पवित्र है, देवताओं को कैसे प्रिय है?

श्लोक 50 (padma.6.38.50)

श्रीभगवानुवाच ।पुरा कृतयुगे पार्थ मुरनामेति दानवः । अत्यद्भुतो महारौद्र सर्वदेवभयंकरः

śrībhagavānuvāca purā kṛtayuge pārtha muranāmeti dānavaḥ atyadbhuto mahāraudra sarvadevabhayaṁkaraḥ

श्रीभगवान ने कहा — प्राचीन सत्ययुग में, हे पार्थ! मुर नामक एक दानव था, अत्यंत अद्भुत, अत्यंत भयंकर, सभी देवताओं को भयभीत करने वाला।

श्लोक 51 (padma.6.38.51)

इंद्रोऽपि निर्जितस्तेन सर्वदेवास्तथा नृप । महासुरेण तेनैव मृत्युना च दुरात्मना

iṁdro'pi nirjitastena sarvadevāstathā nṛpa mahāsureṇa tenaiva mṛtyunā ca durātmanā

हे राजन्! इंद्र भी उससे पराजित हो गए, और सभी देवता भी, उसी दुरात्मा, महामृत्यु-रूप महासुर से।

श्लोक 52 (padma.6.38.52)

स्वर्गान्निराकृतास्तेन विचरंति महीतले । सशंका भयभीताश्च सर्वे गत्वा महेश्वरम्

svargānnirākṛtāstena vicaraṁti mahītale saśaṁkā bhayabhītāśca sarve gatvā maheśvaram

स्वर्ग से निकाले जाकर वे पृथ्वी पर भटकने लगे, शंकित और भयभीत होकर सब महेश्वर के पास गए।

श्लोक 53 (padma.6.38.53)

इंद्रेण कथितं सर्वमीश्वरस्यापि चाग्रतः । स्वर्गलोकपरिभ्रष्टा विचरंति महीतले

iṁdreṇa kathitaṁ sarvamīśvarasyāpi cāgrataḥ svargalokaparibhraṣṭā vicaraṁti mahītale

इंद्र ने ईश्वर के सामने सब कुछ कह सुनाया — 'हम स्वर्गलोक से भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर भटक रहे हैं,

श्लोक 54 (padma.6.38.54)

मर्त्येषु संस्थिता देवा न शोभंते महेश्वर । उपायं ब्रूहि मे देव ह्यमरा यांति कां गतिम्

martyeṣu saṁsthitā devā na śobhaṁte maheśvara upāyaṁ brūhi me deva hyamarā yāṁti kāṁ gatim

मृत्युलोक में स्थित देवता शोभा नहीं पाते, हे महेश्वर! मुझे कोई उपाय बताइए, हम अमर कहाँ की गति पाएँ?'

श्लोक 55 (padma.6.38.55)

महादेव उवाच ।देवराजसुरश्रेष्ठयत्रास्तेगरुडध्वजः । शरण्यश्च जगन्नाथः परित्राता परायणः

mahādeva uvāca devarājasuraśreṣṭhayatrāstegaruḍadhvajaḥ śaraṇyaśca jagannāthaḥ paritrātā parāyaṇaḥ

महादेव ने कहा — देवराज, हे सुरश्रेष्ठ! जहाँ गरुड़-ध्वजधारी विराजते हैं, जो शरणागत-वत्सल, जगन्नाथ, त्राता और परायण हैं,

श्लोक 56 (padma.6.38.56)

तत्र गच्छ सुरश्रेष्ठ स वो रक्षां विधास्यति । ईश्वरस्य वचः श्रुत्वा देवराजो महामतिः

tatra gaccha suraśreṣṭha sa vo rakṣāṁ vidhāsyati īśvarasya vacaḥ śrutvā devarājo mahāmatiḥ

वहाँ जाओ, हे सुरश्रेष्ठ! वे तुम्हारी रक्षा करेंगे। ईश्वर के वचन सुनकर, महामति देवराज,

श्लोक 57 (padma.6.38.57)

त्रिदशैः सहितो यत्र गतस्तत्र युधिष्ठिर । जलमध्ये प्रसुप्तं तं दृष्ट्वा देवं गदाधरम्

tridaśaiḥ sahito yatra gatastatra yudhiṣṭhira jalamadhye prasuptaṁ taṁ dṛṣṭvā devaṁ gadādharam

त्रिदेव-गणों सहित जहाँ गए, हे युधिष्ठिर! वहाँ जल के मध्य सोए हुए गदाधर देव को देखकर,

श्लोक 58 (padma.6.38.58)

कृतांजलिपुटो भूत्वा इंद्रः स्तोत्रमुदीरयत्

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā iṁdraḥ stotramudīrayat

अंजलि बाँधकर इंद्र ने स्तोत्र का उच्चारण किया।

श्लोक 59 (padma.6.38.59)

