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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 13

कमल-माहात्म्य तथा दस्यु-पूर्वजन्म-कथा

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (padma.7.13.1)

व्यास उवाच- ज्येष्ठे मासि द्विजश्रेष्ठ भगवंतं जनार्दनम् । पूजयेद्भक्तिभावेन जलैः संस्नाप्य शीतलैः

vyāsa uvāca- jyeṣṭhe māsi dvijaśreṣṭha bhagavaṁtaṁ janārdanam pūjayedbhaktibhāvena jalaiḥ saṁsnāpya śītalaiḥ

व्यास जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! ज्येष्ठ मास में शीतल जल से स्नान कराकर, भगवान् जनार्दन की भक्तिभाव से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 2 (padma.7.13.2)

उद्वर्तनं च दातव्यं सुगन्ध्यामलकं तथा । तैलं सुंगंधं हरये ग्रीष्मकाले दिनेदिने

udvartanaṁ ca dātavyaṁ sugandhyāmalakaṁ tathā tailaṁ suṁgaṁdhaṁ haraye grīṣmakāle dinedine

उबटन भी अर्पित करना चाहिए, तथा सुगन्धित आँवला और सुगन्धित तेल — ग्रीष्म-काल में प्रतिदिन हरि को अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 3 (padma.7.13.3)

सुवासिते शीतले च मन्दिरेऽतिमनोरमे । प्रत्यहं कमलाकांतं स्थापयेज्जनमंडपे

suvāsite śītale ca mandire'timanorame pratyahaṁ kamalākāṁtaṁ sthāpayejjanamaṁḍape

सुवासित, शीतल और अत्यन्त मनोहर मन्दिर में, प्रतिदिन कमला-कान्त को उस लोग-मण्डप में स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 4 (padma.7.13.4)

न रौद्रदेशे विप्रेन्द्र सधूमे इंधनालये । न सूतिकागृहे चैव स्थापयेत्कमलापतिम्

na raudradeśe viprendra sadhūme iṁdhanālaye na sūtikāgṛhe caiva sthāpayetkamalāpatim

हे विप्रेन्द्र! धूप वाले स्थान में, धुँआ भरे स्थान में, ईंधन-गृह में, अथवा प्रसूति-गृह में, कमलापति को न रखा जाए।

श्लोक 5 (padma.7.13.5)

चामरैर्वीजितः श्वेतैः सुदीर्घैः कमलापतिम् । ज्येष्ठे मासि द्विजश्रेष्ठ सुप्रीतः किं न यच्छति

cāmarairvījitaḥ śvetaiḥ sudīrghaiḥ kamalāpatim jyeṣṭhe māsi dvijaśreṣṭha suprītaḥ kiṁ na yacchati

श्वेत, अत्यन्त लम्बे चँवरों से पंखा झलते हुए कमलापति को, हे द्विजश्रेष्ठ, ज्येष्ठ मास में प्रसन्न होकर वे क्या नहीं देते?

श्लोक 6 (padma.7.13.6)

मयूरपुच्छव्यजनैर्निदार्घैर्वीजितो हरिः । ददात्यभिमतं सर्वमचिरेणैव सत्तम

mayūrapucchavyajanairnidārghairvījito hariḥ dadātyabhimataṁ sarvamacireṇaiva sattama

मयूर-पंखों के लम्बे पंखों से पंखा झला गया हरि, हे सत्तम, अभिष्ट को शीघ्र ही देते हैं।

श्लोक 7 (padma.7.13.7)

तालवृंतकवातेन पवित्रांबरवायुना । यै ग्रीष्मे वीज्यते विष्णुस्ते सर्वे स्वर्गगामिनः

tālavṛṁtakavātena pavitrāṁbaravāyunā yai grīṣme vījyate viṣṇuste sarve svargagāminaḥ

ताड़-पंखे की हवा से, पवित्र वस्त्र की वायु से, जो लोग ग्रीष्म में विष्णु को पंखा झलते हैं, वे सब स्वर्ग-गामी होते हैं।

श्लोक 8 (padma.7.13.8)

यो गात्रलेपनं कुर्यात्सुगन्धीयैश्च कर्दमैः । ग्रीष्मे हरिं चंदनैश्च स विशेन्माधवीं तनुम्

yo gātralepanaṁ kuryātsugandhīyaiśca kardamaiḥ grīṣme hariṁ caṁdanaiśca sa viśenmādhavīṁ tanum

जो व्यक्ति ग्रीष्म में हरि के शरीर पर सुगन्धित कीचड़ और चन्दन का लेप करता है, वह लक्ष्मी के तुल्य शरीर में प्रवेश करता है।

श्लोक 9 (padma.7.13.9)

उष्मागमे द्विजश्रेष्ठ स मुक्तो नात्र संशयः । प्रफुल्लकुसुमोद्याने तुलसीकानने तथा

uṣmāgame dvijaśreṣṭha sa mukto nātra saṁśayaḥ praphullakusumodyāne tulasīkānane tathā

हे द्विजश्रेष्ठ! उष्ण-ऋतु में वह मुक्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। खिले हुए फूलों के बगीचे में, तुलसी-वन में भी,

श्लोक 10 (padma.7.13.10)

संध्यायां स्थापयेद्विष्णुं देशे धीरसमीरणे । स्रग्भिः पाटलपुष्पाणां येन विष्णुरलंकृतः

saṁdhyāyāṁ sthāpayedviṣṇuṁ deśe dhīrasamīraṇe sragbhiḥ pāṭalapuṣpāṇāṁ yena viṣṇuralaṁkṛtaḥ

सन्ध्या के समय, स्थिर पवन वाले स्थान में विष्णु को स्थापित करना चाहिए। पाटल-पुष्पों की मालाओं से जो विष्णु को अलंकृत करता है,

श्लोक 11 (padma.7.13.11)

ज्येष्ठे मासि स विज्ञेयो अश्वमेधसहस्रकृत् । यस्तु मुक्तावलिं दद्याद्ग्रीष्मे वै श्रीपतेर्जनः

jyeṣṭhe māsi sa vijñeyo aśvamedhasahasrakṛt yastu muktāvaliṁ dadyādgrīṣme vai śrīpaterjanaḥ

उसे ज्येष्ठ मास में हजार अश्वमेध यज्ञ करने वाला जानना चाहिए। जो व्यक्ति ग्रीष्म में श्रीपति को मोतियों की माला अर्पित करता है,

श्लोक 12 (padma.7.13.12)

भूपालत्वं हरिस्तस्मै यच्छेज्जन्मनि जन्मनि । यस्तु मण्डयति ग्रीष्मे श्रीकृष्णं मणिमालया

bhūpālatvaṁ haristasmai yacchejjanmani janmani yastu maṇḍayati grīṣme śrīkṛṣṇaṁ maṇimālayā

उसे हरि जन्म-जन्मान्तर में राजपद प्रदान करते हैं। जो ग्रीष्म में श्रीकृष्ण को मणि-माला से सजाता है,

श्लोक 13 (padma.7.13.13)

तस्य पुण्यफलं विप्र वदतो मे निशामय । यावद्ब्रह्मा सृजत्येतज्जैमिने सकलं जगत्

tasya puṇyaphalaṁ vipra vadato me niśāmaya yāvadbrahmā sṛjatyetajjaimine sakalaṁ jagat

उसके पुण्य का फल, हे विप्र, मुझसे सुनो, मैं कहता हूँ। हे जैमिनि! जब तक ब्रह्मा इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि करते हैं,

श्लोक 14 (padma.7.13.14)

तिष्ठेद्विष्णुपुरे तावन्मणिमालाविभूषितः । सुवर्णाभरणैर्यस्तु रजताभरणैस्तथा

tiṣṭhedviṣṇupure tāvanmaṇimālāvibhūṣitaḥ suvarṇābharaṇairyastu rajatābharaṇaistathā

तब तक वह, मणि-माला से भूषित, विष्णु के धाम में रहता है। जो स्वर्ण-आभूषणों और रजत-आभूषणों से भी,

श्लोक 15 (padma.7.13.15)

कृष्णं मंडयति ग्रीष्मे सोऽपि तत्फलमाप्नुयात् । विचित्रं यस्तु पर्यंकं सगंडूकं प्रयच्छति

kṛṣṇaṁ maṁḍayati grīṣme so'pi tatphalamāpnuyāt vicitraṁ yastu paryaṁkaṁ sagaṁḍūkaṁ prayacchati

ग्रीष्म में कृष्ण को सजाता है, वह भी वही फल प्राप्त करता है। जो सुन्दर, गद्दी और तकिये सहित पलंग,

श्लोक 16 (padma.7.13.16)

हरये देवदेवाय न स दुःखी कदाचन । ग्रीष्मकाले न देयानि गुरूणि वसनानि च

haraye devadevāya na sa duḥkhī kadācana grīṣmakāle na deyāni gurūṇi vasanāni ca

हरि, देवाधिदेव को अर्पित करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता। ग्रीष्म-काल में हरि को भारी वस्त्र नहीं देने चाहिए;

श्लोक 17 (padma.7.13.17)

हरये ब्राह्मणश्रेष्ठ देयं तन्वंशुंकं शुचि । यस्त्वच्युतफलैर्दिव्यैः सुगंधैः पूजयेद्धरिम्

haraye brāhmaṇaśreṣṭha deyaṁ tanvaṁśuṁkaṁ śuci yastvacyutaphalairdivyaiḥ sugaṁdhaiḥ pūjayeddharim

हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ! हरि को पतला, शुद्ध वस्त्र देना चाहिए। जो अच्युत को दिव्य, सुगन्धित फलों से पूजता है,

श्लोक 18 (padma.7.13.18)

अंते शक्रपुरं गत्वा सपिबेदमृतं मुदा । प्रियालानां फलैर्दिव्यैर्योऽर्चयेत्कमलापतिम्

aṁte śakrapuraṁ gatvā sapibedamṛtaṁ mudā priyālānāṁ phalairdivyairyo'rcayetkamalāpatim

वह अन्त में इन्द्र की नगरी को जाकर हर्षपूर्वक अमृत का पान करता है। जो प्रियाल के दिव्य फलों से कमलापति की पूजा करता है,

श्लोक 19 (padma.7.13.19)

सोऽपि तत्फलमाप्नोति किमन्यैर्बहुभाषितैः । निदाघे हरये यस्तु यवागूमतिशीतलाम्

so'pi tatphalamāpnoti kimanyairbahubhāṣitaiḥ nidāghe haraye yastu yavāgūmatiśītalām

वह भी वही फल प्राप्त करता है — इससे अधिक बहुत क्या कहें? गर्मी में जो वैष्णव जन हरि को अत्यन्त शीतल यवागू (मांड-भात)

श्लोक 20 (padma.7.13.20)

नानाव्यंजनसंयुक्तां श्रद्धया वैष्णवो जनः । आषाढे मासि विप्रेन्द्र देवदेवं जगद्गुरुम्

nānāvyaṁjanasaṁyuktāṁ śraddhayā vaiṣṇavo janaḥ āṣāḍhe māsi viprendra devadevaṁ jagadgurum

नाना व्यंजनों से युक्त, श्रद्धापूर्वक अर्पित करता है। हे विप्रेन्द्र! आषाढ़ मास में देवाधिदेव जगद्गुरु को,

श्लोक 21 (padma.7.13.21)

दधिभिः स्नापयित्वा च पूजयेद्भक्तितो बुधः । मातुः पयोधरपयः पुनस्तेन न पीयते

dadhibhiḥ snāpayitvā ca pūjayedbhaktito budhaḥ mātuḥ payodharapayaḥ punastena na pīyate

दही से स्नान कराकर, बुद्धिमान् व्यक्ति को भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिए; तब उसे माता के स्तन का दूध फिर कभी नहीं पीना पड़ता (अर्थात् पुनर्जन्म नहीं होता)।

