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उत्तर खण्ड · अध्याय 62

पुरुषोत्तम मास कमला एकादशी

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (padma.6.62.1)

युधिष्ठिर उवाच - भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि व्रतानामुत्तमं व्रतम् । सर्वपापहरं विष्णोः फलदं व्रतिनां च यत्

yudhiṣṭhira uvāca - bhagavañchrotumicchāmi vratānāmuttamaṁ vratam sarvapāpaharaṁ viṣṇoḥ phaladaṁ vratināṁ ca yat

युधिष्ठिर ने कहा - हे भगवन्! मैं व्रतों में सर्वोत्तम व्रत सुनना चाहता हूँ, जो सब पापों को हरने वाला और विष्णु के व्रतियों को फल देने वाला है।

श्लोक 2 (padma.6.62.2)

पुरुषोत्तममासस्य कथां ब्रूहि जनार्दन । को विधिः किं फलं तस्य को देवस्तत्र पूज्यते

puruṣottamamāsasya kathāṁ brūhi janārdana ko vidhiḥ kiṁ phalaṁ tasya ko devastatra pūjyate

हे जनार्दन! पुरुषोत्तम मास की कथा कहिए। उसकी विधि क्या है, उसका फल क्या है, वहाँ किस देवता की पूजा होती है?

श्लोक 3 (padma.6.62.3)

अधिमासे च संप्राप्ते व्रतं ब्रूहि जनार्दन । कस्य दानस्य किं पुण्यं किं कर्त्तव्यं नृभिः प्रभो

adhimāse ca saṁprāpte vrataṁ brūhi janārdana kasya dānasya kiṁ puṇyaṁ kiṁ karttavyaṁ nṛbhiḥ prabho

हे जनार्दन! अधिमास (अधिक मास) आने पर उसका व्रत बताइए। हे प्रभो! उसमें किस दान का क्या पुण्य है, मनुष्यों को क्या करना चाहिए?

श्लोक 4 (padma.6.62.4)

कथं स्नानं च किं जाप्यं कथं पूजाविधिः स्मृतः । किं भोज्यमुत्तमं चान्नं मासेऽस्मिन्पुरुषोत्तमे

kathaṁ snānaṁ ca kiṁ jāpyaṁ kathaṁ pūjāvidhiḥ smṛtaḥ kiṁ bhojyamuttamaṁ cānnaṁ māse'sminpuruṣottame

स्नान कैसे करना चाहिए, जप क्या करना चाहिए, पूजा-विधि कैसी बताई गई है? इस पुरुषोत्तम मास में सर्वोत्तम भोज्य अन्न क्या है?

श्लोक 5 (padma.6.62.5)

श्रीकृष्ण उवाच- कथयिष्यामि राजेंद्र भवतः स्नेहकारणात् । पुरुषोत्तममासस्य माहात्म्यं पापनाशनम्

śrīkṛṣṇa uvāca- kathayiṣyāmi rājeṁdra bhavataḥ snehakāraṇāt puruṣottamamāsasya māhātmyaṁ pāpanāśanam

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजेंद्र! तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण मैं पुरुषोत्तम मास की पापनाशक महिमा कहता हूँ।

श्लोक 6 (padma.6.62.6)

अधिमासे तु संप्राप्ते भवेदेकादशी तु या । कमला नाम सा नाम्ना तिथीनामुत्तमा तिथिः

adhimāse tu saṁprāpte bhavedekādaśī tu yā kamalā nāma sā nāmnā tithīnāmuttamā tithiḥ

अधिमास आने पर जो एकादशी होती है, वह कमला नाम से जानी जाती है, और तिथियों में सर्वश्रेष्ठ तिथि है।

श्लोक 7 (padma.6.62.7)

तस्या व्रतप्रभावेन कमलाभिमुखी भवेत् । ब्राह्मे मुहूर्त्ते चोत्थाय संस्मृत्य पुरुषोत्तमम्

tasyā vrataprabhāvena kamalābhimukhī bhavet brāhme muhūrtte cotthāya saṁsmṛtya puruṣottamam

