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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 23

एकादशी-महिमा (शेष)

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (padma.7.23.1)

व्यास उवाच- पूर्वं कोचरशोनाम राजाऽभूत्क्षितिमंडले । शांतः परमधर्मज्ञो राजनीतिविदांवरः

vyāsa uvāca- pūrvaṁ kocaraśonāma rājā'bhūtkṣitimaṁḍale śāṁtaḥ paramadharmajño rājanītividāṁvaraḥ

व्यास जी ने कहा — पूर्वकाल में पृथ्वीमंडल पर कोचरशो नामक एक राजा था, जो शांत, परम धर्मज्ञ और राजनीतिज्ञों में श्रेष्ठ था।

श्लोक 2 (padma.7.23.2)

सत्यवादी जितक्रोधो जितवैरि समुच्चयः । नारायणार्चनपरो हरिसेवा रतः परः

satyavādī jitakrodho jitavairi samuccayaḥ nārāyaṇārcanaparo harisevā rataḥ paraḥ

वह सत्यवादी, क्रोध पर विजय पाने वाला, समस्त शत्रुओं को जीतने वाला, नारायण की अर्चना में तत्पर और हरि की सेवा में परम रत था।

श्लोक 3 (padma.7.23.3)

सुप्रज्ञा नाम महिषी तस्यासीत्प्रियवादिनी । सर्वलक्षणसंपन्ना पतिसेवापरायणा

suprajñā nāma mahiṣī tasyāsītpriyavādinī sarvalakṣaṇasaṁpannā patisevāparāyaṇā

उसकी सुप्रज्ञा नामक रानी थी, जो मधुरभाषिणी, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त और पति-सेवा में परायण थी।

श्लोक 4 (padma.7.23.4)

एकादशीव्रतरता सर्वप्राणिहितैषिणी । जातिस्मरा महाभागा सुशीला वरवर्णिनी

ekādaśīvrataratā sarvaprāṇihitaiṣiṇī jātismarā mahābhāgā suśīlā varavarṇinī

वह एकादशी-व्रत में लीन, समस्त प्राणियों का हित चाहने वाली, अपने पूर्वजन्म को स्मरण रखने वाली, महाभाग्यशाली, सुशील और सुंदरी थी।

श्लोक 5 (padma.7.23.5)

स राजा दशमीं कृत्वा सदारः परमार्थवित् । एकादशीं निशीथिन्यां जागरं कर्तुमुद्यतः

sa rājā daśamīṁ kṛtvā sadāraḥ paramārthavit ekādaśīṁ niśīthinyāṁ jāgaraṁ kartumudyataḥ

उस परमार्थ के ज्ञाता राजा ने अपनी रानी सहित दशमी का व्रत करके, एकादशी की रात्रि में जागरण करने के लिए तैयारी की।

श्लोक 6 (padma.7.23.6)

तत्रांतरे द्विजः कश्चिच्छौरिर्नाम महीपतेः । आजगाम महातेजास्तस्य जागरमण्डपम्

tatrāṁtare dvijaḥ kaścicchaurirnāma mahīpateḥ ājagāma mahātejāstasya jāgaramaṇḍapam

इसी बीच शौरि नामक कोई महातेजस्वी ब्राह्मण, उस राजा के जागरण-मंडप में आया।

श्लोक 7 (padma.7.23.7)

तमायांतं स भूपालो नारायणपरायणः । पाद्याद्यैः पूजयामास सदारोऽत्यंतहर्षितः

tamāyāṁtaṁ sa bhūpālo nārāyaṇaparāyaṇaḥ pādyādyaiḥ pūjayāmāsa sadāro'tyaṁtaharṣitaḥ

नारायण में परायण उस राजा ने, अपनी रानी सहित अत्यंत हर्षित होकर, आते हुए उस ब्राह्मण की पाद्य आदि से पूजा की।

श्लोक 8 (padma.7.23.8)

तेषां मध्ये सूपविष्ठः स विप्रोऽखिलतत्ववित् । विष्णुपूजापरांस्तत्र ददर्श व्रतिनो बहून्

teṣāṁ madhye sūpaviṣṭhaḥ sa vipro'khilatatvavit viṣṇupūjāparāṁstatra dadarśa vratino bahūn

समस्त तत्वों के ज्ञाता वह ब्राह्मण उन लोगों के बीच बैठकर, वहाँ विष्णु-पूजा में तत्पर अनेक व्रतियों को देखने लगा।

श्लोक 9 (padma.7.23.9)

पूजयंति हरिं केचिन्नानापुष्पैर्मनोरमैः । गंधैर्धूपैस्तथादीपैरुपहारैरनुत्तमैः

pūjayaṁti hariṁ kecinnānāpuṣpairmanoramaiḥ gaṁdhairdhūpaistathādīpairupahārairanuttamaiḥ

कोई नाना मनोरम फूलों से, गंध, धूप, दीपों और उत्तम उपहारों से हरि की पूजा कर रहे थे।

श्लोक 10 (padma.7.23.10)

गङ्गामृद्भूषिताकेचित्तुलसीपत्रमालया । अलंकृता हरेरग्रे नृत्यंति व्रतिनो मुदा

gaṅgāmṛdbhūṣitākecittulasīpatramālayā alaṁkṛtā hareragre nṛtyaṁti vratino mudā

कोई गंगा-मिट्टी से भूषित, तुलसी-पत्रों की माला से अलंकृत होकर, हरि के समक्ष हर्षपूर्वक नृत्य कर रहे थे।

श्लोक 11 (padma.7.23.11)

केचिद्गायंति गीतानि ललितानि हरेः पुनः । करतालं समादाय व्रतिनो भगवत्प्रियाः

kecidgāyaṁti gītāni lalitāni hareḥ punaḥ karatālaṁ samādāya vratino bhagavatpriyāḥ

भगवान के प्रिय कुछ व्रती करताल लेकर हरि के मधुर गीत गा रहे थे।

श्लोक 12 (padma.7.23.12)

स्तवैरनुत्तमैः केचिन्नारायणमनामयम् । स्तुवंति जगतामीशं दिव्यार्थैः कोमलाक्षरैः

stavairanuttamaiḥ kecinnārāyaṇamanāmayam stuvaṁti jagatāmīśaṁ divyārthaiḥ komalākṣaraiḥ

कोई उत्तम स्तोत्रों से, दिव्य अर्थों और कोमल शब्दों से, निरामय जगदीश्वर नारायण की स्तुति कर रहे थे।

श्लोक 13 (padma.7.23.13)

श्वेतचामरवातेन शीतलेन जगत्पतेः । वीजयंति हरेः प्रीतिं केचिच्च महतीं तथा

śvetacāmaravātena śītalena jagatpateḥ vījayaṁti hareḥ prītiṁ kecicca mahatīṁ tathā

कोई शीतल श्वेत चामर की हवा से जगत्पति को पंखा झल रहे थे, जिससे हरि की महती प्रसन्नता होती थी।

श्लोक 14 (padma.7.23.14)

केचिद्वीणादिकं वाद्यं ललितं शुचिमंगलम् । वादयंतो महात्मानः केचिद्गायंति केशवम्

kecidvīṇādikaṁ vādyaṁ lalitaṁ śucimaṁgalam vādayaṁto mahātmānaḥ kecidgāyaṁti keśavam

कुछ महात्मा वीणा आदि सुंदर, पवित्र, मंगलमय वाद्य बजा रहे थे, और कुछ केशव का गुणगान गा रहे थे।

श्लोक 15 (padma.7.23.15)

स राजा राजमहिषी द्वावप्यत्यंतहर्षितौ । गायतां ललितं गीतं नृत्यतां नृत्यमुत्तमम्

sa rājā rājamahiṣī dvāvapyatyaṁtaharṣitau gāyatāṁ lalitaṁ gītaṁ nṛtyatāṁ nṛtyamuttamam

वह राजा और रानी, दोनों अत्यंत हर्षित होकर, मधुर गीत गाने वाले और उत्तम नृत्य करने वालों के साथ लीन हो गए।

श्लोक 16 (padma.7.23.16)

तौ दंपती महात्मानौ नृत्यगीतादिकारिणौ । वाचा मधुरया प्राह स शौरिर्ब्राह्मणोत्तमः

tau daṁpatī mahātmānau nṛtyagītādikāriṇau vācā madhurayā prāha sa śaurirbrāhmaṇottamaḥ

नृत्य-गीत आदि करने वाले उन महात्मा दंपती से, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण शौरि मधुर वाणी में बोला।

श्लोक 17 (padma.7.23.17)

शौरिरुवाच- धन्योऽसि त्वं महीपाल धन्या च महिषी तव । चरित्रं युवयोरेतन्मङ्गलं भुविदुर्ल्लभम्

śauriruvāca- dhanyo'si tvaṁ mahīpāla dhanyā ca mahiṣī tava caritraṁ yuvayoretanmaṅgalaṁ bhuvidurllabham

