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उत्तर खण्ड · अध्याय 51

ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी

अध्याय 50अध्याय-सूचीअध्याय 52

श्लोक 1 (padma.6.51.1)

युधिष्ठिर उवाच- अपरायाश्च माहात्म्यं श्रुतं सर्वं जनार्दन । ज्येष्ठस्य शुक्लपक्षे तु स्याद्या तां वद मानद

yudhiṣṭhira uvāca- aparāyāśca māhātmyaṁ śrutaṁ sarvaṁ janārdana jyeṣṭhasya śuklapakṣe tu syādyā tāṁ vada mānada

युधिष्ठिर ने कहा - हे जनार्दन! अपरा की सारी महिमा सुन ली गई। हे मानद! अब ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, वह बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.51.2)

श्रीकृष्ण उवाच- एनां वक्ष्यति धर्मात्मा व्यासः सत्यवतीसुतः । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो वेदवेदांगपारगः

śrīkṛṣṇa uvāca- enāṁ vakṣyati dharmātmā vyāsaḥ satyavatīsutaḥ sarvaśāstrārthatattvajño vedavedāṁgapāragaḥ

श्रीकृष्ण ने कहा - इसे धर्मात्मा व्यास, सत्यवती के पुत्र, जो समस्त शास्त्रों के तत्त्व के ज्ञाता और वेद-वेदांगों में पारंगत हैं, स्वयं कहेंगे।

श्लोक 3 (padma.6.51.3)

युधिष्ठिर उवाच- श्रुता मे मानवा धर्मा वासिष्ठाश्च श्रुता मया । द्वैपायन यथावत्त्वं वैष्णवान्वक्तुमर्हसि

yudhiṣṭhira uvāca- śrutā me mānavā dharmā vāsiṣṭhāśca śrutā mayā dvaipāyana yathāvattvaṁ vaiṣṇavānvaktumarhasi

युधिष्ठिर ने कहा - हे द्वैपायन! मैंने मानव धर्म और वासिष्ठ धर्म को सुना है; अब आप यथावत् वैष्णव धर्म भी कहिए।

श्लोक 4 (padma.6.51.4)

श्रीवेदव्यास उवाच - श्रुतास्तु मानवा धर्मा वैदिकाश्च श्रुतास्त्वया । कलौ युगे न शक्यंते ते वै कर्तुं नराधिप

śrīvedavyāsa uvāca - śrutāstu mānavā dharmā vaidikāśca śrutāstvayā kalau yuge na śakyaṁte te vai kartuṁ narādhipa

श्रीवेदव्यास ने कहा - तुमने मानव धर्म और वैदिक धर्म भी सुना है, किंतु हे नराधिप! कलियुग में उन सबका पालन करना संभव नहीं है।

श्लोक 5 (padma.6.51.5)

सुखोपायमल्पधनमल्पक्लेशं महाफलम् । पुराणानां च सर्वेषां सारभूतं महामते

sukhopāyamalpadhanamalpakleśaṁ mahāphalam purāṇānāṁ ca sarveṣāṁ sārabhūtaṁ mahāmate

सुख से किया जाने वाला, कम धन और कम कष्ट में महान फल देने वाला, समस्त पुराणों का सारभूत, हे महामते, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 6 (padma.6.51.6)

एकादश्यां न भुंजीत पक्षयोरुभयोरपि । द्वादश्यां तु शुचिर्भूत्वा पुष्पैः संपूज्य केशवम्

ekādaśyāṁ na bhuṁjīta pakṣayorubhayorapi dvādaśyāṁ tu śucirbhūtvā puṣpaiḥ saṁpūjya keśavam

एकादशी को दोनों पक्षों में भोजन नहीं करना चाहिए। द्वादशी को पवित्र होकर, फूलों से केशव की पूजा करके,

श्लोक 7 (padma.6.51.7)

अन्नं भुंजीत सत्कृत्य पश्चाद्विप्रपुरःसरम् । सूतकेऽपि न भोक्तव्यं नाशौचे च जनाधिप

annaṁ bhuṁjīta satkṛtya paścādviprapuraḥsaram sūtake'pi na bhoktavyaṁ nāśauce ca janādhipa

ब्राह्मणों को आगे रखकर भलीभाँति सत्कारपूर्वक भोजन करना चाहिए। हे जनाधिप! सूतक अथवा अशौच में भी भोजन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 8 (padma.6.51.8)