श्लोक 22 (padma.7.13.22)

घनागमे घनश्यामं कदंबकुसुमैर्हरिम् । आराधयति विप्रर्षे पराङ्गतिमवाप्नुयात्

ghanāgame ghanaśyāmaṁ kadaṁbakusumairharim ārādhayati viprarṣe parāṅgatimavāpnuyāt

मेघों के आगमन पर, जो मेघ-श्याम हरि की कदम्ब-पुष्पों से आराधना करता है, हे विप्रर्षे, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (padma.7.13.23)

कदम्बपुष्पमालाभिर्मण्डपं ज्वलनोपमम् । यस्तस्य ब्राह्मणश्रेष्ठ वाजिमेधफलं भवेत्

kadambapuṣpamālābhirmaṇḍapaṁ jvalanopamam yastasya brāhmaṇaśreṣṭha vājimedhaphalaṁ bhavet

कदम्ब-पुष्पों की मालाओं से अग्नि के समान चमकते हुए मण्डप को जो सजाता है, हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 24 (padma.7.13.24)

सुगन्धैः केतकीपुष्पैः पूजितः कमलापतिः । सर्वदुःखं हरत्येव मानवानां द्विजोत्तम

sugandhaiḥ ketakīpuṣpaiḥ pūjitaḥ kamalāpatiḥ sarvaduḥkhaṁ haratyeva mānavānāṁ dvijottama

सुगन्धित केतकी-पुष्पों से पूजित कमलापति, हे द्विजोत्तम, मनुष्यों के समस्त दुःखों को अवश्य ही हर लेते हैं।

श्लोक 25 (padma.7.13.25)

पनसानां फलैर्दिव्यैः सुपक्वैर्घृतमिश्रितैः । पूजितो भगवान्विष्णुर्दद्यादैश्वर्यमुत्तमम्

panasānāṁ phalairdivyaiḥ supakvairghṛtamiśritaiḥ pūjito bhagavānviṣṇurdadyādaiśvaryamuttamam

पके, घी में मिश्रित, दिव्य कटहल के फलों से पूजित भगवान् विष्णु उत्तम ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

श्लोक 26 (padma.7.13.26)

आषाढे मासि दध्यन्नं हरये प्रतिवासरम् । श्रद्धया वैष्णवो दद्यान्मुक्तिमिच्छन्द्विजोत्तम

āṣāḍhe māsi dadhyannaṁ haraye prativāsaram śraddhayā vaiṣṇavo dadyānmuktimicchandvijottama

आषाढ़ मास में जो वैष्णव प्रतिदिन दधि-अन्न श्रद्धापूर्वक हरि को अर्पित करता है, हे द्विजोत्तम, वह मोक्ष चाहता है तो पाता है।

श्लोक 27 (padma.7.13.27)

कृष्णाय नवनीतं यो ददाति वैष्णवो जनः । विशुद्धः सकलैः पापैर्ब्रह्मलोकं स गच्छति

kṛṣṇāya navanītaṁ yo dadāti vaiṣṇavo janaḥ viśuddhaḥ sakalaiḥ pāpairbrahmalokaṁ sa gacchati

जो वैष्णव जन कृष्ण को मक्खन अर्पित करता है, वह समस्त पापों से शुद्ध होकर ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 28 (padma.7.13.28)

शेफालिकाप्रसूनैश्च यूथिकाकुसुमैस्तथा । योऽर्चयेत्परमात्मानं सगच्छेत्परमं पदम्

śephālikāprasūnaiśca yūthikākusumaistathā yo'rcayetparamātmānaṁ sagacchetparamaṁ padam

शेफालिका (हरसिंगार) के फूलों से और चमेली के फूलों से जो परमात्मा की पूजा करता है, वह परम पद को जाता है।

श्लोक 29 (padma.7.13.29)

प्रफुल्लमालतीपुष्पैः सुगन्धैर्योऽर्चयेद्धरिम् । तत्पुण्येनास्य तत्पुण्यं येन नो भविता द्विज

praphullamālatīpuṣpaiḥ sugandhairyo'rcayeddharim tatpuṇyenāsya tatpuṇyaṁ yena no bhavitā dvija

खिले हुए, सुगन्धित मालती-पुष्पों से जो हरि की पूजा करता है, हे द्विज, उसके पुण्य से बढ़कर पुण्य किसी का नहीं होगा।

श्लोक 30 (padma.7.13.30)

कंदपुष्पैश्च बकुलैर्जगद्बंधुं जनार्दनम् । अर्चयन्सकलं कामं प्राप्नोति भुवि मानवः

kaṁdapuṣpaiśca bakulairjagadbaṁdhuṁ janārdanam arcayansakalaṁ kāmaṁ prāpnoti bhuvi mānavaḥ

कन्द-पुष्पों और बकुल के फूलों से जगत्-बन्धु जनार्दन की पूजा करता हुआ मनुष्य इस पृथ्वी पर समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (padma.7.13.31)

महामहाप्रसूनैश्च तथा कुरुबकैर्हरिम् । प्रफुल्लैः पूजयेद्यस्तु तस्य तुष्टः सदा हरिः

mahāmahāprasūnaiśca tathā kurubakairharim praphullaiḥ pūjayedyastu tasya tuṣṭaḥ sadā hariḥ

बड़े-बड़े खिले हुए फूलों से और कुरुबक के फूलों से जो हरि की पूजा करता है, हरि सदा उससे सन्तुष्ट रहते हैं।

श्लोक 32 (padma.7.13.32)

सैरीयकैश्च यो विष्णुं प्रसूपुष्पैश्च योऽर्चयेत् । करवीरप्रसूनैश्च स याति हरिसन्निधिम्

sairīyakaiśca yo viṣṇuṁ prasūpuṣpaiśca yo'rcayet karavīraprasūnaiśca sa yāti harisannidhim

जो सैरेयक (कटसरैया) के फूलों से और प्रसू-पुष्पों से विष्णु की पूजा करता है, तथा कनेर के फूलों से भी, वह हरि के सान्निध्य को जाता है।

श्लोक 33 (padma.7.13.33)

श्रावणे चैव यो दद्याल्लाजान्घृतसमन्वितान् । हरये तस्य विप्रर्षे गृहे श्रीःस र्वतोमुखी

śrāvaṇe caiva yo dadyāllājānghṛtasamanvitān haraye tasya viprarṣe gṛhe śrīḥsa rvatomukhī

श्रावण में जो हरि को घृत-मिश्रित लावा (भुना अन्न) अर्पित करता है, हे विप्रर्षे, उसके घर में लक्ष्मी सर्वतोमुखी होकर वास करती हैं।

श्लोक 34 (padma.7.13.34)

भाद्रे मासि द्विजश्रेष्ठ नारायणमनामयम् । श्रद्धया पूजयेत्प्राज्ञश्चतुर्वर्गप्रदायकम्

bhādre māsi dvijaśreṣṭha nārāyaṇamanāmayam śraddhayā pūjayetprājñaścaturvargapradāyakam

हे द्विजश्रेष्ठ! भाद्रपद मास में बुद्धिमान् व्यक्ति को चतुर्वर्ग के दाता, अनामय नारायण की श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 35 (padma.7.13.35)

निर्मिते नूतनागारे सर्वोपद्रववर्जिते । स्थापयेत्पुण्डरीकाक्षं भगवंतं जनार्दनम्

nirmite nūtanāgāre sarvopadravavarjite sthāpayetpuṇḍarīkākṣaṁ bhagavaṁtaṁ janārdanam

नये, सम्पूर्ण उपद्रवों से रहित बने घर में पुण्डरीकाक्ष भगवान् जनार्दन को स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 36 (padma.7.13.36)

दंशैश्च मशकैश्चापि प्रकीर्णे मक्षिकादिभिः । हरिं पुरातनागारे स्थापयेन्न हि मानवः

daṁśaiśca maśakaiścāpi prakīrṇe makṣikādibhiḥ hariṁ purātanāgāre sthāpayenna hi mānavaḥ

डाँस, मच्छर और मक्खियों आदि से भरे हुए, पुराने घर में मनुष्य को हरि को नहीं रखना चाहिए।

श्लोक 37 (padma.7.13.37)

सकर्दमे पतद्द्वारे गलद्भित्तौ गृहे तथा । हरिं न स्थापयेत्प्राज्ञो वर्षासु परमेश्वरम्

sakardame pataddvāre galadbhittau gṛhe tathā hariṁ na sthāpayetprājño varṣāsu parameśvaram

कीचड़ भरे, जिसका द्वार गिर रहा हो, जिसकी दीवार टपक रही हो, ऐसे घर में बुद्धिमान् व्यक्ति को वर्षा-ऋतु में हरि को न रखना चाहिए।

श्लोक 38 (padma.7.13.38)

विष्ण्वाल्ये द्विजश्रेष्ठ प्रकुर्याद्यस्तु मानवः । चन्द्रातपं विचित्रं च चन्द्रलोकं स गच्छति

viṣṇvālye dvijaśreṣṭha prakuryādyastu mānavaḥ candrātapaṁ vicitraṁ ca candralokaṁ sa gacchati

हे द्विजश्रेष्ठ! विष्णु के मन्दिर में जो मनुष्य विचित्र चन्द्रमा के समान छत्र (चन्दोवा) लगवाता है, वह चन्द्रलोक को जाता है।

श्लोक 39 (padma.7.13.39)

रात्रौ नानाविधैर्धूपैर्मन्दिरे जगतीपतेः । दंशाश्च मशकाश्चैव पूजाकाले निवारयेत्

rātrau nānāvidhairdhūpairmandire jagatīpateḥ daṁśāśca maśakāścaiva pūjākāle nivārayet

रात्रि में, जगत्पति के मन्दिर में, नाना प्रकार के धूप से, पूजा के समय डाँस और मच्छरों का निवारण करना चाहिए।

श्लोक 40 (padma.7.13.40)

मंसारिकाभिः प्रावृत्य मंचशायिनमच्युतम् । प्रावृषि स्थापयेद्विष्णुं निशायां दिव्यमंदिरे

maṁsārikābhiḥ prāvṛtya maṁcaśāyinamacyutam prāvṛṣi sthāpayedviṣṇuṁ niśāyāṁ divyamaṁdire

मशहरी से ढककर, पलंग पर शयन करते हुए अच्युत को, वर्षा-ऋतु में, रात्रि में, दिव्य मन्दिर में स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 41 (padma.7.13.41)

कह्लारपत्रैर्देवेशं सुगंधैर्नूतनैस्तथा । मुमुक्षुः पूजयेन्मर्त्यो भाद्रे मासि दिनेदिने

kahlārapatrairdeveśaṁ sugaṁdhairnūtanaistathā mumukṣuḥ pūjayenmartyo bhādre māsi dinedine

देवाधिदेव को कह्लार (लाल कमल) के पत्तों से, सुगन्धित नये पत्तों से, भाद्रपद मास में मोक्ष चाहने वाले मनुष्य को प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 42 (padma.7.13.42)

न भाद्रे केतकीपुष्पैः पूजितव्यो जनार्दनः । यतो भाद्रपदेमासि केतकी स्यात्सुरा समा

na bhādre ketakīpuṣpaiḥ pūjitavyo janārdanaḥ yato bhādrapademāsi ketakī syātsurā samā

भाद्रपद में केतकी के फूलों से जनार्दन की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि भाद्रपद मास में केतकी शराब के समान (अशुद्ध) मानी जाती है।

श्लोक 43 (padma.7.13.43)

पक्वैस्तालफलैर्दिव्यैर्योऽर्चयेद्यदुनंदनम् । गर्भवासमहादुःखं स भूयो लभते न च

pakvaistālaphalairdivyairyo'rcayedyadunaṁdanam garbhavāsamahāduḥkhaṁ sa bhūyo labhate na ca

