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उत्तर खण्ड · अध्याय 4

वृंदा-विवाह और जालंधर-अभिषेक

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (padma.6.4.1)

नारद उवाच ।क्रमेण वर्द्धमानोऽसौ बाल्यभावे स बालकः । निपत्य मारुतोत्संगे सागरं प्रति धावति

nārada uvāca krameṇa varddhamāno'sau bālyabhāve sa bālakaḥ nipatya mārutotsaṁge sāgaraṁ prati dhāvati

नारद जी ने कहा — वह बालक क्रमशः बढ़ता हुआ, बाल्यावस्था में ही वायु की गोद में कूदकर सागर की ओर दौड़ पड़ता था।

श्लोक 2 (padma.6.4.2)

आनीय चक्रे स च पंजरस्थान्क्रीडापरः केसरिणां किशोरान् । सिंहादिनेभादिनि युद्धमेवं युधोपयोगीव तदीय वीर्यम्

ānīya cakre sa ca paṁjarasthānkrīḍāparaḥ kesariṇāṁ kiśorān siṁhādinebhādini yuddhamevaṁ yudhopayogīva tadīya vīryam

वह खेल-खेल में पिंजरों में बंद सिंह-शावकों को मँगवाकर सिंह और गज आदि में युद्ध कराता था, मानो उसका बल भी उसी युद्ध के योग्य हो।

श्लोक 3 (padma.6.4.3)

तस्मादाकाशमुत्पत्य खेचरान्पातयेद्भुवि । गर्जितैर्भीषयामास स्वर्गं हि सह सागरम्

tasmādākāśamutpatya khecarānpātayedbhuvi garjitairbhīṣayāmāsa svargaṁ hi saha sāgaram

वहाँ से आकाश में उड़कर वह खेचरों (आकाशचारियों) को पृथ्वी पर गिरा देता था; अपनी गर्जना से वह सागर सहित स्वर्ग को भी भयभीत कर देता था।

श्लोक 4 (padma.6.4.4)

समुद्रांतर्गतं सर्वं सत्वजातं तु पार्थिव । ग्रस्तं सिंधुसुतेनेति तद्भयाच्छन्नतां गतम्

samudrāṁtargataṁ sarvaṁ satvajātaṁ tu pārthiva grastaṁ siṁdhusuteneti tadbhayācchannatāṁ gatam

हे राजन्! सागर के भीतर के सभी प्राणी यह सोचकर कि 'हम सागर-पुत्र द्वारा निगले जा रहे हैं', उसके भय से छिप गए।

श्लोक 5 (padma.6.4.5)

दृष्ट्वा निःसत्वकं तोयं तद्भयाद्वडवानलः । निजदेशं परित्यज्य प्रविवेश हिमालयम्

dṛṣṭvā niḥsatvakaṁ toyaṁ tadbhayādvaḍavānalaḥ nijadeśaṁ parityajya praviveśa himālayam

जल को प्राणियों से रहित देखकर, उसी के भय से वडवाग्नि (समुद्री अग्नि) ने अपना स्थान त्यागकर हिमालय में प्रवेश कर लिया।

श्लोक 6 (padma.6.4.6)

स बालत्वं परित्यज्य क्रमेणार्णवनंदनः । ततो नवं वयः प्राप्य विक्रमेणाक्रमद्दिवम्

sa bālatvaṁ parityajya krameṇārṇavanaṁdanaḥ tato navaṁ vayaḥ prāpya vikrameṇākramaddivam

वह सागर-पुत्र क्रमशः बाल्यावस्था त्यागकर, नई युवावस्था पाकर, अपने पराक्रम से स्वर्ग पर भी आक्रमण करने लगा।

श्लोक 7 (padma.6.4.7)

एकदा पितरं प्राह समुद्रं सिंधुनंदनः । मन्निवासोचितं स्थानं देहि तातातिविस्तृतम्

ekadā pitaraṁ prāha samudraṁ siṁdhunaṁdanaḥ mannivāsocitaṁ sthānaṁ dehi tātātivistṛtam

