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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 12

मासानुसार हरि-अर्चन तथा अश्वत्थ-माहात्म्य

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (padma.7.12.1)

व्यास उवाच- फाल्गुने ब्राह्मणश्रेष्ठ श्रीकृष्णं सुरवंदितम् । पूजयेद्भक्तिभावेन प्रत्यहं वैष्णवो जनः

vyāsa uvāca- phālgune brāhmaṇaśreṣṭha śrīkṛṣṇaṁ suravaṁditam pūjayedbhaktibhāvena pratyahaṁ vaiṣṇavo janaḥ

व्यास जी ने कहा — हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ! फाल्गुन मास में वैष्णव जन को प्रतिदिन देवताओं से वन्दित श्रीकृष्ण की भक्तिभाव से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 2 (padma.7.12.2)

फाल्गुने स्नापयेद्यस्तु सर्पिषा देवकीसुतम् । फलं तस्य प्रवक्ष्यामि यतः सम्यङिनशामय

phālgune snāpayedyastu sarpiṣā devakīsutam phalaṁ tasya pravakṣyāmi yataḥ samyaṅinaśāmaya

जो फाल्गुन में देवकी-पुत्र को घी से स्नान कराता है, उसका फल मैं कहूँगा, क्योंकि यह भलीभाँति सुनने योग्य है।

श्लोक 3 (padma.7.12.3)

सर्वयज्ञफलं प्राप्य सर्वदानफलं तथा । अंते याति हरेः स्थानं सर्वपापविवर्जितः

sarvayajñaphalaṁ prāpya sarvadānaphalaṁ tathā aṁte yāti hareḥ sthānaṁ sarvapāpavivarjitaḥ

समस्त यज्ञों का फल और समस्त दानों का फल प्राप्त करके, अन्त में वह समस्त पापों से रहित होकर हरि के धाम को जाता है।

श्लोक 4 (padma.7.12.4)

युगकोटिसहस्राणि भुक्त्त्वा भोगं हरेर्गृहे । तत्रैव मोक्षमाप्नोति संप्राप्य ज्ञानमुत्तमम्

yugakoṭisahasrāṇi bhukttvā bhogaṁ harergṛhe tatraiva mokṣamāpnoti saṁprāpya jñānamuttamam

हजारों करोड़ युगों तक हरि के घर में भोग भोगकर, वहीं उत्तम ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष पाता है।

श्लोक 5 (padma.7.12.5)

यस्तु यच्छति कृष्णाय शिशिरे गोपमूर्तये । तिलानां मोदकं दिव्यं स गच्छेद्धरिमंदिरम्

yastu yacchati kṛṣṇāya śiśire gopamūrtaye tilānāṁ modakaṁ divyaṁ sa gaccheddharimaṁdiram

जो शिशिर ऋतु में गोप-रूपधारी कृष्ण को तिल के दिव्य लड्डू अर्पित करता है, वह हरि के मन्दिर को जाता है।

श्लोक 6 (padma.7.12.6)

यो दुग्धलड्डुकान्दद्यात्केशवाय महात्मने । स पिबेदमृतं स्वर्गे मन्वंतरशतावधि

yo dugdhalaḍḍukāndadyātkeśavāya mahātmane sa pibedamṛtaṁ svarge manvaṁtaraśatāvadhi

जो महात्मा केशव को दूध के लड्डू अर्पित करता है, वह सैकड़ों मन्वन्तरों तक स्वर्ग में अमृत का पान करता है।

श्लोक 7 (padma.7.12.7)

हरये ललितं खंडं यस्तु यच्छति जैमिने । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा छिनत्ति भवबंधनम्

haraye lalitaṁ khaṁḍaṁ yastu yacchati jaimine tasya viṣṇuḥ prasannātmā chinatti bhavabaṁdhanam

हे जैमिनि! जो हरि को सुन्दर मिश्री (खण्ड) अर्पित करता है, उसके संसार-बन्धन को प्रसन्नात्मा विष्णु काट देते हैं।

श्लोक 8 (padma.7.12.8)

विचित्रं फलितं दिव्यं दद्याद्भगवते द्विज । अंते शक्रपुरं गत्वा स भवेत्सुरवंदितः

vicitraṁ phalitaṁ divyaṁ dadyādbhagavate dvija aṁte śakrapuraṁ gatvā sa bhavetsuravaṁditaḥ

हे द्विज! जो भगवान् को नाना दिव्य फल अर्पित करता है, वह अन्त में इन्द्र की नगरी को जाकर देवताओं से वन्दित होता है।

श्लोक 9 (padma.7.12.9)

निर्मलां शर्करां यच्छेद्यस्तु कृष्णाय भक्तिमान् । स किं न लभते विप्र वासुदेवप्रसादतः

nirmalāṁ śarkarāṁ yacchedyastu kṛṣṇāya bhaktimān sa kiṁ na labhate vipra vāsudevaprasādataḥ

जो भक्त कृष्ण को निर्मल मिश्री अर्पित करता है, हे विप्र! वह वासुदेव की कृपा से क्या प्राप्त नहीं करता?

श्लोक 10 (padma.7.12.10)

सुपक्वं फाल्गुने मासि मधुरं बदरीफलम् । यस्तु यच्छति कृष्णाय फलं तस्य निशामय

supakvaṁ phālgune māsi madhuraṁ badarīphalam yastu yacchati kṛṣṇāya phalaṁ tasya niśāmaya

फाल्गुन मास में जो कृष्ण को सुपक्व, मधुर बेर का फल अर्पित करता है, उसका फल सुनो।

श्लोक 11 (padma.7.12.11)

इह भुङ्क्ते सुखं सर्वं पुत्रपौत्रसमन्वितः । अंते हरेर्गृहं याति रथमारुह्य शोभनम्

iha bhuṅkte sukhaṁ sarvaṁ putrapautrasamanvitaḥ aṁte harergṛhaṁ yāti rathamāruhya śobhanam

वह यहाँ पुत्र-पौत्रों सहित समस्त सुख भोगकर, अन्त में सुन्दर रथ पर सवार होकर हरि के घर को जाता है।

श्लोक 12 (padma.7.12.12)

न दद्याद्गुडसंयुक्तं हरये बदरीफलम् । अज्ञानाद्ब्राह्मणश्रेष्ठ दद्याच्चेन्नारकीभवेत्

na dadyādguḍasaṁyuktaṁ haraye badarīphalam ajñānādbrāhmaṇaśreṣṭha dadyāccennārakībhavet

हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ! हरि को गुड़ मिला हुआ बेर का फल नहीं अर्पित करना चाहिए; अज्ञान से यदि अर्पित कर दे, तो वह नारकी बनता है।

श्लोक 13 (padma.7.12.13)

फाल्गुने मासि यो दद्याद्धरये दाडिमीफलम् । सुपक्वं तत्फलं विप्र वदतो मे निशामय

phālgune māsi yo dadyāddharaye dāḍimīphalam supakvaṁ tatphalaṁ vipra vadato me niśāmaya

फाल्गुन मास में जो हरि को सुपक्व अनार का फल अर्पित करता है, उसका फल, हे विप्र, मुझसे सुनो।

श्लोक 14 (padma.7.12.14)

तत्र यावंति बीजानि तिष्ठंति दाडिमीफले । तावन्मन्वंतरं विष्णोर्गृहे तिष्ठति भाग्यवान्

tatra yāvaṁti bījāni tiṣṭhaṁti dāḍimīphale tāvanmanvaṁtaraṁ viṣṇorgṛhe tiṣṭhati bhāgyavān

उस अनार के फल में जितने बीज होते हैं, उतने ही मन्वन्तरों तक वह भाग्यशाली व्यक्ति विष्णु के घर में रहता है।

श्लोक 15 (padma.7.12.15)

फाल्गुने मासि यो दद्याद्धरये गुडपिष्टकम् । स विज्ञेयो द्विजश्रेष्ठ वाजिमेधसहस्रकृत्

phālgune māsi yo dadyāddharaye guḍapiṣṭakam sa vijñeyo dvijaśreṣṭha vājimedhasahasrakṛt

फाल्गुन मास में जो हरि को गुड़ से बने पिष्टक (मिठाई) अर्पित करता है, हे द्विजश्रेष्ठ, उसे हजार अश्वमेध यज्ञों का कर्ता जानना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.7.12.16)

चैत्रे मासि द्विजश्रेष्ठ मधुना मधुसूदनम् । स्नापयेल्लभते मर्त्यस्तद्विष्णोः परमं पदम्

caitre māsi dvijaśreṣṭha madhunā madhusūdanam snāpayellabhate martyastadviṣṇoḥ paramaṁ padam

हे द्विजश्रेष्ठ! चैत्र मास में जो शहद से मधुसूदन को स्नान कराता है, वह मरणशील मनुष्य विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (padma.7.12.17)

