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उत्तर खण्ड · अध्याय 44

फाल्गुन कृष्ण विजया एकादशी

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (padma.6.44.1)

युधिष्ठिर उवाच- फाल्गुनस्यासिते पक्षे किंनामैकादशीभवेत् । कथयस्व प्रसादेन वासुदेव ममाग्रतः

yudhiṣṭhira uvāca- phālgunasyāsite pakṣe kiṁnāmaikādaśībhavet kathayasva prasādena vāsudeva mamāgrataḥ

युधिष्ठिर ने कहा - हे वासुदेव! फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? कृपया मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.44.2)

श्रीकृष्ण उवाच- नारदः परिपप्रच्छ ब्रह्माणं कमलासनम् । फाल्गुनस्यासिते पक्षे विजयानाम नामतः । तस्याः पुण्यं द्विजश्रेष्ठ कथयस्व प्रसादतः

śrīkṛṣṇa uvāca- nāradaḥ paripapraccha brahmāṇaṁ kamalāsanam phālgunasyāsite pakṣe vijayānāma nāmataḥ tasyāḥ puṇyaṁ dvijaśreṣṭha kathayasva prasādataḥ

श्रीकृष्ण ने कहा - एक बार नारद ने कमलासन ब्रह्मा से पूछा - फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में जो विजया नाम की एकादशी होती है, हे द्विजश्रेष्ठ, उसका पुण्य कृपा करके बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.44.3)

ब्रह्मोवाच- शृणु नारद वक्ष्यामि कथां पापहराम्पराम् । यन्न कस्यचिदाख्यातं मयैतद्विजयाव्रतम्

brahmovāca- śṛṇu nārada vakṣyāmi kathāṁ pāpaharāmparām yanna kasyacidākhyātaṁ mayaitadvijayāvratam

ब्रह्मा ने कहा - हे नारद! सुनो, मैं वह परम पापहारी कथा कहता हूँ, जो विजया व्रत मैंने अब तक किसी से नहीं कहा।

श्लोक 4 (padma.6.44.4)

पुरातनं व्रतं ह्येतत्पवित्रं पापनाशनम् । जयं ददाति विजया नृपाणां वै न संशयः

purātanaṁ vrataṁ hyetatpavitraṁ pāpanāśanam jayaṁ dadāti vijayā nṛpāṇāṁ vai na saṁśayaḥ

यह अत्यंत प्राचीन, पवित्र और पापनाशक व्रत है। विजया राजाओं को विजय प्रदान करती है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 5 (padma.6.44.5)

पुरा रामो वनं यातो वर्षाण्येव चतुर्दश । न्यवसत्पंचवट्यां तु सहसीतः सलक्ष्मणः

purā rāmo vanaṁ yāto varṣāṇyeva caturdaśa nyavasatpaṁcavaṭyāṁ tu sahasītaḥ salakṣmaṇaḥ

प्राचीन काल में राम चौदह वर्षों के लिए वन गए थे। वे सीता और लक्ष्मण के साथ पंचवटी में निवास कर रहे थे।

श्लोक 6 (padma.6.44.6)

तत्रैव वसतस्तस्य रामस्य विजयात्मनः । रावणेन हृता लौल्याद्भार्या सीता यशस्विनी

tatraiva vasatastasya rāmasya vijayātmanaḥ rāvaṇena hṛtā laulyādbhāryā sītā yaśasvinī

वहीं निवास करते हुए विजय-स्वरूप उस राम की यशस्विनी पत्नी सीता को रावण ने कामातुर होकर हर लिया।

श्लोक 7 (padma.6.44.7)

तेन दुःखेन रामोऽपि मोहमभ्यागतस्तदा । भ्रमन्जटायुषमथो ददर्श विगतायुषम्

tena duḥkhena rāmo'pi mohamabhyāgatastadā bhramanjaṭāyuṣamatho dadarśa vigatāyuṣam

उस दुःख से राम भी मोह को प्राप्त हो गए। भटकते हुए उन्होंने प्राणहीन जटायु को देखा।

श्लोक 8 (padma.6.44.8)

कबंधो निहतः पश्चाद्भ्रमतारण्यमध्यतः । सुग्रीवेण समं तस्य सखित्वं समपद्यत

kabaṁdho nihataḥ paścādbhramatāraṇyamadhyataḥ sugrīveṇa samaṁ tasya sakhitvaṁ samapadyata