उस व्रत के प्रभाव से मनुष्य कमला (लक्ष्मी) के सम्मुख हो जाता है। ब्राह्म मुहूर्त में उठकर, पुरुषोत्तम का स्मरण करके,

श्लोक 8 (padma.6.62.8)

स्नात्वा चैव विधानेन नियमं कारयेद्व्रती । गृहे त्वेकगुणं जाप्यं नद्यां तु द्विगुणं स्मृतम्

snātvā caiva vidhānena niyamaṁ kārayedvratī gṛhe tvekaguṇaṁ jāpyaṁ nadyāṁ tu dviguṇaṁ smṛtam

विधिपूर्वक स्नान करके, व्रती को नियम ग्रहण करना चाहिए। घर में एक गुना जप और नदी में दो गुना जप बताया गया है।

श्लोक 9 (padma.6.62.9)

गवां गोष्ठे सहस्रोर्ध्वमग्न्यागारे शतान्वितम् । शिवक्षेत्रेषु तीर्थेषु देवतानां च सन्निधौ

gavāṁ goṣṭhe sahasrordhvamagnyāgāre śatānvitam śivakṣetreṣu tīrtheṣu devatānāṁ ca sannidhau

गौशाला में हजार गुना, अग्निशाला में सौ गुना, शिव-क्षेत्रों में, तीर्थों में और देवताओं की उपस्थिति में,

श्लोक 10 (padma.6.62.10)

लक्षं तुलस्याः सांनिध्ये ह्यनंतं विष्णुसन्निधौ । अवंत्यामभवत्कश्चिच्छिवशर्मा द्विजोत्तमः

lakṣaṁ tulasyāḥ sāṁnidhye hyanaṁtaṁ viṣṇusannidhau avaṁtyāmabhavatkaścicchivaśarmā dvijottamaḥ

तुलसी के समीप लाख गुना, और विष्णु के समीप अनंत गुना [फलदायक होता है]। अवंती नगरी में शिवशर्मा नामक एक श्रेष्ठ द्विज रहते थे।

श्लोक 11 (padma.6.62.11)

तस्यात्मजास्तु पंचासन्कनिष्ठो दोषवानभूत् । तदा पित्रा परित्यक्तस्त्यक्तः स्वजनबांधवैः

tasyātmajāstu paṁcāsankaniṣṭho doṣavānabhūt tadā pitrā parityaktastyaktaḥ svajanabāṁdhavaiḥ

उनके पाँच पुत्र थे, और उनमें सबसे छोटा दोषयुक्त था; तब उसे उसके पिता ने त्याग दिया, और उसके स्वजन-बंधुओं ने भी त्याग दिया।

श्लोक 12 (padma.6.62.12)

कुकर्मणः प्रभावेन गतो दूरतरं वनम् । एकदा दैवयोगेन तीर्थराजं समागतः

kukarmaṇaḥ prabhāvena gato dūrataraṁ vanam ekadā daivayogena tīrtharājaṁ samāgataḥ

अपने कुकर्म के प्रभाव से वह अत्यंत दूर के वन में चला गया। एक बार, दैवयोग से, वह तीर्थराज (प्रयाग) में आ पहुँचा।

श्लोक 13 (padma.6.62.13)

क्षुत्क्षामो दीनवदनस्त्रिवेण्यां स्नानमाचरत् । मुनीनामाश्रमांस्तत्र विचिन्वन्क्षुधयार्दितः

kṣutkṣāmo dīnavadanastriveṇyāṁ snānamācarat munīnāmāśramāṁstatra vicinvankṣudhayārditaḥ

भूख से क्षीण और दीन मुख वाला होकर उसने त्रिवेणी में स्नान किया; भूख से पीड़ित होकर वह मुनियों के आश्रमों को खोजने लगा।

श्लोक 14 (padma.6.62.14)

हरिमित्रमुनेस्तत्र ददर्शाश्रममुत्तमम् । पुरुषोत्तममासे वै जनानां च समागमे

harimitramunestatra dadarśāśramamuttamam puruṣottamamāse vai janānāṁ ca samāgame

वहाँ उसने हरिमित्र मुनि का उत्तम आश्रम देखा, जो पुरुषोत्तम मास में लोगों के समागम से भरा हुआ था।