मधुना स्नापयेद्यस्तु नारायणमनामयम् । न चर्चा क्रियते तस्य कदाचिद्रविसूनुना

madhunā snāpayedyastu nārāyaṇamanāmayam na carcā kriyate tasya kadācidravisūnunā

जो शहद से अनामय नारायण को स्नान कराता है, उसकी गणना कभी भी सूर्य-पुत्र (यमराज) द्वारा नहीं की जाती।

श्लोक 18 (padma.7.12.18)

चैत्रे किंशुकपुष्पेण योऽर्चयेत्कमलापतिम् । तन्नाम चित्रगुप्तेन पंजिकायां न लिख्यते

caitre kiṁśukapuṣpeṇa yo'rcayetkamalāpatim tannāma citraguptena paṁjikāyāṁ na likhyate

चैत्र में जो पलाश के फूल से कमला-कान्त की पूजा करता है, उसका नाम चित्रगुप्त द्वारा अपनी बही में कभी नहीं लिखा जाता।

श्लोक 19 (padma.7.12.19)

चैत्रके जगतामीशं कृष्णं तिलकपुष्पकैः । पूजतो नास्ति वै जन्म पुनरस्मिन्महीतले

caitrake jagatāmīśaṁ kṛṣṇaṁ tilakapuṣpakaiḥ pūjato nāsti vai janma punarasminmahītale

चैत्र में जगदीश्वर कृष्ण को तिलक के फूलों से जो पूजता है, उसका इस भू-मण्डल पर फिर जन्म नहीं होता।

श्लोक 20 (padma.7.12.20)

कृष्णवंजुलपुष्पेण सर्वदेवशिरोमणिम् । पूजयन्मनुजो विप्र लभते नापदं क्वचित्

kṛṣṇavaṁjulapuṣpeṇa sarvadevaśiromaṇim pūjayanmanujo vipra labhate nāpadaṁ kvacit

हे विप्र! समस्त देवताओं में शिरोमणि उस भगवान् को जो मनुष्य काले वंजुल के फूलों से पूजता है, उसे कभी कोई विपत्ति नहीं मिलती।

श्लोक 21 (padma.7.12.21)

वासंतीभिः सुगंधीभिर्वसंते यस्तु पूजयेत् । भगवंतं प्रसन्नात्मा स देवैरपि पूज्यते

vāsaṁtībhiḥ sugaṁdhībhirvasaṁte yastu pūjayet bhagavaṁtaṁ prasannātmā sa devairapi pūjyate

जो वसन्त ऋतु में सुगन्धित वासन्ती-पुष्पों से प्रसन्नात्मा भगवान् की पूजा करता है, वह देवताओं द्वारा भी पूज्य होता है।

श्लोक 22 (padma.7.12.22)

तथा किसलयैर्दिव्यैरखण्डैर्योऽर्चयेद्धरिम् । तं वंदते समुत्थाय स्वयं पीठासनोपि च

tathā kisalayairdivyairakhaṇḍairyo'rcayeddharim taṁ vaṁdate samutthāya svayaṁ pīṭhāsanopi ca

इसी प्रकार जो अखण्ड, दिव्य कोमल पत्तों से हरि की पूजा करता है, उसे स्वयं पीठ पर बैठे हरि भी उठकर वन्दन करते हैं।

श्लोक 23 (padma.7.12.23)

धात्रीपत्रैर्नवैर्यस्तु कोमलैर्हरिमर्चयेत् । अचिरेणैव लभते सकलं वांछितं जनः

dhātrīpatrairnavairyastu komalairharimarcayet acireṇaiva labhate sakalaṁ vāṁchitaṁ janaḥ

जो आँवले के नये, कोमल पत्तों से हरि की पूजा करता है, वह मनुष्य शीघ्र ही अपनी समस्त अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 24 (padma.7.12.24)

शांडिल्या खंडपत्रैश्च धत्तूरैश्चार्कपुष्पकैः । योऽर्चयेद्विष्णुमीशं च स संसाराब्धिपारगः

śāṁḍilyā khaṁḍapatraiśca dhattūraiścārkapuṣpakaiḥ yo'rcayedviṣṇumīśaṁ ca sa saṁsārābdhipāragaḥ

शाण्डिल्या के खण्ड-पत्रों से, धतूरे और आक के फूलों से जो प्रभु विष्णु की पूजा करता है, वह संसार-सागर को पार कर जाता है।

श्लोक 25 (padma.7.12.25)

यो दद्याद्विष्णवे विप्र कदलीफलमुत्तमम् । शक्राद्यास्त्रिदशाः सर्वे वंदंते तमहर्निशम्

yo dadyādviṣṇave vipra kadalīphalamuttamam śakrādyāstridaśāḥ sarve vaṁdaṁte tamaharniśam

हे विप्र! जो विष्णु को उत्तम केले का फल अर्पित करता है, इन्द्र आदि समस्त देवगण उसे दिन-रात वन्दन करते हैं।

श्लोक 26 (padma.7.12.26)

यो दद्याच्चैत्रके मासि भक्त्या गोपालरूपिणे । गोधूमपिष्टकं विप्र सर्वपापैः प्रमुच्यते

yo dadyāccaitrake māsi bhaktyā gopālarūpiṇe godhūmapiṣṭakaṁ vipra sarvapāpaiḥ pramucyate

हे विप्र! जो चैत्र मास में गोप-रूपधारी को भक्तिपूर्वक गेहूँ के पिष्टक अर्पित करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 27 (padma.7.12.27)

आयाते माधवे मासि पवित्रे माधव प्रिये । आमिषं मैथुनं तैलं विष्णुभक्तः परित्यजेत्

āyāte mādhave māsi pavitre mādhava priye āmiṣaṁ maithunaṁ tailaṁ viṣṇubhaktaḥ parityajet

माधव-प्रिय, पवित्र वैशाख मास के आने पर, विष्णु-भक्त को मांस, मैथुन और तेल — इन सबका त्याग करना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.7.12.28)

प्राप्तः समाचरेत्स्नानं माधवे मासि वैष्णवः । परित्यजेत्परान्नं च न कुर्याच्च द्विभोजनम्

prāptaḥ samācaretsnānaṁ mādhave māsi vaiṣṇavaḥ parityajetparānnaṁ ca na kuryācca dvibhojanam

वैष्णव को वैशाख मास प्राप्त होने पर स्नान का आचरण करना चाहिए, दूसरों का दिया अन्न त्यागना चाहिए, और दो बार भोजन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 29 (padma.7.12.29)

प्रभाते पूजयेद्विष्णुंपू र्वोक्तविधिना द्विज । वैशाखे स्नापयेद्विष्णुं पुष्पवासितवारिणा

prabhāte pūjayedviṣṇuṁpū rvoktavidhinā dvija vaiśākhe snāpayedviṣṇuṁ puṣpavāsitavāriṇā

हे द्विज! प्रभात में पूर्वोक्त विधि से विष्णु की पूजा करनी चाहिए। वैशाख में फूलों से सुवासित जल से विष्णु को स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 30 (padma.7.12.30)

स्नापयेच्छीततोयेषु संध्यापर्यंतमच्युतम् । त्रिसंध्यं पूजयेद्भक्त्या नैवेद्यैर्विविधैः प्रभुम्

snāpayecchītatoyeṣu saṁdhyāparyaṁtamacyutam trisaṁdhyaṁ pūjayedbhaktyā naivedyairvividhaiḥ prabhum

शीतल जल से अच्युत को सन्ध्या तक स्नान कराना चाहिए; तीनों सन्ध्याओं में भक्तिपूर्वक नाना नैवेद्यों से प्रभु की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 31 (padma.7.12.31)

वैशाखे दमनस्रग्भिर्लक्ष्मीपतिरलंकृतः । न किं ददाति विप्रर्षे प्रसन्नः परमेश्वरः

vaiśākhe damanasragbhirlakṣmīpatiralaṁkṛtaḥ na kiṁ dadāti viprarṣe prasannaḥ parameśvaraḥ

वैशाख में दमन (दौने) की माला से अलंकृत लक्ष्मीपति, हे विप्रर्षे, प्रसन्न होकर क्या नहीं देते?

श्लोक 32 (padma.7.12.32)

वैशाखे मासि यो दद्याद्यवान्नं चक्रपाणये । तस्य पुण्यानि संख्यातुं कः समर्थोऽस्ति पंडितः

vaiśākhe māsi yo dadyādyavānnaṁ cakrapāṇaye tasya puṇyāni saṁkhyātuṁ kaḥ samartho'sti paṁḍitaḥ

वैशाख मास में जो जौ का अन्न चक्रधारी को अर्पित करता है, उसके पुण्यों की गिनती करने में कौन-सा पण्डित समर्थ है?