तत्पश्चात् वन के बीच भटकते हुए कबंध का वध हुआ; तब सुग्रीव के साथ उनकी मित्रता हुई।

श्लोक 9 (padma.6.44.9)

वानराणामनीकानि रामार्थंसंगतानि च । ततो हनुमता दृष्टा लंकोद्याने तु जानकी

vānarāṇāmanīkāni rāmārthaṁsaṁgatāni ca tato hanumatā dṛṣṭā laṁkodyāne tu jānakī

राम के कार्य के लिए वानरों की सेनाएँ एकत्र हुईं; तब हनुमान ने लंका के उद्यान में जानकी को देखा।

श्लोक 10 (padma.6.44.10)

रामसंज्ञापनं तस्यै दत्तं कर्म महत्कृतम् । पुनः समेत्य रामेण सर्वं तत्र निवेदितम्

rāmasaṁjñāpanaṁ tasyai dattaṁ karma mahatkṛtam punaḥ sametya rāmeṇa sarvaṁ tatra niveditam

सीता को राम का परिचय-चिह्न दिया गया, और यह महान कार्य संपन्न हुआ; लौटकर हनुमान ने राम को सब कुछ निवेदित किया।

श्लोक 11 (padma.6.44.11)

अथ श्रुत्वा रामचंद्रो वाक्यं चैव हनूमतः । सुग्रीवानुमतेनैव प्रस्थानं समरोचयत्

atha śrutvā rāmacaṁdro vākyaṁ caiva hanūmataḥ sugrīvānumatenaiva prasthānaṁ samarocayat

हनुमान का वचन सुनकर रामचंद्र ने सुग्रीव की सम्मति से प्रस्थान करने का निश्चय किया।

श्लोक 12 (padma.6.44.12)

सौमित्रेकेन पुण्येन तीर्यते वरुणालयः । अगाधो नितरामेष यादोभिश्च समाकुलः । उपायं नैव पश्यामि येनासौ सुतरो भवेत्

saumitrekena puṇyena tīryate varuṇālayaḥ agādho nitarāmeṣa yādobhiśca samākulaḥ upāyaṁ naiva paśyāmi yenāsau sutaro bhavet

हे सौमित्रे! किस पुण्य से यह समुद्र पार किया जा सकता है? यह अगाध और जलचरों से भरा हुआ है; मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जिससे यह सहज ही पार हो सके।

श्लोक 13 (padma.6.44.13)

लक्ष्मण उवाच- आदिदेवस्त्वमेवासि पुराणपुरुषोत्तमः । बकदाल्भ्यो मुनिश्चात्र वर्तते द्वीपमध्यतः

lakṣmaṇa uvāca- ādidevastvamevāsi purāṇapuruṣottamaḥ bakadālbhyo muniścātra vartate dvīpamadhyataḥ

लक्ष्मण ने कहा - आप स्वयं ही आदिदेव, पुराणपुरुषोत्तम हैं। यहाँ द्वीप के मध्य बकदाल्भ्य नामक मुनि निवास करते हैं।

श्लोक 14 (padma.6.44.14)

अस्मात्स्थानाद्योजनार्द्धमाश्रमस्तस्य राघव । अन्ये च ब्राह्मणास्तत्र बहवो रघुनंदन

asmātsthānādyojanārddhamāśramastasya rāghava anye ca brāhmaṇāstatra bahavo raghunaṁdana

हे राघव! इस स्थान से आधे योजन की दूरी पर उनका आश्रम है, हे रघुनंदन, और वहाँ अन्य अनेक ब्राह्मण भी हैं।

श्लोक 15 (padma.6.44.15)

तं पृच्छ गत्वा राजेंद्र पुराणमृषिपुंगवम् । इति वाक्यं ततः श्रुत्वा लक्ष्मणस्यातिशोभनम्

taṁ pṛccha gatvā rājeṁdra purāṇamṛṣipuṁgavam iti vākyaṁ tataḥ śrutvā lakṣmaṇasyātiśobhanam

हे राजेंद्र! जाकर उस प्राचीन ऋषिश्रेष्ठ से पूछिए। लक्ष्मण के इस अत्यंत सुंदर वचन को सुनकर,

