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उत्तर खण्ड · अध्याय 46

चैत्र कृष्ण पापमोचनी एकादशी

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (padma.6.46.1)

युधिष्ठिर उवाच- फाल्गुनस्य सिते पक्षे श्रुता चामलकी तथा । चैत्रस्य कृष्णपक्षे तु किं नामैकादशी भवेत्

yudhiṣṭhira uvāca- phālgunasya site pakṣe śrutā cāmalakī tathā caitrasya kṛṣṇapakṣe tu kiṁ nāmaikādaśī bhavet

युधिष्ठिर ने कहा - फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में आमलकी एकादशी का वर्णन सुना गया। अब चैत्र के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है?

श्लोक 2 (padma.6.46.2)

श्रीकृष्ण उवाच- शृणु राजेंद्र वक्ष्यामि आख्यानं पापनाशनम् । यल्लोमशोऽब्रवीत्पृष्टो मांधात्रा चक्रवर्तिना

śrīkṛṣṇa uvāca- śṛṇu rājeṁdra vakṣyāmi ākhyānaṁ pāpanāśanam yallomaśo'bravītpṛṣṭo māṁdhātrā cakravartinā

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजेंद्र! सुनो, मैं वह पापनाशक आख्यान कहता हूँ, जो लोमश ऋषि ने चक्रवर्ती मांधाता के पूछने पर कहा था।

श्लोक 3 (padma.6.46.3)

मांधातोवाच - भगवन्श्रोतुमिच्छामि लोकानां हितकाम्यया । चैत्रस्य प्रथमे पक्षे का नामैकादशी भवेत् । को विधिः किं फलं तस्याः कथयस्व प्रसादतः

māṁdhātovāca - bhagavanśrotumicchāmi lokānāṁ hitakāmyayā caitrasya prathame pakṣe kā nāmaikādaśī bhavet ko vidhiḥ kiṁ phalaṁ tasyāḥ kathayasva prasādataḥ

मांधाता ने कहा - हे भगवन्! लोगों के हित की कामना से मैं सुनना चाहता हूँ। चैत्र के प्रथम पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? उसकी विधि क्या है, फल क्या है - कृपया बताइए।

श्लोक 4 (padma.6.46.4)

लोमश उवाच- चैत्रमास्यसिते पक्षे नाम्ना वै पापमोचनी । एकादशी समाख्याता पिशाचत्वविनाशिनी

lomaśa uvāca- caitramāsyasite pakṣe nāmnā vai pāpamocanī ekādaśī samākhyātā piśācatvavināśinī

लोमश ने कहा - चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी होती है, वह पापमोचनी नाम से कही गई है, जो पिशाचत्व का भी नाश करने वाली है।

श्लोक 5 (padma.6.46.5)

शृणु तस्याः प्रवक्ष्यामि कामदां सिद्धिदां नृप । कथां विचित्रां शुभदां पापघ्नीं धर्मदायिनीम्

śṛṇu tasyāḥ pravakṣyāmi kāmadāṁ siddhidāṁ nṛpa kathāṁ vicitrāṁ śubhadāṁ pāpaghnīṁ dharmadāyinīm

हे राजन्! सुनो, मैं उस कामना पूर्ण करने वाली, सिद्धि देने वाली, विचित्र, शुभप्रद, पापनाशक और धर्मदायिनी कथा को कहता हूँ।

श्लोक 6 (padma.6.46.6)

पुरा चैत्ररथोद्देशे अप्सरोगणसेविते । वसंतसमये प्राप्ते षट्पदाकुलिते वने

purā caitrarathoddeśe apsarogaṇasevite vasaṁtasamaye prāpte ṣaṭpadākulite vane

प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक वन में, जो अप्सराओं के समूह से सेवित था, वसंत ऋतु आने पर, जब वह वन भ्रमरों से भरा हुआ था,

श्लोक 7 (padma.6.46.7)

गंधर्वकन्यावादित्रै रमंति सह किंनरैः । पाकशासनमुख्याश्च क्रीडांते त्रिदिवौकसः

gaṁdharvakanyāvāditrai ramaṁti saha kiṁnaraiḥ pākaśāsanamukhyāśca krīḍāṁte tridivaukasaḥ