एक बार सागर-पुत्र ने अपने पिता समुद्र से कहा — 'हे तात! मेरे निवास योग्य कोई अत्यंत विस्तृत स्थान मुझे दीजिए।'

श्लोक 8 (padma.6.4.8)

संबुद्ध्य वचनं सूनोः स जगाद महार्णवः । पुत्र दास्याम्यहं राज्यं तव वा भुवि दुर्ल्लभम्

saṁbuddhya vacanaṁ sūnoḥ sa jagāda mahārṇavaḥ putra dāsyāmyahaṁ rājyaṁ tava vā bhuvi durllabham

पुत्र की यह बात सुनकर महासागर ने कहा — 'हे पुत्र! मैं तुम्हें ऐसा राज्य दूँगा जो पृथ्वी पर दुर्लभ हो।'

श्लोक 9 (padma.6.4.9)

अनंतरं दैत्यगुरुः समुद्रं भार्गवो गतः । तमागतं विलोक्याब्धिर्विधिना समपूजयत्

anaṁtaraṁ daityaguruḥ samudraṁ bhārgavo gataḥ tamāgataṁ vilokyābdhirvidhinā samapūjayat

इसी बीच दैत्यगुरु भार्गव (शुक्राचार्य) समुद्र के पास गए; उन्हें आया देख सागर ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया।

श्लोक 10 (padma.6.4.10)

अथ नदिपतिदत्ते प्राप्तसौंदर्यनिर्यन्मणिमहसि स तस्मिन्नासने सन्निविष्टः । रुचिररुचि सुमेरोः सुंदरे शृंगभागे कमलजइव कांतिं किंचिदुच्चैर्जहार

atha nadipatidatte prāptasauṁdaryaniryanmaṇimahasi sa tasminnāsane sanniviṣṭaḥ ruciraruci sumeroḥ suṁdare śṛṁgabhāge kamalajaiva kāṁtiṁ kiṁciduccairjahāra

नदियों के स्वामी (सागर) द्वारा दिए गए, अपनी आभा से मणियों को भी लजाने वाले उस आसन पर बैठे हुए, वे सुमेरु के सुंदर शिखर-भाग पर मानो ब्रह्मा के समान कुछ अधिक ही शोभा हर ले गए।

श्लोक 11 (padma.6.4.11)

कृतांजलिपुटो भूत्वा व्याजहारार्णवः कविम् । दिष्ट्या तवात्रागमनं वद किं करवाण्यहम्

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vyājahārārṇavaḥ kavim diṣṭyā tavātrāgamanaṁ vada kiṁ karavāṇyaham

हाथ जोड़कर समुद्र ने उस कवि (शुक्राचार्य) से कहा — 'सौभाग्य से आपका यहाँ आगमन हुआ है; बताइए, मैं क्या करूँ?'

श्लोक 12 (padma.6.4.12)

तदा दैत्यकुलाचार्यः प्राह तं सागरं कविः । किं तेन जातु जातेन मातुर्यौवनहारिणा

tadā daityakulācāryaḥ prāha taṁ sāgaraṁ kaviḥ kiṁ tena jātu jātena māturyauvanahāriṇā

तब दैत्यकुल के आचार्य उस बुद्धिमान (शुक्र) ने सागर से कहा — 'ऐसे पुत्र के जन्म से क्या लाभ जो केवल माता के यौवन को हर ले?

