उत्तर खण्ड · अध्याय 49
वैशाख शुक्ल मोहिनी एकादशी
श्लोक 1 (padma.6.49.1)
युधिष्ठिर उवाच- वैशाख शुक्लपक्षे तु किन्नामैकादशी भवेत् । किं फलं को विधिस्तत्र कथयस्व जनार्दन
yudhiṣṭhira uvāca- vaiśākha śuklapakṣe tu kinnāmaikādaśī bhavet kiṁ phalaṁ ko vidhistatra kathayasva janārdana
युधिष्ठिर ने कहा - वैशाख के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? हे जनार्दन! उसका फल और विधि क्या है, कृपया बताइए।
श्लोक 2 (padma.6.49.2)
श्रीकृष्ण उवाच- इदमेव पुरा पृष्टं रामचंद्रेण धीमता । वसिष्ठं प्रति राजेंद्र यत्त्वं मामनुपृच्छसि
śrīkṛṣṇa uvāca- idameva purā pṛṣṭaṁ rāmacaṁdreṇa dhīmatā vasiṣṭhaṁ prati rājeṁdra yattvaṁ māmanupṛcchasi
श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजेंद्र! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, यही प्रश्न पहले बुद्धिमान रामचंद्र ने वसिष्ठ से पूछा था।
श्लोक 3 (padma.6.49.3)
राम उवाच- भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि व्रतानामुत्तमं व्रतम् । सर्वपापक्षयकरं सर्वदुःखनिकृंतनम्
rāma uvāca- bhagavañchrotumicchāmi vratānāmuttamaṁ vratam sarvapāpakṣayakaraṁ sarvaduḥkhanikṛṁtanam
राम ने कहा - हे भगवन्! मैं व्रतों में सर्वोत्तम व्रत सुनना चाहता हूँ, जो सब पापों का नाश करने वाला और सब दुःखों को काटने वाला हो।
श्लोक 4 (padma.6.49.4)
मया दुःखानि भुक्तानि सीताविरहजानि तु । ततोऽहं भयभीतोऽस्मि पृच्छामि त्वां महामुने
mayā duḥkhāni bhuktāni sītāvirahajāni tu tato'haṁ bhayabhīto'smi pṛcchāmi tvāṁ mahāmune
सीता के वियोग से मैंने जो दुःख भोगे हैं, उनसे मैं भयभीत हूँ; इसीलिए, हे महामुने, मैं आपसे पूछता हूँ।
श्लोक 5 (padma.6.49.5)
वसिष्ठ उवाच- साधु पृष्टं त्वया राम तवैषा नैष्ठिकी मतिः । त्वन्नामग्रहणेनैव पूतो भवति मानवः
vasiṣṭha uvāca- sādhu pṛṣṭaṁ tvayā rāma tavaiṣā naiṣṭhikī matiḥ tvannāmagrahaṇenaiva pūto bhavati mānavaḥ
वसिष्ठ ने कहा - हे राम! तुमने अच्छा प्रश्न किया है, यह तुम्हारी दृढ़ बुद्धि को दर्शाता है। तुम्हारा नाम लेने मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है।
श्लोक 6 (padma.6.49.6)
तथापि कथयिष्यामि लोकानां हितकाम्यया । पवित्रं पावनानां च व्रतानामुत्तमं व्रतम्
tathāpi kathayiṣyāmi lokānāṁ hitakāmyayā pavitraṁ pāvanānāṁ ca vratānāmuttamaṁ vratam
फिर भी लोगों के हित की कामना से मैं कहता हूँ, यह पवित्र वस्तुओं में भी पवित्र और व्रतों में सर्वोत्तम व्रत है।
श्लोक 7 (padma.6.49.7)
वैशाखस्य सिते पक्षे राम चैकादशी भवेत् । मोहिनी नाम सा प्रोक्ता सर्वपापहरापराः
vaiśākhasya site pakṣe rāma caikādaśī bhavet mohinī nāma sā proktā sarvapāpaharāparāḥ
हे राम! वैशाख के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी है, वह मोहिनी नाम से कही गई है और सब पापों को हरने वाली परम एकादशी है।
श्लोक 8 (padma.6.49.8)
