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उत्तर खण्ड · अध्याय 94

कार्तिक-व्रत आहार-नियम

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

श्लोक 1 (padma.6.94.1)

नारद उवाच । कार्तिकव्रतिनां पुंसां नियमा ये प्रकीर्तिताः । ताञ्छृणुष्व मया राजन्कथ्यमानान्समंततः

nārada uvāca kārtikavratināṁ puṁsāṁ niyamā ye prakīrtitāḥ tāñchṛṇuṣva mayā rājankathyamānānsamaṁtataḥ

नारद ने कहा - हे राजन्! कार्तिक-व्रत करने वालों के लिए जो नियम कहे गए हैं, उन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह से बताए जाते हुए सुनो।

श्लोक 2 (padma.6.94.2)

सर्वामिषाणि मांसानि क्षौद्रं सौवीरकं तथा । राजमाषादिकं चापि नैवाद्यात्कार्तिकव्रती

sarvāmiṣāṇi māṁsāni kṣaudraṁ sauvīrakaṁ tathā rājamāṣādikaṁ cāpi naivādyātkārtikavratī

कार्तिक-व्रती को सभी प्रकार के मांस, शहद, सौवीरक, उड़द आदि दालें कभी नहीं खानी चाहिए।

श्लोक 3 (padma.6.94.3)

द्विदलं तिलतैलं च तथान्नमश्रुदूषितम् । भावदुष्टं शब्ददुष्टं वर्जयेत्कार्तिकव्रती

dvidalaṁ tilatailaṁ ca tathānnamaśrudūṣitam bhāvaduṣṭaṁ śabdaduṣṭaṁ varjayetkārtikavratī

दाल, तिल का तेल तथा आँसुओं से दूषित हुआ अन्न, तथा भाव से दूषित और शब्द से दूषित अन्न भी कार्तिक-व्रती को त्याग देना चाहिए।

श्लोक 4 (padma.6.94.4)

परान्नं च परद्रोहं परदारागमं तथा । तीर्थे प्रतिगृहं नापि गृह्णीयात्कार्तिकव्रती

parānnaṁ ca paradrohaṁ paradārāgamaṁ tathā tīrthe pratigṛhaṁ nāpi gṛhṇīyātkārtikavratī

दूसरे का अन्न, दूसरे से द्रोह, तथा दूसरे की पत्नी के पास जाना - कार्तिक-व्रती को त्याग देना चाहिए। तीर्थ में भी दूसरे से भेंट स्वरूप कोई वस्तु नहीं लेनी चाहिए।

श्लोक 5 (padma.6.94.5)

देवदेवद्विजानां च गुरोश्च व्रतिनस्तथा । स्त्रीराजमहतां निंदां वर्जयेत्कार्तिके व्रती

devadevadvijānāṁ ca gurośca vratinastathā strīrājamahatāṁ niṁdāṁ varjayetkārtike vratī

कार्तिक में व्रती को देवताओं, ब्राह्मणों, गुरु, अन्य व्रतधारियों, स्त्रियों, राजा तथा महापुरुषों की निंदा का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 6 (padma.6.94.6)

प्राण्यंगमामिषं चूर्णं फले जंबीरमामिषम् । धान्ये मसूरिका प्रोक्ता चान्नं पर्युषितं तथा

prāṇyaṁgamāmiṣaṁ cūrṇaṁ phale jaṁbīramāmiṣam dhānye masūrikā proktā cānnaṁ paryuṣitaṁ tathā

प्राणी का अंग मांस के समान त्याज्य है, बासी चूर्ण, फलों में जंबीर, धान्यों में मसूर की दाल तथा बासी अन्न भी मांस के समान त्याज्य कहे गए हैं।

श्लोक 7 (padma.6.94.7)

अजागोमहिषीक्षीरादन्यदुग्धादि चामिषम् । द्विजक्रीता रसाः सर्वे लवणं भूमिजं तथा

ajāgomahiṣīkṣīrādanyadugdhādi cāmiṣam dvijakrītā rasāḥ sarve lavaṇaṁ bhūmijaṁ tathā

बकरी, गाय और भैंस के दूध के अतिरिक्त अन्य पशुओं का दूध मांस के समान है। ब्राह्मण द्वारा बेचे गए सभी रस अखाद्य हैं, तथा भूमि से उत्पन्न सैंधव लवण भी इस श्रेणी में है।

श्लोक 8 (padma.6.94.8)