श्लोक 13 (padma.6.4.13)

प्ररोहति नयः स्वस्य वंशस्याग्रे ध्वजो यथा । तवात्मजो विक्रमेण त्रैलोक्यं भोक्ष्यति ध्रुवम्

prarohati nayaḥ svasya vaṁśasyāgre dhvajo yathā tavātmajo vikrameṇa trailokyaṁ bhokṣyati dhruvam

अपने वंश की नीति ही उसके आगे ध्वजा की भाँति फलती-फूलती है; आपका पुत्र निश्चय ही अपने पराक्रम से तीनों लोकों का भोग करेगा।

श्लोक 14 (padma.6.4.14)

जंबूद्वीपे महापीठं योगिनीगणसेवितम् । आप्लावितं त्वयेदानीं मुंच जालंधरालयम्

jaṁbūdvīpe mahāpīṭhaṁ yoginīgaṇasevitam āplāvitaṁ tvayedānīṁ muṁca jālaṁdharālayam

जंबूद्वीप में योगिनी-गणों से सेवित एक महापीठ है, जिसे अभी आपने डुबो रखा है — उसे जालंधर के निवास के लिए मुक्त कीजिए।

श्लोक 15 (padma.6.4.15)

तत्र राज्यं प्रयच्छास्मै तनयाय महार्णव । अजेयश्चाप्यवध्यश्च तत्रस्थोऽयं भविष्यति

tatra rājyaṁ prayacchāsmai tanayāya mahārṇava ajeyaścāpyavadhyaśca tatrastho'yaṁ bhaviṣyati

हे महासागर! अपने इस पुत्र को वहाँ राज्य दीजिए; वहाँ स्थित होकर यह अजेय और अवध्य हो जाएगा।'

श्लोक 16 (padma.6.4.16)

एवमुक्तोऽर्णवः प्रीत्या भार्गवेणाथ लीलया । अपासर्पत्सुतप्रीत्यै जले स्थलमदर्शयत्

evamukto'rṇavaḥ prītyā bhārgaveṇātha līlayā apāsarpatsutaprītyai jale sthalamadarśayat

भार्गव के प्रेमपूर्वक ऐसा कहने पर सागर ने पुत्र-प्रेम से लीलापूर्वक जल हटाकर वहाँ स्थल प्रकट कर दिया।

श्लोक 17 (padma.6.4.17)

शतयोजनविस्तीर्णमायतं च शतत्रयम् । देशं जालंधरं पुण्यं तस्य नाम्नैव विश्रुतम्

śatayojanavistīrṇamāyataṁ ca śatatrayam deśaṁ jālaṁdharaṁ puṇyaṁ tasya nāmnaiva viśrutam

सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन लंबा वह पुण्य देश उसी के नाम से 'जालंधर' के नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 18 (padma.6.4.18)

दैत्यवर्यं समाहूय मयं प्रोवाच सागरः । पुरं जालंधरे पीठे कुरु जालंधराय वै

daityavaryaṁ samāhūya mayaṁ provāca sāgaraḥ puraṁ jālaṁdhare pīṭhe kuru jālaṁdharāya vai

सागर ने दैत्यों में श्रेष्ठ मय (शिल्पी) को बुलाकर कहा — 'जालंधर-पीठ में जालंधर के लिए नगर बनाओ।'

श्लोक 19 (padma.6.4.19)

अंभोधिनैवमुक्तस्तु चक्रे रत्नमयं पुरम् । प्राकारगोपुरद्वारं सोपानगृहभूमिकम्

aṁbhodhinaivamuktastu cakre ratnamayaṁ puram prākāragopuradvāraṁ sopānagṛhabhūmikam

सागर के ऐसा कहने पर उसने रत्नों से बना, प्राकार-गोपुर-द्वार, सीढ़ियों और भवनों की भूमियों से युक्त नगर बनाया।

श्लोक 20 (padma.6.4.20)

यत्रेंद्रनीलसंबद्धप्रासादतल संस्थिताः । मेनिरे जलदोद्योगं तांडवस्थाः शिखंडिनः

yatreṁdranīlasaṁbaddhaprāsādatala saṁsthitāḥ menire jaladodyogaṁ tāṁḍavasthāḥ śikhaṁḍinaḥ

जहाँ इंद्रनील मणियों से जड़े महलों की छतों पर नाचते हुए मोर उन्हें बादल समझ बैठते थे।

श्लोक 21 (padma.6.4.21)

