उत्तर खण्ड · अध्याय 63
पुरुषोत्तम मास शुक्ल कामदा एकादशी
श्लोक 1 (padma.6.63.1)
युधिष्ठिर उवाच - श्रुतानि बहुधर्माणि व्रतानि च जगत्प्रभो । एकादशीसमं किंजिच्छ्रुतं नैव जनार्दन
yudhiṣṭhira uvāca - śrutāni bahudharmāṇi vratāni ca jagatprabho ekādaśīsamaṁ kiṁjicchrutaṁ naiva janārdana
युधिष्ठिर ने कहा - हे जगत्प्रभो! मैंने अनेक धर्म और व्रत सुने हैं, किंतु हे जनार्दन! एकादशी के समान कुछ भी नहीं सुना।
श्लोक 2 (padma.6.63.2)
पुनस्त्वेकादशीं ब्रूहि पापघ्नीं पुण्यदायिनीम् । यां कृत्वा मनुजो लोके प्राप्नुयात्परमं पदम्
punastvekādaśīṁ brūhi pāpaghnīṁ puṇyadāyinīm yāṁ kṛtvā manujo loke prāpnuyātparamaṁ padam
पुनः मुझे वह पापनाशक, पुण्यदायी एकादशी बताइए, जिसे करके मनुष्य इस लोक में परम पद प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (padma.6.63.3)
श्रीकृष्ण उवाच- शुक्ले वा यदि वा कृष्णे यदा चैकादशी भवेत् । न त्याज्या जगतीपाल मोक्षसौख्यविवर्द्धनी
śrīkṛṣṇa uvāca- śukle vā yadi vā kṛṣṇe yadā caikādaśī bhavet na tyājyā jagatīpāla mokṣasaukhyavivarddhanī
श्रीकृष्ण ने कहा - हे जगत्पाल! शुक्ल हो या कृष्ण पक्ष, जब भी एकादशी हो, मोक्ष और सुख को बढ़ाने वाली उसे कभी नहीं त्यागना चाहिए।
श्लोक 4 (padma.6.63.4)
एकादशी कलौ राजन्भवबंधविमोचनी । कामदा सर्वकामानां पापानां पापहा भुवि
ekādaśī kalau rājanbhavabaṁdhavimocanī kāmadā sarvakāmānāṁ pāpānāṁ pāpahā bhuvi
हे राजन्! कलियुग में एकादशी संसार-बंधन से मुक्त करने वाली है। यह पृथ्वी पर सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली और सब पापों का नाश करने वाली है।
श्लोक 5 (padma.6.63.5)
रविवारेऽथ मांगल्ये संक्रमे वा नृपोत्तम । एकादशी सदोपोष्या पुत्रपौत्रविवर्द्धनी
ravivāre'tha māṁgalye saṁkrame vā nṛpottama ekādaśī sadopoṣyā putrapautravivarddhanī
हे नृपोत्तम! रविवार को, मंगल-योग में, अथवा संक्रांति में भी, एकादशी का उपवास सदा करना चाहिए, क्योंकि यह पुत्र-पौत्रों को बढ़ाने वाली है।
श्लोक 6 (padma.6.63.6)
एकादशीव्रतं क्वापि न त्याज्यं विष्णुवल्लभैः । आयुः कीर्तिप्रदं नित्यं संतानारोग्यवित्तदम्
ekādaśīvrataṁ kvāpi na tyājyaṁ viṣṇuvallabhaiḥ āyuḥ kīrtipradaṁ nityaṁ saṁtānārogyavittadam
एकादशी का व्रत विष्णु के प्रियजनों द्वारा कभी नहीं त्यागा जाना चाहिए। यह सदा आयु और कीर्ति देने वाला, तथा संतान, आरोग्य और धन प्रदान करने वाला है।
श्लोक 7 (padma.6.63.7)
मोक्षदं रूपदं राज्यं नित्यमेकादशीव्रतम् । ये कुर्वंति महीपाल श्रद्धया परया युताः
mokṣadaṁ rūpadaṁ rājyaṁ nityamekādaśīvratam ye kurvaṁti mahīpāla śraddhayā parayā yutāḥ
हे महीपाल! जो लोग परम श्रद्धा से युक्त होकर नित्य यह मोक्षदायी, रूपदायी और राज्यदायी एकादशी-व्रत करते हैं,
श्लोक 8 (padma.6.63.8)
यथोक्तविधिना लोके ते नरा विष्णुरूपिणः । जीवन्मुक्तास्तु भूपाल दृश्यंते नात्र संशयः