इंद्र उवाच ।ॐनमो देवदेवेश देवदानववंदित । दैत्यारे पुंडरीकाक्ष त्राहि नो मधुसूदन

iṁdra uvāca oṁnamo devadeveśa devadānavavaṁdita daityāre puṁḍarīkākṣa trāhi no madhusūdana

इंद्र ने कहा — ॐ, हे देवों के देव, देव-दानवों द्वारा वंदित, दैत्यों के शत्रु, कमल-नेत्र! हम मधुसूदन की रक्षा में हैं।

श्लोक 60 (padma.6.38.60)

सुराः सर्वे समायाता भयभीताश्च दानवात् । शरणं त्वां जगन्नाथ त्राहि मां भक्तवत्सल

surāḥ sarve samāyātā bhayabhītāśca dānavāt śaraṇaṁ tvāṁ jagannātha trāhi māṁ bhaktavatsala

सभी देवता दानव से भयभीत होकर आए हैं; हे जगन्नाथ! आपकी शरण में हैं, हे भक्तवत्सल! हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 61 (padma.6.38.61)

त्राहि नो देवदेवेश त्राहि त्राहि जनार्दन । त्राहि वै पुंडरीकाक्ष दानवानां विनाशक

trāhi no devadeveśa trāhi trāhi janārdana trāhi vai puṁḍarīkākṣa dānavānāṁ vināśaka

हे देवों के देव! हमारी रक्षा कीजिए, हे जनार्दन! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। हे कमल-नेत्र, दानवों के नाशक! रक्षा कीजिए।

श्लोक 62 (padma.6.38.62)

त्वत्समीपं गताः सर्वे त्वमेव शरणं प्रभो । चशरणागतानां देवानां सहायं कुरु वै प्रभो

tvatsamīpaṁ gatāḥ sarve tvameva śaraṇaṁ prabho caśaraṇāgatānāṁ devānāṁ sahāyaṁ kuru vai prabho

हम सब आपके समीप आए हैं, हे प्रभो! आप ही एकमात्र शरण हैं। हे प्रभो! शरणागत देवताओं की सहायता कीजिए।

श्लोक 63 (padma.6.38.63)

त्वं पतिस्त्वं मतिर्देव त्वं कर्ता त्वं च कारणम् । त्वं माता सर्वलोकानां त्वमेव जगतः पिता

tvaṁ patistvaṁ matirdeva tvaṁ kartā tvaṁ ca kāraṇam tvaṁ mātā sarvalokānāṁ tvameva jagataḥ pitā

हे देव! आप ही पति हैं, आप ही बुद्धि हैं, आप ही कर्ता हैं, आप ही कारण हैं। आप ही सभी लोकों की माता हैं, आप ही जगत् के पिता हैं।

श्लोक 64 (padma.6.38.64)

भगवन्देवदेवेश शरणागतवत्सल । शरणं तव चायाता भयभीताश्च देवताः

bhagavandevadeveśa śaraṇāgatavatsala śaraṇaṁ tava cāyātā bhayabhītāśca devatāḥ

हे भगवन्, देवों के देव, शरणागत-वत्सल! हम भयभीत देवता आपकी शरण में आए हैं।

श्लोक 65 (padma.6.38.65)

देवता निर्जिताः सर्वाः स्वर्गभ्रष्टाः कृताः प्रभो । अत्युग्रेण हि दैत्येन मुरनाम्ना महौजसा । इंद्रस्य वचनं श्रुत्वा विष्णुर्वचनमब्रवीत्

devatā nirjitāḥ sarvāḥ svargabhraṣṭāḥ kṛtāḥ prabho atyugreṇa hi daityena muranāmnā mahaujasā iṁdrasya vacanaṁ śrutvā viṣṇurvacanamabravīt

हे प्रभो! सभी देवता पराजित होकर स्वर्ग से निकाल दिए गए हैं, अत्यंत उग्र, अत्यंत बलशाली मुर नामक दैत्य द्वारा। इंद्र के वचन सुनकर विष्णु ने कहा —

श्लोक 66 (padma.6.38.66)

श्रीभगवानुवाच ।कीदृशो दानवः शक्र किं रूपं कीदृशं बलम् । क्व स्थानं तस्य दुष्टस्य किं वीर्यं कः पराक्रमः । किं वरं तस्य दुष्टस्य ममाख्याहि महामते

śrībhagavānuvāca kīdṛśo dānavaḥ śakra kiṁ rūpaṁ kīdṛśaṁ balam kva sthānaṁ tasya duṣṭasya kiṁ vīryaṁ kaḥ parākramaḥ kiṁ varaṁ tasya duṣṭasya mamākhyāhi mahāmate

श्रीभगवान ने कहा — हे शक्र! वह दानव कैसा है, उसका रूप कैसा है, उसका बल कैसा है? उस दुष्ट का स्थान कहाँ है, उसका पराक्रम और वीर्य कैसा है? उस दुष्ट को कौन-सा वर मिला है, यह मुझे बताओ, हे महामते!