यत्र प्रवालमाणिक्य भवनोत्था मरीचयः । सेव्यंते शकुनैश्चूतरुचिरांकुरशंकया

yatra pravālamāṇikya bhavanotthā marīcayaḥ sevyaṁte śakunaiścūtarucirāṁkuraśaṁkayā

जहाँ मूँगे और माणिक्य से बने भवनों से निकलती किरणों को पक्षी आम के सुंदर नए अंकुर समझकर उनके पास मँडराते थे।

श्लोक 22 (padma.6.4.22)

यत्र कांचनहर्म्येषु त्विषो वह्निषु कातराः । विलोक्य प्रपलायंते दावशंकाः शिखंडिनः

yatra kāṁcanaharmyeṣu tviṣo vahniṣu kātarāḥ vilokya prapalāyaṁte dāvaśaṁkāḥ śikhaṁḍinaḥ

जहाँ सोने के महलों की चमक को अग्नि समझकर भयभीत मोर, दावानल की आशंका से भागने लगते थे।

श्लोक 23 (padma.6.4.23)

यत्र स्फटिकशालोत्थ प्रभासं मिश्रिता दिशः । विभांति मंदरोद्भ्रांताः सफेनार्णवसंनिभाः

yatra sphaṭikaśālottha prabhāsaṁ miśritā diśaḥ vibhāṁti maṁdarodbhrāṁtāḥ saphenārṇavasaṁnibhāḥ

जहाँ स्फटिक की दीवारों से उठती आभा से मिश्रित दिशाएँ मेरु से भटकी हुई, फेनयुक्त सागर के समान शोभित होती थीं।

श्लोक 24 (padma.6.4.24)

यत्र मोहं स्वहर्म्येषु विभातालोकसंस्थिताः । चक्रिरे ललनाः पूर्णसांध्यचंद्रोपमाननाः

yatra mohaṁ svaharmyeṣu vibhātālokasaṁsthitāḥ cakrire lalanāḥ pūrṇasāṁdhyacaṁdropamānanāḥ

जहाँ अपने महलों में उषाकाल के प्रकाश में खड़ी, पूर्णचंद्र-सी मुखाकृति वाली स्त्रियाँ देखने वालों को मोहित कर देती थीं।

श्लोक 25 (padma.6.4.25)

यत्रेन्द्र नीप कादंब पवनोद्यानमोदिताः । चित्तं विशंत्यो नारीणां चक्रिरे मोहनज्वरम्

yatrendra nīpa kādaṁba pavanodyānamoditāḥ cittaṁ viśaṁtyo nārīṇāṁ cakrire mohanajvaram

जहाँ इंद्र-वृक्ष और कदंब के उद्यानों से आती सुगंधित वायु स्त्रियों के हृदय में प्रवेश कर मोहज्वर उत्पन्न कर देती थी।

श्लोक 26 (padma.6.4.26)

यत्र लेख्यगतं नॄणां विलोक्य सुरतं जनः । संयाति द्विगुणं नूनं निजकांतारतोद्यमः

yatra lekhyagataṁ nṝṇāṁ vilokya surataṁ janaḥ saṁyāti dviguṇaṁ nūnaṁ nijakāṁtāratodyamaḥ

जहाँ मनुष्यों का चित्रित प्रणय-दृश्य देखकर भी लोगों का अपने प्रिय के प्रति प्रेम निश्चय ही दुगुना हो उठता था।

श्लोक 27 (padma.6.4.27)

यत्र वातायनोद्धूत धूपधूमस्य लेखयः । नभो बभूव तद्गंगाकालिंदीसंगमोपमम्

yatra vātāyanoddhūta dhūpadhūmasya lekhayaḥ nabho babhūva tadgaṁgākāliṁdīsaṁgamopamam

जहाँ झरोखों से उठती धूप की धुएँ की रेखाओं से आकाश मानो गंगा-यमुना के संगम-सा प्रतीत होता था।

श्लोक 28 (padma.6.4.28)