श्लोक 15 (padma.6.62.15)

तत्राश्रमे कथयतां कथां कल्मषनाशिनीम् । ब्राह्मणानां मुखात्तेन श्रद्धया कमला श्रुता

tatrāśrame kathayatāṁ kathāṁ kalmaṣanāśinīm brāhmaṇānāṁ mukhāttena śraddhayā kamalā śrutā

उस आश्रम में पापनाशक कथा कही जा रही थी; ब्राह्मणों के मुख से उसने श्रद्धापूर्वक कमला [एकादशी] के विषय में सुना -

श्लोक 16 (padma.6.62.16)

एकादशी पुण्यतमा भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । जयशर्मा विधानेन श्रुत्वेमां कमला तिथिम्

ekādaśī puṇyatamā bhuktimuktipradāyinī jayaśarmā vidhānena śrutvemāṁ kamalā tithim

'यह एकादशी अत्यंत पुण्यमयी है, भोग और मोक्ष दोनों देने वाली है।' जयशर्मा ने इस कमला तिथि के विषय में विधिपूर्वक सुनकर,

श्लोक 17 (padma.6.62.17)

एकादशीपुण्यतमा भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । व्रतं कृतं च तैः सार्द्धं स्थित्वा शून्यालये तदा

ekādaśīpuṇyatamā bhuktimuktipradāyinī vrataṁ kṛtaṁ ca taiḥ sārddhaṁ sthitvā śūnyālaye tadā

- यह एकादशी अत्यंत पुण्यमयी और भोग-मोक्ष दोनों देने वाली है - उसने उन [ब्राह्मणों] के साथ ही वह व्रत किया, उस समय एक सूने घर में ठहरकर।

श्लोक 18 (padma.6.62.18)

निशीथे समनुप्राप्ते लक्ष्मीस्तत्र समागता । वरं ददामि भो विप्र कमलायाः प्रभावतः

niśīthe samanuprāpte lakṣmīstatra samāgatā varaṁ dadāmi bho vipra kamalāyāḥ prabhāvataḥ

आधी रात होने पर, वहाँ लक्ष्मी स्वयं प्रकट हुईं - 'हे विप्र! मैं कमला के प्रभाव से तुम्हें वर देती हूँ।'

श्लोक 19 (padma.6.62.19)

जयशर्मोवाच - का त्वं कस्यासि रंभोरु प्रसन्ना च कथं मम । इंद्राणी सुरनाथस्य भवानी शंकरस्य वा

jayaśarmovāca - kā tvaṁ kasyāsi raṁbhoru prasannā ca kathaṁ mama iṁdrāṇī suranāthasya bhavānī śaṁkarasya vā

जयशर्मा ने कहा - हे सुंदर जंघाओं वाली! आप कौन हैं, किसकी हैं, और मुझ पर कैसे प्रसन्न हुई हैं? क्या आप इंद्राणी हैं, सुरनाथ की, अथवा शंकर की भवानी हैं,

श्लोक 20 (padma.6.62.20)

गंधर्वी किन्नरी वाथ वधूर्वा चंद्रसूर्ययोः । त्वत्सदृक्षा न दृष्टा च न श्रुता च शुभानने

gaṁdharvī kinnarī vātha vadhūrvā caṁdrasūryayoḥ tvatsadṛkṣā na dṛṣṭā ca na śrutā ca śubhānane

अथवा गंधर्वी हैं, किन्नरी हैं, या चंद्र-सूर्य की पत्नी हैं? हे शुभानने! आपके समान न कभी देखा गया है, और न कभी सुना गया है।

श्लोक 21 (padma.6.62.21)

लक्ष्मीरुवाच- प्रसन्ना सांप्रतं जाता वैकुंठादहमागता । प्रेरिता देवदेवेन कमलायाः प्रभावतः

lakṣmīruvāca- prasannā sāṁprataṁ jātā vaikuṁṭhādahamāgatā preritā devadevena kamalāyāḥ prabhāvataḥ

लक्ष्मी ने कहा - मैं इस समय प्रसन्न होकर वैकुंठ से यहाँ आई हूँ, देवाधिदेव द्वारा भेजी गई, कमला [एकादशी] के प्रभाव से।

