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उत्तर खण्ड · अध्याय 56

भाद्रपद कृष्ण अजा एकादशी

अध्याय 55अध्याय-सूचीअध्याय 57

श्लोक 1 (padma.6.56.1)

युधिष्ठिर उवाच- भाद्रस्य कृष्णपक्षे तु किंनामैकादशीभवेत् । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कथयस्व जनार्दन

yudhiṣṭhira uvāca- bhādrasya kṛṣṇapakṣe tu kiṁnāmaikādaśībhavet etadicchāmyahaṁ śrotuṁ kathayasva janārdana

युधिष्ठिर ने कहा - भाद्रपद के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? हे जनार्दन! मैं इसे सुनना चाहता हूँ, कृपया बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.56.2)

श्रीकृष्ण उवाच- शृणुष्वैकमना राजन्कथयिष्यामि विस्तरात् । अजेति नामतः प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी

śrīkṛṣṇa uvāca- śṛṇuṣvaikamanā rājankathayiṣyāmi vistarāt ajeti nāmataḥ proktā sarvapāpapraṇāśinī

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजन्! एकाग्रचित्त होकर सुनो, मैं विस्तार से कहता हूँ। इसका नाम अजा है, जो सब पापों का नाश करने वाली कही गई है।

श्लोक 3 (padma.6.56.3)

पूजयित्वा हृषीकेशं व्रतमस्यां करोति यः । पापानि तस्य नश्यंति व्रतस्य श्रवणादपि

pūjayitvā hṛṣīkeśaṁ vratamasyāṁ karoti yaḥ pāpāni tasya naśyaṁti vratasya śravaṇādapi

जो हृषीकेश की पूजा करके इस एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं - इस व्रत के केवल सुनने मात्र से भी।

श्लोक 4 (padma.6.56.4)

नातः परतरा राजन्लोकद्वयहिताय वै । सत्यमुक्तं मया ह्येतन्नासत्यं मम भाषितम्

nātaḥ paratarā rājanlokadvayahitāya vai satyamuktaṁ mayā hyetannāsatyaṁ mama bhāṣitam

हे राजन्! दोनों लोकों के हित के लिए इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। मैंने यह सत्य ही कहा है, मेरा यह कथन असत्य नहीं है।

श्लोक 5 (padma.6.56.5)

हरिश्चन्द्र इति ख्यातो बभूव नृपतिः पुरा । चक्रवर्ती सत्यसंधः समस्ताया भुवः पतिः

hariścandra iti khyāto babhūva nṛpatiḥ purā cakravartī satyasaṁdhaḥ samastāyā bhuvaḥ patiḥ

प्राचीन काल में हरिश्चंद्र नाम से विख्यात एक राजा हुए, चक्रवर्ती, सत्य-प्रतिज्ञ, समस्त पृथ्वी के स्वामी।

श्लोक 6 (padma.6.56.6)

कस्यापि कर्मणः प्राप्तौ राज्यभ्रष्टो बभूव सः । विक्रीतौ वनितापुत्रौ स चकारात्मविक्रयम्

kasyāpi karmaṇaḥ prāptau rājyabhraṣṭo babhūva saḥ vikrītau vanitāputrau sa cakārātmavikrayam

किसी कर्म के फलस्वरूप वे राज्यभ्रष्ट हो गए; उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया, और स्वयं भी अपने आपको बेच डाला।

श्लोक 7 (padma.6.56.7)

पुल्कसस्य च दासत्वं गतो राजा स पुण्यकृत् । सत्यमालंब्य राजेंद्र मृतचैलापहारकः

pulkasasya ca dāsatvaṁ gato rājā sa puṇyakṛt satyamālaṁbya rājeṁdra mṛtacailāpahārakaḥ

वह पुण्यकर्मा राजा एक पुल्कस (चांडाल) का दास बन गया; हे राजेंद्र, सत्य पर स्थिर रहते हुए वे मृत व्यक्तियों के वस्त्र उतारने का कार्य करने लगे।

श्लोक 8 (padma.6.56.8)

सोऽभवन्नृपतिश्रेष्ठो न सत्याच्चलितस्तथा । एवं च तस्य नृपतेर्बहवो वत्सरा गताः

so'bhavannṛpatiśreṣṭho na satyāccalitastathā evaṁ ca tasya nṛpaterbahavo vatsarā gatāḥ