यत्रानेकगृहोद्भूत प्रभया सकलं नभः । विभातींद्रायुधाकीर्णं शरन्मेघ इवोन्नतः

yatrānekagṛhodbhūta prabhayā sakalaṁ nabhaḥ vibhātīṁdrāyudhākīrṇaṁ śaranmegha ivonnataḥ

जहाँ अनेक भवनों से उठती आभा से समूचा आकाश इंद्रधनुषों से व्याप्त शरद-ऋतु के ऊँचे मेघ जैसा शोभित होता था।

श्लोक 29 (padma.6.4.29)

यत्रानिशं भ्रमभ्रांताः सूर्यवाहाः प्रपीडिताः । विश्रामं यांति मध्याह्ने प्रासादशिरसि स्थिताः

yatrāniśaṁ bhramabhrāṁtāḥ sūryavāhāḥ prapīḍitāḥ viśrāmaṁ yāṁti madhyāhne prāsādaśirasi sthitāḥ

जहाँ निरंतर भ्रमण से थके हुए सूर्य के घोड़े मध्याह्न में महलों की चोटी पर विश्राम करने लगते थे।

श्लोक 30 (padma.6.4.30)

यत्रकुत्रच हर्म्येषु बिभ्रत्यो मालतीस्रजः । रात्रौ संभूतनक्षत्रा इव रेजुर्वरांगनाः

yatrakutraca harmyeṣu bibhratyo mālatīsrajaḥ rātrau saṁbhūtanakṣatrā iva rejurvarāṁganāḥ

जहाँ इधर-उधर महलों में मालती के हार धारण किए श्रेष्ठ स्त्रियाँ रात्रि में मानो साकार हुए नक्षत्रों-सी शोभित होती थीं।

श्लोक 31 (padma.6.4.31)

यत्र हाटकहिंदोल शृंखलाघर्षणोद्भवः । चकार सुंदरीं शब्दः स्फुटं मेरुभुवोभुवम्

yatra hāṭakahiṁdola śṛṁkhalāgharṣaṇodbhavaḥ cakāra suṁdarīṁ śabdaḥ sphuṭaṁ merubhuvobhuvam

जहाँ सोने के झूलों की साँकलों की रगड़ से उठने वाला शब्द मेरु-भूमि के उस भाग को स्पष्टतः सुंदर बना देता था।

श्लोक 32 (padma.6.4.32)

साकं सरिद्भिः पुत्रस्योशनसा सह सागरः । तत्राभिषेकमकरोद्वादित्रैर्निज गर्जितैः

sākaṁ saridbhiḥ putrasyośanasā saha sāgaraḥ tatrābhiṣekamakarodvāditrairnija garjitaiḥ

सागर ने नदियों के साथ मिलकर, उशना (शुक्राचार्य) सहित, वाद्यों और अपनी ही गर्जना के बीच वहाँ पुत्र का अभिषेक किया।

श्लोक 33 (padma.6.4.33)

याः स्कंदस्य जगाद तारकजये देवः स्वयंभूः स्वयं स्वः साम्राज्यमहोत्सवेऽपि च शचीकांतस्य वाचस्पतिः । ताभिश्चित्रविंरिंचि वक्त्रसरसी हंसीभिराशास्महे वाणीभिर्वसुधाविवाहसमये मंत्रोत्सवैर्मंगलम्

yāḥ skaṁdasya jagāda tārakajaye devaḥ svayaṁbhūḥ svayaṁ svaḥ sāmrājyamahotsave'pi ca śacīkāṁtasya vācaspatiḥ tābhiścitraviṁriṁci vaktrasarasī haṁsībhirāśāsmahe vāṇībhirvasudhāvivāhasamaye maṁtrotsavairmaṁgalam

स्वयंभू ब्रह्मा ने स्वयं जिन शब्दों से स्कंद की तारकासुर पर विजय का आशीर्वाद दिया था, और वाचस्पति (बृहस्पति) ने शचीपति (इंद्र) के स्वर्ग-साम्राज्य के महोत्सव में जिन शब्दों का उच्चारण किया था — उन्हीं अद्भुत, ब्रह्मा के मुख-सरोवर से निकली हंसी-वाणियों से, इस पृथ्वी-अभिषेक (जालंधर के राज्याभिषेक) के अवसर पर हम मंत्रोच्चार सहित मंगल-कामना करते हैं।

