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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 21

अन्नदान-जलदान-महिमा

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (padma.7.21.1)

व्यास उवाच- ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा हरिशर्मा द्विजोत्तमः । भूयोऽपि तं नमस्कृत्य भक्त्या प्राहेति जैमिने

vyāsa uvāca- brahmaṇo vacanaṁ śrutvā hariśarmā dvijottamaḥ bhūyo'pi taṁ namaskṛtya bhaktyā prāheti jaimine

व्यास जी ने कहा — हे जैमिनि! ब्रह्मा के वचन सुनकर द्विजोत्तम हरिशर्मा ने पुनः उन्हें नमस्कार कर भक्तिपूर्वक यह कहा।

श्लोक 2 (padma.7.21.2)

हरिशर्मोवाच- प्रोक्तानि यानि दानानि सुखहूनि त्वया प्रभो । कस्मै देयानि दानानि तन्मे गदितुमर्हसि

hariśarmovāca- proktāni yāni dānāni sukhahūni tvayā prabho kasmai deyāni dānāni tanme gaditumarhasi

हरिशर्मा ने कहा — हे प्रभो! आपने जो सुखदायी दान बताए, वे किसे दिए जाने चाहिए, यह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (padma.7.21.3)

ब्रह्मोवाच- सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणः परमो गुरुः । तस्मै देयानि दानानि भक्तिश्रद्धासमन्वितैः

brahmovāca- sarveṣāmeva varṇānāṁ brāhmaṇaḥ paramo guruḥ tasmai deyāni dānāni bhaktiśraddhāsamanvitaiḥ

ब्रह्मा ने कहा — समस्त वर्णों में ब्राह्मण ही परम गुरु है; भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर उसी को दान देने चाहिए।

श्लोक 4 (padma.7.21.4)

सर्वदेवाश्रयो विप्रः प्रत्यक्षस्त्रिदशो भुवि । स तारयति दातारं दुस्तरे विश्वसागरे

sarvadevāśrayo vipraḥ pratyakṣastridaśo bhuvi sa tārayati dātāraṁ dustare viśvasāgare

ब्राह्मण समस्त देवताओं का आश्रय है, पृथ्वी पर साक्षात् देवता है; वह दाता को इस दुस्तर संसार-सागर से पार लगाता है।

श्लोक 5 (padma.7.21.5)

ब्राह्मण उवाच- सर्ववर्णगुरुर्विप्रस्त्वया प्रोक्तः सुरोत्तम । तेषां मध्ये तु कः श्रेष्ठः कस्मै दानं प्रदीयते

brāhmaṇa uvāca- sarvavarṇagururviprastvayā proktaḥ surottama teṣāṁ madhye tu kaḥ śreṣṭhaḥ kasmai dānaṁ pradīyate

ब्राह्मण ने कहा — हे सुरोत्तम! आपने कहा कि ब्राह्मण ही समस्त वर्णों का गुरु है; परन्तु उनमें भी श्रेष्ठ कौन है, किसे दान दिया जाए?

श्लोक 6 (padma.7.21.6)

ब्रह्मोवाच- सर्वेऽपि ब्राह्मणाः श्रेष्ठाः पूजनीयाः सदैव हि । स्तेयादिदोषतप्ता ये ब्राह्मणा ब्राह्मणोत्तम

brahmovāca- sarve'pi brāhmaṇāḥ śreṣṭhāḥ pūjanīyāḥ sadaiva hi steyādidoṣataptā ye brāhmaṇā brāhmaṇottama

ब्रह्मा ने कहा — समस्त ब्राह्मण ही श्रेष्ठ और सदा पूजनीय हैं; हे ब्राह्मणोत्तम! चोरी आदि दोषों से युक्त ब्राह्मण भी —

श्लोक 7 (padma.7.21.7)

अस्माकं द्वेषिणस्ते च परेभ्यो न कदाचन । अनाचारा द्विजाः पूज्या न च शूद्रा जितेन्द्रियाः । अभक्ष्यभक्षका गावो लोकानां मातरः स्मृताः

asmākaṁ dveṣiṇaste ca parebhyo na kadācana anācārā dvijāḥ pūjyā na ca śūdrā jitendriyāḥ abhakṣyabhakṣakā gāvo lokānāṁ mātaraḥ smṛtāḥ

— वे हमारे प्रति द्वेष रखने वाले भले ही हों, फिर भी अन्य वर्णों से कभी हीन नहीं हैं। आचार-भ्रष्ट ब्राह्मण भी पूज्य हैं, इन्द्रियजित शूद्र भी नहीं; अभक्ष्य खाने वाली गायें भी लोकों की माता ही मानी गई हैं।

श्लोक 8 (padma.7.21.8)

माहात्म्यं भूमिदेवानां विशेषादुच्यते मया । तव स्नेहाद्द्विजश्रेष्ठ निशामय समाहितः

māhātmyaṁ bhūmidevānāṁ viśeṣāducyate mayā tava snehāddvijaśreṣṭha niśāmaya samāhitaḥ

तुम्हारे प्रति स्नेहवश, हे द्विजश्रेष्ठ! मैं भूदेवों की महिमा विशेष रूप से कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 9 (padma.7.21.9)

क्षत्त्रियाणां च वैश्यानां शूद्राणां गुरवो द्विजाः । अन्योन्यं गुरवो विप्राः पूजनीयाश्च भूसुराः

kṣattriyāṇāṁ ca vaiśyānāṁ śūdrāṇāṁ guravo dvijāḥ anyonyaṁ guravo viprāḥ pūjanīyāśca bhūsurāḥ

ब्राह्मण ही क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के गुरु हैं; ब्राह्मण आपस में भी एक-दूसरे के गुरु और पूजनीय भूदेव हैं।

श्लोक 10 (padma.7.21.10)

ब्राह्मणं पूजयेद्यस्तु विष्णुबुद्ध्या नरोत्तम । आयुः पुत्रश्च कीर्तिश्च संपत्तिस्तस्य वर्द्धते

brāhmaṇaṁ pūjayedyastu viṣṇubuddhyā narottama āyuḥ putraśca kīrtiśca saṁpattistasya varddhate

जो श्रेष्ठ मनुष्य विष्णु-बुद्धि से ब्राह्मण की पूजा करता है, उसकी आयु, पुत्र, कीर्ति और संपत्ति — सभी बढ़ते हैं।

श्लोक 11 (padma.7.21.11)

संचिनोति द्विजं यस्तु मूढधीर्मानवो भुवि । सुदर्शनेन तच्छीर्षं हंतुमिच्छति केशवः

saṁcinoti dvijaṁ yastu mūḍhadhīrmānavo bhuvi sudarśanena tacchīrṣaṁ haṁtumicchati keśavaḥ

पृथ्वी पर जो मूढ़बुद्धि मनुष्य ब्राह्मण को क्रोध से पीड़ित करता है, केशव सुदर्शन चक्र से उसके सिर को नष्ट करना चाहते हैं।

श्लोक 12 (padma.7.21.12)

पुष्पहस्तं पयोहस्तं देवहस्तं च जैमिने । न नमेद्ब्राह्मणं प्राज्ञस्तैलाभ्यंगितविग्रहम्

puṣpahastaṁ payohastaṁ devahastaṁ ca jaimine na namedbrāhmaṇaṁ prājñastailābhyaṁgitavigraham

हे जैमिनि! हाथ में फूल, दूध या देव-मूर्ति लिए हुए, अथवा तेल से मालिश किए हुए शरीर वाले ब्राह्मण को बुद्धिमान को प्रणाम नहीं करना चाहिए।

श्लोक 13 (padma.7.21.13)

जलस्थं देववेश्मस्थं ध्यानमज्जितचेतसम् । देवपूजां प्रकुर्वंतं न नमेद्ब्राह्मणं बुधः

jalasthaṁ devaveśmasthaṁ dhyānamajjitacetasam devapūjāṁ prakurvaṁtaṁ na namedbrāhmaṇaṁ budhaḥ

जल में स्थित, देव-मंदिर में स्थित, ध्यान में डूबे हुए चित्त वाले, अथवा देव-पूजा करते हुए ब्राह्मण को बुद्धिमान को प्रणाम नहीं करना चाहिए।

श्लोक 14 (padma.7.21.14)

बहिष्क्रियां प्रकुर्वंतं भुंजानं च द्विजोत्तम । तथा सामानि गायंतं न नमेद्ब्राह्मणं बुधः

bahiṣkriyāṁ prakurvaṁtaṁ bhuṁjānaṁ ca dvijottama tathā sāmāni gāyaṁtaṁ na namedbrāhmaṇaṁ budhaḥ

हे द्विजोत्तम! शौच-क्रिया करते हुए, भोजन करते हुए अथवा साम-गान करते हुए ब्राह्मण को भी बुद्धिमान को प्रणाम नहीं करना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.7.21.15)

ब्राह्मणा यत्र तिष्ठंति बहबो द्विजसत्तम । प्रत्येकं तु नमस्कारस्तत्र कार्यो न धीमता

brāhmaṇā yatra tiṣṭhaṁti bahabo dvijasattama pratyekaṁ tu namaskārastatra kāryo na dhīmatā

हे द्विजसत्तम! जहाँ अनेक ब्राह्मण एकत्र हों, वहाँ बुद्धिमान को प्रत्येक को अलग-अलग प्रणाम नहीं करना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.7.21.16)

कृताभिवादनं विप्रं भक्त्या यो नाभिवादयेत् । स चाण्डालसमो ज्ञेयो नाभिवाद्यः कदाचन

kṛtābhivādanaṁ vipraṁ bhaktyā yo nābhivādayet sa cāṇḍālasamo jñeyo nābhivādyaḥ kadācana