श्लोक 33 (padma.7.12.33)

यत्किंचिन्माधवे मासि माधवप्रीतिहेतवे । दीयते माधवायैव तत्सर्वमक्षयं भवेत्

yatkiṁcinmādhave māsi mādhavaprītihetave dīyate mādhavāyaiva tatsarvamakṣayaṁ bhavet

माधव मास में माधव की प्रसन्नता के लिए जो कुछ भी अर्पित किया जाता है, वह सब माधव को अर्पित होकर अक्षय हो जाता है।

श्लोक 34 (padma.7.12.34)

यदन्यत्सुकृतं कर्म क्रियते मासि माधवे । माधवप्रीतये विप्र क्षयस्तस्य न विद्यते

yadanyatsukṛtaṁ karma kriyate māsi mādhave mādhavaprītaye vipra kṣayastasya na vidyate

माधव मास में माधव की प्रसन्नता के लिए जो अन्य भी पुण्यकर्म किया जाता है, हे विप्र, उसका कभी क्षय नहीं होता।

श्लोक 35 (padma.7.12.35)

वैशाखे मासि यः कुर्यात्प्रपां माधवतुष्टये । दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलमाप्नोति मानवः

vaiśākhe māsi yaḥ kuryātprapāṁ mādhavatuṣṭaye dinedine'śvamedhasya phalamāpnoti mānavaḥ

वैशाख मास में जो माधव की तुष्टि के लिए प्याऊ लगाता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 36 (padma.7.12.36)

वैशाखो दुर्ल्लभो मासः सर्वकर्मफलप्रदः । पूजितव्यो हरिस्तत्र हित्वा कर्मशतान्यपि

vaiśākho durllabho māsaḥ sarvakarmaphalapradaḥ pūjitavyo haristatra hitvā karmaśatānyapi

वैशाख अत्यन्त दुर्लभ मास है, समस्त कर्मों का फल देने वाला; उसमें सैकड़ों अन्य कर्मों को भी छोड़कर हरि की ही पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 37 (padma.7.12.37)

एकाहमपि यः पूजां वैशाखे कुरुते हरेः । षड्वर्षं हरिं पूजित्वा यत्फलं लभते स तत्

ekāhamapi yaḥ pūjāṁ vaiśākhe kurute hareḥ ṣaḍvarṣaṁ hariṁ pūjitvā yatphalaṁ labhate sa tat

जो एक दिन भी वैशाख में हरि की पूजा करता है, छह वर्षों तक हरि की पूजा करने से जो फल मिलता है, वही फल उसे मिलता है।

श्लोक 38 (padma.7.12.38)

वैशाखे मासि यो नित्यं विष्णुमश्वत्थरूपिणम् । चतुर्वर्गफलप्राप्तिहेतवे वैष्णवो जनः

vaiśākhe māsi yo nityaṁ viṣṇumaśvattharūpiṇam caturvargaphalaprāptihetave vaiṣṇavo janaḥ

वैशाख मास में जो वैष्णव जन नित्य विष्णु को अश्वत्थ (पीपल)-रूप में मानकर, चतुर्वर्ग-फल की प्राप्ति के लिए,

श्लोक 39 (padma.7.12.39)

गण्डूषमात्रतो येन कुर्याद्योऽश्वत्थसेवनम् । सोऽपि याति परं स्थानं विमुक्तः कोटिपातकैः

gaṇḍūṣamātrato yena kuryādyo'śvatthasevanam so'pi yāti paraṁ sthānaṁ vimuktaḥ koṭipātakaiḥ

एक कुल्ला जल से भी अश्वत्थ की सेवा करता है, वह भी करोड़ों पापों से मुक्त होकर परम स्थान को जाता है।

श्लोक 40 (padma.7.12.40)

अश्वत्थमूलं विप्रर्षे यो बध्नाति शिलादिभिः । अश्वत्थरूपी भगवान्किं किं तस्मै न यच्छति

aśvatthamūlaṁ viprarṣe yo badhnāti śilādibhiḥ aśvattharūpī bhagavānkiṁ kiṁ tasmai na yacchati

हे विप्रर्षे! जो अश्वत्थ की जड़ को पत्थर आदि से बाँधता है, अश्वत्थ-रूपधारी भगवान् उसे क्या-क्या नहीं देते?

श्लोक 41 (padma.7.12.41)

अश्वत्थद्रुममालोक्य प्रणामं कुरुते यदि । सोऽपि याति परं स्थानमायुर्वृद्धिर्न संशयः

aśvatthadrumamālokya praṇāmaṁ kurute yadi so'pi yāti paraṁ sthānamāyurvṛddhirna saṁśayaḥ

यदि कोई अश्वत्थ-वृक्ष को देखकर प्रणाम करे, तो वह भी परम स्थान को जाता है, और उसकी आयु बढ़ती है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 42 (padma.7.12.42)

यदश्वत्थतले विप्र धर्मकर्म करोति यः । न्यूनातिरिक्तता न स्यात्तस्मिन्कर्मणि जैमिने

yadaśvatthatale vipra dharmakarma karoti yaḥ nyūnātiriktatā na syāttasminkarmaṇi jaimine

हे विप्र! अश्वत्थ के नीचे जो कोई धर्म-कर्म करता है, हे जैमिनि, उस कर्म में न कमी होती है, न अधिकता।

श्लोक 43 (padma.7.12.43)

तत्र तीर्थानि सर्वाणि त्रिस्त्रोतादीनि जैमिने । यत्राश्वत्थतरुस्तिष्ठेदेकोपि शाखिनां वरः

tatra tīrthāni sarvāṇi tristrotādīni jaimine yatrāśvatthatarustiṣṭhedekopi śākhināṁ varaḥ

हे जैमिनि! तीन-स्रोतों से युक्त गंगा आदि जितने भी तीर्थ हैं, वे सब उसी वृक्षों में श्रेष्ठ, एकमात्र अश्वत्थ-वृक्ष जहाँ खड़ा हो, वहाँ स्थित रहते हैं।

श्लोक 44 (padma.7.12.44)

अश्वत्थं पूजयेद्यस्तु स एव विष्णुपूजकः । अश्वत्थमूर्तिर्भगवान्स्वयमेव यतो द्विज

aśvatthaṁ pūjayedyastu sa eva viṣṇupūjakaḥ aśvatthamūrtirbhagavānsvayameva yato dvija

जो अश्वत्थ की पूजा करता है, वही वास्तव में विष्णु-पूजक है, क्योंकि, हे द्विज, भगवान् स्वयं ही अश्वत्थ-रूप हैं।

श्लोक 45 (padma.7.12.45)

अवज्ञानाद्द्विजश्रेष्ठ योऽश्वत्थं हंति मूढधीः । संसारे नास्ति तत्कर्म यत्कृत्वा स च शुद्ध्यति

avajñānāddvijaśreṣṭha yo'śvatthaṁ haṁti mūḍhadhīḥ saṁsāre nāsti tatkarma yatkṛtvā sa ca śuddhyati

हे द्विजश्रेष्ठ! जो मूर्ख-बुद्धि व्यक्ति अवज्ञा से अश्वत्थ को नष्ट करता है, इस संसार में कोई ऐसा कर्म नहीं है जिसे करके वह शुद्ध हो सके।

श्लोक 46 (padma.7.12.46)

अश्वत्थो वृक्षराजोऽयं हरिमूर्तिः प्रकीर्तितः । तस्मादश्वत्थहंतॄणां त्राता कोऽपि न विद्यते

aśvattho vṛkṣarājo'yaṁ harimūrtiḥ prakīrtitaḥ tasmādaśvatthahaṁtṝṇāṁ trātā ko'pi na vidyate

यह अश्वत्थ वृक्षों का राजा है, हरि की ही मूर्ति कहा गया है; इसलिए अश्वत्थ को नष्ट करने वालों का कोई भी रक्षक नहीं है।

श्लोक 47 (padma.7.12.47)

अश्वत्थं पश्यतो विप्र स्पृशतः परतस्तथा । देहस्थं पातकं सर्वं हरेत्प्रणमतो हरिः

aśvatthaṁ paśyato vipra spṛśataḥ paratastathā dehasthaṁ pātakaṁ sarvaṁ haretpraṇamato hariḥ

हे विप्र! अश्वत्थ को देखने वाले का, उसे स्पर्श करने वाले का, तथा उसे प्रणाम करने वाले का, हरि उसके शरीर में स्थित सम्पूर्ण पाप हर लेते हैं।

श्लोक 48 (padma.7.12.48)

विलोक्याश्वत्थहंतारं यः शक्तो न निवारयेत्। तन्नेत्रयुग्मं बडिशैर्यमेनोत्पाट्यते स्वयम्

vilokyāśvatthahaṁtāraṁ yaḥ śakto na nivārayet tannetrayugmaṁ baḍiśairyamenotpāṭyate svayam