गंधर्व-कन्याएँ वाद्यों के साथ किन्नरों के संग रमण करती थीं; इंद्र आदि प्रमुख स्वर्गवासी वहाँ क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 8 (padma.6.46.8)

नापरं सुखदं किंचिद्विना चैत्ररथाद्वनम् । तस्मिन्वने तु मुनयस्तपंति बहुलं तपः

nāparaṁ sukhadaṁ kiṁcidvinā caitrarathādvanam tasminvane tu munayastapaṁti bahulaṁ tapaḥ

चैत्ररथ वन के समान सुखदायक कोई अन्य स्थान नहीं था। उस वन में मुनिजन गहन तपस्या करते थे।

श्लोक 9 (padma.6.46.9)

मेधावि नामानमृषिं तत्रस्थं ब्रह्मचारिणम् । अप्सरास्तं मुनिवरं मोहनायोपचक्रमे

medhāvi nāmānamṛṣiṁ tatrasthaṁ brahmacāriṇam apsarāstaṁ munivaraṁ mohanāyopacakrame

मेधावी नामक एक ब्रह्मचारी ऋषि वहाँ रहते थे; एक अप्सरा उस श्रेष्ठ मुनि को मोहित करने के लिए उनके पास आई।

श्लोक 10 (padma.6.46.10)

मंजुघोषेति विख्याता भावं तस्य वितन्वती । क्रोशमात्रं स्थिता तस्य भयादाश्रमसन्निधौ

maṁjughoṣeti vikhyātā bhāvaṁ tasya vitanvatī krośamātraṁ sthitā tasya bhayādāśramasannidhau

वह मंजुघोषा नाम से विख्यात थी। उसने अपना भाव प्रकट करते हुए, भय के कारण उनके आश्रम के पास एक कोस की दूरी पर स्थान लिया।

श्लोक 11 (padma.6.46.11)

गायंती मधुरं साधु पीडयंती विपंचिकाम् । गायंतीं तामथालोक्य पुष्पचंदनसेविताम्

gāyaṁtī madhuraṁ sādhu pīḍayaṁtī vipaṁcikām gāyaṁtīṁ tāmathālokya puṣpacaṁdanasevitām

वह मधुर स्वर में सुंदर गीत गाती हुई वीणा बजा रही थी। उस पुष्प और चंदन से सेवित, गीत गाती हुई उस अप्सरा को देखकर,

श्लोक 12 (padma.6.46.12)

कामोऽपि विजयाकांक्षी शिवभक्तान्मुनीश्वरान् । तस्याः शरीरे संवासमकरोन्मनसः सुतः

kāmo'pi vijayākāṁkṣī śivabhaktānmunīśvarān tasyāḥ śarīre saṁvāsamakaronmanasaḥ sutaḥ

विजय की इच्छा रखने वाले काम ने, जो शिव-भक्त मुनीश्वरों को भी जीतने की चाह रखता है, मन के उस पुत्र ने उसके शरीर में निवास कर लिया।

श्लोक 13 (padma.6.46.13)

कृत्वा भ्रुवौ धनुष्कोटिं गुणं कृत्वा कटाक्षकम् । मार्गणौ नयने कृत्वा पक्ष्मयुक्ते यथाक्रमम्

kṛtvā bhruvau dhanuṣkoṭiṁ guṇaṁ kṛtvā kaṭākṣakam mārgaṇau nayane kṛtvā pakṣmayukte yathākramam

उसने दोनों भौंहों को धनुष के दोनों सिरों के समान बनाकर, कटाक्ष को उसकी प्रत्यंचा बनाकर,

श्लोक 14 (padma.6.46.14)

कुचौ कृत्वा पटकुटीं विजयायोपचक्रमे । मंजुघोषाभवत्तस्य कामस्यैव वरूथिनी

kucau kṛtvā paṭakuṭīṁ vijayāyopacakrame maṁjughoṣābhavattasya kāmasyaiva varūthinī

पलकों सहित उसके दोनों नेत्रों को क्रमशः बाणों के समान बनाकर, दोनों स्तनों को वस्त्र-कुटी बनाकर, विजय-प्राप्ति के लिए आगे बढ़ा। मंजुघोषा उस काम की सेना बन गई।

श्लोक 15 (padma.6.46.15)