वह श्रेष्ठ राजा फिर भी सत्य से विचलित नहीं हुआ; इस प्रकार उस राजा के अनेक वर्ष बीत गए।

श्लोक 9 (padma.6.56.9)

ततश्चिंतापरो राजा स बभूवातिदुःखितः । किं करोमि क्व गच्छामि निष्कृतिर्मे कथं भवेत्

tataściṁtāparo rājā sa babhūvātiduḥkhitaḥ kiṁ karomi kva gacchāmi niṣkṛtirme kathaṁ bhavet

तब वह राजा चिंतामग्न होकर अत्यंत दुःखी हो गया - मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरा उद्धार कैसे हो?

श्लोक 10 (padma.6.56.10)

इति चिंतयतस्तस्य मग्नस्य वृजिनार्णवे । आजगाम मुनिः कश्चिज्ज्ञात्वा राजानमातुरम्

iti ciṁtayatastasya magnasya vṛjinārṇave ājagāma muniḥ kaścijjñātvā rājānamāturam

इस प्रकार दुःख-सागर में डूबे हुए उसे इस प्रकार सोचता देखकर, कोई मुनि उस पीड़ित राजा के पास आ पहुँचे।

श्लोक 11 (padma.6.56.11)

परोपकारणार्थाय निर्मिता ब्रह्मणा द्विजाः । स तं दृष्ट्वा द्विजवरं ननाम नृपसत्तमः

paropakāraṇārthāya nirmitā brahmaṇā dvijāḥ sa taṁ dṛṣṭvā dvijavaraṁ nanāma nṛpasattamaḥ

ब्रह्मा ने ब्राह्मणों को दूसरों की सहायता के लिए ही रचा है। उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को देखकर उस श्रेष्ठ राजा ने उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 12 (padma.6.56.12)

कृतांजलिपुटो भूत्वा गौतमस्याग्रतः स्थितः । कथयामास वृत्तांतमात्मनो दुःखसंयुतम्

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā gautamasyāgrataḥ sthitaḥ kathayāmāsa vṛttāṁtamātmano duḥkhasaṁyutam

हाथ जोड़कर गौतम मुनि के सामने खड़े होकर, उन्होंने अपने दुःखपूर्ण वृत्तांत को कह सुनाया।

श्लोक 13 (padma.6.56.13)

श्रुत्वा नृपतिवाक्यानि गौतमो विस्मयान्वितः । उपदेशं नृपतये व्रतस्यास्य ददौ मुनिः

śrutvā nṛpativākyāni gautamo vismayānvitaḥ upadeśaṁ nṛpataye vratasyāsya dadau muniḥ

राजा के वचन सुनकर गौतम अत्यंत विस्मित हुए; उस मुनि ने राजा को इस व्रत का उपदेश दिया।

श्लोक 14 (padma.6.56.14)

मासि भाद्रपदे राजन्कृष्णपक्षेति शोभना । एकादशी समायाता अजा नामेति पुण्यदा

māsi bhādrapade rājankṛṣṇapakṣeti śobhanā ekādaśī samāyātā ajā nāmeti puṇyadā

हे राजन्! भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में वह शोभन एकादशी आती है, जिसे अजा नाम से जाना जाता है और जो पुण्यदायिनी है।

श्लोक 15 (padma.6.56.15)

अस्याः कुरु व्रतं राजन्पापस्यांतो भविष्यति । तव भाग्यवशादेषा सप्तमेऽह्नि समागता

asyāḥ kuru vrataṁ rājanpāpasyāṁto bhaviṣyati tava bhāgyavaśādeṣā saptame'hni samāgatā

हे राजन्! इसका व्रत करो, तुम्हारे पाप का अंत हो जाएगा। तुम्हारे भाग्यवश ही यह सातवें दिन आ रही है।

श्लोक 16 (padma.6.56.16)

उपवासपरो भूत्वा रात्रौ जागरणं कुरु । एवमस्या व्रते चीर्णे तव पापक्षयो ध्रुवम्

upavāsaparo bhūtvā rātrau jāgaraṇaṁ kuru evamasyā vrate cīrṇe tava pāpakṣayo dhruvam