अश्वत्थ को नष्ट करने वाले को देखकर भी जो, समर्थ होते हुए, उसे नहीं रोकता, यमराज स्वयं ही उसकी दोनों आँखों को बंसी से उखाड़ देते हैं।

श्लोक 49 (padma.7.12.49)

अश्वत्थच्छेदनं मूढो मा कुर्विति वदेन्न यः । तस्य जिह्वां छुरिकया स्वयं कृंतति प्रेतराट्

aśvatthacchedanaṁ mūḍho mā kurviti vadenna yaḥ tasya jihvāṁ churikayā svayaṁ kṛṁtati pretarāṭ

जो व्यक्ति मूर्ख को "अश्वत्थ मत काटो" नहीं कहता, उसकी जिह्वा को यमराज स्वयं छुरी से काट डालते हैं।

श्लोक 50 (padma.7.12.50)

अश्वत्थशाखामेकां यः स्वल्पामपि निहंति वै । स कोटिब्रह्महत्यानां फलमाप्नोति मानवः

aśvatthaśākhāmekāṁ yaḥ svalpāmapi nihaṁti vai sa koṭibrahmahatyānāṁ phalamāpnoti mānavaḥ

जो एक छोटी-सी भी अश्वत्थ की शाखा को नष्ट करता है, वह मनुष्य करोड़ों ब्रह्महत्याओं का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 51 (padma.7.12.51)

यत्पापं ब्रह्महत्यायां गुरुस्त्रीगमनेन च । सुरापाने तथास्तेये न्यासापहरणेऽपि च

yatpāpaṁ brahmahatyāyāṁ gurustrīgamanena ca surāpāne tathāsteye nyāsāpaharaṇe'pi ca

ब्रह्महत्या में, गुरु-पत्नी-गमन में, मद्यपान में, चोरी में, धरोहर के अपहरण में जो पाप है,

श्लोक 52 (padma.7.12.52)

यत्पापं भ्रूणहत्यायां गोहत्यायां द्विजोत्तम । स्त्रीहत्यायां च यत्पापं परस्त्रीगमने तथा

yatpāpaṁ bhrūṇahatyāyāṁ gohatyāyāṁ dvijottama strīhatyāyāṁ ca yatpāpaṁ parastrīgamane tathā

गर्भ-हत्या में, गो-हत्या में, हे द्विजोत्तम, स्त्री-हत्या में और पर-स्त्री-गमन में जो पाप है,

श्लोक 53 (padma.7.12.53)

शरणागत हत्यायां हत्यायां सुहृदस्तथा । विश्वासवाक्याकथने पतिहिंसाविधौ च यत्

śaraṇāgata hatyāyāṁ hatyāyāṁ suhṛdastathā viśvāsavākyākathane patihiṁsāvidhau ca yat

शरणागत की हत्या में, मित्र की हत्या में, विश्वास के वचन को तोड़ने में, और पति की हिंसा में जो पाप है,

श्लोक 54 (padma.7.12.54)

यत्पापं परनिंदायां हरिवासरभोजने । अश्वत्थच्छेदनाद्धोरं तत्पापं प्राप्यते जनैः

yatpāpaṁ paraniṁdāyāṁ harivāsarabhojane aśvatthacchedanāddhoraṁ tatpāpaṁ prāpyate janaiḥ

दूसरों की निन्दा में, हरि के दिन (एकादशी) को भोजन करने में जो पाप है — अश्वत्थ को काटने से मनुष्यों को उससे भी भयंकर पाप प्राप्त होता है।

श्लोक 55 (padma.7.12.55)

विष्णुमूर्त्तेर्जनो मोहादश्वत्थस्य निहंति यः । तत्तुल्यः पातकी कोऽपि न श्रुतः क्षितिमंडले

viṣṇumūrtterjano mohādaśvatthasya nihaṁti yaḥ tattulyaḥ pātakī ko'pi na śrutaḥ kṣitimaṁḍale

जो व्यक्ति मोहवश विष्णु की मूर्ति ऐसे अश्वत्थ को नष्ट करता है, इस भू-मण्डल में उसके तुल्य कोई भी पापी नहीं सुना गया।

श्लोक 56 (padma.7.12.56)

वदाम्यश्वत्थमाहात्म्यं सर्वपापविनाशनम् । सेतिहासं द्विजश्रेष्ठ शृणु वत्स समाहितः

vadāmyaśvatthamāhātmyaṁ sarvapāpavināśanam setihāsaṁ dvijaśreṣṭha śṛṇu vatsa samāhitaḥ

मैं समस्त पापों का नाश करने वाली अश्वत्थ की महिमा एक इतिहास सहित कहता हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ! हे वत्स! ध्यान से सुनो।

श्लोक 57 (padma.7.12.57)

पूर्वं धनंजयो नाम ब्राह्मणो हरिभक्तिकृत् । आसीत्त्रेतायुगे विप्र सर्वप्राणिहिते रतः

pūrvaṁ dhanaṁjayo nāma brāhmaṇo haribhaktikṛt āsīttretāyuge vipra sarvaprāṇihite rataḥ

पूर्वकाल में त्रेतायुग में धनंजय नाम का एक ब्राह्मण था, हरि-भक्ति करने वाला, हे विप्र, समस्त प्राणियों के हित में लीन।

श्लोक 58 (padma.7.12.58)

ज्ञातिपूजारतो नित्यं दीपदाने रतः सदा । सत्यवादी जितक्रोधो हिंसादंभविवर्जितः

jñātipūjārato nityaṁ dīpadāne rataḥ sadā satyavādī jitakrodho hiṁsādaṁbhavivarjitaḥ

वह सदा अपने बन्धुओं के पालन में लीन रहता था, सदा दीप-दान में तत्पर, सत्यवादी, क्रोध-विजयी, हिंसा और दम्भ से रहित।

श्लोक 59 (padma.7.12.59)

मुमुक्षुः स द्विजश्रेष्ठ सर्वदा परमेश्वरम् । पूजयामास परया भक्त्या नारायणं प्रभुम्

mumukṣuḥ sa dvijaśreṣṭha sarvadā parameśvaram pūjayāmāsa parayā bhaktyā nārāyaṇaṁ prabhum

हे द्विजश्रेष्ठ! मोक्ष की इच्छा रखने वाला वह, सदा परमेश्वर प्रभु नारायण की परम भक्ति से पूजा करता था।

श्लोक 60 (padma.7.12.60)

तस्य भक्तिं ततो ज्ञात्वा महतीं सुदृढां प्रभुः । जहार सकलं वित्तं हेतुमात्रेण केनचित्

tasya bhaktiṁ tato jñātvā mahatīṁ sudṛḍhāṁ prabhuḥ jahāra sakalaṁ vittaṁ hetumātreṇa kenacit

उसकी उस बड़ी और अत्यन्त दृढ़ भक्ति को जानकर, प्रभु ने किसी न किसी बहाने से उसका सारा धन हर लिया।

श्लोक 61 (padma.7.12.61)

तथापि स द्विजश्रेष्ठः केशवस्य महात्मनः । पूजामनुदिने चक्रे भक्त्या परमया सुधीः

tathāpi sa dvijaśreṣṭhaḥ keśavasya mahātmanaḥ pūjāmanudine cakre bhaktyā paramayā sudhīḥ

फिर भी वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, महात्मा केशव की, परम भक्तिपूर्वक, प्रतिदिन पूजा करता रहा, बुद्धिमान् होकर।

श्लोक 62 (padma.7.12.62)

दुःखेनोपार्जितं वित्तं विनष्टं सकलं द्विज । दृष्ट्वापि तेन विप्रेण दुःखेनाचिंत्यचेतसा

duḥkhenopārjitaṁ vittaṁ vinaṣṭaṁ sakalaṁ dvija dṛṣṭvāpi tena vipreṇa duḥkhenāciṁtyacetasā

हे द्विज! दुःख से अर्जित सम्पूर्ण धन को नष्ट होते देखकर भी, उस ब्राह्मण ने, दुःख से अचिन्त्य हृदय होकर,

श्लोक 63 (padma.7.12.63)

भक्षणे वर्जनं चक्रे स विप्रः परमार्थवित् । महाविष्णुसपर्यायां दृढं बद्ध्वा मनो निजम्

bhakṣaṇe varjanaṁ cakre sa vipraḥ paramārthavit mahāviṣṇusaparyāyāṁ dṛḍhaṁ baddhvā mano nijam

भोजन में संयम बरता, वह परमार्थ जानने वाला ब्राह्मण, अपने मन को महाविष्णु की पूजा में दृढ़तापूर्वक बाँधकर।

श्लोक 64 (padma.7.12.64)

