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उत्तर खण्ड · अध्याय 54

श्रावण कृष्ण कामिका एकादशी

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (padma.6.54.1)

युधिष्ठिर उवाच- श्रावणस्य सिते पक्षे किंनामैकादशीभवेत् । तन्नः कथय गोविंद वासुदेव नमोऽस्तु ते

yudhiṣṭhira uvāca- śrāvaṇasya site pakṣe kiṁnāmaikādaśībhavet tannaḥ kathaya goviṁda vāsudeva namo'stu te

युधिष्ठिर ने कहा - श्रावण के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? हे गोविंद! वह हमें बताइए। हे वासुदेव! आपको नमस्कार है।

श्लोक 2 (padma.6.54.2)

श्रीकृष्ण उवाच- शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि आख्यानं पापनाशनम् । यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वं पृच्छते नारदाय वै

śrīkṛṣṇa uvāca- śṛṇu rājanpravakṣyāmi ākhyānaṁ pāpanāśanam yatproktaṁ brahmaṇā pūrvaṁ pṛcchate nāradāya vai

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजन्! सुनो, मैं वह पापनाशक आख्यान कहता हूँ, जो पहले ब्रह्मा ने पूछते हुए नारद से कहा था।

श्लोक 3 (padma.6.54.3)

नारद उवाच- भगवन्श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽहं कमलासन । श्रावणस्यासिते पक्षे किं नामैकादशी भवेत्

nārada uvāca- bhagavanśrotumicchāmi tvatto'haṁ kamalāsana śrāvaṇasyāsite pakṣe kiṁ nāmaikādaśī bhavet

नारद ने कहा - हे भगवन्! हे कमलासन! मैं आपसे सुनना चाहता हूँ। श्रावण के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है?

श्लोक 4 (padma.6.54.4)

को देवः को विधिस्तस्याः किं पुण्यं कथय प्रभो । इति तस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत्

ko devaḥ ko vidhistasyāḥ kiṁ puṇyaṁ kathaya prabho iti tasya vacaḥ śrutvā brahmā vacanamabravīt

उसका देवता कौन है, उसकी विधि क्या है, उसका पुण्य क्या है, हे प्रभो, बताइए। उसका यह वचन सुनकर ब्रह्मा ने यह उत्तर दिया -

श्लोक 5 (padma.6.54.5)

ब्रह्मोवाच- शृणु नारद ते वच्मि लोकानां हितकाम्यया । श्रावणैकादशी कृष्णा कामिका नाम नामतः

brahmovāca- śṛṇu nārada te vacmi lokānāṁ hitakāmyayā śrāvaṇaikādaśī kṛṣṇā kāmikā nāma nāmataḥ

ब्रह्मा ने कहा - हे नारद! सुनो, लोगों के हित की कामना से मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रावण की कृष्ण-पक्षीय एकादशी कामिका नाम से जानी जाती है।

श्लोक 6 (padma.6.54.6)

अस्याः श्रवणमात्रेण वाजपेयफलं लभेत् । अस्यां यजति देवेशं शंखचक्रगदाधरम्

asyāḥ śravaṇamātreṇa vājapeyaphalaṁ labhet asyāṁ yajati deveśaṁ śaṁkhacakragadādharam

इसके श्रवण मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस दिन शंख-चक्र-गदाधारी देवाधिदेव की पूजा की जाती है।

श्लोक 7 (padma.6.54.7)

श्रीधराख्यं हरिं विष्णुं माधवं मधुसूदनम् । पूजयेद्ध्यायते यो वै तस्य पुण्यंफलं शृणु

śrīdharākhyaṁ hariṁ viṣṇuṁ mādhavaṁ madhusūdanam pūjayeddhyāyate yo vai tasya puṇyaṁphalaṁ śṛṇu

जो कोई हरि, विष्णु, माधव और मधुसूदन को श्रीधर नाम से पूजता या ध्यान करता है, उसका पुण्य-फल सुनो।