ताम्रपात्रस्थितं गव्यं जलं पल्वलसंस्थितम् । आत्मार्थं पाचितं चान्नमामिषं तत्स्मृतं बुधैः

tāmrapātrasthitaṁ gavyaṁ jalaṁ palvalasaṁsthitam ātmārthaṁ pācitaṁ cānnamāmiṣaṁ tatsmṛtaṁ budhaiḥ

ताँबे के पात्र में रखा हुआ दूध, जलाशय में स्थित गंदा जल, और केवल अपने लिए ही पकाया गया अन्न - ये सभी बुद्धिमानों द्वारा मांस के समान त्याज्य माने गए हैं।

श्लोक 9 (padma.6.94.9)

ब्रह्मचर्यमधः सुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम् । चतुर्थकाले भुंजीत कुर्यादेवं सदा व्रती

brahmacaryamadhaḥ suptiḥ patrāvalyāṁ ca bhojanam caturthakāle bhuṁjīta kuryādevaṁ sadā vratī

ब्रह्मचर्य का पालन, भूमि पर सोना, पत्तों के पत्तल पर भोजन करना - व्रती को दिन के चौथे प्रहर में भोजन करना चाहिए, इस प्रकार सदा करना चाहिए।

श्लोक 10 (padma.6.94.10)

नरकस्य चतुर्दश्यां तैलाभ्यंगं च कारयेत् । अन्यत्र कार्तिकस्नायि तैलाभ्यंगं न कारयेत्

narakasya caturdaśyāṁ tailābhyaṁgaṁ ca kārayet anyatra kārtikasnāyi tailābhyaṁgaṁ na kārayet

नरक-चतुर्दशी को तेल का अभ्यंगन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कार्तिक-स्नान करने वाले को कहीं भी तेल की मालिश नहीं करानी चाहिए।

श्लोक 11 (padma.6.94.11)

पलांडुं लशुनं शिग्रु छत्राकं गृंजनं तथा । नालिकां मूलकं हिंगुं वर्जयेत्कार्तिकव्रती

palāṁḍuṁ laśunaṁ śigru chatrākaṁ gṛṁjanaṁ tathā nālikāṁ mūlakaṁ hiṁguṁ varjayetkārtikavratī

प्याज, लहसुन, सहजन, कुकुरमुत्ता, गाजर, कमल-नाल, मूली और हींग - इन सबका कार्तिक-व्रती को त्याग करना चाहिए।

श्लोक 12 (padma.6.94.12)

अलाबुं चापि वृंताकं कूष्मांडं बृहतीफलम् । श्लेष्मातकं कपित्थं च वर्जयेद्वैष्णवव्रती

alābuṁ cāpi vṛṁtākaṁ kūṣmāṁḍaṁ bṛhatīphalam śleṣmātakaṁ kapitthaṁ ca varjayedvaiṣṇavavratī

लौकी, बैंगन, कुम्हड़ा, बड़ी बैंगन, लसोड़ा तथा कैथ - इन सबका भी वैष्णव-व्रती को त्याग करना चाहिए।

श्लोक 13 (padma.6.94.13)

रजस्वलांत्यज म्लेच्छ पतितव्रात्यकैः सह । द्विजातिवेदबाह्यैश्च न वदेत्कार्तिकव्रती

rajasvalāṁtyaja mleccha patitavrātyakaiḥ saha dvijātivedabāhyaiśca na vadetkārtikavratī

कार्तिक-व्रती को रजस्वला स्त्री, अंत्यज, म्लेच्छ, पतित, व्रात्य तथा द्विजातियों में से वेद-बाह्य लोगों से बातचीत नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 14 (padma.6.94.14)

श्वभिर्दृष्टं च काकैश्च सूतकान्नं च वर्जयेत् । द्विःपाचितं च दग्धान्नं वर्जयेत्कार्तिकव्रती

śvabhirdṛṣṭaṁ ca kākaiśca sūtakānnaṁ ca varjayet dviḥpācitaṁ ca dagdhānnaṁ varjayetkārtikavratī

कुत्तों और कौवों द्वारा देखा गया अन्न, तथा सूतक से युक्त अन्न का त्याग करना चाहिए। कार्तिक-व्रती को दो बार पकाए हुए तथा जले हुए अन्न का भी त्याग करना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.6.94.15)