पके, दिव्य ताड़ के फलों से जो यदुनन्दन की पूजा करता है, उसे गर्भवास का महान् दुःख फिर कभी नहीं भोगना पड़ता।

श्लोक 44 (padma.7.13.44)

संयुक्तं घृतदुग्धाभ्यां पक्वतालं मुरारये । यो दद्याच्छ्रद्धया मर्त्यः स गच्छेन्मन्दिरं हरेः

saṁyuktaṁ ghṛtadugdhābhyāṁ pakvatālaṁ murāraye yo dadyācchraddhayā martyaḥ sa gacchenmandiraṁ hareḥ

घी और दूध सहित पके ताड़-फल को जो मरणशील व्यक्ति श्रद्धापूर्वक मुरारि को अर्पित करता है, वह हरि के मन्दिर को जाता है।

श्लोक 45 (padma.7.13.45)

भाद्रे मासि द्विजश्रेष्ठ हरये तालपिष्टकम् । सघृतं वैष्णवो दद्यात्केवलप्राप्तिहेतवे

bhādre māsi dvijaśreṣṭha haraye tālapiṣṭakam saghṛtaṁ vaiṣṇavo dadyātkevalaprāptihetave

हे द्विजश्रेष्ठ! भाद्रपद मास में वैष्णव को हरि के लिए घी-सहित ताड़ के पिष्टक (मिठाई) अर्पित करने चाहिए, केवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति के लिए।

श्लोक 46 (padma.7.13.46)

मासि भाद्रपदे विप्र न कुर्याच्छाकभक्षणम् । न रात्रौ भोजनं कुर्यान्मुमुक्षुर्वैष्णवो जनः

māsi bhādrapade vipra na kuryācchākabhakṣaṇam na rātrau bhojanaṁ kuryānmumukṣurvaiṣṇavo janaḥ

हे विप्र! भाद्रपद मास में साग-भाजी का सेवन नहीं करना चाहिए; मोक्ष चाहने वाले वैष्णव जन को रात्रि में भोजन भी नहीं करना चाहिए।

श्लोक 47 (padma.7.13.47)

आश्विने मासि विप्रेन्द्र केशवं क्लेशनाशनम् । यत्तोयं दीयते विप्र पूर्वाह्णे हरये जनैः

āśvine māsi viprendra keśavaṁ kleśanāśanam yattoyaṁ dīyate vipra pūrvāhṇe haraye janaiḥ

हे विप्रेन्द्र! आश्विन मास में क्लेश का नाश करने वाले केशव को — हे विप्र, जो जल पूर्वाह्ण में लोगों द्वारा हरि को अर्पित किया जाता है,

श्लोक 48 (padma.7.13.48)

पीयूषमिव तत्तोयं गृह्णाति कमलापतिः । मध्याह्ने दीयते यच्च तत्तोयं चक्रपाणये

pīyūṣamiva tattoyaṁ gṛhṇāti kamalāpatiḥ madhyāhne dīyate yacca tattoyaṁ cakrapāṇaye

उस जल को कमलापति अमृत के समान ग्रहण करते हैं। जो जल मध्याह्न में चक्रधारी को दिया जाता है,

श्लोक 49 (padma.7.13.49)

तत्तोयमिव वेत्तव्यं तद्गृह्णाति द्विजोत्तम । अपराह्णे च यत्तोयं गोविन्दाय प्रदीयते

tattoyamiva vettavyaṁ tadgṛhṇāti dvijottama aparāhṇe ca yattoyaṁ govindāya pradīyate

हे द्विजोत्तम! उस जल को वैसा ही (साधारण) जल समझना चाहिए, वह उसे ग्रहण तो करते हैं। अपराह्न में जो जल गोविन्द को अर्पित किया जाता है,

श्लोक 50 (padma.7.13.50)

तत्तोयं रक्ततुल्यं स्यान्न गृह्णाति ततो हरिः । अतएव द्विजश्रेष्ठ पूर्वाह्णे हरिमर्चयेत्

tattoyaṁ raktatulyaṁ syānna gṛhṇāti tato hariḥ ataeva dvijaśreṣṭha pūrvāhṇe harimarcayet

वह जल रक्त के समान होता है, इसलिए हरि उसे ग्रहण नहीं करते। इसीलिए, हे द्विजश्रेष्ठ, पूर्वाह्ण में ही हरि की पूजा करनी चाहिए;

श्लोक 51 (padma.7.13.51)

समस्तं लभते कामं केशवस्यानुकंपया । एकवस्त्रेण विप्रेन्द्र न कुर्यात्पूजनं हरेः

samastaṁ labhate kāmaṁ keśavasyānukaṁpayā ekavastreṇa viprendra na kuryātpūjanaṁ hareḥ

इससे केशव की कृपा से समस्त कामनाएँ प्राप्त होती हैं। हे विप्रेन्द्र! एक ही वस्त्र पहनकर हरि की पूजा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 52 (padma.7.13.52)

कुर्याद्वापि तथा पूजां न गृह्णाति च केशवः । अधौतेन च वस्त्रेण यः पूजां कुरुते हरेः

kuryādvāpi tathā pūjāṁ na gṛhṇāti ca keśavaḥ adhautena ca vastreṇa yaḥ pūjāṁ kurute hareḥ

यदि इस प्रकार पूजा भी की जाए, तो केशव उसे ग्रहण नहीं करते। जो अधोवस्त्र (बिना धोया वस्त्र) पहनकर हरि की पूजा करता है,

श्लोक 53 (padma.7.13.53)

विफला सा च पूजा स्यान्न च विष्णुः प्रसीदति । यैस्त्वबद्धशिखैः पूजा क्रियते चक्रिणो जनैः

viphalā sā ca pūjā syānna ca viṣṇuḥ prasīdati yaistvabaddhaśikhaiḥ pūjā kriyate cakriṇo janaiḥ

उसकी वह पूजा निष्फल हो जाती है, और विष्णु प्रसन्न नहीं होते। जो लोग चक्रधारी की पूजा बिना शिखा बाँधे करते हैं,

श्लोक 54 (padma.7.13.54)

पूजाफलं नाप्नुवंति बलिग्राह्या च सा भवेत् । असंस्कृतगृहे पूजा क्रियते जगतीपतेः

pūjāphalaṁ nāpnuvaṁti baligrāhyā ca sā bhavet asaṁskṛtagṛhe pūjā kriyate jagatīpateḥ

वे पूजा का फल नहीं पाते, और वह पूजा बलि (राक्षसों) को ही मिलती है। असंस्कृत (शुद्ध न किये गये) घर में जो जगत्पति की पूजा की जाती है,

श्लोक 55 (padma.7.13.55)

सा पूजा ब्राह्मणश्रेष्ठ बलिग्राह्या भवेत्खलु । स्नानं देवार्चनं चैव दानं च पितृपूजनम्

sā pūjā brāhmaṇaśreṣṭha baligrāhyā bhavetkhalu snānaṁ devārcanaṁ caiva dānaṁ ca pitṛpūjanam

हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ! वह पूजा भी बलि को ही मिलती है। स्नान, देव-अर्चन, दान और पितृ-पूजन —

श्लोक 56 (padma.7.13.56)

तिलकेन विना विप्र कुरुते न विचक्षणः । तिलकान्यगृहीत्वा यत्पुण्यकर्म विधीयते

tilakena vinā vipra kurute na vicakṣaṇaḥ tilakānyagṛhītvā yatpuṇyakarma vidhīyate

हे विप्र! बुद्धिमान् व्यक्ति बिना तिलक लगाये यह सब नहीं करता; तिलक लगाये बिना जो पुण्यकर्म किया जाता है,

श्लोक 57 (padma.7.13.57)

भस्मीभवति तत्सर्वं कर्ता च नारकी भवेत् । शङ्खचक्रगदापद्मैरङ्कितं यस्य दृश्यते

bhasmībhavati tatsarvaṁ kartā ca nārakī bhavet śaṅkhacakragadāpadmairaṅkitaṁ yasya dṛśyate

वह सब भस्म हो जाता है, और उसका कर्ता नारकी बनता है। शंख, चक्र, गदा और पद्म से अंकित,

श्लोक 58 (padma.7.13.58)

शरीरं ब्राह्मणश्रेष्ठ विज्ञेयः सोऽच्युतः स्वयम् । यो लिखेद्दक्षिणे बाहौ शङ्ख पद्मे च वैष्णवः

śarīraṁ brāhmaṇaśreṣṭha vijñeyaḥ so'cyutaḥ svayam yo likheddakṣiṇe bāhau śaṅkha padme ca vaiṣṇavaḥ

जिसका शरीर दिखाई देता है, हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ, उसे साक्षात् अच्युत ही जानना चाहिए। जो वैष्णव अपनी दाहिनी भुजा पर शंख और पद्म,

श्लोक 59 (padma.7.13.59)

सव्ये चक्रं गदां चैव स विष्णुर्नात्र संशयः । पङ्कजं दक्षिणे बाहौ शङ्खस्योपरि यो लिखेत्

savye cakraṁ gadāṁ caiva sa viṣṇurnātra saṁśayaḥ paṅkajaṁ dakṣiṇe bāhau śaṅkhasyopari yo likhet

और बाईं भुजा पर चक्र और गदा अंकित करता है, वह स्वयं विष्णु ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं। जो दाहिनी भुजा पर, शंख के ऊपर, कमल अंकित करता है,

श्लोक 60 (padma.7.13.60)

पातकं सकलं तस्य क्षणादेव तु नश्यति । चक्रोपरि गदां यस्तु लिखेत्सव्ये भुजे द्विज

pātakaṁ sakalaṁ tasya kṣaṇādeva tu naśyati cakropari gadāṁ yastu likhetsavye bhuje dvija

उसके समस्त पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। हे द्विज! जो बाईं भुजा पर चक्र के ऊपर गदा अंकित करता है,

श्लोक 61 (padma.7.13.61)

तं वंदंते द्विजश्रेष्ठ शक्राद्या अपि निर्जराः । मुरारिपादयुग्मं च स्वललाटे लिखेद्बुधः

taṁ vaṁdaṁte dvijaśreṣṭha śakrādyā api nirjarāḥ murāripādayugmaṁ ca svalalāṭe likhedbudhaḥ

उसे, हे द्विजश्रेष्ठ, इन्द्र आदि देवगण भी वन्दन करते हैं। जो बुद्धिमान् व्यक्ति अपने ही ललाट पर मुरारि के चरण-युगल का चिह्न बनाता है,

श्लोक 62 (padma.7.13.62)

पापात्मापि च तं दृष्ट्वा मुक्तो भवति पातकात् । अष्टाक्षरं महामंत्रं मत्स्यं कूर्मं च यो हृदि

pāpātmāpi ca taṁ dṛṣṭvā mukto bhavati pātakāt aṣṭākṣaraṁ mahāmaṁtraṁ matsyaṁ kūrmaṁ ca yo hṛdi

उसे देखकर पापी व्यक्ति भी अपने पाप से मुक्त हो जाता है। जो हृदय पर मत्स्य, कूर्म और अष्टाक्षर महामन्त्र का चिह्न बनाता है,

श्लोक 63 (padma.7.13.63)

लिखेत्स वैष्णवश्रेष्ठः पुनाति भुवनत्रयम् । कृष्णायुधांकितं यस्य शरीरं स्याद्दिनेदिने

likhetsa vaiṣṇavaśreṣṭhaḥ punāti bhuvanatrayam kṛṣṇāyudhāṁkitaṁ yasya śarīraṁ syāddinedine

वह वैष्णवों में श्रेष्ठ, तीनों लोकों को पवित्र करता है। जिसका शरीर प्रतिदिन कृष्ण के आयुधों के चिह्नों से अंकित रहता है,

श्लोक 64 (padma.7.13.64)