भूयोऽपि तस्य विप्रस्य भक्तिं ज्ञात्वा जनार्दनः । चकार बंधुविच्छेदं सुदृढः शमदस्ततः

bhūyo'pi tasya viprasya bhaktiṁ jñātvā janārdanaḥ cakāra baṁdhuvicchedaṁ sudṛḍhaḥ śamadastataḥ

फिर भी, उस ब्राह्मण की भक्ति को जानकर, जनार्दन ने, सम्यक् नियन्ता होकर, उसके बन्धु-वियोग को भी करा दिया।

श्लोक 65 (padma.7.12.65)

बांधवास्तस्य विप्रस्य विष्णुमायाविमोहिताः । हिंसामारेभिरे कर्तुं सर्वदैव द्विजोत्तम

bāṁdhavāstasya viprasya viṣṇumāyāvimohitāḥ hiṁsāmārebhire kartuṁ sarvadaiva dvijottama

हे द्विजोत्तम! उस ब्राह्मण के बन्धु, विष्णु की माया से मोहित होकर, सदा उससे हिंसा करने का प्रयत्न करने लगे।

श्लोक 66 (padma.7.12.66)

ततो विप्रो हि निर्वृत्तो निर्बंधैः पुरुषोत्तमम् । पूजयामास सततं प्रीतः प्रचुरभक्तितः

tato vipro hi nirvṛtto nirbaṁdhaiḥ puruṣottamam pūjayāmāsa satataṁ prītaḥ pracurabhaktitaḥ

तब वह ब्राह्मण, उनके बन्धनों से मुक्त होकर, प्रेमपूर्वक और प्रचुर भक्ति से, सतत पुरुषोत्तम की पूजा करता रहा।

श्लोक 67 (padma.7.12.67)

परिकल्प्य च भूदेवो धनं केशवपूजने । माधवं च जगन्नाथं सबंधुशुचमत्यजत्

parikalpya ca bhūdevo dhanaṁ keśavapūjane mādhavaṁ ca jagannāthaṁ sabaṁdhuśucamatyajat

उस ब्राह्मण-देव ने केशव-पूजा के लिए ही अपने धन का उपयोग किया, और माधव जगन्नाथ के लिए, अपने बन्धुओं के शोक को भी त्याग दिया।

श्लोक 68 (padma.7.12.68)

भूय एव महाविष्णुः कौतुकी तस्य जैमिने । जहार सानुकंपोऽपि पुत्रानपि दिने दिने

bhūya eva mahāviṣṇuḥ kautukī tasya jaimine jahāra sānukaṁpo'pi putrānapi dine dine

हे जैमिनि! फिर से, वह कौतुकी महाविष्णु, दया-भाव रखते हुए भी, प्रतिदिन उसके पुत्रों को भी हर लेने लगे।

श्लोक 69 (padma.7.12.69)

तथापि स द्विजश्रेष्ठः केशवं क्लेशनाशनम् । पूर्वद्विगुणया भक्त्या नित्यं विष्णुमपूजयत्

tathāpi sa dvijaśreṣṭhaḥ keśavaṁ kleśanāśanam pūrvadviguṇayā bhaktyā nityaṁ viṣṇumapūjayat

फिर भी वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्लेश का नाश करने वाले केशव की, पूर्व से दुगुनी भक्ति से, नित्य विष्णु की पूजा करता रहा।

श्लोक 70 (padma.7.12.70)

तस्य पत्नी ततो विप्र दुःखशोकातिदुःखिता । पितृगेहं गता विष्णोर्मायया परिमोहिता

tasya patnī tato vipra duḥkhaśokātiduḥkhitā pitṛgehaṁ gatā viṣṇormāyayā parimohitā

उसकी पत्नी भी, हे विप्र, दुःख और शोक से अत्यन्त पीड़ित होकर, विष्णु की माया से मोहित होकर, अपने मायके चली गई।

श्लोक 71 (padma.7.12.71)

अथैकाकी स भूदेवो विष्णुभक्तिपरायणः । विपदं चिंतयामास न कदापि सुचेतसा

athaikākī sa bhūdevo viṣṇubhaktiparāyaṇaḥ vipadaṁ ciṁtayāmāsa na kadāpi sucetasā

फिर वह ब्राह्मण अकेला, विष्णु-भक्ति में परायण, अपनी विपत्ति के बारे में कभी दुःखी मन से नहीं सोचता था।

श्लोक 72 (padma.7.12.72)

एकदा स द्विजश्रेष्ठ विष्णुभक्तिमतां वरः । स्कंधे परशुमादाय काष्ठार्थं विपिने ययौ

ekadā sa dvijaśreṣṭha viṣṇubhaktimatāṁ varaḥ skaṁdhe paraśumādāya kāṣṭhārthaṁ vipine yayau

एक बार, हे द्विजश्रेष्ठ! वह विष्णु-भक्तों में श्रेष्ठ, कन्धे पर कुल्हाड़ी लेकर, लकड़ी के लिए वन को गया।

श्लोक 73 (padma.7.12.73)

वनात्काष्ठं समादाय नित्यमेव च स द्विजः । हिमागमे वस्त्रहीनः कुरुते शीतवारणम्

vanātkāṣṭhaṁ samādāya nityameva ca sa dvijaḥ himāgame vastrahīnaḥ kurute śītavāraṇam

वन से लकड़ी लाकर, वह ब्राह्मण, हिम-ऋतु में वस्त्र-रहित होते हुए भी, उससे प्रतिदिन शीत का निवारण करता था।

श्लोक 74 (padma.7.12.74)

कदाचिद्विपिनं गंतुं नाशक्नोद्द्विजसत्तमः । जघान प्रांगणस्थस्य शाखामश्वत्थशाखिनः

kadācidvipinaṁ gaṁtuṁ nāśaknoddvijasattamaḥ jaghāna prāṁgaṇasthasya śākhāmaśvatthaśākhinaḥ

एक बार वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वन को नहीं जा सका; उसने अपने आँगन में स्थित अश्वत्थ-वृक्ष की एक शाखा काट ली।

श्लोक 75 (padma.7.12.75)

अत्रांतरे महाविष्णुस्तस्मादश्वत्थ पादपात् । निश्चक्राम सुरश्रेष्ठो व्यथाव्यथितमानसः

atrāṁtare mahāviṣṇustasmādaśvattha pādapāt niścakrāma suraśreṣṭho vyathāvyathitamānasaḥ

इसी बीच, उस अश्वत्थ-वृक्ष से, महाविष्णु स्वयं, वेदना से पीड़ित मन के साथ, बाहर निकल आये।

श्लोक 76 (padma.7.12.76)

ददर्श विष्णुं पुरतः स विप्रश्चतुर्भुजं पद्मदलायताक्षम् । पीतांबरं कुडलिनं सुकेशं दधानमब्जादि निजायुधानि

dadarśa viṣṇuṁ purataḥ sa vipraścaturbhujaṁ padmadalāyatākṣam pītāṁbaraṁ kuḍalinaṁ sukeśaṁ dadhānamabjādi nijāyudhāni

उस ब्राह्मण ने अपने सामने विष्णु को देखा, चतुर्भुज, कमल-दल के समान विशाल नेत्रों वाले, पीत-वस्त्रधारी, कुण्डलधारी, सुन्दर केशों वाले, कमल आदि अपने आयुधों को धारण किये हुए।

श्लोक 77 (padma.7.12.77)

परिस्रवद्विस्तररक्तधारा संध्यासु शोणीकृतनव्यमेघम् । विभावसुं चैव सुखं परेशं संदृश्यते देवगणैरदृश्यम् । हर्षाश्रुधारा रुचिराक्षियुग्मस्तुष्टाव विप्रो मृदुलैर्वचोभिः

parisravadvistararaktadhārā saṁdhyāsu śoṇīkṛtanavyamegham vibhāvasuṁ caiva sukhaṁ pareśaṁ saṁdṛśyate devagaṇairadṛśyam harṣāśrudhārā rucirākṣiyugmastuṣṭāva vipro mṛdulairvacobhiḥ

उस पर एक विस्तृत रक्त-धारा बहती हुई, संध्याओं में लाल हुए नये मेघ के समान, प्रकाशमान, सुखी परमेश्वर को — जो देवगणों के लिए भी अदृश्य हैं — देखकर, हर्ष के आँसुओं की धारा से सुन्दर दोनों आँखों वाला वह ब्राह्मण, कोमल वचनों से उनकी स्तुति करने लगा।

श्लोक 78 (padma.7.12.78)

ब्राह्मण उवाच- हरे मुरारे जगदेकनाथ गोविंद दामोदर माधवेति । लक्ष्मीपते केशवकेशिशत्रो नारायणानंत विभो प्रसीद

brāhmaṇa uvāca- hare murāre jagadekanātha goviṁda dāmodara mādhaveti lakṣmīpate keśavakeśiśatro nārāyaṇānaṁta vibho prasīda

ब्राह्मण ने कहा — हे हरि! हे मुरारि! हे जगत् के एकमात्र नाथ! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! हे लक्ष्मीपति! हे केशव! हे केशी के शत्रु! हे नारायण! हे अनन्त! हे विभो! प्रसन्न होइए।

श्लोक 79 (padma.7.12.79)

तवावतारं किमहं ब्रवीमि त्वया विना नास्ति भुवीह कोऽपि । किं वा गुणव्याप्तसमस्तलोकं किं वा दयां मित्रपरैकतुल्याम्

tavāvatāraṁ kimahaṁ bravīmi tvayā vinā nāsti bhuvīha ko'pi kiṁ vā guṇavyāptasamastalokaṁ kiṁ vā dayāṁ mitraparaikatulyām

आपके अवतार का मैं क्या वर्णन करूँ? आपके बिना इस पृथ्वी पर कोई भी नहीं है। मैं क्या कहूँ — सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त करने वाले आपके गुणों को, अथवा मित्र के समान आपकी उस अतुल्य दया को?