मेधाविनं मुनिं दृष्ट्वा सापि कामेन पीडिता । यौवनोद्भिन्नदेहोऽसौ मेधाव्यपि विराजते

medhāvinaṁ muniṁ dṛṣṭvā sāpi kāmena pīḍitā yauvanodbhinnadeho'sau medhāvyapi virājate

मेधावी मुनि को देखकर वह भी काम से पीड़ित हो उठी - यौवन से पूर्ण उस मुनि का शरीर भी उज्ज्वल था।

श्लोक 16 (padma.6.46.16)

सितोपवीतसहितो दृष्टः स्मर इवापरः । मेधावी वसते चासौ च्यवनस्याश्रमे शुभे

sitopavītasahito dṛṣṭaḥ smara ivāparaḥ medhāvī vasate cāsau cyavanasyāśrame śubhe

श्वेत उपवीत धारण किए हुए वे मानो कोई दूसरा काम ही प्रतीत हो रहे थे। वे मेधावी च्यवन के शुभ आश्रम में निवास करते थे।

श्लोक 17 (padma.6.46.17)

मंजुघोषा स्थितं तत्र दृष्ट्वा सा मुनिपुंगवम् । मदनस्य वशं प्राप्ता मंदं मंदमगायत

maṁjughoṣā sthitaṁ tatra dṛṣṭvā sā munipuṁgavam madanasya vaśaṁ prāptā maṁdaṁ maṁdamagāyata

वहाँ स्थित उस श्रेष्ठ मुनि को देखकर मंजुघोषा काम के वश में हो गई और धीरे-धीरे गाने लगी।

श्लोक 18 (padma.6.46.18)

रणद्वलयसंयुक्तां शिंजन्नूपुरमेखलाम् । गायंतीं तां तथाभूतां विलोक्य मुनिपुंगवः

raṇadvalayasaṁyuktāṁ śiṁjannūpuramekhalām gāyaṁtīṁ tāṁ tathābhūtāṁ vilokya munipuṁgavaḥ

चूड़ियों की झंकार और नूपुर-मेखला की रुनझुन से युक्त, गाती हुई उस अप्सरा को इस प्रकार देखकर, उस श्रेष्ठ मुनि ने,

श्लोक 19 (padma.6.46.19)

मदनेन ससैन्येन नीतो मोहवशं बलात् । मंजुघोषा समागम्य मुनिं दृष्ट्वा तथाविधम्

madanena sasainyena nīto mohavaśaṁ balāt maṁjughoṣā samāgamya muniṁ dṛṣṭvā tathāvidham

सेना सहित काम द्वारा बलपूर्वक मोह के वश में ला दिया गया। मंजुघोषा ने पास आकर उस मुनि को उस अवस्था में देखा,

श्लोक 20 (padma.6.46.20)

हावभावकटाक्षैस्तं मोहयामास चांगना । अधः संस्थाप्य वीणां सा सस्वजे तं मुनीश्वरम्

hāvabhāvakaṭākṣaistaṁ mohayāmāsa cāṁganā adhaḥ saṁsthāpya vīṇāṁ sā sasvaje taṁ munīśvaram

और हाव-भाव तथा कटाक्षों से उस स्त्री ने उन्हें और भी मोहित कर दिया। वीणा नीचे रखकर उसने उस मुनीश्वर का आलिंगन कर लिया,

श्लोक 21 (padma.6.46.21)

वलितेव लता वृक्षं वातवेगेन कंपितम् । सोऽपि रेमे तया सार्द्धं मेधावी मुनिपुंगवः

valiteva latā vṛkṣaṁ vātavegena kaṁpitam so'pi reme tayā sārddhaṁ medhāvī munipuṁgavaḥ

जैसे कोई लता वायु के वेग से हिलते हुए वृक्ष को लिपट जाती है। वे मेधावी श्रेष्ठ मुनि भी उसके साथ रमण करने लगे।

श्लोक 22 (padma.6.46.22)

तस्मिन्नेव ततो दृष्ट्वा तस्यास्तं देहमुत्तमम् । शिवतत्वं गतं तस्य कामतत्त्ववशं गतः

tasminneva tato dṛṣṭvā tasyāstaṁ dehamuttamam śivatatvaṁ gataṁ tasya kāmatattvavaśaṁ gataḥ