मोहजालात्प्रमुच्यंते पातकानां समूहतः । अस्या व्रत प्रभावेन सत्यं सत्यं वदाम्यहम्
mohajālātpramucyaṁte pātakānāṁ samūhataḥ asyā vrata prabhāvena satyaṁ satyaṁ vadāmyaham
इससे मनुष्य मोह के जाल से और पापों के समूह से मुक्त हो जाते हैं। मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, यह इसी व्रत के प्रभाव से होता है।
श्लोक 9 (padma.6.49.9)
अतः कारणतो राम कर्तव्यैषा भवादृशैः । पातकानां क्षयकरी महादुःखविनाशिनी
ataḥ kāraṇato rāma kartavyaiṣā bhavādṛśaiḥ pātakānāṁ kṣayakarī mahāduḥkhavināśinī
इसी कारण, हे राम, तुम्हारे जैसे लोगों को इसे अवश्य करना चाहिए। यह पापों का नाश करने वाली और महान दुःखों को मिटाने वाली है।
श्लोक 10 (padma.6.49.10)
शृणुष्वैकमना राम कथां पापहरां पराम् । यस्याः श्रवणमात्रेण महापापं प्रणश्यति
śṛṇuṣvaikamanā rāma kathāṁ pāpaharāṁ parām yasyāḥ śravaṇamātreṇa mahāpāpaṁ praṇaśyati
हे राम! एकाग्रचित्त होकर सुनो वह परम पापहारी कथा, जिसके सुनने मात्र से भी महापाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 11 (padma.6.49.11)
सरस्वत्यास्तटे रम्ये पुरी भद्रावती शुभा । द्युतिमान्नाम नृपतिस्तत्र राज्यं करोति वै
sarasvatyāstaṭe ramye purī bhadrāvatī śubhā dyutimānnāma nṛpatistatra rājyaṁ karoti vai
सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नामक शुभ नगरी थी; वहाँ द्युतिमान नामक राजा राज्य करते थे।
श्लोक 12 (padma.6.49.12)
चंद्रवंशोद्भवो नाम धृतिमान्सत्यसंगरः । तत्र वैश्यो निवसति धनधान्यसमृद्धिमान्
caṁdravaṁśodbhavo nāma dhṛtimānsatyasaṁgaraḥ tatra vaiśyo nivasati dhanadhānyasamṛddhimān
वहाँ चंद्रवंश में उत्पन्न, धैर्यवान और सत्यप्रतिज्ञ धनसंपन्न एक वैश्य निवास करता था।
श्लोक 13 (padma.6.49.13)
धनपाल इति ख्यातः पुण्यकर्मप्रवर्त्तकः । प्रपा कूप मठाराम तडाग गृहकारकः
dhanapāla iti khyātaḥ puṇyakarmapravarttakaḥ prapā kūpa maṭhārāma taḍāga gṛhakārakaḥ
वह धनपाल नाम से विख्यात था और पुण्य-कर्मों में सदा प्रवृत्त रहता था - प्याऊ, कुएँ, मठ, बगीचे और तालाब बनवाने वाला।
श्लोक 14 (padma.6.49.14)
विष्णुभक्तिरतः शांतस्तस्यासन्पंचपुत्रकाः । सुमना द्युतिमांश्चैव मेधावी सुकृतस्तथा
viṣṇubhaktirataḥ śāṁtastasyāsanpaṁcaputrakāḥ sumanā dyutimāṁścaiva medhāvī sukṛtastathā
वह विष्णु-भक्ति में लीन और शांत स्वभाव का था। उसके पाँच पुत्र थे - सुमना, द्युतिमान, मेधावी और सुकृत,
श्लोक 15 (padma.6.49.15)
पंचमो धृष्टबुद्धिश्च महापापरतः सदा । परस्त्रीसंगनिरतो विटगोष्ठी विशारदः
paṁcamo dhṛṣṭabuddhiśca mahāpāparataḥ sadā parastrīsaṁganirato viṭagoṣṭhī viśāradaḥ
और पाँचवाँ धृष्टबुद्धि, जो सदा महापाप में रत रहता था, दूसरों की स्त्रियों की संगति में लीन और दुष्टों की सभा में निपुण था।
श्लोक 16 (padma.6.49.16)
द्यूतादि व्यसनासक्तः परस्त्री रतिलालसः । न च देवार्चने बुद्धिर्नपितॄन्न द्विजान्प्रति
