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उत्तर खण्ड · अध्याय 48

वैशाख कृष्ण वरूथिनी एकादशी

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (padma.6.48.1)

युधिष्ठिर उवाच- वैशाखस्यासिते पक्षे किंनामैकादशी भवेत् । महिमानं कथय मे वासुदेव नमोऽस्तु ते

yudhiṣṭhira uvāca- vaiśākhasyāsite pakṣe kiṁnāmaikādaśī bhavet mahimānaṁ kathaya me vāsudeva namo'stu te

युधिष्ठिर ने कहा - वैशाख के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? हे वासुदेव! आपको नमस्कार है, मुझे उसकी महिमा बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.48.2)

श्रीकृष्ण उवाच- सौभाग्यदायिनी राजन्निहलोके परत्र च । वैशाखकृष्णपक्षे तु नाम्ना चैव वरूथिनी

śrīkṛṣṇa uvāca- saubhāgyadāyinī rājannihaloke paratra ca vaiśākhakṛṣṇapakṣe tu nāmnā caiva varūthinī

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजन्! वैशाख के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी है, वह इस लोक और परलोक दोनों में सौभाग्य देने वाली है, और वरूथिनी नाम से जानी जाती है।

श्लोक 3 (padma.6.48.3)

वरूथिन्या व्रतेनैव सौख्यं भवति सर्वदा । पापहानिश्च भवति सौभाग्यप्राप्तिरेव च

varūthinyā vratenaiva saukhyaṁ bhavati sarvadā pāpahāniśca bhavati saubhāgyaprāptireva ca

वरूथिनी के व्रत मात्र से सदा सुख प्राप्त होता है; पाप का नाश होता है और सौभाग्य की प्राप्ति भी होती है।

श्लोक 4 (padma.6.48.4)

दुर्भगा या करोत्येनां सा स्त्री सौभाग्यमाप्नुयात् । लोकानां चैव सर्वेषां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी

durbhagā yā karotyenāṁ sā strī saubhāgyamāpnuyāt lokānāṁ caiva sarveṣāṁ bhuktimuktipradāyinī

जो अभागिनी स्त्री इसका व्रत करती है, वह भी सौभाग्य पाती है। यह सब लोकों को भोग और मोक्ष दोनों देने वाली है।

श्लोक 5 (padma.6.48.5)

सर्वपापहरा नॄणां गर्भवासनिकृंतनी । वरूथिन्या व्रतेनैव मांधाता स्वर्गतिं गतः

sarvapāpaharā nṝṇāṁ garbhavāsanikṛṁtanī varūthinyā vratenaiva māṁdhātā svargatiṁ gataḥ

यह मनुष्यों के सब पापों को हरने वाली और गर्भवास को समाप्त करने वाली है। वरूथिनी व्रत के प्रभाव से ही मांधाता स्वर्ग को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 6 (padma.6.48.6)

धुंधुमारादयश्चान्ये राजानो बहवस्तथा । ब्रह्मकपालनिर्मुक्तो बभूव भगवान्भवः

dhuṁdhumārādayaścānye rājāno bahavastathā brahmakapālanirmukto babhūva bhagavānbhavaḥ

धुंधुमार आदि अन्य अनेक राजा भी इसी से स्वर्ग गए। इसी के प्रभाव से भगवान शिव भी ब्रह्म-हत्या के कपाल (ब्रह्महत्या के पाप) से मुक्त हुए।

श्लोक 7 (padma.6.48.7)

दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्यति यो नरः । कुरुक्षेत्रे रविग्रहे स्वर्णभारं ददाति यः । तत्तुल्यंफलमाप्नोतिवरूथिन्याव्रतंचरन्

daśavarṣasahasrāṇi tapastapyati yo naraḥ kurukṣetre ravigrahe svarṇabhāraṁ dadāti yaḥ tattulyaṁphalamāpnotivarūthinyāvrataṁcaran

जो मनुष्य दस हजार वर्षों तक तपस्या करता है, अथवा कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय सोने का पहाड़ दान करता है - वरूथिनी व्रत करने वाला उसी के समान फल पाता है।

श्लोक 8 (padma.6.48.8)

श्रद्धावान्यस्तु कुरुते वरूथिन्या व्रतं नरः । वांछितं लभते सोऽपि इहलोके परत्र च

śraddhāvānyastu kurute varūthinyā vrataṁ naraḥ vāṁchitaṁ labhate so'pi ihaloke paratra ca

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक वरूथिनी का व्रत करता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (padma.6.48.9)

पवित्रा पावनी ह्येषा महापातकनाशिनी । भुक्तिमुक्तिप्रदा चैव कर्तॄणां नृपसत्तम

pavitrā pāvanī hyeṣā mahāpātakanāśinī bhuktimuktipradā caiva kartṝṇāṁ nṛpasattama

