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उत्तर खण्ड · अध्याय 45

फाल्गुन शुक्ल आमलकी एकादशी

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

श्लोक 1 (padma.6.45.1)

श्रीकृष्ण उवाच- माहात्म्यं विजयायाश्च श्रुतं कृष्ण महत्फलम् । फाल्गुनस्यार्जुने पक्षे यन्नाम्नी तां वदाधुना

śrīkṛṣṇa uvāca- māhātmyaṁ vijayāyāśca śrutaṁ kṛṣṇa mahatphalam phālgunasyārjune pakṣe yannāmnī tāṁ vadādhunā

श्रीकृष्ण ने कहा - हे कृष्ण (अर्जुन)! विजया का महात्म्य, जिसका फल महान है, सुन लिया गया। अब फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी है, उसका नाम बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.45.2)

श्रीकृष्ण उवाच-। धर्मपुत्र महाभाग शृणु वक्ष्यामितेऽधुना । योक्ता पृष्टेन मांधात्रा वसिष्ठेन महात्मना

śrīkṛṣṇa uvāca- dharmaputra mahābhāga śṛṇu vakṣyāmite'dhunā yoktā pṛṣṭena māṁdhātrā vasiṣṭhena mahātmanā

श्रीकृष्ण ने कहा - हे धर्मपुत्र महाभाग! सुनो, अब मैं तुम्हें वह बताता हूँ, जो महात्मा वसिष्ठ से मांधाता ने पूछकर प्राप्त किया था।

श्लोक 3 (padma.6.45.3)

फाल्गुनस्य विशेषेण विशेषः कथितो नृप । आमलकीव्रतं पुण्यं विष्णुलोकफलप्रदम्

phālgunasya viśeṣeṇa viśeṣaḥ kathito nṛpa āmalakīvrataṁ puṇyaṁ viṣṇulokaphalapradam

हे नृप! फाल्गुन की विशेष एकादशी का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। आमलकी-व्रत पुण्यमय है और विष्णुलोक का फल देने वाला है।

श्लोक 4 (padma.6.45.4)

आमलक्यास्तले गत्वा जागरं तत्र कारयेत् । कृत्वा जागरणं रात्रौ गोसहस्रफलं लभेत्

āmalakyāstale gatvā jāgaraṁ tatra kārayet kṛtvā jāgaraṇaṁ rātrau gosahasraphalaṁ labhet

आमलकी वृक्ष के नीचे जाकर वहाँ रात्रि-जागरण करना चाहिए। रात्रि में जागरण करने से सहस्र गौओं के दान का फल मिलता है।

श्लोक 5 (padma.6.45.5)

मांधातोवाच - आमलकी कदा ह्येषा उत्पन्ना द्विजसत्तम । एतत्सर्वं ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे

māṁdhātovāca - āmalakī kadā hyeṣā utpannā dvijasattama etatsarvaṁ mamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi me

मांधाता ने कहा - हे द्विजसत्तम! यह आमलकी वृक्ष कब उत्पन्न हुआ? यह सब मुझे बताइए, मुझे इसमें अत्यंत कौतूहल है।

श्लोक 6 (padma.6.45.6)

कस्मादियं पवित्रा च कस्मात्पापप्रणाशिनी । कस्माज्जागरणं कृत्वा गोसहस्रफलं लभेत्

kasmādiyaṁ pavitrā ca kasmātpāpapraṇāśinī kasmājjāgaraṇaṁ kṛtvā gosahasraphalaṁ labhet

यह किस कारण पवित्र है, किस कारण पापों का नाश करने वाला है? किस कारण इसके नीचे जागरण करने से सहस्र गौओं का फल मिलता है?

श्लोक 7 (padma.6.45.7)

वसिष्ठ उवाच- कथयामि महाभाग यथेयमभवत्क्षितौ । आमलकी महावृक्षः सर्वपापप्रणाशनः

vasiṣṭha uvāca- kathayāmi mahābhāga yatheyamabhavatkṣitau āmalakī mahāvṛkṣaḥ sarvapāpapraṇāśanaḥ

वसिष्ठ ने कहा - हे महाभाग! मैं कहता हूँ कि यह पृथ्वी पर कैसे उत्पन्न हुआ। आमलकी एक महान वृक्ष है, जो सब पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 8 (padma.6.45.8)

एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजंगमे । नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे

ekārṇave purā jāte naṣṭe sthāvarajaṁgame naṣṭe devāsuragaṇe praṇaṣṭoragarākṣase

प्राचीन काल में जब एक ही अर्णव (जलराशि) रह गया था, चराचर सब नष्ट हो चुके थे, देव-असुर गण भी नष्ट हो गए थे, और नाग-राक्षस भी नष्ट हो चुके थे,

श्लोक 9 (padma.6.45.9)

तत्र देवादिदेवेशः परमात्मा सनातनः । जगाम ब्रह्मपरममात्मनः पदमव्ययम्

tatra devādideveśaḥ paramātmā sanātanaḥ jagāma brahmaparamamātmanaḥ padamavyayam

तब देवाधिदेवेश, सनातन परमात्मा, ब्रह्म के परम अविनाशी पद को प्राप्त हो गए थे।

श्लोक 10 (padma.6.45.10)

ततोऽस्य जाग्रतो ब्रह्ममुखाच्छशिसमप्रभः । ष्ठीवनाद्बिंदुरुत्पन्नः स भूमौ निपपात ह

tato'sya jāgrato brahmamukhācchaśisamaprabhaḥ ṣṭhīvanādbiṁdurutpannaḥ sa bhūmau nipapāta ha

तब जागृत होते हुए उनके मुख से चंद्रमा के समान कांतिमान एक बिंदु थूक के रूप में उत्पन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 11 (padma.6.45.11)

तस्माद्बिंदोः समुत्पन्नः स्वयं धात्री नगो महान् । शाखाप्रशाखाबहुलः फलभारेण नामितः

tasmādbiṁdoḥ samutpannaḥ svayaṁ dhātrī nago mahān śākhāpraśākhābahulaḥ phalabhāreṇa nāmitaḥ

उस बिंदु से स्वयं ही एक महान वृक्ष धात्री (आमलकी) उत्पन्न हो गया, जो अनेक शाखाओं और उपशाखाओं से भरा तथा फलों के भार से झुका हुआ था।

श्लोक 12 (padma.6.45.12)

सर्वेषां चैव वृक्षाणामादिरोहः प्रकीर्तितः । ब्रह्मणाथ ततः पश्चात्संसृष्टाश्च इमाः प्रजाः

sarveṣāṁ caiva vṛkṣāṇāmādirohaḥ prakīrtitaḥ brahmaṇātha tataḥ paścātsaṁsṛṣṭāśca imāḥ prajāḥ

यह सब वृक्षों में प्रथम उत्पन्न माना गया है। इसके पश्चात् ब्रह्मा द्वारा ये सभी प्रजाएँ रची गईं -

श्लोक 13 (padma.6.45.13)

देवदानवगंधर्वयक्षराक्षसपन्नगान् । असृजद्भगवान्देवो महर्षींश्च तथामलान्

devadānavagaṁdharvayakṣarākṣasapannagān asṛjadbhagavāndevo maharṣīṁśca tathāmalān

देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस और नाग; भगवान देव ने निर्मल महर्षियों को भी रचा।

श्लोक 14 (padma.6.45.14)

आजग्मुस्तत्र देवास्ते यत्र धात्री हरिप्रिया । तां दृष्ट्वा ते महाभाग परं विस्मयमागताः

ājagmustatra devāste yatra dhātrī haripriyā tāṁ dṛṣṭvā te mahābhāga paraṁ vismayamāgatāḥ

वे देवता वहाँ आए, जहाँ हरि की प्रिय धात्री (आमलकी) खड़ी थी। हे महाभाग! उसे देखकर वे परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 15 (padma.6.45.15)

न जानीम इमं वृक्षं चिंतयंतोऽभिसंस्थिताः । एवं चिंतयतां तेषां वागुवाचाशरीरिणी

na jānīma imaṁ vṛkṣaṁ ciṁtayaṁto'bhisaṁsthitāḥ evaṁ ciṁtayatāṁ teṣāṁ vāguvācāśarīriṇī

'हम इस वृक्ष को नहीं जानते' - ऐसा सोचते हुए वे वहीं खड़े रहे। उनके इस प्रकार सोचते समय, एक अशरीरी वाणी बोली -

श्लोक 16 (padma.6.45.16)

आमलकी नगो ह्येष प्रवरो वैष्णवो मतः । अस्य संस्मरणादेव लभेद्गोदानजं फलम्

āmalakī nago hyeṣa pravaro vaiṣṇavo mataḥ asya saṁsmaraṇādeva labhedgodānajaṁ phalam

'यह आमलकी वृक्ष है, जो सर्वश्रेष्ठ वैष्णव माना गया है। इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलता है।