तस्य कृष्णो जगन्नाथो ददाति परमं पदम् । कृष्णायुधांकिततनुर्यत्कर्म कुरुते नरः

tasya kṛṣṇo jagannātho dadāti paramaṁ padam kṛṣṇāyudhāṁkitatanuryatkarma kurute naraḥ

उसे कृष्ण जगन्नाथ परम पद प्रदान करते हैं। कृष्ण के आयुधों के चिह्नों से अंकित शरीर वाला मनुष्य जो भी कर्म करता है,

श्लोक 65 (padma.7.13.65)

शुभं वाप्यशुभं वापि तत्सर्वमक्षयं भवेत् । दानवा राक्षसाश्चैव भूतवेतालकास्तथा

śubhaṁ vāpyaśubhaṁ vāpi tatsarvamakṣayaṁ bhavet dānavā rākṣasāścaiva bhūtavetālakāstathā

चाहे शुभ हो या अशुभ, वह सब अक्षय हो जाता है। दानव, राक्षस, भूत, वेताल,

श्लोक 66 (padma.7.13.66)

पिशाचाः पन्नगाश्चापि यक्षविद्याधरास्तथा । किन्नरा गुह्यकाश्चैव ग्रहा बालग्रहास्तथा

piśācāḥ pannagāścāpi yakṣavidyādharāstathā kinnarā guhyakāścaiva grahā bālagrahāstathā

पिशाच, नाग, यक्ष, विद्याधर, किन्नर, गुह्यक, ग्रह, बाल-ग्रह,

श्लोक 67 (padma.7.13.67)

कूष्माण्डाश्चैव डाकिन्यस्तथान्ये विघ्नकारकाः । सर्वे भीत्या पलायंते दृष्ट्वा कृष्णायुधाङ्कितम्

kūṣmāṇḍāścaiva ḍākinyastathānye vighnakārakāḥ sarve bhītyā palāyaṁte dṛṣṭvā kṛṣṇāyudhāṅkitam

कूष्माण्ड, डाकिनियाँ, और अन्य विघ्नकारक — ये सभी, कृष्ण के आयुधों के चिह्न देखकर, भय से भाग जाते हैं।

श्लोक 68 (padma.7.13.68)

द्वीपाश्च द्वीपिनश्चैव तथान्ये वनवासिनः । दृष्ट्वैव प्रपलायंते भयात्कृष्णायुधांकितम्

dvīpāśca dvīpinaścaiva tathānye vanavāsinaḥ dṛṣṭvaiva prapalāyaṁte bhayātkṛṣṇāyudhāṁkitam

द्वीपों के वासी और वन में रहने वाले पशु आदि भी, कृष्ण के आयुधों के चिह्न देखते ही भय से भाग जाते हैं।

श्लोक 69 (padma.7.13.69)

कामलाद्या महारोगा देहदेहावपातिनः । कृष्णायुधांकिततनुं भक्त्या पश्यति यो जनः

kāmalādyā mahārogā dehadehāvapātinaḥ kṛṣṇāyudhāṁkitatanuṁ bhaktyā paśyati yo janaḥ

कामला (पीलिया) आदि महान् रोग, जो शरीर से शरीर में फैलते हैं, जो व्यक्ति कृष्ण के आयुधों के चिह्नों से अंकित शरीर को भक्तिपूर्वक देखता है,

श्लोक 70 (padma.7.13.70)

कृष्णदर्शनतुल्यस्य फलं प्राप्नोति मानवः । त्रिपत्रीकृतदूर्वाभिरश्विने योऽर्चयेद्धरिम्

kṛṣṇadarśanatulyasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ tripatrīkṛtadūrvābhiraśvine yo'rcayeddharim

वह मनुष्य कृष्ण-दर्शन के तुल्य ही फल प्राप्त करता है। जो आश्विन में तीन-पत्ती वाली दूर्वा से हरि की पूजा करता है,

श्लोक 71 (padma.7.13.71)

दूर्वावत्संततिस्तस्य अविच्छिन्ना प्रवर्तते । आश्विने मासि यो दद्याद्धरये कर्कटीफलम्

dūrvāvatsaṁtatistasya avicchinnā pravartate āśvine māsi yo dadyāddharaye karkaṭīphalam

उसकी दूर्वा जैसी सन्तान अविच्छिन्न रूप से चलती है। आश्विन मास में जो हरि को ककड़ी का फल अर्पित करता है,

श्लोक 72 (padma.7.13.72)

शोको न जायते तस्य कदाचिद्धृदये द्विज । कार्तिके च समायाते सर्वमासोत्तमे शुभे

śoko na jāyate tasya kadāciddhṛdaye dvija kārtike ca samāyāte sarvamāsottame śubhe

हे द्विज! उसके हृदय में कभी शोक उत्पन्न नहीं होता। समस्त महीनों में उत्तम और शुभ कार्तिक मास के आने पर,

श्लोक 73 (padma.7.13.73)

दामोदरं देवदेवं भक्त्या प्राज्ञः प्रपूजयेत् । कार्तिके मासि विप्रेन्द्र विष्णुप्रीणनहेतवे

dāmodaraṁ devadevaṁ bhaktyā prājñaḥ prapūjayet kārtike māsi viprendra viṣṇuprīṇanahetave

बुद्धिमान् व्यक्ति को देवाधिदेव दामोदर की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। हे विप्रेन्द्र! कार्तिक मास में विष्णु को प्रसन्न करने के लिए,

श्लोक 74 (padma.7.13.74)

यथोक्तविधिना प्राज्ञः प्रातःस्नानं समाचरेत् । आमिषं मैथुनं चैव कार्तिके मासि यस्त्यजेत्

yathoktavidhinā prājñaḥ prātaḥsnānaṁ samācaret āmiṣaṁ maithunaṁ caiva kārtike māsi yastyajet

बुद्धिमान् व्यक्ति को यथोक्त विधि से प्रातः-स्नान करना चाहिए। कार्तिक मास में जो मांस और मैथुन दोनों का त्याग करता है,

श्लोक 75 (padma.7.13.75)

जन्मान्तरार्जितैः पापैर्मुक्तो याति पराङ्गतिम् । तुलाराशिगते सूर्ये प्रातःस्नानं द्विजोत्तम

janmāntarārjitaiḥ pāpairmukto yāti parāṅgatim tulārāśigate sūrye prātaḥsnānaṁ dvijottama

वह जन्म-जन्मान्तर में अर्जित पापों से मुक्त होकर परम गति को जाता है। तुला राशि में सूर्य के आने पर, हे द्विजोत्तम,

श्लोक 76 (padma.7.13.76)

हविष्यं ब्रह्मचर्यं च महापातकनाशनम् । आमिषं मैथुनं चैव कार्तिकेमासि सेवते

haviṣyaṁ brahmacaryaṁ ca mahāpātakanāśanam āmiṣaṁ maithunaṁ caiva kārtikemāsi sevate

हविष्य-भोजन और ब्रह्मचर्य महापातकों का नाश करने वाला है। जो कार्तिक मास में मांस और मैथुन का सेवन करता है,

श्लोक 77 (padma.7.13.77)

जन्मजन्मनि विप्रेन्द्र स भवेद्ग्रामशूकरः । द्विभोजनं परान्नं च तैलं च वैष्णवो जनः

janmajanmani viprendra sa bhavedgrāmaśūkaraḥ dvibhojanaṁ parānnaṁ ca tailaṁ ca vaiṣṇavo janaḥ

हे विप्रेन्द्र! वह जन्म-जन्मान्तर में ग्राम-शूकर (गाँव का सूअर) बनता है। दो बार भोजन, दूसरे का दिया अन्न, और तेल — वैष्णव जन को,

श्लोक 78 (padma.7.13.78)

आयाते कार्तिके मासि यत्नादपि परित्यजेत् । दामोदराय नभसि दीपं यस्तु प्रयच्छति

āyāte kārtike māsi yatnādapi parityajet dāmodarāya nabhasi dīpaṁ yastu prayacchati

कार्तिक मास के आने पर, यत्नपूर्वक भी इन सबका त्याग करना चाहिए। जो आकाश में दामोदर के लिए दीपक जलाता है,

श्लोक 79 (padma.7.13.79)

फलं तस्य प्रवक्ष्यामि समासेन शृणु द्विज । ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्विमुक्तः क्लेशदायकैः

phalaṁ tasya pravakṣyāmi samāsena śṛṇu dvija brahmahatyādibhiḥ pāpairvimuktaḥ kleśadāyakaiḥ

उसका फल मैं तुम्हें बताऊँगा, संक्षेप में, हे द्विज, सुनो। ब्रह्महत्या आदि, क्लेश देने वाले पापों से मुक्त होकर,

श्लोक 80 (padma.7.13.80)

दामोदरपुरं गत्वा तिष्ठेत्कोटियुगावधि । दीपं ज्वलंतं नभसि त्रिदशा वासवादयः

dāmodarapuraṁ gatvā tiṣṭhetkoṭiyugāvadhi dīpaṁ jvalaṁtaṁ nabhasi tridaśā vāsavādayaḥ

वह दामोदर के धाम को जाकर, करोड़ों युगों तक वहाँ रहता है। आकाश में जलते हुए दीपक को, इन्द्र आदि सभी देवता,

श्लोक 81 (padma.7.13.81)

विलोक्य हर्षिताः सर्वे वदंतीति परस्परम् । असौ पुण्यात्मनां श्रेष्ठः केशवार्चनतत्परः

vilokya harṣitāḥ sarve vadaṁtīti parasparam asau puṇyātmanāṁ śreṣṭhaḥ keśavārcanatatparaḥ

देखकर सभी हर्षित होते हैं, और आपस में यह कहते हैं — यह पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ, केशव-अर्चन में तत्पर है,

श्लोक 82 (padma.7.13.82)

प्रदीपं कार्तिके मासि यतो यच्छति चक्रिणे । कार्तिके मासि विप्रेन्द्र तस्य तुष्टः सदा हरिः

pradīpaṁ kārtike māsi yato yacchati cakriṇe kārtike māsi viprendra tasya tuṣṭaḥ sadā hariḥ

क्योंकि कार्तिक मास में चक्रधारी को दीपक अर्पित करता है। हे विप्रेन्द्र! कार्तिक मास में उससे हरि सदा प्रसन्न रहते हैं।

श्लोक 83 (padma.7.13.83)

दद्यादक्षयदीपं यः कार्तिके हरिमंदिरे । दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः

dadyādakṣayadīpaṁ yaḥ kārtike harimaṁdire dinedine'śvamedhasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ

जो कार्तिक में हरि के मन्दिर में अखण्ड दीपक जलाता है, वह मनुष्य प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 84 (padma.7.13.84)

तुलसीदललक्षैर्यः कार्तिके पूजयेद्धरिम् । लक्षैकवाजिमेधस्य मानवो लभते फलम्

tulasīdalalakṣairyaḥ kārtike pūjayeddharim lakṣaikavājimedhasya mānavo labhate phalam

जो कार्तिक में लाखों तुलसी-दलों से हरि की पूजा करता है, वह मनुष्य एक लाख अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 85 (padma.7.13.85)

बिल्वस्य दललक्षेण योऽर्चयेद्विष्णुमव्ययम् । परमं मोक्षमाप्नोति प्रसादाज्जगतीपते

bilvasya dalalakṣeṇa yo'rcayedviṣṇumavyayam paramaṁ mokṣamāpnoti prasādājjagatīpate

जो एक लाख बिल्व-दलों से अविनाशी विष्णु की पूजा करता है, हे जगत्पते, वह प्रसाद से परम मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 86 (padma.7.13.86)

यत्किञ्चित्कार्तिकेमासि विष्णुमुद्दिश्य दीयते । तदक्षयं भवेत्सर्वं सत्यमेतन्मयोच्यते

yatkiñcitkārtikemāsi viṣṇumuddiśya dīyate tadakṣayaṁ bhavetsarvaṁ satyametanmayocyate

कार्तिक मास में जो कुछ भी विष्णु के उद्देश्य से अर्पित किया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है — यह सत्य मैं कहता हूँ।

श्लोक 87 (padma.7.13.87)

घृताक्तं सुरपत्रं यः कार्तिके मासि वैष्णवे । दद्याद्दिनेदिने विप्र तस्य विष्णोः पुरे स्थितिः

ghṛtāktaṁ surapatraṁ yaḥ kārtike māsi vaiṣṇave dadyāddinedine vipra tasya viṣṇoḥ pure sthitiḥ

जो घी से सने हुए सुरा-वृक्ष के पत्ते (कदली-पत्र) कार्तिक मास में हे विप्र, प्रतिदिन वैष्णव को अर्पित करता है, उसका निवास विष्णु के धाम में होता है।

श्लोक 88 (padma.7.13.88)

प्रफुल्लपद्मपत्रेण सितेनाप्यसितेन वा । योऽर्चयेत्कमलाकांतं तस्य किं भुवि दुर्ल्लभम्

praphullapadmapatreṇa sitenāpyasitena vā yo'rcayetkamalākāṁtaṁ tasya kiṁ bhuvi durllabham

खिले हुए, श्वेत अथवा नील कमल-दल से जो कमलापति की पूजा करता है, इस पृथ्वी पर उसके लिए क्या दुर्लभ है?