श्लोक 34 (padma.6.4.34)

महापद्मसहस्रं तु सैन्यमात्मोदरोद्भवम् । जालंधराय पुत्राय ददौ भीमं महोदधिः

mahāpadmasahasraṁ tu sainyamātmodarodbhavam jālaṁdharāya putrāya dadau bhīmaṁ mahodadhiḥ

महासागर ने अपने पुत्र जालंधर को अपने ही गर्भ से उत्पन्न एक हजार महापद्म परिमाण की विशाल सेना दी।

श्लोक 35 (padma.6.4.35)

जालंधराय शुक्रोऽपि प्रीत्या विद्यां निजां ददौ । मृतसंजीवनीं नाम्ना मायां रुद्रविमोहिनीम्

jālaṁdharāya śukro'pi prītyā vidyāṁ nijāṁ dadau mṛtasaṁjīvanīṁ nāmnā māyāṁ rudravimohinīm

शुक्राचार्य ने भी प्रेमपूर्वक जालंधर को अपनी वह विद्या दी जिसे मृतसंजीवनी कहा जाता है, जो रुद्र को भी मोहित करने वाली माया है।

श्लोक 36 (padma.6.4.36)

शस्त्रास्त्रविद्या अन्याश्च विधिना अब्धिसूनवे । यदन्यत्सकलं तस्मै व्याख्यातं कविना तदा

śastrāstravidyā anyāśca vidhinā abdhisūnave yadanyatsakalaṁ tasmai vyākhyātaṁ kavinā tadā

शस्त्र-अस्त्र की विद्याएँ और अन्य विधियाँ भी सागर-पुत्र को सिखाई गईं; उस समय जो कुछ शेष था, वह सब भी उस कवि (शुक्र) ने उसे समझा दिया।

श्लोक 37 (padma.6.4.37)

ततो जालंधरं पुत्रमभिषिच्यार्णवो ययौ । स्वस्थानं दिव्यदेहेन नदीभिः परिवारितः

tato jālaṁdharaṁ putramabhiṣicyārṇavo yayau svasthānaṁ divyadehena nadībhiḥ parivāritaḥ

फिर पुत्र जालंधर का अभिषेक करके सागर दिव्य शरीर धारण किए, नदियों से घिरे हुए, अपने स्थान को लौट गए।

श्लोक 38 (padma.6.4.38)

दृष्ट्वा जालंधरो दिव्यपुरं गोपुरमंडितम् । व्यचरत्सह शुक्रेण द्विजसंघैः सुपूजितः

dṛṣṭvā jālaṁdharo divyapuraṁ gopuramaṁḍitam vyacaratsaha śukreṇa dvijasaṁghaiḥ supūjitaḥ

गोपुरों से सुसज्जित उस दिव्य नगर को देखकर जालंधर शुक्राचार्य के साथ, ब्राह्मणों के समूहों द्वारा सम्मानित होते हुए, उसमें विचरण करने लगा।

श्लोक 39 (padma.6.4.39)

एतस्मिन्नंतरे दैत्याः पातालस्था महाबलाः । प्राप्ता जालंधरं सर्वे कालनेमिपुरोगमाः

etasminnaṁtare daityāḥ pātālasthā mahābalāḥ prāptā jālaṁdharaṁ sarve kālanemipurogamāḥ

इसी बीच पाताल में रहने वाले महाबली दैत्य, कालनेमि के नेतृत्व में, सब जालंधर के पास आए।

श्लोक 40 (padma.6.4.40)

ततो महाबला वीरा बलं क्षीरोदसंनिभम् । तस्य शुंभासुरं दैत्यं सेनापतिमकल्पयन्

tato mahābalā vīrā balaṁ kṣīrodasaṁnibham tasya śuṁbhāsuraṁ daityaṁ senāpatimakalpayan

