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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 19

डाकू उर्वीश का हरि को गुड़-शकट अर्पण

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (padma.7.19.1)

व्यास उवाच- नारायणप्रपन्ना ये नराभक्तिसमन्विताः । कदाचिदशुभं तेषां विद्यते न द्विजोत्तम

vyāsa uvāca- nārāyaṇaprapannā ye narābhaktisamanvitāḥ kadācidaśubhaṁ teṣāṁ vidyate na dvijottama

व्यास जी ने कहा — हे द्विजोत्तम! जो मनुष्य भक्तिसहित नारायण की शरण में जाते हैं, उनका कभी भी अशुभ नहीं होता।

श्लोक 2 (padma.7.19.2)

पुनरेव प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं कमलापतेः । यच्छ्रुत्वा मानवाः सर्वे लभंते परमं पदम्

punareva pravakṣyāmi māhātmyaṁ kamalāpateḥ yacchrutvā mānavāḥ sarve labhaṁte paramaṁ padam

मैं पुनः कमलापति की महिमा कहूँगा, जिसे सुनकर सभी मनुष्य परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 3 (padma.7.19.3)

वासुदेवस्य माहात्म्यं श्रुत्वा तृप्यंति वैष्णवाः । पाखण्डा न हि तृप्यंति नरके क्लेशभागिनः

vāsudevasya māhātmyaṁ śrutvā tṛpyaṁti vaiṣṇavāḥ pākhaṇḍā na hi tṛpyaṁti narake kleśabhāginaḥ

वासुदेव की महिमा सुनकर वैष्णव तृप्त होते हैं; परन्तु पाखंडी तृप्त नहीं होते, वे नरक में क्लेश भोगने वाले हैं।

श्लोक 4 (padma.7.19.4)

पाखण्डानां समीपे तु विष्णुमाहात्म्यमुत्तमम् । न वक्तव्यं द्विजश्रेष्ठ वक्तव्यं वैष्णवाग्रतः

pākhaṇḍānāṁ samīpe tu viṣṇumāhātmyamuttamam na vaktavyaṁ dvijaśreṣṭha vaktavyaṁ vaiṣṇavāgrataḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! पाखंडियों के समक्ष विष्णु की उत्तम महिमा नहीं कहनी चाहिए; वह वैष्णवों के समक्ष ही कहनी चाहिए।

श्लोक 5 (padma.7.19.5)

पूर्वं त्रेतायुगे विप्र उर्वीशुर्नाम जैमिने । आसीत्पापरतो नित्यं धर्मनिंदापरायणः

pūrvaṁ tretāyuge vipra urvīśurnāma jaimine āsītpāparato nityaṁ dharmaniṁdāparāyaṇaḥ

हे जैमिनि! पूर्वकाल में त्रेतायुग में उर्वीशु नामक एक ब्राह्मण था, जो सदा पाप में लीन रहता था और धर्म की निंदा में परायण था।

श्लोक 6 (padma.7.19.6)

ब्रह्मस्वहारी विप्रेन्द्र परस्त्रीगमनोद्यतः । गोमांसाशी सुरापी च वेश्याविभ्रमलोलुपः

brahmasvahārī viprendra parastrīgamanodyataḥ gomāṁsāśī surāpī ca veśyāvibhramalolupaḥ

हे विप्रेन्द्र! वह ब्राह्मण-धन का हरणकर्ता, परस्त्री-गमन में उद्यत, गोमांस खाने वाला, मदिरापान करने वाला और वेश्याओं की चंचलता का लोभी था।

श्लोक 7 (padma.7.19.7)

शरणागतहंता च परनिंदाकरः सदा । विश्वासघाती मित्रघ्नो ज्ञातिपीडाकरस्तथा

śaraṇāgatahaṁtā ca paraniṁdākaraḥ sadā viśvāsaghātī mitraghno jñātipīḍākarastathā

वह शरणागतों का हंता, सदा दूसरों की निंदा करने वाला, विश्वासघाती, मित्रों का घातक और अपने बांधवों को कष्ट देने वाला था।

श्लोक 8 (padma.7.19.8)

असत्यभाषी क्रूरश्च पाखंडजनसङ्गभाक् । वृत्तिच्छेदी द्विजातीनां न्यासापहारकस्तथा

asatyabhāṣī krūraśca pākhaṁḍajanasaṅgabhāk vṛtticchedī dvijātīnāṁ nyāsāpahārakastathā

वह असत्यभाषी, क्रूर, पाखंडियों की संगति करने वाला, ब्राह्मणों की जीविका काटने वाला और धरोहर हड़पने वाला भी था।

श्लोक 9 (padma.7.19.9)

तादृशं तं समालोक्य दुष्टं पापपरायणम् । आजग्मुर्ज्ञातयः सर्वे क्रुद्धास्तस्य निजंगृहम्

tādṛśaṁ taṁ samālokya duṣṭaṁ pāpaparāyaṇam ājagmurjñātayaḥ sarve kruddhāstasya nijaṁgṛham

उस दुष्ट, पापपरायण व्यक्ति को इस प्रकार देखकर, उसके समस्त बांधव क्रुद्ध होकर उसके घर आए।

श्लोक 10 (padma.7.19.10)

ज्ञातय ऊचुः - प्रतिष्ठोपार्जिता पूर्वैरस्माकं विमले कुले । सा प्रतिष्ठा त्वया मूढ विनाशं प्रतिनीयते

jñātaya ūcuḥ - pratiṣṭhopārjitā pūrvairasmākaṁ vimale kule sā pratiṣṭhā tvayā mūḍha vināśaṁ pratinīyate

बांधवों ने कहा — हमारे निर्मल कुल में हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित की गई जो प्रतिष्ठा है, हे मूर्ख! वह प्रतिष्ठा तुम्हारे द्वारा विनाश की ओर ले जाई जा रही है।

श्लोक 11 (padma.7.19.11)

धर्ममार्गं परित्यज्य कुरुषे पातकं सदा । मद्वंशकीर्तिहननं जातोऽसि ज्ञातिदुःखदः

dharmamārgaṁ parityajya kuruṣe pātakaṁ sadā madvaṁśakīrtihananaṁ jāto'si jñātiduḥkhadaḥ

तुम धर्म-मार्ग को त्यागकर सदा पाप ही करते हो; तुम हमारे वंश की कीर्ति के नाशक और बांधवों को दुःख देने वाले उत्पन्न हुए हो।

श्लोक 12 (padma.7.19.12)

अतिविस्मयदा सृष्टिर्विधातुर्मन्यते त्वयि । यस्मिन्सिंधौ शशी जातस्तत्र क्ष्वेडोद्भवोऽपि च

ativismayadā sṛṣṭirvidhāturmanyate tvayi yasminsiṁdhau śaśī jātastatra kṣveḍodbhavo'pi ca

विधाता की सृष्टि तुम्हारे विषय में अत्यंत आश्चर्यजनक प्रतीत होती है — जिस सागर से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, उसी से विष भी उत्पन्न हुआ।

श्लोक 13 (padma.7.19.13)

अहो शक्तिः कुपुत्राणां संख्यातुं न च शक्यते । अनेकैः पुरुषैः कीर्तिं संचितां हंति तत्क्षणात्

aho śaktiḥ kuputrāṇāṁ saṁkhyātuṁ na ca śakyate anekaiḥ puruṣaiḥ kīrtiṁ saṁcitāṁ haṁti tatkṣaṇāt

अहो! कुपुत्रों की शक्ति गिनी नहीं जा सकती — वह अनेक पुरुषों द्वारा संचित कीर्ति को क्षणभर में नष्ट कर देती है।

श्लोक 14 (padma.7.19.14)

जाते पुत्रोत्तमे वंशः श्रेष्ठः स्यादधमोऽपि च । पुत्रेधमेतु श्रेष्ठोऽपि वंशो गच्छति हीनताम्

jāte putrottame vaṁśaḥ śreṣṭhaḥ syādadhamo'pi ca putredhametu śreṣṭho'pi vaṁśo gacchati hīnatām

उत्तम पुत्र के जन्म से अधम वंश भी श्रेष्ठ हो जाता है, और अधम पुत्र से श्रेष्ठ वंश भी हीनता को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 15 (padma.7.19.15)

व्यास उवाच- इत्युक्त्वा ज्ञातयस्ते च तं सर्वे पापिनां वरम् । अपकीर्तिभयात्क्रुद्धास्तत्यजुः सहसा द्विज

vyāsa uvāca- ityuktvā jñātayaste ca taṁ sarve pāpināṁ varam apakīrtibhayātkruddhāstatyajuḥ sahasā dvija