श्लोक 89 (padma.7.13.89)

द्विजाग्र्यः कार्तिके मासि हरये येन पङ्कजम् । न दत्तं तेन किं विप्र विष्णवे दैत्यजिष्णवे

dvijāgryaḥ kārtike māsi haraye yena paṅkajam na dattaṁ tena kiṁ vipra viṣṇave daityajiṣṇave

हे द्विजाग्र्य! जिसने कार्तिक मास में हरि को कमल अर्पित नहीं किया है, उसने, हे विप्र, दैत्यों के विजेता विष्णु को क्या नहीं दिया है?

श्लोक 90 (padma.7.13.90)

एकमेवांबुजं हृत्वा ददाति कैटभारये । तस्मै किं भगवान्विष्णुर्न ददाति श्रियः पतिः

ekamevāṁbujaṁ hṛtvā dadāti kaiṭabhāraye tasmai kiṁ bhagavānviṣṇurna dadāti śriyaḥ patiḥ

एक ही कमल तोड़कर जो कैटभ के शत्रु को अर्पित करता है, उसे भगवान् विष्णु, श्री के स्वामी, क्या नहीं देते?

श्लोक 91 (padma.7.13.91)

कमलैः कार्तिके मासि येन नाराधितो हरिः । जन्मजन्मनि तद्गेहे कमला न हि तिष्ठति

kamalaiḥ kārtike māsi yena nārādhito hariḥ janmajanmani tadgehe kamalā na hi tiṣṭhati

जो कार्तिक मास में कमलों से हरि की आराधना नहीं करता, उसके घर में जन्म-जन्मान्तर में कमला (लक्ष्मी) कभी नहीं ठहरतीं।

श्लोक 92 (padma.7.13.92)

पद्मबीजानि यो दद्यात्केशवाय महात्मने । स जायते विप्रकुले शुद्धे च प्रतिजन्मनि

padmabījāni yo dadyātkeśavāya mahātmane sa jāyate viprakule śuddhe ca pratijanmani

जो महात्मा केशव को कमल के बीज अर्पित करता है, वह हर जन्म में शुद्ध ब्राह्मण-कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 93 (padma.7.13.93)

ब्राह्मणस्य कुले जातश्चतुर्वेदसुहृद्भवेत् । धनवान्बहुपुत्रश्च कुटुंबानां च पोषकः

brāhmaṇasya kule jātaścaturvedasuhṛdbhavet dhanavānbahuputraśca kuṭuṁbānāṁ ca poṣakaḥ

ब्राह्मण के कुल में जन्म पाकर वह चारों वेदों का सुहृद बनता है — धनवान्, बहुपुत्रवान्, और अपने कुटुम्ब का पालक।

श्लोक 94 (padma.7.13.94)

नास्ति पद्मसमं पुष्पं जैमिने सत्यमुच्यते । येन संपूज्य गोविन्दं पापात्मापि च मोक्षभाक्

nāsti padmasamaṁ puṣpaṁ jaimine satyamucyate yena saṁpūjya govindaṁ pāpātmāpi ca mokṣabhāk

हे जैमिनि! कमल के समान कोई फूल नहीं है — यह सत्य कहा जाता है, जिससे गोविन्द की पूजा करके, पापी व्यक्ति भी मोक्ष का भागी बनता है।

श्लोक 95 (padma.7.13.95)

पद्मपुष्पस्य माहात्म्यं विशेषादुच्यते मया । सेतिहासं द्विजश्रेष्ठ सावधानं निशामय

padmapuṣpasya māhātmyaṁ viśeṣāducyate mayā setihāsaṁ dvijaśreṣṭha sāvadhānaṁ niśāmaya

कमल-पुष्प की महिमा को मैं विशेष रूप से कहता हूँ, हे द्विजश्रेष्ठ, एक इतिहास सहित; सावधान होकर सुनो।

श्लोक 96 (padma.7.13.96)

आसीदेकः प्रजा नाम ब्राह्मणः सर्वशास्त्रवित् । हरिपादांबुजे यस्य मनोभृङ्ग सदा स्थितिः

āsīdekaḥ prajā nāma brāhmaṇaḥ sarvaśāstravit haripādāṁbuje yasya manobhṛṅga sadā sthitiḥ

प्रजा नाम का एक ब्राह्मण था, समस्त शास्त्रों का ज्ञाता, जिसका मन-रूपी भँवरा सदा हरि के चरण-कमल में ही स्थित रहता था।

श्लोक 97 (padma.7.13.97)

देवानां ब्राह्मणानां च गुरूणां चैव सर्वदा । कृता पूजा द्विजश्रेष्ठ कार्याकार्यशतान्यपि

devānāṁ brāhmaṇānāṁ ca gurūṇāṁ caiva sarvadā kṛtā pūjā dvijaśreṣṭha kāryākāryaśatānyapi

देवताओं की, ब्राह्मणों की, और गुरुओं की सदा पूजा उसने की, हे द्विजश्रेष्ठ, सैकड़ों उचित-अनुचित कार्यों में भी।

श्लोक 98 (padma.7.13.98)

परद्रव्यं विषं चैव परस्त्रीषु स्वमातृवत् । कृतं तेनैव यच्चैवं तथा मित्रे च शात्रवे

paradravyaṁ viṣaṁ caiva parastrīṣu svamātṛvat kṛtaṁ tenaiva yaccaivaṁ tathā mitre ca śātrave

पराया धन, विष के समान, और पर-स्त्रियों को अपनी ही माता के समान — उसने ऐसा ही व्यवहार किया, तथा मित्र और शत्रु में भी (समान भाव रखा)।

श्लोक 99 (padma.7.13.99)

आयांतमतिथिं दृष्ट्वा स विप्रः परमार्थवित् । भृशं मानं न चाप्नोति याचकं च द्विजोत्तमम्

āyāṁtamatithiṁ dṛṣṭvā sa vipraḥ paramārthavit bhṛśaṁ mānaṁ na cāpnoti yācakaṁ ca dvijottamam

आते हुए अतिथि को देखकर, वह ब्राह्मण, परमार्थ जानने वाला, कभी भी अत्यधिक मान नहीं करता था; और याचक ब्राह्मण को भी नहीं (अनादर करता था)।

श्लोक 100 (padma.7.13.100)

सर्वयज्ञाः कृतास्तेन व्रतानि सकलानि च । संसारसागरं घोरमपारंच तितीर्षुणा

sarvayajñāḥ kṛtāstena vratāni sakalāni ca saṁsārasāgaraṁ ghoramapāraṁca titīrṣuṇā

उसने समस्त यज्ञ और समस्त व्रत किये, इस भयंकर, अपार संसार-सागर को पार करने की इच्छा से।

श्लोक 101 (padma.7.13.101)

एकदा स द्विजश्रेष्ठो हरिभक्तिपरायणः । स्वमृत्युं च निजां जातिं चिंतयामास चेतसा

ekadā sa dvijaśreṣṭho haribhaktiparāyaṇaḥ svamṛtyuṁ ca nijāṁ jātiṁ ciṁtayāmāsa cetasā

एक बार वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, हरि-भक्ति में परायण, अपनी मृत्यु और अपनी पूर्व-जाति के बारे में मन ही मन सोचने लगा।

श्लोक 102 (padma.7.13.102)

अहं पूर्वं स्थितः को वा किं वा कर्म कृतं पुरा । कथं वा जन्म संप्राप्तं गमिष्यामि क्व वा पुनः

ahaṁ pūrvaṁ sthitaḥ ko vā kiṁ vā karma kṛtaṁ purā kathaṁ vā janma saṁprāptaṁ gamiṣyāmi kva vā punaḥ

"मैं पहले क्या था, या क्या कर्म पहले किया था, या किस प्रकार यह जन्म पाया — मैं फिर कहाँ जाऊँगा?"

श्लोक 103 (padma.7.13.103)

इति संचिंत्य विप्रोऽसौ निःश्वस्य च पुनः पुनः । विज्ञातुं पूर्ववृत्तांतं शिवक्षेत्रं जगाम ह

iti saṁciṁtya vipro'sau niḥśvasya ca punaḥ punaḥ vijñātuṁ pūrvavṛttāṁtaṁ śivakṣetraṁ jagāma ha

इस प्रकार सोचकर, वह ब्राह्मण, बार-बार लम्बी साँस लेकर, अपने पूर्व-वृत्तान्त को जानने के लिए शिव-क्षेत्र को गया।

श्लोक 104 (padma.7.13.104)

तत्र बद्धाञ्जलिर्विप्रो भक्त्या परमया युतः । तुष्टाव शंकरं देवं वाचा मधुरया शिवम्

tatra baddhāñjalirvipro bhaktyā paramayā yutaḥ tuṣṭāva śaṁkaraṁ devaṁ vācā madhurayā śivam

वहाँ हाथ जोड़कर, परम भक्ति से युक्त वह ब्राह्मण, मधुर वाणी से देवता शंकर की स्तुति करने लगा।

श्लोक 105 (padma.7.13.105)

ब्राह्मण उवाच- नमस्तुभ्यं महादेव नमस्ते परमेश्वर । नमस्ते शंकरेशान नमस्ते वरद प्रभो

brāhmaṇa uvāca- namastubhyaṁ mahādeva namaste parameśvara namaste śaṁkareśāna namaste varada prabho

ब्राह्मण ने कहा — हे महादेव! आपको नमस्कार। हे परमेश्वर! आपको नमस्कार। हे शंकर! हे ईशान! आपको नमस्कार। हे वर देने वाले प्रभो! आपको नमस्कार।

श्लोक 106 (padma.7.13.106)

नमस्ते ज्ञानरूपाय नमस्ते ज्ञानदायिने । नमस्ते सर्वभूतानां हृदम्बुजनिवासिने

namaste jñānarūpāya namaste jñānadāyine namaste sarvabhūtānāṁ hṛdambujanivāsine

हे ज्ञान-रूप! आपको नमस्कार। हे ज्ञान के दाता! आपको नमस्कार। हे समस्त प्राणियों के हृदय-कमल में निवास करने वाले! आपको नमस्कार।

श्लोक 107 (padma.7.13.107)

जगत्स्रष्ट्रे नमस्तुभ्यं जगत्पित्रे नमो नमः । नमः संहराकर्त्रे च पशूनां पतये नमः

jagatsraṣṭre namastubhyaṁ jagatpitre namo namaḥ namaḥ saṁharākartre ca paśūnāṁ pataye namaḥ

हे जगत् के रचयिता! आपको नमस्कार। हे जगत् के पिता! बारम्बार नमस्कार। हे संहार करने वाले! और हे पशुओं के स्वामी! नमस्कार।