yathoktavidhinā loke te narā viṣṇurūpiṇaḥ jīvanmuktāstu bhūpāla dṛśyaṁte nātra saṁśayaḥ
वे मनुष्य, यथोक्त विधि से इस लोक में विष्णु-स्वरूप बन जाते हैं। हे भूपाल! उन्हें जीवन्मुक्त ही देखा जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 9 (padma.6.63.9)
युधिष्ठिर उवाच- जीवन्मुक्ताः कथं कृष्ण विष्णुरूपाः कथं पुनः । पापरूपाश्च दृश्यंते परं कौतूहलं हि मे
yudhiṣṭhira uvāca- jīvanmuktāḥ kathaṁ kṛṣṇa viṣṇurūpāḥ kathaṁ punaḥ pāparūpāśca dṛśyaṁte paraṁ kautūhalaṁ hi me
युधिष्ठिर ने कहा - हे कृष्ण! वे कैसे जीवन्मुक्त होते हैं, कैसे विष्णु-रूप हो जाते हैं? फिर भी कुछ लोग पाप-रूप में ही क्यों दिखाई देते हैं - मुझे इसमें बड़ा कौतूहल है।
श्लोक 10 (padma.6.63.10)
श्रीकृष्ण उवाच- ये च राजन्कलौ भक्त्या निर्जलं व्रतमुत्तमम् । एकादश्याः प्रकुर्वंति विधिदृष्टेन कर्मणा
śrīkṛṣṇa uvāca- ye ca rājankalau bhaktyā nirjalaṁ vratamuttamam ekādaśyāḥ prakurvaṁti vidhidṛṣṭena karmaṇā
श्रीकृष्ण ने कहा - हे राजन्! जो लोग कलियुग में भक्तिपूर्वक एकादशी के इस उत्तम जल-रहित व्रत को शास्त्रोक्त कर्म-विधि से करते हैं,
श्लोक 11 (padma.6.63.11)
न कथं विष्णुरूपास्ते जीवन्मुक्ताः कथं नहि । सर्वपापहरं पुण्यं व्रतमेकादशीसमम्
na kathaṁ viṣṇurūpāste jīvanmuktāḥ kathaṁ nahi sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ vratamekādaśīsamam
वे विष्णु-रूप क्यों नहीं होंगे, वे जीवन्मुक्त क्यों नहीं होंगे? एकादशी के समान सब पापों को हरने वाला और पुण्यदायी कोई और व्रत नहीं है।
श्लोक 12 (padma.6.63.12)
न किंचिद्विद्यते राजन्सर्वकामप्रदं नृणाम् । एकाशनं दशम्यां च नंदायां निर्जलं व्रतम्
na kiṁcidvidyate rājansarvakāmapradaṁ nṛṇām ekāśanaṁ daśamyāṁ ca naṁdāyāṁ nirjalaṁ vratam
हे राजन्! मनुष्यों की सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला इसके समान और कुछ भी नहीं है। दशमी को एक बार भोजन करके, नंदा तिथि [एकादशी] को जल-रहित व्रत करके,
श्लोक 13 (padma.6.63.13)
पारणं चैव भद्रायां कृत्वा विष्णुसमा नराः । श्रद्धावान्यस्तु कुरुते कामदाया व्रतं शुभम्
pāraṇaṁ caiva bhadrāyāṁ kṛtvā viṣṇusamā narāḥ śraddhāvānyastu kurute kāmadāyā vrataṁ śubham
भद्रा तिथि [द्वादशी] को पारण करके, वे मनुष्य विष्णु के समान हो जाते हैं। जो श्रद्धावान कामदा का यह शुभ व्रत करता है,
श्लोक 14 (padma.6.63.14)
वांछितं लभते सोऽपि इहलोके परत्र च । पवित्रा पावनी ह्येषा महापातकनाशिनी
vāṁchitaṁ labhate so'pi ihaloke paratra ca pavitrā pāvanī hyeṣā mahāpātakanāśinī
वह इस लोक और परलोक दोनों में इच्छित वस्तु प्राप्त करता है। यह पवित्र और पावन, महापातकों का नाश करने वाली है।
श्लोक 15 (padma.6.63.15)
भुक्तिमुक्तिप्रदा चैव कर्तॄणां नृपसत्तम । कामदायां विधानेन पूजयेत्पुरुषोत्तमम्