यावज्जीवं व्रतमिदं कर्त्तव्यं पुरुषर्षभ । स्वर्गतिं प्राप्तुमिच्छद्भिरत्र नैवास्ति संशयः

yāvajjīvaṁ vratamidaṁ karttavyaṁ puruṣarṣabha svargatiṁ prāptumicchadbhiratra naivāsti saṁśayaḥ

हे पुरुषर्षभ! यह व्रत जीवनभर करना चाहिए। स्वर्गगति चाहने वालों के लिए इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 9 (padma.6.51.9)

आपपापा दुराचाराः पापिष्ठा धर्मवर्जिताः । एकादश्यां न भुंजाना न ते यांति यमांतिकम्

āpapāpā durācārāḥ pāpiṣṭhā dharmavarjitāḥ ekādaśyāṁ na bhuṁjānā na te yāṁti yamāṁtikam

अत्यंत पापी, दुराचारी, अधम और धर्महीन लोग भी, यदि एकादशी को भोजन नहीं करते, तो वे यमराज के पास नहीं जाते।

श्लोक 10 (padma.6.51.10)

इति तद्वचनं श्रुत्वा कंपितोऽश्वत्थपत्रवत् । भीमसेनो महाबाहुर्नत्वोवाच गुरुं प्रति

iti tadvacanaṁ śrutvā kaṁpito'śvatthapatravat bhīmaseno mahābāhurnatvovāca guruṁ prati

यह वचन सुनकर, पीपल के पत्ते के समान काँपते हुए, महाबाहु भीमसेन ने गुरु को प्रणाम करके यह कहा -

श्लोक 11 (padma.6.51.11)

भीमसेन उवाच- पितामह महाबुद्धे शृणु मे परमं वचः । युधिष्ठिरश्च कुंती च तथा द्रुपदनंदिनी

bhīmasena uvāca- pitāmaha mahābuddhe śṛṇu me paramaṁ vacaḥ yudhiṣṭhiraśca kuṁtī ca tathā drupadanaṁdinī

भीमसेन ने कहा - हे पितामह! हे महाबुद्धे! मेरा यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण वचन सुनिए। युधिष्ठिर, कुंती और द्रुपद-नंदिनी (द्रौपदी),

श्लोक 12 (padma.6.51.12)

अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवस्तथैव च । एकादश्यां न भुंजंति कदाचिदपि सुव्रताः

arjuno nakulaścaiva sahadevastathaiva ca ekādaśyāṁ na bhuṁjaṁti kadācidapi suvratāḥ

अर्जुन, नकुल और सहदेव भी - ये सब्रत लोग किसी भी एकादशी को कभी भोजन नहीं करते।

श्लोक 13 (padma.6.51.13)

ते मां ब्रुवंति वै नित्यं मा भुंक्ष्व त्वं वृकोदर । अहं तानब्रुवं तात बुभुक्षा दुःसहा मम

te māṁ bruvaṁti vai nityaṁ mā bhuṁkṣva tvaṁ vṛkodara ahaṁ tānabruvaṁ tāta bubhukṣā duḥsahā mama

वे मुझसे सदा कहते हैं - 'हे वृकोदर! तुम मत खाओ।' मैं उनसे कहता हूँ, हे तात, कि मेरी भूख असह्य है।

श्लोक 14 (padma.6.51.14)

दानं दास्यामि विधिवत्पूजयिष्यामि केशवम् । भीमसेनवचः श्रुत्वा व्यासो वचनमब्रवीत्

dānaṁ dāsyāmi vidhivatpūjayiṣyāmi keśavam bhīmasenavacaḥ śrutvā vyāso vacanamabravīt

'मैं विधिपूर्वक दान दूँगा, केशव की पूजा करूँगा।' भीमसेन का यह वचन सुनकर व्यास ने यह उत्तर दिया -

श्लोक 15 (padma.6.51.15)

व्यास उवाच- यदि स्वर्गमभीष्टं ते नरकं दुष्टमेव च । एकादश्यां न भोक्तव्यं पक्षयोरुभयोरपि

vyāsa uvāca- yadi svargamabhīṣṭaṁ te narakaṁ duṣṭameva ca ekādaśyāṁ na bhoktavyaṁ pakṣayorubhayorapi

व्यास ने कहा - यदि तुम्हें स्वर्ग अभीष्ट है और दुष्ट नरक अनिष्ट है, तो दोनों पक्षों की एकादशी को कभी भोजन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.6.51.16)

भीमसेन उवाच- पितामह महाबुद्धे कथयामि तवाग्रतः । एकभक्ते न शक्नोमि उपवासे कुतः प्रभो

bhīmasena uvāca- pitāmaha mahābuddhe kathayāmi tavāgrataḥ ekabhakte na śaknomi upavāse kutaḥ prabho

भीमसेन ने कहा - हे पितामह! हे महाबुद्धे! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मैं एक समय भोजन करना भी नहीं कर सकता, फिर उपवास तो कैसे करूँ, हे प्रभो?