श्लोक 22 (padma.6.62.22)

पुरुषोत्तममासस्य या पक्षे प्रथमे भवेत् । तस्या व्रतं त्वया चीर्णं प्रयागे मुनिसंनिधौ

puruṣottamamāsasya yā pakṣe prathame bhavet tasyā vrataṁ tvayā cīrṇaṁ prayāge munisaṁnidhau

पुरुषोत्तम मास के प्रथम पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका व्रत तुमने प्रयाग में मुनि की उपस्थिति में किया है।

श्लोक 23 (padma.6.62.23)

व्रतस्यास्य प्रभावेन वशगाहं न संशयः । तववंशे भविष्यंति मानवा द्विजसत्तम

vratasyāsya prabhāvena vaśagāhaṁ na saṁśayaḥ tavavaṁśe bhaviṣyaṁti mānavā dvijasattama

इस व्रत के प्रभाव से मैं तुम्हारे वश में हो गई हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। हे द्विजसत्तम! तुम्हारे वंश में जो भी मनुष्य होंगे,

श्लोक 24 (padma.6.62.24)

मत्प्रसादादवाप्स्यंति सत्यं ते व्याहृतं मया । ब्राह्मण उवाच- प्रसन्ना यदि मे पद्मे व्रतं विस्तरतो वद

matprasādādavāpsyaṁti satyaṁ te vyāhṛtaṁ mayā brāhmaṇa uvāca- prasannā yadi me padme vrataṁ vistarato vada

वे मेरी कृपा से यह सब प्राप्त करेंगे - मैंने तुमसे यह सत्य कहा है। ब्राह्मण ने कहा - हे पद्मे! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो इस व्रत को विस्तार से बताइए,

श्लोक 25 (padma.6.62.25)

यत्कथासु प्रवर्तंते साधवो ये जना द्विजाः । लक्ष्मीरुवाच- श्रोतॄणां परमं श्राव्यं पवित्राणामनुत्तमम्

yatkathāsu pravartaṁte sādhavo ye janā dvijāḥ lakṣmīruvāca- śrotṝṇāṁ paramaṁ śrāvyaṁ pavitrāṇāmanuttamam

जिसकी कथाओं में सज्जन और ब्राह्मण लोग प्रवृत्त रहते हैं। लक्ष्मी ने कहा - यह श्रोताओं के लिए सुनने योग्य सर्वोत्तम और पवित्रों में भी सर्वश्रेष्ठ है,

श्लोक 26 (padma.6.62.26)

दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं श्रोतव्यं यत्नतस्ततः । उत्तमः श्रद्धया युक्तः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव वा

duḥsvapnanāśanaṁ puṇyaṁ śrotavyaṁ yatnatastataḥ uttamaḥ śraddhayā yuktaḥ ślokaṁ ślokārddhameva vā

यह दुःस्वप्नों का नाश करने वाला पुण्य है, जिसे यत्नपूर्वक सुनना चाहिए। श्रद्धायुक्त उत्तम पुरुष एक श्लोक, या श्लोक का आधा भाग भी,

श्लोक 27 (padma.6.62.27)

पठित्वा मुच्यते सद्यो महापातककोटिभिः । मासानां परमो मासः पक्षिणां गरुडो यथा

paṭhitvā mucyate sadyo mahāpātakakoṭibhiḥ māsānāṁ paramo māsaḥ pakṣiṇāṁ garuḍo yathā

पढ़कर तुरंत ही करोड़ों महापातकों से मुक्त हो जाता है। जैसे मासों में सबसे श्रेष्ठ मास [पुरुषोत्तम मास है], जैसे पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है,

श्लोक 28 (padma.6.62.28)

नदीनां च यथा गंगा तिथीनां द्वादशी तिथिः । अद्यापि निर्जराः सर्वे भारते जन्मलिप्सवः

nadīnāṁ ca yathā gaṁgā tithīnāṁ dvādaśī tithiḥ adyāpi nirjarāḥ sarve bhārate janmalipsavaḥ

और नदियों में जैसे गंगा, तिथियों में जैसे द्वादशी तिथि [श्रेष्ठ है, वैसे ही यह मास श्रेष्ठ है]। आज भी सभी देवता भारत में जन्म लेने की कामना करते हैं,