श्लोक 8 (padma.6.54.8)

न गंगायां न काश्यां च नैमिषे न च पुष्करे । तत्फलं समवाप्नोति यत्फलं कृष्णपूजनात्

na gaṁgāyāṁ na kāśyāṁ ca naimiṣe na ca puṣkare tatphalaṁ samavāpnoti yatphalaṁ kṛṣṇapūjanāt

गंगा में, काशी में, नैमिष में या पुष्कर में भी वह फल नहीं मिलता, जो फल श्रीकृष्ण की पूजा से प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (padma.6.54.9)

गोदावर्यां गुरौ सिंहे व्यतीपाते च दंडके । यत्फलं समवाप्नोति तत्फलं कृष्णपूजनात्

godāvaryāṁ gurau siṁhe vyatīpāte ca daṁḍake yatphalaṁ samavāpnoti tatphalaṁ kṛṣṇapūjanāt

गोदावरी में, बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर, व्यतीपात योग में, तथा दंडकारण्य में जो फल प्राप्त होता है, वही फल श्रीकृष्ण की पूजा से मिलता है।

श्लोक 10 (padma.6.54.10)

ससागरवनोपेतां यो ददाति वसुंधराम् । कामिकाव्रतकारी च ह्युभौ समफलौ स्मृतौ

sasāgaravanopetāṁ yo dadāti vasuṁdharām kāmikāvratakārī ca hyubhau samaphalau smṛtau

जो सागर और वनों सहित पृथ्वी का दान करता है, और जो कामिका का व्रत करता है - दोनों का फल समान बताया गया है।

श्लोक 11 (padma.6.54.11)

प्रसूयमानां यो धेनुं दद्यात्सोपस्करां नरः । तत्फलं समवाप्नोति कामिकाव्रतकारकः

prasūyamānāṁ yo dhenuṁ dadyātsopaskarāṁ naraḥ tatphalaṁ samavāpnoti kāmikāvratakārakaḥ

जो मनुष्य ब्यायी हुई गाय को उसके सब उपकरणों सहित दान करता है, वैसा ही फल कामिका-व्रत करने वाले को मिलता है।

श्लोक 12 (padma.6.54.12)

श्रावणे श्रीधरं देवं पूजयेद्यो नरोत्तमः । तेनैव पूजिता देवा गंधर्वोरगपन्नगाः

śrāvaṇe śrīdharaṁ devaṁ pūjayedyo narottamaḥ tenaiva pūjitā devā gaṁdharvoragapannagāḥ

श्रावण में जो श्रेष्ठ मनुष्य श्रीधर देव की पूजा करता है, उसके द्वारा देवता, गंधर्व, नाग और सर्प भी पूजित हो जाते हैं।

श्लोक 13 (padma.6.54.13)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कामिकादिवसे हरिः । पूजनीयो यथाशक्ति मानुषैः पापभीरुभिः

tasmātsarvaprayatnena kāmikādivase hariḥ pūjanīyo yathāśakti mānuṣaiḥ pāpabhīrubhiḥ

इसलिए सब प्रयत्नों से पाप से डरने वाले मनुष्यों को कामिका के दिन अपनी शक्ति के अनुसार हरि की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 14 (padma.6.54.14)

ये संसारार्णवे मग्नाः पापपंकसमाकुले । तेषामुद्धरणार्थाय कामिकाव्रतमुत्तमम्

ye saṁsārārṇave magnāḥ pāpapaṁkasamākule teṣāmuddharaṇārthāya kāmikāvratamuttamam

जो लोग पाप-रूपी कीचड़ से भरे संसार-सागर में डूबे हुए हैं, उन्हें उबारने के लिए ही यह उत्तम कामिका-व्रत है।

श्लोक 15 (padma.6.54.15)