हे नृपसत्तम! यह पवित्र और पावन एकादशी महापातकों का नाश करने वाली है, और इसे करने वालों को भोग तथा मोक्ष दोनों देने वाली है।

श्लोक 10 (padma.6.48.10)

अश्वदानान्नृपश्रेष्ठ गजदानं विशिष्यते । गजदानाद्भूमिदानं तिलदानं ततोऽधिकम्

aśvadānānnṛpaśreṣṭha gajadānaṁ viśiṣyate gajadānādbhūmidānaṁ tiladānaṁ tato'dhikam

हे नृपश्रेष्ठ! घोड़े के दान से बढ़कर हाथी का दान है; हाथी के दान से बढ़कर भूमि का दान है, और उससे भी बढ़कर तिल का दान है।

श्लोक 11 (padma.6.48.11)

तस्माच्च स्वर्णदानं वै अन्नदानं ततोऽधिकम् । अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति

tasmācca svarṇadānaṁ vai annadānaṁ tato'dhikam annadānātparaṁ dānaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

उससे भी बढ़कर स्वर्ण का दान है, और स्वर्ण-दान से भी बढ़कर अन्न का दान है। अन्न-दान से बढ़कर कोई दान न हुआ है और न होगा।

श्लोक 12 (padma.6.48.12)

पितृदेवमनुष्याणां तृप्तिरन्नेन जायते । तत्समं कविभिः प्रोक्तं कन्यादानं नृपोत्तम

pitṛdevamanuṣyāṇāṁ tṛptirannena jāyate tatsamaṁ kavibhiḥ proktaṁ kanyādānaṁ nṛpottama

अन्न से ही पितरों, देवताओं और मनुष्यों की तृप्ति होती है। हे नृपोत्तम! कवियों ने कन्यादान को उसके समान बताया है।

श्लोक 13 (padma.6.48.13)

धेनुदानं च तत्तुल्यमित्याह भगवान्स्वयम् । प्रोक्तेभ्यः सर्वदानेभ्यो विद्यादानं विशिष्यते

dhenudānaṁ ca tattulyamityāha bhagavānsvayam proktebhyaḥ sarvadānebhyo vidyādānaṁ viśiṣyate

गोदान भी उसी के समान है, ऐसा स्वयं भगवान ने कहा है। इन सब कहे गए दानों में विद्यादान सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 14 (padma.6.48.14)

तत्फलं समवाप्नोति नरः कृत्वा वरूथिनीम् । कन्यावित्तेन जीवंति ये नराः पापमोहिताः

tatphalaṁ samavāpnoti naraḥ kṛtvā varūthinīm kanyāvittena jīvaṁti ye narāḥ pāpamohitāḥ

वरूथिनी का व्रत करने वाला मनुष्य उसी का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य पापमोहित होकर कन्या के धन से जीवन-यापन करते हैं,

श्लोक 15 (padma.6.48.15)

पुण्यक्षयं ते गच्छंति निरयं यातनामयम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन न ग्राह्यं कन्यकाधनम्

puṇyakṣayaṁ te gacchaṁti nirayaṁ yātanāmayam tasmātsarvaprayatnena na grāhyaṁ kanyakādhanam

वे अपने पुण्य के क्षय को प्राप्त होते हैं और यातनामय नरक में जाते हैं। इसलिए सब प्रयत्नों से कन्या का धन कभी नहीं लेना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.6.48.16)

यश्च गृह्णाति लोभेन कन्यां क्रीत्वा च तद्धनम् । सोऽन्यजन्मनि राजेंद्र ओतुर्भवति निश्चितम्

yaśca gṛhṇāti lobhena kanyāṁ krītvā ca taddhanam so'nyajanmani rājeṁdra oturbhavati niścitam

जो लोभवश कन्या को बेचकर उसका धन ग्रहण करता है, हे राजेंद्र, वह निश्चित रूप से अगले जन्म में भेड़िया बनता है।

श्लोक 17 (padma.6.48.17)

कन्यां पुण्येन यो दद्याद्यथाशक्ति स्वलंकृताम् । तत्पुण्यसंख्यां नृपते चित्रगुप्तो न शक्नुयात्

kanyāṁ puṇyena yo dadyādyathāśakti svalaṁkṛtām tatpuṇyasaṁkhyāṁ nṛpate citragupto na śaknuyāt

जो पुण्य के भाव से अपनी सामर्थ्य के अनुसार सुसज्जित कन्या का दान करता है, हे नृपते, उसके पुण्य की गणना चित्रगुप्त भी नहीं कर सकते।

