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उत्तर खण्ड · अध्याय 70

नदी त्रिरात्र व्रत

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

श्लोक 1 (padma.6.70.1)

नारद उवाच- देवदेव जगन्नाथ भुक्तिमुक्तिप्रदायक । कथयस्व सुरश्रेष्ठ येन दुःखं न पश्यति

nārada uvāca- devadeva jagannātha bhuktimuktipradāyaka kathayasva suraśreṣṭha yena duḥkhaṁ na paśyati

नारद ने कहा - हे देवाधिदेव! हे जगन्नाथ! हे भोग और मोक्ष देने वाले! हे देवश्रेष्ठ! वह बताइए, जिससे मनुष्य दुःख नहीं देखता।

श्लोक 2 (padma.6.70.2)

महेश उवाच- शृणु वाडव वक्ष्यामि त्रिरात्रं सरितः शुभम् । येन चीर्णेन नरको मानवानां न जायते

maheśa uvāca- śṛṇu vāḍava vakṣyāmi trirātraṁ saritaḥ śubham yena cīrṇena narako mānavānāṁ na jāyate

महेश ने कहा - हे वाडव! सुनो, मैं नदी के त्रिरात्र (तीन-रात्रि) के शुभ व्रत को बताता हूँ, जिसका पालन करने से मनुष्यों को नरक की प्राप्ति नहीं होती।

श्लोक 3 (padma.6.70.3)

आयुरारोग्यमतुलं सौभाग्यं सुखसंपदम् । संतानं चाक्षयं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते

āyurārogyamatulaṁ saubhāgyaṁ sukhasaṁpadam saṁtānaṁ cākṣayaṁ prāpya svargaloke mahīyate

वे अतुल आयु और आरोग्य, सौभाग्य और सुख-संपदा, तथा अक्षय संतान प्राप्त करके स्वर्गलोक में सम्मानित होते हैं।

श्लोक 4 (padma.6.70.4)

आषाढमासि संप्राप्ते नदीपूरेण संयुता । सततं तोयसंस्थाने पुराणे सा च विश्रुता

āṣāḍhamāsi saṁprāpte nadīpūreṇa saṁyutā satataṁ toyasaṁsthāne purāṇe sā ca viśrutā

आषाढ़ मास आने पर, नदी के जल-प्रवाह से युक्त, सदा जल में स्थित रहने वाली [इस देवी] की पूजा पुराणों में विख्यात है।

श्लोक 5 (padma.6.70.5)

वर्षर्तौ घनसंपूर्णे कर्तव्या सा व्रतेन वा । तोयोघैः परिपूर्णा सा सकलैः स्यान्नदी यदा

varṣartau ghanasaṁpūrṇe kartavyā sā vratena vā toyoghaiḥ paripūrṇā sā sakalaiḥ syānnadī yadā

वर्षा ऋतु में, बादलों से भरे आकाश में, यह व्रत करना चाहिए, अथवा जब नदी सब ओर से जल-प्रवाहों से भरपूर हो जाए,

श्लोक 6 (padma.6.70.6)

व्रतं त्रिरात्रमुद्दिश्य तदा कार्यं प्रयत्नतः । कृतं प्रतिपदा छंदः दर्शनं तु दिनत्रयम्

vrataṁ trirātramuddiśya tadā kāryaṁ prayatnataḥ kṛtaṁ pratipadā chaṁdaḥ darśanaṁ tu dinatrayam

तब त्रिरात्र-व्रत को लक्ष्य करके यत्नपूर्वक इसे करना चाहिए। प्रतिपदा से आरंभ करते हुए, तीन दिनों तक दर्शन करना चाहिए।

श्लोक 7 (padma.6.70.7)

यथाप्राप्तं नदीपूरं स्त्रीभिस्तीरजलस्य तु । अथवा तज्जलं कुंभे कृष्णे कृत्वा गृहं नयेत्

yathāprāptaṁ nadīpūraṁ strībhistīrajalasya tu athavā tajjalaṁ kuṁbhe kṛṣṇe kṛtvā gṛhaṁ nayet

जितना संभव हो, स्त्रियों द्वारा नदी-तट के जल का [संग्रह करना चाहिए], अथवा उस जल को कलश में लेकर कृष्ण पक्ष में घर ले जाना चाहिए।

श्लोक 8 (padma.6.70.8)

प्रातःस्नायी तथा नद्यां गत्वा अभ्यर्चयेत्सुधीः । त्रिरात्रस्योपवासस्य यथाशक्तो भवेद्दिवज

prātaḥsnāyī tathā nadyāṁ gatvā abhyarcayetsudhīḥ trirātrasyopavāsasya yathāśakto bhaveddivaja