व्यास जी ने कहा — हे द्विज! ऐसा कहकर उसके समस्त बांधवों ने, पापियों में श्रेष्ठ उसको, अपयश के भय से क्रुद्ध होकर तत्काल त्याग दिया।

श्लोक 16 (padma.7.19.16)

ज्ञातिभिः स परित्यक्तो जनैः सर्वैश्च धिक्कृतः । प्रपेदे दस्युतां दुःखी विभ्रष्टाखिलवैभवः

jñātibhiḥ sa parityakto janaiḥ sarvaiśca dhikkṛtaḥ prapede dasyutāṁ duḥkhī vibhraṣṭākhilavaibhavaḥ

बांधवों द्वारा त्यागा गया और सभी लोगों द्वारा धिक्कारा गया, वह समस्त वैभव से भ्रष्ट होकर दुःखी होकर डकैती करने लगा।

श्लोक 17 (padma.7.19.17)

तं दस्युकर्मकुर्वंतं निर्द्दयं परहिंसकम् । धृत्वा जनपदाः सर्वे भूपालाय न्यवेदयन्

taṁ dasyukarmakurvaṁtaṁ nirddayaṁ parahiṁsakam dhṛtvā janapadāḥ sarve bhūpālāya nyavedayan

डकैती करने वाले, निर्दय, दूसरों को कष्ट देने वाले उसे पकड़कर सभी नगरवासियों ने राजा के समक्ष प्रस्तुत किया।

श्लोक 18 (padma.7.19.18)

तेन भूमिभुजा तस्य पितृस्नेहाद्दिवजोत्तम । न हतोऽसौ दुराचारो निजदेशाद्वहिष्कृतः

tena bhūmibhujā tasya pitṛsnehāddivajottama na hato'sau durācāro nijadeśādvahiṣkṛtaḥ

हे द्विजोत्तम! उस राजा ने उसके पिता के स्नेह के कारण उस दुराचारी को मारा नहीं, बल्कि उसे अपने देश से निकाल दिया।

श्लोक 19 (padma.7.19.19)

ततोऽसौ वनमाश्रित्य दस्युभिः सह निर्द्दयः । पांथस्वहरणार्थाय तस्थौ बहुभिरुद्धतैः

tato'sau vanamāśritya dasyubhiḥ saha nirddayaḥ pāṁthasvaharaṇārthāya tasthau bahubhiruddhataiḥ

तब वह निर्दय व्यक्ति वन में शरण लेकर, अनेक उद्धत डाकुओं के साथ, राहगीरों का धन हरने के लिए ठहरा रहा।

श्लोक 20 (padma.7.19.20)

कदाचित्तटिनीतीरं दस्युभिः सह जैमिने । वनपर्यटने श्रांतो जगाम स्नानहेतवे

kadācittaṭinītīraṁ dasyubhiḥ saha jaimine vanaparyaṭane śrāṁto jagāma snānahetave

हे जैमिनि! एक बार डाकुओं के साथ वन में घूमते-घूमते थककर वह स्नान के लिए नदी के तट पर गया।

श्लोक 21 (padma.7.19.21)

तस्यां तटिन्यां भगवत्परिचर्यापरायणान् । असौ ददर्श दुष्टात्मा ब्राह्मणाकृतिनो बहून्

tasyāṁ taṭinyāṁ bhagavatparicaryāparāyaṇān asau dadarśa duṣṭātmā brāhmaṇākṛtino bahūn

उस नदी के तट पर उस दुष्टात्मा ने भगवान की सेवा में तत्पर अनेक ब्राह्मण-रूपधारियों को देखा।

श्लोक 22 (padma.7.19.22)

अथ ते ब्राह्मणाः सर्वे समाराध्य जनार्दनम् । अन्योन्यं कथयामासुर्विहिता अति कौतुकात्

atha te brāhmaṇāḥ sarve samārādhya janārdanam anyonyaṁ kathayāmāsurvihitā ati kautukāt

तब वे सभी ब्राह्मण जनार्दन की आराधना करके, अत्यंत कौतूहलवश आपस में यह बातें करने लगे।

श्लोक 23 (padma.7.19.23)

अद्य चंपकपुष्पाणि मया त्यक्तानि तानि वै । कश्चिद्वदति तांबूलं मया दत्तं मुरारये

adya caṁpakapuṣpāṇi mayā tyaktāni tāni vai kaścidvadati tāṁbūlaṁ mayā dattaṁ murāraye

"आज मैंने चंपा के फूल अर्पित किए हैं" — यह एक कहता; कोई कहता, "मैंने मुरारि को ताम्बूल अर्पित किया है।"

श्लोक 24 (padma.7.19.24)

न खादितव्यं तांबूलं कदाचिदपि जन्मनि । मयाद्य हरये दत्तं कदलीफलमुत्तमम्

na khāditavyaṁ tāṁbūlaṁ kadācidapi janmani mayādya haraye dattaṁ kadalīphalamuttamam

"इस जन्म में मुझे कभी ताम्बूल नहीं खाना चाहिए, क्योंकि आज मैंने हरि को उत्तम केले का फल अर्पित किया है।"

श्लोक 25 (padma.7.19.25)

जन्मजन्मानि च मया भक्ष्यं च कदलीफलम् । कोऽपि वक्ति मया दत्तं हरये दाडिमीफलम्

janmajanmāni ca mayā bhakṣyaṁ ca kadalīphalam ko'pi vakti mayā dattaṁ haraye dāḍimīphalam

"जन्म-जन्मांतर तक मुझे केले का फल ही खाना चाहिए" — एक ने कहा; कोई कहता, "मैंने हरि को अनार का फल अर्पित किया है।"

श्लोक 26 (padma.7.19.26)

कोऽपि वक्ति मया दत्तं रसालफलमुत्तमम् । अन्योऽन्यमेतद्वदतां तेषां श्रुत्वा वचांसि च

ko'pi vakti mayā dattaṁ rasālaphalamuttamam anyo'nyametadvadatāṁ teṣāṁ śrutvā vacāṁsi ca

कोई कहता, "मैंने उत्तम आम का फल अर्पित किया है।" इस प्रकार आपस में बातें करते हुए उनकी बातें सुनकर —

श्लोक 27 (padma.7.19.27)

उर्वीशुश्चिन्तयामास किं प्रदास्यामि विष्णवे । संसारे यानि वस्तूनि भक्ष्याणि संति तान्यहम्

urvīśuścintayāmāsa kiṁ pradāsyāmi viṣṇave saṁsāre yāni vastūni bhakṣyāṇi saṁti tānyaham

— उर्वीशु सोचने लगा, "मैं विष्णु को क्या अर्पित करूँ? संसार में जो भी भक्ष्य वस्तुएँ हैं, वे सब —"

श्लोक 28 (padma.7.19.28)

न हि शक्नोमि संत्यक्तुं किं दास्यामि मुरारये । नित्यं वनांतरस्थोऽहं चौरो राजभयाकुलः

na hi śaknomi saṁtyaktuṁ kiṁ dāsyāmi murāraye nityaṁ vanāṁtarastho'haṁ cauro rājabhayākulaḥ

"— मैं उन्हें त्यागने में असमर्थ हूँ, मुरारि को क्या दूँ? मैं तो सदा वन में रहने वाला चोर हूँ, राजा के भय से व्याकुल।"

श्लोक 29 (padma.7.19.29)

शकटारोहणे नास्ति ह्यधिकारः कदापि मे । व्यास उवाच- इत्युक्त्वा दस्युना तेन भूयोभूयो द्विजोत्तम

śakaṭārohaṇe nāsti hyadhikāraḥ kadāpi me vyāsa uvāca- ityuktvā dasyunā tena bhūyobhūyo dvijottama

"गाड़ी पर चढ़ने का भी मुझे कभी कोई अधिकार नहीं है।" व्यास जी ने कहा — हे द्विजोत्तम! ऐसा बार-बार कहकर उस डाकू ने —

श्लोक 30 (padma.7.19.30)

शकटं हरये दत्तं चतुर्वर्गप्रदायिने । अथ तेब्राह्मणाः सर्वे जग्मुर्विप्र यथागताः

śakaṭaṁ haraye dattaṁ caturvargapradāyine atha tebrāhmaṇāḥ sarve jagmurvipra yathāgatāḥ

— मन में उस गाड़ी को चारों पुरुषार्थ देने वाले हरि को अर्पित कर दिया। तब वे सभी ब्राह्मण जैसे आए थे, वैसे ही चले गए।

