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उत्तर खण्ड · अध्याय 90

विष्णु-प्रबोधन एवं कार्तिक-माहात्म्य

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

श्लोक 1 (padma.6.90.1)

सत्योवाच । सर्वेऽपि कालावयवास्तवकालस्वरूपिणः । समानास्तु कथं नाथ मासानां कार्तिको वरः

satyovāca sarve'pi kālāvayavāstavakālasvarūpiṇaḥ samānāstu kathaṁ nātha māsānāṁ kārtiko varaḥ

सत्या ने कहा - हे नाथ! समय के सभी अंश आपके ही कालस्वरूप हैं और समान हैं, फिर सभी महीनों में कार्तिक ही श्रेष्ठ क्यों है?

श्लोक 2 (padma.6.90.2)

एकादशी तिथीनां च मासानां कार्त्तिकः प्रियः । कथं ते देवदेवेश कारणं किं च कथ्यताम्

ekādaśī tithīnāṁ ca māsānāṁ kārttikaḥ priyaḥ kathaṁ te devadeveśa kāraṇaṁ kiṁ ca kathyatām

तिथियों में एकादशी और महीनों में कार्तिक आपको प्रिय है - हे देवाधिदेव! इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (padma.6.90.3)

श्रीकृष्ण उवाच । साधु पृष्टं त्वया सत्ये शृणुष्वैकाग्रमानसा । पृथोर्वैन्यस्य संवादं देवर्षेर्नारदस्य च

śrīkṛṣṇa uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā satye śṛṇuṣvaikāgramānasā pṛthorvainyasya saṁvādaṁ devarṣernāradasya ca

श्रीकृष्ण ने कहा - हे सत्ये! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। एकाग्रचित्त होकर सुनो - राजा पृथु वैन्य और देवर्षि नारद के संवाद को।

श्लोक 4 (padma.6.90.4)

एवमेव पुरा पृष्टो नारदः पृथुना प्रिये । उवाच कार्त्तिकाधिक्ये कारणं सर्वविन्मुनिः

evameva purā pṛṣṭo nāradaḥ pṛthunā priye uvāca kārttikādhikye kāraṇaṁ sarvavinmuniḥ

हे प्रिये! पूर्वकाल में इसी प्रकार पृथु ने नारद से पूछा था, और सर्वज्ञ मुनि नारद ने कार्तिक की महत्ता का कारण बताया था।

श्लोक 5 (padma.6.90.5)

नारद उवाच । शंखनामाभवत्पूर्वमसुरः सागरात्मजः । त्रिलोकीमथने शक्तो महाबलपराक्रमः

nārada uvāca śaṁkhanāmābhavatpūrvamasuraḥ sāgarātmajaḥ trilokīmathane śakto mahābalaparākramaḥ

नारद ने कहा - पूर्वकाल में शंख नामक एक असुर था, जो समुद्र का पुत्र था। वह तीनों लोकों को मथने में समर्थ, महाबली और पराक्रमी था।

श्लोक 6 (padma.6.90.6)

जित्वा देवान्निराकृत्य स्वर्गलोकान्महासुरः । इंद्रादिलोकपालानामधिकारांस्तथाहरत्

jitvā devānnirākṛtya svargalokānmahāsuraḥ iṁdrādilokapālānāmadhikārāṁstathāharat

उस महान् असुर ने देवताओं को जीतकर, उन्हें स्वर्गलोक से निकालकर, इंद्र आदि लोकपालों के अधिकारों को भी हर लिया।

श्लोक 7 (padma.6.90.7)

तद्भयादथ ते देवाः सुवर्णाद्रिगुहां गताः । न्यवसन्बहुवर्षाणि सावरोधाः सवासवाः

tadbhayādatha te devāḥ suvarṇādriguhāṁ gatāḥ nyavasanbahuvarṣāṇi sāvarodhāḥ savāsavāḥ

उसके भय से वे देवता सुवर्ण-पर्वत की गुफा में चले गए और इंद्र सहित, अपनी पत्नियों सहित, कई वर्षों तक वहीं निवास करते रहे।

श्लोक 8 (padma.6.90.8)

सुवर्णाद्रि गुहादुर्गसंस्थितास्त्रिदशा यदा । तद्वश्या न बभूवुस्ते तदा दैत्यो व्यचारयत्

suvarṇādri guhādurgasaṁsthitāstridaśā yadā tadvaśyā na babhūvuste tadā daityo vyacārayat

जब देवता सुवर्ण-पर्वत की दुर्गम गुफा में स्थित होकर उसके वश में नहीं आए, तब उस दैत्य ने विचार किया -

श्लोक 9 (padma.6.90.9)

हृताधिकारास्त्रिदशा मया यद्यपि निर्जिताः । भवंति बलयुक्तास्ते करणीयं ममात्र किम्

hṛtādhikārāstridaśā mayā yadyapi nirjitāḥ bhavaṁti balayuktāste karaṇīyaṁ mamātra kim

मैंने देवताओं के अधिकार हर लिए हैं और उन्हें पराजित भी कर दिया है, फिर भी वे बलवान बने रहते हैं। अब मुझे क्या करना चाहिए?