श्लोक 67 (padma.6.38.67)

इंद्र उवाच ।पूर्वं बभूव देवेश ब्रह्मवंशसमुद्भवः । तालजंघस्तु नाम्ना च अत्युग्रोऽपि महासुरः

iṁdra uvāca pūrvaṁ babhūva deveśa brahmavaṁśasamudbhavaḥ tālajaṁghastu nāmnā ca atyugro'pi mahāsuraḥ

इंद्र ने कहा — हे देवेश! पूर्वकाल में ब्रह्म-वंश से उत्पन्न, अत्यंत उग्र, तालजंघ नामक एक महासुर हुआ।

श्लोक 68 (padma.6.38.68)

तस्य पुत्रो हि विख्यातो मुरनामेति दानवः । अत्युत्कटो महावीर्यो देवतानां भयंकरः

tasya putro hi vikhyāto muranāmeti dānavaḥ atyutkaṭo mahāvīryo devatānāṁ bhayaṁkaraḥ

उसका पुत्र मुर नामक प्रसिद्ध दानव है — अत्यंत उत्कट, महाबलशाली, देवताओं को भयभीत करने वाला।

श्लोक 69 (padma.6.38.69)

पुरी चंद्रावती नाम्ना तत्र स्थाने वसत्यसौ । निर्जिता देवताः सर्वा स्वर्गात्तेन विवासिताः

purī caṁdrāvatī nāmnā tatra sthāne vasatyasau nirjitā devatāḥ sarvā svargāttena vivāsitāḥ

चंद्रावती नाम की पुरी में वह निवास करता है; उसने सभी देवताओं को पराजित करके स्वर्ग से निर्वासित कर दिया है।

श्लोक 70 (padma.6.38.70)

इंद्रोऽन्यो रोपितस्तेन वातश्चैव हुताशनः । चंद्रसूर्यो कृतौ चान्यौ वायुर्वरुण एव च

iṁdro'nyo ropitastena vātaścaiva hutāśanaḥ caṁdrasūryo kṛtau cānyau vāyurvaruṇa eva ca

उसने दूसरा इंद्र, वायु और अग्नि नियुक्त किए हैं; उसने दूसरे चंद्रमा और सूर्य भी बना डाले हैं, तथा वायु और वरुण भी।

श्लोक 71 (padma.6.38.71)

सर्वमात्मकृतं तेन सत्यं सत्यं जनार्दन । देवलोकः कृतस्तेन सर्वस्थानविवर्जितः

sarvamātmakṛtaṁ tena satyaṁ satyaṁ janārdana devalokaḥ kṛtastena sarvasthānavivarjitaḥ

हे जनार्दन! सब कुछ उसने अपने वश में कर लिया है, सत्य है, सत्य ही है। उसने देवलोक को समस्त स्थानों से रहित कर दिया है।

श्लोक 72 (padma.6.38.72)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कोपमानो जनार्दनः । हनिष्ये दानवं दुष्टं देवतानां भयंकरम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā kopamāno janārdanaḥ haniṣye dānavaṁ duṣṭaṁ devatānāṁ bhayaṁkaram

उसका यह वचन सुनकर क्रोधित होकर जनार्दन ने कहा — 'देवताओं को भयभीत करने वाले उस दुष्ट दानव का मैं वध करूँगा।'

श्लोक 73 (padma.6.38.73)

त्रिदशैः सहितो देवो गतश्चंद्रावतीं पुरीम् । दृष्टो देवैस्तु दैत्येंद्रो गर्जमानः पुनः पुनः

tridaśaiḥ sahito devo gataścaṁdrāvatīṁ purīm dṛṣṭo devaistu daityeṁdro garjamānaḥ punaḥ punaḥ

त्रिदेव-गणों सहित देव चंद्रावती नगरी में गए; देवताओं ने बार-बार गर्जना करते हुए दैत्येंद्र को देखा।

श्लोक 74 (padma.6.38.74)

तेन सर्वे जिता देव गताश्चैव दिशो दश । हरिं निरीक्ष्य प्रोवाच तिष्ठतिष्ठेति दानवः

tena sarve jitā deva gatāścaiva diśo daśa hariṁ nirīkṣya provāca tiṣṭhatiṣṭheti dānavaḥ

उसने सभी देवताओं को जीतकर दसों दिशाओं में भगा दिया था; हरि को देखकर वह दानव बार-बार 'रुको, रुको' कहने लगा।

श्लोक 75 (padma.6.38.75)

भगवानब्रवीत्तं च क्रोधसंरक्तलोचनः । श्रीभगवानुवाच ।रे दानव दुराचार मम बाहुं निरीक्षय

bhagavānabravīttaṁ ca krodhasaṁraktalocanaḥ śrībhagavānuvāca re dānava durācāra mama bāhuṁ nirīkṣaya

क्रोध से रक्त हुए नेत्रों वाले भगवान ने उससे कहा — श्रीभगवान ने कहा — 'रे दुराचारी दानव! मेरी भुजा को देख।'

श्लोक 76 (padma.6.38.76)