श्लोक 108 (padma.7.13.108)

मनस्ते वह्निनेत्राय नमस्ते वह्निचक्षुषे । नमस्ते चन्द्रनेत्राय सूर्यनेत्राय वै नमः

manaste vahninetrāya namaste vahnicakṣuṣe namaste candranetrāya sūryanetrāya vai namaḥ

हे अग्नि-नेत्र! आपको नमस्कार। हे अग्नि-चक्षु! नमस्कार। हे चन्द्र-नेत्र! आपको नमस्कार। हे सूर्य-नेत्र! नमस्कार।

श्लोक 109 (padma.7.13.109)

नमस्ते भस्मभूषाय नमस्ते कृत्तिवाससे । नमोऽस्थिमालिने तुभ्यं नीलकंठाय वै नमः

namaste bhasmabhūṣāya namaste kṛttivāsase namo'sthimāline tubhyaṁ nīlakaṁṭhāya vai namaḥ

हे भस्म-भूषित! आपको नमस्कार। हे मृगचर्म-धारी! नमस्कार। हे अस्थियों की माला धारण करने वाले! आपको नमस्कार। हे नीलकण्ठ! नमस्कार।

श्लोक 110 (padma.7.13.110)

नमस्ते पंचक्त्राय नमस्ते शूलपाणिने । कन्दर्पदर्पविध्वंसकारिणे भीममूर्तये

namaste paṁcaktrāya namaste śūlapāṇine kandarpadarpavidhvaṁsakāriṇe bhīmamūrtaye

हे पंचमुख! आपको नमस्कार। हे शूल-पाणि! नमस्कार। हे कामदेव के गर्व का नाश करने वाले, हे भयंकर स्वरूप! नमस्कार।

श्लोक 111 (padma.7.13.111)

नमस्ते देवदेवाय नमस्ते त्रिपुरारये । पार्वतीपतये तुभ्यं नमस्ते भीममूर्तये

namaste devadevāya namaste tripurāraye pārvatīpataye tubhyaṁ namaste bhīmamūrtaye

हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार। हे त्रिपुर के शत्रु! नमस्कार। हे पार्वती के स्वामी! आपको नमस्कार। हे भयंकर स्वरूप! नमस्कार।

श्लोक 112 (padma.7.13.112)

बाणभक्त्यातिसंतुष्ट मानसाय नमोस्तु ते । बहुरूपाय वै तुभ्यं विश्वरूपाय वै नमः

bāṇabhaktyātisaṁtuṣṭa mānasāya namostu te bahurūpāya vai tubhyaṁ viśvarūpāya vai namaḥ

बाण की भक्ति से अत्यन्त सन्तुष्ट मन वाले, आपको नमस्कार। हे नाना रूपधारी! आपको, हे विश्व-रूप! भी नमस्कार।

श्लोक 113 (padma.7.13.113)

गङ्गाधराय वै तुभ्यं दक्षयज्ञविनाशिने । प्रेतानां पतये तुभ्यं नमस्तुभ्यं पिनाकिने

gaṅgādharāya vai tubhyaṁ dakṣayajñavināśine pretānāṁ pataye tubhyaṁ namastubhyaṁ pinākine

हे गंगा-धारक! आपको नमस्कार। हे दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले! नमस्कार। हे प्रेतों के स्वामी! आपको नमस्कार। हे पिनाक धारण करने वाले! नमस्कार।

श्लोक 114 (padma.7.13.114)

ईशानाय नमस्तुभ्यं मनीषाय नमो नमः । तुभ्यं नमोऽस्तु दृश्याय अदृश्याय नमो नमः । नमश्चिन्त्याय वै तुभ्यमचिन्त्याय नमोनमः

īśānāya namastubhyaṁ manīṣāya namo namaḥ tubhyaṁ namo'stu dṛśyāya adṛśyāya namo namaḥ namaścintyāya vai tubhyamacintyāya namonamaḥ

हे ईशान! आपको नमस्कार। हे बुद्धि-स्वरूप! बारम्बार नमस्कार। हे दृश्य-स्वरूप! आपको नमस्कार, हे अदृश्य-स्वरूप! बारम्बार नमस्कार। हे चिन्तनीय! आपको नमस्कार, हे अचिन्त्य-स्वरूप! बारम्बार नमस्कार।

श्लोक 115 (padma.7.13.115)

ब्रह्मा त्वमेव त्रिदशैकनाथस्त्वमेव विष्णुस्तपनस्त्वमेव । त्वमेव सोमः सकलार्त्तिहारी नमो नमस्ते परमेश्वराय

brahmā tvameva tridaśaikanāthastvameva viṣṇustapanastvameva tvameva somaḥ sakalārttihārī namo namaste parameśvarāya

आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही देवताओं के एकमात्र स्वामी विष्णु हैं, आप ही सूर्य हैं, आप ही चन्द्रमा हैं, समस्त पीड़ाओं को हरने वाले हैं — हे परमेश्वर! आपको बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 116 (padma.7.13.116)

तस्यस्तवं समाकर्ण्य शंकरो लोकशंकरः । आविर्बभूव सहसा प्रसन्नः परमेश्वरः

tasyastavaṁ samākarṇya śaṁkaro lokaśaṁkaraḥ āvirbabhūva sahasā prasannaḥ parameśvaraḥ

उसकी इस स्तुति को सुनकर, लोकों के कल्याणकर्ता शंकर, प्रसन्न होकर, परमेश्वर, तत्काल प्रकट हो गये।

श्लोक 117 (padma.7.13.117)

आविर्भूतं समालोक्य सर्वदेवनमस्कृतम् । ववंदे चरणौ तस्य स विप्रोऽत्यंतभक्तिमान्

āvirbhūtaṁ samālokya sarvadevanamaskṛtam vavaṁde caraṇau tasya sa vipro'tyaṁtabhaktimān

उन्हें प्रकट देखकर, जिन्हें समस्त देवता नमस्कार करते हैं, उस अत्यन्त भक्तिमान् ब्राह्मण ने उनके दोनों चरणों को नमन किया।

श्लोक 118 (padma.7.13.118)

भूयोऽपि स द्विजश्रेष्ठो हर्षनिर्भरमानसः । कृताञ्जलिर्महादेवं तुष्टाव वरदं प्रभुम्

bhūyo'pi sa dvijaśreṣṭho harṣanirbharamānasaḥ kṛtāñjalirmahādevaṁ tuṣṭāva varadaṁ prabhum

फिर से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, हर्ष से भरे मन के साथ, हाथ जोड़कर, वर देने वाले प्रभु महादेव की स्तुति करने लगा।

श्लोक 119 (padma.7.13.119)

ब्राह्मण उवाच- यं न पश्यंति देवेशं देवा अपि सवासवाः । पश्यामि तमहं साक्षान्महाभाग्यमिदं मम

brāhmaṇa uvāca- yaṁ na paśyaṁti deveśaṁ devā api savāsavāḥ paśyāmi tamahaṁ sākṣānmahābhāgyamidaṁ mama

ब्राह्मण ने कहा — जिस देवाधिदेव को इन्द्र सहित देवता भी नहीं देख पाते, उसे मैं साक्षात् देख रहा हूँ — यह मेरा महान् सौभाग्य है।

श्लोक 120 (padma.7.13.120)

ध्यानावस्थितचित्तेन योऽदृश्यः परमेश्वरः । पश्यामि तमहं साक्षान् साध्यं किमपरं मम

dhyānāvasthitacittena yo'dṛśyaḥ parameśvaraḥ paśyāmi tamahaṁ sākṣān sādhyaṁ kimaparaṁ mama

ध्यान की अवस्था में स्थित चित्त वाले लोगों के लिए भी जो परमेश्वर अदृश्य हैं, उन्हें मैं साक्षात् देख रहा हूँ — अब मुझे और क्या सिद्ध करना है?

श्लोक 121 (padma.7.13.121)

त्वन्नामस्मरणादेव महापातकिनोऽपि च । गच्छंति परमं स्थानं समीक्षे तमहं प्रभुम्

tvannāmasmaraṇādeva mahāpātakino'pi ca gacchaṁti paramaṁ sthānaṁ samīkṣe tamahaṁ prabhum

जिनके नाम के स्मरण मात्र से महापापी भी परम स्थान को जाते हैं, उन्हीं प्रभु को मैं देख रहा हूँ।

श्लोक 122 (padma.7.13.122)

कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि च भाग्यवान् । नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं प्रसीद परमेश्वर

kṛtārtho'smi kṛtārtho'smi kṛtārtho'smi ca bhāgyavān namastubhyaṁ namastubhyaṁ prasīda parameśvara

मैं कृतार्थ हूँ, मैं कृतार्थ हूँ, मैं कृतार्थ और भाग्यशाली हूँ। आपको नमस्कार, आपको नमस्कार, प्रसन्न होइए, हे परमेश्वर!

श्लोक 123 (padma.7.13.123)

महादेव उवाच-। भवतोऽनेन वाक्येन तुष्टोऽस्मि द्विजसत्तम । वरं वृणु महाभाग वरं दित्सुरहं खलु

mahādeva uvāca- bhavato'nena vākyena tuṣṭo'smi dvijasattama varaṁ vṛṇu mahābhāga varaṁ ditsurahaṁ khalu

महादेव ने कहा — तुम्हारे इस वचन से मैं प्रसन्न हूँ, हे द्विजसत्तम! हे महाभाग! वर माँगो, मैं वास्तव में देना चाहता हूँ।

श्लोक 124 (padma.7.13.124)

ब्राह्मण उवाच- भवंतं परमात्मानमदृश्यं दैवतैरपि । साक्षात्पश्याम्यहं नाथ किं कार्यमपरैर्वरैः

brāhmaṇa uvāca- bhavaṁtaṁ paramātmānamadṛśyaṁ daivatairapi sākṣātpaśyāmyahaṁ nātha kiṁ kāryamaparairvaraiḥ

ब्राह्मण ने कहा — हे नाथ! देवताओं के लिए भी अदृश्य परमात्मा आपको मैं साक्षात् देख रहा हूँ; अन्य वरों से क्या प्रयोजन?

श्लोक 125 (padma.7.13.125)

तथापि त्वं महादेव वरं दित्सुः कृपामयः । पृच्छामि यदहं किंचित्तद्ब्रूहि परमेश्वर

tathāpi tvaṁ mahādeva varaṁ ditsuḥ kṛpāmayaḥ pṛcchāmi yadahaṁ kiṁcittadbrūhi parameśvara

फिर भी, हे महादेव! आप, कृपामय, वर देना चाहते हैं, तो मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह मुझे बताइये, हे परमेश्वर!

श्लोक 126 (padma.7.13.126)

कोऽहं तस्थौ पुरा देव किं वा कार्यं कृतं पुरा । संसारसागरे नाथ पतितोऽस्मि कथं प्रभो

ko'haṁ tasthau purā deva kiṁ vā kāryaṁ kṛtaṁ purā saṁsārasāgare nātha patito'smi kathaṁ prabho

हे देव! मैं पहले क्या था, पहले क्या कर्म किया था? हे प्रभो! संसार-सागर में मैं कैसे गिर पड़ा?

श्लोक 127 (padma.7.13.127)

कर्मणा प्राप्यते देहो देही पापेन लिप्यते । पुनः पापप्रभावेण प्राप्यते विषमा गतिः

karmaṇā prāpyate deho dehī pāpena lipyate punaḥ pāpaprabhāveṇa prāpyate viṣamā gatiḥ

कर्म से शरीर प्राप्त होता है, देहधारी पाप से लिप्त होता है, फिर पाप के प्रभाव से विषम गति प्राप्त होती है।

श्लोक 128 (padma.7.13.128)

प्रभावैः कर्मणां केषां जन्म प्राप्तमिदं मया । नानादुःखप्रदं नाथ प्रसन्नो ब्रूहि शंकर

prabhāvaiḥ karmaṇāṁ keṣāṁ janma prāptamidaṁ mayā nānāduḥkhapradaṁ nātha prasanno brūhi śaṁkara

मैंने किस-किस कर्म के प्रभाव से यह जन्म पाया है, जो नाना दुःख देने वाला है, हे नाथ! प्रसन्न होकर बताइये, हे शंकर!