श्लोक 31 (padma.7.19.31)

सोऽपि दस्युर्दस्युभिश्च जगाम निजमाश्रयम् । एकदा गुडकंडोलं तेनैव खलु वर्त्मना

so'pi dasyurdasyubhiśca jagāma nijamāśrayam ekadā guḍakaṁḍolaṁ tenaiva khalu vartmanā

वह डाकू भी अपने साथी डाकुओं के साथ अपने ठिकाने को चला गया। एक बार उसी मार्ग से गुड़ की एक पिटारी —

श्लोक 32 (padma.7.19.32)

गृहीत्वा पथिकः कश्चित्काकीमंडलमागतः । ततोऽसौ सहसा दस्युर्निर्भयः परहिंसकः

gṛhītvā pathikaḥ kaścitkākīmaṁḍalamāgataḥ tato'sau sahasā dasyurnirbhayaḥ parahiṁsakaḥ

— लेकर कोई राहगीर काकीमंडल नामक स्थान पर आया। तब वह निर्भय, दूसरों को कष्ट देने वाला डाकू सहसा —

श्लोक 33 (padma.7.19.33)

जहार गुडकंडोलमध्वनीनस्य तस्य च । अथ ते दस्यवश्चक्रुर्गुडकंडोल भंजनम्

jahāra guḍakaṁḍolamadhvanīnasya tasya ca atha te dasyavaścakrurguḍakaṁḍola bhaṁjanam

— उस राहगीर की गुड़ की पिटारी छीन ली। तब उन डाकुओं ने उस गुड़ की पिटारी को खोल दिया।

श्लोक 34 (padma.7.19.34)

उर्वीशुश्चापतद्भागे शकटं गुडनिर्मितम् । उर्वीशुः शकटं गौडं समासाद्य द्विजोत्तम

urvīśuścāpatadbhāge śakaṭaṁ guḍanirmitam urvīśuḥ śakaṭaṁ gauḍaṁ samāsādya dvijottama

उस बँटवारे में उर्वीशु के हिस्से में गुड़ से बना एक छोटा गाड़ी-जैसा टुकड़ा आया। हे द्विजोत्तम! उर्वीशु उस गुड़ की गाड़ी को पाकर —

श्लोक 35 (padma.7.19.35)

मनसा चिंतयामास वचःस्मरणपूर्वकम् । अनो मया पुरा दत्तं स्वयमेव मुरारये

manasā ciṁtayāmāsa vacaḥsmaraṇapūrvakam ano mayā purā dattaṁ svayameva murāraye

— मन में उन वचनों का स्मरण करते हुए विचार करने लगा, "मैंने पहले ही स्वयं मुरारि को गाड़ी अर्पित कर दी थी।"

श्लोक 36 (padma.7.19.36)

तस्मादनो न मे ग्राह्यं कदाचिदिह जन्मनि । विचिन्त्येति हृदा दातुं तदनो गुडनिर्मितम्

tasmādano na me grāhyaṁ kadācidiha janmani vicintyeti hṛdā dātuṁ tadano guḍanirmitam

"इसलिए इस जन्म में गाड़ी मुझे कभी ग्रहण नहीं करनी चाहिए।" ऐसा हृदय में विचार कर उसने उस गुड़ से बनी गाड़ी को —

श्लोक 37 (padma.7.19.37)

दत्तं विप्राय कस्मैचिन्माधवप्रीतिहेतवे । तां भक्तिं तस्य विज्ञाय महापातकिनो द्विज

dattaṁ viprāya kasmaicinmādhavaprītihetave tāṁ bhaktiṁ tasya vijñāya mahāpātakino dvija

— माधव को प्रसन्न करने के हेतु किसी ब्राह्मण को दे दिया। हे द्विज! उस महापापी की उस भक्ति को जानकर —

श्लोक 38 (padma.7.19.38)

जहार सकलं पापं सद्यः प्रीतो जनार्दनः । तस्मिन्नेव दिने विप्र प्रविश्य च महावनम्

jahāra sakalaṁ pāpaṁ sadyaḥ prīto janārdanaḥ tasminneva dine vipra praviśya ca mahāvanam

— प्रसन्न होकर जनार्दन ने तत्काल उसके समस्त पाप हर लिए। उसी दिन, हे विप्र! उस महावन में प्रवेश करने पर —

श्लोक 39 (padma.7.19.39)

हतः पौरजनैः सर्वैरथ क्रुद्धैः स उर्विशुः । भगवानथ तं नेतुं विमानं स्वर्णनिर्मितम्

hataḥ paurajanaiḥ sarvairatha kruddhaiḥ sa urviśuḥ bhagavānatha taṁ netuṁ vimānaṁ svarṇanirmitam

— वह उर्वीशु, नगरवासियों द्वारा क्रुद्ध होकर मारा गया। तब भगवान ने उसे ले जाने के लिए सुवर्ण-निर्मित विमान —

श्लोक 40 (padma.7.19.40)

दूतांश्च प्रेषयामास नानाभरणभूषितान् । अथ ते भगवद्दूतास्तमुर्वीशुं गतैनसम्

dūtāṁśca preṣayāmāsa nānābharaṇabhūṣitān atha te bhagavaddūtāstamurvīśuṁ gatainasam

— तथा नाना आभूषणों से सुसज्जित अपने दूतों को भेजा। तब भगवान के उन दूतों ने पाप-रहित हो चुके उस उर्वीशु को —

श्लोक 41 (padma.7.19.41)

समारोप्य विमाने तं सद्यो जग्मुः पुरं हरेः । ततौऽसौ हरिसान्निध्यं प्राप्य पुण्यात्मनां वरः

samāropya vimāne taṁ sadyo jagmuḥ puraṁ hareḥ tatau'sau harisānnidhyaṁ prāpya puṇyātmanāṁ varaḥ

— विमान पर बिठाकर तुरंत हरि के धाम को ले गए। तब वह पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ बनकर हरि की सन्निधि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 42 (padma.7.19.42)

पुनर्मन्वंतरशतं स्थित्वा केशवसन्निधिम् । परमं ज्ञानमासाद्य स विवेश तनुं हरेः

punarmanvaṁtaraśataṁ sthitvā keśavasannidhim paramaṁ jñānamāsādya sa viveśa tanuṁ hareḥ

फिर सौ मन्वंतरों तक केशव की सन्निधि में रहकर, परम ज्ञान प्राप्त कर, वह हरि के ही शरीर में विलीन हो गया।

श्लोक 43 (padma.7.19.43)

व्यास उवाच- येन केनाप्युपायेन हरिभक्तिकरो नरः । संसारजलधेः पारं राजहंस इव व्रजन्

vyāsa uvāca- yena kenāpyupāyena haribhaktikaro naraḥ saṁsārajaladheḥ pāraṁ rājahaṁsa iva vrajan

व्यास जी ने कहा — जिस किसी भी उपाय से हरि की भक्ति करने वाला मनुष्य, राजहंस के समान, संसार-सागर के पार जाता है —

श्लोक 44 (padma.7.19.44)

क्षणमेव हरेर्भक्तिर्वर्तते यस्य चेतसि । तत्पदं परमं याति स पापात्मापि गच्छति

kṣaṇameva harerbhaktirvartate yasya cetasi tatpadaṁ paramaṁ yāti sa pāpātmāpi gacchati

जिसके चित्त में हरि की भक्ति क्षणभर के लिए भी बनी रहती है, पापी होते हुए भी वह उस परम पद को जाता है, वहीं पहुँचता है।

श्लोक 45 (padma.7.19.45)

एकमप्युत्तमं वस्तु दत्वाऽसौ तन्मुरारये । स्वयमेव हि भोक्तव्यं पश्चात्पापोपशांतये

ekamapyuttamaṁ vastu datvā'sau tanmurāraye svayameva hi bhoktavyaṁ paścātpāpopaśāṁtaye

मुरारि को एक भी उत्तम वस्तु अर्पित करके, पाप की शांति के लिए, उसे स्वयं ही उसके बाद भोगना चाहिए।

श्लोक 46 (padma.7.19.46)

यद्वस्तु हरये दत्तं तच्च दद्याद्दिवजातये । किंचिच्छेषं न भोक्तव्यं तस्यावश्यं स्वयं बुधैः

yadvastu haraye dattaṁ tacca dadyāddivajātaye kiṁciccheṣaṁ na bhoktavyaṁ tasyāvaśyaṁ svayaṁ budhaiḥ