श्लोक 17 (padma.6.51.17)

वृकोऽपिनाम यो वह्निः स सदा जठरे मम । अतिवेलं यदाश्नामि तदा समुपशाम्यति

vṛko'pināma yo vahniḥ sa sadā jaṭhare mama ativelaṁ yadāśnāmi tadā samupaśāmyati

वृक नामक जो अग्नि मेरे उदर में सदा जलती रहती है, वह तभी शांत होती है जब मैं अत्यधिक भोजन कर लेता हूँ।

श्लोक 18 (padma.6.51.18)

नैकं शक्नोम्यहं कर्तुमुपवासं महामुने । येनैव प्राप्यते स्वर्गस्तत्कर्त्तास्मि यथातथम् । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्

naikaṁ śaknomyahaṁ kartumupavāsaṁ mahāmune yenaiva prāpyate svargastatkarttāsmi yathātatham tadekaṁ vada niścitya yena śreyo'hamāpnuyām

हे महामुने! मैं एक भी उपवास करने में समर्थ नहीं हूँ। किंतु जिससे स्वर्ग की प्राप्ति हो, वह मैं यथावत् अवश्य करूँगा - वह एक उपाय निश्चित करके मुझे बताइए, जिससे मैं कल्याण प्राप्त कर सकूँ।

श्लोक 19 (padma.6.51.19)

व्यास उवाच- वृषस्थे मिथुनस्थे वा यदा चैकादशी भवेत् । ज्येष्ठमासे प्रयत्नेन सोपोष्योदकवर्जिता

vyāsa uvāca- vṛṣasthe mithunasthe vā yadā caikādaśī bhavet jyeṣṭhamāse prayatnena sopoṣyodakavarjitā

व्यास ने कहा - वृष अथवा मिथुन राशि में सूर्य के होने पर, ज्येष्ठ मास में जो एकादशी होती है, उसका यत्नपूर्वक उपवास करना चाहिए, जल से भी रहित होकर।

श्लोक 20 (padma.6.51.20)

गंडूषाचमनं वारि वर्जयित्वोदकं बुधः । उपभुंजीत नैवेह व्रतभंगोऽन्यथा भवेत्

gaṁḍūṣācamanaṁ vāri varjayitvodakaṁ budhaḥ upabhuṁjīta naiveha vratabhaṁgo'nyathā bhavet

गंडूष अथवा आचमन के जल को छोड़कर, बुद्धिमान व्यक्ति को इसमें कोई भी जल ग्रहण नहीं करना चाहिए, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।

श्लोक 21 (padma.6.51.21)

उदयादुदयं यावद्वर्जयित्वोदकं नरः । श्रूयतां समवाप्नोति द्वादशद्वादशी फलम्

udayādudayaṁ yāvadvarjayitvodakaṁ naraḥ śrūyatāṁ samavāpnoti dvādaśadvādaśī phalam

सूर्योदय से लेकर अगले सूर्योदय तक जल का त्याग करने वाला मनुष्य, सुनो, बारह एकादशियों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (padma.6.51.22)

ततः प्रभाते विमले द्वादश्यां स्नानमाचरेत् । जलं सुवर्णं दत्त्वा च द्विजातिभ्यो यथाविधि

tataḥ prabhāte vimale dvādaśyāṁ snānamācaret jalaṁ suvarṇaṁ dattvā ca dvijātibhyo yathāvidhi

तत्पश्चात् द्वादशी के निर्मल प्रातःकाल में स्नान करना चाहिए, और द्विजातियों को विधिपूर्वक जल और सोना दान करके,

श्लोक 23 (padma.6.51.23)

भुंजीत कृतकृत्यस्तु ब्राह्मणैः सहितो वशी । एवं कृते च यत्पुण्यं भीमसेन शृणुष्व तत्

bhuṁjīta kṛtakṛtyastu brāhmaṇaiḥ sahito vaśī evaṁ kṛte ca yatpuṇyaṁ bhīmasena śṛṇuṣva tat

संयमी व्यक्ति को ब्राह्मणों सहित कृतकृत्य होकर भोजन करना चाहिए। हे भीमसेन! ऐसा करने पर जो पुण्य मिलता है, वह सुनो।

श्लोक 24 (padma.6.51.24)

