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उत्तर खण्ड · अध्याय 59

आश्विन शुक्ल पापांकुशा एकादशी

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (padma.6.59.1)

युधिष्ठिर उवाच- कथयस्व प्रसादेन ममाग्रे मधुसूदन । इषस्य शुक्लपक्षे तु किं नामैकादशीभवेत्

yudhiṣṭhira uvāca- kathayasva prasādena mamāgre madhusūdana iṣasya śuklapakṣe tu kiṁ nāmaikādaśībhavet

युधिष्ठिर ने कहा - हे मधुसूदन! कृपया मुझे बताइए। आश्विन के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है?

श्लोक 2 (padma.6.59.2)

श्रीकृष्ण उवाच- शृणुराजेंद्र वक्ष्यामि माहात्म्यं पाप नाशनम् । शुक्लपक्षे चाश्विनस्य भवेदेकादशी तु या

śrīkṛṣṇa uvāca- śṛṇurājeṁdra vakṣyāmi māhātmyaṁ pāpa nāśanam śuklapakṣe cāśvinasya bhavedekādaśī tu yā

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजेंद्र! सुनो, मैं पापनाशक महिमा कहता हूँ। आश्विन के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है,

श्लोक 3 (padma.6.59.3)

पापांकुशेति विख्याता सर्वपापहरा परा । पद्मनाभाभिधानं मां पूजयेत्तत्र मानवः

pāpāṁkuśeti vikhyātā sarvapāpaharā parā padmanābhābhidhānaṁ māṁ pūjayettatra mānavaḥ

वह पापांकुशा नाम से विख्यात है, सब पापों को हरने वाली परम एकादशी। उस दिन मनुष्य को पद्मनाभ नामधारी मेरी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 4 (padma.6.59.4)

सर्वाभीष्ट फलं प्राप्तौ स्वर्गमोक्षप्रदं नृणाम् । तपस्तप्त्वा पुनस्तीव्रं चिरं सुनियतेन्द्रियः

sarvābhīṣṭa phalaṁ prāptau svargamokṣapradaṁ nṛṇām tapastaptvā punastīvraṁ ciraṁ suniyatendriyaḥ

इससे मनुष्यों को समस्त अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है, और यह स्वर्ग तथा मोक्ष दोनों देने वाली है। दीर्घकाल तक तीव्र तपस्या करके, इंद्रियों को भलीभाँति संयमित करके,

श्लोक 5 (padma.6.59.5)

यत्फलं समवाप्नोति तन्न त्वा गरुडध्वजम् । कृत्वापि बहुशःपापं नरो मोह समन्वितः

yatphalaṁ samavāpnoti tanna tvā garuḍadhvajam kṛtvāpi bahuśaḥpāpaṁ naro moha samanvitaḥ

जो फल प्राप्त होता है, वह भी उतना नहीं जितना गरुड़-ध्वज [विष्णु] को नमस्कार करने से मिलता है। मोह से युक्त मनुष्य अनेक बार पाप करके भी,

श्लोक 6 (padma.6.59.6)

न याति नरकं नत्वा सर्वपापहरं हरिम् । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च

na yāti narakaṁ natvā sarvapāpaharaṁ harim pṛthivyāṁ yāni tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca

सब पापों को हरने वाले हरि को नमस्कार करके नरक को नहीं जाता। पृथ्वी पर जो भी तीर्थ और पुण्य-स्थल हैं,

श्लोक 7 (padma.6.59.7)

तानि सर्वाण्यवाप्नोति विष्णोर्नामानुकीर्त्तनात् । देवं शार्ङ्गधरं विष्णुं ये प्रपन्ना जनार्दनम्

tāni sarvāṇyavāpnoti viṣṇornāmānukīrttanāt devaṁ śārṅgadharaṁ viṣṇuṁ ye prapannā janārdanam

वे सब विष्णु के नाम-कीर्तन से प्राप्त हो जाते हैं। जो लोग धनुर्धारी देव विष्णु, जनार्दन की शरण में जाते हैं,

श्लोक 8 (padma.6.59.8)

न तेषां यमलोकस्य यातना जायते क्वचित् । उपोष्यैकादशीमेकां प्रसंगेनापि मानवः । न याति यातनां यामीं पापं कृत्वापि दारुणम्

na teṣāṁ yamalokasya yātanā jāyate kvacit upoṣyaikādaśīmekāṁ prasaṁgenāpi mānavaḥ na yāti yātanāṁ yāmīṁ pāpaṁ kṛtvāpi dāruṇam

उन्हें यमलोक की कोई भी यातना कभी नहीं होती। प्रसंगवश भी एक एकादशी का उपवास करने वाला मनुष्य, चाहे उसने कितना भी भयंकर पाप किया हो, यम की यातना को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 9 (padma.6.59.9)

वैष्णवः पुरुषो भूत्वा शिवनिंदां करोति यः । न विंदेद्वैष्णवं लोकं स याति नरकं ध्रुवम्

vaiṣṇavaḥ puruṣo bhūtvā śivaniṁdāṁ karoti yaḥ na viṁdedvaiṣṇavaṁ lokaṁ sa yāti narakaṁ dhruvam