जो कोई प्रणाम करते हुए ब्राह्मण के प्रति भक्तिपूर्वक प्रति-प्रणाम नहीं करता, उसे चांडाल के समान जानना चाहिए; उसे कभी भी प्रणाम नहीं करना चाहिए।

श्लोक 17 (padma.7.21.17)

कृतप्रणामंतनयंनमेतांपितरौनच । कृतप्रणामाः सर्वेऽपि नमस्कार्या द्विजैर्द्विजाः

kṛtapraṇāmaṁtanayaṁnametāṁpitaraunaca kṛtapraṇāmāḥ sarve'pi namaskāryā dvijairdvijāḥ

पुत्र द्वारा प्रणाम किए जाने पर माता-पिता को भी प्रति-प्रणाम नहीं करना चाहिए; परन्तु ब्राह्मणों द्वारा प्रणाम किए गए समस्त ब्राह्मणों को ब्राह्मणों द्वारा प्रति-नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 18 (padma.7.21.18)

कृतदोषान्द्विजान्गाश्च न द्विषन्ति विचक्षणाः । द्विषंति वापि मोहेन तेषां रुष्टः सदा हरिः

kṛtadoṣāndvijāngāśca na dviṣanti vicakṣaṇāḥ dviṣaṁti vāpi mohena teṣāṁ ruṣṭaḥ sadā hariḥ

बुद्धिमान लोग दोष-युक्त ब्राह्मणों और गायों से भी द्वेष नहीं करते; जो मोहवश उनसे द्वेष करते हैं, हरि उन पर सदा रुष्ट रहते हैं।

श्लोक 19 (padma.7.21.19)

याचकान्ब्राह्मणान्यस्तु कोपदृष्ट्या प्रपश्यति । सूचीप्ररोपणं तस्य नेत्रयोः कुरुते यमः

yācakānbrāhmaṇānyastu kopadṛṣṭyā prapaśyati sūcīpraropaṇaṁ tasya netrayoḥ kurute yamaḥ

जो कोई भिक्षा माँगने वाले ब्राह्मणों को क्रोध-दृष्टि से देखता है, यम उसकी दोनों आँखों में सुई गड़ो देते हैं।

श्लोक 20 (padma.7.21.20)

विप्रनिर्भर्त्सनं मूढा येन वक्त्रेण कुर्वते । तस्मिन्वक्त्रे यमस्तप्तं लोहदंडं ददाति वै

vipranirbhartsanaṁ mūḍhā yena vaktreṇa kurvate tasminvaktre yamastaptaṁ lohadaṁḍaṁ dadāti vai

जो मूर्ख जिस मुख से ब्राह्मणों की भर्त्सना करते हैं, यम उसी मुख में तपा हुआ लोहे का दंड डाल देते हैं।

श्लोक 21 (padma.7.21.21)

ब्राह्मणो यद्गृहं भुंक्ते तद्गृहे केशवः स्वयम् । देवताः सकला ये च पितरश्च सुरर्षयः

brāhmaṇo yadgṛhaṁ bhuṁkte tadgṛhe keśavaḥ svayam devatāḥ sakalā ye ca pitaraśca surarṣayaḥ

ब्राह्मण जिस घर में भोजन करता है, उस घर में स्वयं केशव, समस्त देवता, पितर और देवर्षि —

श्लोक 22 (padma.7.21.22)

विप्रपादोदकं यस्तु कणमात्रं वहेद्बुधः । देहस्थं पातकं तस्य सर्वमेवाशु नश्यति

viprapādodakaṁ yastu kaṇamātraṁ vahedbudhaḥ dehasthaṁ pātakaṁ tasya sarvamevāśu naśyati

— विद्यमान रहते हैं। जो बुद्धिमान ब्राह्मण के चरण-जल का एक कण भी धारण करता है, उसके शरीर में स्थित समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 23 (padma.7.21.23)

कोटिब्रह्माण्डमध्येषु संति तीर्थानि यानि वै । तीर्थानि तानि सर्वाणि विप्रपादे तु दक्षिणे

koṭibrahmāṇḍamadhyeṣu saṁti tīrthāni yāni vai tīrthāni tāni sarvāṇi viprapāde tu dakṣiṇe

करोड़ों ब्रह्मांडों के भीतर जितने भी तीर्थ हैं, वे समस्त तीर्थ ब्राह्मण के दाहिने चरण में ही विद्यमान हैं।

श्लोक 24 (padma.7.21.24)

विप्रपादोदकैर्नित्यं सिक्तं स्याद्यस्य मस्तकम् । स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः

viprapādodakairnityaṁ siktaṁ syādyasya mastakam sa snātaḥ sarvatīrtheṣu sarvayajñeṣu dīkṣitaḥ

जिसका मस्तक नित्य ब्राह्मण के चरण-जल से सिंचित होता है, वह समस्त तीर्थों में स्नान किए हुए और समस्त यज्ञों में दीक्षित माना जाता है।

श्लोक 25 (padma.7.21.25)

सर्वपापानि घोराणि ब्रह्महत्यादिकानि च । सद्यस्तस्य विनश्यंति विप्रपादांबुधारणात्

sarvapāpāni ghorāṇi brahmahatyādikāni ca sadyastasya vinaśyaṁti viprapādāṁbudhāraṇāt

समस्त घोर पाप, ब्रह्महत्या आदि, ब्राह्मण के चरण-जल को धारण करने मात्र से तत्काल नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 26 (padma.7.21.26)

क्षयाद्या व्याधयः सर्वाः परमक्लेशदायिकाः । गच्छंति विलयं सद्यो विप्रपादांबुधारणात्

kṣayādyā vyādhayaḥ sarvāḥ paramakleśadāyikāḥ gacchaṁti vilayaṁ sadyo viprapādāṁbudhāraṇāt

क्षय आदि परम क्लेशदायी समस्त व्याधियाँ भी ब्राह्मण के चरण-जल को धारण करने से तत्काल विलीन हो जाती हैं।

श्लोक 27 (padma.7.21.27)

पित्रर्थं यानि तोयानि दीयंते विप्रपादयोः । तैस्तृप्ताः पितरः स्वर्गे तिष्ठंत्याचंद्रतारकम्

pitrarthaṁ yāni toyāni dīyaṁte viprapādayoḥ taistṛptāḥ pitaraḥ svarge tiṣṭhaṁtyācaṁdratārakam

पितरों के लिए जो जल ब्राह्मण के चरणों में दिया जाता है, उससे तृप्त हुए पितर चंद्रमा और तारों के रहने तक स्वर्ग में रहते हैं।

श्लोक 28 (padma.7.21.28)

प्रक्षाल्य विप्रचरणौ दूर्वाभिर्योऽर्चयेद्बुधः । तेनार्चितो जगत्स्वामी विष्णुः सर्वसुरोत्तमः

prakṣālya vipracaraṇau dūrvābhiryo'rcayedbudhaḥ tenārcito jagatsvāmī viṣṇuḥ sarvasurottamaḥ

जो बुद्धिमान ब्राह्मण के दोनों चरणों को धोकर दूर्वा से पूजा करता है, उसके द्वारा जगत्स्वामी, समस्त देवताओं में श्रेष्ठ विष्णु ही पूजित होते हैं।

श्लोक 29 (padma.7.21.29)

विप्राणां पादनिर्माल्यं यो मर्त्यः शिरसा वहेत् । सत्यं सत्यमहं वच्मि तस्य मुक्तिर्हि शाश्वती

viprāṇāṁ pādanirmālyaṁ yo martyaḥ śirasā vahet satyaṁ satyamahaṁ vacmi tasya muktirhi śāśvatī

ब्राह्मणों के चरण-निर्माल्य को जो मनुष्य अपने सिर पर धारण करता है, मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, उसकी मुक्ति निश्चय ही शाश्वत होती है।

श्लोक 30 (padma.7.21.30)

विप्रं प्रदक्षिणीकृत्ये वंदते यो नरोत्तमः । प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा

vipraṁ pradakṣiṇīkṛtye vaṁdate yo narottamaḥ pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā vasundharā

जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण की प्रदक्षिणा कर उसे वंदन करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपों वाली पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर ली जाती है।

श्लोक 31 (padma.7.21.31)

यो दद्यात्फलतांबूलं विप्राणां पादसेचनात् । रोगी रोगात्प्रमुच्येत पापी मुच्यत पातकात्

yo dadyātphalatāṁbūlaṁ viprāṇāṁ pādasecanāt rogī rogātpramucyeta pāpī mucyata pātakāt

जो कोई ब्राह्मणों के चरण सींचकर फल और ताम्बूल अर्पित करता है, रोगी उससे रोग से मुक्त होता है, पापी पाप से मुक्त होता है।

श्लोक 32 (padma.7.21.32)

मुच्यते बन्धनाद्बद्धो विप्राणां पादसेचने । अनपत्याश्च या नार्यो मृता पत्याश्च याः स्त्रियः

mucyate bandhanādbaddho viprāṇāṁ pādasecane anapatyāśca yā nāryo mṛtā patyāśca yāḥ striyaḥ

बंधन में बँधा हुआ भी ब्राह्मणों के चरण सींचने से बंधन से मुक्त हो जाता है; जो स्त्रियाँ निःसंतान हों या जिनके पति मर चुके हों —

श्लोक 33 (padma.7.21.33)

बह्वपत्या जीववत्सा विप्रपादस्य सेचनात् । माहाम्त्यं शृणु विप्रेन्द्र सर्वपापप्रणाशनम्

bahvapatyā jīvavatsā viprapādasya secanāt māhāmtyaṁ śṛṇu viprendra sarvapāpapraṇāśanam