श्लोक 17 (padma.6.45.17)

स्पर्शनाद्द्विगुणं पुण्यं त्रिगुणं धारणात्तथा । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेव्या आमलकी सदा

sparśanāddviguṇaṁ puṇyaṁ triguṇaṁ dhāraṇāttathā tasmātsarvaprayatnena sevyā āmalakī sadā

इसके स्पर्श से दुगुना पुण्य और इसे धारण करने से तिगुना पुण्य मिलता है। इसलिए सब प्रयत्नों से आमलकी की सदा सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 18 (padma.6.45.18)

सर्वपापहरा प्रोक्ता वैष्णवी पापनाशिनी । तस्या मूले स्थितो विष्णुस्तदूर्ध्वे च पितामहः

sarvapāpaharā proktā vaiṣṇavī pāpanāśinī tasyā mūle sthito viṣṇustadūrdhve ca pitāmahaḥ

यह वैष्णवी वृक्ष सब पापों को हरने वाला और पापनाशक कहा गया है। इसकी जड़ में विष्णु स्थित हैं और उसके ऊपर पितामह ब्रह्मा।

श्लोक 19 (padma.6.45.19)

स्कंधे च भगवान्रुद्रः संस्थितः परमेश्वरः । शाखासु मुनयः सर्वे प्रशाखासु च देवताः

skaṁdhe ca bhagavānrudraḥ saṁsthitaḥ parameśvaraḥ śākhāsu munayaḥ sarve praśākhāsu ca devatāḥ

इसके स्कंध पर भगवान परमेश्वर रुद्र विराजमान हैं; इसकी शाखाओं पर सभी मुनि और उपशाखाओं पर देवता निवास करते हैं।

श्लोक 20 (padma.6.45.20)

पर्णेषु चासते देवाः पुष्पेषु मरुतस्तथा । प्रजानां पतयः सर्वे फलेष्वेव व्यवस्थिताः

parṇeṣu cāsate devāḥ puṣpeṣu marutastathā prajānāṁ patayaḥ sarve phaleṣveva vyavasthitāḥ

इसके पत्तों में देवता निवास करते हैं, फूलों में मरुद्गण, और सब फलों में प्रजापतिगण स्थित हैं।

श्लोक 21 (padma.6.45.21)

सर्वदेवमयी ह्येषा धात्री च कथिता मया । तस्मात्पूज्यतमा ह्येषा विष्णुभक्तिपरायणैः

sarvadevamayī hyeṣā dhātrī ca kathitā mayā tasmātpūjyatamā hyeṣā viṣṇubhaktiparāyaṇaiḥ

यह धात्री सर्वदेवमयी बताई गई है। इसीलिए यह विष्णु-भक्ति में परायण लोगों के द्वारा सर्वाधिक पूज्य है।

श्लोक 22 (padma.6.45.22)

ऋषय ऊचुः - को भवान्न हि जानीमः कस्मात्कारणतां गतः । देवो वा यदि वा चान्यः कथयस्व यथातथम्

ṛṣaya ūcuḥ - ko bhavānna hi jānīmaḥ kasmātkāraṇatāṁ gataḥ devo vā yadi vā cānyaḥ kathayasva yathātatham

ऋषियों ने कहा - आप कौन हैं, हम नहीं जानते; आप किस कारण से यहाँ प्रकट हुए हैं? क्या आप कोई देवता हैं या अन्य कोई - यह यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 23 (padma.6.45.23)

वागुवाच - यः कर्ता सर्वभूतानां भुवनानां च सर्वशः । विस्मितान्विदुषः प्रेक्ष्य सोऽहं विष्णुः सनातनः

vāguvāca - yaḥ kartā sarvabhūtānāṁ bhuvanānāṁ ca sarvaśaḥ vismitānviduṣaḥ prekṣya so'haṁ viṣṇuḥ sanātanaḥ

वाणी ने कहा - जो समस्त प्राणियों और समस्त लोकों का कर्ता है, विद्वानों को विस्मित देखकर, मैं वही सनातन विष्णु हूँ।

श्लोक 24 (padma.6.45.24)

तच्छ्रुत्वा देवदेवस्य भाषितं ब्रह्मणः सुताः । अनादिनिधनं देवं स्तोतुं तत्र प्रचक्रमुः

tacchrutvā devadevasya bhāṣitaṁ brahmaṇaḥ sutāḥ anādinidhanaṁ devaṁ stotuṁ tatra pracakramuḥ