शौरि ने कहा — हे राजन्! तुम धन्य हो, और तुम्हारी रानी भी धन्य है; तुम दोनों का यह मंगलमय चरित्र पृथ्वी पर दुर्लभ है।

श्लोक 18 (padma.7.23.18)

त्वां वक्ष्यामि यतः कश्चिन्न दृष्टो वैष्णवोत्तमः । त्वया भूमिभुजा पृथ्वी धन्येयं नात्र संशयः

tvāṁ vakṣyāmi yataḥ kaścinna dṛṣṭo vaiṣṇavottamaḥ tvayā bhūmibhujā pṛthvī dhanyeyaṁ nātra saṁśayaḥ

मैं तुमसे कहता हूँ, क्योंकि तुम्हारे समान श्रेष्ठ वैष्णव मैंने कभी नहीं देखा; हे राजन्! तुम्हारे द्वारा यह पृथ्वी धन्य हुई है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 19 (padma.7.23.19)

एकादशीव्रतमिदं पवित्रं भगवत्प्रियम् । सदारः कुरुषे भूप तस्मात्त्वं वैष्णवाग्रणीः

ekādaśīvratamidaṁ pavitraṁ bhagavatpriyam sadāraḥ kuruṣe bhūpa tasmāttvaṁ vaiṣṇavāgraṇīḥ

हे राजन्! यह पवित्र, भगवान को प्रिय एकादशी-व्रत तुम अपनी रानी सहित करते हो, इसलिए तुम वैष्णवों में अग्रणी हो।

श्लोक 20 (padma.7.23.20)

सप्तद्वीपैकनाथश्च सदारस्त्वं नृपोत्तम । नारायणाग्रतः प्रीत्या यतो नृत्यसि गायसि

saptadvīpaikanāthaśca sadārastvaṁ nṛpottama nārāyaṇāgrataḥ prītyā yato nṛtyasi gāyasi

हे नृपोत्तम! सातों द्वीपों के एकमात्र स्वामी होते हुए भी, तुम अपनी रानी सहित प्रेमपूर्वक नारायण के समक्ष नाचते और गाते हो।

श्लोक 21 (padma.7.23.21)

चरित्रं युवयोरेतद्दंपत्योर्दृष्टमद्भुतम् । कस्माद्बुद्धिरियं जाता युवयोरतिनिर्मला

caritraṁ yuvayoretaddaṁpatyordṛṣṭamadbhutam kasmādbuddhiriyaṁ jātā yuvayoratinirmalā

तुम दोनों दंपतियों का यह चरित्र देखकर मुझे अद्भुत लगा है — तुम दोनों में यह अत्यंत निर्मल बुद्धि कहाँ से उत्पन्न हुई?

श्लोक 22 (padma.7.23.22)

व्यास उवाच- तस्येदं वाक्यमाकर्ण्य शौरिनाम्नो द्विजन्मनः । ईषद्धास्यमुखीप्राह सुप्राज्ञा तमथो द्विजम्

vyāsa uvāca- tasyedaṁ vākyamākarṇya śaurināmno dvijanmanaḥ īṣaddhāsyamukhīprāha suprājñā tamatho dvijam

व्यास जी ने कहा — शौरि नामक उस ब्राह्मण के इन वचनों को सुनकर, कुछ मुस्कुराते हुए सुप्रज्ञा ने उस ब्राह्मण से यह कहा।

श्लोक 23 (padma.7.23.23)

सुप्राज्ञोवाच- एकादशीप्रभावेन पूर्वमावां द्विजोत्तम । अतिपातकिनौ मुक्तौ सूर्यजेन महात्मना

suprājñovāca- ekādaśīprabhāvena pūrvamāvāṁ dvijottama atipātakinau muktau sūryajena mahātmanā

सुप्रज्ञा ने कहा — हे द्विजोत्तम! पूर्वकाल में हम दोनों अत्यंत पापी थे, फिर भी एकादशी के प्रभाव से महात्मा सूर्यपुत्र द्वारा मुक्त कर दिए गए।

श्लोक 24 (padma.7.23.24)

जातिस्मृतिप्रभावेण दिव्यमेकादशीव्रतम् । कुर्वः संप्रति विप्रेन्द्र परमस्थानकाङ्क्षया

jātismṛtiprabhāveṇa divyamekādaśīvratam kurvaḥ saṁprati viprendra paramasthānakāṅkṣayā

पूर्वजन्म-स्मृति के प्रभाव से, हे विप्रेन्द्र! अब हम परम स्थान की कामना से यह दिव्य एकादशी-व्रत करते हैं।

श्लोक 25 (padma.7.23.25)

शौरिरुवाच- यदि नूनं वरारोहे पूर्वां जातिं त्वमात्मनः । वेत्सि मे ब्रूहि तां श्रोतुं जायते कौतुकं हृदि

śauriruvāca- yadi nūnaṁ varārohe pūrvāṁ jātiṁ tvamātmanaḥ vetsi me brūhi tāṁ śrotuṁ jāyate kautukaṁ hṛdi

शौरि ने कहा — हे वरारोहे! यदि तुम निश्चय ही अपने पूर्वजन्म को जानती हो, तो मुझे बताओ; उसे सुनने की कौतूहल मेरे हृदय में उत्पन्न हो रहा है।

श्लोक 26 (padma.7.23.26)

पूर्वं स्थिता का भवती पतिर्वा कः स्थितस्तव । कथं भास्करिणा त्यक्तौ युवां पातकिनावपि

pūrvaṁ sthitā kā bhavatī patirvā kaḥ sthitastava kathaṁ bhāskariṇā tyaktau yuvāṁ pātakināvapi

पूर्वकाल में तुम कौन थीं, और तुम्हारा पति कौन था? पापी होते हुए भी सूर्यपुत्र ने तुम दोनों को कैसे छोड़ दिया?

श्लोक 27 (padma.7.23.27)

सुप्राज्ञोवाच- अप्रकाश्यमिदं वाक्यं यद्यपि द्विजसत्तम । स्थितास्मि वारमुख्याऽहं रतिशास्त्रविशारदा

suprājñovāca- aprakāśyamidaṁ vākyaṁ yadyapi dvijasattama sthitāsmi vāramukhyā'haṁ ratiśāstraviśāradā

सुप्रज्ञा ने कहा — हे द्विजसत्तम! यद्यपि यह बात प्रकट करने योग्य नहीं है, फिर भी कहती हूँ — मैं एक प्रमुख वेश्या थी, रतिशास्त्र में निपुण।

श्लोक 28 (padma.7.23.28)

तस्मिञ्जन्मनि पापानि घोराणि सुबहूनि च । मया कृतानि विप्रेन्द्र नरकक्लेशदानि वै

tasmiñjanmani pāpāni ghorāṇi subahūni ca mayā kṛtāni viprendra narakakleśadāni vai

उस जन्म में, हे विप्रेन्द्र! मैंने अनेक घोर पाप किए थे, जो नरक का क्लेश देने वाले थे।

श्लोक 29 (padma.7.23.29)

अयं नित्योदयो नाम शूद्र स्वाःचारवर्जितः । परदारहरः क्रूरः परद्रव्यापहारकः

ayaṁ nityodayo nāma śūdra svāḥcāravarjitaḥ paradāraharaḥ krūraḥ paradravyāpahārakaḥ

यह मेरा वर्तमान पति, तब नित्योदय नामक एक शूद्र था, अपने ही आचार से रहित, दूसरों की पत्नियों को हरने वाला, क्रूर, दूसरों के धन को हड़पने वाला।

श्लोक 30 (padma.7.23.30)

सुरापो मित्रहंता च भ्रूणहा परहिंसकः । अत्यहंकारयुक्तश्च धर्मनिंदाकरः सदा

surāpo mitrahaṁtā ca bhrūṇahā parahiṁsakaḥ atyahaṁkārayuktaśca dharmaniṁdākaraḥ sadā

वह मदिरापायी, मित्रों का हत्यारा, भ्रूण-हत्यारा, दूसरों को कष्ट देने वाला, अत्यंत अहंकारी और सदा धर्म की निंदा करने वाला था।

श्लोक 31 (padma.7.23.31)

एकदा ज्ञातिभिः सर्वैः परित्यक्तो हि सद्व्रतैः । आजगाम ममागारं वेश्याविभ्रमलोलुपः

ekadā jñātibhiḥ sarvaiḥ parityakto hi sadvrataiḥ ājagāma mamāgāraṁ veśyāvibhramalolupaḥ

एक बार सद्वृत्त बांधवों द्वारा त्यागा गया वह, वेश्या की चंचलता का लोभी होकर मेरे घर आया।

श्लोक 32 (padma.7.23.32)

युवानं सुंदरं दृष्ट्वा तमेनं द्विजसत्तम । मयापि प्रीतिमासाद्य संतुष्टः सुरतैरपि

yuvānaṁ suṁdaraṁ dṛṣṭvā tamenaṁ dvijasattama mayāpi prītimāsādya saṁtuṣṭaḥ suratairapi