संवत्सरे तु याश्चैव एकादश्यो भवंति हि । तासां फलमवाप्नोति ह्यत्र मे नास्ति संशयः

saṁvatsare tu yāścaiva ekādaśyo bhavaṁti hi tāsāṁ phalamavāpnoti hyatra me nāsti saṁśayaḥ

एक वर्ष में जितनी भी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल इससे प्राप्त होता है - इसमें मुझे कोई संशय नहीं है।

श्लोक 25 (padma.6.51.25)

इति मां केशवः प्राह शंखचक्रगदाधरः । सर्वान्परित्यज्य पुमान्मामेकं शरणं व्रजेत्

iti māṁ keśavaḥ prāha śaṁkhacakragadādharaḥ sarvānparityajya pumānmāmekaṁ śaraṇaṁ vrajet

शंख-चक्र-गदाधारी केशव ने स्वयं मुझसे यह कहा है - मनुष्य को सब कुछ त्यागकर मेरी ही एक शरण लेनी चाहिए।

श्लोक 26 (padma.6.51.26)

एकादश्यां निराहारस्ततः पापात्प्रमुच्यते । द्रव्यशुद्धिः कलौ नास्ति संस्कारः स्मार्त्त एव च

ekādaśyāṁ nirāhārastataḥ pāpātpramucyate dravyaśuddhiḥ kalau nāsti saṁskāraḥ smārtta eva ca

एकादशी को भोजन से रहित रहकर मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है। कलियुग में द्रव्य की शुद्धि नहीं रहती, न ही स्मार्त संस्कार शुद्ध रहते हैं।

श्लोक 27 (padma.6.51.27)

वैदिकस्तु कुतश्चापि प्राप्ते दुष्टे कलौ युगे । किं नु ते बहुनोक्तेन वायुपुत्र पुनः पुनः

vaidikastu kutaścāpi prāpte duṣṭe kalau yuge kiṁ nu te bahunoktena vāyuputra punaḥ punaḥ

फिर वैदिक संस्कार तो दुष्ट कलियुग में कहाँ से प्राप्त हों? हे वायुपुत्र! अधिक कहने से क्या लाभ, बार-बार यही कहता हूँ।

श्लोक 28 (padma.6.51.28)

एकादश्यां न भुंजीत पक्षयोरुभयोरपि । एकादश्यां सिते पक्षे ज्येष्ठेमास्युदकं विना

ekādaśyāṁ na bhuṁjīta pakṣayorubhayorapi ekādaśyāṁ site pakṣe jyeṣṭhemāsyudakaṁ vinā

एकादशी को दोनों पक्षों में भोजन नहीं करना चाहिए, और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तो जल के बिना ही रहना चाहिए।

श्लोक 29 (padma.6.51.29)

पुण्यं फलमवाप्नोति तच्छृणुष्व वृकोदर । संवत्सरे तु या प्रोक्ताः शुक्लः कृष्णा वृकोदर

puṇyaṁ phalamavāpnoti tacchṛṇuṣva vṛkodara saṁvatsare tu yā proktāḥ śuklaḥ kṛṣṇā vṛkodara

इससे जो पुण्य फल प्राप्त होता है, वह सुनो, हे वृकोदर। वर्षभर में जितनी भी शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशियाँ कही गई हैं,

श्लोक 30 (padma.6.51.30)

उपोषिता हि सर्वाः स्युरेकादश्यो न संशयः । धनधान्यप्रदा पुण्या पुत्रारोग्यशुभप्रदा

upoṣitā hi sarvāḥ syurekādaśyo na saṁśayaḥ dhanadhānyapradā puṇyā putrārogyaśubhapradā

उन सबका उपवास मानो हो ही गया - इसमें कोई संशय नहीं है। यह धन-धान्य देने वाली, पुण्यमयी, पुत्र-आरोग्य और शुभ प्रदान करने वाली है।

श्लोक 31 (padma.6.51.31)

उपोषिता नरव्याघ्र इति सत्यं ब्रवीमि ते । यमदूता महाकायाः करालाः कृष्णरूपिणः

upoṣitā naravyāghra iti satyaṁ bravīmi te yamadūtā mahākāyāḥ karālāḥ kṛṣṇarūpiṇaḥ

हे नरव्याघ्र! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इसका उपवास करने वाले के पास महाकाय, विकराल, काले रूप वाले यमदूत,

श्लोक 32 (padma.6.51.32)

दंडपाशधरा रौद्रा नोपसर्पंति तं नरम् । पीतांबरधरा सौम्याश्चक्रहस्ता मनोजवाः

daṁḍapāśadharā raudrā nopasarpaṁti taṁ naram pītāṁbaradharā saumyāścakrahastā manojavāḥ