श्लोक 16 (padma.6.44.16)

जगाम राघवो द्रष्टुं बकदाल्भ्यं महामुनिम् । प्रणनाम मुनिं मूर्ध्ना रामो विष्णुमिवामरः

jagāma rāghavo draṣṭuṁ bakadālbhyaṁ mahāmunim praṇanāma muniṁ mūrdhnā rāmo viṣṇumivāmaraḥ

राघव उस महामुनि बकदाल्भ्य को देखने गए; राम ने विष्णु के समान उस मुनि को सिर झुकाकर प्रणाम किया।

श्लोक 17 (padma.6.44.17)

ज्ञात्वा मुनिस्ततो रामं पुराणं पुरुषोत्तमम् । केनापि कारणेनैव प्रविष्टो मानुषीं तनुम्

jñātvā munistato rāmaṁ purāṇaṁ puruṣottamam kenāpi kāraṇenaiva praviṣṭo mānuṣīṁ tanum

तब मुनि ने जान लिया कि यह राम स्वयं प्राचीन पुरुषोत्तम हैं, जो किसी विशेष कारण से मनुष्य-देह में प्रविष्ट हुए हैं।

श्लोक 18 (padma.6.44.18)

उवाच स ऋषिस्तुष्टः कुतो राम तवागमः

uvāca sa ṛṣistuṣṭaḥ kuto rāma tavāgamaḥ

वह ऋषि प्रसन्न होकर बोले - हे राम! आपका यहाँ आगमन किस कारण से हुआ?

श्लोक 19 (padma.6.44.19)

राम उवाच- त्वत्प्रसादादहं विप्र तीरं नदनदीपतेः । आगतोऽस्मि ससैन्योऽत्र लंकां जेतुं सराक्षसाम्

rāma uvāca- tvatprasādādahaṁ vipra tīraṁ nadanadīpateḥ āgato'smi sasainyo'tra laṁkāṁ jetuṁ sarākṣasām

राम ने कहा - हे विप्र! आपकी कृपा से मैं नदियों और नदों के स्वामी समुद्र के तट पर सेनासहित आया हूँ, राक्षसों सहित लंका को जीतने के लिए।

श्लोक 20 (padma.6.44.20)

भवतश्चानुकूलत्वात्तीर्यतेऽब्धिर्यथा मया । तमुपायं वद मुने प्रसादं कुरु सांप्रतम्

bhavataścānukūlatvāttīryate'bdhiryathā mayā tamupāyaṁ vada mune prasādaṁ kuru sāṁpratam

आपकी कृपा से ही मुझे इस सागर को पार करना है - वह उपाय बताइए, हे मुने, अभी कृपा कीजिए।

श्लोक 21 (padma.6.44.21)

एतस्मात्कारणादेव द्रष्टुं त्वाहमिहागतः । रामस्य वचनं श्रुत्वा बकदाल्भ्यो महामुनिः

etasmātkāraṇādeva draṣṭuṁ tvāhamihāgataḥ rāmasya vacanaṁ śrutvā bakadālbhyo mahāmuniḥ

इसी कारण मैं आपको देखने यहाँ आया हूँ। राम का यह वचन सुनकर, महामुनि बकदाल्भ्य ने,

श्लोक 22 (padma.6.44.22)

उवाच सुप्रसन्नात्मा रामं राजीवलोचनम् । कर्तव्यमद्य ते राम व्रतानां व्रतमुत्तमम्

uvāca suprasannātmā rāmaṁ rājīvalocanam kartavyamadya te rāma vratānāṁ vratamuttamam

अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर कमल-नयन राम से कहा - हे राम! आज तुम्हें व्रतों में सर्वोत्तम व्रत करना चाहिए,

श्लोक 23 (padma.6.44.23)

कृतेन येन सहसा विजयस्ते भविष्यति । लंकां जित्वा राक्षसांश्च स्वच्छां कीर्तिमवाप्स्यसि

kṛtena yena sahasā vijayaste bhaviṣyati laṁkāṁ jitvā rākṣasāṁśca svacchāṁ kīrtimavāpsyasi