उसी अवस्था में उसके उस उत्तम शरीर को देखते हुए, उनका शिव-तत्त्व (शुद्ध चैतन्य) जाता रहा, और वे काम-तत्त्व के वश में आ गए।

श्लोक 23 (padma.6.46.23)

न निशां न दिनं सोऽपि रमन्जानाति कामुकः । बहुवर्षं गतः कालो मुनेराचारलोपतः

na niśāṁ na dinaṁ so'pi ramanjānāti kāmukaḥ bahuvarṣaṁ gataḥ kālo munerācāralopataḥ

वे कामी न रात्रि जानते थे, न दिन, रमण में लीन रहते हुए। मुनि के आचार-भ्रष्ट होने से बहुत वर्षों का काल बीत गया।

श्लोक 24 (padma.6.46.24)

मंजुघोषा देवलोकगमनायोपचक्रमे । गच्छंती तं प्रत्युवाच रमंतं मुनिसत्तमम् । आदेशो दीयतां ब्रह्मन्स्वदेशगमनाय मे

maṁjughoṣā devalokagamanāyopacakrame gacchaṁtī taṁ pratyuvāca ramaṁtaṁ munisattamam ādeśo dīyatāṁ brahmansvadeśagamanāya me

तब मंजुघोषा देवलोक जाने के लिए तैयार हुई। जाते हुए उसने रमण करते उस श्रेष्ठ मुनि से कहा - 'हे ब्रह्मन्! अपने देश जाने के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।'

श्लोक 25 (padma.6.46.25)

मेधाव्युवाच- अद्यैव त्वं समायाता प्रदोषादौ वरानने । यावत्प्रभातसंध्या स्यात्तावत्तिष्ठ ममांतिके । इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं भयभीता बभूव सा

medhāvyuvāca- adyaiva tvaṁ samāyātā pradoṣādau varānane yāvatprabhātasaṁdhyā syāttāvattiṣṭha mamāṁtike iti śrutvā munervākyaṁ bhayabhītā babhūva sā

मेधावी ने कहा - हे वरानने! तुम आज ही संध्या के आरंभ में आई हो; जब तक प्रातःकालीन संध्या न हो, तब तक मेरे पास ठहरो। मुनि का यह वचन सुनकर वह भय से भयभीत हो गई।

श्लोक 26 (padma.6.46.26)

पुनर्वै रमयामास तमृषिं नृपसत्तम । मुनेः शापभयाद्भीता बहुलान्परिवत्सरान्

punarvai ramayāmāsa tamṛṣiṁ nṛpasattama muneḥ śāpabhayādbhītā bahulānparivatsarān

हे नृपसत्तम! भय के कारण वह पुनः उस ऋषि के साथ रमण करने लगी, अनेक वर्षों तक मुनि के शाप के भय से।

श्लोक 27 (padma.6.46.27)

वर्षाणां पंचपंचाशन्नवमासदिनत्रयम् । सा रेमे मुनिना तस्य निशार्द्धमिव चाभवत्

varṣāṇāṁ paṁcapaṁcāśannavamāsadinatrayam sā reme muninā tasya niśārddhamiva cābhavat

सत्तावन वर्ष, नौ मास और तीन दिन तक वह उस मुनि के साथ रमण करती रही; उसे यह समय आधी रात के समान प्रतीत हुआ।

श्लोक 28 (padma.6.46.28)

सा तं पुनरुवाचाथ तस्मिन्काले गते मुनिम् । आदेशो दीयतां ब्रह्मन्गंतव्यं स्वगृहे मया

sā taṁ punaruvācātha tasminkāle gate munim ādeśo dīyatāṁ brahmangaṁtavyaṁ svagṛhe mayā

वह समय बीतने पर उसने पुनः उस मुनि से कहा - 'हे ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिए, मुझे अपने घर जाना है।'

श्लोक 29 (padma.6.46.29)

मेधाव्युवाच- प्रभातमधुना चास्ते श्रूयतां वचनं मम । संध्या यावच्च कुर्वेऽहं तावत्त्वं वै स्थिरा भव

medhāvyuvāca- prabhātamadhunā cāste śrūyatāṁ vacanaṁ mama saṁdhyā yāvacca kurve'haṁ tāvattvaṁ vai sthirā bhava