नातः परतरा काचित्पवित्रा पापहारिणी । एवं नारद जानीहि स्वयमाह परो हरिः

nātaḥ paratarā kācitpavitrā pāpahāriṇī evaṁ nārada jānīhi svayamāha paro hariḥ

इससे बढ़कर पवित्र और पापहारी कोई और एकादशी नहीं है। हे नारद! ऐसा जानो, यह स्वयं परम हरि ने कहा है।

श्लोक 16 (padma.6.54.16)

अध्यात्मविद्या निरतैर्यत्फलं प्राप्यते नरैः । ततो बहुतरं विद्धि कामिकाव्रतसेविनाम्

adhyātmavidyā niratairyatphalaṁ prāpyate naraiḥ tato bahutaraṁ viddhi kāmikāvratasevinām

अध्यात्म-विद्या में लीन मनुष्यों को जो फल मिलता है, उससे कहीं अधिक फल कामिका-व्रत का सेवन करने वालों को जानो।

श्लोक 17 (padma.6.54.17)

रात्रौ जागरणं कृत्वा कामिकाव्रतकृन्नरः । न पश्यति यमं रौद्रं नैव गच्छति दुर्गतिम्

rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā kāmikāvratakṛnnaraḥ na paśyati yamaṁ raudraṁ naiva gacchati durgatim

रात्रि-जागरण करके कामिका-व्रत करने वाला मनुष्य भयंकर यमराज को नहीं देखता, और न ही दुर्गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 18 (padma.6.54.18)

न पश्यति कुयोनिं च कामिकाव्रतसेवनात् । कामिकाया व्रते चीर्णे कैवल्यं योगिनो गताः

na paśyati kuyoniṁ ca kāmikāvratasevanāt kāmikāyā vrate cīrṇe kaivalyaṁ yogino gatāḥ

कामिका-व्रत के सेवन से वह निम्न योनि को भी नहीं देखता। कामिका का व्रत पूर्ण करने पर योगीजन कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 19 (padma.6.54.19)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्या नियतात्मभिः । तुलसीप्रभवैः पत्रैः यो नरः पूजयेद्धरिम्

tasmātsarvaprayatnena kartavyā niyatātmabhiḥ tulasīprabhavaiḥ patraiḥ yo naraḥ pūjayeddharim

इसलिए संयमी लोगों को सब प्रयत्नों से इसे करना चाहिए। जो मनुष्य तुलसी के पत्तों से हरि की पूजा करता है,

श्लोक 20 (padma.6.54.20)

न लिप्यते स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा । सुवर्णभारमेकं तु रजतं च चतुर्गुणम्

na lipyate sa pāpena padmapatramivāṁbhasā suvarṇabhāramekaṁ tu rajataṁ ca caturguṇam

वह पाप से उसी प्रकार अलिप्त रहता है जैसे कमल-पत्र जल से। एक भार सोना और उससे चौगुना चाँदी [दान करने से जो फल मिलता है],

श्लोक 21 (padma.6.54.21)

तत्फलं समवाप्नोति तुलसीदलपूजनात् । रत्न मौक्तिक वैडूर्य प्रवालादिभिरर्चितः

tatphalaṁ samavāpnoti tulasīdalapūjanāt ratna mauktika vaiḍūrya pravālādibhirarcitaḥ

वही फल तुलसीदल की पूजा से प्राप्त होता है। रत्न, मोती, वैडूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी,

श्लोक 22 (padma.6.54.22)

न तुष्यति तथा विष्णुस्तुलसीदलतो यथा । तुलसीमंजरीभिश्च पूजितो येन केशवः

na tuṣyati tathā viṣṇustulasīdalato yathā tulasīmaṁjarībhiśca pūjito yena keśavaḥ

विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने तुलसी के पत्ते से होते हैं। जिसने तुलसी की मंजरियों से केशव की पूजा की है -

श्लोक 23 (padma.6.54.23)