जो वस्तु हरि को अर्पित की गई हो, उसे ब्राह्मण को भी देनी चाहिए; बुद्धिमानों को उसका कुछ भी शेष स्वयं भोगना उचित नहीं।

श्लोक 47 (padma.7.19.47)

वस्तूनि ब्राह्मणश्रेष्ठमिष्टानि यानि कानि च । अदत्वा विष्णवे तानि न भोक्तव्यानि वैष्णवैः

vastūni brāhmaṇaśreṣṭhamiṣṭāni yāni kāni ca adatvā viṣṇave tāni na bhoktavyāni vaiṣṇavaiḥ

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! जो भी वस्तुएँ प्रिय हों, उन्हें विष्णु को अर्पित किए बिना वैष्णवों को भोगनी नहीं चाहिए।

श्लोक 48 (padma.7.19.48)

विष्णुनैवेद्यमाहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम् । सेतिहासं पुनर्वच्मि शृणु विप्र समाहितः

viṣṇunaivedyamāhātmyaṁ sarvapāpapraṇāśanam setihāsaṁ punarvacmi śṛṇu vipra samāhitaḥ

विष्णु के नैवेद्य की महिमा समस्त पापों का नाश करने वाली है; उसे मैं फिर से इतिहास सहित कहता हूँ, हे विप्र! एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 49 (padma.7.19.49)

आसीत्सर्वजनिर्नाम ब्राह्मणः शुद्धवंशजः । शांतो दांतो दयायुक्तो गुरुब्राह्मणपूजकः

āsītsarvajanirnāma brāhmaṇaḥ śuddhavaṁśajaḥ śāṁto dāṁto dayāyukto gurubrāhmaṇapūjakaḥ

सर्वजनि नामक एक ब्राह्मण था, जो शुद्ध वंश में उत्पन्न, शांत, संयमी, दयायुक्त और गुरुजनों तथा ब्राह्मणों का पूजक था।

श्लोक 50 (padma.7.19.50)

हरेः पूजापरश्चैव हरिस्मरणतत्परः । प्रपन्नक्लेशविध्वंसी सत्यवादी जितेन्द्रियः

hareḥ pūjāparaścaiva harismaraṇatatparaḥ prapannakleśavidhvaṁsī satyavādī jitendriyaḥ

वह हरि की पूजा में तत्पर, हरि-स्मरण में लीन, शरणागतों के क्लेश को नष्ट करने वाला, सत्यवादी और जितेन्द्रिय था।

श्लोक 51 (padma.7.19.51)

प्रातःस्नायी निजाचारग्राही हिंसा विवर्जितः । एकादशीव्रतरतो ज्ञातिपूजापरायणः

prātaḥsnāyī nijācāragrāhī hiṁsā vivarjitaḥ ekādaśīvratarato jñātipūjāparāyaṇaḥ

वह प्रातःकाल स्नान करने वाला, अपने आचार का पालन करने वाला, हिंसा से रहित, एकादशी-व्रत में लीन और अपने बांधवों के आदर-सत्कार में परायण था।

श्लोक 52 (padma.7.19.52)

कदाचित्स द्विजश्रेष्ठः स्वप्नेऽपश्यच्च केशवम् । श्यामं विरजपद्माक्षं स्मेरास्यं पीतवाससम्

kadācitsa dvijaśreṣṭhaḥ svapne'paśyacca keśavam śyāmaṁ virajapadmākṣaṁ smerāsyaṁ pītavāsasam

एक बार उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने स्वप्न में केशव का दर्शन किया — श्यामवर्ण, निर्मल कमल के समान नेत्रों वाले, मुस्कुराते हुए मुखवाले, पीताम्बरधारी।

श्लोक 53 (padma.7.19.53)

स्वर्णकुण्डलमञ्जीरकिरीटोज्ज्वलविग्रहम् । कौस्तुभोद्भासितोरस्कं वनमालाविभूषितम्

svarṇakuṇḍalamañjīrakirīṭojjvalavigraham kaustubhodbhāsitoraskaṁ vanamālāvibhūṣitam

सुवर्ण-कुण्डल, नूपुर और मुकुट से उद्भासित शरीर वाले, कौस्तुभ-मणि से देदीप्यमान वक्षस्थल वाले, वनमाला से विभूषित।

श्लोक 54 (padma.7.19.54)

चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदापद्मधरं प्रभुम् । समस्तैर्लक्षणैर्युक्तं स्वर्णयज्ञोपवीतिनम्

caturbāhuṁ śaṅkhacakragadāpadmadharaṁ prabhum samastairlakṣaṇairyuktaṁ svarṇayajñopavītinam

चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए हुए प्रभु, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त, सुवर्ण के यज्ञोपवीत धारण किए हुए।

श्लोक 55 (padma.7.19.55)

संप्राप्य दर्शनं स्वप्ने स विप्रो जगतीपतेः । कृताञ्जलिस्तमस्तौषीद्रोमांचिततनुर्मुदा

saṁprāpya darśanaṁ svapne sa vipro jagatīpateḥ kṛtāñjalistamastauṣīdromāṁcitatanurmudā

स्वप्न में जगत्पति का यह दर्शन पाकर, उस ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर, आनंद से रोमांचित शरीर के साथ उनकी स्तुति की।

श्लोक 56 (padma.7.19.56)

तुभ्यं नमोऽस्तु जगतः सकलस्यभर्त्त्रे सल्लोकशोकभयरोगविनाशनाय । नारायणाय कमलाहृदयप्रियाय धर्मार्थकामपरमामृतदाय तुभ्यम्

tubhyaṁ namo'stu jagataḥ sakalasyabharttre sallokaśokabhayarogavināśanāya nārāyaṇāya kamalāhṛdayapriyāya dharmārthakāmaparamāmṛtadāya tubhyam

आपको नमस्कार है, जो समस्त जगत् के पालनकर्ता हैं, सज्जनों के शोक, भय और रोग का नाश करने वाले हैं; हे नारायण, कमला के हृदय के प्रिय, धर्म-अर्थ-काम तथा परम अमृत को देने वाले, आपको नमस्कार है।

श्लोक 57 (padma.7.19.57)

पापानि चैव सकलानि मया कृतानि मत्तेन मोहवशगेन सदा मुरारे । तस्माद्बिभेमि जगदंबुनिधेर्गभीरान्मामुद्धरस्व निजभक्तितरीं प्रदाय

pāpāni caiva sakalāni mayā kṛtāni mattena mohavaśagena sadā murāre tasmādbibhemi jagadaṁbunidhergabhīrānmāmuddharasva nijabhaktitarīṁ pradāya

हे मुरारे! मैंने, मोह के वशीभूत होकर, सदा समस्त पाप किए हैं; इसीलिए मैं इस गहरे जगत्-सागर से भयभीत हूँ। अपनी भक्ति की नौका देकर मुझे इससे उबार लीजिए।

श्लोक 58 (padma.7.19.58)

जानामि यद्यपि हरे दुरितं मनुष्यो व्यामोहमाशुचलभे भुवि कैटभारे । पापं तथापि च मुदा सततं करोमि तस्मान्न कोऽप्यहमिवास्ति जनो विमूढः

jānāmi yadyapi hare duritaṁ manuṣyo vyāmohamāśucalabhe bhuvi kaiṭabhāre pāpaṁ tathāpi ca mudā satataṁ karomi tasmānna ko'pyahamivāsti jano vimūḍhaḥ

हे हरे! हे कैटभारे! यद्यपि मनुष्य जानता है कि पाप से शीघ्र ही व्यामोह उत्पन्न होता है, फिर भी मैं सदा हर्षपूर्वक पाप ही करता हूँ; इसलिए मेरे समान मूर्ख इस पृथ्वी पर और कोई नहीं है।

श्लोक 59 (padma.7.19.59)

पुण्यद्रुमः सुखफलं सहसैव धत्ते किं वेद्मि नेति नृहरे कृतपातकोऽहम् । पुष्पद्रुमार्पणविधौ न ममास्ति वित्तं नाथ प्रसीद भगवन्किमहं करोमि

puṇyadrumaḥ sukhaphalaṁ sahasaiva dhatte kiṁ vedmi neti nṛhare kṛtapātako'ham puṣpadrumārpaṇavidhau na mamāsti vittaṁ nātha prasīda bhagavankimahaṁ karomi

हे नृहरे! क्या मैं नहीं जानता कि पुण्य-वृक्ष तुरंत ही सुखरूपी फल देता है? फिर भी मैं पापी ही रहा हूँ। हे नाथ! फूल और वृक्ष अर्पित करने की विधि के लिए भी मेरे पास धन नहीं है; हे भगवन्! प्रसन्न होइए, मैं क्या करूँ?