bhuktimuktipradā caiva kartṝṇāṁ nṛpasattama kāmadāyāṁ vidhānena pūjayetpuruṣottamam
हे नृपसत्तम! यह इसे करने वालों को भोग और मोक्ष दोनों देने वाली है। कामदा के दिन विधिपूर्वक पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए,
श्लोक 16 (padma.6.63.16)
पुष्पधूपादिभिश्चैव नैवेद्यैर्विविधैस्तथा । कांस्य मांसमसूरांश्च चणकान्कोद्रवांस्तथा
puṣpadhūpādibhiścaiva naivedyairvividhaistathā kāṁsya māṁsamasūrāṁśca caṇakānkodravāṁstathā
फूल, धूप आदि और विविध नैवेद्यों से। कांसे का पात्र, मांस, मसूर, चना और कोदो का अनाज,
श्लोक 17 (padma.6.63.17)
शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजन मैथुनम् । वैष्णवो व्रतकर्त्ता च दशम्यां दश वर्जयेत्
śākaṁ madhu parānnaṁ ca punarbhojana maithunam vaiṣṇavo vratakarttā ca daśamyāṁ daśa varjayet
साग, मधु, दूसरे का दिया हुआ अन्न, तथा पुनः भोजन और मैथुन - वैष्णव व्रती को दशमी के दिन इन दस वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 18 (padma.6.63.18)
द्यूतं क्रीडां तथा निद्रा तांबूलं दंतधावनम् । परापवादं पैशुन्यं स्तेयं हिंसां तथा रतिम्
dyūtaṁ krīḍāṁ tathā nidrā tāṁbūlaṁ daṁtadhāvanam parāpavādaṁ paiśunyaṁ steyaṁ hiṁsāṁ tathā ratim
जुआ, क्रीड़ा, निद्रा, पान-सुपारी, दतौन, दूसरों की निंदा, चुगली, चोरी, हिंसा तथा काम-भोग,
श्लोक 19 (padma.6.63.19)
क्रोधं च वितथं वाक्यमेकादश्यां विवर्जयेत् । कांस्यं मांसंमसूरांश्च तैलं वितथभाषणम्
krodhaṁ ca vitathaṁ vākyamekādaśyāṁ vivarjayet kāṁsyaṁ māṁsaṁmasūrāṁśca tailaṁ vitathabhāṣaṇam
तथा क्रोध और असत्य वचन - इनका एकादशी के दिन त्याग करना चाहिए। कांसे का पात्र, मांस, मसूर, तेल और असत्य भाषण,
श्लोक 20 (padma.6.63.20)
व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भोजनमैथुनम् । वृषपृष्ठं परान्नं च शाकं च द्वादशीदिने
vyāyāmaṁ ca pravāsaṁ ca punarbhojanamaithunam vṛṣapṛṣṭhaṁ parānnaṁ ca śākaṁ ca dvādaśīdine
व्यायाम, यात्रा, दुबारा भोजन, मैथुन, बैल की पीठ पर सवारी, दूसरे का अन्न और साग - इनका द्वादशी के दिन त्याग करना चाहिए।
श्लोक 21 (padma.6.63.21)
अनेन विधिना राजन्विहिता यैश्च कामदा । रात्रौ जागरणं कृत्वा पूजितः पुरुषोत्तमः
anena vidhinā rājanvihitā yaiśca kāmadā rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā pūjitaḥ puruṣottamaḥ
हे राजन्! जिन लोगों ने इस विधि से कामदा का व्रत किया है, उन्होंने रात्रि-जागरण करके पुरुषोत्तम की पूजा की है।
श्लोक 22 (padma.6.63.22)
सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यांति परमां गतिम् । पठनाच्छ्रवणाद्राजन्गोसहस्रफलं लभेत्
sarvapāpavinirmuktāste yāṁti paramāṁ gatim paṭhanācchravaṇādrājangosahasraphalaṁ labhet
वे सब पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। हे राजन्! इसे पढ़ने और सुनने मात्र से सहस्र गौओं के दान का फल मिलता है।