— वे ब्राह्मण के चरण सींचने से अनेक जीवित संतानों वाली बन जाती हैं। हे विप्रेन्द्र! अब उसकी वह महिमा सुनो, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है।

श्लोक 34 (padma.7.21.34)

द्विजांघ्रिसेचनस्याहं समासेन ब्रवीमि ते । पूर्वं भद्रक्रियो नाम पवित्रकुलसंभवः

dvijāṁghrisecanasyāhaṁ samāsena bravīmi te pūrvaṁ bhadrakriyo nāma pavitrakulasaṁbhavaḥ

मैं तुम्हें ब्राह्मण के चरण-सेचन की महिमा संक्षेप में कहता हूँ। पूर्वकाल में भद्रक्रिय नामक एक पवित्र कुल में उत्पन्न —

श्लोक 35 (padma.7.21.35)

बभूव ब्राह्मणो विष्णोः परिचर्यापरायणः । वेदवित्सदयः शांतः पितृभक्तिपरायणः

babhūva brāhmaṇo viṣṇoḥ paricaryāparāyaṇaḥ vedavitsadayaḥ śāṁtaḥ pitṛbhaktiparāyaṇaḥ

— जो विष्णु की सेवा में परायण, वेद का ज्ञाता, दयालु, शांत और पितृभक्ति में लीन ब्राह्मण था।

श्लोक 36 (padma.7.21.36)

अतिथीनां कृता पूजा ज्ञातिपूजाकरस्तथा । एकदा स द्विजश्रेष्ठस्तैलाभ्यंगितविग्रहः

atithīnāṁ kṛtā pūjā jñātipūjākarastathā ekadā sa dvijaśreṣṭhastailābhyaṁgitavigrahaḥ

वह अतिथियों का सत्कार करने वाला और बांधवों का आदर करने वाला था। एक बार वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, तेल से अपने शरीर की मालिश किए हुए —

श्लोक 37 (padma.7.21.37)

जगाम सरसीं स्नातुं गृहीतस्नानवस्त्रकः । कृतस्नानः स विप्रेन्द्रो विधिना तर्पणादिकम्

jagāma sarasīṁ snātuṁ gṛhītasnānavastrakaḥ kṛtasnānaḥ sa viprendro vidhinā tarpaṇādikam

— स्नान का वस्त्र लेकर सरोवर में स्नान करने गया। हे विप्रेन्द्र! स्नान करके उसने विधिवत तर्पण आदि —

श्लोक 38 (padma.7.21.38)

चकार सर्वशास्त्रज्ञः सर्वलोकहिते रतः । समाप्य स्नानकर्माणि हरिनामानि कीर्तयन्

cakāra sarvaśāstrajñaḥ sarvalokahite rataḥ samāpya snānakarmāṇi harināmāni kīrtayan

— समस्त शास्त्रों का ज्ञाता, समस्त लोगों के हित में रत उसने ये कर्म किए। स्नान-कर्म समाप्त कर, हरि के नामों का कीर्तन करते हुए —

श्लोक 39 (padma.7.21.39)

आजगाम स्वके गेहे हरिपूजापरोऽभवत् । पादौ प्रक्षालयामास पानीयैरतिशीतलैः

ājagāma svake gehe haripūjāparo'bhavat pādau prakṣālayāmāsa pānīyairatiśītalaiḥ

— वह अपने घर लौटा, और हरि की पूजा में लीन हो गया। उसने अत्यंत शीतल जल से अपने दोनों चरण धोए।

श्लोक 40 (padma.7.21.40)

प्रक्षालितांघ्रिहस्तोऽसौ ब्राह्मणो ब्राह्मणार्चकः । स्थापयामास सर्वाणि स्नानोपकरणानि च

prakṣālitāṁghrihasto'sau brāhmaṇo brāhmaṇārcakaḥ sthāpayāmāsa sarvāṇi snānopakaraṇāni ca

चरण और हाथ धोकर, ब्राह्मण-पूजक उस ब्राह्मण ने समस्त स्नान-सामग्री को रख दिया।

श्लोक 41 (padma.7.21.41)

द्वारदेशे द्विजश्रेष्ठ निदाघतपनातपैः । तापितो भषकः कश्चिदग्निकल्पैः समागतः

dvāradeśe dvijaśreṣṭha nidāghatapanātapaiḥ tāpito bhaṣakaḥ kaścidagnikalpaiḥ samāgataḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! उसके द्वार पर, ग्रीष्म की अग्नि-तुल्य धूप से संतप्त होकर, कोई एक कुत्ता आया।

श्लोक 42 (padma.7.21.42)

विप्रपादोदके तस्मिन्प्रसुप्तोत्यंतशीतले । विप्रपादोदकस्पर्शाद्भषक्तोऽत्यंतपातकी

viprapādodake tasminprasuptotyaṁtaśītale viprapādodakasparśādbhaṣakto'tyaṁtapātakī

उस अत्यंत शीतल ब्राह्मण-चरण-जल में वह सो गया। ब्राह्मण के चरण-जल के स्पर्श मात्र से वह अत्यंत पापी कुत्ता —

श्लोक 43 (padma.7.21.43)

विमुक्तः पातकैः सर्वैः कोटिजन्मकृतैरपि । स सुप्तो मन्दिरद्वारि भषको विकलस्तृषा

vimuktaḥ pātakaiḥ sarvaiḥ koṭijanmakṛtairapi sa supto mandiradvāri bhaṣako vikalastṛṣā

— करोड़ों जन्मों में किए गए समस्त पापों से भी मुक्त हो गया। वह कुत्ता प्यास से व्याकुल होकर घर के द्वार पर सोया रहा।

श्लोक 44 (padma.7.21.44)

पानीयं याचयामास ताडितो द्विजकिंकरैः । जगाम पंचतां सद्यस्तत्रैव भषको द्विजः

pānīyaṁ yācayāmāsa tāḍito dvijakiṁkaraiḥ jagāma paṁcatāṁ sadyastatraiva bhaṣako dvijaḥ

वह जल माँगने लगा, तब ब्राह्मण के सेवकों ने उसे मार दिया; और वहीं तत्काल वह कुत्ता मृत्यु को प्राप्त हुआ। हे द्विज!

श्लोक 45 (padma.7.21.45)

द्विजाङ्घ्रिसेचनस्पर्शाद्भषको वीतकल्मषः । तमालोक्य महात्मानं मूर्तिमंतमिवेश्वरम्

dvijāṅghrisecanasparśādbhaṣako vītakalmaṣaḥ tamālokya mahātmānaṁ mūrtimaṁtamiveśvaram

— ब्राह्मण के चरण-सेचन के स्पर्श मात्र से पापरहित हो चुका वह कुत्ता, उस महात्मा को मूर्तिमान ईश्वर के समान देखकर —

श्लोक 46 (padma.7.21.46)

विनयावनतः प्राह ब्राह्मणोऽसौ तपोधनः । ब्राह्मण उवाच- कस्त्वं ब्रूहि महाभाग केन दुःखी तु कर्मणा । भषकस्य कुले जातो नानादुःखसमाकुले

vinayāvanataḥ prāha brāhmaṇo'sau tapodhanaḥ brāhmaṇa uvāca- kastvaṁ brūhi mahābhāga kena duḥkhī tu karmaṇā bhaṣakasya kule jāto nānāduḥkhasamākule

— विनम्रतापूर्वक झुककर, उस तपोधन ब्राह्मण से यह बोला। ब्राह्मण ने कहा — हे महाभाग! तुम कौन हो, बताओ, किस कर्म के कारण तुम दुःखी हो, और नाना दुःखों से भरे कुत्तों के कुल में जन्मे हो?

श्लोक 47 (padma.7.21.47)

ब्रह्मोवाच- वचनं तस्य विप्रर्षेः समाकर्ण्य महायशाः । कथयामास वृत्तांतं मूलतः सर्वमात्मनः

brahmovāca- vacanaṁ tasya viprarṣeḥ samākarṇya mahāyaśāḥ kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ mūlataḥ sarvamātmanaḥ

ब्रह्मा ने कहा — उस विप्रर्षि के वचन सुनकर, वह महायशस्वी अपना समस्त वृत्तांत मूल से कहने लगा।

श्लोक 48 (padma.7.21.48)

अहमासं सर्वभौमः शङ्खनामा महाबलः । चतुर्वर्षसहस्राणि महीं कृत्स्नामपालयम्

ahamāsaṁ sarvabhaumaḥ śaṅkhanāmā mahābalaḥ caturvarṣasahasrāṇi mahīṁ kṛtsnāmapālayam

मैं शंख नामक अत्यंत बलवान चक्रवर्ती सम्राट था; मैंने चार हजार वर्षों तक सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन किया।

श्लोक 49 (padma.7.21.49)

मयाज्ञया कृताः सर्वे जिताश्च रिपवो युधि । दत्तानि सर्वदानानि पालिताज्ञा तयोनिजाः

mayājñayā kṛtāḥ sarve jitāśca ripavo yudhi dattāni sarvadānāni pālitājñā tayonijāḥ

मेरी आज्ञा से सभी कार्य किए जाते थे, युद्ध में मैंने शत्रुओं को जीता, समस्त दान दिए, और अपनी प्रजा की मैंने भलीभाँति रक्षा की।

श्लोक 50 (padma.7.21.50)

एकदाऽहं महाभागं संधितः स्मरसायकैः । बलाज्जनवधूं कांचिज्जहार भृशसुंदरीम्

ekadā'haṁ mahābhāgaṁ saṁdhitaḥ smarasāyakaiḥ balājjanavadhūṁ kāṁcijjahāra bhṛśasuṁdarīm