मेधावी ने कहा - अभी तो प्रातःकाल ही है, मेरा वचन सुनो। जब तक मैं संध्या-वंदन कर लूँ, तब तक तुम स्थिर होकर रहो।

श्लोक 30 (padma.6.46.30)

इति वाक्यं मुनेः श्रुत्वा जातानंदसमाकुला । स्मितं कृत्वा तु सा किंचित्प्रत्युवाच शुचिस्मिता

iti vākyaṁ muneḥ śrutvā jātānaṁdasamākulā smitaṁ kṛtvā tu sā kiṁcitpratyuvāca śucismitā

मुनि का यह वचन सुनकर वह आनंद से भर उठी; पवित्र मुस्कान वाली उसने कुछ मुस्कुराते हुए यह उत्तर दिया -

श्लोक 31 (padma.6.46.31)

अप्सरा उवाच-। कियत्प्रमाणा विप्रेंद्र तव संध्या गतानघ । मयि प्रसादं कृत्वा तु गतकालो विचार्यताम्

apsarā uvāca- kiyatpramāṇā vipreṁdra tava saṁdhyā gatānagha mayi prasādaṁ kṛtvā tu gatakālo vicāryatām

अप्सरा ने कहा - हे विप्रेंद्र, हे निष्पाप! आपकी कितनी संध्या बीत चुकी है? मुझ पर कृपा करके बीते हुए समय पर विचार कीजिए।

श्लोक 32 (padma.6.46.32)

इति तस्या वचः श्रुत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः । गतकालस्य विप्रेंद्र प्रमाणमकरोत्तदा

iti tasyā vacaḥ śrutvā vismayotphullalocanaḥ gatakālasya vipreṁdra pramāṇamakarottadā

उसका यह वचन सुनकर, हे विप्रेंद्र, वे विस्मय से चकित नेत्रों वाले हो गए, और तब उन्होंने बीते हुए समय का प्रमाण निकाला।

श्लोक 33 (padma.6.46.33)

समाश्च सप्तपंचाशद्गतास्तस्य तया सह । चुक्रोध सततस्तस्यै ज्वालामाली बभूव ह

samāśca saptapaṁcāśadgatāstasya tayā saha cukrodha satatastasyai jvālāmālī babhūva ha

उसके साथ सत्तावन वर्ष बीत चुके थे। तब उसके प्रति उनका सतत क्रोध ज्वाला की माला के समान भड़क उठा।

श्लोक 34 (padma.6.46.34)

नेत्राभ्यां विस्फुलिंगान्स मुंचमानोऽतिकोपनः । कालरूपां तु तां दृष्ट्वा तपसः क्षयकारिणीम्

netrābhyāṁ visphuliṁgānsa muṁcamāno'tikopanaḥ kālarūpāṁ tu tāṁ dṛṣṭvā tapasaḥ kṣayakāriṇīm

अत्यंत क्रोधित होकर वे अपने नेत्रों से चिंगारियाँ बिखेरने लगे। उसे काल-रूपिणी और अपनी तपस्या का क्षय करने वाली देखकर,

श्लोक 35 (padma.6.46.35)

दुःखार्जितं क्षयं नीतं तपोदृष्ट्वातयासह । सकंपोष्ठो मुनिस्तत्रप्रत्युवाचाकुलेंद्रियः

duḥkhārjitaṁ kṣayaṁ nītaṁ tapodṛṣṭvātayāsaha sakaṁpoṣṭho munistatrapratyuvācākuleṁdriyaḥ

उसके साथ रहते हुए दुःखपूर्वक अर्जित तपस्या के क्षय को देखकर, वहाँ काँपते होंठों वाले वे मुनि विचलित इंद्रियों से यह बोले -

श्लोक 36 (padma.6.46.36)

तां शशापाथमेधावी त्वं पिशाची भवेति च । धिक्त्वां पापे दुराचारे कुलटे पातकप्रिये

tāṁ śaśāpāthamedhāvī tvaṁ piśācī bhaveti ca dhiktvāṁ pāpe durācāre kulaṭe pātakapriye

उस मेधावी ने उसे शाप दिया - 'तू पिशाचिनी बन जा। धिक्कार है तुझे, हे पापिनी, दुराचारिणी, कुलटा, पाप-प्रिये!'