श्लोक 10 (padma.6.90.10)

अद्य ज्ञातं मया देवा वेदमंत्रबलान्विताः । तान्हरिष्ये ततः सर्वे बलहीना भवंति हि

adya jñātaṁ mayā devā vedamaṁtrabalānvitāḥ tānhariṣye tataḥ sarve balahīnā bhavaṁti hi

आज मैंने जान लिया है कि देवता वेद-मंत्रों के बल से युक्त हैं। यदि मैं उन वेदों को हर लूँ, तो वे सभी निश्चय ही बलहीन हो जाएँगे।

श्लोक 11 (padma.6.90.11)

इति मत्वा ततो दैत्यो विष्णुमालक्ष्य निद्रितम् । सत्यलोकाज्जहाराशु वेदानां च गणं प्रभुः

iti matvā tato daityo viṣṇumālakṣya nidritam satyalokājjahārāśu vedānāṁ ca gaṇaṁ prabhuḥ

ऐसा विचार कर उस शक्तिशाली दैत्य ने विष्णु को सोया हुआ देखकर सत्यलोक से वेदों के समूह को शीघ्र चुरा लिया।

श्लोक 12 (padma.6.90.12)

नीतास्तु तेन ते वेदास्तद्भयात्ते निराक्रमन् । तोये निविविशुस्तेऽत्र यज्ञमंत्रसमन्विताः

nītāstu tena te vedāstadbhayātte nirākraman toye niviviśuste'tra yajñamaṁtrasamanvitāḥ

वेदों को वहाँ ले जाकर, उसी के भय से वे वेद भाग गए और यज्ञ-मंत्रों सहित जल में जा छिपे।

श्लोक 13 (padma.6.90.13)

तान्मार्गमाणः शंखोऽपि समुद्रांतर्गतो भ्रमन् । न ददर्श ततो दैत्यः क्वचिदेकत्र संस्थितान्

tānmārgamāṇaḥ śaṁkho'pi samudrāṁtargato bhraman na dadarśa tato daityaḥ kvacidekatra saṁsthitān

उन्हें ढूँढते हुए शंख भी समुद्र में घुसकर घूमने लगा, किंतु उस दैत्य ने उन्हें कहीं भी एक स्थान पर स्थित हुए नहीं देखा।

श्लोक 14 (padma.6.90.14)

अथ ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं विष्णुं शरणमन्वयात् । पूजोपकरणं गृह्य वैकुंठभवनं गतः

atha brahmā suraiḥ sārddhaṁ viṣṇuṁ śaraṇamanvayāt pūjopakaraṇaṁ gṛhya vaikuṁṭhabhavanaṁ gataḥ

तब ब्रह्मा देवताओं के साथ विष्णु की शरण में गए। पूजा की सामग्री लेकर वे वैकुंठ-भवन गए।

श्लोक 15 (padma.6.90.15)

तत्र तस्य प्रबोधाय गीतवाद्यादिकाः क्रियाः । चक्रुर्देवा गंधपुष्पधूपदीपान्मुहुर्मुहुः

tatra tasya prabodhāya gītavādyādikāḥ kriyāḥ cakrurdevā gaṁdhapuṣpadhūpadīpānmuhurmuhuḥ

वहाँ उन्हें जगाने के लिए देवताओं ने गीत-वाद्य आदि क्रियाएँ कीं और बार-बार गंध, पुष्प, धूप, दीप अर्पित किए।

श्लोक 16 (padma.6.90.16)

अथ प्रबुद्धो भगवांस्तद्भक्तिपरितोषितः । ददृशे तैः सुरैस्तत्र सहस्रार्कसमद्युतिः

atha prabuddho bhagavāṁstadbhaktiparitoṣitaḥ dadṛśe taiḥ suraistatra sahasrārkasamadyutiḥ

तब भगवान जागृत हुए और उनकी भक्ति से संतुष्ट होकर, उन देवताओं ने वहाँ सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी उन्हें देखा।