हे द्विजसत्तम! उस सुंदर युवक को देखकर मुझे भी प्रीति उत्पन्न हुई, और वह भी रति-क्रीड़ा से संतुष्ट हुआ।

श्लोक 33 (padma.7.23.33)

ततोऽनुभूय सुरतं मया सह तपोधन । अयमाह च मां प्रेम्णा विनयावनतो वचः

tato'nubhūya surataṁ mayā saha tapodhana ayamāha ca māṁ premṇā vinayāvanato vacaḥ

हे तपोधन! फिर मेरे साथ रति-क्रीड़ा का अनुभव करके, इसने विनम्रतापूर्वक झुककर प्रेम से मुझसे यह वचन कहा।

श्लोक 34 (padma.7.23.34)

अहं सुरतशास्त्रज्ञः परित्यक्तः स्वबंधुभिः । यदि त्वं मन्यसे तस्मिंस्तिष्ठाम्यत्र त्वया सह

ahaṁ surataśāstrajñaḥ parityaktaḥ svabaṁdhubhiḥ yadi tvaṁ manyase tasmiṁstiṣṭhāmyatra tvayā saha

"मैं रति-शास्त्र का ज्ञाता हूँ, अपने ही बांधवों द्वारा त्याग दिया गया हूँ; यदि तुम स्वीकार करो, तो मैं यहीं तुम्हारे साथ रहूँ।"

श्लोक 35 (padma.7.23.35)

विनयावनतं वाक्यमिदं शुश्राव तद्दिवज । दंपतीभावमासाद्य सहानेन स्थितास्म्यहम्

vinayāvanataṁ vākyamidaṁ śuśrāva taddivaja daṁpatībhāvamāsādya sahānena sthitāsmyaham

हे द्विज! उसके इस विनम्र वचन को सुनकर, मैं दंपती-भाव से इसके साथ रहने लगी।

श्लोक 36 (padma.7.23.36)

कदाचिद्दिवजशार्दूल एकादश्यां तिथौ हरेः । महद्भिः पीडिताहं च देहदेहावघातकैः

kadāciddivajaśārdūla ekādaśyāṁ tithau hareḥ mahadbhiḥ pīḍitāhaṁ ca dehadehāvaghātakaiḥ

हे द्विजशार्दूल! एक बार हरि की एकादशी तिथि को, मैं शरीर को क्षति पहुँचाने वाले महान रोगों से पीड़ित हो गई।

श्लोक 37 (padma.7.23.37)

तस्मिन्नेव द्विजश्रेष्ठ ज्वरजर्जरदेहया । न पीतमुदकं नान्नं भुक्तं च परया भिया

tasminneva dvijaśreṣṭha jvarajarjaradehayā na pītamudakaṁ nānnaṁ bhuktaṁ ca parayā bhiyā

हे द्विजश्रेष्ठ! ज्वर से जर्जर देह वाली मैंने उसी दिन, अत्यंत भय के कारण न जल पिया, न अन्न खाया।

श्लोक 38 (padma.7.23.38)

ममस्नेहोदयोऽयं च तस्मिन्नेव दिने हरेः । तत्याजान्नं च तोयं च विषण्ण इव जन्मना

mamasnehodayo'yaṁ ca tasminneva dine hareḥ tatyājānnaṁ ca toyaṁ ca viṣaṇṇa iva janmanā

और मेरे स्नेह से यह नित्योदय भी उसी हरि-दिन में, मानो जन्म से ही खिन्न होकर, अन्न और जल का त्याग कर बैठा।

श्लोक 39 (padma.7.23.39)

अथ रात्रौ द्विजश्रेष्ठ दीपं प्रज्वाल्य सर्पिषा । मया कृतं जागरणं ज्वरापहतचेतसा

atha rātrau dvijaśreṣṭha dīpaṁ prajvālya sarpiṣā mayā kṛtaṁ jāgaraṇaṁ jvarāpahatacetasā

हे द्विजश्रेष्ठ! फिर रात्रि में घी का दीपक जलाकर, ज्वर से आहत चित्त वाली मैंने भी जागरण किया।

श्लोक 40 (padma.7.23.40)

नारायण हरेकृष्ण रक्ष मामिति जल्पता । मुहुर्मुहुरनेनापि कृतं जागरणं निशि

nārāyaṇa harekṛṣṇa rakṣa māmiti jalpatā muhurmuhuranenāpi kṛtaṁ jāgaraṇaṁ niśi

"हे नारायण, हे हरि, हे कृष्ण! मेरी रक्षा करो" — ऐसा बार-बार कहते हुए इसने भी रात्रि में जागरण किया।

श्लोक 41 (padma.7.23.41)

उपवासप्रभावेण केशवोच्चारणेन च । आवयोः सकलं पापं विनष्टमभवद्दिवज

upavāsaprabhāveṇa keśavoccāraṇena ca āvayoḥ sakalaṁ pāpaṁ vinaṣṭamabhavaddivaja

हे द्विज! उपवास के प्रभाव से और केशव के नाम-उच्चारण से, हम दोनों के समस्त पाप नष्ट हो गए।

श्लोक 42 (padma.7.23.42)

ततः प्रभाते विमले भगवत्युदिते रवौ । ज्वरार्दिताहं पंचत्वं गता ब्राह्मणसत्तम

tataḥ prabhāte vimale bhagavatyudite ravau jvarārditāhaṁ paṁcatvaṁ gatā brāhmaṇasattama

फिर स्वच्छ प्रभात में, भगवान सूर्य के उदय होने पर, हे ब्राह्मणसत्तम! ज्वर से पीड़ित मैं मृत्यु को प्राप्त हो गई।

श्लोक 43 (padma.7.23.43)

संप्राप्तपंचतां दृष्ट्वा मामयं च ततः शुचिः । सहत्या मरणं भेजे निंदितः सकलैर्जनैः

saṁprāptapaṁcatāṁ dṛṣṭvā māmayaṁ ca tataḥ śuciḥ sahatyā maraṇaṁ bheje niṁditaḥ sakalairjanaiḥ

मुझे मृत्यु को प्राप्त देखकर, यह भी शुद्ध होकर सह-मरण को प्राप्त हुआ, यद्यपि सभी लोगों ने इसकी निंदा की।

श्लोक 44 (padma.7.23.44)

सूर्य्यजस्य ततः प्रेष्यैर्ज्वलदग्निनिभेक्षणैः । बद्ध्वा दृढेन पाशेन नीतौ दुर्गमवर्त्मना

sūryyajasya tataḥ preṣyairjvaladagninibhekṣaṇaiḥ baddhvā dṛḍhena pāśena nītau durgamavartmanā

फिर सूर्यपुत्र के सेवकों ने, जिनकी आँखें जलती हुई अग्नि के समान थीं, हम दोनों को दृढ़ पाश से बाँधकर दुर्गम मार्ग से ले गए।

श्लोक 45 (padma.7.23.45)

शुभकर्मा शुभं वापि चित्रगुप्तो यमाज्ञया । सर्वं विचारयामास मूलात्स तु विचक्षणः

śubhakarmā śubhaṁ vāpi citragupto yamājñayā sarvaṁ vicārayāmāsa mūlātsa tu vicakṣaṇaḥ

निपुण चित्रगुप्त ने यम की आज्ञा से हमारे शुभ-अशुभ समस्त कर्मों का मूल से विचार किया।

श्लोक 46 (padma.7.23.46)

चित्रगुप्त उवाच- यद्यप्येतौ महाबाहो महापातकिनां वरौ । तथापि पातकैर्मुक्तौ ह्येकादश्यामुपोषणात्

citragupta uvāca- yadyapyetau mahābāho mahāpātakināṁ varau tathāpi pātakairmuktau hyekādaśyāmupoṣaṇāt

चित्रगुप्त ने कहा — हे महाबाहो! यद्यपि ये दोनों महापापियों में श्रेष्ठ हैं, फिर भी एकादशी को उपवास करने से ये पापों से मुक्त हो चुके हैं।

श्लोक 47 (padma.7.23.47)

अनिच्छयापि यः कुर्यात्पुण्यमेकादशीव्रतम् । सोऽपि गच्छेत्परंस्थानं सर्वपापविवर्जितः

anicchayāpi yaḥ kuryātpuṇyamekādaśīvratam so'pi gacchetparaṁsthānaṁ sarvapāpavivarjitaḥ

जो अनिच्छापूर्वक भी पुण्यमय एकादशी-व्रत कर लेता है, वह भी समस्त पापों से रहित होकर परम स्थान को जाता है।

श्लोक 48 (padma.7.23.48)

इत्युक्तश्चित्रगुप्तेन धर्मराजो महायशाः । आसनात्सहसोत्थाय ववंदे ताममुंच सः

ityuktaścitraguptena dharmarājo mahāyaśāḥ āsanātsahasotthāya vavaṁde tāmamuṁca saḥ

चित्रगुप्त द्वारा ऐसा कहे जाने पर, महायशस्वी धर्मराज अपने आसन से तत्काल उठकर, उन दोनों को वंदन कर उनके बंधन को खोल दिया।