dyūtādi vyasanāsaktaḥ parastrī ratilālasaḥ na ca devārcane buddhirnapitṝnna dvijānprati
वह जुआ आदि दुर्व्यसनों में लिप्त और परस्त्री-रति की लालसा रखने वाला था; उसकी बुद्धि न तो देव-पूजा में लगती थी, न पितरों में, न ब्राह्मणों में।
श्लोक 17 (padma.6.49.17)
अन्यायवर्ती दुष्टात्मा पितुर्द्रव्यक्षयंकरः । अभक्ष्यभक्षकः पापी सुरापाने रतः सदा
anyāyavartī duṣṭātmā piturdravyakṣayaṁkaraḥ abhakṣyabhakṣakaḥ pāpī surāpāne rataḥ sadā
वह अन्यायी और दुष्टात्मा था, अपने पिता के धन का नाश करने वाला; वह अभक्ष्य वस्तुओं का भक्षक और पापी था, सदा मदिरापान में लीन रहता था।
श्लोक 18 (padma.6.49.18)
वेश्याकंठे क्षिप्तबाहुर्भ्रमन्दुष्टश्चतुष्पथे । पित्रा निष्कासितो गेहात्परित्यक्तश्च बांधवैः
veśyākaṁṭhe kṣiptabāhurbhramanduṣṭaścatuṣpathe pitrā niṣkāsito gehātparityaktaśca bāṁdhavaiḥ
वह वेश्याओं के गले में बाहें डाले चौराहों पर भटकता रहता था; अंततः पिता ने उसे घर से निकाल दिया और उसके बंधुओं ने भी उसे त्याग दिया।
श्लोक 19 (padma.6.49.19)
स्वदेहभूषणान्येव क्षयं नीतानि तेन वै । गणिकाभिः परित्यक्तो निंदितश्च धनक्षयात्
svadehabhūṣaṇānyeva kṣayaṁ nītāni tena vai gaṇikābhiḥ parityakto niṁditaśca dhanakṣayāt
उसके अपने शरीर के आभूषण भी उसने नष्ट कर डाले; गणिकाओं ने भी उसे त्याग दिया, और अपने धन के क्षय से वह निंदित हुआ।
श्लोक 20 (padma.6.49.20)
ततश्चिंतापरो जातो वस्त्रहीनः क्षुधार्दितः । किं करोमि क्वगच्छामि केनोपायेन जीव्यते
tataściṁtāparo jāto vastrahīnaḥ kṣudhārditaḥ kiṁ karomi kvagacchāmi kenopāyena jīvyate
तब वस्त्रहीन और भूख से पीड़ित होकर वह चिंतामग्न हो गया - मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किस उपाय से जीवन चलाऊँ?
श्लोक 21 (padma.6.49.21)
तस्करत्वं समारब्धं तत्रैव नगरे पितुः । गृहीतो राजपुरुषैर्मुक्तश्च पितृगौरवात्
taskaratvaṁ samārabdhaṁ tatraiva nagare pituḥ gṛhīto rājapuruṣairmuktaśca pitṛgauravāt
उसने उसी नगर में, अपने पिता के ही नगर में, चोरी करना आरंभ कर दिया; राजपुरुषों ने उसे पकड़ लिया, किंतु पिता के सम्मान के कारण उसे छोड़ दिया गया।
श्लोक 22 (padma.6.49.22)
पुनर्बद्धः पुनस्त्यक्तः पुनर्बद्धः ससंभ्रमैः । धृष्टबुद्धिर्दुराचारो निबध्य निगडै र्दृढैः
punarbaddhaḥ punastyaktaḥ punarbaddhaḥ sasaṁbhramaiḥ dhṛṣṭabuddhirdurācāro nibadhya nigaḍai rdṛḍhaiḥ
वह फिर बंधा गया, फिर छोड़ा गया, और फिर घबराए हुए लोगों द्वारा बाँधा गया; वह धृष्टबुद्धि, दुराचारी, दृढ़ बेड़ियों में जकड़ा गया।
श्लोक 23 (padma.6.49.23)
कशाघातैस्ताडितश्च पीडितश्च पुनः पुनः । न स्थातव्यं हि मंदात्मंस्त्वया मद्देशगोचरे
kaśāghātaistāḍitaśca pīḍitaśca punaḥ punaḥ na sthātavyaṁ hi maṁdātmaṁstvayā maddeśagocare
कोड़ों से पीटा गया और बार-बार पीड़ित किया गया। राजा ने कहा - 'हे मूर्ख! अब मेरे राज्य की सीमा में तुझे नहीं रहना चाहिए।'
श्लोक 24 (padma.6.49.24)