तिलाभ्यंगं तथा शय्यां परान्नं कांस्यभोजनम् । कार्तिके वर्जयेद्यस्तु परिपूर्णव्रती भवेत् । एतानि वर्जयेन्नित्यं व्रती सर्वव्रतेष्वपि । कृच्छ्राद्यं चापि कुर्वीत स्वशक्त्या विष्णुतुष्टये

tilābhyaṁgaṁ tathā śayyāṁ parānnaṁ kāṁsyabhojanam kārtike varjayedyastu paripūrṇavratī bhavet etāni varjayennityaṁ vratī sarvavrateṣvapi kṛcchrādyaṁ cāpi kurvīta svaśaktyā viṣṇutuṣṭaye

तिल के तेल का अभ्यंगन, ऊँची शय्या पर सोना, दूसरे का अन्न और कांसे के पात्र में भोजन - जो कार्तिक में इन सबका त्याग करता है, वही परिपूर्ण व्रती होता है। व्रती को सभी व्रतों में सदा इनका त्याग करना चाहिए, और विष्णु को प्रसन्न करने के लिए अपनी शक्ति के अनुसार कृच्छ्र आदि व्रत भी करने चाहिए।

श्लोक 16 (padma.6.94.16)

क्रमात्कूष्मांड वृंताकं बृहती मूलकं तथा । श्रीफलं च कलिंगं च फलं धात्रीभवं तथा

kramātkūṣmāṁḍa vṛṁtākaṁ bṛhatī mūlakaṁ tathā śrīphalaṁ ca kaliṁgaṁ ca phalaṁ dhātrībhavaṁ tathā

क्रमशः कुम्हड़ा, बैंगन, बड़ी बैंगन, मूली, बेल का फल, तरबूज और आँवले का फल -

श्लोक 17 (padma.6.94.17)

नारिकेरं महालाबुं पटोलं बदरीफलम् । चर्म वैकतकं चापि बिसं वै कट्फलं तथा

nārikeraṁ mahālābuṁ paṭolaṁ badarīphalam carma vaikatakaṁ cāpi bisaṁ vai kaṭphalaṁ tathā

नारियल, बड़ी लौकी, परवल, बेर का फल, चमड़ा, वैकतक, कमल-नाल तथा कायफल -

श्लोक 18 (padma.6.94.18)

शाकान्येतानि वर्ज्यानि क्रमात्प्रतिपदादिषु । धात्रीफलं रवौ तद्वद्वर्जयेत्सर्वदा गृही

śākānyetāni varjyāni kramātpratipadādiṣu dhātrīphalaṁ ravau tadvadvarjayetsarvadā gṛhī

ये सब्जियाँ क्रमशः प्रतिपदा आदि तिथियों में त्याज्य हैं। इसी प्रकार गृहस्थ को रविवार को सदा आँवले के फल का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 19 (padma.6.94.19)

एभ्योऽपि वर्जयेत्किंचिद्यद्विष्णुप्रीतये नरः । तत्पुनर्ब्राह्मणे दत्त्वा भक्षयेत्सर्वदैव हि

ebhyo'pi varjayetkiṁcidyadviṣṇuprītaye naraḥ tatpunarbrāhmaṇe dattvā bhakṣayetsarvadaiva hi

इनमें से भी जो कुछ मनुष्य विष्णु की प्रसन्नता के लिए त्याग करता है, उसे ब्राह्मण को देकर, फिर वह उसे प्रसाद स्वरूप सदा ग्रहण कर सकता है।

श्लोक 20 (padma.6.94.20)

एवमेव हि माघेऽपि कुर्याद्वै नियमान्व्रती । हरिजागरणं तत्र विधिप्रोक्तं च कारयेत्

evameva hi māghe'pi kuryādvai niyamānvratī harijāgaraṇaṁ tatra vidhiproktaṁ ca kārayet

इसी प्रकार माघ में भी व्रती को ये नियम करने चाहिए। वहाँ विधिपूर्वक कहे गए हरि-जागरण को भी कराना चाहिए।

श्लोक 21 (padma.6.94.21)

यथोक्तकारिणं दृष्ट्वा कार्तिकव्रतिनं नरम् । यमदूताः पलायंते गजाः सिंहार्दिता यथा

yathoktakāriṇaṁ dṛṣṭvā kārtikavratinaṁ naram yamadūtāḥ palāyaṁte gajāḥ siṁhārditā yathā

जैसे सिंह से पीड़ित हाथी भाग जाते हैं, वैसे ही यथोक्त विधि से आचरण करने वाले कार्तिक-व्रती मनुष्य को देखकर यमदूत भाग जाते हैं।

श्लोक 22 (padma.6.94.22)