श्लोक 60 (padma.7.19.60)

त्वत्पादपद्मयुगलं परमामृतस्य स्थानं विहाय मम चित्तमधुव्रतोऽयम् । नारीमुखं व्रजति देवमृतिप्रदं यच्छ्लेष्मप्रकीर्णमनिशं कमलभ्रमेण

tvatpādapadmayugalaṁ paramāmṛtasya sthānaṁ vihāya mama cittamadhuvrato'yam nārīmukhaṁ vrajati devamṛtipradaṁ yacchleṣmaprakīrṇamaniśaṁ kamalabhrameṇa

हे देव! आपके चरण-कमल-युगल, जो परम अमृत का स्थान हैं, उन्हें छोड़कर मेरा यह मन-रूपी भ्रमर मृत्यु देने वाले, कफ से सदा भरे हुए स्त्री-मुख की ओर, कमल के भ्रम से जा पहुँचता है।

श्लोक 61 (padma.7.19.61)

पाणिःप्रदानरहितोऽनृतभाषिवक्त्रं कर्णौ च पापश्रवणाय सदैव दक्षौ । दोषानिमान्मम हरे हर सेवकस्य यस्मान्नु नाथ शरणागतदोषहंता

pāṇiḥpradānarahito'nṛtabhāṣivaktraṁ karṇau ca pāpaśravaṇāya sadaiva dakṣau doṣānimānmama hare hara sevakasya yasmānnu nātha śaraṇāgatadoṣahaṁtā

हे हरे! मेरे हाथ दान-रहित हैं, मेरा मुख असत्य बोलने वाला है, मेरे कान सदा पाप सुनने में ही दक्ष हैं — अपने इस सेवक के इन दोषों को हर लीजिए, क्योंकि हे नाथ! आप ही शरणागतों के दोषों को हरने वाले हैं।

श्लोक 62 (padma.7.19.62)

संसारघोरजलधौ नृहरे कदाचित्त्वद्भक्तिनौरिह मया सुदृढा च लब्धा । तत्रापि दैववशगोऽहमहो दुरात्मा वर्तेत एव सततं ममदुःखकालः

saṁsāraghorajaladhau nṛhare kadācittvadbhaktinauriha mayā sudṛḍhā ca labdhā tatrāpi daivavaśago'hamaho durātmā varteta eva satataṁ mamaduḥkhakālaḥ

हे नृहरे! इस घोर संसार-सागर में मैंने कभी आपकी भक्ति-रूपी दृढ़ नौका प्राप्त भी कर ली, फिर भी अहो! दैव के वशीभूत, दुरात्मा मैं, सदा दुःख का ही समय भोगता रहा।

श्लोक 63 (padma.7.19.63)

संसारपारगमनाय लसत्पथोऽस्ति किं सर्वदुःखरहितः सदयः प्रसन्नः । अंधीकृतस्य मम मोहमहत्तमिस्रैर्दृष्टिस्त्वयीह न कदापि च याति विष्णो

saṁsārapāragamanāya lasatpatho'sti kiṁ sarvaduḥkharahitaḥ sadayaḥ prasannaḥ aṁdhīkṛtasya mama mohamahattamisrairdṛṣṭistvayīha na kadāpi ca yāti viṣṇo

हे विष्णु! क्या संसार को पार करने का कोई ऐसा उज्ज्वल, समस्त दुःखों से रहित मार्ग है, जिस पर आप दयालु और प्रसन्न हों? मोह के महान अंधकार से अंधे हुए मेरी दृष्टि आप पर कभी नहीं पहुँच पाती।

श्लोक 64 (padma.7.19.64)

पापात्मनोऽपि मम चित्तमिदं मुरारे नष्टं विनष्टजनकष्टविनष्टिकारि । यस्त्वां समस्तसुरवंदितपादपद्म स्वप्नेऽपि केशिमथनाद्य विभो समीक्षे

pāpātmano'pi mama cittamidaṁ murāre naṣṭaṁ vinaṣṭajanakaṣṭavinaṣṭikāri yastvāṁ samastasuravaṁditapādapadma svapne'pi keśimathanādya vibho samīkṣe

हे मुरारे! पापी होते हुए भी, दुःखी जनों के कष्ट को नाश करने वाला मेरा यह मन नष्ट हो चुका था; फिर भी हे केशी-मथन! हे विभो! समस्त देवताओं द्वारा वंदित चरण-कमल वाले आपको आज मैंने स्वप्न में भी देख लिया।

श्लोक 65 (padma.7.19.65)

व्यास उवाच- इति तेन स्तुतो देवो भगवान्कमलापतिः । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः संसारार्णवतारकः

vyāsa uvāca- iti tena stuto devo bhagavānkamalāpatiḥ uvāca vākyaṁ vākyajñaḥ saṁsārārṇavatārakaḥ

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार उसके द्वारा स्तुति किए जाने पर, वाणी के ज्ञाता, संसार-सागर से पार उतारने वाले भगवान कमलापति ने यह वचन कहा।

श्लोक 66 (padma.7.19.66)

श्रीभगवानुवाच- भक्तिभिस्तव विप्रेंद्र तुष्टोऽहं नित्यमेव च । तस्मात्तवाचिरेणैव सर्वं भद्रं भविष्यति

śrībhagavānuvāca- bhaktibhistava vipreṁdra tuṣṭo'haṁ nityameva ca tasmāttavācireṇaiva sarvaṁ bhadraṁ bhaviṣyati

श्री भगवान ने कहा — हे विप्रेन्द्र! तुम्हारी भक्ति से मैं सदा ही प्रसन्न हूँ; इसलिए तुम्हारा शीघ्र ही सब कुछ कल्याणमय होगा।

श्लोक 67 (padma.7.19.67)

पापिनोऽपि तवोद्धारो मया पूर्वं कृतो द्विज । अधुना मम भक्तोऽसि न विपत्तिर्भविष्यति

pāpino'pi tavoddhāro mayā pūrvaṁ kṛto dvija adhunā mama bhakto'si na vipattirbhaviṣyati

हे द्विज! पापी होते हुए भी तुम्हारा उद्धार मैंने पहले ही कर दिया है; अब तुम मेरे भक्त हो, तुम पर कोई विपत्ति नहीं आएगी।

श्लोक 68 (padma.7.19.68)

ब्राह्मण उवाच। कोऽहं तस्थौ पुरा विष्णो किं वा पापं मया कृतम् । पापिनोऽपि ममोद्धारः कथं पूर्वं त्वया कृतः

brāhmaṇa uvāca ko'haṁ tasthau purā viṣṇo kiṁ vā pāpaṁ mayā kṛtam pāpino'pi mamoddhāraḥ kathaṁ pūrvaṁ tvayā kṛtaḥ

ब्राह्मण ने कहा — हे विष्णु! पूर्वकाल में मैं कौन था? मैंने क्या पाप किया था? पापी होते हुए भी मेरा उद्धार आपने पहले ही कैसे किया?

श्लोक 69 (padma.7.19.69)

संसारेऽस्मिन्कथं जातो जनितोऽहं कथं त्वया । एतत्सर्वं विभो ब्रूहि यतस्त्वं सदयः सदा

saṁsāre'sminkathaṁ jāto janito'haṁ kathaṁ tvayā etatsarvaṁ vibho brūhi yatastvaṁ sadayaḥ sadā

इस संसार में मैं कैसे जन्मा? आपके द्वारा मुझे कैसे जन्म दिया गया? हे विभो! यह सब कहिए, क्योंकि आप सदा दयालु हैं।

श्लोक 70 (padma.7.19.70)

श्रीभगवानुवाच- अप्रकाश्यमिदं गुह्यं यद्यपि द्विजसत्तम । तथापि तव वात्सल्यान्निगदामि निशामय

śrībhagavānuvāca- aprakāśyamidaṁ guhyaṁ yadyapi dvijasattama tathāpi tava vātsalyānnigadāmi niśāmaya

श्री भगवान ने कहा — हे द्विजसत्तम! यद्यपि यह रहस्य प्रकट करने योग्य नहीं है, फिर भी तुम्हारे प्रति स्नेहवश मैं इसे कहता हूँ, सुनो।

श्लोक 71 (padma.7.19.71)

पुरा त्वं ब्राह्मणश्रेष्ठ पक्षिवंशसमुद्भवः । भूतोऽसि भूमिभागेषु निजकर्मविपाकतः

purā tvaṁ brāhmaṇaśreṣṭha pakṣivaṁśasamudbhavaḥ bhūto'si bhūmibhāgeṣu nijakarmavipākataḥ