एक बार काम के बाणों से बिंधकर, मैंने बलपूर्वक किसी अत्यंत सुंदर स्त्री को हर लिया।

श्लोक 51 (padma.7.21.51)

तेन पापप्रभावेण मम श्रीः संशयं गता । ततस्समस्तैर्लोकैश्च निरस्तोऽहं महाबलः

tena pāpaprabhāveṇa mama śrīḥ saṁśayaṁ gatā tatassamastairlokaiśca nirasto'haṁ mahābalaḥ

उस पाप के प्रभाव से मेरा ऐश्वर्य संकट में पड़ गया; तब समस्त लोगों ने मुझ महाबली को त्याग दिया।

श्लोक 52 (padma.7.21.52)

ततस्तु भ्रष्टराज्योऽहं काननाभ्यंतरे स्थितः । क्षुधातृषापरिश्रांतःकदाचित्पंचतां गतः

tatastu bhraṣṭarājyo'haṁ kānanābhyaṁtare sthitaḥ kṣudhātṛṣāpariśrāṁtaḥkadācitpaṁcatāṁ gataḥ

तब राज्यभ्रष्ट होकर मैं वन के भीतर रहने लगा; भूख-प्यास से थका हुआ मैं एक बार मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 53 (padma.7.21.53)

अंतकस्य पुरं गत्वा दुःखं भुक्तं मया चिरम् । तदाकर्ण्य विप्रेन्द्र शृण्वतां चित्तदुःखदम्

aṁtakasya puraṁ gatvā duḥkhaṁ bhuktaṁ mayā ciram tadākarṇya viprendra śṛṇvatāṁ cittaduḥkhadam

यम की पुरी में जाकर मैंने दीर्घकाल तक दुःख भोगा। हे विप्रेन्द्र! उसे सुनकर सुनने वालों का चित्त दुःखी हो जाता है —

श्लोक 54 (padma.7.21.54)

संतप्तलोहशस्त्रायां तप्ता ताम्रमयीं महीम् । संरेमे प्रज्वलद्वह्निं शिखाततिसुभीषणाम्

saṁtaptalohaśastrāyāṁ taptā tāmramayīṁ mahīm saṁreme prajvaladvahniṁ śikhātatisubhīṣaṇām

— मैं तपे हुए लोहे के शस्त्रों वाली, गरम ताम्बे की भूमि पर, प्रज्वलित अग्नि की भयंकर शिखाओं में विचरण करता रहा।

श्लोक 55 (padma.7.21.55)

ततस्तु शमनादेशाल्लोहस्तंभं सुभीषणम् । ज्वलता वह्निना तप्तं समालिङ्ग्य स्थितोऽस्म्यहम्

tatastu śamanādeśāllohastaṁbhaṁ subhīṣaṇam jvalatā vahninā taptaṁ samāliṅgya sthito'smyaham

फिर यम की आज्ञा से जलती हुई अग्नि से तपाए हुए भयंकर लोहे के स्तंभ का आलिंगन कर मुझे खड़ा रहना पड़ा।

श्लोक 56 (padma.7.21.56)

शीते क्षुरांबुधाराभिः सिक्तोऽहं यमकिङ्करैः । दुःखमन्यच्च सुमहद्भुक्तं तत्र यमालये

śīte kṣurāṁbudhārābhiḥ sikto'haṁ yamakiṅkaraiḥ duḥkhamanyacca sumahadbhuktaṁ tatra yamālaye

यम के सेवकों द्वारा मुझे उस्तरे जैसी धार वाले शीतल जल से सींचा गया; यम के धाम में मैंने अन्य भी अनेक महान दुःख भोगे।

श्लोक 57 (padma.7.21.57)

ततो नरकशेषे च जन्मासाद्य मुहुर्मुहुः । पापयोनौ मया दुःखमनुभूतं चिरं महत्

tato narakaśeṣe ca janmāsādya muhurmuhuḥ pāpayonau mayā duḥkhamanubhūtaṁ ciraṁ mahat

फिर नरक-शेष कर्मों के फलस्वरूप बार-बार पापयोनियों में जन्म पाकर, मैंने दीर्घकाल तक महान दुःख भोगा।

श्लोक 58 (padma.7.21.58)

त्वत्पादजलसंसर्गान्मुक्तोऽहं पापरज्जुना । गच्छामि परमं धाम दुर्ल्लभं योगिनामपि

tvatpādajalasaṁsargānmukto'haṁ pāparajjunā gacchāmi paramaṁ dhāma durllabhaṁ yogināmapi

आपके चरण-जल के स्पर्श से मैं पाप-रूपी रस्सी से मुक्त हो गया हूँ; अब मैं उस परम धाम को जा रहा हूँ, जो योगियों को भी दुर्लभ है।

श्लोक 59 (padma.7.21.59)

त्वं मे गुरुर्द्विजश्रेष्ठ नमस्तेऽस्तु महात्मने । त्वत्प्रसादाद्विमुक्तोऽहं पापैर्यामि पुरं हरेः

tvaṁ me gururdvijaśreṣṭha namaste'stu mahātmane tvatprasādādvimukto'haṁ pāpairyāmi puraṁ hareḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! आप ही मेरे गुरु हैं, हे महात्मन्! आपको नमस्कार है। आपकी कृपा से पापों से मुक्त होकर मैं हरि के धाम को जाता हूँ।

श्लोक 60 (padma.7.21.60)

भद्रक्रिय उवाच- पूर्वजन्मकथा राजन्मनुष्यो न कदाचन । अतस्तु तनयं त्यक्त्वा सर्वदा नीतिमाचरेत्

bhadrakriya uvāca- pūrvajanmakathā rājanmanuṣyo na kadācana atastu tanayaṁ tyaktvā sarvadā nītimācaret

भद्रक्रिय ने कहा — हे राजन्! मनुष्य को पूर्वजन्म की कथा कभी प्राप्त नहीं होती; इसलिए पुत्र के मोह को छोड़कर सदा नीति का ही आचरण करना चाहिए।

श्लोक 61 (padma.7.21.61)

नीतिग्राही नृपो यस्तु विपत्तिर्नास्ति तस्य वै । चिरं भुनक्ति पृथिवीं कंटकैः परिवर्जिताम्

nītigrāhī nṛpo yastu vipattirnāsti tasya vai ciraṁ bhunakti pṛthivīṁ kaṁṭakaiḥ parivarjitām

जो राजा नीति को धारण करता है, उस पर कोई विपत्ति नहीं आती; वह दीर्घकाल तक कंटकों से रहित पृथ्वी का भोग करता है।

श्लोक 62 (padma.7.21.62)

यस्मै न रोचते नीतिर्भूपालाय दुरात्मने । भ्रष्टश्रीरचिरेणापि स भवेन्नात्र संशयः

yasmai na rocate nītirbhūpālāya durātmane bhraṣṭaśrīracireṇāpi sa bhavennātra saṁśayaḥ

जिस दुरात्मा राजा को नीति नहीं भाती, वह शीघ्र ही ऐश्वर्य-भ्रष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 63 (padma.7.21.63)

आयुर्बलं यशो मित्रं विजयं सुखमिच्छता । मंत्रिणः पंडिता राज्ञा नियोज्याः सर्वदैव हि

āyurbalaṁ yaśo mitraṁ vijayaṁ sukhamicchatā maṁtriṇaḥ paṁḍitā rājñā niyojyāḥ sarvadaiva hi

आयु, बल, यश, मित्र, विजय और सुख की इच्छा रखने वाले राजा को सदा ही पंडित मंत्रियों को नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 64 (padma.7.21.64)

अवज्ञाय महीभर्तुस्त्यजंते सादरं बुधाः । सभायां बुधहीनायां नीतिर्बलवती नहि

avajñāya mahībhartustyajaṁte sādaraṁ budhāḥ sabhāyāṁ budhahīnāyāṁ nītirbalavatī nahi

राजा की अवज्ञा से आदरणीय विद्वान भी उसे त्याग देते हैं; विद्वानों से रहित सभा में नीति कभी बलवती नहीं होती।

श्लोक 65 (padma.7.21.65)

ततो नीतौ विनष्टायां सहसा धरणीपतेः । राजश्रियो विनश्यंति सकोशबलवाहनाः

tato nītau vinaṣṭāyāṁ sahasā dharaṇīpateḥ rājaśriyo vinaśyaṁti sakośabalavāhanāḥ

तब नीति के नष्ट होने पर, राजा का समस्त राजैश्वर्य — कोष, सेना और वाहनों सहित — सहसा नष्ट हो जाता है।

श्लोक 66 (padma.7.21.66)

ब्राह्मणान्गणकांश्चैव वैद्यांश्च बांधवांस्तथा । नृपाः कल्याणमिच्छंति न द्विषंति कदाचन

brāhmaṇāngaṇakāṁścaiva vaidyāṁśca bāṁdhavāṁstathā nṛpāḥ kalyāṇamicchaṁti na dviṣaṁti kadācana

राजाओं को ब्राह्मणों, ज्योतिषियों, वैद्यों और बांधवों का कल्याण चाहना चाहिए, उनसे कभी द्वेष नहीं करना चाहिए।

श्लोक 67 (padma.7.21.67)

गतश्रीर्गणकद्वेष्टा वैद्यद्वेष्टायुवर्जितः । ज्ञातिद्वेष्टानिष्कुलः स्याद्द्विजद्वेष्टाखिलार्तिभाक्

gataśrīrgaṇakadveṣṭā vaidyadveṣṭāyuvarjitaḥ jñātidveṣṭāniṣkulaḥ syāddvijadveṣṭākhilārtibhāk