देवाधिदेव के इस वचन को सुनकर, ब्रह्मा के उन पुत्रों ने वहाँ उस आदि-अंतरहित देव की स्तुति करना आरंभ किया।

श्लोक 25 (padma.6.45.25)

नमो भूतात्मभूताय आत्मने परमात्मने । अच्युताय नमो नित्यमनंताय नमो नमः

namo bhūtātmabhūtāya ātmane paramātmane acyutāya namo nityamanaṁtāya namo namaḥ

'भूतात्मभूत, आत्मा, परमात्मा को नमस्कार है; अच्युत को सदा नमस्कार है, अनंत को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 26 (padma.6.45.26)

दामोदराय कवये यज्ञेशाय नमो नमः । एवं स्तुतस्तु ऋषिभिस्तुतोष भगवान्हरिः

dāmodarāya kavaye yajñeśāya namo namaḥ evaṁ stutastu ṛṣibhistutoṣa bhagavānhariḥ

दामोदर को, कवि को, यज्ञेश्वर को बार-बार नमस्कार है' - इस प्रकार ऋषियों द्वारा स्तुति किए जाने पर भगवान हरि संतुष्ट हुए।

श्लोक 27 (padma.6.45.27)

प्रत्युवाच महर्षींस्तानभीष्टं किं ददामि वः । ऋषय ऊचुः यदि तुष्टोऽसि भगवन्नस्माकं हितकाम्यया

pratyuvāca maharṣīṁstānabhīṣṭaṁ kiṁ dadāmi vaḥ ṛṣaya ūcuḥ yadi tuṣṭo'si bhagavannasmākaṁ hitakāmyayā

उन्होंने उन महर्षियों से पूछा - तुम्हें क्या इष्ट है, मैं क्या दूँ? ऋषियों ने कहा - हे भगवन्! यदि आप हमारे हित की कामना से प्रसन्न हैं,

श्लोक 28 (padma.6.45.28)

व्रतं किंचित्समाख्याहि स्वर्गमोक्षफलप्रदम् । धनधान्यप्रदं पुण्यमात्मनस्तुष्टिकारकम्

vrataṁ kiṁcitsamākhyāhi svargamokṣaphalapradam dhanadhānyapradaṁ puṇyamātmanastuṣṭikārakam

तो स्वर्ग और मोक्ष दोनों फल देने वाला कोई व्रत बताइए, जो धन-धान्य देने वाला, पुण्यकारी और आत्मा को संतोष देने वाला हो।

श्लोक 29 (padma.6.45.29)

अल्पायासं बहुफलं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । कृतेन येन देवेश विष्णुलोके महीयते

alpāyāsaṁ bahuphalaṁ vratānāmuttamaṁ vratam kṛtena yena deveśa viṣṇuloke mahīyate

जो कम परिश्रम से अधिक फल देने वाला हो, व्रतों में सर्वोत्तम व्रत हो, जिसे करने से, हे देवेश, विष्णुलोक में सम्मान मिले।

श्लोक 30 (padma.6.45.30)

विष्णुरुवाच- फाल्गुने शुक्लपक्षे तु पुष्येण द्वादशी यदि । भवेत्सा च महापुण्या महापातकनाशिनी

viṣṇuruvāca- phālgune śuklapakṣe tu puṣyeṇa dvādaśī yadi bhavetsā ca mahāpuṇyā mahāpātakanāśinī

विष्णु ने कहा - फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में यदि पुष्य नक्षत्र में द्वादशी हो, तो वह महापुण्यमयी और महापातकों का नाश करने वाली होती है।

श्लोक 31 (padma.6.45.31)

विशेषस्तत्र कर्त्तव्यः शृणुध्वं द्विजसत्तमाः । आमलकीं च संप्राप्य जागरं तत्र कारयेत्

viśeṣastatra karttavyaḥ śṛṇudhvaṁ dvijasattamāḥ āmalakīṁ ca saṁprāpya jāgaraṁ tatra kārayet

उस दिन एक विशेष कर्तव्य है - सुनो, हे द्विजसत्तमों! आमलकी वृक्ष को पाकर उसके नीचे रात्रि-जागरण करना चाहिए।

श्लोक 32 (padma.6.45.32)

सर्वपापविनिर्मुक्तो गोसहस्रफलं लभेत् । एतद्वः कथितं विप्रा व्रतानां व्रतमुत्तमम् । अर्चयित्वाच्युतं तस्यां विष्णुलोकान्न मुच्यते

sarvapāpavinirmukto gosahasraphalaṁ labhet etadvaḥ kathitaṁ viprā vratānāṁ vratamuttamam arcayitvācyutaṁ tasyāṁ viṣṇulokānna mucyate