ततस्ते सम्मुखाः सर्वे विष्णुना दुष्टदानवाः । हता बाणैः पुनर्दिव्यैर्जाताश्च भयविह्वलाः

tataste sammukhāḥ sarve viṣṇunā duṣṭadānavāḥ hatā bāṇaiḥ punardivyairjātāśca bhayavihvalāḥ

फिर वे सभी दुष्ट दानव विष्णु के सामने आ गए; दिव्य बाणों से मारे जाकर वे फिर से भय से विह्वल हो गए।

श्लोक 77 (padma.6.38.77)

चक्रं मुक्तं च कृष्णेन दैत्यसैन्येषु पांडव । तेनच्छिन्नास्तु शतशो बहवो निधनं गताः

cakraṁ muktaṁ ca kṛṣṇena daityasainyeṣu pāṁḍava tenacchinnāstu śataśo bahavo nidhanaṁ gatāḥ

हे पांडव! कृष्ण ने दैत्य-सेना पर चक्र छोड़ा; उससे सैकड़ों काटे जाकर बहुत से मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 78 (padma.6.38.78)

एकोपि दानवस्तत्र युध्यमानो मुहुर्मुहुः । नष्टाः सर्वे सुरास्तेन निर्जितो मधुसूदनः

ekopi dānavastatra yudhyamāno muhurmuhuḥ naṣṭāḥ sarve surāstena nirjito madhusūdanaḥ

वहाँ अकेला दानव भी बार-बार युद्ध करता रहा; सभी देवता उससे पराजित हो गए, मधुसूदन भी वहाँ पराजित हो गए।

श्लोक 79 (padma.6.38.79)

निर्जितं तेन दैत्येन बाहुयुद्धमजायत । बाहुयुद्धं कृतं तेन दिव्यं वर्षसहस्रकम्

nirjitaṁ tena daityena bāhuyuddhamajāyata bāhuyuddhaṁ kṛtaṁ tena divyaṁ varṣasahasrakam

उस दैत्य से पराजित होकर, भुजाओं का युद्ध हुआ; उसने एक हज़ार दिव्य वर्षों तक भुजा-युद्ध किया।

श्लोक 80 (padma.6.38.80)

विष्णुश्चिंतां प्रपन्नश्च नष्टाः सर्वाश्च देवताः । विष्णुश्च निर्जितस्तेन गतो बदरिकाश्रमम्

viṣṇuściṁtāṁ prapannaśca naṣṭāḥ sarvāśca devatāḥ viṣṇuśca nirjitastena gato badarikāśramam

विष्णु चिंतामग्न हो गए, सभी देवता पराजित हो गए; विष्णु भी उससे पराजित होकर बदरिकाश्रम को चले गए।

श्लोक 81 (padma.6.38.81)

गुहा सिंहावती नाम तत्र सुप्तो जनार्दनः । योजनद्वादशवती एकद्वारा च पांडव

guhā siṁhāvatī nāma tatra supto janārdanaḥ yojanadvādaśavatī ekadvārā ca pāṁḍava

सिंहावती नाम की एक गुफा में जनार्दन सो गए; हे पांडव! वह गुफा बारह योजन लंबी थी और उसका केवल एक द्वार था।

श्लोक 82 (padma.6.38.82)

तस्यां विष्टः प्रसुप्तश्च दानवो हंतुमुद्यतः । महायुद्धेन तेनैव श्रांतोऽसौ योगमायया

tasyāṁ viṣṭaḥ prasuptaśca dānavo haṁtumudyataḥ mahāyuddhena tenaiva śrāṁto'sau yogamāyayā

उसमें प्रवेश करके सोए हुए उन्हें मारने के लिए दानव तत्पर हुआ; उस महायुद्ध से वह योगमाया के कारण थका हुआ था।

श्लोक 83 (padma.6.38.83)

दानवः पृष्ठतो लग्नो प्रविष्टः स तदा गुहाम् । प्रसुप्तं तत्र मां दृष्ट्वा दानवो हर्षमागतः

dānavaḥ pṛṣṭhato lagno praviṣṭaḥ sa tadā guhām prasuptaṁ tatra māṁ dṛṣṭvā dānavo harṣamāgataḥ

दानव पीछे से लगकर उस गुफा में प्रविष्ट हुआ; वहाँ मुझे सोया हुआ देखकर दानव हर्षित हो गया।

श्लोक 84 (padma.6.38.84)

इत्थं मां निर्जितं मत्वा प्रविष्टं शंकया हरिम् । निःसंदेहं हनिष्यामि दानवानां भयंकरम्

itthaṁ māṁ nirjitaṁ matvā praviṣṭaṁ śaṁkayā harim niḥsaṁdehaṁ haniṣyāmi dānavānāṁ bhayaṁkaram

मुझे इस प्रकार पराजित मानकर, शंकावश गुफा में प्रविष्ट हरि को देखकर, वह सोचने लगा — 'देवताओं को भयभीत करने वाले इस हरि को मैं निःसंदेह मार डालूँगा।'

श्लोक 85 (padma.6.38.85)