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! पूर्वकाल में तुम पक्षी-कुल में उत्पन्न होकर, अपने ही कर्मों के फलस्वरूप, पृथ्वी के विभिन्न भागों में विचरण करते थे।

श्लोक 72 (padma.7.19.72)

क्षुधया तृषया वापि सततं व्याकुलो भवान् । बभ्राम भक्षयन्कीटान्निर्झरोष्णोदकं तथा

kṣudhayā tṛṣayā vāpi satataṁ vyākulo bhavān babhrāma bhakṣayankīṭānnirjharoṣṇodakaṁ tathā

भूख और प्यास से सदा व्याकुल होकर, तुम कीड़ों को खाते हुए तथा झरनों का गर्म जल पीते हुए भटकते रहते थे।

श्लोक 73 (padma.7.19.73)

नानादुःखं सदा भुंजन्पक्षियोनौ समुद्भवः । चतुर्वर्षसहस्राणि स्थितोऽसि त्वं पुरा क्षितौ

nānāduḥkhaṁ sadā bhuṁjanpakṣiyonau samudbhavaḥ caturvarṣasahasrāṇi sthito'si tvaṁ purā kṣitau

पक्षि-योनि में उत्पन्न होकर, सदा नाना दुःख भोगते हुए, तुम पूर्वकाल में चार हजार वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहे।

श्लोक 74 (padma.7.19.74)

एकदा कुलभद्राख्यो ब्राह्मणः सर्वतत्ववित् । पूजयामास मां भक्त्या नैवेद्याद्यैर्नदीतटे

ekadā kulabhadrākhyo brāhmaṇaḥ sarvatatvavit pūjayāmāsa māṁ bhaktyā naivedyādyairnadītaṭe

एक बार कुलभद्र नामक, समस्त तत्वों का ज्ञाता एक ब्राह्मण ने नदी के तट पर नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की।

श्लोक 75 (padma.7.19.75)

समभ्यर्च्य स विप्रेंद्रो मम नैवेद्यतंदुलम् । ययौ तत्रैव निक्षिप्य भूय एव निजं गृहम्

samabhyarcya sa vipreṁdro mama naivedyataṁdulam yayau tatraiva nikṣipya bhūya eva nijaṁ gṛham

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने भलीभाँति पूजा करके, मेरे लिए अर्पित नैवेद्य के चावल को वहीं रखकर, अपने घर को लौट गया।

श्लोक 76 (padma.7.19.76)

ततो वृक्षात्समागत्य क्षुधिना पक्षिणा त्वया । मम नैवेद्यसंबंधि भक्षितं सर्वतंदुलम्

tato vṛkṣātsamāgatya kṣudhinā pakṣiṇā tvayā mama naivedyasaṁbaṁdhi bhakṣitaṁ sarvataṁdulam

तब भूखे पक्षी-रूप तुमने पेड़ से आकर, मुझे अर्पित उन सारे नैवेद्य-चावलों को खा लिया।

श्लोक 77 (padma.7.19.77)

भुक्त्वैव सद्यो मुक्तोऽसि पातकैरतिदारुणैः । कदाचित्प्राप्तकालस्त्वं कालधर्मगतो द्विज

bhuktvaiva sadyo mukto'si pātakairatidāruṇaiḥ kadācitprāptakālastvaṁ kāladharmagato dvija

उसे खाते ही तुम तत्काल अत्यंत भयंकर पापों से मुक्त हो गए। हे द्विज! कालांतर में एक बार तुम काल के अधीन होकर मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 78 (padma.7.19.78)

त्वामानेतुं मया दूताः प्रेषिताः सर्वथा निजाः । ततो रथे समारोप्य भवंतं नष्टकल्मषम्

tvāmānetuṁ mayā dūtāḥ preṣitāḥ sarvathā nijāḥ tato rathe samāropya bhavaṁtaṁ naṣṭakalmaṣam

तुम्हें लाने के लिए मैंने पूर्ण रूप से अपने ही दूत भेजे। तब पापरहित हो चुके तुम्हें रथ पर बिठाकर —

श्लोक 79 (padma.7.19.79)

सद्यो दूतगणाः सर्वे समायाताः परं पदम् । युगकोटिसहस्राणि स्थितोऽसि मम सन्निधौ

sadyo dūtagaṇāḥ sarve samāyātāḥ paraṁ padam yugakoṭisahasrāṇi sthito'si mama sannidhau

— वे समस्त दूत तत्काल परम पद को ले आए। तुम करोड़ों-हजारों युगों तक मेरी सन्निधि में रहे।

श्लोक 80 (padma.7.19.80)

भुंजन्सुखानि सर्वाणि दुर्ल्लभानि सुरैरपि । ततो यातोऽसि विप्रेन्द्र विशुद्धे ब्राह्मणान्वये

bhuṁjansukhāni sarvāṇi durllabhāni surairapi tato yāto'si viprendra viśuddhe brāhmaṇānvaye

वहाँ तुमने देवताओं को भी दुर्लभ समस्त सुखों को भोगा। फिर, हे विप्रेन्द्र! तुम एक विशुद्ध ब्राह्मण-कुल में जन्मे।

श्लोक 81 (padma.7.19.81)

तत्रापि मयि भक्तिस्ते जातातिसुदृढा पुनः । क्रियायोगेन मां नित्यं समाराध्य द्विजोत्तम

tatrāpi mayi bhaktiste jātātisudṛḍhā punaḥ kriyāyogena māṁ nityaṁ samārādhya dvijottama

वहाँ भी तुम्हारी मुझमें भक्ति पुनः अत्यंत दृढ़ हुई; हे द्विजोत्तम! क्रियायोग द्वारा नित्य मेरी भलीभाँति आराधना करते हुए —

श्लोक 82 (padma.7.19.82)

आयुषोंते मत्प्रसादान्मामकं पदमाप्स्यसि । यदा तुष्टोऽस्म्यहं विप्र सपापात्मापि मुक्तिभाक्

āyuṣoṁte matprasādānmāmakaṁ padamāpsyasi yadā tuṣṭo'smyahaṁ vipra sapāpātmāpi muktibhāk

— आयु के अंत में मेरी कृपा से तुम मेरे ही पद को प्राप्त करोगे। हे विप्र! जब मैं प्रसन्न हो जाता हूँ, तब पापी भी मुक्ति का भागी बन जाता है।

श्लोक 83 (padma.7.19.83)

कदाचिद्यस्य रुष्टोस्मि पुण्यात्मापि च पापभाक् । तस्माद्ब्राह्मण भद्रं ते भक्तोऽसि मम सुव्रत

kadācidyasya ruṣṭosmi puṇyātmāpi ca pāpabhāk tasmādbrāhmaṇa bhadraṁ te bhakto'si mama suvrata

और जिस पर मैं कभी रुष्ट हो जाता हूँ, वह पुण्यात्मा होते हुए भी पाप का भागी बन जाता है। इसलिए हे ब्राह्मण! तुम्हारा कल्याण हो, हे उत्तम व्रतधारी! तुम मेरे भक्त हो।

श्लोक 84 (padma.7.19.84)

दास्यामि ते परं स्थानं यदलभ्यं सुरैरपि । ब्राह्मण उवाच- त्वत्प्रसादाच्छ्रुतं नाथ पूर्ववृत्तांतमात्मनः

dāsyāmi te paraṁ sthānaṁ yadalabhyaṁ surairapi brāhmaṇa uvāca- tvatprasādācchrutaṁ nātha pūrvavṛttāṁtamātmanaḥ

मैं तुम्हें वह परम स्थान दूँगा, जो देवताओं को भी अप्राप्य है। ब्राह्मण ने कहा — हे नाथ! आपकी कृपा से मैंने अपना पूर्ववृत्तांत सुन लिया।

श्लोक 85 (padma.7.19.85)

इदानीं श्रोतुमिच्छामि यत्किञ्चिद्ब्रूहि तत्प्रभो । कस्य तुष्टोऽसि देवेन्द्र कस्य रुष्टोऽसि वा प्रभो

idānīṁ śrotumicchāmi yatkiñcidbrūhi tatprabho kasya tuṣṭo'si devendra kasya ruṣṭo'si vā prabho

अब मैं और सुनना चाहता हूँ, हे प्रभो! कुछ और भी कहिए। हे देवेन्द्र, हे प्रभो! आप किस पर प्रसन्न होते हैं, और किस पर रुष्ट होते हैं?