इससे मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर सहस्र गौओं के दान का फल पाता है। हे विप्रों! मैंने तुम्हें व्रतों में सर्वोत्तम यह व्रत बताया है; उस दिन अच्युत की पूजा करने वाला विष्णुलोक से कभी मुक्त नहीं होता (अर्थात् वहीं से वापस नहीं आता)।

श्लोक 33 (padma.6.45.33)

ऋषय ऊचुः - व्रतस्यास्य विधिं ब्रूहि परिपूर्णं कथं भवेत् । के मंत्राः के नमस्काराः देवता का प्रकीर्तिता

ṛṣaya ūcuḥ - vratasyāsya vidhiṁ brūhi paripūrṇaṁ kathaṁ bhavet ke maṁtrāḥ ke namaskārāḥ devatā kā prakīrtitā

ऋषियों ने कहा - इस व्रत की पूर्ण विधि बताइए। कौन-से मंत्र हैं, कौन-से नमस्कार हैं, कौन-सी देवता कही गई है?

श्लोक 34 (padma.6.45.34)

कथं दानं कथं स्नानं कश्च पूजाविधिः स्मृतः । अर्घार्चनस्य मंत्रं तु कथयस्व यथातथम्

kathaṁ dānaṁ kathaṁ snānaṁ kaśca pūjāvidhiḥ smṛtaḥ arghārcanasya maṁtraṁ tu kathayasva yathātatham

दान कैसे करें, स्नान कैसे करें, पूजा-विधि क्या मानी गई है? अर्घ्य और अर्चना का मंत्र भी यथावत् बताइए।

श्लोक 35 (padma.6.45.35)

विष्णुरुवाच- श्रूयतां यो विधिः सम्यग्व्रतस्यास्य द्विजर्षभाः । एकादश्यां निराहारः स्थित्वा चैव परेऽहनि

viṣṇuruvāca- śrūyatāṁ yo vidhiḥ samyagvratasyāsya dvijarṣabhāḥ ekādaśyāṁ nirāhāraḥ sthitvā caiva pare'hani

विष्णु ने कहा - हे द्विजर्षभों! इस व्रत की सम्यक् विधि सुनो। एकादशी को निराहार रहकर, दूसरे दिन,

श्लोक 36 (padma.6.45.36)

भोक्ष्येऽहं पुंडरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत । इति कृत्वा तु नियमं दंतधावनपूर्वकम्

bhokṣye'haṁ puṁḍarīkākṣa śaraṇaṁ me bhavācyuta iti kṛtvā tu niyamaṁ daṁtadhāvanapūrvakam

'हे पुंडरीकाक्ष! मैं भोजन करूँगा, हे अच्युत! आप मेरी शरण बनें' - ऐसा नियम लेकर दतौन करने के पश्चात्,

श्लोक 37 (padma.6.45.37)

नालपेत्पतितांश्चौरांस्तथा पाषंडिनो नरान् । दुर्वृत्तान्भिन्नमर्यादान्गुरुदारप्रधर्षकान्

nālapetpatitāṁścaurāṁstathā pāṣaṁḍino narān durvṛttānbhinnamaryādāngurudārapradharṣakān

पतितों, चोरों, पाखंडी पुरुषों, दुराचारियों, मर्यादा भंग करने वालों और गुरु-पत्नी का अपमान करने वालों से बातचीत नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 38 (padma.6.45.38)

अपराह्णे ततः स्नानं विधिना कारयेद्बुधः । नद्यां तडागे कूपे वा गृहे वा नियतात्मवान्

aparāhṇe tataḥ snānaṁ vidhinā kārayedbudhaḥ nadyāṁ taḍāge kūpe vā gṛhe vā niyatātmavān

तत्पश्चात् बुद्धिमान व्यक्ति को अपराह्ण में विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए - नदी में, तालाब में, कुएँ में, अथवा नियंत्रित मन से घर में ही।

श्लोक 39 (padma.6.45.39)

मृत्तिकालंभनं पूर्वं ततः स्नानं च कारयेत् । अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे

mṛttikālaṁbhanaṁ pūrvaṁ tataḥ snānaṁ ca kārayet aśvakrāṁte rathakrāṁte viṣṇukrāṁte vasuṁdhare