दंड-पाश धारण किए हुए, भयंकर, नहीं आते। पीत वस्त्र धारण करने वाले, सौम्य, चक्र-हस्त और मन के समान वेग वाले [विष्णु के दूत],

श्लोक 33 (padma.6.51.33)

अंतकालेन यंत्येते वैष्णवान्वैष्णवीपुरीम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन उपोष्योदकवर्जिता

aṁtakālena yaṁtyete vaiṣṇavānvaiṣṇavīpurīm tasmātsarvaprayatnena upoṣyodakavarjitā

अंतकाल में इन वैष्णवों को वैष्णवी पुरी (वैकुंठ) ले जाते हैं। इसलिए सब प्रयत्नों से जल-रहित होकर उपवास करना चाहिए,

श्लोक 34 (padma.6.51.34)

जलधेनुं तदा दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते । ततस्त्वमस्यां कौंतेय सोपवासोऽर्चनं हरेः

jaladhenuṁ tadā dattvā sarvapāpaiḥ pramucyate tatastvamasyāṁ kauṁteya sopavāso'rcanaṁ hareḥ

तथा जल से भरी गाय (जलधेनु) का दान करना चाहिए, जिससे वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। हे कौंतेय! तब तुम भी इस एकादशी में उपवास और हरि की अर्चना करो,

श्लोक 35 (padma.6.51.35)

कुरु सर्वप्रयत्नेन सर्वपापप्रशांतये । स्वप्नेन मेऽपराधोस्ति दंतरागतयापि वा

kuru sarvaprayatnena sarvapāpapraśāṁtaye svapnena me'parādhosti daṁtarāgatayāpi vā

सब पापों की शांति के लिए सब प्रयत्नों से यह करो। [संकल्प-मंत्र:] 'यदि स्वप्न में या दतौन के दौरान मुझसे कोई अपराध हुआ हो,

श्लोक 36 (padma.6.51.36)

भोक्ष्येपरेऽह्नि देवेश ह्यशनं वासराद्धरेः । इत्युच्चार्य ततो मंत्र उपवासपरो भवेत्

bhokṣyepare'hni deveśa hyaśanaṁ vāsarāddhareḥ ityuccārya tato maṁtra upavāsaparo bhavet

तो भी, हे देवेश, मैं अगले दिन ही, हरि के दिन के उपवास के पश्चात्, भोजन करूँगा।' यह मंत्र बोलकर तब उपवास में लीन हो जाना चाहिए,

श्लोक 37 (padma.6.51.37)

सर्वपापविनाशाय श्रद्धा दम समन्वितः । मेरुमंदरमात्राघं स्त्रिया पुंसा च यत्कृतम्

sarvapāpavināśāya śraddhā dama samanvitaḥ merumaṁdaramātrāghaṁ striyā puṁsā ca yatkṛtam

सब पापों के नाश के लिए, श्रद्धा और संयम से युक्त होकर। स्त्री या पुरुष द्वारा किया गया मेरु और मंदराचल पर्वत के समान भी बड़ा पाप,

श्लोक 38 (padma.6.51.38)

सर्वं तद्भस्मतां याति एकादश्याः प्रभावतः । न शक्नुवंति ये दातुं जलधेनुं नराधिप

sarvaṁ tadbhasmatāṁ yāti ekādaśyāḥ prabhāvataḥ na śaknuvaṁti ye dātuṁ jaladhenuṁ narādhipa

वह सब एकादशी के प्रभाव से भस्म हो जाता है। हे नराधिप! जो लोग जलधेनु का दान करने में असमर्थ हों,

श्लोक 39 (padma.6.51.39)

सकांचनः प्रदातव्यो घटको वस्त्रसंयुतः । तोयस्य नियमं योऽस्या कुरुते वै स पुण्यभाक्

sakāṁcanaḥ pradātavyo ghaṭako vastrasaṁyutaḥ toyasya niyamaṁ yo'syā kurute vai sa puṇyabhāk

उन्हें सोने सहित वस्त्र से युक्त एक घड़ा दान करना चाहिए। जो इस एकादशी के जल-नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है।

श्लोक 40 (padma.6.51.40)

फलं कोटिसुवर्णस्य यामेयामे श्रुतं फलम् । स्नानं दानं जपं होमं यदस्यां कुरुते नरः

phalaṁ koṭisuvarṇasya yāmeyāme śrutaṁ phalam snānaṁ dānaṁ japaṁ homaṁ yadasyāṁ kurute naraḥ