ज्योतिषी से द्वेष करने वाला ऐश्वर्य-रहित हो जाता है, वैद्य से द्वेष करने वाला आयु-रहित हो जाता है, बांधवों से द्वेष करने वाला कुल-रहित हो जाता है, और ब्राह्मण से द्वेष करने वाला समस्त पीड़ाओं का भागी बनता है।

श्लोक 68 (padma.7.21.68)

राजानः पितरः प्रोक्ताः पुत्रा जानपदास्तथा । ततो भूपाः पालयंति प्रजाः पुत्रमिवौरसान्

rājānaḥ pitaraḥ proktāḥ putrā jānapadāstathā tato bhūpāḥ pālayaṁti prajāḥ putramivaurasān

राजा को प्रजा का पिता और प्रजाजनों को उसकी संतान कहा गया है; इसलिए राजाओं को अपनी प्रजा का पालन अपने ही औरस पुत्र के समान करना चाहिए।

श्लोक 69 (padma.7.21.69)

पौरलोके तथा कुर्याद्यथा स्नेहो निजात्मजे । प्रजापीडाकरा ये च भूपाला अतिपापिनः

pauraloke tathā kuryādyathā sneho nijātmaje prajāpīḍākarā ye ca bhūpālā atipāpinaḥ

नगरवासियों के प्रति भी उतना ही स्नेह रखना चाहिए, जितना अपने पुत्र के प्रति; जो राजा प्रजा को पीड़ा देते हैं, वे अत्यंत पापी हैं।

श्लोक 70 (padma.7.21.70)

शिरःस्था विपदस्तेषां विज्ञेया दीर्घदर्शिभिः । विवेकिनो महीपालाः पालयंति यथा प्रजाः

śiraḥsthā vipadasteṣāṁ vijñeyā dīrghadarśibhiḥ vivekino mahīpālāḥ pālayaṁti yathā prajāḥ

दूरदर्शी लोगों को जानना चाहिए कि उन पर विपत्ति सिर पर मँडराती रहती है। विवेकवान राजा जिस प्रकार अपनी प्रजा का पालन करते हैं —

श्लोक 71 (padma.7.21.71)

तथा तानपि देवेशः पालयत्यनिशं हरिः । प्रजानां पालनं दंडं द्वेऽपि राज्ञे शुभावहे

tathā tānapi deveśaḥ pālayatyaniśaṁ hariḥ prajānāṁ pālanaṁ daṁḍaṁ dve'pi rājñe śubhāvahe

— उसी प्रकार देवेश हरि भी उन राजाओं की सदा रक्षा करते हैं। प्रजा का पालन और दुष्टों का दंड — ये दोनों ही राजा के लिए कल्याणकारी हैं।

श्लोक 72 (padma.7.21.72)

द्वाभ्यां विवर्जिता भूपास्ते विज्ञेया नृपाधमाः । दुष्टानां शासनं चैव शिष्टानां प्रतिपालनम्

dvābhyāṁ vivarjitā bhūpāste vijñeyā nṛpādhamāḥ duṣṭānāṁ śāsanaṁ caiva śiṣṭānāṁ pratipālanam

जो राजा इन दोनों से रहित हैं, उन्हें अधम राजा जानना चाहिए। दुष्टों का शासन और सज्जनों का प्रतिपालन —

श्लोक 73 (padma.7.21.73)

प्रकुर्वंतो महीपालाश्चिरं नंदंति भूतले । न्यायेनोपार्जितं वित्तं यत्नाद्रक्षेन्महीपतिः

prakurvaṁto mahīpālāściraṁ naṁdaṁti bhūtale nyāyenopārjitaṁ vittaṁ yatnādrakṣenmahīpatiḥ

— इन दोनों को करने वाले राजा ही पृथ्वी पर दीर्घकाल तक आनंद पाते हैं। राजा को न्यायपूर्वक अर्जित धन का प्रयत्नपूर्वक रक्षण करना चाहिए।

श्लोक 74 (padma.7.21.74)

दुर्वृत्तो हि महीपालो विपत्तौ न हि विस्तरेत् । नृपाः कल्याणमिच्छंतो निजराज्यं शुभाशुभम्

durvṛtto hi mahīpālo vipattau na hi vistaret nṛpāḥ kalyāṇamicchaṁto nijarājyaṁ śubhāśubham

दुराचारी राजा विपत्ति में टिक नहीं सकता। कल्याण चाहने वाले राजाओं को अपने राज्य के शुभ-अशुभ को —

श्लोक 75 (padma.7.21.75)

पश्यंति नित्यं विप्रेन्द्र सत्वराश्चारचक्षुषा । परचक्रभयं यावन्नायाति चिंतयेद्भयम्

paśyaṁti nityaṁ viprendra satvarāścāracakṣuṣā paracakrabhayaṁ yāvannāyāti ciṁtayedbhayam

— गुप्तचरों की आँखों से नित्य सतर्कता से देखते रहना चाहिए, हे विप्रेन्द्र! जब तक शत्रु-सेना का भय नहीं आता, तब तक उस भय की चिंता करते रहना चाहिए।

श्लोक 76 (padma.7.21.76)

आगते तु भये भूप आचरेन्निर्भयोऽपि च । ज्ञातौ वापि च मित्रे वा पुत्रे वापि च मंत्रिणि

āgate tu bhaye bhūpa ācarennirbhayo'pi ca jñātau vāpi ca mitre vā putre vāpi ca maṁtriṇi

परन्तु जब भय आ ही जाए, तो राजा को निर्भय होकर आचरण करना चाहिए। बांधव में, मित्र में, पुत्र में अथवा मंत्री में —

श्लोक 77 (padma.7.21.77)

कुर्यान्मुखेन गांभीर्यं मनसा प्रेमकेवलम् । मंत्रिणो ज्ञातयः पुत्राः प्रजाश्च भ्रातरस्तथा

kuryānmukhena gāṁbhīryaṁ manasā premakevalam maṁtriṇo jñātayaḥ putrāḥ prajāśca bhrātarastathā

— मुख से गंभीरता का प्रदर्शन करते हुए, मन में केवल प्रेम रखना चाहिए। मंत्री, बांधव, पुत्र, प्रजा और भाई —

श्लोक 78 (padma.7.21.78)

गांभीर्यहीनं भूपालं मन्यंते नहि भूपवत् । तिष्ठंति प्रथमं दूरे न संति पुरतस्तथा

gāṁbhīryahīnaṁ bhūpālaṁ manyaṁte nahi bhūpavat tiṣṭhaṁti prathamaṁ dūre na saṁti puratastathā

— गंभीरता-रहित राजा को राजा के समान नहीं मानते; वे पहले दूर ही खड़े रहते हैं, उसके सामने नहीं आते।

श्लोक 79 (padma.7.21.79)

लोकाश्रयं न हीच्छन्ति त्यक्तगांभीर्यभूपतेः । एकश्च मंत्री राजा वै चिरं राज्यत्वमिच्छता

lokāśrayaṁ na hīcchanti tyaktagāṁbhīryabhūpateḥ ekaśca maṁtrī rājā vai ciraṁ rājyatvamicchatā

लोग गंभीरता त्याग चुके राजा का आश्रय नहीं चाहते। दीर्घकाल तक राज्य चाहने वाले राजा को एक ही प्रमुख मंत्री रखना चाहिए।

श्लोक 80 (padma.7.21.80)

कर्तव्यः सकले राज्ये वृद्धये न हि भूसुर । अत्यंतबुद्धिवृत्तीनां भृत्यानां सपदं हरेत्

kartavyaḥ sakale rājye vṛddhaye na hi bhūsura atyaṁtabuddhivṛttīnāṁ bhṛtyānāṁ sapadaṁ haret

हे भूसुर! समस्त राज्य की वृद्धि के लिए एक ही मंत्री नियुक्त करना चाहिए; अत्यंत तीव्रबुद्धि वाले सेवकों की सम्पत्ति शीघ्र ही हर लेनी चाहिए।

श्लोक 81 (padma.7.21.81)

तस्मात्संसदि भूपालो भृत्यमन्यं नियोजयेत् । मूर्खस्त्रीविजितो राजा गीतवाद्यरतः सदा

tasmātsaṁsadi bhūpālo bhṛtyamanyaṁ niyojayet mūrkhastrīvijito rājā gītavādyarataḥ sadā

इसलिए राजा को सभा में अन्य सेवकों को भी नियुक्त करना चाहिए। मूर्ख, स्त्रियों के वश में रहने वाला, सदा गीत-वाद्य में रत रहने वाला राजा —

श्लोक 82 (padma.7.21.82)

तुरंगवाहनैर्हीनः सहसा विपदं व्रजेत् । आचारग्रहणं सत्यं स्ववाक्यप्रतिपालनम्

turaṁgavāhanairhīnaḥ sahasā vipadaṁ vrajet ācāragrahaṇaṁ satyaṁ svavākyapratipālanam

— घोड़ों और वाहनों से रहित, अचानक विपत्ति को प्राप्त होता है। सदाचार का पालन, सत्य, अपने ही वचन का निर्वाह —

श्लोक 83 (padma.7.21.83)

गांभीर्यं चेति भूपानां लक्षणानि द्विजोत्तम । स कथं नृपतिर्यस्तु प्रतापेन विवर्जितः

gāṁbhīryaṁ ceti bhūpānāṁ lakṣaṇāni dvijottama sa kathaṁ nṛpatiryastu pratāpena vivarjitaḥ

— तथा गंभीरता — हे द्विजोत्तम! ये राजाओं के लक्षण हैं। जो राजा प्रताप से रहित है, वह भला राजा कैसे कहलाए?