पहले मिट्टी का स्पर्श करके फिर स्नान करना चाहिए - [मंत्र:] 'हे अश्वक्रांता, रथक्रांता, विष्णुक्रांता वसुंधरे,

श्लोक 40 (padma.6.45.40)

मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्

mṛttike hara me pāpaṁ yanmayā duṣkṛtaṁ kṛtam

हे मृत्तिका! मेरे उस पाप को हरो, जो मैंने दुष्कर्म किया है।' यह मिट्टी का मंत्र है।

श्लोक 41 (padma.6.45.41)

इति मृत्तिकामंत्रः । त्वमंबु सर्वभूतानां जीवनं तनुरक्षकम् । स्वेदजोद्भिज्जजातीनां रसानां पतये नमः

iti mṛttikāmaṁtraḥ tvamaṁbu sarvabhūtānāṁ jīvanaṁ tanurakṣakam svedajodbhijjajātīnāṁ rasānāṁ pataye namaḥ

'हे जल! तुम समस्त प्राणियों के जीवन और शरीर के रक्षक हो; स्वेदज और उद्भिज्ज जातियों के रसों के स्वामी को नमस्कार है।'

श्लोक 42 (padma.6.45.42)

स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु ह्रदप्रस्रवणेषु च । नदीषु देवखातेषु इदं स्नानं तु मे भवेत्

snāto'haṁ sarvatīrtheṣu hradaprasravaṇeṣu ca nadīṣu devakhāteṣu idaṁ snānaṁ tu me bhavet

'मैं सब तीर्थों में, सब सरोवरों और झरनों में, नदियों और देव-निर्मित खातों (कुंडों) में स्नान कर चुका - यही मेरा यह स्नान हो।' यह स्नान-मंत्र है।

श्लोक 43 (padma.6.45.43)

इति स्नानमंत्रः । जामदग्न्यं मुनिं चैव कारयित्वा हिरण्मयम् । माषकस्य सुवर्णस्य तदर्द्धार्द्धेन वा पुनः

iti snānamaṁtraḥ jāmadagnyaṁ muniṁ caiva kārayitvā hiraṇmayam māṣakasya suvarṇasya tadarddhārddhena vā punaḥ

तत्पश्चात् जामदग्न्य (परशुराम) मुनि की स्वर्णमय प्रतिमा बनवाकर, एक माषा सोने से अथवा उसके आधे या चौथाई भाग से,

श्लोक 44 (padma.6.45.44)

गृहमागत्य पूजायाः पूजाहोमं तु कारयेत् । ततश्चामलकीं गच्छेत्सर्वोपस्करसंयुतः

gṛhamāgatya pūjāyāḥ pūjāhomaṁ tu kārayet tataścāmalakīṁ gacchetsarvopaskarasaṁyutaḥ

घर लौटकर पूजा और पूजा-होम करना चाहिए। तत्पश्चात् समस्त पूजा-सामग्री सहित आमलकी वृक्ष के पास जाना चाहिए।

श्लोक 45 (padma.6.45.45)

आमलकीं ततो गत्वा परिशोध्य समंततः । स्थापयेत्सततं कुंभमव्रणं मंत्रपूर्वकम्

āmalakīṁ tato gatvā pariśodhya samaṁtataḥ sthāpayetsatataṁ kuṁbhamavraṇaṁ maṁtrapūrvakam

आमलकी के पास जाकर उसे चारों ओर से भलीभाँति शुद्ध करके, बिना दरार वाला कलश मंत्रपूर्वक वहाँ स्थिर रूप से स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 46 (padma.6.45.46)

पंचरत्नसमोपेतं दिव्यगंधाधिवासितम् । छत्रोपानद्युगोपेतं सितचंदनचर्चितम्

paṁcaratnasamopetaṁ divyagaṁdhādhivāsitam chatropānadyugopetaṁ sitacaṁdanacarcitam

उसे पाँच रत्नों से युक्त, दिव्य सुगंध से वासित, छत्र और जूतों की जोड़ी सहित, श्वेत चंदन से लेपित करना चाहिए।

श्लोक 47 (padma.6.45.47)

स्रग्दामलंबितग्रीवं सर्वधूपविधूपितम् । दीपमालाकुलं कुर्यात्सर्वतः सुमनोहरम्

sragdāmalaṁbitagrīvaṁ sarvadhūpavidhūpitam dīpamālākulaṁ kuryātsarvataḥ sumanoharam

उसकी गर्दन में माला लटकाई जाए, वह सभी प्रकार के धूप से सुवासित हो, दीपों की माला से घिरा हो और सब ओर से अत्यंत मनोहर बनाया जाए।