बुद्धिमान को प्रातःकाल स्नान करके नदी में जाकर पूजा करनी चाहिए; हे द्विज! जो सक्षम हो, उसे त्रिरात्र का उपवास करना चाहिए।

श्लोक 9 (padma.6.70.9)

अशक्तश्चैकभक्तेन कुर्याच्चैवाप्युपोषणम् । दीपं दद्यादविछिन्नं प्रातःसायं च पूजनम्

aśaktaścaikabhaktena kuryāccaivāpyupoṣaṇam dīpaṁ dadyādavichinnaṁ prātaḥsāyaṁ ca pūjanam

जो असमर्थ हो, वह एक बार भोजन करके भी उपवास कर सकता है। अखंड दीपक जलाना चाहिए, तथा प्रातः-सायं पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 10 (padma.6.70.10)

महानदीं समुच्चार्य नाम्ना च वरुणं तथा । जलमूले तु संस्थाप्य केशवं जलशायिनम्

mahānadīṁ samuccārya nāmnā ca varuṇaṁ tathā jalamūle tu saṁsthāpya keśavaṁ jalaśāyinam

महानदी का नाम लेते हुए और वरुण का भी नाम लेते हुए, जलशायी केशव को जल के आधार पर स्थापित करके [पूजा करनी चाहिए] -

श्लोक 11 (padma.6.70.11)

नमो देव्यै च गंगेति गौतमीति नदीति च । सिंधो चैव च कावेरि सरस्वति नमोऽस्तु ते

namo devyai ca gaṁgeti gautamīti nadīti ca siṁdho caiva ca kāveri sarasvati namo'stu te

'हे देवी! आपको नमस्कार है, हे गंगे, हे गौतमी, हे नदी! हे सिंधु, हे कावेरी, हे सरस्वती! आपको नमस्कार है।

श्लोक 12 (padma.6.70.12)

तापी पयोष्णी पूर्णेति महेंद्रसुखदेति च । काश्यपी गंडकी चैव सिंधुनद्यै नमोनमः

tāpī payoṣṇī pūrṇeti maheṁdrasukhadeti ca kāśyapī gaṁḍakī caiva siṁdhunadyai namonamaḥ

हे तापी, हे पयोष्णी, हे पूर्णा, हे महेंद्र-सुखदा! हे काश्यपी, हे गंडकी! हे सिंधु नदी! आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 13 (padma.6.70.13)

वरुणाय नमस्तेऽस्तु जलवासहरिप्रिय । यादोनाथ रसेशान कल्याणं देहि मे सदा

varuṇāya namaste'stu jalavāsaharipriya yādonātha raseśāna kalyāṇaṁ dehi me sadā

हे वरुण! आपको नमस्कार है, हे जल में निवास करने वाले, हरि के प्रिय! हे यादों (जलचरों) के स्वामी, हे रस के अधिपति! मुझे सदा कल्याण प्रदान कीजिए।

श्लोक 14 (padma.6.70.14)

गृहाणार्घं मया दत्तं देहि मे वांछितं फलम् । कूष्मांडैर्नालिकेरैश्च फलैः कालोद्भवैः शुभैः

gṛhāṇārghaṁ mayā dattaṁ dehi me vāṁchitaṁ phalam kūṣmāṁḍairnālikeraiśca phalaiḥ kālodbhavaiḥ śubhaiḥ

मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य ग्रहण कीजिए, मुझे इच्छित फल दीजिए।' कुम्हड़ा, नारियल तथा ऋतु में उत्पन्न शुभ फलों से,

श्लोक 15 (padma.6.70.15)

नैवेद्यं घृतपक्वं तु सरितः संप्रकल्पयेत् । नमस्ते केशवानंत जलशायिन्नमोऽस्तु ते

naivedyaṁ ghṛtapakvaṁ tu saritaḥ saṁprakalpayet namaste keśavānaṁta jalaśāyinnamo'stu te

घी में पका हुआ नैवेद्य नदी के लिए तैयार करना चाहिए - 'हे केशव, हे अनंत, हे जलशायी! आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है।

श्लोक 16 (padma.6.70.16)

परिपालय मामीश गोविंदवरदो भव । एवं पूजा प्रकर्तव्या यथाकालं क्रमेण तु

paripālaya māmīśa goviṁdavarado bhava evaṁ pūjā prakartavyā yathākālaṁ krameṇa tu

हे ईश! मेरी रक्षा कीजिए, हे गोविंद! वर देने वाले बनिए।' इस प्रकार समय-समय पर क्रमशः पूजा करनी चाहिए,

श्लोक 17 (padma.6.70.17)