वरं विष्णुव्रतं ह्येतदथ यज्ञशताधिकम् । यज्ञकृत्प्राप्नुयात्स्वर्गं वैकुंठं कार्तिकव्रती

varaṁ viṣṇuvrataṁ hyetadatha yajñaśatādhikam yajñakṛtprāpnuyātsvargaṁ vaikuṁṭhaṁ kārtikavratī

यह विष्णु-व्रत सौ यज्ञों से भी श्रेष्ठ है। यज्ञ करने वाला स्वर्ग प्राप्त करता है, किंतु कार्तिक-व्रती वैकुंठ प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (padma.6.94.23)

भुक्तिमुक्तिप्रदानीह यानि क्षेत्राणि भूतले । वसंति तानि तद्गेहे कार्तिक्रव्रतकारिणः

bhuktimuktipradānīha yāni kṣetrāṇi bhūtale vasaṁti tāni tadgehe kārtikravratakāriṇaḥ

इस पृथ्वी पर जो भी क्षेत्र भोग और मोक्ष देने वाले हैं, वे सब कार्तिक-व्रत करने वाले के घर में ही निवास करते हैं।

श्लोक 24 (padma.6.94.24)

दुःस्वप्न्नं दुष्कृतं किंचिन्मनोवाक्कायकर्मजम् । कार्त्तिकव्रतिनं दृष्ट्वा विलयं यांति तत्क्षणात्

duḥsvapnnaṁ duṣkṛtaṁ kiṁcinmanovākkāyakarmajam kārttikavratinaṁ dṛṣṭvā vilayaṁ yāṁti tatkṣaṇāt

दुःस्वप्न और मन, वाणी तथा शरीर से किए गए कोई भी दुष्कर्म, कार्तिक-व्रती को देखते ही उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 25 (padma.6.94.25)

कार्त्तिकव्रतिनः पुंसो विष्णुवाक्यप्रणोदिताः । रक्षां कुर्वंति शक्राद्या राज्ञो वै किंकरा यथा

kārttikavratinaḥ puṁso viṣṇuvākyapraṇoditāḥ rakṣāṁ kurvaṁti śakrādyā rājño vai kiṁkarā yathā

विष्णु के वचन से प्रेरित होकर इंद्र आदि देवगण कार्तिक-व्रती मनुष्य की रक्षा करते हैं, जैसे राजा के सेवक राजा की आज्ञा से रक्षा करते हैं।

श्लोक 26 (padma.6.94.26)

विष्णुव्रतकरा नित्यं यत्र तिष्ठंति पूजिताः । ग्रहभूतपिशाचाद्या नैव तिष्ठंति तत्र वै

viṣṇuvratakarā nityaṁ yatra tiṣṭhaṁti pūjitāḥ grahabhūtapiśācādyā naiva tiṣṭhaṁti tatra vai

जहाँ विष्णु-व्रत करने वाले सदा पूजित होकर रहते हैं, वहाँ ग्रह, भूत, पिशाच आदि कभी नहीं ठहरते।

श्लोक 27 (padma.6.94.27)

कार्त्तिकव्रतिनः पुण्यं यथोक्तव्रतकारिणः । न समर्थो भवेद्वक्तुं ब्रह्मापीह चतुर्मुखः

kārttikavratinaḥ puṇyaṁ yathoktavratakāriṇaḥ na samartho bhavedvaktuṁ brahmāpīha caturmukhaḥ

यथोक्त विधि से व्रत करने वाले कार्तिक-व्रती के पुण्य को कहने में यहाँ स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 28 (padma.6.94.28)

विष्णुप्रियं सकलकल्मषनाशनं च सर्वत्र पुत्रधनधान्यसमृद्धिकारि । ऊर्जे व्रतं सनियमं कुरुते मनुष्यः किं तस्य तीर्थपरिशीलन सेवया च

viṣṇupriyaṁ sakalakalmaṣanāśanaṁ ca sarvatra putradhanadhānyasamṛddhikāri ūrje vrataṁ saniyamaṁ kurute manuṣyaḥ kiṁ tasya tīrthapariśīlana sevayā ca

यह व्रत विष्णु को प्रिय है, सभी पापों का नाशक है और सर्वत्र पुत्र, धन तथा धान्य की समृद्धि करने वाला है। जो मनुष्य ऊर्ज मास में नियम सहित यह व्रत करता है, उसे तीर्थों के सेवन और परिशीलन की क्या आवश्यकता है?

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