श्लोक 48 (padma.6.45.48)

तस्योपरि न्यसेत्पात्रं दिव्यलाजैः प्रपूरितम् । पात्रोपरि न्यसेद्देवं जामदग्न्यं महाप्रभम्

tasyopari nyasetpātraṁ divyalājaiḥ prapūritam pātropari nyaseddevaṁ jāmadagnyaṁ mahāprabham

उसके ऊपर दिव्य लावा (खील) से भरा हुआ पात्र रखना चाहिए; उस पात्र के ऊपर महाकांतिमान जामदग्न्य देव को स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 49 (padma.6.45.49)

विशोकाय नमः पादौ जानुनी विश्वरूपिणे । उग्राय च ततोऽप्यूरू कटी दामोदराय च

viśokāya namaḥ pādau jānunī viśvarūpiṇe ugrāya ca tato'pyūrū kaṭī dāmodarāya ca

'विशोक को नमस्कार, दोनों चरणों को; विश्वरूपी को, दोनों घुटनों को; उग्र को, फिर दोनों जंघाओं को; दामोदर को, कमर को -

श्लोक 50 (padma.6.45.50)

उदरं पद्मनाभाय उरः श्रीवत्सधारिणे । चक्रिणे वामबाहुं च दक्षिणं गदिने नमः

udaraṁ padmanābhāya uraḥ śrīvatsadhāriṇe cakriṇe vāmabāhuṁ ca dakṣiṇaṁ gadine namaḥ

पद्मनाभ को, उदर को; श्रीवत्सधारी को, वक्षस्थल को; चक्रधारी को, बायीं भुजा को; गदाधारी को, दाहिनी भुजा को नमस्कार है।

श्लोक 51 (padma.6.45.51)

वैकुंठाय नमः कंठमास्यं यज्ञमुखाय वै । नासां विशोकनिधये वासुदेवाय चाक्षिणी

vaikuṁṭhāya namaḥ kaṁṭhamāsyaṁ yajñamukhāya vai nāsāṁ viśokanidhaye vāsudevāya cākṣiṇī

वैकुंठ को नमस्कार, कंठ को; यज्ञमुख को, मुख को; विशोकनिधि को, नासिका को; वासुदेव को, दोनों नेत्रों को -

श्लोक 52 (padma.6.45.52)

ललाटं वामनायेति रामायेति भ्रुवौ नमः । सर्वात्मने तु तच्छीर्षं नम इत्यभिपूजयेत्

lalāṭaṁ vāmanāyeti rāmāyeti bhruvau namaḥ sarvātmane tu tacchīrṣaṁ nama ityabhipūjayet

वामन को, ललाट को; राम को, दोनों भौंहों को नमस्कार है। सर्वात्मा को, मस्तक को नमस्कार कहते हुए यह पूजा करनी चाहिए।'

श्लोक 53 (padma.6.45.53)

इति पूजामंत्रः । ततो देवाधिदेवाय अर्घं चैव प्रदापयेत् । फलेन चैव शुभ्रेण भक्तियुक्तेन चेतसा

iti pūjāmaṁtraḥ tato devādhidevāya arghaṁ caiva pradāpayet phalena caiva śubhreṇa bhaktiyuktena cetasā

यह पूजा-मंत्र है। तत्पश्चात् देवाधिदेव को अर्घ्य देना चाहिए, भक्तिपूर्ण मन से शुभ्र फल के साथ।

श्लोक 54 (padma.6.45.54)

ततो जागरणं कुर्याद्भक्तियुक्तेन चेतसा । नृत्यैर्गीतैश्च वादित्रैर्द्धर्माख्यानैः स्तवैरपि

tato jāgaraṇaṁ kuryādbhaktiyuktena cetasā nṛtyairgītaiśca vāditrairddharmākhyānaiḥ stavairapi

तत्पश्चात् भक्तिपूर्ण मन से रात्रि-जागरण करना चाहिए - नृत्य, गीत, वाद्य, धर्म-कथाओं और स्तोत्रों के साथ,

श्लोक 55 (padma.6.45.55)

वैष्णवैश्च तथाख्यानैः क्षपयेत्सर्वशर्वरीम् । प्रदक्षिणां ततः कुर्याद्धात्र्या वै विष्णुनामभिः

vaiṣṇavaiśca tathākhyānaiḥ kṣapayetsarvaśarvarīm pradakṣiṇāṁ tataḥ kuryāddhātryā vai viṣṇunāmabhiḥ