उपवास में लीन होकर रात्रि में जागरण करो। इस व्रत को इस प्रकार करने पर तुम्हारे पाप का क्षय निश्चित है।

श्लोक 17 (padma.6.56.17)

तव पुण्यप्रभावेण चागतोऽहं नृपोत्तम । इत्येवं कथयित्वा च मुनिरंतरधीयत

tava puṇyaprabhāveṇa cāgato'haṁ nṛpottama ityevaṁ kathayitvā ca muniraṁtaradhīyata

तुम्हारे ही पुण्य के प्रभाव से मैं यहाँ आया हूँ, हे नृपोत्तम।' ऐसा कहकर वह मुनि अंतर्धान हो गए।

श्लोक 18 (padma.6.56.18)

मुनिवाक्यं नृपः श्रुत्वा चकार व्रतमुत्तमम् । कृते तस्मिन्व्रते राज्ञः पापस्यांतोऽभवत्क्षणात्

munivākyaṁ nṛpaḥ śrutvā cakāra vratamuttamam kṛte tasminvrate rājñaḥ pāpasyāṁto'bhavatkṣaṇāt

मुनि के इस वचन को सुनकर राजा ने वह उत्तम व्रत किया; उस व्रत के करने पर राजा के पाप का अंत क्षणभर में हो गया।

श्लोक 19 (padma.6.56.19)

श्रूयतां राजशार्दूल प्रभावोऽस्य व्रतस्य च । यद्दुःखंबहुभिर्वर्षैर्भोक्तव्यंतत्क्षयोभवेत्

śrūyatāṁ rājaśārdūla prabhāvo'sya vratasya ca yadduḥkhaṁbahubhirvarṣairbhoktavyaṁtatkṣayobhavet

हे राजशार्दूल! इस व्रत के प्रभाव को सुनो - जिस दुःख का भोग अनेक वर्षों तक करना था, उसका भी क्षय हो गया।

श्लोक 20 (padma.6.56.20)

निस्तीर्णदुःखो राजासीद्व्रतस्यास्य प्रभावतः । पत्न्या सह समायोगं पुत्रजीवनमाप सः

nistīrṇaduḥkho rājāsīdvratasyāsya prabhāvataḥ patnyā saha samāyogaṁ putrajīvanamāpa saḥ

इस व्रत के प्रभाव से राजा दुःख से पार हो गए; उन्हें अपनी पत्नी के साथ मिलन और अपने पुत्र का जीवन [पुनः] प्राप्त हुआ।

श्लोक 21 (padma.6.56.21)

दिवि दुंदुभयो नेदुः पुष्पवर्षमभूद्दिवः । एकादश्याः प्रभावेन प्राप्यराज्यमकंटकम्

divi duṁdubhayo neduḥ puṣpavarṣamabhūddivaḥ ekādaśyāḥ prabhāvena prāpyarājyamakaṁṭakam

आकाश में दुंदुभियाँ बजने लगीं और स्वर्ग से फूलों की वर्षा हुई। एकादशी के प्रभाव से कंटकरहित राज्य को प्राप्त करके,

श्लोक 22 (padma.6.56.22)

स्वर्गं लेभे हरिश्चंद्रः सपुरः सपरिच्छदः । ईदृग्विधं व्रतंराजन्ये कुर्वंति च मानवाः

svargaṁ lebhe hariścaṁdraḥ sapuraḥ saparicchadaḥ īdṛgvidhaṁ vrataṁrājanye kurvaṁti ca mānavāḥ

हरिश्चंद्र अपने नगर और अपने समस्त परिवार सहित स्वर्ग को प्राप्त हुए। हे राजन्! इस प्रकार का यह व्रत जो मनुष्य करते हैं,

श्लोक 23 (padma.6.56.23)

सर्वपापविनिर्मुक्तास्त्रिदिवं यांति ते नृप । पठनाच्छ्रवणाद्वापि अश्वमेधफलं लभेत्

sarvapāpavinirmuktāstridivaṁ yāṁti te nṛpa paṭhanācchravaṇādvāpi aśvamedhaphalaṁ labhet

हे नृप! वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को जाते हैं। इसे पढ़ने अथवा सुनने मात्र से भी अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

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