श्लोक 49 (padma.7.23.49)

सुगंधैश्चंदनैर्दिव्यैर्धूपैः पुष्पैश्च मृत्युना । सुवर्णाभरणैरेव मंडितौ पापवर्जितौ

sugaṁdhaiścaṁdanairdivyairdhūpaiḥ puṣpaiśca mṛtyunā suvarṇābharaṇaireva maṁḍitau pāpavarjitau

मृत्यु द्वारा सुगंधित दिव्य चंदन, धूप और पुष्पों से, तथा सुवर्ण-आभूषणों से, पाप-रहित हो चुके हम दोनों को सजाया गया।

श्लोक 50 (padma.7.23.50)

फलैर्नानाविधैस्तत्र मधुरैरमृतोपमैः । भास्करिः कारयामास प्रीत्या भोजनमावयोः

phalairnānāvidhaistatra madhurairamṛtopamaiḥ bhāskariḥ kārayāmāsa prītyā bhojanamāvayoḥ

वहाँ सूर्यपुत्र ने प्रेमपूर्वक अनेक प्रकार के मधुर, अमृत-तुल्य फलों से हम दोनों को भोजन कराया।

श्लोक 51 (padma.7.23.51)

अथ स्तुत्वा स्तवैर्दिव्यैः स्वयमावां यमः प्रभुः । समारोप्य रथे दिव्ये प्रोवाचेति कृताञ्जलि

atha stutvā stavairdivyaiḥ svayamāvāṁ yamaḥ prabhuḥ samāropya rathe divye provāceti kṛtāñjali

फिर दिव्य स्तोत्रों से हमारी स्तुति कर, प्रभु यम ने स्वयं हमें दिव्य रथ पर बिठाकर, हाथ जोड़कर यह कहा।

श्लोक 52 (padma.7.23.52)

यम उवाच- युवां पुण्यवतां श्रेष्ठौ सर्वपापविवर्जितौ । यत्रास्ते भगवान्विष्णुर्गंच्छेतां तत्र संप्रति

yama uvāca- yuvāṁ puṇyavatāṁ śreṣṭhau sarvapāpavivarjitau yatrāste bhagavānviṣṇurgaṁcchetāṁ tatra saṁprati

यम ने कहा — तुम दोनों समस्त पापों से रहित, पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ हो; अब वहीं जाओ, जहाँ भगवान विष्णु विराजमान हैं।

श्लोक 53 (padma.7.23.53)

इत्युक्तौ धर्मराजेन विनयावनतेन वै । अथैतदुक्तमावाभ्यां नत्वा तत्पादपङ्कजे

ityuktau dharmarājena vinayāvanatena vai athaitaduktamāvābhyāṁ natvā tatpādapaṅkaje

धर्मराज द्वारा विनम्रतापूर्वक ऐसा कहे जाने पर, हम दोनों ने उनके चरण-कमलों में प्रणाम कर यह कहा।

श्लोक 54 (padma.7.23.54)

गंतव्यं नान्यथा देव तद्विष्णोः परमं पदम् । किंत्वस्ति नरकं द्रष्टुं त्वद्गृहस्थं स्पृहावयोः

gaṁtavyaṁ nānyathā deva tadviṣṇoḥ paramaṁ padam kiṁtvasti narakaṁ draṣṭuṁ tvadgṛhasthaṁ spṛhāvayoḥ

"हे देव! विष्णु के उस परम पद में अवश्य जाना है, इसमें कोई और मार्ग नहीं; परन्तु आपके ही धाम में स्थित नरक को देखने की हमारी इच्छा है।"

श्लोक 55 (padma.7.23.55)

यमाज्ञया ततो विप्र रथमारुह्य शोभनम् । दुष्प्रेक्ष्या निरया दृष्टा आवाभ्यां तत्र विस्तराः

yamājñayā tato vipra rathamāruhya śobhanam duṣprekṣyā nirayā dṛṣṭā āvābhyāṁ tatra vistarāḥ

हे विप्र! तब यम की आज्ञा से सुंदर रथ पर चढ़कर, हम दोनों ने वहाँ देखने में अत्यंत दुष्कर, विस्तृत नरकों को देखा।

श्लोक 56 (padma.7.23.56)

ब्राह्मण उवाच- तत्रावस्था पापवतां या या दृष्टाः पतिव्रते । विस्तरेण समाख्यातुं तास्ताः सर्वास्त्वमर्हसि

brāhmaṇa uvāca- tatrāvasthā pāpavatāṁ yā yā dṛṣṭāḥ pativrate vistareṇa samākhyātuṁ tāstāḥ sarvāstvamarhasi

ब्राह्मण ने कहा — हे पतिव्रते! वहाँ पापियों की जो-जो अवस्थाएँ तुमने देखी हैं, उन सबका विस्तार से वर्णन करने की तुम पात्र हो।

श्लोक 57 (padma.7.23.57)

पुण्यात्मानः पथा येन व्रजन्ति यममंदिरम् । पापात्मानश्च सुश्रोणि तन्मे कथय विस्तरात्

puṇyātmānaḥ pathā yena vrajanti yamamaṁdiram pāpātmānaśca suśroṇi tanme kathaya vistarāt

पुण्यात्मा किस मार्ग से यम के धाम को जाते हैं, और पापात्मा किस मार्ग से — हे सुश्रोणि! यह मुझे विस्तार से कहो।

श्लोक 58 (padma.7.23.58)

पुण्यात्मा कीदृशं पश्येत्तत्र वैवस्वतं प्रभुम् । पुण्यात्मनां पापिनां च पंथानं सुखदुःखदम्

puṇyātmā kīdṛśaṁ paśyettatra vaivasvataṁ prabhum puṇyātmanāṁ pāpināṁ ca paṁthānaṁ sukhaduḥkhadam

पुण्यात्मा वहाँ वैवस्वत प्रभु को कैसा देखता है? और पुण्यात्माओं तथा पापियों को क्रमशः सुखदायी और दुःखदायी मार्ग कैसा होता है?

श्लोक 59 (padma.7.23.59)

सुप्राज्ञोवाच- आदौ ब्रवीमि पंथानं नृणां पुण्यवतामहम् । शृणुष्व द्विजशार्दूल शृण्वतां प्रीतिवर्द्धनम्

suprājñovāca- ādau bravīmi paṁthānaṁ nṛṇāṁ puṇyavatāmaham śṛṇuṣva dvijaśārdūla śṛṇvatāṁ prītivarddhanam

सुप्रज्ञा ने कहा — पहले मैं पुण्यात्मा मनुष्यों के मार्ग को बताती हूँ; हे द्विजशार्दूल! सुनो, यह सुनने वालों के लिए प्रीति बढ़ाने वाला है।

श्लोक 60 (padma.7.23.60)

प्रस्तरैर्विस्तरैर्बद्धो दिव्यवस्त्रैः समावृतः । भाति पुण्यवतां पंथाः सर्वोपद्रववर्जितः

prastarairvistarairbaddho divyavastraiḥ samāvṛtaḥ bhāti puṇyavatāṁ paṁthāḥ sarvopadravavarjitaḥ

बिछे हुए विस्तृत पत्थरों से बना, दिव्य वस्त्रों से आच्छादित, समस्त उपद्रवों से रहित — पुण्यात्माओं का मार्ग ऐसा शोभित होता है।

श्लोक 61 (padma.7.23.61)

क्वचिद्गंधर्वकन्याभिर्गीयते गानमद्भुतम् । क्वचिन्मञ्जुशरीराभिरप्सरोभिश्च नृत्यते

kvacidgaṁdharvakanyābhirgīyate gānamadbhutam kvacinmañjuśarīrābhirapsarobhiśca nṛtyate

कहीं गंधर्व-कन्याओं द्वारा अद्भुत गान गाया जाता है, कहीं सुंदर शरीर वाली अप्सराओं द्वारा नृत्य किया जाता है।

श्लोक 62 (padma.7.23.62)

क्वचिद्वीणाक्वणं नाना वाद्यं चक्रुर्मनोरमम् । क्वचित्कुसुमवृष्टिश्च क्वचिद्वायुश्च शीतलः

kvacidvīṇākvaṇaṁ nānā vādyaṁ cakrurmanoramam kvacitkusumavṛṣṭiśca kvacidvāyuśca śītalaḥ

कहीं वीणा और नाना मनोरम वाद्य बजाए जाते हैं, कहीं फूलों की वर्षा होती है, कहीं शीतल वायु चलती है।

श्लोक 63 (padma.7.23.63)

क्वचित्प्रपा शीततोया क्वचिच्च भुक्तिशालिकाः । क्वचिद्देवाश्च गंधर्वाः पठंति स्तवमुत्तमम्

kvacitprapā śītatoyā kvacicca bhuktiśālikāḥ kvaciddevāśca gaṁdharvāḥ paṭhaṁti stavamuttamam