इसके हर याम (प्रहर) में करोड़ स्वर्ण-दान का फल कहा गया है। स्नान, दान, जप और होम जो भी मनुष्य इस दिन करता है,

श्लोक 41 (padma.6.51.41)

तत्सर्वं चाक्षयं प्राप्तमेतत्कृष्णप्रभाषितम् । किं वापरेण धर्मेण निर्जलैकादशीं विना

tatsarvaṁ cākṣayaṁ prāptametatkṛṣṇaprabhāṣitam kiṁ vāpareṇa dharmeṇa nirjalaikādaśīṁ vinā

वह सब कृष्ण के ही वचन से अक्षय फल देने वाला माना गया है। निर्जला एकादशी के बिना अन्य किसी धर्म से क्या लाभ?

श्लोक 42 (padma.6.51.42)

उपोष्य सम्यग्विधिवद्वैष्णवं पदमाप्नुयात् । सुवर्णमन्नं वासो वा यदस्यां संप्रदीयते

upoṣya samyagvidhivadvaiṣṇavaṁ padamāpnuyāt suvarṇamannaṁ vāso vā yadasyāṁ saṁpradīyate

इसका भलीभाँति विधिपूर्वक उपवास करके मनुष्य वैष्णव पद को प्राप्त करता है। इस दिन जो सोना, अन्न या वस्त्र दान किया जाता है,

श्लोक 43 (padma.6.51.43)

तदस्य कुरुशार्दूल सर्वं चाप्यक्षयं भवेत् । एकादश्यां दिने योऽन्नं भुंक्ते पापं भुनक्ति सः

tadasya kuruśārdūla sarvaṁ cāpyakṣayaṁ bhavet ekādaśyāṁ dine yo'nnaṁ bhuṁkte pāpaṁ bhunakti saḥ

हे कुरुशार्दूल! वह सब भी अक्षय हो जाता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप ही खाता है।

श्लोक 44 (padma.6.51.44)

इहलोके स चांडालो मृतः प्राप्नोति दुर्गतिम् । ये च दास्यंति दानानि द्वादश्यां समुपोषिताः

ihaloke sa cāṁḍālo mṛtaḥ prāpnoti durgatim ye ca dāsyaṁti dānāni dvādaśyāṁ samupoṣitāḥ

वह इस लोक में चांडाल के समान है, और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है। जो लोग द्वादशी को उपवास करके दान देते हैं,

श्लोक 45 (padma.6.51.45)

ज्येष्ठमासे सिते पक्षे प्राप्स्यंति परमं पदम् । ब्रह्महा मद्यपः स्तेनो गुरुद्वेषी सदानृती

jyeṣṭhamāse site pakṣe prāpsyaṁti paramaṁ padam brahmahā madyapaḥ steno gurudveṣī sadānṛtī

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में, वे परम पद को प्राप्त करते हैं। ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर, गुरु से द्वेष रखने वाला और सदा झूठ बोलने वाला भी,

श्लोक 46 (padma.6.51.46)

मुच्यंते पातकैः सर्वैर्निर्जलायैरुपोषिता । विशेषं शृणु कौंतेय निर्जलैकादशी दिने

mucyaṁte pātakaiḥ sarvairnirjalāyairupoṣitā viśeṣaṁ śṛṇu kauṁteya nirjalaikādaśī dine

निर्जला एकादशी का उपवास करने से सब पापों से मुक्त हो जाता है। हे कौंतेय! अब एक विशेष बात सुनो, निर्जला एकादशी के दिन के विषय में।

श्लोक 47 (padma.6.51.47)

यत्कर्त्तव्यं नरैः स्त्रीभिर्दानं श्रद्धासमन्वितैः । जलशायी च संपूज्यो देया धेनुस्तथाम्मयी

yatkarttavyaṁ naraiḥ strībhirdānaṁ śraddhāsamanvitaiḥ jalaśāyī ca saṁpūjyo deyā dhenustathāmmayī

श्रद्धायुक्त पुरुषों और स्त्रियों को जो कर्तव्य है वह दान है; जलशायी विष्णु की पूजा करनी चाहिए, और जल से भरी गाय दान करनी चाहिए।

श्लोक 48 (padma.6.51.48)

प्रत्यक्षा वा नृपश्रेष्ठ घृतधेनुरथापि वा । दक्षिणाभिः सुपुष्टाभिर्मिष्टान्नैश्च पृथग्विधैः

pratyakṣā vā nṛpaśreṣṭha ghṛtadhenurathāpi vā dakṣiṇābhiḥ supuṣṭābhirmiṣṭānnaiśca pṛthagvidhaiḥ