श्लोक 17 (padma.6.90.17)

उपचारैः षोडशभिः संपूज्य त्रिदशास्तदा । दंडवत्पतिता भूमौ तानुवाचाथ केशवः

upacāraiḥ ṣoḍaśabhiḥ saṁpūjya tridaśāstadā daṁḍavatpatitā bhūmau tānuvācātha keśavaḥ

तब देवताओं ने सोलह उपचारों से उनकी भलीभाँति पूजा की और भूमि पर दंडवत् प्रणाम किया। तब केशव ने उनसे कहा -

श्लोक 18 (padma.6.90.18)

विष्णुरुवाच । वरदोऽहं सुरगणा गीतवाद्यादि मंगलैः । मनोऽभिलषितान्कामान्सर्वानेव ददामि वः

viṣṇuruvāca varado'haṁ suragaṇā gītavādyādi maṁgalaiḥ mano'bhilaṣitānkāmānsarvāneva dadāmi vaḥ

विष्णु ने कहा - हे देवगण! मैं वर देने वाला हूँ। इन मंगलमय गीत-वाद्य आदि से मैं तुम सभी की मनोवांछित कामनाएँ पूर्ण करता हूँ।

श्लोक 19 (padma.6.90.19)

इषस्य शुक्लैकादश्या यावदुद्बोधिनी भवेत् । निशातुर्यांशशेषेण गीतवाद्यादि मंगलैः

iṣasya śuklaikādaśyā yāvadudbodhinī bhavet niśāturyāṁśaśeṣeṇa gītavādyādi maṁgalaiḥ

कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी को, जो प्रबोधिनी कहलाती है, रात्रि के अंतिम चतुर्थांश में मंगलमय गीत-वाद्य आदि के साथ -

श्लोक 20 (padma.6.90.20)

कुर्वंति मनुजा नित्यं भवद्भिर्यद्यथाकृतम् । ते मत्प्रियकरा नित्यं मत्सांनिध्यं व्रजंति हि

kurvaṁti manujā nityaṁ bhavadbhiryadyathākṛtam te matpriyakarā nityaṁ matsāṁnidhyaṁ vrajaṁti hi

- जो मनुष्य सदा वही करते हैं जो तुमने किया था, वे मुझे सदा प्रिय करने वाले होते हैं और निश्चय ही मेरी निकटता को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 21 (padma.6.90.21)

पाद्यार्घाचमनीयाद्यैर्भवद्भिर्यद्यथाकृतम् । तदद्भुतगुणं यस्माज्जातंवः सुखकारणम्

pādyārghācamanīyādyairbhavadbhiryadyathākṛtam tadadbhutaguṇaṁ yasmājjātaṁvaḥ sukhakāraṇam

पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि से जो तुमने किया, वह अद्भुत गुण वाला है, जिससे तुम्हें सुख का कारण प्राप्त हुआ।

श्लोक 22 (padma.6.90.22)

वेदाः शंखहृताः सर्वे तिष्ठंत्युदकसंस्थिताः । तानानयाम्यहं देवा हत्वा सागरनंदनम्

vedāḥ śaṁkhahṛtāḥ sarve tiṣṭhaṁtyudakasaṁsthitāḥ tānānayāmyahaṁ devā hatvā sāgaranaṁdanam

शंख द्वारा हरे गए सभी वेद जल में स्थित हैं। हे देवगण! सागर के पुत्र को मारकर मैं उन्हें वापस लाऊँगा।

श्लोक 23 (padma.6.90.23)

अद्यप्रभृति वेदास्तु मंत्रबीजमखान्विताः । प्रत्यब्दं कार्तिके मासि विश्रमंत्वप्सु सर्वदा

adyaprabhṛti vedāstu maṁtrabījamakhānvitāḥ pratyabdaṁ kārtike māsi viśramaṁtvapsu sarvadā

आज से लेकर मंत्र-बीज और यज्ञों से युक्त वेद प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में सदा जल में विश्राम करेंगे।

श्लोक 24 (padma.6.90.24)

अद्यप्रभृत्यहमपि भवामि जलमध्यगः । भवंतोऽपि मया सार्द्धमायांतु समुनीश्वराः

adyaprabhṛtyahamapi bhavāmi jalamadhyagaḥ bhavaṁto'pi mayā sārddhamāyāṁtu samunīśvarāḥ

आज से लेकर मैं भी जल के मध्य में स्थित रहूँगा। तुम भी मेरे साथ ऋषिश्वरों सहित आओ।