कहीं शीतल जल की प्याऊ हैं, कहीं भोजनशालाएँ हैं, कहीं देवता और गंधर्व उत्तम स्तोत्र पढ़ते हैं।

श्लोक 64 (padma.7.23.64)

क्वचित्क्वचिद्दीर्घिकाश्च फुल्लपद्माः सुशोभनाः । सुच्छायाः पादपाः क्वापि पुष्पिता वंजुलादयः

kvacitkvaciddīrghikāśca phullapadmāḥ suśobhanāḥ succhāyāḥ pādapāḥ kvāpi puṣpitā vaṁjulādayaḥ

कहीं-कहीं खिले हुए कमलों से सुशोभित सरोवर हैं, कहीं सुंदर छाया वाले, फूलों से लदे अशोक आदि वृक्ष हैं।

श्लोक 65 (padma.7.23.65)

ततस्तु सुखसम्पन्नाः पथि गच्छंति मानवाः । पुण्यात्मानो द्विजश्रेष्ठ सुखमृत्युमवाप्य च

tatastu sukhasampannāḥ pathi gacchaṁti mānavāḥ puṇyātmāno dvijaśreṣṭha sukhamṛtyumavāpya ca

फिर हे द्विजश्रेष्ठ! सुख-मृत्यु प्राप्त कर पुण्यात्मा मनुष्य, सुख से संपन्न होकर इस मार्ग पर चलते हैं।

श्लोक 66 (padma.7.23.66)

केचित्तुरंगमारूढा नानालंकारभूषिताः । उद्दण्डधवलच्छत्रैर्गच्छंत्यावृत्य मस्तकम्

kecitturaṁgamārūḍhā nānālaṁkārabhūṣitāḥ uddaṇḍadhavalacchatrairgacchaṁtyāvṛtya mastakam

कोई घोड़ों पर सवार, नाना आभूषणों से सुशोभित, अपने सिर पर उठाए हुए श्वेत छत्रों से ढँके हुए चलते हैं।

श्लोक 67 (padma.7.23.67)

केचिद्यांति गजारूढा रथारूढाश्च केचन । यानारूढा जनाः केचित्सुखेन यममंदिरम्

kecidyāṁti gajārūḍhā rathārūḍhāśca kecana yānārūḍhā janāḥ kecitsukhena yamamaṁdiram

कोई हाथियों पर सवार, कोई रथों पर सवार होकर, कोई अन्य वाहनों पर सवार होकर सुखपूर्वक यम के धाम को जाते हैं।

श्लोक 68 (padma.7.23.68)

केचिद्देवाङ्गना हस्त न्यस्तचामरवायुभिः । गच्छंति वीजिता मर्त्याः स्तूयमानाः सुरर्षिभिः

keciddevāṅganā hasta nyastacāmaravāyubhiḥ gacchaṁti vījitā martyāḥ stūyamānāḥ surarṣibhiḥ

कुछ मनुष्य देवांगनाओं के हाथों में लिए हुए चामर की हवा से पंखा झलते हुए, देवर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए चलते हैं।

श्लोक 69 (padma.7.23.69)

केचिद्दिव्यायुधधराः स्रक्चन्दनविभूषिताः । भुंजंतो यांति तांबूलं पुण्यात्मानो यमालयम्

keciddivyāyudhadharāḥ srakcandanavibhūṣitāḥ bhuṁjaṁto yāṁti tāṁbūlaṁ puṇyātmāno yamālayam

कुछ पुण्यात्मा दिव्य आयुध धारण किए, माला और चंदन से विभूषित होकर, ताम्बूल का सेवन करते हुए यम के धाम को जाते हैं।

श्लोक 70 (padma.7.23.70)

निजगात्रत्विषा केचिज्ज्वालयंतो दिशो दश । व्रजंति शमनागारं जलग्रहनिवासिनः

nijagātratviṣā kecijjvālayaṁto diśo daśa vrajaṁti śamanāgāraṁ jalagrahanivāsinaḥ

कोई अपने ही शरीर की कांति से दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, जल-दान करने वाले, यम के धाम को जाते हैं।

श्लोक 71 (padma.7.23.71)

केचिच्च पायसं दिव्यं भुंजतो यांति सत्तम । सुभक्षणं प्रकुर्वंतः पथि यांतः सुखेन च

kecicca pāyasaṁ divyaṁ bhuṁjato yāṁti sattama subhakṣaṇaṁ prakurvaṁtaḥ pathi yāṁtaḥ sukhena ca

हे सत्पुरुष! कुछ दिव्य खीर का सेवन करते हुए, मार्ग में सुख से उत्तम भोजन करते हुए चलते हैं।

श्लोक 72 (padma.7.23.72)

केचिद्दुग्धं पिबंतश्च केचिदिक्षुरसं तथा । केचित्तक्रं पिबंतश्च गच्छंति यममंदिरम्

keciddugdhaṁ pibaṁtaśca kecidikṣurasaṁ tathā kecittakraṁ pibaṁtaśca gacchaṁti yamamaṁdiram

कोई दूध पीते हुए, कोई गन्ने का रस पीते हुए, कोई छाछ पीते हुए यम के धाम को जाते हैं।

श्लोक 73 (padma.7.23.73)

केचिद्दधीनि भक्षंतः केचिन्नानाफलानि च । केचिन्मधुपिबंतश्च पुण्यवंतो व्रजंति वै

keciddadhīni bhakṣaṁtaḥ kecinnānāphalāni ca kecinmadhupibaṁtaśca puṇyavaṁto vrajaṁti vai

कोई दही खाते हुए, कोई नाना फल खाते हुए, कोई मधु पीते हुए — इस प्रकार पुण्यात्मा जाते हैं।

श्लोक 74 (padma.7.23.74)

तानागतांस्ततो दृष्ट्वा बहून्धर्मपरायणान् । भास्करीं प्रीतिमासाद्य स्वयं नारायणो भवेत्

tānāgatāṁstato dṛṣṭvā bahūndharmaparāyaṇān bhāskarīṁ prītimāsādya svayaṁ nārāyaṇo bhavet

उन धर्मपरायण अनेक लोगों को आते देखकर, सूर्यपुत्र प्रसन्नता को प्राप्त होकर स्वयं नारायण-रूप बन जाते हैं।

श्लोक 75 (padma.7.23.75)

चतुर्बाहुः श्यामवर्णः प्रफुल्लकमलेक्षणः । शङ्खचक्रगदापद्मधारी गरुडवाहनः

caturbāhuḥ śyāmavarṇaḥ praphullakamalekṣaṇaḥ śaṅkhacakragadāpadmadhārī garuḍavāhanaḥ

वे चतुर्भुज, श्यामवर्ण, खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाले, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, गरुड़वाहन बन जाते हैं।

श्लोक 76 (padma.7.23.76)

स्वर्णयज्ञोपवीती च स्मरचारुमहाननः । किरीटी कुण्डली चैव वनमालाविभूषितः

svarṇayajñopavītī ca smaracārumahānanaḥ kirīṭī kuṇḍalī caiva vanamālāvibhūṣitaḥ

सुवर्ण के यज्ञोपवीत से युक्त, कामदेव के समान सुंदर विशाल मुख वाले, मुकुट-कुंडलों से युक्त, वनमाला से विभूषित।

श्लोक 77 (padma.7.23.77)

चित्रगुप्तो महाप्राज्ञश्चंडाद्या यमकिंकराः । सर्वे नारायणाकारा बभूवुर्मधुरोक्तयः

citragupto mahāprājñaścaṁḍādyā yamakiṁkarāḥ sarve nārāyaṇākārā babhūvurmadhuroktayaḥ

महाप्राज्ञ चित्रगुप्त और चण्ड आदि यम के सेवक — सभी नारायण के ही स्वरूप बनकर मधुर वचन बोलने लगते हैं।

श्लोक 78 (padma.7.23.78)

ततः स्वयं धर्मराजस्तान्सर्वान्मनुजोत्तमान् । परमां प्रीतिमासाद्य मित्रवच्चार्चयेद्द्विज

tataḥ svayaṁ dharmarājastānsarvānmanujottamān paramāṁ prītimāsādya mitravaccārcayeddvija

हे द्विज! तब स्वयं धर्मराज परम प्रसन्नता से उन समस्त श्रेष्ठ मनुष्यों की मित्र के समान पूजा करते हैं।

श्लोक 79 (padma.7.23.79)

दिव्यरत्नैः फलैश्चैव तेषां पुण्यवतां नृणाम् । भोजनं कारयित्वा तु तानुवाचाथ भास्करिः

divyaratnaiḥ phalaiścaiva teṣāṁ puṇyavatāṁ nṛṇām bhojanaṁ kārayitvā tu tānuvācātha bhāskariḥ

उन पुण्यात्मा मनुष्यों को दिव्य रत्नों और फलों से भोजन कराकर, सूर्यपुत्र ने उनसे यह कहा।

श्लोक 80 (padma.7.23.80)