या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुः पावनी। रोगाणामभिवंदितानि रसिनी सिक्तांतकत्रासिनी । प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवतः कृष्णस्य संरोपिता। न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नमः

yā dṛṣṭā nikhilāghasaṁghaśamanī spṛṣṭā vapuḥ pāvanī rogāṇāmabhivaṁditāni rasinī siktāṁtakatrāsinī pratyāsattividhāyinī bhagavataḥ kṛṣṇasya saṁropitā nyastā taccaraṇe vimuktiphaladā tasyai tulasyai namaḥ

[तुलसी की स्तुति:] 'जिसका दर्शन समस्त पापों के समूह को शांत करने वाला है, जिसका स्पर्श शरीर को पवित्र करने वाला है, जो रोगों को हरने वाली और वंदनीय रसवाली है, जो सींची जाने पर काल को भी भयभीत करती है, जो भक्त को भगवान कृष्ण के निकट लाने वाली है, जो उन्हीं के द्वारा रोपी गई और उन्हीं के चरणों में रखी गई है, जो मुक्ति का फल देने वाली है - उस तुलसी को नमस्कार है।'

श्लोक 24 (padma.6.54.24)

दीपं ददाति यो मर्त्यो दिवारात्रं हरेर्दिने । तस्य पुण्यस्य संख्यातुं चित्रगुप्तो न वेत्त्यलम्

dīpaṁ dadāti yo martyo divārātraṁ harerdine tasya puṇyasya saṁkhyātuṁ citragupto na vettyalam

जो मनुष्य हरि के दिन दिन-रात दीप जलाता है, उसके पुण्य की गणना करने में स्वयं चित्रगुप्त भी समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 25 (padma.6.54.25)

कृष्णाग्रे दीपको यस्य ज्वलत्येकादशीदिने । पितरस्तस्य तृप्यंति अमृतेन दिवि स्थिताः

kṛṣṇāgre dīpako yasya jvalatyekādaśīdine pitarastasya tṛpyaṁti amṛtena divi sthitāḥ

जिसका दीपक कृष्ण के सामने एकादशी के दिन जलता है, उसके पितर स्वर्ग में स्थित होकर अमृत से तृप्त होते हैं।

श्लोक 26 (padma.6.54.26)

घृतेन दीपं प्रज्वाल्य तिलतैलेन वा पुनः । प्रयाति सूर्यलोकं च दीपकोटिशतार्चितः

ghṛtena dīpaṁ prajvālya tilatailena vā punaḥ prayāti sūryalokaṁ ca dīpakoṭiśatārcitaḥ

घी अथवा तिल के तेल से दीपक जलाकर, सैकड़ों करोड़ दीपों से पूजित होकर, वह सूर्यलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 27 (padma.6.54.27)

अयं तवाग्रे कथितः कामिकामहिमा मया । अतो नरैः प्रकर्त्तव्या सर्वपातकहारिणी

ayaṁ tavāgre kathitaḥ kāmikāmahimā mayā ato naraiḥ prakarttavyā sarvapātakahāriṇī

यह कामिका की महिमा मैंने तुम्हारे सामने कही है। इसलिए मनुष्यों को सब पातकों को हरने वाला यह व्रत अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.54.28)

ब्रह्महत्यापहरणी भ्रूणहत्याविनाशिनी । वैष्णवस्थानदात्री च महापुण्यफलप्रदा

brahmahatyāpaharaṇī bhrūṇahatyāvināśinī vaiṣṇavasthānadātrī ca mahāpuṇyaphalapradā

यह ब्रह्महत्या को हरने वाली, भ्रूण-हत्या का नाश करने वाली, वैष्णव-पद देने वाली और महापुण्य-फल प्रदान करने वाली है।

श्लोक 29 (padma.6.54.29)

श्रुत्वा माहात्म्यमेतस्या नरः श्रद्धासमन्वितः । विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वपापैः प्रमुच्यते

śrutvā māhātmyametasyā naraḥ śraddhāsamanvitaḥ viṣṇulokamavāpnoti sarvapāpaiḥ pramucyate

इसकी महिमा सुनकर श्रद्धायुक्त मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त करता है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।

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