जिसे करने से शीघ्र ही तुम्हारी विजय होगी। लंका को जीतकर और राक्षसों को परास्त करके तुम निर्मल कीर्ति प्राप्त करोगे।

श्लोक 24 (padma.6.44.24)

एकाग्रमानसो भूत्वा व्रतमेतत्समाचर । फाल्गुनस्यासिते पक्षे विजयैकादशी भवेत्

ekāgramānaso bhūtvā vratametatsamācara phālgunasyāsite pakṣe vijayaikādaśī bhavet

एकाग्रचित्त होकर यह व्रत करो। फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में विजया एकादशी होती है।

श्लोक 25 (padma.6.44.25)

तस्या व्रतेन हे राम विजयस्ते भविष्यति । निःसंशयं समुद्रं त्वं तरिष्यसि सवानरः

tasyā vratena he rāma vijayaste bhaviṣyati niḥsaṁśayaṁ samudraṁ tvaṁ tariṣyasi savānaraḥ

हे राम! उसी व्रत से तुम्हारी विजय होगी; तुम निःसंदेह वानरों सहित समुद्र को पार कर जाओगे।

श्लोक 26 (padma.6.44.26)

विधिस्तु श्रूयतां राजन्व्रतस्यास्य फलप्रदः । दशम्यां दिवसे प्राप्ते कुंभमेकं तु कारयेत्

vidhistu śrūyatāṁ rājanvratasyāsya phalapradaḥ daśamyāṁ divase prāpte kuṁbhamekaṁ tu kārayet

हे राजन्! अब इस फलदायक व्रत की विधि सुनो। दशमी के दिन आने पर एक कलश बनवाना चाहिए,

श्लोक 27 (padma.6.44.27)

हैमं वा राजतं वापि ताम्रं वाप्यथ मृन्मयम् । स्थापयेच्छोभितं चैव जलपूर्णं सपल्लवम्

haimaṁ vā rājataṁ vāpi tāmraṁ vāpyatha mṛnmayam sthāpayecchobhitaṁ caiva jalapūrṇaṁ sapallavam

सोने का, चाँदी का, ताँबे का, अथवा मिट्टी का; उसे सुशोभित करके जल से भरकर और पल्लवों सहित स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.44.28)

सप्तधान्यान्यधस्तस्य यवानुपरि विन्यसेत् । तस्योपरि न्यसेद्देवं हैमं नारायणं प्रभुम्

saptadhānyānyadhastasya yavānupari vinyaset tasyopari nyaseddevaṁ haimaṁ nārāyaṇaṁ prabhum

उसके नीचे सप्तधान्य और ऊपर जौ बिछाना चाहिए; उसके ऊपर स्वर्णमय भगवान नारायण की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

श्लोक 29 (padma.6.44.29)

एकादशीदिने प्राप्ते प्रातः स्नानं समाचरेत् । निश्चलं स्थापयेत्कुंभं कंठमाल्यानुलेपनैः

ekādaśīdine prāpte prātaḥ snānaṁ samācaret niścalaṁ sthāpayetkuṁbhaṁ kaṁṭhamālyānulepanaiḥ

एकादशी का दिन आने पर प्रातःकाल स्नान करना चाहिए, और उस कलश को कंठ-माला और अनुलेपन से स्थिर रूप से सजाकर स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 30 (padma.6.44.30)

पूगीफलैर्नालिकेरैः पूजयेच्च विशेषतः । गंधैर्धूपैश्चदीपैश्च नैवेद्यैर्विविधैरपि

pūgīphalairnālikeraiḥ pūjayecca viśeṣataḥ gaṁdhairdhūpaiścadīpaiśca naivedyairvividhairapi

सुपारी और नारियल से विशेष रूप से उसकी पूजा करनी चाहिए, गंध, धूप, दीप और विविध नैवेद्यों से भी।

श्लोक 31 (padma.6.44.31)

कुंभाग्रे तद्दिनं राम नीयते सत्कथादिभिः । रात्रौ जागरणं चैव तस्याग्रे कारयेद्बुधः

kuṁbhāgre taddinaṁ rāma nīyate satkathādibhiḥ rātrau jāgaraṇaṁ caiva tasyāgre kārayedbudhaḥ