वैष्णव होकर भी जो शिव की निंदा करता है, वह वैष्णव लोक को नहीं पाता और निश्चय ही नरक को जाता है।

श्लोक 10 (padma.6.59.10)

शैवः पाशुपतो भूत्वा विष्णुनिंदां करोति चेत् । रौरवे पच्यते घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश

śaivaḥ pāśupato bhūtvā viṣṇuniṁdāṁ karoti cet raurave pacyate ghore yāvadindrāścaturdaśa

शैव होकर पाशुपत होकर भी जो विष्णु की निंदा करता है, वह भयंकर रौरव नरक में तब तक पकता रहता है, जब तक चौदह इंद्र नहीं बदल जाते।

श्लोक 11 (padma.6.59.11)

नेदृशं पावनं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते । यादृशं पद्मनाभस्य व्रतं पातकनाशनम्

nedṛśaṁ pāvanaṁ kiṁcittriṣu lokeṣu vidyate yādṛśaṁ padmanābhasya vrataṁ pātakanāśanam

तीनों लोकों में पद्मनाभ के इस पापनाशक व्रत के समान इतना पवित्र कुछ भी नहीं है।

श्लोक 12 (padma.6.59.12)

तावत्पापानि देहेऽस्मिन्तिष्ठंति मनुजाधिपम् । यावन्नोपवसेज्जंतुः पद्मनाभदिनं शुभम्

tāvatpāpāni dehe'smintiṣṭhaṁti manujādhipam yāvannopavasejjaṁtuḥ padmanābhadinaṁ śubham

जब तक मनुष्य पद्मनाभ के इस शुभ दिन का उपवास नहीं करता, हे मनुजाधिप! तब तक पाप उसके शरीर में बने रहते हैं।

श्लोक 13 (padma.6.59.13)

अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च । एकादश्युपवासस्य कलां नार्हंति षोडशीम्

aśvamedhasahasrāṇi rājasūyaśatāni ca ekādaśyupavāsasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

हजारों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय यज्ञ भी एकादशी के उपवास के सोलहवें अंश के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 14 (padma.6.59.14)

एकादशीसमं किंचिद्व्रतं लोके न विद्यते । व्याजेनापि कृता यैश्च न ते यांति हि भास्करिम्

ekādaśīsamaṁ kiṁcidvrataṁ loke na vidyate vyājenāpi kṛtā yaiśca na te yāṁti hi bhāskarim

संसार में एकादशी के समान कोई और व्रत नहीं है। जिन्होंने इसे छल से भी किया है, वे भी सूर्यपुत्र [यम] के पास नहीं जाते।

श्लोक 15 (padma.6.59.15)

स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा शरीरारोग्यदायिनी । कलत्रसुतदा ह्येषा धनमित्रप्रदायिनी

svargamokṣapradā hyeṣā śarīrārogyadāyinī kalatrasutadā hyeṣā dhanamitrapradāyinī

यह स्वर्ग और मोक्ष दोनों देने वाली और शरीर को आरोग्य प्रदान करने वाली है। यह पत्नी और पुत्र देने वाली, तथा धन और मित्र प्रदान करने वाली है।

श्लोक 16 (padma.6.59.16)

न गंगा न गया राजन्न च काशी च पुष्करम् । न चापि कौरवं क्षेत्रं पुण्यं भूप हरेर्दिनात्

na gaṁgā na gayā rājanna ca kāśī ca puṣkaram na cāpi kauravaṁ kṣetraṁ puṇyaṁ bhūpa harerdināt

हे राजन्! न गंगा, न गया, न काशी, न पुष्कर, और न ही कुरुक्षेत्र, हे भूप, हरि के इस दिन के समान पुण्यमय है।

श्लोक 17 (padma.6.59.17)

रात्रौ जागरणं कृत्वा समुपोष्य हरेर्दिनम् । अनायासेन भूपाल प्राप्यते वैष्णवं पदम्

rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā samupoṣya harerdinam anāyāsena bhūpāla prāpyate vaiṣṇavaṁ padam

रात्रि-जागरण करके और हरि के दिन का उपवास करके, हे भूपाल! सहज ही मनुष्य वैष्णव पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 18 (padma.6.59.18)

दशैव मातृके पक्षे राजेंद्र दश पैतृके । प्रियाया दशपक्षे तु पुरुषानुद्धरेन्नरः

daśaiva mātṛke pakṣe rājeṁdra daśa paitṛke priyāyā daśapakṣe tu puruṣānuddharennaraḥ

हे राजेंद्र! [इस व्रत के प्रभाव से] मातृ-पक्ष के दस, पितृ-पक्ष के दस, और पत्नी के पक्ष के दस पीढ़ियों के पुरुषों का उद्धार मनुष्य कर देता है।

श्लोक 19 (padma.6.59.19)