हे नृपश्रेष्ठ! प्रत्यक्ष गाय अथवा घी से बनी गाय भी दी जा सकती है, तथा भरपूर दक्षिणा और विविध मिष्ट भोजन से,

श्लोक 49 (padma.6.51.49)

तोषणीयाः प्रयत्नेन द्विजा धर्मभृतां वर । तुष्टा भवंति वै विप्रास्तैस्तुष्टैर्मोक्षदो हरिः

toṣaṇīyāḥ prayatnena dvijā dharmabhṛtāṁ vara tuṣṭā bhavaṁti vai viprāstaistuṣṭairmokṣado hariḥ

हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक संतुष्ट करना चाहिए। ब्राह्मणों के प्रसन्न होने पर, उनके प्रसन्न होने से ही हरि मोक्ष देते हैं।

श्लोक 50 (padma.6.51.50)

आत्मद्रोहः कृतस्तैर्हि यैरेषा न ह्युपोषिता । पापात्मानो दुराचारा मुष्टास्ते नात्र संशयः

ātmadrohaḥ kṛtastairhi yaireṣā na hyupoṣitā pāpātmāno durācārā muṣṭāste nātra saṁśayaḥ

जिन्होंने इसका उपवास नहीं किया, उन्होंने निश्चय ही अपनी ही आत्मा के साथ द्रोह किया है। ऐसे पापात्मा और दुराचारी लोग निश्चय ही ठगे गए हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 51 (padma.6.51.51)

कुलानां शतमागामि अतीतानां तथा शतम् । आत्मना सह तैर्नीतं वासुदेवस्य मंदिरम्

kulānāṁ śatamāgāmi atītānāṁ tathā śatam ātmanā saha tairnītaṁ vāsudevasya maṁdiram

सौ आने वाले कुलों और सौ बीते हुए कुलों को, अपने साथ, जो लोग इस व्रत को करते हैं, वे वासुदेव के धाम में ले जाते हैं -

श्लोक 52 (padma.6.51.52)

शांतैर्दांतैर्दानपरैरर्चयद्भिस्तथा हरिम् । कुर्वद्भिर्जागरं रात्रौ यैरेषा समुपोषिता

śāṁtairdāṁtairdānaparairarcayadbhistathā harim kurvadbhirjāgaraṁ rātrau yaireṣā samupoṣitā

शांत, संयमी, दानपरायण होकर हरि की पूजा करने वाले और रात्रि-जागरण करने वाले, जिन्होंने इसका उपवास किया हो।

श्लोक 53 (padma.6.51.53)

अन्नं वस्त्रं तथा गावो जलं शय्यासनं शुभम् । कमंडलुं तथा छत्रं दातव्यं निर्जला दिने

annaṁ vastraṁ tathā gāvo jalaṁ śayyāsanaṁ śubham kamaṁḍaluṁ tathā chatraṁ dātavyaṁ nirjalā dine

निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, गौएँ, जल, शुभ शय्या-आसन,

श्लोक 54 (padma.6.51.54)

उपानहौ यो ददाति पात्रभूते द्विजोत्तमे । स सौवर्णेन यानेन स्वर्गलोके महीयते

upānahau yo dadāti pātrabhūte dvijottame sa sauvarṇena yānena svargaloke mahīyate

कमंडलु तथा छत्र भी दान करने चाहिए। जो कोई सुयोग्य ब्राह्मण को जूते दान करता है,

श्लोक 55 (padma.6.51.55)

यश्चेमां शृणुयाद्भक्त्या यश्चापि परिकीर्तयेत् । उभौ तौ स्वर्गमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा

yaścemāṁ śṛṇuyādbhaktyā yaścāpi parikīrtayet ubhau tau svargamāpnoti nātra kāryā vicāraṇā

वह स्वर्ण-निर्मित विमान पर सवार होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है। जो कोई इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, और जो कोई इसका कीर्तन करता है,

श्लोक 56 (padma.6.51.56)

यत्फलं संनिहत्यायां राहुग्रस्ते दिवाकरे । कृत्वा श्राद्धं लभेन्मर्त्यस्तदस्याः श्रवणादपि

yatphalaṁ saṁnihatyāyāṁ rāhugraste divākare kṛtvā śrāddhaṁ labhenmartyastadasyāḥ śravaṇādapi

वे दोनों स्वर्ग प्राप्त करते हैं, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। सूर्यग्रहण में संगम पर श्राद्ध करके मनुष्य जो फल पाता है,