हे राम! वह दिन उस कलश के सामने शुभ कथाओं आदि में बिताया जाता है; बुद्धिमान व्यक्ति को उसके सामने रात्रि-जागरण भी करना चाहिए।

श्लोक 32 (padma.6.44.32)

प्रकाशयेद्घृतदीपमखंडव्रतहेतवे । द्वादशीदिवसे प्राप्ते मार्तंडस्योदये सति

prakāśayedghṛtadīpamakhaṁḍavratahetave dvādaśīdivase prāpte mārtaṁḍasyodaye sati

अखंड व्रत के लिए घी का दीपक जलाना चाहिए। द्वादशी का दिन आने पर, सूर्योदय होने पर,

श्लोक 33 (padma.6.44.33)

नीत्वा कुंभं जलोद्देशे नद्याः प्रस्रवणे तथा । तडागे स्थापयित्वा तं पूजयित्वा यथाविधि

nītvā kuṁbhaṁ jaloddeśe nadyāḥ prasravaṇe tathā taḍāge sthāpayitvā taṁ pūjayitvā yathāvidhi

उस कलश को नदी के जल-स्थान, या झरने, अथवा तालाब में ले जाकर, वहाँ स्थापित करके, विधिपूर्वक उसकी पूजा करके,

श्लोक 34 (padma.6.44.34)

दद्यात्सदेवं तं कुंभं ब्राह्मणे वेदपारगे । कुंभेन सह राजेंद्र महादानानि दापयेत्

dadyātsadevaṁ taṁ kuṁbhaṁ brāhmaṇe vedapārage kuṁbhena saha rājeṁdra mahādānāni dāpayet

उस देवमूर्ति सहित कलश को वेदपारंगत ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए। हे राजेंद्र! उस कलश के साथ महादान भी देने चाहिए।

श्लोक 35 (padma.6.44.35)

अनेनविधिना राम यूथपैः सह संगतः । कुरु व्रतं प्रयत्नेन विजयस्ते भविष्यति

anenavidhinā rāma yūthapaiḥ saha saṁgataḥ kuru vrataṁ prayatnena vijayaste bhaviṣyati

हे राम! इसी विधि से, सेनापतियों के साथ मिलकर, यत्नपूर्वक इस व्रत को करो - तुम्हारी विजय अवश्य होगी।

श्लोक 36 (padma.6.44.36)

इति श्रुत्वा ततो रामो यथोक्तमकरोत्तदा । कृते व्रते स विजयी बभूव रघुनंदनः

iti śrutvā tato rāmo yathoktamakarottadā kṛte vrate sa vijayī babhūva raghunaṁdanaḥ

यह सुनकर राम ने वैसा ही किया जैसा कहा गया था; व्रत पूर्ण होने पर रघुनंदन विजयी हुए।

श्लोक 37 (padma.6.44.37)

प्राप्ता सीता जिता लंका पौलस्त्यो निहतो रणे । अनेनविधिना पुत्र ये कुर्वंति नरा व्रतम्

prāptā sītā jitā laṁkā paulastyo nihato raṇe anenavidhinā putra ye kurvaṁti narā vratam

सीता को पाया गया, लंका जीती गई, और रावण युद्ध में मारा गया। हे पुत्र! जो मनुष्य इसी विधि से यह व्रत करते हैं,

श्लोक 38 (padma.6.44.38)

इहलोकजयप्राप्तिः परलोकस्तथाक्षयः । एतस्मात्कारणात्पुत्र कर्तव्यं विजयाव्रतम्

ihalokajayaprāptiḥ paralokastathākṣayaḥ etasmātkāraṇātputra kartavyaṁ vijayāvratam

उन्हें इस लोक में विजय की प्राप्ति होती है और परलोक में अक्षय पद मिलता है। इसी कारण, हे पुत्र, विजया व्रत करना चाहिए।

श्लोक 39 (padma.6.44.39)

विजयायाश्च माहात्म्यं सर्वकिल्बिषनाशनम् । पठनाच्छ्रवणाच्चैव वाजपेयफलं लभेत्

vijayāyāśca māhātmyaṁ sarvakilbiṣanāśanam paṭhanācchravaṇāccaiva vājapeyaphalaṁ labhet

विजया की यह महिमा समस्त पापों का नाश करने वाली है। इसे पढ़ने और सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

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