श्लोक 80 (padma.7.12.80)

दत्वा स्वीयां कस्यचिदीश विष्णो भक्तिं हरस्य च्युतदेहसंस्थाम् । श्रियं समादाय मुदं प्रदास्ये भक्तिः प्रदत्तामहतः सुधन्या

datvā svīyāṁ kasyacidīśa viṣṇo bhaktiṁ harasya cyutadehasaṁsthām śriyaṁ samādāya mudaṁ pradāsye bhaktiḥ pradattāmahataḥ sudhanyā

हे विष्णु! अपनी भक्ति किसी को दी, और शिव को अपने ही शरीर में स्थान दिया — हे ईश! समृद्धि पाकर आनन्द दूँगा, जिसे भक्ति दी गई, वह अत्यन्त धन्य है।

श्लोक 81 (padma.7.12.81)

मन्ये महात्मानमनंतमूर्त्ते पापात्मनां श्रेष्ठमिवानिशं यत् । तदर्थमेवांघ्रियुगं त्वदीयं न पातकी पश्यति दैवचिंत्यम्

manye mahātmānamanaṁtamūrtte pāpātmanāṁ śreṣṭhamivāniśaṁ yat tadarthamevāṁghriyugaṁ tvadīyaṁ na pātakī paśyati daivaciṁtyam

हे अनन्त-रूपधारी महात्मा! मैं मानता हूँ कि आप पापियों में श्रेष्ठ को सदा भी अपना ही समझते हैं; इसीलिए तो पापी आपके दैव-चिन्त्य चरण-युगल को कभी नहीं देख पाता।

श्लोक 82 (padma.7.12.82)

यद्यप्यहं दुःखवतां वरिष्ठो मन्ये तथापीन्द्रमिवाद्य विष्णो । आत्मानमात्मा जगतां भवंतं साक्षात्समीक्षेयत ईक्षणाभ्याम्

yadyapyahaṁ duḥkhavatāṁ variṣṭho manye tathāpīndramivādya viṣṇo ātmānamātmā jagatāṁ bhavaṁtaṁ sākṣātsamīkṣeyata īkṣaṇābhyām

यद्यपि मैं दुःखियों में सबसे बढ़कर मानता हूँ अपने आपको, फिर भी, हे विष्णु! आज इन्द्र के समान, मैं अपनी ही आँखों से जगत् की आत्मा साक्षात् आपको देख रहा हूँ।

श्लोक 83 (padma.7.12.83)

पूजां तवाल्पामपि वेद्मि नाहं द्रव्यं कदापि न ददामि तुभ्यम् । तथापि चाग्रे मम मूर्तिमांस्त्वं दृष्टोसि मे केशव एक पूज्यः

pūjāṁ tavālpāmapi vedmi nāhaṁ dravyaṁ kadāpi na dadāmi tubhyam tathāpi cāgre mama mūrtimāṁstvaṁ dṛṣṭosi me keśava eka pūjyaḥ

मैं आपकी थोड़ी-सी भी पूजा नहीं जानता, कभी भी आपको कोई वस्तु अर्पित नहीं करता — फिर भी, हे केशव, आप स्वयं मेरे सामने मूर्तिमान् प्रकट हुए, मेरे एकमात्र पूज्य।

श्लोक 84 (padma.7.12.84)

दत्तस्त्वयायं ममभक्ति वृक्षो धमार्थकामत्रय एव सोऽयम् । त्वद्दर्शनांभो मयवृष्टिसिक्तः प्रभोऽद्यकैवल्यफलं दधार

dattastvayāyaṁ mamabhakti vṛkṣo dhamārthakāmatraya eva so'yam tvaddarśanāṁbho mayavṛṣṭisiktaḥ prabho'dyakaivalyaphalaṁ dadhāra

आपने मुझे यह भक्ति-वृक्ष दिया है, जो धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों को देने वाला है; आज, हे प्रभो, आपके दर्शन-रूपी जल की वर्षा से सिंचित होकर, इसने कैवल्य (मोक्ष) का फल धारण कर लिया है।

श्लोक 85 (padma.7.12.85)

मूर्धा मदीयोऽखिललोकमूर्ध्नां श्रेष्ठो भवेत्केशवविश्वमूर्तेः । त्वत्पादपाथोजयुगेमनो मे संयाति वै संप्रतिदेवदेव

mūrdhā madīyo'khilalokamūrdhnāṁ śreṣṭho bhavetkeśavaviśvamūrteḥ tvatpādapāthojayugemano me saṁyāti vai saṁpratidevadeva

मेरा सिर, समस्त लोकों के सिरों में श्रेष्ठ हो जाए, हे केशव, हे विश्व-मूर्ति! क्योंकि, हे देवाधिदेव, अभी मेरा मन आपके चरण-कमल-युगल की ओर ही जा रहा है।

श्लोक 86 (padma.7.12.86)

व्यासउवाच- इत्थं स्तुत्वा जगन्नाथं नारायणमनामयम् । कृतांजलिपुनःप्राह भक्त्या तमिति स द्विजः

vyāsauvāca- itthaṁ stutvā jagannāthaṁ nārāyaṇamanāmayam kṛtāṁjalipunaḥprāha bhaktyā tamiti sa dvijaḥ

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार अनामय जगन्नाथ नारायण की स्तुति करके, वह ब्राह्मण, हाथ जोड़कर, फिर भक्तिपूर्वक यह कहने लगा।

श्लोक 87 (padma.7.12.87)

ब्राह्मण उवाच- देवदेव जगन्नाथ लोकानुग्रहकारक । कशाप्रहरणैरेतद्गात्रं ते रुधिरोक्षितम्

brāhmaṇa uvāca- devadeva jagannātha lokānugrahakāraka kaśāpraharaṇairetadgātraṁ te rudhirokṣitam

ब्राह्मण ने कहा — हे देवाधिदेव! हे जगन्नाथ! हे समस्त लोकों पर अनुग्रह करने वाले! कोड़ों के प्रहार से मानो, आपका यह शरीर रक्त से सना हुआ क्यों है?

श्लोक 88 (padma.7.12.88)

सर्वेषामेव दैत्यानां युधि वंशास्त्वया हताः । त्वां हंतुं कः क्षमः पृथ्व्यां प्रभोऽद्भुतमिदं महत्

sarveṣāmeva daityānāṁ yudhi vaṁśāstvayā hatāḥ tvāṁ haṁtuṁ kaḥ kṣamaḥ pṛthvyāṁ prabho'dbhutamidaṁ mahat

समस्त दैत्यों के वंश आपने युद्ध में मार डाले हैं; इस पृथ्वी पर आपको मारने में कौन समर्थ है, हे प्रभु? यह अत्यन्त अद्भुत और महान् है।

श्लोक 89 (padma.7.12.89)

भगवानुवाच- वत्स सत्यमिदं प्रोक्तं त्वया नास्त्यत्र संशयः । दानवो राक्षसो वापि मां हंतुं कोऽपि न क्षमः

bhagavānuvāca- vatsa satyamidaṁ proktaṁ tvayā nāstyatra saṁśayaḥ dānavo rākṣaso vāpi māṁ haṁtuṁ ko'pi na kṣamaḥ

भगवान् ने कहा — हे वत्स! जो तुमने कहा है, वह सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं; दानव अथवा राक्षस, कोई भी मुझे मारने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 90 (padma.7.12.90)

अश्वत्थमूतिरेवाहं कुठारेण हतस्त्वया । अतोऽजनि शरीरे मे रक्तपातोऽधुना द्विज

aśvatthamūtirevāhaṁ kuṭhāreṇa hatastvayā ato'jani śarīre me raktapāto'dhunā dvija