श्लोक 29 (padma.6.62.29)

तमर्चयंति विविधा नारायणमनामयम् । ये यजंति सदा भक्त्या देवं नारायणं प्रभुम्

tamarcayaṁti vividhā nārāyaṇamanāmayam ye yajaṁti sadā bhaktyā devaṁ nārāyaṇaṁ prabhum

ताकि वे विविध रूपों में उस निर्दोष नारायण की अर्चना कर सकें। जो लोग सदा भक्तिपूर्वक प्रभु देव नारायण की पूजा करते हैं,

श्लोक 30 (padma.6.62.30)

तानर्चयंति सततं ब्रह्माद्या देवतागणाः । येऽपि नामपरा ये च हरिकीर्त्तनतत्पराः

tānarcayaṁti satataṁ brahmādyā devatāgaṇāḥ ye'pi nāmaparā ye ca harikīrttanatatparāḥ

उनकी सतत पूजा ब्रह्मा आदि देवगण भी करते हैं। जो लोग नाम-परायण हैं और जो हरि-कीर्तन में तत्पर हैं,

श्लोक 31 (padma.6.62.31)

हरिपूजापरा ये च ते कृतार्थाः कलौ युगेः । शुक्ले वा यदि वा कृष्णे भवेदेकादशी द्वयम्

haripūjāparā ye ca te kṛtārthāḥ kalau yugeḥ śukle vā yadi vā kṛṣṇe bhavedekādaśī dvayam

और जो हरि-पूजा में लीन हैं, वे कलियुग में कृतार्थ माने जाते हैं। शुक्ल हो या कृष्ण, दोनों पक्षों में एकादशी होती है -

श्लोक 32 (padma.6.62.32)

गृहस्थानां भवेत्पूर्वा यतीनामुत्तरा स्मृता । एकादशी द्वादशी च रात्रिशेषे त्रयोदशी । तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणे

gṛhasthānāṁ bhavetpūrvā yatīnāmuttarā smṛtā ekādaśī dvādaśī ca rātriśeṣe trayodaśī tatra kratuśataṁ puṇyaṁ trayodaśyāṁ tu pāraṇe

गृहस्थों के लिए पहली मानी गई है, और यतियों के लिए दूसरी बताई गई है। एकादशी, द्वादशी और रात्रि-शेष में त्रयोदशी - इनमें त्रयोदशी को किए गए पारण में सौ यज्ञों का पुण्य होता है।

श्लोक 33 (padma.6.62.33)

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहंनि । भोक्ष्यामि पुंडरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत

ekādaśyāṁ nirāhāraḥ sthitvāhamapare'haṁni bhokṣyāmi puṁḍarīkākṣa śaraṇaṁ me bhavācyuta

'एकादशी को भोजन-रहित रहकर, अगले दिन मैं भोजन करूँगा, हे पुंडरीकाक्ष, हे अच्युत! आप मेरी शरण बनें' -

श्लोक 34 (padma.6.62.34)

अमुं मंत्रं समुच्चार्य देवदेवस्य चक्रिणः । भक्तिभावेन तुष्टात्मा उपवासं समाचरेत्

amuṁ maṁtraṁ samuccārya devadevasya cakriṇaḥ bhaktibhāvena tuṣṭātmā upavāsaṁ samācaret

इस मंत्र का उच्चारण करके, देवाधिदेव चक्रधारी की भक्ति-भाव से संतुष्ट होकर, उपवास करना चाहिए।

श्लोक 35 (padma.6.62.35)

कुर्याद्देवस्य पुरतो जागरं नियतो व्रती । गीतैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च पुराणपठनादिभिः

kuryāddevasya purato jāgaraṁ niyato vratī gītairvādyaiśca nṛtyaiśca purāṇapaṭhanādibhiḥ

व्रती को देवता के सामने संयमपूर्वक जागरण करना चाहिए - गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदि के साथ।

श्लोक 36 (padma.6.62.36)