श्लोक 37 (padma.6.46.37)

तस्य शापेन सा दग्धा विनयावनता स्थिता । उवाच वचनं सुभ्रूः प्रसादं वांछती मुनिम् । प्रसादं कुरु विप्रेंद्र शापस्यानुग्रहं कुरु

tasya śāpena sā dagdhā vinayāvanatā sthitā uvāca vacanaṁ subhrūḥ prasādaṁ vāṁchatī munim prasādaṁ kuru vipreṁdra śāpasyānugrahaṁ kuru

उस शाप से दग्ध होकर वह विनयपूर्वक झुककर खड़ी हो गई। सुंदर भौंहों वाली उसने कृपा चाहते हुए मुनि से यह वचन कहा - 'हे विप्रेंद्र! कृपा कीजिए, इस शाप के प्रति अनुग्रह कीजिए।

श्लोक 38 (padma.6.46.38)

सतां संगो हि भवति वचोभिः सप्तभिः पदैः । त्वया सह मम ब्रह्मन्नीता वै बहुवत्सराः । एतस्मात्कारणात्स्वामिन्प्रसादं कुरु सुव्रत

satāṁ saṁgo hi bhavati vacobhiḥ saptabhiḥ padaiḥ tvayā saha mama brahmannītā vai bahuvatsarāḥ etasmātkāraṇātsvāminprasādaṁ kuru suvrata

सज्जनों की संगति सात शब्दों के भी बोलने से हो जाती है; और मैंने तो, हे ब्रह्मन्, आपके साथ इतने वर्ष बिताए हैं। इसी कारण, हे स्वामिन्, हे सुव्रत, कृपा कीजिए।'

श्लोक 39 (padma.6.46.39)

मुनिरुवाच- शृणु मे वचनं भद्रे शापानुग्रहकारकम् । किं करोमि त्वया पापे क्षयं नीतं महत्तपः

muniruvāca- śṛṇu me vacanaṁ bhadre śāpānugrahakārakam kiṁ karomi tvayā pāpe kṣayaṁ nītaṁ mahattapaḥ

मुनि ने कहा - हे भद्रे! मेरा यह शाप-निवारण करने वाला वचन सुनो। हे पापिनी! तूने मेरी महान तपस्या का क्षय कर दिया, अब मैं क्या करूँ?

श्लोक 40 (padma.6.46.40)

चैत्रस्य कृष्णपक्षे तु भवेदेकादशी शुभा । पापमोचनिका नाम सर्वपापक्षयंकरी

caitrasya kṛṣṇapakṣe tu bhavedekādaśī śubhā pāpamocanikā nāma sarvapāpakṣayaṁkarī

चैत्र के कृष्ण पक्ष में जो शुभ एकादशी होती है, वह पापमोचनी नाम से जानी जाती है और सब पापों का नाश करने वाली है।

श्लोक 41 (padma.6.46.41)

तस्या व्रते कृते शुभ्रे पिशाचत्वं प्रयास्यति । इत्युक्त्वा सोऽपि मेधावी जगाम पितुराश्रमम्

tasyā vrate kṛte śubhre piśācatvaṁ prayāsyati ityuktvā so'pi medhāvī jagāma piturāśramam

उस पवित्र व्रत को करने से तेरा पिशाचत्व दूर हो जाएगा।' ऐसा कहकर वह मेधावी अपने पिता के आश्रम को चले गए।

श्लोक 42 (padma.6.46.42)

तमागतं समालोक्य च्यवनः प्रत्युवाचतम् । किमेतद्विहितं पुत्र त्वया पुण्यं क्षयं कृतम्

tamāgataṁ samālokya cyavanaḥ pratyuvācatam kimetadvihitaṁ putra tvayā puṇyaṁ kṣayaṁ kṛtam

उसे इस प्रकार आया देखकर च्यवन ने उससे कहा - 'हे पुत्र! यह क्या हुआ, तूने अपना पुण्य क्यों नष्ट कर दिया?'