श्लोक 84 (padma.7.21.84)

स कथं नृपतिर्येनाऽनिर्जिता परमेदिनी । जितायां परमेदिन्यां यावत्पादं व्रजेन्नृपः

sa kathaṁ nṛpatiryenā'nirjitā paramedinī jitāyāṁ paramedinyāṁ yāvatpādaṁ vrajennṛpaḥ

और वह भला राजा कैसे कहलाए, जिसने सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय नहीं पाई? पृथ्वी पर विजय पाने के बाद राजा जितना भी आगे कदम बढ़ाता है —

श्लोक 85 (padma.7.21.85)

प्रतिपादेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति चाक्षयम् । परभूमिजयाकांक्षी हतो नृपतिभिर्युधि

pratipāde'śvamedhasya phalaṁ prāpnoti cākṣayam parabhūmijayākāṁkṣī hato nṛpatibhiryudhi

— उसे प्रत्येक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का अक्षय फल प्राप्त होता है। दूसरे राजा की भूमि पर विजय की कामना रखने वाला जो राजा युद्ध में मारा जाता है —

श्लोक 86 (padma.7.21.86)

तदागच्छेत्परं स्थानं विमुक्तः सर्वपातकैः । युधि प्राप्तजयो राजा प्राप्नोति परमं पदम्

tadāgacchetparaṁ sthānaṁ vimuktaḥ sarvapātakaiḥ yudhi prāptajayo rājā prāpnoti paramaṁ padam

— वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम स्थान को प्राप्त होता है। युद्ध में विजय पाने वाला राजा भी परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 87 (padma.7.21.87)

संग्रामे प्राप्तमृत्युर्वा दिवीन्द्र संपदं लभेत् । त्यक्तशस्त्रं त्यक्तसत्वं पलायनपरायणम्

saṁgrāme prāptamṛtyurvā divīndra saṁpadaṁ labhet tyaktaśastraṁ tyaktasatvaṁ palāyanaparāyaṇam

युद्ध में मृत्यु प्राप्त करने वाला भी स्वर्ग में इन्द्र-सम्पदा पाता है। शस्त्र त्यागकर, बल त्यागकर, भाग जाने में तत्पर —

श्लोक 88 (padma.7.21.88)

योद्धारं यदि यो हंति स भूपो यात्यधोगतिम् । पलायनपरो युद्धे तद्धंता च द्विजोत्तम

yoddhāraṁ yadi yo haṁti sa bhūpo yātyadhogatim palāyanaparo yuddhe taddhaṁtā ca dvijottama

— किसी योद्धा को यदि कोई राजा मार डाले, वह अधोगति को प्राप्त होता है। हे द्विजोत्तम! युद्ध में भाग जाने वाला और उसे मारने वाला —

श्लोक 89 (padma.7.21.89)

तावुभावपि तिष्ठेतां नरकेऽत्यंतदुःसहे । युद्ध्येत्साहसवान्योद्धा तद्धंता च द्विजोत्तम

tāvubhāvapi tiṣṭhetāṁ narake'tyaṁtaduḥsahe yuddhyetsāhasavānyoddhā taddhaṁtā ca dvijottama

— दोनों ही अत्यंत दुःसह नरक में जाते हैं। जो साहसी योद्धा युद्ध करता है, और उसका वध करने वाला भी, हे द्विजोत्तम —

श्लोक 90 (padma.7.21.90)

तिष्ठेतां तावपि स्वर्गे यावच्चन्द्र दिवाकरौ । बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपादुच्यते मया

tiṣṭhetāṁ tāvapi svarge yāvaccandra divākarau bahunātra kimuktena saṁkṣepāducyate mayā

— दोनों ही चंद्र-सूर्य के रहने तक स्वर्ग में रहते हैं। यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? मैं संक्षेप में कहता हूँ।

श्लोक 91 (padma.7.21.91)

प्रजापालनकृद्राजा कदाचिन्नावसीदति । ब्रह्मोवाच- इति ब्रुवति भूपाले तस्मिन्गलितकल्मषे

prajāpālanakṛdrājā kadācinnāvasīdati brahmovāca- iti bruvati bhūpāle tasmingalitakalmaṣe

प्रजा का पालन करने वाला राजा कभी दुःखी नहीं होता। ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार पापरहित हो चुके उस राजा के यह कहते ही —

श्लोक 92 (padma.7.21.92)

पुष्पवृष्टिरभूत्तस्मिन्महती गगनाद्द्विज । अथ दूताः समायाताः केशवस्य महात्मनः

puṣpavṛṣṭirabhūttasminmahatī gaganāddvija atha dūtāḥ samāyātāḥ keśavasya mahātmanaḥ

— हे द्विज! आकाश से उस पर पुष्पों की महती वर्षा हुई। तब महात्मा केशव के दूत वहाँ आए —

श्लोक 93 (padma.7.21.93)

राजहंसयुतं दिव्यं रथमादाय सुन्दरम् । रथं स तं समारुह्य दिव्यं कनकनिर्मितम्

rājahaṁsayutaṁ divyaṁ rathamādāya sundaram rathaṁ sa taṁ samāruhya divyaṁ kanakanirmitam

— राजहंसों से युक्त, सुवर्ण-निर्मित, सुंदर दिव्य रथ लेकर। उस दिव्य, सुवर्ण-निर्मित रथ पर आरूढ़ होकर —

श्लोक 94 (padma.7.21.94)

जगाम विष्णुभवनं स राजा गतकल्मषः । विप्रपादोदकस्यैतन्माहात्म्यं ते प्रकीर्तितम्

jagāma viṣṇubhavanaṁ sa rājā gatakalmaṣaḥ viprapādodakasyaitanmāhātmyaṁ te prakīrtitam

— वह पापरहित हो चुका राजा विष्णु के धाम को गया। यह ब्राह्मण के चरण-जल की महिमा तुम्हें कही गई है।

श्लोक 95 (padma.7.21.95)

तच्छ्रुत्वा भक्तिभावेन नरो निर्वाणमाप्नुयात् । इति ते कथितं सर्वं श्रोतुं यद्वांछितं त्वया

tacchrutvā bhaktibhāvena naro nirvāṇamāpnuyāt iti te kathitaṁ sarvaṁ śrotuṁ yadvāṁchitaṁ tvayā

उसे भक्तिभाव से सुनकर मनुष्य निर्वाण प्राप्त करता है। इस प्रकार तुमने जो कुछ सुनना चाहा था, वह सब मैंने कह दिया।

श्लोक 96 (padma.7.21.96)

गच्छ ब्राह्मण भद्रं ते चक्रिणो निलयं प्रति । हरिशर्मोवाच- क्षुधानलेन महता शरीरं मम दह्यते

gaccha brāhmaṇa bhadraṁ te cakriṇo nilayaṁ prati hariśarmovāca- kṣudhānalena mahatā śarīraṁ mama dahyate

हे ब्राह्मण! जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, चक्रधारी विष्णु के धाम की ओर। हरिशर्मा ने कहा — विशाल भूख की अग्नि से मेरा शरीर जल रहा है।

श्लोक 97 (padma.7.21.97)

केनोपायेन भगवन्क्षुधाशांतिर्भवेन्मम । एतन्मे वद देवेश भक्तस्त्वं भक्तवत्सलः

kenopāyena bhagavankṣudhāśāṁtirbhavenmama etanme vada deveśa bhaktastvaṁ bhaktavatsalaḥ

हे भगवन्! किस उपाय से मेरी भूख शांत हो? हे देवेश! यह मुझे बताइए, आप भक्तों के वत्सल और मैं आपका भक्त हूँ।

श्लोक 98 (padma.7.21.98)

प्राप्नोमि सुमहद्दुःखं नित्यं दग्धक्षुधानलैः । ब्रह्मोवाच- यच्छरीरं त्वया पुष्टं सततं भोजनैः कृतम्

prāpnomi sumahadduḥkhaṁ nityaṁ dagdhakṣudhānalaiḥ brahmovāca- yaccharīraṁ tvayā puṣṭaṁ satataṁ bhojanaiḥ kṛtam

मुझे भूख की जलती हुई अग्नि से नित्य महान दुःख प्राप्त होता है। ब्रह्मा ने कहा — जिस शरीर को तुमने सदा भोजन से पुष्ट किया —

श्लोक 99 (padma.7.21.99)

भुंक्ष्व तस्य शरीरस्य मांसानि द्विजसत्तम । आत्मतृप्तिं प्रकुर्वन्ति भोजनेन परस्य ये । मांसानि स्वशरीराणां भुंजते तेपरत्र हि

bhuṁkṣva tasya śarīrasya māṁsāni dvijasattama ātmatṛptiṁ prakurvanti bhojanena parasya ye māṁsāni svaśarīrāṇāṁ bhuṁjate teparatra hi

— हे द्विजसत्तम! उसी शरीर के मांस का भक्षण करो। जो लोग दूसरों को भोजन कराए बिना केवल अपनी ही तृप्ति करते हैं, वे परलोक में अपने ही शरीर का मांस भोगते हैं।

श्लोक 100 (padma.7.21.100)

व्यास उवाच- ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा निष्ठुरं द्विजसत्तमः । पुनस्तुष्टाव तं देवं वचनैः कोमलाक्षरैः

vyāsa uvāca- brahmaṇo vacanaṁ śrutvā niṣṭhuraṁ dvijasattamaḥ punastuṣṭāva taṁ devaṁ vacanaiḥ komalākṣaraiḥ

व्यास जी ने कहा — ब्रह्मा के इस कठोर वचन को सुनकर, उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने पुनः कोमल वचनों से उस देव की स्तुति की।

श्लोक 101 (padma.7.21.101)