यम उवाच- यूयं सर्वे महात्मानो नरकक्लेशभीरवः । निजकर्मप्रभावेण गम्यतां परमं पदम्

yama uvāca- yūyaṁ sarve mahātmāno narakakleśabhīravaḥ nijakarmaprabhāveṇa gamyatāṁ paramaṁ padam

यम ने कहा — तुम सभी महात्मा हो, नरक के क्लेश से मुक्त हो; अपने ही कर्मों के प्रभाव से परम पद को जाओ।

श्लोक 81 (padma.7.23.81)

संसारे जन्म संप्राप्य पुण्यं यः कुरुते नरः । स मे पिता स मे भ्राता स मे बंधुसमः सुहृत्

saṁsāre janma saṁprāpya puṇyaṁ yaḥ kurute naraḥ sa me pitā sa me bhrātā sa me baṁdhusamaḥ suhṛt

इस संसार में जन्म पाकर जो मनुष्य पुण्य करता है, वह मेरा पिता है, वह मेरा भाई है, वह मेरे बांधव के समान मित्र है।

श्लोक 82 (padma.7.23.82)

इत्युक्ता धर्मराजेन ते सर्वे द्विजसत्तम । दिव्यं रथं समारुह्य नारायणपुरं गताः

ityuktā dharmarājena te sarve dvijasattama divyaṁ rathaṁ samāruhya nārāyaṇapuraṁ gatāḥ

हे द्विजसत्तम! धर्मराज द्वारा ऐसा कहे जाने पर, वे सभी दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर नारायण के धाम को गए।

श्लोक 83 (padma.7.23.83)

पुण्यात्मनां गतिः प्रोक्ता समासेन द्विजोत्तम । पापात्मनां शृणु गतिं विस्तरेण वदाम्यहम्

puṇyātmanāṁ gatiḥ proktā samāsena dvijottama pāpātmanāṁ śṛṇu gatiṁ vistareṇa vadāmyaham

हे द्विजोत्तम! पुण्यात्माओं की गति संक्षेप में कह दी गई; अब पापियों की गति सुनो, मैं विस्तार से कहती हूँ।

श्लोक 84 (padma.7.23.84)

षडशीतिसहस्राणि योजनानि दुरात्मनाम् । प्रोक्तो मार्गस्य विस्तारः सर्वदुःखान्वितः स च

ṣaḍaśītisahasrāṇi yojanāni durātmanām prokto mārgasya vistāraḥ sarvaduḥkhānvitaḥ sa ca

दुरात्माओं के मार्ग का विस्तार छियासी हज़ार योजन कहा गया है, और वह समस्त दुःखों से युक्त है।

श्लोक 85 (padma.7.23.85)

कुत्रचिद्वह्निवृष्टिश्च कुत्रचिच्चाश्मवर्षणम् । क्वचित्क्वचिद्द्विजश्रेष्ठ संतप्तं तप्तवालुकम्

kutracidvahnivṛṣṭiśca kutraciccāśmavarṣaṇam kvacitkvaciddvijaśreṣṭha saṁtaptaṁ taptavālukam

कहीं अग्नि की वर्षा होती है, कहीं पत्थरों की वर्षा होती है; हे द्विजश्रेष्ठ! कहीं-कहीं तपी हुई गरम बालू होती है।

श्लोक 86 (padma.7.23.86)

क्वचित्क्वचित्तीक्ष्णशिलाः क्वचित्तप्तशिलास्तथा । क्वचित्क्वचिच्छस्त्रवृष्टिः क्वचिदंगारवर्षणम्

kvacitkvacittīkṣṇaśilāḥ kvacittaptaśilāstathā kvacitkvacicchastravṛṣṭiḥ kvacidaṁgāravarṣaṇam

कहीं-कहीं तीक्ष्ण पत्थर हैं, कहीं तपे हुए पत्थर हैं; कहीं-कहीं शस्त्रों की वर्षा है, कहीं अंगारों की वर्षा है।

श्लोक 87 (padma.7.23.87)

क्वचिदग्निरिवातीव संतप्ता वांति मारुताः । गंभीरांधकराः क्वापि तृणावर्तमुखा द्विज

kvacidagnirivātīva saṁtaptā vāṁti mārutāḥ gaṁbhīrāṁdhakarāḥ kvāpi tṛṇāvartamukhā dvija

कहीं अग्नि के समान अत्यंत गरम हवाएँ बहती हैं; हे द्विज! कहीं गहरे अंधकार वाले, बवंडर के समान भँवर हैं।

श्लोक 88 (padma.7.23.88)

क्वचित्कंटकवृष्टिश्च नाराचमयकंटकैः । पाषाणश्रेणयः क्वापि दुःखरोहाः सपन्नगाः

kvacitkaṁṭakavṛṣṭiśca nārācamayakaṁṭakaiḥ pāṣāṇaśreṇayaḥ kvāpi duḥkharohāḥ sapannagāḥ

कहीं बाण जैसे कांटों की वर्षा होती है, कहीं पत्थरों की पंक्तियाँ हैं, जिन पर चढ़ना कठिन है, और सर्पों से युक्त हैं।

श्लोक 89 (padma.7.23.89)

गच्छंति पापिनस्तत्र शुष्ककंठोष्ठतालुकाः । एवं बहुविधक्लेशे छायाजलविवर्जिते

gacchaṁti pāpinastatra śuṣkakaṁṭhoṣṭhatālukāḥ evaṁ bahuvidhakleśe chāyājalavivarjite

वहाँ पापी, जिनका कंठ, होंठ और तालु सूख गए हैं, चलते हैं। इस प्रकार अनेक प्रकार के क्लेशों से युक्त, छाया और जल से रहित —

श्लोक 90 (padma.7.23.90)

तस्मिन्मार्गे द्विजश्रेष्ठ पापिनो यांति दुःखिताः । नाम्ना विमुक्तकेशाश्च प्रेताकारा भयंकराः

tasminmārge dvijaśreṣṭha pāpino yāṁti duḥkhitāḥ nāmnā vimuktakeśāśca pretākārā bhayaṁkarāḥ

— हे द्विजश्रेष्ठ! उस मार्ग पर पापी दुःखी होकर चलते हैं, उनके केश बिखरे हुए, प्रेत के समान भयंकर आकार वाले होते हैं।

श्लोक 91 (padma.7.23.91)

रुधिरौघप्लुताः केचित्केचित्कर्दमभूषिताः । केचित्केचिच्च कृष्णांगाः पथि गच्छंति पापिनः

rudhiraughaplutāḥ kecitkecitkardamabhūṣitāḥ kecitkecicca kṛṣṇāṁgāḥ pathi gacchaṁti pāpinaḥ

कोई रक्त की धारा से नहाए हुए, कोई कीचड़ से लिपटे हुए, कोई काले अंगों वाले पापी उस मार्ग पर चलते हैं।

श्लोक 92 (padma.7.23.92)

क्रंदंतो व्यथया केचित्स्रवद्बाष्पाकुले क्षणाः । शोचंतः स्वानि कर्माणि केचिद्गच्छंति पापिनः

kraṁdaṁto vyathayā kecitsravadbāṣpākule kṣaṇāḥ śocaṁtaḥ svāni karmāṇi kecidgacchaṁti pāpinaḥ

कोई व्यथा से रोते हुए, आँसू बहाते हुए, अपने ही कर्मों पर शोक करते हुए पापी चलते हैं।

श्लोक 93 (padma.7.23.93)

कस्यचिच्चर्मपाशस्य बंधनं पापिनां गले । कंकाले कस्यचिद्बद्धाः कस्यचिच्च पदद्वये

kasyaciccarmapāśasya baṁdhanaṁ pāpināṁ gale kaṁkāle kasyacidbaddhāḥ kasyacicca padadvaye

किसी पापी के गले में चमड़े के पाश का बंधन है, किसी के कंकाल पर बाँधा गया है, किसी के दोनों पैरों में।

श्लोक 94 (padma.7.23.94)

गले सूचीसमुत्कीर्णे पाशं दत्वा दृढं रुषा । आकृष्यंते यमप्रेष्याः केषांचिच्च कृतैनसाम्

gale sūcīsamutkīrṇe pāśaṁ datvā dṛḍhaṁ ruṣā ākṛṣyaṁte yamapreṣyāḥ keṣāṁcicca kṛtainasām

कुछ पापियों के सुई से बींधे गले में क्रोधपूर्वक दृढ़ पाश डालकर, यम के सेवक उन्हें घसीटते हैं।

श्लोक 95 (padma.7.23.95)

वर्त्मस्थान्गुरुपाषाणान्वहंतः कर्णरन्ध्रकैः । अयोभारांश्च शीर्षाग्रैर्व्रजंति पथि पापिनः

vartmasthāngurupāṣāṇānvahaṁtaḥ karṇarandhrakaiḥ ayobhārāṁśca śīrṣāgrairvrajaṁti pathi pāpinaḥ

मार्ग में पड़े हुए भारी पत्थरों को अपने कान के छिद्रों से ढोते हुए, लोहे के भार को अपने सिर पर ढोते हुए पापी चलते हैं।