निर्गता कन्यका तत्र विष्णुदेहाद्युधिष्ठिर । रूपवती सुसौभाग्या दिव्यप्रहरणायुधा

nirgatā kanyakā tatra viṣṇudehādyudhiṣṭhira rūpavatī susaubhāgyā divyapraharaṇāyudhā

हे युधिष्ठिर! उसी समय विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई — रूपवती, सुभाग्यवती, दिव्य आयुध-शस्त्रों से युक्त।

श्लोक 86 (padma.6.38.86)

तस्य तेजोंऽशसंभूता महाबलपराक्रमा । दृष्टा सा दानवेंद्रेण मुरनाम्ना धनंजय

tasya tejoṁ'śasaṁbhūtā mahābalaparākramā dṛṣṭā sā dānaveṁdreṇa muranāmnā dhanaṁjaya

हे धनंजय! उनके तेज के अंश से उत्पन्न, महाबल और पराक्रम से युक्त उस कन्या को मुर नामक दानवेंद्र ने देखा।

श्लोक 87 (padma.6.38.87)

युद्धं समाहितं तेन स्त्रिया चैव प्रयाचितम् । कन्यका युध्यते तत्र सर्वयुद्धविशारदा

yuddhaṁ samāhitaṁ tena striyā caiva prayācitam kanyakā yudhyate tatra sarvayuddhaviśāradā

उसने उस स्त्री से ही युद्ध की याचना की और युद्ध ठान लिया; कन्या ने वहाँ युद्ध किया, वह सभी युद्ध-विद्याओं में निपुण थी।

श्लोक 88 (padma.6.38.88)

हुंकारैर्भस्मसाज्जातो मुर नामा महासुरः । निहते दानवे तस्मिंस्तत्र देवस्त्वबुध्यत

huṁkārairbhasmasājjāto mura nāmā mahāsuraḥ nihate dānave tasmiṁstatra devastvabudhyata

हुंकार-मात्र से मुर नामक महासुर भस्म हो गया; उस दानव के मारे जाने पर, वहाँ देव जाग उठे।

श्लोक 89 (padma.6.38.89)

पतितं दानवं दृष्ट्वा ततो विस्मयमागतः । केनायं च हतो रौद्रो ह्यत्युग्रो मम शात्रवः

patitaṁ dānavaṁ dṛṣṭvā tato vismayamāgataḥ kenāyaṁ ca hato raudro hyatyugro mama śātravaḥ

गिरे हुए दानव को देखकर वे विस्मित हो गए — 'यह अत्यंत उग्र और भयंकर, मेरा शत्रु किसके द्वारा मारा गया?

श्लोक 90 (padma.6.38.90)

अत्युग्रं च कृतं कर्म मम कारुण्यतः कृतम् । कन्योवाच ।तेन देवाश्च गंधर्वा सयक्षोरगराक्षसाः

atyugraṁ ca kṛtaṁ karma mama kāruṇyataḥ kṛtam kanyovāca tena devāśca gaṁdharvā sayakṣoragarākṣasāḥ

मेरी करुणा से ही ऐसा अत्यंत उग्र कर्म संपन्न हुआ है।' कन्या ने कहा — 'उसने देवताओं, गंधर्वों, यक्षों, नागों और राक्षसों को,

श्लोक 91 (padma.6.38.91)

इंद्राद्याः सकला जित्वा स्वर्गाच्चैव निराकृताः । हरिः सुप्तो मया दृष्टो मुरः पृष्ठे समागतः

iṁdrādyāḥ sakalā jitvā svargāccaiva nirākṛtāḥ hariḥ supto mayā dṛṣṭo muraḥ pṛṣṭhe samāgataḥ

इंद्र आदि सभी को जीतकर स्वर्ग से निर्वासित कर दिया था। मैंने सोए हुए हरि को देखा, तब मुर पीछे से आया।

श्लोक 92 (padma.6.38.92)

संहरिष्यति त्रैलोक्यं सुप्ते चैव जर्नादने । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुर्वचनमब्रवीत्

saṁhariṣyati trailokyaṁ supte caiva jarnādane tasyāstadvacanaṁ śrutvā viṣṇurvacanamabravīt

'जनार्दन के सोए रहने पर वह तीनों लोकों का संहार कर देता।' उसका यह वचन सुनकर विष्णु ने कहा —

श्लोक 93 (padma.6.38.93)

अहं च निर्जितो येन कथं सोऽपि त्वया जितः । एकादश्युवाच ।त्वत्प्रसादाच्च भो स्वामिन्महादैत्यो मया हतः

ahaṁ ca nirjito yena kathaṁ so'pi tvayā jitaḥ ekādaśyuvāca tvatprasādācca bho svāminmahādaityo mayā hataḥ

'मैं जिससे पराजित हुआ, वह तुमसे कैसे जीता गया?' एकादशी ने कहा — 'हे स्वामिन्! आपके ही प्रसाद से मैंने उस महादैत्य को मारा है।'