तब उन महाबली वीरों ने, क्षीरसागर के समान विशाल उस सेना का सेनापति दैत्य शुंभासुर को नियुक्त किया।

श्लोक 41 (padma.6.4.41)

बलं स्ववशगं कृत्वा कृत्वा भुवि स्थिरं जलम् । जालंधरस्तदा राज्यं पितृदत्तं चकार सः

balaṁ svavaśagaṁ kṛtvā kṛtvā bhuvi sthiraṁ jalam jālaṁdharastadā rājyaṁ pitṛdattaṁ cakāra saḥ

उस सेना को अपने वश में करके और भूमि पर जल को स्थिर बनाकर, जालंधर ने तब पिता द्वारा दिए गए राज्य का शासन किया।

श्लोक 42 (padma.6.4.42)

अत्रांतरेऽप्सराः काचित्स्वर्णेत्यासीत्पुरा दिवि । तस्याः क्रौंचप्रसादेन वृंदानाम सुताभवत्

atrāṁtare'psarāḥ kācitsvarṇetyāsītpurā divi tasyāḥ krauṁcaprasādena vṛṁdānāma sutābhavat

इसी बीच पहले स्वर्ग में स्वर्णा नाम की एक अप्सरा थी; क्रौंच की कृपा से उसकी पुत्री उत्पन्न हुई, जिसका नाम वृंदा था।

श्लोक 43 (padma.6.4.43)

धात्रा विभवसंयुक्तं सौंदर्यं यत्कृतं पृथक् । तत्तदेकगतं द्रष्टुं वृंदागात्रं विनिर्मितम्

dhātrā vibhavasaṁyuktaṁ sauṁdaryaṁ yatkṛtaṁ pṛthak tattadekagataṁ draṣṭuṁ vṛṁdāgātraṁ vinirmitam

विधाता ने जो-जो सौंदर्य अलग-अलग स्थानों में बनाया था, उन सबको एक साथ देखने की इच्छा से ही मानो वृंदा का शरीर रचा।

श्लोक 44 (padma.6.4.44)

तां वृंदामतिचार्वंगीं प्रमदां जनमोहिनीम् । स्वर्णा जालंधरस्यार्थे ददौ शुक्राय याचते

tāṁ vṛṁdāmaticārvaṁgīṁ pramadāṁ janamohinīm svarṇā jālaṁdharasyārthe dadau śukrāya yācate

अत्यंत सुंदर अंगों वाली, लोगों को मोहित करने वाली उस युवती वृंदा को स्वर्णा ने जालंधर के लिए, माँगने पर, शुक्राचार्य को सौंप दिया।

श्लोक 45 (padma.6.4.45)

शुक्र उवाच । कंदर्पस्य जगन्नेत्र शस्त्रेणाश्चर्यकारिणा । रूपेणानेन रंभोरु दीर्घायुः सुखिनी भव

śukra uvāca kaṁdarpasya jagannetra śastreṇāścaryakāriṇā rūpeṇānena raṁbhoru dīrghāyuḥ sukhinī bhava

शुक्राचार्य ने कहा — 'हे संसार को मोहित करने वाली! कामदेव को भी चकित करने वाले इस अद्भुत रूप के साथ, हे सुंदरी! तुम दीर्घायु और सुखी होओ।'

श्लोक 46 (padma.6.4.46)

निर्माय स्वयमेव विस्मितमनाः सौंदर्यसारेण यं। स्वव्यापारपरिश्रमस्य कलशं वेधाः समारोपयत् । कंदर्पं पुरुषं स्त्रियो विदधते यस्मिन्न दृष्टे सति द्रष्टव्यावधि। रूपमाप्नुहि पतिं तं दीर्घनेत्रं भटम्

nirmāya svayameva vismitamanāḥ sauṁdaryasāreṇa yaṁ svavyāpārapariśramasya kalaśaṁ vedhāḥ samāropayat kaṁdarpaṁ puruṣaṁ striyo vidadhate yasminna dṛṣṭe sati draṣṭavyāvadhi rūpamāpnuhi patiṁ taṁ dīrghanetraṁ bhaṭam