श्लोक 96 (padma.7.23.96)

कांश्चिद्भुजेषु पाशेषु नयंति यमकिंकराः । ग्रीवासु पापिनः केचित्करप्रहरणैर्दृढैः

kāṁścidbhujeṣu pāśeṣu nayaṁti yamakiṁkarāḥ grīvāsu pāpinaḥ kecitkarapraharaṇairdṛḍhaiḥ

यम के सेवक कुछ को भुजाओं के पाशों से ले जाते हैं, कुछ पापियों को गले पर, दृढ़ हाथ के प्रहारों से।

श्लोक 97 (padma.7.23.97)

क्षिप्तक्षिप्ता यमप्रेष्या नयंति यमकिंकराः । यांत्यधः शिरसः केचिदूर्ध्वपादास्तथापरे

kṣiptakṣiptā yamapreṣyā nayaṁti yamakiṁkarāḥ yāṁtyadhaḥ śirasaḥ kecidūrdhvapādāstathāpare

यम के सेवक उन्हें बार-बार फेंककर ले जाते हैं; कोई सिर के बल नीचे, तो कोई ऊपर पैर करके चलते हैं।

श्लोक 98 (padma.7.23.98)

गच्छंति बाहुभिः केचिदेकपादाश्च केचन । इत्येवं विकृताकारा आर्तरावविरावणाः

gacchaṁti bāhubhiḥ kecidekapādāśca kecana ityevaṁ vikṛtākārā ārtarāvavirāvaṇāḥ

कोई भुजाओं के बल चलते हैं, कोई एक ही पैर से; इस प्रकार विकृत रूप वाले, पीड़ा से चिल्लाते हुए —

श्लोक 99 (padma.7.23.99)

यमदूतैस्ताड्यमानाः पापिनो यांति तत्पथे । तेष्वागतेषु सर्वेषु पापात्मा सुरुषा यमः

yamadūtaistāḍyamānāḥ pāpino yāṁti tatpathe teṣvāgateṣu sarveṣu pāpātmā suruṣā yamaḥ

— यम के दूतों द्वारा पीटे जाते हुए पापी उस मार्ग पर चलते हैं। उन समस्त पापात्माओं के आने पर, यम अत्यंत क्रोधित होकर —

श्लोक 100 (padma.7.23.100)

दिव्यां मूर्तिं परित्यज्य बभूवात्यंतभैरवः । त्रिंशद्योजनदीर्घांगो वापीसदृशलोचनः

divyāṁ mūrtiṁ parityajya babhūvātyaṁtabhairavaḥ triṁśadyojanadīrghāṁgo vāpīsadṛśalocanaḥ

— अपने दिव्य रूप को त्यागकर अत्यंत भयंकर हो जाते हैं — तीस योजन लंबे अंगों वाले, बावड़ी के समान विशाल नेत्रों वाले।

श्लोक 101 (padma.7.23.101)

धूम्रवर्णो महातेजाः प्रलंबो घर्घरध्वनिः । सुदीर्घदशनश्रेणिः शूर्पोपम नखावलिः

dhūmravarṇo mahātejāḥ pralaṁbo ghargharadhvaniḥ sudīrghadaśanaśreṇiḥ śūrpopama nakhāvaliḥ

वे धुएँ के रंग वाले, महातेजस्वी, लंबे, घर्र-घर्र गरजने वाली ध्वनि वाले, अत्यंत लंबे दाँतों की पंक्ति वाले, सूप के समान बड़े नाखूनों वाले होते हैं।

श्लोक 102 (padma.7.23.102)

प्रचण्डमहिषारूढः संदष्टदशनच्छदः । दंडहस्तश्चर्मपाशो भ्रुकुटी कुटिलाननः

pracaṇḍamahiṣārūḍhaḥ saṁdaṣṭadaśanacchadaḥ daṁḍahastaścarmapāśo bhrukuṭī kuṭilānanaḥ

प्रचंड भैंसे पर सवार, अपने होंठों को दाँतों से काटते हुए, हाथ में दंड और चमड़े का पाश लिए, भौंहें टेढ़ी किए, कुटिल मुखवाले।

श्लोक 103 (padma.7.23.103)

चित्रगुप्तो महामायः क्रोधारुणितलोचनः । अट्टाट्टहासं कुर्वाणः समवर्ती विराजते

citragupto mahāmāyaḥ krodhāruṇitalocanaḥ aṭṭāṭṭahāsaṁ kurvāṇaḥ samavartī virājate

महामायावी चित्रगुप्त, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाला, ठहाके लगाता हुआ — इस प्रकार यम विराजते हैं।

श्लोक 104 (padma.7.23.104)

चंडाद्याः किंकराः सर्वे पाशमुद्गरपाणयः । बभूवुर्भैरवाः क्रुद्धा गर्जंतो जलदा इव

caṁḍādyāḥ kiṁkarāḥ sarve pāśamudgarapāṇayaḥ babhūvurbhairavāḥ kruddhā garjaṁto jaladā iva

चण्ड आदि समस्त सेवक, हाथों में पाश और मुद्गर लिए, क्रुद्ध होकर मेघों के समान गरजते हुए, भयंकर हो गए।

श्लोक 105 (padma.7.23.105)

जहि जह्याशु पापिष्ठान्भिन्धि च्छिंदय विंधय । समंतादेव धावंतो वल्गंति यमकिंकराः

jahi jahyāśu pāpiṣṭhānbhindhi cchiṁdaya viṁdhaya samaṁtādeva dhāvaṁto valgaṁti yamakiṁkarāḥ

"मारो, मारो, इन महापापियों को शीघ्र मारो! भेदो, काटो, बींधो!" — इस प्रकार चारों ओर से दौड़ते हुए यम के सेवक उछल-कूद करने लगे।

श्लोक 106 (padma.7.23.106)

तानाह पततः सर्वान्पापिनो धर्मराट्प्रभुः । तर्जयेत्कालदंडेन त्यजन्हुंकारनिःस्वनम्

tānāha patataḥ sarvānpāpino dharmarāṭprabhuḥ tarjayetkāladaṁḍena tyajanhuṁkāraniḥsvanam

गिरते हुए उन समस्त पापियों को धर्मराज प्रभु ने कहा, हुंकार की ध्वनि छोड़ते हुए काल-दंड से उन्हें डाँटा।

श्लोक 107 (padma.7.23.107)

यम उवाच- रेरे पापा दुराचारा युष्माभिरविवेकिभिः । अहो कृतानि पापानि आत्मपीडाकराण्यपि

yama uvāca- rere pāpā durācārā yuṣmābhiravivekibhiḥ aho kṛtāni pāpāni ātmapīḍākarāṇyapi

यम ने कहा — "अरे दुराचारी पापियो! अविवेकी तुमने अहो! अपने ही को कष्ट देने वाले पाप किए हैं।

श्लोक 108 (padma.7.23.108)

मस्तकोपरि तिष्ठंतं नेक्षध्वं समवर्तिनम् । ज्ञात्वापि मां जीवितेशं युष्माभिः पातकं कृतम्

mastakopari tiṣṭhaṁtaṁ nekṣadhvaṁ samavartinam jñātvāpi māṁ jīviteśaṁ yuṣmābhiḥ pātakaṁ kṛtam

"अपने सिर के ऊपर स्थित समवर्ती को तुमने नहीं देखा; मुझे प्राणों का स्वामी जानते हुए भी तुमने पाप किया।

श्लोक 109 (padma.7.23.109)

पुण्यात्मनामहं बंधुरहं पापात्मनां रिपुः । इति कुत्रापि युष्माभिर्न श्रुतं श्रवणैः स्वकैः

puṇyātmanāmahaṁ baṁdhurahaṁ pāpātmanāṁ ripuḥ iti kutrāpi yuṣmābhirna śrutaṁ śravaṇaiḥ svakaiḥ

"मैं पुण्यात्माओं का बंधु हूँ, और पापात्माओं का शत्रु हूँ — यह भी तुमने कभी अपने कानों से नहीं सुना।

श्लोक 110 (padma.7.23.110)

निरया दुःसहाः संति नानादुःखसमन्विताः । पापिनो भुंजते तांश्च युष्माभिर्नेति विश्रुतम्

nirayā duḥsahāḥ saṁti nānāduḥkhasamanvitāḥ pāpino bhuṁjate tāṁśca yuṣmābhirneti viśrutam

"नरक असह्य और नाना दुःखों से भरे हैं, पापी उन्हें भोगते हैं — यह भी तुमने कभी नहीं सुना।

श्लोक 111 (padma.7.23.111)

मत्वा मिथ्यैव युष्माभिश्चर्चा मम दुराशयाः । अद्य सैव स्वकैर्नेत्रैर्दृश्यतां कृतपातकाः

matvā mithyaiva yuṣmābhiścarcā mama durāśayāḥ adya saiva svakairnetrairdṛśyatāṁ kṛtapātakāḥ

"हे दुष्ट-इच्छा वालो! मेरी चर्चा को झूठा मानकर, आज उसे अपनी ही आँखों से देखो, हे पापियो!