श्लोक 94 (padma.6.38.94)

श्रीभगवानुवाच ।आनंदं त्रिषु लोकेषु मुनयो देवता गताः । ब्रूहि त्वं च मया भद्रे यत्ते मनसि रोचते । ददामि च न संदेहो यत्सुरैरपि दुर्ल्लभम्

śrībhagavānuvāca ānaṁdaṁ triṣu lokeṣu munayo devatā gatāḥ brūhi tvaṁ ca mayā bhadre yatte manasi rocate dadāmi ca na saṁdeho yatsurairapi durllabham

श्रीभगवान ने कहा — तीनों लोकों में मुनि और देवता आनंद को प्राप्त हुए। 'हे भद्रे! तुम मुझसे कहो, जो तुम्हारे मन को भाए; मैं निःसंदेह दूँगा, जो देवताओं को भी दुर्लभ है।'

श्लोक 95 (padma.6.38.95)

एकादश्युवाच ।यदि तुष्टोऽसि मे देव सत्यमुक्तं जनार्दन । वरमेकं तु वांच्छामि हृदये च जगत्पते

ekādaśyuvāca yadi tuṣṭo'si me deva satyamuktaṁ janārdana varamekaṁ tu vāṁcchāmi hṛdaye ca jagatpate

एकादशी ने कहा — 'यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे देव, हे जनार्दन! मैं सच कहूँ — मैं एक ही वर चाहती हूँ, हृदय से, हे जगत्पते!

श्लोक 96 (padma.6.38.96)

प्रार्थयामि च देवेश ईप्सितं च मया प्रभो । यदि सत्यं जगन्नाथ तिस्रो वाचो ददासि मे

prārthayāmi ca deveśa īpsitaṁ ca mayā prabho yadi satyaṁ jagannātha tisro vāco dadāsi me

मैं वह प्रार्थना करती हूँ, हे देवेश, जो मुझे इच्छित है, हे प्रभो! यदि सच में, हे जगन्नाथ! आप मुझे तीन वचन देते हैं...'

श्लोक 97 (padma.6.38.97)

श्रीभगवानुवाच ।सत्यं सत्यं मया प्रोक्तं अवश्यं तव सुव्रते । तिस्रो वाचो मया दत्ता न चावाक्यं भवेदिह

śrībhagavānuvāca satyaṁ satyaṁ mayā proktaṁ avaśyaṁ tava suvrate tisro vāco mayā dattā na cāvākyaṁ bhavediha

श्रीभगवान ने कहा — 'सत्य, सत्य ही मैंने कहा है, हे उत्तम व्रत वाली! अवश्य ही तुम्हें तीन वचन मैंने दिए हैं, यहाँ मेरा वचन असत्य नहीं होगा।'

श्लोक 98 (padma.6.38.98)

एकादश्युवाच ।त्रिभुवनेषु च देवेश चतुर्युगेषु सांप्रतम् । त्रिषु लोकेषु सर्वत्र तादृशं कुरु मे प्रभो

ekādaśyuvāca tribhuvaneṣu ca deveśa caturyugeṣu sāṁpratam triṣu lokeṣu sarvatra tādṛśaṁ kuru me prabho

एकादशी ने कहा — 'हे देवेश! तीनों लोकों में, चारों युगों में, अभी और सदा, तीनों लोकों में सर्वत्र वैसा ही मेरे लिए कीजिए, हे प्रभो —

श्लोक 99 (padma.6.38.99)

सर्वतीर्थप्रधानं हि सर्वविघ्नविनाशिनी । सर्वसिद्धिकरी देवी त्वत्प्रसादाद्भवाम्यहम्

sarvatīrthapradhānaṁ hi sarvavighnavināśinī sarvasiddhikarī devī tvatprasādādbhavāmyaham

मैं सभी तीर्थों में प्रधान, सभी विघ्नों का नाश करने वाली, सभी सिद्धियाँ देने वाली देवी बनूँ, आपकी कृपा से।

श्लोक 100 (padma.6.38.100)

मामुपोष्यंति ये भक्त्या तव भक्त्या जनार्दन । सर्वसिद्धिर्भवेत्तेषां यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो

māmupoṣyaṁti ye bhaktyā tava bhaktyā janārdana sarvasiddhirbhavetteṣāṁ yadi tuṣṭo'si me prabho

जो भक्तिपूर्वक मेरा उपवास करते हैं, आपकी ही भक्ति से, हे जनार्दन! उन सभी को सिद्धि प्राप्त हो, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे प्रभो!

श्लोक 101 (padma.6.38.101)

उपवासं च नक्तं च एकभक्तं करोति च । तस्य वित्तं च धर्मं च मोक्षं वै देहि माधव

upavāsaṁ ca naktaṁ ca ekabhaktaṁ karoti ca tasya vittaṁ ca dharmaṁ ca mokṣaṁ vai dehi mādhava

'जो उपवास, नक्त-भोजन और एक-भुक्त करता है, उसे धन, धर्म और मोक्ष प्रदान कीजिए, हे माधव!'