एवमुक्त्वा ततो राज्ञा मोचितो दृढबंधनात् । निर्जगाम भयात्तस्य गतोऽसौ गहनं वनम्
evamuktvā tato rājñā mocito dṛḍhabaṁdhanāt nirjagāma bhayāttasya gato'sau gahanaṁ vanam
ऐसा कहकर राजा ने उसे उस दृढ़ बंधन से मुक्त कर दिया। भय के मारे वह वहाँ से निकलकर घने वन में चला गया।
श्लोक 25 (padma.6.49.25)
क्षुत्तृषापीडितश्चायमितश्चेतश्च धावति । सिंहवन्निजघानासौ मृग शूकर चित्रलान्
kṣuttṛṣāpīḍitaścāyamitaścetaśca dhāvati siṁhavannijaghānāsau mṛga śūkara citralān
भूख-प्यास से पीड़ित होकर वह इधर-उधर दौड़ता रहा; सिंह के समान वह मृगों, सूअरों और चित्तीदार पशुओं का वध करने लगा।
श्लोक 26 (padma.6.49.26)
आमिषाहार निरतो वने तिष्ठति सर्वदा । करे शरासनं कृत्वा निषंगं पृष्ठ संगतम्
āmiṣāhāra nirato vane tiṣṭhati sarvadā kare śarāsanaṁ kṛtvā niṣaṁgaṁ pṛṣṭha saṁgatam
वह मांसाहार में लीन होकर सदा वन में ही रहने लगा; हाथ में धनुष लेकर और पीठ पर तरकश बाँधकर,
श्लोक 27 (padma.6.49.27)
अरण्यचारिणो हंति पक्षिणश्च पदाचरन् । चकोरांश्च मयूरांश्च कंक तित्तिर मूषिकान्
araṇyacāriṇo haṁti pakṣiṇaśca padācaran cakorāṁśca mayūrāṁśca kaṁka tittira mūṣikān
वह पैदल चलकर वन में विचरने वाले पक्षियों का वध करता था - चकोर, मोर, कंक (बाज़), तीतर और चूहों का भी।
श्लोक 28 (padma.6.49.28)
एतानन्यान्हिनस्त्यंधो धृष्टबुद्धिस्तु निर्घृणः । पूर्वजन्मकृतैः पापैर्निमग्नः पापकर्दमे
etānanyānhinastyaṁdho dhṛṣṭabuddhistu nirghṛṇaḥ pūrvajanmakṛtaiḥ pāpairnimagnaḥ pāpakardame
इन सबका और अन्य पशु-पक्षियों का भी वह अंधा, निर्दय धृष्टबुद्धि वध करता रहा, अपने पूर्वजन्म के पापों से पाप के कीचड़ में डूबा हुआ।
श्लोक 29 (padma.6.49.29)
दुःखशोकसमाविष्टः पीड्यमानो दिवानिशम् । कौंडिन्यस्याश्रमपदं प्राप्तः पुण्यागमात्क्वचित्
duḥkhaśokasamāviṣṭaḥ pīḍyamāno divāniśam kauṁḍinyasyāśramapadaṁ prāptaḥ puṇyāgamātkvacit
दुःख और शोक से भरा हुआ, दिन-रात पीड़ित रहते हुए, वह अपने किसी पूर्वपुण्य के उदय से कौंडिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा।
श्लोक 30 (padma.6.49.30)
माधवे मासि जाह्नव्याः कृतस्नानं तपोधनम् । आससाद धृष्टबुद्धिः शोकभारेण पीडितः
mādhave māsi jāhnavyāḥ kṛtasnānaṁ tapodhanam āsasāda dhṛṣṭabuddhiḥ śokabhāreṇa pīḍitaḥ
वैशाख मास में गंगा में स्नान करके लौट रहे उस तपोधन (कौंडिन्य) से शोक के भार से पीड़ित धृष्टबुद्धि आ मिला।
श्लोक 31 (padma.6.49.31)
तद्वस्त्रबिंदुस्पर्शेन गतपापो हताशुभः । कौंडिन्यस्याग्रतः स्थित्वा प्रत्युवाच कृतांजलि
tadvastrabiṁdusparśena gatapāpo hatāśubhaḥ kauṁḍinyasyāgrataḥ sthitvā pratyuvāca kṛtāṁjali
उनके वस्त्र की एक जल-बूँद के स्पर्श मात्र से उसका पाप और अशुभ दूर हो गया। तब वह कौंडिन्य के सामने खड़े होकर, हाथ जोड़कर बोला -
श्लोक 32 (padma.6.49.32)
धृष्टबुद्धिरुवाच- भो भो ब्रह्मन्द्विजश्रेष्ठ दयां कृत्वा ममोपरि । येन पुण्यप्रभावेन मुक्तिर्भवति तद्वद