श्लोक 43 (padma.6.46.43)

मेधाव्युवाच- पातकं वै कृतं तात रमिता चाप्सरा मया । प्रायश्चित्तं ब्रूहि तात येन पापक्षयो भवेत्

medhāvyuvāca- pātakaṁ vai kṛtaṁ tāta ramitā cāpsarā mayā prāyaścittaṁ brūhi tāta yena pāpakṣayo bhavet

मेधावी ने कहा - हे तात! मैंने एक पाप कर डाला, मैं एक अप्सरा के साथ रमण करता रहा। हे तात! वह प्रायश्चित्त बताइए, जिससे मेरे पाप का नाश हो।

श्लोक 44 (padma.6.46.44)

च्यवन उवाच- चैत्रस्य चासिते पक्षे नाम्ना वै पापमोचनी । अस्या व्रते कृते पुत्र पापराशिः क्षयं व्रजेत्

cyavana uvāca- caitrasya cāsite pakṣe nāmnā vai pāpamocanī asyā vrate kṛte putra pāparāśiḥ kṣayaṁ vrajet

च्यवन ने कहा - चैत्र के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी है, वह पापमोचनी नाम से जानी जाती है। हे पुत्र! इसका व्रत करने से पापों की राशि क्षय को प्राप्त होती है।

श्लोक 45 (padma.6.46.45)

इति श्रुत्वा पितुर्वाक्यं कृतं तेन व्रतोत्तमम् । गतं पापं क्षयं तस्य तपोयुक्तो बभूव सः

iti śrutvā piturvākyaṁ kṛtaṁ tena vratottamam gataṁ pāpaṁ kṣayaṁ tasya tapoyukto babhūva saḥ

पिता का यह वचन सुनकर उसने वह उत्तम व्रत किया; उसका पाप नष्ट हो गया और वह पुनः तपस्या से युक्त हो गया।

श्लोक 46 (padma.6.46.46)

साप्येवं मंजुघोषा च कृत्वैतद्व्रतमुत्तमम् । पिशाचत्वाद्विनिर्मुक्ता पापमोचनिकाव्रतात् । दिव्यरूपधरा सा वै गता नाके वराप्सराः

sāpyevaṁ maṁjughoṣā ca kṛtvaitadvratamuttamam piśācatvādvinirmuktā pāpamocanikāvratāt divyarūpadharā sā vai gatā nāke varāpsarāḥ

उसी प्रकार मंजुघोषा ने भी इस उत्तम व्रत को करके, पापमोचनी व्रत के प्रभाव से पिशाचत्व से मुक्ति पाई; दिव्य रूप धारण करके वह श्रेष्ठ अप्सरा स्वर्गलोक चली गई।

श्लोक 47 (padma.6.46.47)

लोमश उवाच- पापमोचनिकां राजन्ये कुर्वंति नरोत्तमाः । तेषां पापं च यत्किंचित्तत्सर्वं च क्षयं व्रजेत्

lomaśa uvāca- pāpamocanikāṁ rājanye kurvaṁti narottamāḥ teṣāṁ pāpaṁ ca yatkiṁcittatsarvaṁ ca kṣayaṁ vrajet

लोमश ने कहा - हे राजन्! जो श्रेष्ठ मनुष्य पापमोचनी व्रत करते हैं, उनका जो भी पाप हो, वह सब नष्ट हो जाता है।

श्लोक 48 (padma.6.46.48)

पठनाच्छ्रवणाद्राजन्गोसहस्रफलं लभेत् । ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः

paṭhanācchravaṇādrājangosahasraphalaṁ labhet brahmahā hemahārī ca surāpo gurutalpagaḥ

हे राजन्! इसे पढ़ने और सुनने मात्र से सहस्र गौओं के दान का फल मिलता है। ब्रह्महत्यारा, स्वर्ण-चोर, मद्यपायी और गुरु-पत्नीगामी -

श्लोक 49 (padma.6.46.49)

व्रतस्य चास्य करणात्पापमुक्ता भवंति ते । बहुपुण्यप्रदं ह्येतत्करणाद्व्रतमुत्तमम्

vratasya cāsya karaṇātpāpamuktā bhavaṁti te bahupuṇyapradaṁ hyetatkaraṇādvratamuttamam

इस व्रत को करने से वे भी पाप से मुक्त हो जाते हैं। इस व्रत को करने से यह बहुत पुण्य देने वाला, व्रतों में सर्वोत्तम व्रत है।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47