तथा वैष्णव कथाओं द्वारा भी सारी रात्रि व्यतीत करनी चाहिए। तत्पश्चात् उस धात्री की विष्णु-नामों के साथ परिक्रमा करनी चाहिए,

श्लोक 56 (padma.6.45.56)

अष्टाधिकं शतं चैव अष्टाविंशतिरेव वा । ततः प्रभाते समये कृत्वा नीराजनं हरेः

aṣṭādhikaṁ śataṁ caiva aṣṭāviṁśatireva vā tataḥ prabhāte samaye kṛtvā nīrājanaṁ hareḥ

एक सौ आठ बार या अट्ठाईस बार। तत्पश्चात् प्रातःकाल के समय हरि की आरती करके,

श्लोक 57 (padma.6.45.57)

ब्राह्मणं पूजयित्वा तु सर्वं तस्मै निवेदयेत् । जामदग्न्य घटे तत्र वस्त्रयुग्ममुपानहौ

brāhmaṇaṁ pūjayitvā tu sarvaṁ tasmai nivedayet jāmadagnya ghaṭe tatra vastrayugmamupānahau

ब्राह्मण की पूजा करके उसे सब कुछ अर्पित कर देना चाहिए। उस जामदग्न्य-कलश के साथ वस्त्र-युगल और जूते भी,

श्लोक 58 (padma.6.45.58)

जामदग्न्यस्वरूपेण प्रीयतां मम केशवः । ततश्चामलकीं स्पृष्ट्वा कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम्

jāmadagnyasvarūpeṇa prīyatāṁ mama keśavaḥ tataścāmalakīṁ spṛṣṭvā kṛtvā caiva pradakṣiṇām

[देते हुए कहना चाहिए -] 'जामदग्न्य के इस स्वरूप में मेरे केशव प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् आमलकी को स्पर्श करके और उसकी परिक्रमा करके,

श्लोक 59 (padma.6.45.59)

स्नानं कृत्वा विधानेन ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः । ततश्च स्वयमश्नीयात्कुटुंबेन समावृतः

snānaṁ kṛtvā vidhānena brāhmaṇānbhojayettataḥ tataśca svayamaśnīyātkuṭuṁbena samāvṛtaḥ

विधिपूर्वक स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। तत्पश्चात् स्वयं भी परिवार सहित भोजन करना चाहिए।

श्लोक 60 (padma.6.45.60)

एवं कृतेन यत्पुण्यं तत्सर्वं कथयामि ते । सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम्

evaṁ kṛtena yatpuṇyaṁ tatsarvaṁ kathayāmi te sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṁ sarvadāneṣu yatphalam

इस प्रकार करने से जो पुण्य मिलता है, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ - सब तीर्थों में जो पुण्य है, सब दानों में जो फल है,

श्लोक 61 (padma.6.45.61)

सर्वयज्ञाधिकं चैव लभते नात्र संशयः । एतद्वः सर्वमाख्यातं व्रतानामुत्तमं व्रतम्

sarvayajñādhikaṁ caiva labhate nātra saṁśayaḥ etadvaḥ sarvamākhyātaṁ vratānāmuttamaṁ vratam

वह सब यज्ञों से भी अधिक प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं। यह सब मैंने तुम्हें बताया है - व्रतों में यह सर्वोत्तम व्रत है।

श्लोक 62 (padma.6.45.62)

एतावदुक्त्वा देवेशस्तत्रैवांतरधीयत । ते चापि ऋषयः सर्वे चक्रुः सर्वमशेषतः

etāvaduktvā deveśastatraivāṁtaradhīyata te cāpi ṛṣayaḥ sarve cakruḥ sarvamaśeṣataḥ

इतना कहकर देवेश उसी स्थान पर अंतर्धान हो गए; और उन ऋषियों ने भी वह सब कुछ, बिना किसी शेष के, वैसा ही किया।

श्लोक 63 (padma.6.45.63)

तथा त्वमपि राजेन्द्र कर्तुमर्हसि सत्तम । व्रतमेतद्दुराधर्षं सर्वपापप्रमोचनम्

tathā tvamapi rājendra kartumarhasi sattama vratametaddurādharṣaṁ sarvapāpapramocanam

हे राजेंद्र! उसी प्रकार तुम्हें भी, हे सत्तम, इस अत्यंत दुर्धर्ष और सब पापों से मुक्त करने वाले व्रत को करना चाहिए।

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