ब्राह्मण उवाच-। प्रसीद देवदेवेश शरणागतपालक । क्षमस्व सकलं दोषं सुरश्रेष्ठ नमोऽस्तु ते

brāhmaṇa uvāca- prasīda devadeveśa śaraṇāgatapālaka kṣamasva sakalaṁ doṣaṁ suraśreṣṭha namo'stu te

ब्राह्मण ने कहा — हे देवदेवेश, हे शरणागत-पालक! प्रसन्न होइए। हे देवश्रेष्ठ! मेरे समस्त दोष क्षमा कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 102 (padma.7.21.102)

मलमूलप्रकीर्णानि वपूंषि वहतां नृणाम् । सर्व एव प्रभो दोषाः संति केचिद्गुणा न च

malamūlaprakīrṇāni vapūṁṣi vahatāṁ nṛṇām sarva eva prabho doṣāḥ saṁti kecidguṇā na ca

मल से भरे शरीर धारण करने वाले मनुष्यों में, हे प्रभो! सभी में केवल दोष ही हैं, कुछ भी गुण नहीं हैं।

श्लोक 103 (padma.7.21.103)

कृतं मया मोहवता दूषणं क्षंतुमर्हसि । शरणापन्नलोकानां सद्भिर्दोषो न चेक्ष्यते

kṛtaṁ mayā mohavatā dūṣaṇaṁ kṣaṁtumarhasi śaraṇāpannalokānāṁ sadbhirdoṣo na cekṣyate

मोहवश मैंने जो अपराध किया है, उसे क्षमा करने योग्य आप हैं; सज्जन लोग शरणागत लोगों के दोषों को नहीं देखते।

श्लोक 104 (padma.7.21.104)

आत्मदेहस्य मांसानि भोक्तुं ब्रह्मन्न शक्यते । देहिनां वद यद्योग्यं संतुष्टिर्जायते यतः

ātmadehasya māṁsāni bhoktuṁ brahmanna śakyate dehināṁ vada yadyogyaṁ saṁtuṣṭirjāyate yataḥ

हे ब्रह्मन्! अपने ही शरीर का मांस भक्षण करना संभव नहीं है; प्राणियों के लिए जो योग्य हो, वही बताइए, जिससे संतुष्टि उत्पन्न हो।

श्लोक 105 (padma.7.21.105)

इत्येवमुक्तं वचनं भक्त्या तेनाग्रजन्मना । उवाच सदयो ब्रह्मा सर्वज्ञो ब्राह्मणप्रियः

ityevamuktaṁ vacanaṁ bhaktyā tenāgrajanmanā uvāca sadayo brahmā sarvajño brāhmaṇapriyaḥ

उस ब्राह्मण द्वारा भक्तिपूर्वक इस प्रकार कहे जाने पर, दयालु, सर्वज्ञ, ब्राह्मणप्रिय ब्रह्मा ने यह कहा।

श्लोक 106 (padma.7.21.106)

ब्रह्मोवाच- शोकं मा कुरु विप्रेन्द्र शृणु मे वचनं शुभम् । आहारो लभते येन प्रकारेणात्र संप्रति

brahmovāca- śokaṁ mā kuru viprendra śṛṇu me vacanaṁ śubham āhāro labhate yena prakāreṇātra saṁprati

ब्रह्मा ने कहा — हे विप्रेन्द्र! शोक मत करो, मेरे शुभ वचन सुनो — किस प्रकार से यहाँ अभी आहार प्राप्त हो सकता है —

श्लोक 107 (padma.7.21.107)

आत्मनो जायते पुत्रो यथैवात्मा तथा सुतः । तस्मात्पुत्रकृतं कर्म लभंते पितरः खलु

ātmano jāyate putro yathaivātmā tathā sutaḥ tasmātputrakṛtaṁ karma labhaṁte pitaraḥ khalu

— पुत्र स्वयं अपने ही से उत्पन्न होता है, जैसा स्वयं होता है वैसा ही पुत्र भी होता है; इसलिए पुत्र द्वारा किया गया कर्म निश्चय ही पिता को प्राप्त होता है।

श्लोक 108 (padma.7.21.108)

चिरं तिष्ठसि देवस्य भवनेऽत्यंतशोभने । एवमुक्तस्ततस्तेन स विप्रः क्षुधयाकुलः

ciraṁ tiṣṭhasi devasya bhavane'tyaṁtaśobhane evamuktastatastena sa vipraḥ kṣudhayākulaḥ

तुम देव के अत्यंत शोभनीय धाम में दीर्घकाल तक रहो। यह कहे जाने पर, भूख से व्याकुल वह ब्राह्मण —

श्लोक 109 (padma.7.21.109)

स्वप्ने संदर्शनं दत्वा पुत्रं वचनमब्रवीत् । ब्राह्मण उवाच- दीक्षितोऽसि सुतश्रेष्ठ तथास्तु परमां शिवम्

svapne saṁdarśanaṁ datvā putraṁ vacanamabravīt brāhmaṇa uvāca- dīkṣito'si sutaśreṣṭha tathāstu paramāṁ śivam

— स्वप्न में अपने पुत्र को दर्शन देकर उससे यह वचन कहने लगा। ब्राह्मण ने कहा — हे श्रेष्ठ पुत्र दीक्षित! तुम्हारा परम कल्याण हो।

श्लोक 110 (padma.7.21.110)

तवास्मि जनकः सौम्य ममदुःखं निशामय । तपःप्रभावैः परमं धाम प्राप्तं मया सुत

tavāsmi janakaḥ saumya mamaduḥkhaṁ niśāmaya tapaḥprabhāvaiḥ paramaṁ dhāma prāptaṁ mayā suta

हे सौम्य! मैं तुम्हारा पिता हूँ, मेरे दुःख को सुनो। हे पुत्र! तप के प्रभाव से मैंने परम धाम प्राप्त किया है।

श्लोक 111 (padma.7.21.111)

क्षुधानलेन संतप्तस्तत्र सीदाम्यहं सदा । यदा मयि पितृस्नेहस्तवास्ति सुत संप्रति

kṣudhānalena saṁtaptastatra sīdāmyahaṁ sadā yadā mayi pitṛsnehastavāsti suta saṁprati

वहाँ भूख की अग्नि से संतप्त होकर मैं सदा दुःखी रहता हूँ। हे पुत्र! यदि अभी तुम्हारा मेरे प्रति स्नेह है —

श्लोक 112 (padma.7.21.112)

तदान्नमुदकं चापि मदर्थं दीयतां द्विज । यत्किंचिद्दीयते पुत्रैः पित्रर्थं क्षितिमंडले

tadānnamudakaṁ cāpi madarthaṁ dīyatāṁ dvija yatkiṁciddīyate putraiḥ pitrarthaṁ kṣitimaṁḍale

— तो मेरे लिए अन्न और जल दान करो, हे द्विज। पुत्रों द्वारा पिता के लिए इस पृथ्वीमंडल पर जो कुछ भी दिया जाता है —

श्लोक 113 (padma.7.21.113)

लभंते पितरस्तच्च यत्पुत्राः पितृदेहजाः । पुरा परमया भक्त्या पूजितो भगवान्मया

labhaṁte pitarastacca yatputrāḥ pitṛdehajāḥ purā paramayā bhaktyā pūjito bhagavānmayā

— वह सब पितरों को प्राप्त होता है, क्योंकि पुत्र पिता के ही शरीर से उत्पन्न हैं। पूर्वकाल में मैंने परम भक्ति से भगवान की पूजा की —

श्लोक 114 (padma.7.21.114)

गीतैर्वाद्यैश्चनृत्यैश्च स्तवपाठैश्च शोभनैः । गंधैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्घृतपूर्णप्रदीपकैः

gītairvādyaiścanṛtyaiśca stavapāṭhaiśca śobhanaiḥ gaṁdhairdhūpaiśca naivedyairghṛtapūrṇapradīpakaiḥ

— गीत, वाद्य, नृत्य और सुंदर स्तोत्र-पाठ से; गंध, धूप, नैवेद्य और घी से भरे दीपकों से —

श्लोक 115 (padma.7.21.115)

पाद्यार्घ्याचमनीयैश्च ध्यानैरावाहनादिभिः । न दत्तं जगदीशाय कृपणेन मयात्मज

pādyārghyācamanīyaiśca dhyānairāvāhanādibhiḥ na dattaṁ jagadīśāya kṛpaṇena mayātmaja

— पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, ध्यान और आवाहन आदि से — परन्तु, हे पुत्र! कंजूस होने के कारण मैंने जगदीश को —

श्लोक 116 (padma.7.21.116)

अन्नमत्रमपि क्वापि नैवेद्यं पापहारिणे । अतिथेर्न कृता पूजा तोयैरन्यैः कदाचन

annamatramapi kvāpi naivedyaṁ pāpahāriṇe atitherna kṛtā pūjā toyairanyaiḥ kadācana

— कहीं भी अन्न या पात्र-भोजन का नैवेद्य नहीं दिया, जो पाप का नाशक है; अतिथि की भी मैंने कभी जल आदि से पूजा नहीं की।

श्लोक 117 (padma.7.21.117)

ज्ञातीनां याचकानां च संतुष्टिर्न कृता मया । तेनैव कर्मणा पुत्र नारायणगृहेऽपि च

jñātīnāṁ yācakānāṁ ca saṁtuṣṭirna kṛtā mayā tenaiva karmaṇā putra nārāyaṇagṛhe'pi ca

बांधवों और याचकों की भी मैंने कभी संतुष्टि नहीं की। हे पुत्र! उसी कर्म के कारण नारायण के धाम में रहते हुए भी —

श्लोक 118 (padma.7.21.118)