श्लोक 129 (padma.7.13.129)

पापमूलमिदं जन्म जन्म दुःखस्य कारणम् । ज्ञातुमिच्छाम्यहं तस्मात्पूर्ववृत्तांतमात्मनः

pāpamūlamidaṁ janma janma duḥkhasya kāraṇam jñātumicchāmyahaṁ tasmātpūrvavṛttāṁtamātmanaḥ

यह जन्म पाप-मूलक है, जन्म ही दुःख का कारण है; इसलिए मैं अपने पूर्व-वृत्तान्त को जानना चाहता हूँ।

श्लोक 130 (padma.7.13.130)

स्थितोऽहं जननी कुक्षौ जनठरानलतापितः । मूत्रविष्ठाप्रकीर्णे च विपाकेन च कर्मणाम्

sthito'haṁ jananī kukṣau janaṭharānalatāpitaḥ mūtraviṣṭhāprakīrṇe ca vipākena ca karmaṇām

माता के गर्भ में स्थित होकर, उसकी उदर-अग्नि से तप्त होकर, मूत्र और मल से भरे स्थान में, अपने ही कर्मों के परिपाक से,

श्लोक 131 (padma.7.13.131)

गर्भवाससमं दुःखं संसारे न हि मन्यते । कथं मयानुभूतं तत्प्रभो भक्तार्तिनाशन

garbhavāsasamaṁ duḥkhaṁ saṁsāre na hi manyate kathaṁ mayānubhūtaṁ tatprabho bhaktārtināśana

गर्भ-वास के समान दुःख इस संसार में और कोई नहीं माना जाता। हे प्रभो! हे भक्तों की पीड़ा हरने वाले! मैंने वह कैसे भोगा?

श्लोक 132 (padma.7.13.132)

संसारेऽस्मिन्महाघोरे नानादुःखसमन्विते । असारे मायया विष्णोर्मोहिते पातकाश्रये

saṁsāre'sminmahāghore nānāduḥkhasamanvite asāre māyayā viṣṇormohite pātakāśraye

इस अत्यन्त भयानक, नाना दुःखों से युक्त, विष्णु की माया से मोहित हुए, पाप के आश्रय, सार-रहित संसार में,

श्लोक 133 (padma.7.13.133)

दुस्तरे बंधुहीने च कामक्रोधादिसंयुते । शोकरोगप्रदे चैव जन्ममृत्युप्रदे तथा

dustare baṁdhuhīne ca kāmakrodhādisaṁyute śokarogaprade caiva janmamṛtyuprade tathā

दुस्तर, बन्धु-हीन, काम-क्रोध आदि से युक्त, शोक और रोग देने वाले, तथा जन्म-मृत्यु देने वाले,

श्लोक 134 (padma.7.13.134)

अपारे जगतामीश पतितोऽस्मि कथं शिव । एतत्सर्वं विभो ब्रूहि यदि ते मय्यनुग्रहः

apāre jagatāmīśa patito'smi kathaṁ śiva etatsarvaṁ vibho brūhi yadi te mayyanugrahaḥ

अपार जगत् में, हे शिव, हे लोकों के स्वामी! मैं कैसे गिर पड़ा? यह सब, हे विभो, यदि मुझ पर आपकी कृपा हो तो बताइये।

श्लोक 135 (padma.7.13.135)

महादेव उवाच- यद्यप्येतद्दिवजश्रेष्ठ गुह्याद्गुह्यतरं महत् । अप्रकाश्यं तथापि त्वां भक्तं प्रतिवदाम्यहम्

mahādeva uvāca- yadyapyetaddivajaśreṣṭha guhyādguhyataraṁ mahat aprakāśyaṁ tathāpi tvāṁ bhaktaṁ prativadāmyaham

महादेव ने कहा — यद्यपि यह, हे द्विजश्रेष्ठ, गुह्य से भी अत्यन्त गुह्य और महान् है, अप्रकाश्य है, फिर भी, हे भक्त! मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 136 (padma.7.13.136)

पुरा त्वं ब्राह्मणः श्रेष्ठ शबरान्वयसंभव । दण्डपाणिरिति ख्यातः स्थितः सल्लोकदुःखदः

purā tvaṁ brāhmaṇaḥ śreṣṭha śabarānvayasaṁbhava daṇḍapāṇiriti khyātaḥ sthitaḥ sallokaduḥkhadaḥ

हे श्रेष्ठ! तुम पहले शबर-वंश में उत्पन्न एक ब्राह्मण थे, दण्डपाणि नाम से विख्यात, समस्त लोगों को दुःख देने वाले।

श्लोक 137 (padma.7.13.137)

परलोकभयं त्यक्त्वा विवेकैः परिवर्जितः । दस्युवृत्तिं प्रपन्नार्ति परमक्लेशदायिनीम्

paralokabhayaṁ tyaktvā vivekaiḥ parivarjitaḥ dasyuvṛttiṁ prapannārti paramakleśadāyinīm

परलोक के भय को त्यागकर, विवेक से रहित होकर, तुमने अत्यन्त क्लेशदायी, दस्युओं की वृत्ति अपनाई, जो परार्ति (दूसरों को कष्ट) उत्पन्न करती है।

श्लोक 138 (padma.7.13.138)

दस्युवृत्तिगतं दृष्ट्वा भवंतमतिनिर्दयम् । अपरे भ्रातरः सर्वे बभूवुस्ते च दस्यवः

dasyuvṛttigataṁ dṛṣṭvā bhavaṁtamatinirdayam apare bhrātaraḥ sarve babhūvuste ca dasyavaḥ

तुम्हें दस्यु-वृत्ति में लीन, अत्यन्त निर्दय देखकर, तुम्हारे अन्य सभी भाई भी दस्यु बन गये।

श्लोक 139 (padma.7.13.139)

तेषां नामानि विप्रेन्द्र भातॄणां निगदाम्यहम् । यैः सार्द्धं भवता पूर्वं भ्रातृभिर्दस्युता कृता

teṣāṁ nāmāni viprendra bhātṝṇāṁ nigadāmyaham yaiḥ sārddhaṁ bhavatā pūrvaṁ bhrātṛbhirdasyutā kṛtā

हे विप्रेन्द्र! उन भाइयों के नाम मैं बताता हूँ, जिनके साथ तुमने पहले दस्युता का काम किया था।

श्लोक 140 (padma.7.13.140)

दंडी दंडायुधश्चैव दत्तवान्दत्तभूस्तथा । सुंदडो दंडकेतुश्च भ्रातरः षट्प्रकीर्तिताः

daṁḍī daṁḍāyudhaścaiva dattavāndattabhūstathā suṁdaḍo daṁḍaketuśca bhrātaraḥ ṣaṭprakīrtitāḥ

दण्डी, दण्डायुध, दत्तवान्, दत्तभू, सुदण्ड और दण्डकेतु — छह भाई थे, ऐसा कहा गया।

श्लोक 141 (padma.7.13.141)

तैर्भ्रातृभिर्महाघोरैर्दयाभिः परिवर्जितः । दंडेन भवता नित्यं सर्वे व्यग्रीकृता जनाः

tairbhrātṛbhirmahāghorairdayābhiḥ parivarjitaḥ daṁḍena bhavatā nityaṁ sarve vyagrīkṛtā janāḥ

उन अत्यन्त भयंकर, दया-रहित भाइयों सहित, तुमने अपने दण्ड (शासन) से सदा समस्त लोगों को व्याकुल किया।

श्लोक 142 (padma.7.13.142)

धनलोभेन भवता दुष्टैस्तैर्भ्रातृभिः सह । अरण्ये प्रांतरो विप्र हताः शतसहस्रशः

dhanalobhena bhavatā duṣṭaistairbhrātṛbhiḥ saha araṇye prāṁtaro vipra hatāḥ śatasahasraśaḥ

धन के लोभ से, तुमने उन दुष्ट भाइयों के साथ, वन के निर्जन स्थान में, हे विप्र, सैकड़ों-हजारों लोगों को मार डाला।

श्लोक 143 (padma.7.13.143)

हत्वा च सायकैस्तीक्ष्णैर्वनस्थेन त्वया सदा । गवां क्रव्याणि भुक्त्वा च मदिराभिः सह द्विज

hatvā ca sāyakaistīkṣṇairvanasthena tvayā sadā gavāṁ kravyāṇi bhuktvā ca madirābhiḥ saha dvija

तीक्ष्ण बाणों से मारकर, वन में रहते हुए, तुम सदा गायों का मांस खाते और मदिरा भी पीते थे, हे द्विज।

श्लोक 144 (padma.7.13.144)

ततो यानविधिं सर्वे वणिजस्त्वद्भयात्तथा । तत्यजुर्विपिने तस्मिन्ननर्थः पतितः सदा

tato yānavidhiṁ sarve vaṇijastvadbhayāttathā tatyajurvipine tasminnanarthaḥ patitaḥ sadā

तब तुम्हारे भय से सभी व्यापारी, उस वन में यात्रा का मार्ग ही छोड़ने लगे — वहाँ सदा अनर्थ ही हुआ।

श्लोक 145 (padma.7.13.145)

यस्य वित्तं न तद्वित्तं गृहं यस्य न तद्गृहम् । यस्य भार्या न तद्भार्या त्वयि दस्युत्वमागते

yasya vittaṁ na tadvittaṁ gṛhaṁ yasya na tadgṛham yasya bhāryā na tadbhāryā tvayi dasyutvamāgate

जिसका धन तुमने ले लिया, वह उसका धन न रहा; जिसका घर तुमने उजाड़ा, वह उसका घर न रहा; जिसकी पत्नी तुमने हर ली, वह उसकी पत्नी न रही — इतना दस्युत्व तुम्हारा हो गया था।

श्लोक 146 (padma.7.13.146)

एवं स्वभ्रातृभिस्तैस्तु तस्मिन्नेव महावने । गतो वर्त्मश्रमश्रांतः स्नानार्थं सरसीं प्रति

evaṁ svabhrātṛbhistaistu tasminneva mahāvane gato vartmaśramaśrāṁtaḥ snānārthaṁ sarasīṁ prati

इस प्रकार, अपने उन भाइयों के साथ, उसी महान् वन में, मार्ग के परिश्रम से थककर, तुम स्नान के लिए एक सरोवर की ओर गये।

श्लोक 147 (padma.7.13.147)

तत्र स्नानं समाचर्य क्षुधितेन द्विजोत्तम । भक्षितानि मृणालानि भ्रातृभिस्तैर्जलानि च

tatra snānaṁ samācarya kṣudhitena dvijottama bhakṣitāni mṛṇālāni bhrātṛbhistairjalāni ca

हे द्विजोत्तम! वहाँ स्नान करके, भूखे रहते हुए, उन भाइयों ने कमल-नाल और जल-कमल खाये।

श्लोक 148 (padma.7.13.148)

अथ त्वया द्विजश्रेष्ठ कौतुकात्तत्र सत्तम । भुक्तानि पद्मपुष्पाणि प्रफुल्लानि बहूनि च

atha tvayā dvijaśreṣṭha kautukāttatra sattama bhuktāni padmapuṣpāṇi praphullāni bahūni ca

फिर, हे द्विजश्रेष्ठ, हे सत्तम! तुमने भी कौतुक से वहाँ, बहुत सारे खिले हुए कमल-पुष्प खाये।

श्लोक 149 (padma.7.13.149)