श्लोक 86 (padma.7.19.86)

महत्या कृपया सर्वमेतन्मे वक्तुमर्हसि । श्रीभगवानुवाच- कर्मणा येनविप्रेन्द्र तुष्टिर्मे हृदि जायते

mahatyā kṛpayā sarvametanme vaktumarhasi śrībhagavānuvāca- karmaṇā yenaviprendra tuṣṭirme hṛdi jāyate

महती कृपा करके यह सब मुझे बताइए। श्री भगवान ने कहा — हे विप्रेन्द्र! जिस कर्म से मेरे हृदय में तुष्टि उत्पन्न होती है —

श्लोक 87 (padma.7.19.87)

क्रोधश्च तत्समस्तं च कथयामि समासतः । यो दयावान्द्विजश्रेष्ठ सर्वभूतेषु सर्वदा

krodhaśca tatsamastaṁ ca kathayāmi samāsataḥ yo dayāvāndvijaśreṣṭha sarvabhūteṣu sarvadā

— तथा जिससे क्रोध उत्पन्न होता है, वह सब मैं संक्षेप में कहता हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ! जो सदा समस्त प्राणियों पर दयावान रहता है —

श्लोक 88 (padma.7.19.88)

अहंकारविहीनश्च तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । कर्म कुर्यान्मदर्थं यो धर्मभक्तिसमन्वितः

ahaṁkāravihīnaśca tasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā karma kuryānmadarthaṁ yo dharmabhaktisamanvitaḥ

— और अहंकार से रहित है, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो धर्म और भक्ति से युक्त होकर मेरे लिए कर्म करता है —

श्लोक 89 (padma.7.19.89)

ब्रूते मदर्थं यः शांतं तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । मिष्टं वस्तु समासाद्य दत्वा मे यश्च मानवः

brūte madarthaṁ yaḥ śāṁtaṁ tasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā miṣṭaṁ vastu samāsādya datvā me yaśca mānavaḥ

— और मेरे लिए शांत वचन बोलता है, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो मनुष्य मीठी वस्तु पाकर मुझे अर्पित करता है —

श्लोक 90 (padma.7.19.90)

मानापमाने सदृशस्तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । सर्वभूतशरीरस्थं यो मां जानाति मानवः

mānāpamāne sadṛśastasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā sarvabhūtaśarīrasthaṁ yo māṁ jānāti mānavaḥ

— तथा मान और अपमान में समभाव रखता है, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो मनुष्य मुझे समस्त प्राणियों के शरीर में स्थित जानता है —

श्लोक 91 (padma.7.19.91)

परहिंसाविहीनो यस्तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । कर्माणि कुरुते यस्तु सुविचार्य पुनः पुनः

parahiṁsāvihīno yastasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā karmāṇi kurute yastu suvicārya punaḥ punaḥ

— और दूसरों को कष्ट नहीं देता, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो बार-बार भलीभाँति विचार कर ही कर्म करता है —

श्लोक 92 (padma.7.19.92)

गोब्राह्मणहितैषी यस्तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । स्वयं निरुक्तं वचनं यत्नाद्यः परिपालयेत्

gobrāhmaṇahitaiṣī yastasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā svayaṁ niruktaṁ vacanaṁ yatnādyaḥ paripālayet

— और गायों तथा ब्राह्मणों का हितैषी है, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो अपने ही कहे हुए वचन का प्रयत्नपूर्वक पालन करता है —

श्लोक 93 (padma.7.19.93)

प्रपन्नं याति यत्नाद्यस्तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । ददात्यनुपकारिभ्यो दानानि द्विजसत्तम

prapannaṁ yāti yatnādyastasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā dadātyanupakāribhyo dānāni dvijasattama

— और शरणागत की सहायता के लिए प्रयत्नपूर्वक जाता है, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। हे द्विजसत्तम! जो उपकार न करने वालों को भी दान देता है —

श्लोक 94 (padma.7.19.94)

मयि चित्तं सदा यस्य तस्य तुष्टोऽस्म्यहं सदा । कर्मणा येनतुष्टोऽस्मि निरुक्तं तत्समासतः

mayi cittaṁ sadā yasya tasya tuṣṭo'smyahaṁ sadā karmaṇā yenatuṣṭo'smi niruktaṁ tatsamāsataḥ

— और जिसका चित्त सदा मुझमें लगा रहता है, उस पर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जिस कर्म से मैं प्रसन्न होता हूँ, वह मैंने संक्षेप में कह दिया।

श्लोक 95 (padma.7.19.95)

रुष्टोऽस्मि कर्मणा येन विप्र वच्मि शृणुष्वतम् । परहिंसारतो यस्तु निर्द्दयः सर्वजंतुषु

ruṣṭo'smi karmaṇā yena vipra vacmi śṛṇuṣvatam parahiṁsārato yastu nirddayaḥ sarvajaṁtuṣu

हे विप्र! अब मैं वे कर्म कहता हूँ जिनसे मैं रुष्ट होता हूँ, ध्यान से सुनो। जो दूसरों को कष्ट देने में लीन और समस्त प्राणियों पर निर्दय है —

श्लोक 96 (padma.7.19.96)

अहंयुः सर्वदा क्रुद्धः समां नयति शत्रुताम् । असत्यभाषीक्रूरश्च परनिंदापरस्तु यः

ahaṁyuḥ sarvadā kruddhaḥ samāṁ nayati śatrutām asatyabhāṣīkrūraśca paraniṁdāparastu yaḥ

— अहंकारी, सदा क्रुद्ध रहने वाला, वह मुझे अपने प्रति शत्रुता की ओर ले जाता है। जो असत्यभाषी, क्रूर और दूसरों की निंदा में लीन है —

श्लोक 97 (padma.7.19.97)

कविवर्तनविध्वंसी समां नयति शत्रुताम् । अदृष्टदोषौ पितरौ स्त्रीभ्रातृभगिनी तथा

kavivartanavidhvaṁsī samāṁ nayati śatrutām adṛṣṭadoṣau pitarau strībhrātṛbhaginī tathā

— विद्वानों की जीविका को नष्ट करने वाला, वह मुझे शत्रुता की ओर ले जाता है। जो निर्दोष माता-पिता, पत्नी, भाई और बहन को —

श्लोक 98 (padma.7.19.98)

मोहात्त्यजति यो मूढः समां नयति शत्रुताम् । पितृभिर्भर्त्सनं यस्तु कुरुते मूढधीर्नरः

mohāttyajati yo mūḍhaḥ samāṁ nayati śatrutām pitṛbhirbhartsanaṁ yastu kurute mūḍhadhīrnaraḥ

— मोहवश त्याग देता है, वह मूर्ख मुझे शत्रुता की ओर ले जाता है। जो मूर्खबुद्धि मनुष्य अपने पिता-आदि से डाँट खाकर भी —

श्लोक 99 (padma.7.19.99)

गुर्ववज्ञाकरो विप्र समां नयति शत्रुताम् । आरामच्छेदिनो ये च जलाशयविलायिनः

gurvavajñākaro vipra samāṁ nayati śatrutām ārāmacchedino ye ca jalāśayavilāyinaḥ

— गुरु का अनादर करता है, हे विप्र! वह मुझे शत्रुता की ओर ले जाता है। जो उपवनों को काटने वाले और जलाशयों को नष्ट करने वाले हैं —

श्लोक 100 (padma.7.19.100)

ग्रामनाशकरायेचतेमांनयंतिशत्रुताम् । परस्त्रियं समालोक्य विषादं यान्ति ये जनाः

grāmanāśakarāyecatemāṁnayaṁtiśatrutām parastriyaṁ samālokya viṣādaṁ yānti ye janāḥ

— और जो गाँवों का नाश करने वाले हैं, वे मुझे शत्रुता की ओर ले जाते हैं। जो लोग परस्त्री को देखकर विषाद को प्राप्त होते हैं —

श्लोक 101 (padma.7.19.101)

शृण्वंति पापचर्चां च तेषां रुष्टोस्म्यहं सदा । द्विषंति नाथं ये मूढा अनाथस्वं हरंति ये

śṛṇvaṁti pāpacarcāṁ ca teṣāṁ ruṣṭosmyahaṁ sadā dviṣaṁti nāthaṁ ye mūḍhā anāthasvaṁ haraṁti ye

— और जो पाप की चर्चा सुनते हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। जो मूर्ख अपने स्वामी से द्वेष करते हैं, जो अनाथों का धन हरते हैं —