श्लोक 18 (padma.6.48.18)

तत्तुल्यं फलमाप्नोति नरः कृत्वा वरूथिनीम् । कांस्यं मांसं मसूरांश्च चणकान्कोद्रवांस्तथा

tattulyaṁ phalamāpnoti naraḥ kṛtvā varūthinīm kāṁsyaṁ māṁsaṁ masūrāṁśca caṇakānkodravāṁstathā

वरूथिनी का व्रत करने वाला मनुष्य उसी के समान फल प्राप्त करता है। कांसे के पात्र में भोजन, मांस, मसूर, चना और कोदो का अनाज,

श्लोक 19 (padma.6.48.19)

शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजन मैथुने । वैष्णवो व्रतकर्ता च दशम्यां दश वर्जयेत्

śākaṁ madhu parānnaṁ ca punarbhojana maithune vaiṣṇavo vratakartā ca daśamyāṁ daśa varjayet

साग, मधु, दूसरे का दिया हुआ अन्न, तथा पुनः भोजन और मैथुन - वैष्णव व्रती को दशमी के दिन इन दस वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 20 (padma.6.48.20)

द्यूतं क्रीडां च निद्रां च तांबूलं दंतधावनम् । परापवादं पैशुन्यं स्तेयं हिंसां तथा रतिम्

dyūtaṁ krīḍāṁ ca nidrāṁ ca tāṁbūlaṁ daṁtadhāvanam parāpavādaṁ paiśunyaṁ steyaṁ hiṁsāṁ tathā ratim

जुआ, क्रीड़ा, निद्रा, पान-सुपारी, दतौन, दूसरों की निंदा, चुगली, चोरी, हिंसा तथा काम-भोग -

श्लोक 21 (padma.6.48.21)

क्रोधं चैवानृतं वाक्यमेकादश्यां विवर्जयेत् । कांस्यं मांसं सुरां क्षौद्रं तैलं पतितभाषणम्

krodhaṁ caivānṛtaṁ vākyamekādaśyāṁ vivarjayet kāṁsyaṁ māṁsaṁ surāṁ kṣaudraṁ tailaṁ patitabhāṣaṇam

तथा क्रोध और असत्य वचन - इन सबका एकादशी के दिन त्याग करना चाहिए। कांसे का पात्र, मांस, मदिरा, शहद, तेल और पतितों से बातचीत,

श्लोक 22 (padma.6.48.22)

व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भोजनमैथुनम् । वृषपृष्ठं मसूरान्नं द्वादश्यां परिवर्जयेत्

vyāyāmaṁ ca pravāsaṁ ca punarbhojanamaithunam vṛṣapṛṣṭhaṁ masūrānnaṁ dvādaśyāṁ parivarjayet

व्यायाम, यात्रा, दुबारा भोजन, मैथुन, बैल की पीठ पर सवारी और मसूर का भोजन - इन सबका द्वादशी के दिन त्याग करना चाहिए।

श्लोक 23 (padma.6.48.23)

अनेन विधिना राजन्विहिता यैर्वरूथिनी । सर्वपापक्षयं कृत्वा दद्यात्प्रांतेऽक्षयां गतिम् । रात्रौ जागरणं कृत्वा पूजितो मधुसूदनः

anena vidhinā rājanvihitā yairvarūthinī sarvapāpakṣayaṁ kṛtvā dadyātprāṁte'kṣayāṁ gatim rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā pūjito madhusūdanaḥ

हे राजन्! जिन लोगों ने इस विधि से वरूथिनी का व्रत किया है, उन्होंने सब पापों का नाश करके अंत में अक्षय गति पाई है; रात्रि-जागरण करके मधुसूदन की पूजा की जाती है।

श्लोक 24 (padma.6.48.24)

सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यांति परमां गतिम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्या पापभीरुभिः

sarvapāpavinirmuktāste yāṁti paramāṁ gatim tasmātsarvaprayatnena kartavyā pāpabhīrubhiḥ

वे सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए पाप से डरने वालों को सब प्रयत्नों से यह व्रत करना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.6.48.25)

क्षपारितनयाद्भीतो नरः कुर्याद्वरूथिनीम् । पठनाच्छ्रवणाद्राजन्गोसहस्रफलं लभेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते

kṣapāritanayādbhīto naraḥ kuryādvarūthinīm paṭhanācchravaṇādrājangosahasraphalaṁ labhet sarvapāpavinirmukto viṣṇuloke mahīyate

आगे के जन्मों के भय से डरा हुआ मनुष्य वरूथिनी का व्रत करे। हे राजन्! इसे पढ़ने और सुनने मात्र से सहस्र गौओं के दान का फल मिलता है; वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में सम्मानित होता है।

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