dhṛṣṭabuddhiruvāca- bho bho brahmandvijaśreṣṭha dayāṁ kṛtvā mamopari yena puṇyaprabhāvena muktirbhavati tadvada
धृष्टबुद्धि ने कहा - हे ब्रह्मन्! हे द्विजश्रेष्ठ! मुझ पर दया करके, जिस पुण्य के प्रभाव से मुझे मुक्ति मिले, वह मुझे बताइए।
श्लोक 33 (padma.6.49.33)
कौंडिन्य उवाच- शृणुष्वैकमनाभूत्वा येन पापक्षयस्तव । वैशाखस्य सिते पक्षे मोहिनी नाम विश्रुता
kauṁḍinya uvāca- śṛṇuṣvaikamanābhūtvā yena pāpakṣayastava vaiśākhasya site pakṣe mohinī nāma viśrutā
कौंडिन्य ने कहा - एकाग्रचित्त होकर सुनो, जिससे तुम्हारे पाप का नाश होगा। वैशाख के शुक्ल पक्ष में मोहिनी नाम से विख्यात एकादशी है।
श्लोक 34 (padma.6.49.34)
एकादशीव्रतं तस्याः कुरु मद्वाक्यनोदितः । मेरुतुल्यानि पापानि क्षयं गच्छंति देहिनाम्
ekādaśīvrataṁ tasyāḥ kuru madvākyanoditaḥ merutulyāni pāpāni kṣayaṁ gacchaṁti dehinām
मेरे वचन से प्रेरित होकर उसका एकादशी-व्रत करो। मेरु पर्वत के समान भी बड़े पाप देहधारियों के नष्ट हो जाते हैं,
श्लोक 35 (padma.6.49.35)
बहुजन्मार्जितान्येषा मोहिनी समुपोषिता । इति वाक्यं मुनेः श्रुत्वा धृष्टबुद्धिः प्रसन्नधीः
bahujanmārjitānyeṣā mohinī samupoṣitā iti vākyaṁ muneḥ śrutvā dhṛṣṭabuddhiḥ prasannadhīḥ
अनेक जन्मों में अर्जित पाप भी, जब यह मोहिनी एकादशी का उपवास किया जाता है। मुनि के इस वचन को सुनकर धृष्टबुद्धि का मन प्रसन्न हो गया।
श्लोक 36 (padma.6.49.36)
व्रतं चकार विधिवत्कौंडिन्यस्योपदेशतः । कृते व्रते नृपश्रेष्ठ गतपापो बभूव सः
vrataṁ cakāra vidhivatkauṁḍinyasyopadeśataḥ kṛte vrate nṛpaśreṣṭha gatapāpo babhūva saḥ
उसने कौंडिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक वह व्रत किया। हे नृपश्रेष्ठ! व्रत पूरा होने पर वह पाप से मुक्त हो गया।
श्लोक 37 (padma.6.49.37)
दिव्यदेहस्ततो भूत्वा गरुडोपरिसंस्थितः । जगाम वैष्णवं लोकं सर्वोपद्रव वर्जितम्
divyadehastato bhūtvā garuḍoparisaṁsthitaḥ jagāma vaiṣṇavaṁ lokaṁ sarvopadrava varjitam
तत्पश्चात् वह दिव्य देह धारण करके गरुड़ पर सवार हो गया, और सब उपद्रवों से रहित वैष्णव लोक को चला गया।
श्लोक 38 (padma.6.49.38)
इतीदृशं रामचंद्र उत्तमं मोहिनी व्रतम् । नातः परतरं किंचित्त्रैलोक्ये सचराचरे
itīdṛśaṁ rāmacaṁdra uttamaṁ mohinī vratam nātaḥ parataraṁ kiṁcittrailokye sacarācare
हे रामचंद्र! ऐसा है यह उत्तम मोहिनी व्रत। चराचर त्रिलोक में इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है।
श्लोक 39 (padma.6.49.39)
यज्ञादितीर्थदानानि कलां नार्हंति षोडशीम् । पठनाच्छ्रवणाद्राजन्गोसहस्र फलं लभेत्
yajñāditīrthadānāni kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm paṭhanācchravaṇādrājangosahasra phalaṁ labhet
यज्ञ आदि तीर्थ और दान इसकी सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। हे राजन्! इसे पढ़ने और सुनने मात्र से सहस्र गौओं के दान का फल मिलता है।