श्लोक 102 (padma.7.19.102)

विश्वासघातिनो ये च तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । ये च गोवीर्यहंतारो वृषलीपतयश्च ये

viśvāsaghātino ye ca teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā ye ca govīryahaṁtāro vṛṣalīpatayaśca ye

— और जो विश्वासघाती हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। जो गायों के बल को नष्ट करने वाले हैं और जो शूद्रा-स्त्री के पति हैं —

श्लोक 103 (padma.7.19.103)

अश्वत्थघातिनो ये च तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । ब्रह्मविष्णुमहेशानां मध्ये ये भेदकारिणः

aśvatthaghātino ye ca teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā brahmaviṣṇumaheśānāṁ madhye ye bhedakāriṇaḥ

— और जो पीपल के वृक्ष को काटने वाले हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच भेद उत्पन्न करने वाले हैं —

श्लोक 104 (padma.7.19.104)

परदारातिरक्ता ये तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । एकादश्यां भुंजते ये लोभात्पापधियो नराः

paradārātiraktā ye teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā ekādaśyāṁ bhuṁjate ye lobhātpāpadhiyo narāḥ

— और जो परस्त्री में अत्यंत आसक्त हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। जो पापबुद्धि मनुष्य लोभवश एकादशी के दिन भोजन करते हैं —

श्लोक 105 (padma.7.19.105)

वेदनिंदाकरा ये च तेषांरुष्टोऽस्म्यहं सदा । पापबुद्धिरता ये च मित्रद्रोहरतास्तथा

vedaniṁdākarā ye ca teṣāṁruṣṭo'smyahaṁ sadā pāpabuddhiratā ye ca mitradroharatāstathā

— और जो वेदों की निंदा करने वाले हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। जो पापबुद्धि में लीन हैं, तथा जो मित्रद्रोह में लीन हैं —

श्लोक 106 (padma.7.19.106)

धात्रीतरुं च ये घ्नंति तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । दिवसे मैथुनं ये च कुर्वंते काममोहिताः

dhātrītaruṁ ca ye ghnaṁti teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā divase maithunaṁ ye ca kurvaṁte kāmamohitāḥ

— और जो आँवले के वृक्ष को काटते हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। जो काम से मोहित होकर दिन में मैथुन करते हैं —

श्लोक 107 (padma.7.19.107)

रजस्वला स्त्रियां चैव तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । ये चादृष्टार्तवां नारीं मोहाद्गच्छंति सत्तम

rajasvalā striyāṁ caiva teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā ye cādṛṣṭārtavāṁ nārīṁ mohādgacchaṁti sattama

— और जो रजस्वला स्त्री के साथ मैथुन करते हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। हे सत्पुरुष! जो मोहवश उस स्त्री के पास जाते हैं जिसका ऋतुकाल नहीं देखा गया है —

श्लोक 108 (padma.7.19.108)

व्रतस्थां च सदा जाल्मास्ते मां नयंति शत्रुताम् । अमावास्यातिथौ ये च कुर्वंते निशिभोजनम्

vratasthāṁ ca sadā jālmāste māṁ nayaṁti śatrutām amāvāsyātithau ye ca kurvaṁte niśibhojanam

— तथा जो सदा व्रतस्थ स्त्री के पास जाने वाले नीच पुरुष हैं, वे मुझे शत्रुता की ओर ले जाते हैं। जो अमावस्या तिथि पर रात्रि में भोजन करते हैं —

श्लोक 109 (padma.7.19.109)

भोजनद्वयमेवार्के तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । आमिषं मैथुनं तैलममावास्यादिने द्विजाः

bhojanadvayamevārke teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā āmiṣaṁ maithunaṁ tailamamāvāsyādine dvijāḥ

— तथा जो रविवार को दो बार भोजन करते हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। हे ब्राह्मणो! अमावस्या के दिन मांस, मैथुन और तेल —

श्लोक 110 (padma.7.19.110)

न ये त्यजंति विप्रेन्द्र तेषां रुष्टोऽस्म्यहं सदा । बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपात्ते वदाम्यहम्

na ye tyajaṁti viprendra teṣāṁ ruṣṭo'smyahaṁ sadā bahunātra kimuktena saṁkṣepātte vadāmyaham

— इन्हें, हे विप्रेन्द्र! जो लोग नहीं त्यागते, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? मैं तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ —

श्लोक 111 (padma.7.19.111)

निंदंति वैष्णवान्ये च तेषां रुष्टोस्म्यहं सदा । व्यास उवाच- इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुरदृश्यः सहसाऽभवत्

niṁdaṁti vaiṣṇavānye ca teṣāṁ ruṣṭosmyahaṁ sadā vyāsa uvāca- ityuktvā bhagavānviṣṇuradṛśyaḥ sahasā'bhavat

— जो वैष्णवों की निंदा करते हैं, उन पर मैं सदा रुष्ट रहता हूँ। व्यास जी ने कहा — ऐसा कहकर भगवान विष्णु सहसा अदृश्य हो गए।

श्लोक 112 (padma.7.19.112)

स च विप्रः समुत्तस्थौ त्यक्तनिद्रस्तु मंचतः । केशवोक्तेन वाक्येन स विप्रो हरिभक्तिकृत्

sa ca vipraḥ samuttasthau tyaktanidrastu maṁcataḥ keśavoktena vākyena sa vipro haribhaktikṛt

उस ब्राह्मण की नींद खुल गई और वह पलंग से उठ बैठा। केशव द्वारा कहे गए वचनों से वह ब्राह्मण, हरि-भक्ति करने वाला बनकर —

श्लोक 113 (padma.7.19.113)

संत्यज्य सकलं कार्यं क्रियायोगरतोऽभवत् । नारायणस्य नैवेद्यं भुंजतोऽपि फलं त्विदम्

saṁtyajya sakalaṁ kāryaṁ kriyāyogarato'bhavat nārāyaṇasya naivedyaṁ bhuṁjato'pi phalaṁ tvidam

— समस्त कार्यों को त्यागकर क्रियायोग में लीन हो गया। नारायण के नैवेद्य को खाने मात्र का भी यह फल है —

श्लोक 114 (padma.7.19.114)

हरिपूजाकृतां पुंसां न जाने किं भवेदिति । समासेन ब्रवीमि त्वां शृणु सत्तम जैमिने

haripūjākṛtāṁ puṁsāṁ na jāne kiṁ bhavediti samāsena bravīmi tvāṁ śṛṇu sattama jaimine

— तो हरि की पूजा करने वाले पुरुषों के लिए क्या फल होगा, यह मैं नहीं जानता। हे उत्तम जैमिने! मैं इसे संक्षेप में तुम्हें कहता हूँ, सुनो।

श्लोक 115 (padma.7.19.115)

सकृत्कृत्वा हरेः पूजां प्राप्यते परमं पदम्। मानुष्यं दुर्ल्लभं लोके पूजा तत्रापि चक्रिणः

sakṛtkṛtvā hareḥ pūjāṁ prāpyate paramaṁ padam mānuṣyaṁ durllabhaṁ loke pūjā tatrāpi cakriṇaḥ

हरि की पूजा एक बार करके भी परम पद प्राप्त होता है। लोक में मनुष्य-जन्म ही दुर्लभ है, और उसमें भी चक्रधारी विष्णु की पूजा —

श्लोक 116 (padma.7.19.116)

भक्तिस्तत्रापि विप्रेन्द्र दुर्ल्लभा परिकीर्तिता

bhaktistatrāpi viprendra durllabhā parikīrtitā

— और उसमें भी, हे विप्रेन्द्र! भक्ति को दुर्लभतम कहा गया है।

श्लोक 117 (padma.7.19.117)

संसाराब्धिं सर्वदुःखप्रपूर्णं तर्तुं वांछा यस्य चित्तेस्ति पुंसः । भक्त्या नित्यं वासुदेवस्य पूजां कुर्यादार्यः कर्मणां सोऽखिलानाम्

saṁsārābdhiṁ sarvaduḥkhaprapūrṇaṁ tartuṁ vāṁchā yasya cittesti puṁsaḥ bhaktyā nityaṁ vāsudevasya pūjāṁ kuryādāryaḥ karmaṇāṁ so'khilānām

जिस पुरुष के चित्त में समस्त दुःखों से भरे इस संसार-सागर को पार करने की इच्छा हो, उस श्रेष्ठ पुरुष को समस्त कर्मों में भक्तिपूर्वक नित्य वासुदेव की ही पूजा करनी चाहिए।

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