स्वयं विधाता भी अपने ही रचे इस सौंदर्य-सार से चकित रह गए, मानो अपने ही परिश्रम के कलश को उन्होंने इसी पर रख दिया हो; जिसके अदर्शन में स्त्रियाँ पुरुष तक को कामदेव मान बैठें — ऐसा रूप पाकर तुम उस दीर्घनेत्र वीर को अपना पति प्राप्त करो।

श्लोक 47 (padma.6.4.47)

उपयेमे विवाहेन गांधर्वेणार्णवात्मजः । वृंदां तौ दंपती जातौ जनानंदकरौ नृप

upayeme vivāhena gāṁdharveṇārṇavātmajaḥ vṛṁdāṁ tau daṁpatī jātau janānaṁdakarau nṛpa

सागर-पुत्र ने गांधर्व-विवाह से वृंदा से विवाह किया; हे राजन्! वे दोनों दंपती लोगों को आनंद देने वाले हुए।

श्लोक 48 (padma.6.4.48)

चंचलत्वं परित्यक्तं तया जालंधरोऽपि हि । वृत्तेन वृद्धकार्येण चकमे न परस्त्रियम्

caṁcalatvaṁ parityaktaṁ tayā jālaṁdharo'pi hi vṛttena vṛddhakāryeṇa cakame na parastriyam

उसके प्रभाव से जालंधर ने भी चंचलता त्याग दी और अच्छे, वृद्धजनोचित आचरण से युक्त होकर कभी पराई स्त्री की कामना नहीं की।

श्लोक 49 (padma.6.4.49)

कदाचित्स सभासीनो दृष्ट्वा राहुं शिरोहृतम्। कस्मात्कायार्द्धशेषोऽयं इति पप्रच्छ भार्गवम्

kadācitsa sabhāsīno dṛṣṭvā rāhuṁ śirohṛtam kasmātkāyārddhaśeṣo'yaṁ iti papraccha bhārgavam

एक बार सभा में बैठे हुए उसने राहु को सिर-कटा देखकर भार्गव से पूछा — 'यह आधे शरीर वाला क्यों है?'

श्लोक 50 (padma.6.4.50)

स तस्य कथयामास पूर्ववृत्तांतमादितः । यथा निर्मथितो देवैः क्षीरोदोऽमृतकारणात्

sa tasya kathayāmāsa pūrvavṛttāṁtamāditaḥ yathā nirmathito devaiḥ kṣīrodo'mṛtakāraṇāt

उन्होंने उसे आदि से पूर्ववृत्तांत सुनाया — किस प्रकार देवताओं ने अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था।

श्लोक 51 (padma.6.4.51)

तच्छ्रुत्वा विस्मितो वाक्यं प्राह जालंधरोऽसुरः । प्रसादसुमुखो राहुं कामरूपो भवाधुना

tacchrutvā vismito vākyaṁ prāha jālaṁdharo'suraḥ prasādasumukho rāhuṁ kāmarūpo bhavādhunā

यह सुनकर विस्मित असुर जालंधर ने कहा — 'राहु के प्रति कृपा-प्रसन्न होकर अब तुम इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बन जाओ।'

श्लोक 52 (padma.6.4.52)

इति शुक्रस्य मंत्रेण सिंधुसूनुः प्रतापवान् । पितृव्यं संस्मरन्वीर विग्रहं त्वकरोत्सुरैः

iti śukrasya maṁtreṇa siṁdhusūnuḥ pratāpavān pitṛvyaṁ saṁsmaranvīra vigrahaṁ tvakarotsuraiḥ

इस प्रकार शुक्राचार्य की सलाह से, हे वीर! पराक्रमी सागर-पुत्र ने अपने चाचा (राहु) का स्मरण करते हुए देवताओं से युद्ध किया।

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