श्लोक 57 (padma.6.51.57)

नियमं च प्रकर्त्तव्यं दंतधावनपूर्वकम् । एकादश्यां निराहारो वर्जयिष्यामि वै जलम्

niyamaṁ ca prakarttavyaṁ daṁtadhāvanapūrvakam ekādaśyāṁ nirāhāro varjayiṣyāmi vai jalam

वही फल इसे सुनने मात्र से भी प्राप्त होता है। दतौन के साथ यह नियम लेना चाहिए - 'एकादशी को मैं भोजन-रहित रहूँगा, जल का भी त्याग करूँगा,'

श्लोक 58 (padma.6.51.58)

केशवप्रीणनार्थाय अन्यदाचमनादृते । द्वादश्यां देवदेवेशः पूजनीयस्त्रिविक्रमः

keśavaprīṇanārthāya anyadācamanādṛte dvādaśyāṁ devadeveśaḥ pūjanīyastrivikramaḥ

केशव को प्रसन्न करने के लिए, आचमन के अतिरिक्त। द्वादशी को देवाधिदेव त्रिविक्रम की पूजा करनी चाहिए,

श्लोक 59 (padma.6.51.59)

गंधैर्धूपैस्तथा पुष्पैर्वासोभिः प्रियदर्शनैः । पूजयित्वा विधानेन मंत्रमेतमुदीरयेत्

gaṁdhairdhūpaistathā puṣpairvāsobhiḥ priyadarśanaiḥ pūjayitvā vidhānena maṁtrametamudīrayet

गंध, धूप, फूलों और मनभावन वस्त्रों से; विधिपूर्वक पूजा करके यह मंत्र बोलना चाहिए -

श्लोक 60 (padma.6.51.60)

देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक । उदकुंभप्रदानेन नय मां परमां गतिम्

devadeva hṛṣīkeśa saṁsārārṇavatāraka udakuṁbhapradānena naya māṁ paramāṁ gatim

'हे देवाधिदेव! हे हृषीकेश! हे संसार-सागर से तारने वाले! जल से भरे घड़े के दान से मुझे परम गति की ओर ले चलिए।'

श्लोक 61 (padma.6.51.61)

ज्येष्ठे मासि तु वै भीम या शुक्लैकादशी शुभा । निर्जला समुपोष्यात्र जलकुंभान्सशर्करान्

jyeṣṭhe māsi tu vai bhīma yā śuklaikādaśī śubhā nirjalā samupoṣyātra jalakuṁbhānsaśarkarān

हे भीम! ज्येष्ठ मास की जो शुभ शुक्ल एकादशी है, उसका जल-रहित उपवास करके, यहाँ शक्कर सहित जल के घड़े,

श्लोक 62 (padma.6.51.62)

प्रदाय विप्रमुख्येभ्यो मोदते विष्णुसन्निधौ । ततः कुंभाः प्रदातव्या ब्राह्मणानां च भक्तितः

pradāya vipramukhyebhyo modate viṣṇusannidhau tataḥ kuṁbhāḥ pradātavyā brāhmaṇānāṁ ca bhaktitaḥ

श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान करके, विष्णु के समीप आनंदित होता है। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को घड़े दान करने चाहिए,

श्लोक 63 (padma.6.51.63)

भोजयित्वा ततो विप्रान्स्वयं भुंजीत तत्परः । एवं यः कुरुते पूर्णां द्वादशीं पापनाशिनीम्

bhojayitvā tato viprānsvayaṁ bhuṁjīta tatparaḥ evaṁ yaḥ kurute pūrṇāṁ dvādaśīṁ pāpanāśinīm

ब्राह्मणों को भोजन कराकर तत्पर होकर स्वयं भी भोजन करना चाहिए। जो इस प्रकार पापनाशिनी द्वादशी को पूर्ण रूप से करता है,

श्लोक 64 (padma.6.51.64)

सर्वपापविनिर्मुक्तो पदं गच्छत्यनामयम् । ततः प्रभृति भीमेन कृता ह्येकादशी शुभा । पांडवद्वादशी नाम्ना लोके ख्याता बभूव ह

sarvapāpavinirmukto padaṁ gacchatyanāmayam tataḥ prabhṛti bhīmena kṛtā hyekādaśī śubhā pāṁḍavadvādaśī nāmnā loke khyātā babhūva ha

वह सब पापों से मुक्त होकर निर्दोष पद को प्राप्त होता है। उसी समय से भीम द्वारा की गई यह शुभ एकादशी, पांडव-द्वादशी नाम से लोक में विख्यात हुई।

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