प्रार्थना चोपचारैस्तु त्रिरात्रनियमः शुचिः । पारणेन तु संपूज्य जलपात्रं समाचरेत्

prārthanā copacāraistu trirātraniyamaḥ śuciḥ pāraṇena tu saṁpūjya jalapātraṁ samācaret

उपचारों से प्रार्थना सहित, त्रिरात्र का शुद्ध नियम पूर्ण करते हुए। पारण के दिन पूजा करके, जल-पात्र [विसर्जित करने] का आचरण करना चाहिए,

श्लोक 18 (padma.6.70.18)

फलपुष्पैस्तथा विद्वन्स्त्रीभिर्बालैर्नरैरपि । गीतवादित्रसहितैर्नदी कुंभ परिप्लुतैः

phalapuṣpaistathā vidvanstrībhirbālairnarairapi gītavāditrasahitairnadī kuṁbha pariplutaiḥ

हे विद्वन्! फल-फूलों सहित, स्त्रियों, बच्चों और पुरुषों के साथ भी, गीत-वाद्य के साथ, नदी के कलशों से भरे हुए,

श्लोक 19 (padma.6.70.19)

जलेजले समास्थाप्य फलपुष्पैः प्रपूजयेत् । धान्यैर्नानाविधैश्चैव जलप्रक्षेपणैरपि

jalejale samāsthāpya phalapuṣpaiḥ prapūjayet dhānyairnānāvidhaiścaiva jalaprakṣepaṇairapi

जल-जल में उन्हें स्थापित करके फल-फूलों से पूजा करनी चाहिए, विविध धान्यों से भी, तथा जल में उन्हें डालकर भी,

श्लोक 20 (padma.6.70.20)

हास्यैर्गीतैश्च नृत्यैश्च गृहमागत्य यत्नतः । सप्तधान्यैः पूरितानि वंशपात्राणि पूजयेत्

hāsyairgītaiśca nṛtyaiśca gṛhamāgatya yatnataḥ saptadhānyaiḥ pūritāni vaṁśapātrāṇi pūjayet

हास्य, गीत और नृत्य के साथ, तत्पश्चात् प्रयत्नपूर्वक घर लौटकर, सात धान्यों से भरे हुए बाँस के पात्रों की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 21 (padma.6.70.21)

सप्त वा पंच वा त्रीणि यथाशक्त्या प्रपूरयेत् । त्रिरात्रं च नदीतोयं न पिबेद्धितमुल्लसन्

sapta vā paṁca vā trīṇi yathāśaktyā prapūrayet trirātraṁ ca nadītoyaṁ na pibeddhitamullasan

सात, या पाँच, या तीन [पात्रों] को अपनी शक्ति के अनुसार भरना चाहिए। त्रिरात्र के दौरान नदी का जल पीना नहीं चाहिए, चाहे कितनी भी इच्छा हो।

श्लोक 22 (padma.6.70.22)

पारणे तु हविष्यान्नं हृतं वा ह्यन्यथा भवेत् । कृते स्नानार्चने चैव नोपयोज्यं नदीजलम्

pāraṇe tu haviṣyānnaṁ hṛtaṁ vā hyanyathā bhavet kṛte snānārcane caiva nopayojyaṁ nadījalam

पारण के समय हविष्य अन्न [ग्रहण करना चाहिए], अन्यथा वह अपहृत माना जाता है। स्नान और अर्चना करने के बाद भी नदी के जल का उपयोग नहीं करना चाहिए।

श्लोक 23 (padma.6.70.23)

शुच्यन्नानि च भोज्यानि दापयत्त्रितयं तथा । सप्तैव वंशपात्राणि सप्त वै मणिकास्तथा

śucyannāni ca bhojyāni dāpayattritayaṁ tathā saptaiva vaṁśapātrāṇi sapta vai maṇikāstathā

शुद्ध अन्न ही भोजन के लिए देना चाहिए, तीनों दिन ऐसा ही करना चाहिए। सात बाँस के पात्र और सात घड़े भी,

श्लोक 24 (padma.6.70.24)

हविष्यान्नं च भुंजीत कट्वम्लमधुवर्जितम् । माषान्नं च शिलापिष्टं यत्नेन परिवर्जयेत्

haviṣyānnaṁ ca bhuṁjīta kaṭvamlamadhuvarjitam māṣānnaṁ ca śilāpiṣṭaṁ yatnena parivarjayet

हविष्य अन्न ही खाना चाहिए, कड़वा, खट्टा और मीठा वर्जित रखते हुए; उड़द का अन्न और पत्थर पर पीसा हुआ अन्न भी यत्नपूर्वक त्यागना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.6.70.25)