श्लोक 102 (padma.6.38.102)

विष्णुरुवाच । यत्त्वं वदसि कल्याणि तत्सर्वं च भविष्यति । सर्वान्मनोरथान्भद्रे दास्यसि त्वं च नान्यथा

viṣṇuruvāca yattvaṁ vadasi kalyāṇi tatsarvaṁ ca bhaviṣyati sarvānmanorathānbhadre dāsyasi tvaṁ ca nānyathā

विष्णु ने कहा — 'हे कल्याणी! तुम जो कहती हो, वह सब वैसा ही होगा। हे भद्रे! तुम सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करोगी, और कुछ भी अन्यथा नहीं होगा।'

श्लोक 103 (padma.6.38.103)

मम भक्ताश्च ये लोके ये च भक्तास्तु कार्त्तिके । चतुर्युगेषु विख्यातास्त्रिषु लोकेषु वै प्रभो

mama bhaktāśca ye loke ye ca bhaktāstu kārttike caturyugeṣu vikhyātāstriṣu lokeṣu vai prabho

'लोक में जो मेरे भक्त हैं, और जो कार्तिक-मास में भक्त हैं, चारों युगों में विख्यात, तीनों लोकों में, हे प्रभो —

श्लोक 104 (padma.6.38.104)

त्वां च शक्तिमहं मन्ये एकादशीव्रतस्थिताः । मम पूजां करिष्यंति मोक्षगास्ते न संशयः

tvāṁ ca śaktimahaṁ manye ekādaśīvratasthitāḥ mama pūjāṁ kariṣyaṁti mokṣagāste na saṁśayaḥ

मैं तुम्हें शक्ति-रूप मानता हूँ, जो एकादशी-व्रत में स्थित रहते हैं। वे मेरी पूजा करते हुए मोक्ष को प्राप्त करेंगे, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 105 (padma.6.38.105)

तृतीया चाष्टमी चैव नवमी च चतुर्दशी । एकादशी विशेषेण तिथिरेषा हरिप्रिया । सर्वतीर्थाधिकं पुण्यं सत्यं सत्यं न संशयः

tṛtīyā cāṣṭamī caiva navamī ca caturdaśī ekādaśī viśeṣeṇa tithireṣā haripriyā sarvatīrthādhikaṁ puṇyaṁ satyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ

तृतीया, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी — इनमें विशेष रूप से एकादशी, यह हरि-प्रिय तिथि, सभी तीर्थों से अधिक पुण्यमयी है, सत्य है, सत्य ही है, संदेह नहीं।

श्लोक 106 (padma.6.38.106)

इदं दत्त्वा वरं तस्यै तिस्रो वाचो न संशयः । हृष्टा पुष्टा च संजाता एकादशीमहाव्रता

idaṁ dattvā varaṁ tasyai tisro vāco na saṁśayaḥ hṛṣṭā puṣṭā ca saṁjātā ekādaśīmahāvratā

यह वर देकर उसे तीन वचन दिए गए, संदेह नहीं; प्रसन्न और तृप्त होकर एकादशी महाव्रता उत्पन्न हुई —

श्लोक 107 (padma.6.38.107)

शत्रुं हंसि परां तस्य ददासि परमां गतिम् । त्वं हंसि सर्वविघ्नानि सर्वसिद्धिवरप्रदा

śatruṁ haṁsi parāṁ tasya dadāsi paramāṁ gatim tvaṁ haṁsi sarvavighnāni sarvasiddhivarapradā

'तुम शत्रुओं का महान् नाश करती हो, परम गति देती हो; तुम सभी विघ्नों को हरने वाली, सभी सिद्धियाँ और वर देने वाली हो।'

श्लोक 108 (padma.6.38.108)

उभयोः पक्षयोः पार्थ तुल्या एकादशी शुभा । न शुक्ला नैव कृष्णा च विभेदं नैव कारयेत्

ubhayoḥ pakṣayoḥ pārtha tulyā ekādaśī śubhā na śuklā naiva kṛṣṇā ca vibhedaṁ naiva kārayet

हे पार्थ! दोनों पक्षों की एकादशी समान रूप से शुभ है; शुक्ल और कृष्ण में भेद नहीं करना चाहिए।

श्लोक 109 (padma.6.38.109)

विभेदो नैव कर्त्तव्यः समस्तव्रतकारिभिः । दिवा वा यदि वा रात्रौ शृणोति भक्तितत्परः

vibhedo naiva karttavyaḥ samastavratakāribhiḥ divā vā yadi vā rātrau śṛṇoti bhaktitatparaḥ

सभी व्रत करने वालों को कोई भेद नहीं करना चाहिए। दिन में या रात्रि में, जो भक्तिपरायण होकर सुनता है,

श्लोक 110 (padma.6.38.110)

तिथिरेका भवेत्सर्वा पक्षयोरुभयोरपि । उभयैकादशी स्वल्पा ह्यंते चैव त्रयोदशी

tithirekā bhavetsarvā pakṣayorubhayorapi ubhayaikādaśī svalpā hyaṁte caiva trayodaśī