मैं स्वयं ही अश्वत्थ-रूप हूँ, जिसे तुमने कुल्हाड़ी से काट दिया है; इसीलिए, हे द्विज, अभी मेरे शरीर में रक्त-पात हुआ है।

श्लोक 91 (padma.7.12.91)

व्यास उवाच- तस्यवाक्यमिदं श्रुत्वा स विप्रो भयविह्वलः । निनिंद स्वयमात्मानमात्मना बहुधा द्विजः

vyāsa uvāca- tasyavākyamidaṁ śrutvā sa vipro bhayavihvalaḥ niniṁda svayamātmānamātmanā bahudhā dvijaḥ

व्यास जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर, भय से व्याकुल हुआ वह ब्राह्मण, अपने आप को स्वयं ही बारम्बार धिक्कारने लगा।

श्लोक 92 (padma.7.12.92)

धिगस्तु तत्वतो भाग्यं सर्वपातकिनां वरम् । त्रैलोक्याधिपतेर्दाता हृदये महतीं व्यथाम्

dhigastu tatvato bhāgyaṁ sarvapātakināṁ varam trailokyādhipaterdātā hṛdaye mahatīṁ vyathām

धिक्कार है सचमुच मेरे भाग्य को, जो पापियों में सबसे बढ़कर है! त्रिलोकाधिपति के दाता को, अपने ही हृदय में महान् व्यथा हुई है,

श्लोक 93 (padma.7.12.93)

सर्वपापहरो विष्णुः समया व्याधितः कृतः । एतत्पापं मया पारं कर्तुं नैकेन शक्यते

sarvapāpaharo viṣṇuḥ samayā vyādhitaḥ kṛtaḥ etatpāpaṁ mayā pāraṁ kartuṁ naikena śakyate

समस्त पापों को हरने वाले विष्णु को मैंने रोगी बना दिया है; इस पाप को दूर करने में मैं अकेला समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 94 (padma.7.12.94)

यस्मिंस्तुष्टे पापिनोऽपि भवंति सुरवंदिताः । मद्दत्तया स व्यथया व्यथितो हा हतोऽस्म्यहम्

yasmiṁstuṣṭe pāpino'pi bhavaṁti suravaṁditāḥ maddattayā sa vyathayā vyathito hā hato'smyaham

जिसके प्रसन्न होने पर पापी भी देवताओं द्वारा वन्दित हो जाते हैं, मेरे द्वारा दी गई पीड़ा से उन्हें पीड़ित करके, हाय, मैं नष्ट हो गया हूँ।

श्लोक 95 (padma.7.12.95)

प्रसादयंति यं देवा ब्रह्माद्या अतिभक्तितः । अहो मया पापवता तस्य दत्ता हृदि व्यथा

prasādayaṁti yaṁ devā brahmādyā atibhaktitaḥ aho mayā pāpavatā tasya dattā hṛdi vyathā

जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता भी अत्यन्त भक्ति से प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं, ओह! उन्हीं को, पापी होकर, मैंने अपने ही हृदय की पीड़ा दे दी है।

श्लोक 96 (padma.7.12.96)

किं तपोभिर्जपैः किं वा किं गृहैर्जीवनैश्च मे । धर्मार्थकाममोक्षाणां दातैकोऽयं व्यथातुरः

kiṁ tapobhirjapaiḥ kiṁ vā kiṁ gṛhairjīvanaiśca me dharmārthakāmamokṣāṇāṁ dātaiko'yaṁ vyathāturaḥ

मुझे तपों से क्या, जप से क्या, घर और जीवन से क्या, यदि मैंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के एकमात्र दाता को ही व्यथित कर दिया?

श्लोक 97 (padma.7.12.97)

इत्युक्त्वा स द्विजश्रेष्ठ तमेव परशुं निजे । दातुं कंठे मनश्चक्रे विष्णुप्रीणनहेतवे

ityuktvā sa dvijaśreṣṭha tameva paraśuṁ nije dātuṁ kaṁṭhe manaścakre viṣṇuprīṇanahetave

हे द्विजश्रेष्ठ! यह कहकर, वह ब्राह्मण, विष्णु की प्रसन्नता के लिए, उसी कुल्हाड़ी को अपने ही गले में मारने का मन बना बैठा।

श्लोक 98 (padma.7.12.98)

तस्यभक्तिं दृढां ज्ञात्वा दयालुः कमलापतिः । तद्धस्तात्तत्परं निन्ये जवेन भक्तवत्सलः

tasyabhaktiṁ dṛḍhāṁ jñātvā dayāluḥ kamalāpatiḥ taddhastāttatparaṁ ninye javena bhaktavatsalaḥ

उसकी दृढ़ भक्ति को जानकर, भक्त-वत्सल, दयालु कमला-कान्त ने, तत्काल उसके हाथ से वह कुल्हाड़ी छीन ली।

श्लोक 99 (padma.7.12.99)

श्रीभगवानुवाच- कथं त्वमेव कुरुषे वत्स कर्मातिदारुणम् । आत्महत्याकृतां पुंसां तुष्टोस्मि न कदाप्यहम्

śrībhagavānuvāca- kathaṁ tvameva kuruṣe vatsa karmātidāruṇam ātmahatyākṛtāṁ puṁsāṁ tuṣṭosmi na kadāpyaham

श्रीभगवान् ने कहा — हे वत्स! तुम यह अत्यन्त भयंकर कर्म क्यों करते हो? आत्महत्या करने वाले मनुष्यों से मैं कभी प्रसन्न नहीं होता।

श्लोक 100 (padma.7.12.100)

तव भक्त्यातितुष्टोऽस्मि भीतिं मा कुरुसत्तम । वरं वरय विप्रेन्द्र यत्ते मनसि वर्तते

tava bhaktyātituṣṭo'smi bhītiṁ mā kurusattama varaṁ varaya viprendra yatte manasi vartate

मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, भय मत करो, हे सत्तम! हे विप्रेन्द्र! जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो।

श्लोक 101 (padma.7.12.101)

ब्राह्मण उवाच- मया व्यथाप्रदत्तेयं महती परमेश्वर । मा तिष्ठतु शरीरे ते याचे वरमिमं प्रभो

brāhmaṇa uvāca- mayā vyathāpradatteyaṁ mahatī parameśvara mā tiṣṭhatu śarīre te yāce varamimaṁ prabho

ब्राह्मण ने कहा — हे परमेश्वर! मेरे द्वारा दी गई यह महान् पीड़ा आपके शरीर में न रहे — यही वर मैं माँगता हूँ, हे प्रभु।

श्लोक 102 (padma.7.12.102)

श्रीभगवानुवाच- अज्ञानाद्भवता वत्स कर्मेदं विहितं द्विज । अतोऽपराधो नेतव्यो महानपि न ते यथा

śrībhagavānuvāca- ajñānādbhavatā vatsa karmedaṁ vihitaṁ dvija ato'parādho netavyo mahānapi na te yathā

श्रीभगवान् ने कहा — हे वत्स! तुमने यह कर्म अज्ञान से किया है, हे द्विज; इसलिए यह अपराध, चाहे बड़ा भी हो, तुम पर नहीं ठहरता।

श्लोक 103 (padma.7.12.103)

नित्यं तवानुपाल्योऽस्मि भक्तश्रेष्ठो यतो भवान् । भवदीयानहं मन्ये दोषान्वत्स दिनेदिने

nityaṁ tavānupālyo'smi bhaktaśreṣṭho yato bhavān bhavadīyānahaṁ manye doṣānvatsa dinedine

मैं तुम्हारा सदा पालक हूँ, क्योंकि तुम भक्तों में श्रेष्ठ हो; तुम्हारे दोषों को, हे वत्स, मैं प्रतिदिन अपने ही समझता हूँ,

श्लोक 104 (padma.7.12.104)

तथापि ममभक्तिस्ते ववृधे महती सदा । तस्माद्वत्स तवानृण्यं गंतुमिच्छामि संप्रति

tathāpi mamabhaktiste vavṛdhe mahatī sadā tasmādvatsa tavānṛṇyaṁ gaṁtumicchāmi saṁprati

फिर भी तुम्हारे प्रति मेरी भक्ति सदा बढ़ती ही गई है। इसलिए, हे वत्स! मैं अभी तुम्हारे ऋण से मुक्त होना चाहता हूँ।

श्लोक 105 (padma.7.12.105)

विहाय सकलां भीतिं वंर वृणु ममाग्रतः । ब्राह्मण उवाच- त्वयि सर्वसुरश्रेष्ठ मम जन्मनिजन्मनि

vihāya sakalāṁ bhītiṁ vaṁra vṛṇu mamāgrataḥ brāhmaṇa uvāca- tvayi sarvasuraśreṣṭha mama janmanijanmani