एवं वर्षत्रयं कुर्याद्व्रतमेतद्दिवजोत्तम । वर्षत्रये समाप्यैवं तस्योद्यापनमाचरेत्

evaṁ varṣatrayaṁ kuryādvratametaddivajottama varṣatraye samāpyaivaṁ tasyodyāpanamācaret

हे द्विजोत्तम! इस प्रकार तीन वर्षों तक यह व्रत करना चाहिए। तीन वर्ष पूर्ण होने पर इसका उद्यापन करना चाहिए।

श्लोक 26 (padma.6.70.26)

कृष्णां गां कृष्णवस्त्रां च तिलान्दद्याच्च नारद । दंपती परिदाप्यैवं सुवर्णं चापि शक्तितः

kṛṣṇāṁ gāṁ kṛṣṇavastrāṁ ca tilāndadyācca nārada daṁpatī paridāpyaivaṁ suvarṇaṁ cāpi śaktitaḥ

हे नारद! काली गाय, काला वस्त्र और तिल दान करने चाहिए। दंपति दोनों को, और अपनी शक्ति के अनुसार सोना भी दिलवाना चाहिए।

श्लोक 27 (padma.6.70.27)

हैमं च वरुणं कुर्यान्नदीरूपेण नारद । मंडलं वारुणं चैव सर्वतोभद्रमेव च

haimaṁ ca varuṇaṁ kuryānnadīrūpeṇa nārada maṁḍalaṁ vāruṇaṁ caiva sarvatobhadrameva ca

हे नारद! सोने से बना वरुण भी नदी के रूप में बनाना चाहिए, तथा वारुण-मंडल और सर्वतोभद्र-मंडल भी बनाने चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.70.28)

कुंभं तत्र प्रतिष्ठाप्य सोपहारं प्रतिष्ठितम् । संपूज्य विधिवद्भक्त्या ततो विप्राय दापयेत्

kuṁbhaṁ tatra pratiṣṭhāpya sopahāraṁ pratiṣṭhitam saṁpūjya vidhivadbhaktyā tato viprāya dāpayet

वहाँ भेंट सहित कलश स्थापित करके, विधिपूर्वक भक्तिपूर्वक पूजा करके, फिर उसे ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए।

श्लोक 29 (padma.6.70.29)

ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या यथावित्तानुसारतः । गुरवेर्चितशीलाय सर्वशास्त्ररताय च

brāhmaṇānbhojayecchaktyā yathāvittānusārataḥ guravercitaśīlāya sarvaśāstraratāya ca

अपनी शक्ति के अनुसार, अपने धन के अनुसार, ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, उस गुरु को, जो सदाचारी और समस्त शास्त्रों में लीन हो।

श्लोक 30 (padma.6.70.30)

एवं कृते तदा विद्वन्परिपूर्णं व्रतं भवेत् । सौभाग्यसुखसंपत्तिः संततिश्चाक्षया भवेत्

evaṁ kṛte tadā vidvanparipūrṇaṁ vrataṁ bhavet saubhāgyasukhasaṁpattiḥ saṁtatiścākṣayā bhavet

हे विद्वन्! इस प्रकार करने पर तब व्रत परिपूर्ण होता है; सौभाग्य, सुख-संपत्ति और अक्षय संतान प्राप्त होती है।

श्लोक 31 (padma.6.70.31)

न दुर्गतिमवाप्नोति चिरं स्वर्गे महीयते । देवपत्नीभिराचीर्णमृषिपत्नीभिरेव च

na durgatimavāpnoti ciraṁ svarge mahīyate devapatnībhirācīrṇamṛṣipatnībhireva ca

वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता, और चिरकाल तक स्वर्ग में सम्मानित होता है। यह व्रत देव-पत्नियों द्वारा और ऋषि-पत्नियों द्वारा भी किया गया है,

श्लोक 32 (padma.6.70.32)

नागसिद्धांगनाभिश्च व्रतमेतत्पुरा कृतम् । नदीत्रिरात्रमतुलं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि । सौभाग्यं संततिं चैव निश्चयं प्राप्नुते सदा

nāgasiddhāṁganābhiśca vratametatpurā kṛtam nadītrirātramatulaṁ kimanyacchrotumicchasi saubhāgyaṁ saṁtatiṁ caiva niścayaṁ prāpnute sadā

तथा नाग और सिद्धों की स्त्रियों द्वारा भी यह व्रत प्राचीन काल में किया गया है। नदी का यह अनुपम त्रिरात्र-व्रत है - अब और क्या सुनना चाहते हो? यह सदा सौभाग्य और संतान को निश्चय ही प्राप्त कराता है।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71