श्लोक 25 (padma.6.90.25)

कालेऽस्मिन्नेव कुर्वंति प्रातःस्नानं द्विजोत्तमाः । ते सर्वयज्ञावभृथैः सुस्नाताः स्युर्न संशयः

kāle'sminneva kurvaṁti prātaḥsnānaṁ dvijottamāḥ te sarvayajñāvabhṛthaiḥ susnātāḥ syurna saṁśayaḥ

इसी काल में जो श्रेष्ठ द्विज प्रातः स्नान करते हैं, वे सभी यज्ञों के अवभृथ-स्नान से भलीभाँति स्नात हुए मानने चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 26 (padma.6.90.26)

ये कार्तिके व्रतं सम्यङ्नित्यं कुर्वंति मानवाः । ते देहांते त्वया शक्र प्राप्या मद्भवनं सदा

ye kārtike vrataṁ samyaṅnityaṁ kurvaṁti mānavāḥ te dehāṁte tvayā śakra prāpyā madbhavanaṁ sadā

जो मनुष्य कार्तिक में सदा भलीभाँति यह व्रत करते हैं, हे शक्र! शरीर छूटने पर वे सदा तुम्हारे द्वारा मेरे भवन में पहुँचाए जाने योग्य हैं।

श्लोक 27 (padma.6.90.27)

विघ्नेभ्यो रक्षणं तेषां यया कार्यं ममाज्ञया । देया त्वया च वरुण पुत्रपौत्रादि संततिः

vighnebhyo rakṣaṇaṁ teṣāṁ yayā kāryaṁ mamājñayā deyā tvayā ca varuṇa putrapautrādi saṁtatiḥ

मेरी आज्ञा से जिस विधि से उनकी विघ्नों से रक्षा की जानी चाहिए, वह की जाए। हे वरुण! तुम्हें उन्हें पुत्र-पौत्र आदि संतान भी देनी चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.90.28)

धनवृद्धिर्धनाध्यक्ष त्वया कार्या ममाज्ञया । ममरूपधराः साक्षाज्जीवन्मुक्ताश्च ते नराः

dhanavṛddhirdhanādhyakṣa tvayā kāryā mamājñayā mamarūpadharāḥ sākṣājjīvanmuktāśca te narāḥ

हे धनाध्यक्ष! मेरी आज्ञा से तुम्हें उनकी धन-वृद्धि करनी चाहिए। वे मनुष्य साक्षात् मेरे ही रूप को धारण करने वाले और जीवन्मुक्त हैं।

श्लोक 29 (padma.6.90.29)

आजन्ममरणाद्यैश्च कृतमेतद्व्रतोत्तमम् । यथोक्तविधिना सम्यक्ते मान्या भवतामपि

ājanmamaraṇādyaiśca kṛtametadvratottamam yathoktavidhinā samyakte mānyā bhavatāmapi

जिन्होंने जन्म से लेकर मृत्यु तक विधिपूर्वक इस उत्तम व्रत को भलीभाँति किया है, वे तुम सबके लिए भी सम्माननीय हैं।

श्लोक 30 (padma.6.90.30)

एकादश्यां यतश्चाहं भवद्भिः प्रतिबोधितः । अतश्चैषा तिथिर्मान्या सदैव प्रीतिदा मम

ekādaśyāṁ yataścāhaṁ bhavadbhiḥ pratibodhitaḥ ataścaiṣā tithirmānyā sadaiva prītidā mama

चूँकि एकादशी को ही तुमने मुझे जगाया, इसलिए यह तिथि सम्माननीय है और सदा मुझे प्रिय है।

श्लोक 31 (padma.6.90.31)

व्रतद्वयं सम्यगिदं नरैः कृतं कृष्णस्य सान्निध्यदमस्ति नान्यत् । दानानि तीर्थानि तपांसि यज्ञाः स्वर्लोकदानेन सदा सुरोत्तमाः

vratadvayaṁ samyagidaṁ naraiḥ kṛtaṁ kṛṣṇasya sānnidhyadamasti nānyat dānāni tīrthāni tapāṁsi yajñāḥ svarlokadānena sadā surottamāḥ

मनुष्यों द्वारा भलीभाँति किया गया यह दोनों व्रत ही कृष्ण की निकटता देने वाला है, इससे बढ़कर अन्य कुछ नहीं है। हे श्रेष्ठ देवगण! दान, तीर्थ, तप और यज्ञ - ये सब स्वर्गलोक के दान के समान ही सदा फलदायी हैं, किंतु इस व्रत के समान नहीं।

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