समस्त भय त्यागकर, मेरे सामने वर माँगो। ब्राह्मण ने कहा — हे देवताओं में श्रेष्ठ! जन्म-जन्मान्तर में मेरी,

श्लोक 106 (padma.7.12.106)

तिष्ठतां सुदृढा भक्तिर्हरे किमपरैर्वरैः । व्यास उवाच- श्रुत्वा वाक्यमिदं तस्य केशवप्रणयोदितम्

tiṣṭhatāṁ sudṛḍhā bhaktirhare kimaparairvaraiḥ vyāsa uvāca- śrutvā vākyamidaṁ tasya keśavapraṇayoditam

आपके प्रति दृढ़ भक्ति ही स्थिर रहे, हे हरि! अन्य वरों से क्या प्रयोजन? व्यास जी ने कहा — केशव के प्रति उसके इस प्रेम-भरे वचन को सुनकर,

श्लोक 107 (padma.7.12.107)

निजकण्ठस्थितां मालां प्रीतस्तस्मै ददौ ततः । समालिङ्ग्य ततो विप्रं पिता पुत्रमिव प्रभुः

nijakaṇṭhasthitāṁ mālāṁ prītastasmai dadau tataḥ samāliṅgya tato vipraṁ pitā putramiva prabhuḥ

अपने ही गले में पड़ी माला को, प्रसन्न होकर, उन्होंने उसे दे दिया। फिर उस ब्राह्मण को, पिता पुत्र की भाँति,

श्लोक 108 (padma.7.12.108)

चतुर्भिर्बाहुभिर्दीर्घैरुवाच मृदुलं वचः । श्रीभगवानुवाच- मद्भक्तोऽसि यदा विप्र तथा ते मत्प्रसादतः

caturbhirbāhubhirdīrghairuvāca mṛdulaṁ vacaḥ śrībhagavānuvāca- madbhakto'si yadā vipra tathā te matprasādataḥ

अपनी चार दीर्घ भुजाओं से आलिंगन करके, यह कोमल वचन कहा। श्रीभगवान् ने कहा — हे विप्र! जब तुम मेरे भक्त हो, तो मेरी कृपा से,

श्लोक 109 (padma.7.12.109)

अचिरेणैव सकलं भद्रं विप्र भविष्यति । अश्वत्थरूपं मां नित्यं क्रियायोगेन सत्तम

acireṇaiva sakalaṁ bhadraṁ vipra bhaviṣyati aśvattharūpaṁ māṁ nityaṁ kriyāyogena sattama

शीघ्र ही तुम्हारा सब कुछ शुभ होगा, हे विप्र! मुझे अश्वत्थ-रूप में नित्य क्रियायोग से,

श्लोक 110 (padma.7.12.110)

समाराधय सर्वं ते साधयिष्यामि वांछितम् । इत्युक्त्वा तं द्विजश्रेष्ठं भूयोऽप्यालिङ्ग्य केशवः

samārādhaya sarvaṁ te sādhayiṣyāmi vāṁchitam ityuktvā taṁ dvijaśreṣṭhaṁ bhūyo'pyāliṅgya keśavaḥ

पूजा करो, हे सत्तम, तुम्हारा समस्त मनोरथ मैं सिद्ध करूँगा — यह कहकर, उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को फिर से आलिंगन करके, केशव,

श्लोक 111 (padma.7.12.111)

अभवत्सहसादृश्यस्तत्रैव करुणालयः । विष्णोः कंठस्रजं प्राप्य स विप्रो वैष्णवोत्तमः

abhavatsahasādṛśyastatraiva karuṇālayaḥ viṣṇoḥ kaṁṭhasrajaṁ prāpya sa vipro vaiṣṇavottamaḥ

करुणा के धाम, तत्काल वहीं अदृश्य हो गये। विष्णु के गले की माला पाकर, वह ब्राह्मण, वैष्णवों में सर्वोत्तम,

श्लोक 112 (padma.7.12.112)

कृतकृत्यमिवात्मानं मत्वा तस्थौ निजेगृहे । ततः कुबेरो विप्रर्षे तस्य विप्रस्य सद्मनि

kṛtakṛtyamivātmānaṁ matvā tasthau nijegṛhe tataḥ kubero viprarṣe tasya viprasya sadmani

अपने आपको कृतकृत्य मानते हुए अपने घर में रहा। तब, हे विप्रर्षे! उस ब्राह्मण के घर में, केशव की आज्ञा से,

श्लोक 113 (padma.7.12.113)

स्वयं ववर्ष वित्तानि बहूनि केशवाज्ञया । प्रासादो रचितस्तस्य शिल्पिना विश्वकर्मणा

svayaṁ vavarṣa vittāni bahūni keśavājñayā prāsādo racitastasya śilpinā viśvakarmaṇā

स्वयं कुबेर ने बहुत सारा धन बरसाया। विश्वकर्मा नामक शिल्पी ने उसके लिए,

श्लोक 114 (padma.7.12.114)

नारायणाज्ञया तत्र वैजयंत इवोत्तमः । दासदासीसमायुक्तो नानावस्तुविभूषितः

nārāyaṇājñayā tatra vaijayaṁta ivottamaḥ dāsadāsīsamāyukto nānāvastuvibhūṣitaḥ

नारायण की आज्ञा से, वहाँ वैजयन्त के समान उत्तम भवन बनाया, दास-दासियों से युक्त, नाना वस्तुओं से भूषित।

श्लोक 115 (padma.7.12.115)

गजाश्वकोटिसंकीर्णं विबभौ तस्य मन्दिरम् । बभुवुः संगतास्तस्य नष्टा अपि च बांधवाः

gajāśvakoṭisaṁkīrṇaṁ vibabhau tasya mandiram babhuvuḥ saṁgatāstasya naṣṭā api ca bāṁdhavāḥ

हाथियों और घोड़ों की करोड़ों संख्या से भरा हुआ, उसका वह मन्दिर चमकने लगा। उसके नष्ट हो चुके बन्धु भी उससे फिर मिल गये।

श्लोक 116 (padma.7.12.116)

कृतावज्ञा च तत्पत्नी स्वयं तद्गृहमाययौ । मृतपुत्रापि तत्पत्नी केशवस्यानुकंपया

kṛtāvajñā ca tatpatnī svayaṁ tadgṛhamāyayau mṛtaputrāpi tatpatnī keśavasyānukaṁpayā

जिसने उसकी अवज्ञा की थी, वह उसकी पत्नी भी स्वयं ही उसके घर आ गई। उस ब्राह्मण की पत्नी, जिसके पुत्र मर चुके थे,

श्लोक 117 (padma.7.12.117)

स्थिरप्रजाभवद्विप्र स्वामिभक्तिपरायणा । चिरं भुक्त्वाखिलान्भोगान्पुत्रपौत्रसमन्वितः

sthiraprajābhavadvipra svāmibhaktiparāyaṇā ciraṁ bhuktvākhilānbhogānputrapautrasamanvitaḥ

केशव की कृपा से, हे विप्र, स्थिर सन्तान वाली हो गई, अपने स्वामी की भक्ति में परायण। दीर्घकाल तक समस्त भोगों को भोगकर, पुत्र-पौत्रों सहित,

श्लोक 118 (padma.7.12.118)

आयुषोंऽते ययौ मोक्षं सदारो विप्रसत्तमः । व्यास उवाच- साक्षादेव स्वयं विष्णुरश्वत्थो वृक्षसत्तमः

āyuṣoṁ'te yayau mokṣaṁ sadāro viprasattamaḥ vyāsa uvāca- sākṣādeva svayaṁ viṣṇuraśvattho vṛkṣasattamaḥ

आयु के अन्त में वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, अपनी पत्नी सहित, मोक्ष को प्राप्त हुआ। व्यास जी ने कहा — साक्षात् स्वयं विष्णु ही अश्वत्थ, वृक्षों में सर्वोत्तम, हैं।

श्लोक 119 (padma.7.12.119)

तद्भक्तिं कुर्वतां पुंसां विद्यते नाशुभं क्वचित् । अश्वत्थं सेवते यस्तु विष्णुं ध्यात्वा नरोत्तम

tadbhaktiṁ kurvatāṁ puṁsāṁ vidyate nāśubhaṁ kvacit aśvatthaṁ sevate yastu viṣṇuṁ dhyātvā narottama

उसकी भक्ति करने वाले पुरुषों को कहीं भी कोई अशुभ प्राप्त नहीं होता। हे नरोत्तम! जो मनुष्य अश्वत्थ की सेवा करता है, विष्णु का ध्यान करते हुए,

श्लोक 120 (padma.7.12.120)

तस्य प्रसन्नो भगवान्ददाति परमं पदम्

tasya prasanno bhagavāndadāti paramaṁ padam

उससे भगवान् प्रसन्न होकर उसे परम पद प्रदान करते हैं।

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