तस्मिन्नेव ततः काले ब्राह्मणो विपिनेचरः । सर्ववेदा इति ख्यातस्तत्र स्नानार्थमागतः

tasminneva tataḥ kāle brāhmaṇo vipinecaraḥ sarvavedā iti khyātastatra snānārthamāgataḥ

उसी समय, सर्ववेद नाम से विख्यात एक ब्राह्मण, वन-चारी, वहाँ स्नान के लिए आया।

श्लोक 150 (padma.7.13.150)

तत्र स्नात्वा स धर्मात्मा भगवंतं जनार्दनम् । यष्टुं त्वामकमंभोजं ययाचे विनयान्वितः

tatra snātvā sa dharmātmā bhagavaṁtaṁ janārdanam yaṣṭuṁ tvāmakamaṁbhojaṁ yayāce vinayānvitaḥ

वहाँ स्नान करके, वह धर्मात्मा, भगवान् जनार्दन की पूजा के लिए, विनयपूर्वक तुमसे एक कमल माँगने लगा।

श्लोक 151 (padma.7.13.151)

अथ त्वया च विप्रेन्द्र पद्ममेकं सुनिर्मलम् । दत्तं परमया भक्त्या पूजार्थं कमलापतेः

atha tvayā ca viprendra padmamekaṁ sunirmalam dattaṁ paramayā bhaktyā pūjārthaṁ kamalāpateḥ

फिर, हे विप्रेन्द्र! तुमने भी एक अत्यन्त निर्मल कमल, परम भक्ति से, कमलापति की पूजा के लिए उसे दे दिया।

श्लोक 152 (padma.7.13.152)

त्वया दत्तेन पद्मेन स च प्रीतो द्विजोत्तमः । पूजयामास तत्रैव विष्णुं सकलकारकम्

tvayā dattena padmena sa ca prīto dvijottamaḥ pūjayāmāsa tatraiva viṣṇuṁ sakalakārakam

तुम्हारे द्वारा दिये गये उस कमल से, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, प्रसन्न होकर, वहीं सम्पूर्ण कारणों के कर्ता विष्णु की पूजा करने लगा।

श्लोक 153 (padma.7.13.153)

विष्णुपूजा परं दृष्ट्वा तं विप्रं सर्ववेदसम् । त्वमपि प्रहसन्विष्णुं ननन्थ च सुकामदम्

viṣṇupūjā paraṁ dṛṣṭvā taṁ vipraṁ sarvavedasam tvamapi prahasanviṣṇuṁ nanantha ca sukāmadam

उस समस्त वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण की परम विष्णु-पूजा देखकर, तुम भी हँसते हुए विष्णु की, समस्त इच्छाओं के दाता की, आराधना करने लगे।

श्लोक 154 (padma.7.13.154)

अथाभ्यर्च्य परात्मानं चतुर्वर्गफलप्रदम् । यथोक्तविधिना विप्र स जगाम यथागतः

athābhyarcya parātmānaṁ caturvargaphalapradam yathoktavidhinā vipra sa jagāma yathāgataḥ

फिर परमात्मा की, यथोक्त विधि से, चतुर्वर्ग-फल के दाता की पूजा करके, वह ब्राह्मण जैसे आया था, वैसे ही लौट गया।

श्लोक 155 (padma.7.13.155)

तेनाम्बुजप्रदानेन प्रणामेन च सत्तम । विष्णुपूजादर्शनेन नष्टं ते सर्वपातकम्

tenāmbujapradānena praṇāmena ca sattama viṣṇupūjādarśanena naṣṭaṁ te sarvapātakam

हे सत्तम! उसी कमल के अर्पण से, उस प्रणाम से, और उस विष्णु-पूजा के दर्शन से, तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गये।

श्लोक 156 (padma.7.13.156)

ततः कियद्भिर्दिवसैस्तस्मिन्नेव महावने । संप्राप्तकालः पंचत्वं गतोऽसि त्वं द्विजोत्तम

tataḥ kiyadbhirdivasaistasminneva mahāvane saṁprāptakālaḥ paṁcatvaṁ gato'si tvaṁ dvijottama

फिर कुछ ही दिनों में, उसी महान् वन में, समय पूर्ण होने पर, हे द्विजोत्तम, तुम मृत्यु को प्राप्त हो गये।

श्लोक 157 (padma.7.13.157)

तेनैव कर्मणा तुष्टो भगवान्करुणालयः । ददौ तुभ्यं परं स्थानं देवैरपि सुदुर्ल्लभम्

tenaiva karmaṇā tuṣṭo bhagavānkaruṇālayaḥ dadau tubhyaṁ paraṁ sthānaṁ devairapi sudurllabham

उसी कर्म से प्रसन्न होकर, करुणा के धाम भगवान् ने तुम्हें एक ऐसा परम स्थान दिया जो देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 158 (padma.7.13.158)

मन्वंतरसहस्राणि मन्वंतरशतानि च । भुक्तं नानासुखं तत्र कृपया कमलापतेः

manvaṁtarasahasrāṇi manvaṁtaraśatāni ca bhuktaṁ nānāsukhaṁ tatra kṛpayā kamalāpateḥ

हजारों मन्वन्तर और सैकड़ों मन्वन्तर तक, कमलापति की कृपा से, वहाँ तुमने नाना सुख भोगे।

श्लोक 159 (padma.7.13.159)

ततः कर्मावसाने तु कर्मभूमिमिमां द्विज । आगत्य तैः पुण्यफलैर्जातोऽसि द्विजसंततौ

tataḥ karmāvasāne tu karmabhūmimimāṁ dvija āgatya taiḥ puṇyaphalairjāto'si dvijasaṁtatau

फिर, उस कर्म का अन्त होने पर, हे द्विज, इसी कर्मभूमि में आकर, उन पुण्य-फलों से, तुम ब्राह्मण की सन्तति में जन्मे।

श्लोक 160 (padma.7.13.160)

ब्राह्मणस्य कुले शुद्धे जन्म संप्राप्य सत्तम । सर्वगुणाश्रया लब्धा हरिभक्तिरचंचला

brāhmaṇasya kule śuddhe janma saṁprāpya sattama sarvaguṇāśrayā labdhā haribhaktiracaṁcalā

हे सत्तम! शुद्ध ब्राह्मण-कुल में जन्म पाकर, तुमने समस्त गुणों का आश्रय, अटल हरि-भक्ति प्राप्त की है।

श्लोक 161 (padma.7.13.161)

आराधितो महाविष्णुः क्रियायोगैस्त्वया प्रभुः । तुभ्यं दास्यति विज्ञानं ज्ञानान्मुक्तो भविष्यति

ārādhito mahāviṣṇuḥ kriyāyogaistvayā prabhuḥ tubhyaṁ dāsyati vijñānaṁ jñānānmukto bhaviṣyati

क्रियायोगों से तुमने महाविष्णु प्रभु की आराधना की है; वह तुम्हें विज्ञान प्रदान करेंगे, और उस ज्ञान से तुम मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 162 (padma.7.13.162)

गच्छ ब्राह्मण भद्रं ते सुप्रीतो निजमंदिरम् । मद्दर्शनं त्वया प्राप्तं मुक्तोऽसि भवबंधनात्

gaccha brāhmaṇa bhadraṁ te suprīto nijamaṁdiram maddarśanaṁ tvayā prāptaṁ mukto'si bhavabaṁdhanāt

जाओ, हे ब्राह्मण! तुम्हारा कल्याण हो, प्रसन्न होकर अपने घर जाओ। तुमने मेरा दर्शन प्राप्त कर लिया है, तुम संसार-बन्धन से मुक्त हो गये हो।

श्लोक 163 (padma.7.13.163)

व्यास उवाच- इत्युक्त्वांतर्दधे विप्र तत्रैव जगदीश्वरः । कृतार्थो ब्राह्मणः सोऽपि जगाम भवनं स्वकम्

vyāsa uvāca- ityuktvāṁtardadhe vipra tatraiva jagadīśvaraḥ kṛtārtho brāhmaṇaḥ so'pi jagāma bhavanaṁ svakam

व्यास जी ने कहा — यह कहकर, हे विप्र, वहीं जगदीश्वर अन्तर्धान हो गये। कृतार्थ हुआ वह ब्राह्मण भी अपने ही घर चला गया।

श्लोक 164 (padma.7.13.164)

अथ स त्रिदिनं विष्णुं पद्मपुष्पैर्मनोरमैः । यत्नादाराधयामास स्तुत्यर्थं परमेश्वरम्

atha sa tridinaṁ viṣṇuṁ padmapuṣpairmanoramaiḥ yatnādārādhayāmāsa stutyarthaṁ parameśvaram

फिर उसने तीन दिनों तक, मनोहर कमल-पुष्पों से, यत्नपूर्वक विष्णु की स्तुति के लिए, परमेश्वर की आराधना की।

श्लोक 165 (padma.7.13.165)

विष्णुं समाराध्य चिरं प्रसुप्तः पद्मप्रसूनैर्विचित्रैः सुपुष्पैः । ज्ञानं समासाद्य जगाम मोक्षं प्रसादतः श्रीगरुडध्वजस्य

viṣṇuṁ samārādhya ciraṁ prasuptaḥ padmaprasūnairvicitraiḥ supuṣpaiḥ jñānaṁ samāsādya jagāma mokṣaṁ prasādataḥ śrīgaruḍadhvajasya

दीर्घकाल तक विष्णु की आराधना करके, नाना विचित्र, सुन्दर कमल-पुष्पों के बीच सोया हुआ (मृत्यु को प्राप्त), वह ज्ञान प्राप्त करके, श्री गरुड़-ध्वज विष्णु की कृपा से मोक्ष को प्राप्त हुआ।

श्लोक 166 (padma.7.13.166)

अनिच्छयापि कमलं यच्छतः फलमीदृशम् । विष्णवे यच्छतो भक्त्या न जाने किं भवेदिति

anicchayāpi kamalaṁ yacchataḥ phalamīdṛśam viṣṇave yacchato bhaktyā na jāne kiṁ bhavediti

अनिच्छापूर्वक भी कमल अर्पित करने का जो फल है, ऐसा — तो भक्तिपूर्वक विष्णु को अर्पित करने का फल क्या होगा, मैं नहीं जानता।

श्लोक 167 (padma.7.13.167)

सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यमेव मयोच्यते । कमलैर्हरिमभ्यर्च्य प्राप्यते परमं पदम्

satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ satyameva mayocyate kamalairharimabhyarcya prāpyate paramaṁ padam

सत्य है, सत्य है, फिर सत्य है, सत्य ही मैं कहता हूँ — कमलों से हरि की आराधना करके परम पद प्राप्त होता है।

श्लोक 168 (padma.7.13.168)

एकमेवारविंदं यः प्रददाति मुरारये । तस्य नास्ति पुनर्जन्म संसारेषु भयावहे

ekamevāraviṁdaṁ yaḥ pradadāti murāraye tasya nāsti punarjanma saṁsāreṣu bhayāvahe

जो एक ही कमल मुरारि को अर्पित करता है, उसका इस भयंकर संसार में पुनः जन्म नहीं होता।

श्लोक 169 (padma.7.13.169)

नारायणं ये च प्रफुल्लवारिजैर्दयामयं कामदमर्चयंति । एकाहमप्युत्कटपापयुक्तास्ते यांति मुक्तिं प्रति पापिनोऽपि

nārāyaṇaṁ ye ca praphullavārijairdayāmayaṁ kāmadamarcayaṁti ekāhamapyutkaṭapāpayuktāste yāṁti muktiṁ prati pāpino'pi

जो लोग खिले हुए कमलों से दयामय, कामनाओं को पूर्ण करने वाले नारायण की पूजा करते हैं, वे — चाहे भयंकर पापों से युक्त पापी भी क्यों न हों — एक दिन भी पूजा करने से मुक्ति की ओर जाते हैं।

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