ततः प्रातः समुत्थाय द्वादशीदिवसे व्रती । स्नात्वा विष्णुं समभ्यर्च्य विधिवत्प्रयतेंद्रियः

tataḥ prātaḥ samutthāya dvādaśīdivase vratī snātvā viṣṇuṁ samabhyarcya vidhivatprayateṁdriyaḥ

तत्पश्चात् द्वादशी के दिन प्रातःकाल उठकर, व्रती को स्नान करके, संयमित इंद्रियों से विधिपूर्वक विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 37 (padma.6.62.37)

पंचामृतेन संस्नाप्य एकादश्यां जनार्दनः । द्वादश्यां च पयःस्नानाद्धरेः सारूप्यमश्नुते

paṁcāmṛtena saṁsnāpya ekādaśyāṁ janārdanaḥ dvādaśyāṁ ca payaḥsnānāddhareḥ sārūpyamaśnute

एकादशी को पंचामृत से स्नान कराकर जनार्दन को, और द्वादशी को दूध से स्नान कराकर, मनुष्य हरि के सरूप्य (समान रूप) को प्राप्त करता है।

श्लोक 38 (padma.6.62.38)

अज्ञानतिमिरांधस्य व्रतेनानेन केशव । प्रसीद सन्मुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव

ajñānatimirāṁdhasya vratenānena keśava prasīda sanmukho bhūtvā jñānadṛṣṭiprado bhava

'हे केशव! अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मुझ पर इस व्रत से प्रसन्न होइए, सम्मुख होकर मुझे ज्ञान-दृष्टि प्रदान कीजिए।'

श्लोक 39 (padma.6.62.39)

एवं विज्ञाप्य देवेशं देवदेवं गदाधरम् । ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम्

evaṁ vijñāpya deveśaṁ devadevaṁ gadādharam brāhmaṇānbhojayedbhaktyā tebhyo dadyācca dakṣiṇām

इस प्रकार देवाधिदेव गदाधारी को प्रार्थना करके, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 40 (padma.6.62.40)

ततः स्वबंधुभिः सार्द्धं नारायणपरायणः । कृत्वा पंचमहायज्ञान्स्वयं भुंजीत वाग्यतः

tataḥ svabaṁdhubhiḥ sārddhaṁ nārāyaṇaparāyaṇaḥ kṛtvā paṁcamahāyajñānsvayaṁ bhuṁjīta vāgyataḥ

तत्पश्चात् नारायण-परायण होकर, अपने बंधुओं के साथ पाँच महायज्ञ करके, मौन रहकर स्वयं भोजन करना चाहिए।

श्लोक 41 (padma.6.62.41)

एवं यः प्रयतः कुर्यात्पुण्यमेकादशीव्रतम् । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्ल्लभम्

evaṁ yaḥ prayataḥ kuryātpuṇyamekādaśīvratam sa yāti viṣṇubhavanaṁ punarāvṛttidurllabham

इस प्रकार जो संयमी होकर यह पुण्यमय एकादशी-व्रत करता है, वह पुनरागमन (पुनर्जन्म) से रहित विष्णु के धाम को प्राप्त होता है।

श्लोक 42 (padma.6.62.42)

इत्युक्त्वा कमला तस्मै वरं दत्त्वा तिरोदधे । सोऽपि विप्रो धनी भूत्वा पितुर्गेहं समागतः

ityuktvā kamalā tasmai varaṁ dattvā tirodadhe so'pi vipro dhanī bhūtvā piturgehaṁ samāgataḥ

इतना कहकर कमला (लक्ष्मी) ने उसे वर देकर अंतर्धान कर लिया। वह ब्राह्मण भी धनवान होकर अपने पिता के घर लौट आया।

श्लोक 43 (padma.6.62.43)

श्रीकृष्ण उवाच- एवं यः कुरुते राजन्कमलाव्रतमुत्तमम् । शृणुयाद्वासरे विष्णोः सर्वपापैः प्रमुच्यते

śrīkṛṣṇa uvāca- evaṁ yaḥ kurute rājankamalāvratamuttamam śṛṇuyādvāsare viṣṇoḥ sarvapāpaiḥ pramucyate

श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजन्! इस प्रकार जो कोई इस उत्तम कमला-व्रत को करता है, अथवा विष्णु के दिन इसे सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63