क्षुधानलेन संतप्तः सीदामि प्रतिवासरे । अतोऽन्नतोयदानानि दरिद्राय द्विजातये

kṣudhānalena saṁtaptaḥ sīdāmi prativāsare ato'nnatoyadānāni daridrāya dvijātaye

— मैं भूख की अग्नि से संतप्त होकर प्रतिदिन दुःखी रहता हूँ। इसलिए दरिद्र ब्राह्मण को अन्न और जल का दान —

श्लोक 119 (padma.7.21.119)

दत्वा क्षिप्रं सुरश्रेष्ठ प्राणरक्षां कुरुष्व भोः । अथवा न करोषि त्वं निष्ठुरत्वाद्यदा भवान्

datvā kṣipraṁ suraśreṣṭha prāṇarakṣāṁ kuruṣva bhoḥ athavā na karoṣi tvaṁ niṣṭhuratvādyadā bhavān

— शीघ्र देकर, मेरे प्राणों की रक्षा करो। और यदि तुम निष्ठुरतावश ऐसा नहीं करोगे —

श्लोक 120 (padma.7.21.120)

स्वमांसान्येव भोक्ष्यामि तदा वै विष्णुमंदिरे । अथाऽसौ क्षुधितो विप्रः शुष्ककंठोष्ठतालुकः

svamāṁsānyeva bhokṣyāmi tadā vai viṣṇumaṁdire athā'sau kṣudhito vipraḥ śuṣkakaṁṭhoṣṭhatālukaḥ

— तो मैं इसी विष्णु-मंदिर में अपने ही मांस का भक्षण करूँगा। तब वह भूखा ब्राह्मण, जिसका कंठ, होंठ और तालु सूख गए थे —

श्लोक 121 (padma.7.21.121)

इत्युक्त्वा दीक्षितं पुत्रमदृश्यः सहसाऽभवत् । ततः प्रभाते विमले प्रादुर्भूते दिवाकरे

ityuktvā dīkṣitaṁ putramadṛśyaḥ sahasā'bhavat tataḥ prabhāte vimale prādurbhūte divākare

— यह कहकर अपने पुत्र दीक्षित को छोड़कर सहसा अदृश्य हो गया। फिर स्वच्छ प्रभात में सूर्य के उदय होने पर —

श्लोक 122 (padma.7.21.122)

स्वप्ने यदुक्तं पित्रा तु चिंतयामास दीक्षितः । आत्मनः कर्मदोषेण परलोकेऽपि मत्पिता

svapne yaduktaṁ pitrā tu ciṁtayāmāsa dīkṣitaḥ ātmanaḥ karmadoṣeṇa paraloke'pi matpitā

— स्वप्न में पिता ने जो कहा था, उस पर दीक्षित ने विचार किया — "अपने ही कर्मदोष से मेरे पिता परलोक में भी —

श्लोक 123 (padma.7.21.123)

क्षुधया दग्धसर्वाङ्गः सीदति प्रतिवासरम् । धिगस्तु मां मंदधियं कृपणप्रवरञ्जनम्

kṣudhayā dagdhasarvāṅgaḥ sīdati prativāsaram dhigastu māṁ maṁdadhiyaṁ kṛpaṇapravarañjanam

— भूख से जले हुए सम्पूर्ण अंगों वाला होकर प्रतिदिन दुःखी रहता है। धिक्कार है मुझ मंदबुद्धि, अत्यंत कंजूस पुत्र को!

श्लोक 124 (padma.7.21.124)

मयापि पितृपुण्येन न किञ्चिदपि दीयते । इति संचिंत्य बहुधा दीक्षितोऽपि द्विजोत्तम

mayāpi pitṛpuṇyena na kiñcidapi dīyate iti saṁciṁtya bahudhā dīkṣito'pi dvijottama

— मैंने भी अपने पिता के पुण्य के लिए कुछ भी दान नहीं दिया।" इस प्रकार बहुत विचार कर दीक्षित ने भी —

श्लोक 125 (padma.7.21.125)

ददौ दानानि विप्रेभ्यः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । तेन पुण्यप्रभावेण तृषयारहितः क्षुधा

dadau dānāni viprebhyaḥ śraddhābhaktisamanvitaḥ tena puṇyaprabhāveṇa tṛṣayārahitaḥ kṣudhā

— श्रद्धा और भक्ति से युक्त होकर ब्राह्मणों को दान दिए। उस पुण्य के प्रभाव से भूख-प्यास से रहित होकर —

श्लोक 126 (padma.7.21.126)

तस्थौ नारायणागारे यावत्कालं शृणुष्व तत् । चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणोऽहं प्रकीर्तितम्

tasthau nārāyaṇāgāre yāvatkālaṁ śṛṇuṣva tat caturyugasahasrāṇi brahmaṇo'haṁ prakīrtitam

— उसका पिता नारायण के धाम में रहने लगा। कितने काल तक, यह सुनो — मैं तुम्हें बताता हूँ, चार हज़ार युगों तक ब्रह्मा के एक दिन की गणना की जाती है।

श्लोक 127 (padma.7.21.127)

भवंति तस्मिन्नेवाह्नि मनवश्च चतुर्दश । इंद्राश्चतुर्द्दश प्रोक्तास्तस्मिन्नेव दिने च ते

bhavaṁti tasminnevāhni manavaśca caturdaśa iṁdrāścaturddaśa proktāstasminneva dine ca te

उसी एक दिन में चौदह मनु होते हैं, और उसी दिन में चौदह इन्द्र भी होते हैं, ऐसा कहा गया है।

श्लोक 128 (padma.7.21.128)

भुंजते ब्राह्मणः श्रेष्ठ विषयान्स्वान्पृथक्पृथक् । एकस्मिन्ब्रह्मदिवसे भुक्त्वा स्वान्विषयाञ्छुभान्

bhuṁjate brāhmaṇaḥ śreṣṭha viṣayānsvānpṛthakpṛthak ekasminbrahmadivase bhuktvā svānviṣayāñchubhān

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! वे सभी अपने-अपने भिन्न-भिन्न शासन-काल भोगते हैं। ब्रह्मा के एक ही दिन में अपने-अपने शुभ शासन-काल भोगकर —

श्लोक 129 (padma.7.21.129)

इन्द्राश्च मनवश्चैव विनश्यंति चतुर्दश । विष्णुलोके स्थिते तस्मिन्हरिशर्मातिभास्वरे

indrāśca manavaścaiva vinaśyaṁti caturdaśa viṣṇuloke sthite tasminhariśarmātibhāsvare

— वे चौदह इन्द्र और चौदह मनु नष्ट हो जाते हैं। उस अत्यंत तेजस्वी हरिशर्मा के विष्णुलोक में स्थित रहते —

श्लोक 130 (padma.7.21.130)

समस्तसुखदे रम्ये ब्रह्मणो दिवसो गतः । तत्रासौ कालमेतावद्भुक्त्वा भोगान्मनोरमान्

samastasukhade ramye brahmaṇo divaso gataḥ tatrāsau kālametāvadbhuktvā bhogānmanoramān

— उस समस्त सुख देने वाले, रमणीय स्थान में ब्रह्मा का एक दिन बीत गया। वहाँ इतने काल तक मनोरम भोगों को भोगकर —

श्लोक 131 (padma.7.21.131)

परमं ज्ञानमासाद्य प्रविवेश हरेस्तनुम् । व्यास उवाच- अन्नतोयसमं दानं संसारे नास्ति जैमिने

paramaṁ jñānamāsādya praviveśa harestanum vyāsa uvāca- annatoyasamaṁ dānaṁ saṁsāre nāsti jaimine

— परम ज्ञान प्राप्त कर वह हरि के ही शरीर में विलीन हो गया। व्यास जी ने कहा — हे जैमिनि! संसार में अन्न-जल के दान के समान कोई दान नहीं है।

श्लोक 132 (padma.7.21.132)

सर्वदानफलान्येव अन्नतोयप्रदानतः । न च पात्रपरीक्षा च न कालनियमः क्वचित्

sarvadānaphalānyeva annatoyapradānataḥ na ca pātraparīkṣā ca na kālaniyamaḥ kvacit

अन्न-जल के दान से समस्त अन्य दानों के फल प्राप्त होते हैं; इसमें न तो पात्र की परीक्षा आवश्यक है, न किसी काल का नियम है।

श्लोक 133 (padma.7.21.133)

अन्नतोयप्रदानेषु निरुक्तस्तत्वदर्शिभिः । अन्नतोयप्रदानानि कर्तव्यानि सदैव हि

annatoyapradāneṣu niruktastatvadarśibhiḥ annatoyapradānāni kartavyāni sadaiva hi

तत्वदर्शियों ने अन्न-जल के दान को इसी प्रकार निरूपित किया है; इसलिए अन्न और जल का दान सदा ही करना चाहिए।

श्लोक 134 (padma.7.21.134)

एतत्पठंति मनुजाः परमादरेण माहात्म्यमन्नजलयोश्च तथा द्विजानाम् । ते प्राप्य चान्नजलदानफलं ततोंऽते नारायणस्य निलयं सुखदं प्रयांति

etatpaṭhaṁti manujāḥ paramādareṇa māhātmyamannajalayośca tathā dvijānām te prāpya cānnajaladānaphalaṁ tatoṁ'te nārāyaṇasya nilayaṁ sukhadaṁ prayāṁti

जो मनुष्य ब्राह्मणों के प्रति अन्न-जल की इस महिमा को अत्यंत आदर से पढ़ते हैं, वे अन्न-जल-दान का फल प्राप्त कर, अंत में नारायण के उस सुखदायी धाम को प्राप्त होते हैं।

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