चतुर्भुजा दिव्यरूपा नागारिकृतकेतनाः । स्रग्विणः पीतवस्त्राश्च प्रयांति हरिमंदिरम्

caturbhujā divyarūpā nāgārikṛtaketanāḥ sragviṇaḥ pītavastrāśca prayāṁti harimaṁdiram

चार भुजाओं वाले, दिव्य रूप धारण किए हुए, गरुड़-ध्वज लिए हुए, माला धारण किए हुए और पीत वस्त्र पहने हुए, वे हरि के मंदिर की ओर जाते हैं।

श्लोक 20 (padma.6.59.20)

बालत्वे यौवनत्वे च वृद्धत्वे च नृपोत्तम । उपोष्यैकादशीं नूनं नैव प्राप्नोति दुर्गतिम्

bālatve yauvanatve ca vṛddhatve ca nṛpottama upoṣyaikādaśīṁ nūnaṁ naiva prāpnoti durgatim

बचपन में, युवावस्था में और वृद्धावस्था में भी, हे नृपोत्तम, एकादशी का उपवास करके मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 21 (padma.6.59.21)

पापांकुशामुपोष्यैव आश्विनस्य सिते नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो हरिलोकं स गच्छति

pāpāṁkuśāmupoṣyaiva āśvinasya site naraḥ sarvapāpavinirmukto harilokaṁ sa gacchati

आश्विन के शुक्ल पक्ष में पापांकुशा का उपवास करके मनुष्य, सब पापों से मुक्त होकर हरि के लोक को जाता है।

श्लोक 22 (padma.6.59.22)

दत्त्वा हेमतिलान्भूमिं गामन्नमुदकं तथा । उपानच्छत्रवस्त्रादीन्न पश्यति यमं नरः

dattvā hematilānbhūmiṁ gāmannamudakaṁ tathā upānacchatravastrādīnna paśyati yamaṁ naraḥ

सोना, तिल, भूमि, गाय, अन्न, जल, जूते, छाता और वस्त्र आदि दान करके, मनुष्य यमराज को नहीं देखता।

श्लोक 23 (padma.6.59.23)

यस्य पुण्यविहीनानि दिनान्यायांति यांति च । स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति

yasya puṇyavihīnāni dinānyāyāṁti yāṁti ca sa lohakārabhastreva śvasannapi na jīvati

जिसके दिन बिना पुण्य के आते और जाते हैं, वह लोहार की धौंकनी के समान साँस लेते हुए भी जीवित नहीं है।

श्लोक 24 (padma.6.59.24)

अवंध्यं दिवसं कुर्याद्दरिद्रोऽपि नृपोत्तम । सदाचरन्यथाशक्ति स्नानदानादिकाः क्रियाः

avaṁdhyaṁ divasaṁ kuryāddaridro'pi nṛpottama sadācaranyathāśakti snānadānādikāḥ kriyāḥ

हे नृपोत्तम! दरिद्र मनुष्य को भी अपना दिन व्यर्थ नहीं करना चाहिए, अपनी शक्ति के अनुसार स्नान, दान आदि क्रियाएँ सदा करते हुए।

श्लोक 25 (padma.6.59.25)

होमस्नानजपध्यानसत्रादिपुण्यकर्मणाम् । कर्त्तारो नैव पश्यंति घोरां तां यमयातनाम्

homasnānajapadhyānasatrādipuṇyakarmaṇām karttāro naiva paśyaṁti ghorāṁ tāṁ yamayātanām

होम, स्नान, जप, ध्यान, सत्र आदि पुण्य-कर्म करने वाले, वे भयंकर यम-यातना को कभी नहीं देखते।

श्लोक 26 (padma.6.59.26)

दीर्घायुषो धनाढ्याश्च कुलीना रोगवर्जिताः । दृश्यंते मानवा लोके पुण्यकर्त्तार ईदृशाः

dīrghāyuṣo dhanāḍhyāśca kulīnā rogavarjitāḥ dṛśyaṁte mānavā loke puṇyakarttāra īdṛśāḥ

दीर्घायु, धनवान, कुलीन और रोगरहित - ऐसे ही मनुष्य लोक में पुण्यकर्ता के रूप में दिखाई देते हैं।

श्लोक 27 (padma.6.59.27)

किमत्र बहुनोक्तेन यांत्यधर्मेण दुर्गतिम् । आरोहंति दिवं धर्मैर्नात्रकार्या विचारणा

kimatra bahunoktena yāṁtyadharmeṇa durgatim ārohaṁti divaṁ dharmairnātrakāryā vicāraṇā

अधिक कहने से क्या लाभ - अधर्म से लोग दुर्गति को प्राप्त होते हैं, और धर्म से स्वर्ग की ओर उठते हैं - इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 28 (padma.6.59.28)

इति ते कथितं राजन्यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ । पापांकुशाया माहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

iti te kathitaṁ rājanyatpṛṣṭo'haṁ tvayānagha pāpāṁkuśāyā māhātmyaṁ kimanyacchrotumicchasi

हे निष्पाप राजन्! तुमने जो पूछा था, वह मैंने तुम्हें बता दिया - पापांकुशा की महिमा। अब और क्या सुनना चाहते हो?

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