दोनों पक्षों में तिथि एक ही समान हो जाती है। दोनों एकादशी छोटी हों तो अंत में त्रयोदशी होती है,

श्लोक 111 (padma.6.38.111)

मध्ये तु द्वादशी पूर्णा त्रिस्पृशा सा हरिप्रिया । एकामुपोषयेत्तां वै सहस्रैकादशीफलम्

madhye tu dvādaśī pūrṇā trispṛśā sā haripriyā ekāmupoṣayettāṁ vai sahasraikādaśīphalam

मध्य में पूर्ण द्वादशी होती है, वह त्रिस्पृशा हरि-प्रिय है। उस एक का उपवास करने से सहस्र एकादशियों का फल मिलता है।

श्लोक 112 (padma.6.38.112)

सहस्रगुणितं ह्येवं द्वादश्यां पारणे कृते । अष्टम्येकादशी षष्ठी तृतीया च चतुर्दशी

sahasraguṇitaṁ hyevaṁ dvādaśyāṁ pāraṇe kṛte aṣṭamyekādaśī ṣaṣṭhī tṛtīyā ca caturdaśī

इस प्रकार सहस्र-गुणित फल तब मिलता है जब द्वादशी को पारण किया जाता है। अष्टमी, एकादशी, षष्ठी, तृतीया और चतुर्दशी —

श्लोक 113 (padma.6.38.113)

पूर्वविद्धा न कर्तव्या परविद्धामुपोषयेत् । एकादशी ह्यहोरात्रं प्रभाते घटिका भवेत्

pūrvaviddhā na kartavyā paraviddhāmupoṣayet ekādaśī hyahorātraṁ prabhāte ghaṭikā bhavet

पूर्व-वेधा नहीं करनी चाहिए, पर-वेधा का उपवास करना चाहिए। एकादशी अहोरात्र होकर प्रातःकाल में घटिका-मात्र भी हो,

श्लोक 114 (padma.6.38.114)

सा तिथिः परिहर्तव्या उपोष्या द्वादशीयुता । एवंविधा मया प्रोक्ता पक्षयोरुभयोरपि

sā tithiḥ parihartavyā upoṣyā dvādaśīyutā evaṁvidhā mayā proktā pakṣayorubhayorapi

वह तिथि छोड़ देनी चाहिए, द्वादशी-युक्त का उपवास करना चाहिए। इस प्रकार मैंने दोनों पक्षों के लिए यह बताया है।

श्लोक 115 (padma.6.38.115)

एकादश्यां प्रकुर्वीत ह्युपवासं न संशयः । ते यांति वैष्णवं स्थानं यत्रास्ते गरुडध्वजः

ekādaśyāṁ prakurvīta hyupavāsaṁ na saṁśayaḥ te yāṁti vaiṣṇavaṁ sthānaṁ yatrāste garuḍadhvajaḥ

एकादशी को उपवास करना चाहिए, इसमें संदेह नहीं। वे उस वैष्णव स्थान को जाते हैं, जहाँ गरुड़-ध्वजधारी विराजते हैं।

श्लोक 116 (padma.6.38.116)

धन्यास्ते मानवा लोके विष्णुभक्तिपरायणाः । एकादश्याश्च माहात्म्यं सर्वकालेषु यः पठेत्

dhanyāste mānavā loke viṣṇubhaktiparāyaṇāḥ ekādaśyāśca māhātmyaṁ sarvakāleṣu yaḥ paṭhet

वे मनुष्य संसार में धन्य हैं, जो विष्णु-भक्ति में परायण हैं। जो सदैव एकादशी की महिमा पढ़ता है,

श्लोक 117 (padma.6.38.117)

गोसहस्रफलं सोऽपि पुण्यं प्राप्नोति मानवः । दिवा वा यदि वा रात्रौ ये वै शृण्वंति भक्तितः

gosahasraphalaṁ so'pi puṇyaṁ prāpnoti mānavaḥ divā vā yadi vā rātrau ye vai śṛṇvaṁti bhaktitaḥ

वह मनुष्य भी सहस्र गायों के दान का पुण्य प्राप्त करता है। दिन में या रात्रि में जो भक्तिपूर्वक सुनते हैं,

श्लोक 118 (padma.6.38.118)

ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यंते नात्र संशयः । विष्णुधर्मसमं नास्ति गीतार्थं च नृपोत्तम । एकादशीसमं नास्ति व्रतं पापप्रणाशनम्

brahmahatyādipāpebhyo mucyaṁte nātra saṁśayaḥ viṣṇudharmasamaṁ nāsti gītārthaṁ ca nṛpottama ekādaśīsamaṁ nāsti vrataṁ pāpapraṇāśanam

वे ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। हे नृपोत्तम! विष्णु-धर्म के समान गीता-अर्थ कुछ नहीं है; एकादशी के समान पाप-नाशक व्रत कुछ नहीं है।

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