श्लोक 112 (padma.7.23.112)

वित्तांध्येन वचो मत्ता यूयं सर्वे सदैव हि । चक्रिरे पापजालानि युष्माभिः सततं यथा

vittāṁdhyena vaco mattā yūyaṁ sarve sadaiva hi cakrire pāpajālāni yuṣmābhiḥ satataṁ yathā

"धन के अंधेपन से मतवाले होकर तुम सभी ने सदा ही, जिस प्रकार तुमने निरंतर पाप-जाल बुने —

श्लोक 113 (padma.7.23.113)

तथा पापफलं दुष्टा भुंजतां क्रंदनेन किम् । सुप्राज्ञोवाच- इत्युक्त्वा भास्करिर्देवश्चित्रगुप्तमुवाच ह

tathā pāpaphalaṁ duṣṭā bhuṁjatāṁ kraṁdanena kim suprājñovāca- ityuktvā bhāskarirdevaścitraguptamuvāca ha

"— उसी प्रकार, हे दुष्टो! उस पाप का फल भोगो; रोने से क्या लाभ?" सुप्रज्ञा ने कहा — ऐसा कहकर सूर्यपुत्र देव ने चित्रगुप्त से यह कहा।

श्लोक 114 (padma.7.23.114)

एतेषां पापकर्माणि महाभाग विचारय । धर्मराजवचः श्रुत्वा चित्रगुप्तो महत्तदा

eteṣāṁ pāpakarmāṇi mahābhāga vicāraya dharmarājavacaḥ śrutvā citragupto mahattadā

"हे महाभाग! इनके पापकर्मों का विचार करो।" धर्मराज के वचन सुनकर तब महान चित्रगुप्त ने —

श्लोक 115 (padma.7.23.115)

तेषां यावंति पापानि तावंति प्राह चोदितः । ततस्ते पापिनः सर्वे क्रंदंति द्विजसत्तम

teṣāṁ yāvaṁti pāpāni tāvaṁti prāha coditaḥ tataste pāpinaḥ sarve kraṁdaṁti dvijasattama

— आदेश पाकर, उनके जितने भी पाप थे, उतने ही बताए। हे द्विजसत्तम! तब वे समस्त पापी रोने लगे।

श्लोक 116 (padma.7.23.116)

इत्यूचुः शमनं भीताश्चर्मपाशे नियंत्रिताः । पापिन ऊचुः अस्माभिर्यानि पापानि कृतानि भास्करात्मज

ityūcuḥ śamanaṁ bhītāścarmapāśe niyaṁtritāḥ pāpina ūcuḥ asmābhiryāni pāpāni kṛtāni bhāskarātmaja

चमड़े के पाश में जकड़े हुए, भयभीत होकर वे यम से यह कहने लगे। पापियों ने कहा — हे सूर्यपुत्र! हमने जो पाप किए हैं —

श्लोक 117 (padma.7.23.117)

के स्थिताः साक्षिणस्तत्र के वा यूयं निवेदिताः । अशुभं वा शुभं वापि यतोऽस्माभिः कृतं पुरा

ke sthitāḥ sākṣiṇastatra ke vā yūyaṁ niveditāḥ aśubhaṁ vā śubhaṁ vāpi yato'smābhiḥ kṛtaṁ purā

— वहाँ कौन साक्षी उपस्थित थे, और तुम्हें किसने बताया कि हमने पूर्व में क्या शुभ और क्या अशुभ किया था?

श्लोक 118 (padma.7.23.118)

तथा च दृष्टं केनात्र पुरोऽस्माकं निगद्यताम् । ततः प्रहस्य भगवान्कोपेन महता द्विज

tathā ca dṛṣṭaṁ kenātra puro'smākaṁ nigadyatām tataḥ prahasya bhagavānkopena mahatā dvija

और यह भी बताइए कि यहाँ हमारे समक्ष उसे किसने देखा था। हे द्विज! तब भगवान ने मुस्कुराते हुए महान क्रोध के साथ —

श्लोक 119 (padma.7.23.119)

आहूय साक्षिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् । यम उवाच- यूयं सर्वे यथावृत्तं संनिधौ साक्षिणस्तथा

āhūya sākṣiṇaḥ sarvānidaṁ vacanamabravīt yama uvāca- yūyaṁ sarve yathāvṛttaṁ saṁnidhau sākṣiṇastathā

— समस्त साक्षियों को बुलाकर यह वचन कहा। यम ने कहा — तुम सभी उपस्थित होकर, जो जैसा घटित हुआ, उसके साक्षी बनो।

श्लोक 120 (padma.7.23.120)

आकाशं पृथिवीं चैव जलं च तिथयस्तथा । दिनं रात्रिरुभे संध्ये धर्मश्चैते तु साक्षिणः

ākāśaṁ pṛthivīṁ caiva jalaṁ ca tithayastathā dinaṁ rātrirubhe saṁdhye dharmaścaite tu sākṣiṇaḥ

आकाश, पृथ्वी, जल, तिथियाँ, दिन, रात्रि, दोनों संध्याएँ और धर्म — ये सभी साक्षी हैं।

श्लोक 121 (padma.7.23.121)

तेषां पापात्मनामूचुः सर्वं कर्मशुभाशुभम् । यस्य यस्य च वेलायां कर्म यद्यदिकारितम्

teṣāṁ pāpātmanāmūcuḥ sarvaṁ karmaśubhāśubham yasya yasya ca velāyāṁ karma yadyadikāritam

उन पापात्माओं के समस्त शुभ-अशुभ कर्मों को उन्होंने बताया — जिस-जिस समय जो-जो कर्म किया गया था —

श्लोक 122 (padma.7.23.122)

स स साक्षी तस्य तस्य जगाद यमसन्निधौ । तच्छ्रुत्वा पापिनः सर्वे साध्वसा कृष्टमानसाः

sa sa sākṣī tasya tasya jagāda yamasannidhau tacchrutvā pāpinaḥ sarve sādhvasā kṛṣṭamānasāḥ

— उस-उस साक्षी ने उस-उस कर्म को यम की सन्निधि में कह दिया। उसे सुनकर वे समस्त पापी भय से व्याकुल-चित्त हो गए।

श्लोक 123 (padma.7.23.123)

सकंपहृदयास्तस्थुर्मेघं दृष्ट्वा मृगा इव । ततस्तु दंतावलिभिः कुर्वन्कडकडध्वनिम्

sakaṁpahṛdayāstasthurmeghaṁ dṛṣṭvā mṛgā iva tatastu daṁtāvalibhiḥ kurvankaḍakaḍadhvanim

— काँपते हृदय से खड़े रहे, जैसे मेघ को देखकर हिरण डर जाते हैं। फिर अपने दाँतों की पंक्तियों को कटकटाते हुए —

श्लोक 124 (padma.7.23.124)

धर्मराट्कालदंडेन ताञ्जघान पृथक्पृथक् । ताडिता धर्मराजेन ते सर्वे कृतपातकाः

dharmarāṭkāladaṁḍena tāñjaghāna pṛthakpṛthak tāḍitā dharmarājena te sarve kṛtapātakāḥ

— धर्मराज ने काल-दंड से उन सबको अलग-अलग मारा। धर्मराज द्वारा ताड़ित वे समस्त पापी —

श्लोक 125 (padma.7.23.125)

क्रंदंति निजकर्माणि शोचंतः प्राप्तसाध्वसाः । ततस्तान्पापिनः सर्वान्दूताश्चंडादयो रुषा

kraṁdaṁti nijakarmāṇi śocaṁtaḥ prāptasādhvasāḥ tatastānpāpinaḥ sarvāndūtāścaṁḍādayo ruṣā

— भय से आकुल होकर अपने ही कर्मों पर शोक करते हुए रोने लगे। फिर चण्ड आदि दूतों ने उन समस्त पापियों को क्रोधपूर्वक —

श्लोक 126 (padma.7.23.126)

नरकेषु यमादेशाद्रौरवादिषु चिक्षिपुः । तपने चिक्षिपुः कांश्चिदवीचौ कृतपातकान्

narakeṣu yamādeśādrauravādiṣu cikṣipuḥ tapane cikṣipuḥ kāṁścidavīcau kṛtapātakān

— यम की आज्ञा से रौरव आदि नरकों में फेंक दिया। उन पापियों में से कुछ को तपन नरक में, कुछ को अवीचि नरक में डाल दिया।

श्लोक 127 (padma.7.23.127)

संघाते कालसूत्रे च महारौरवके तथा । संतप्ते वालुकाकुंडे कुंभीपाके तथापरान्

saṁghāte kālasūtre ca mahārauravake tathā saṁtapte vālukākuṁḍe kuṁbhīpāke tathāparān

कुछ को संघात नरक में, कुछ को कालसूत्र में, कुछ को महारौरव में, कुछ को तपे हुए बालू के कुंड में, और अन्यों को कुंभीपाक में डाला।

श्लोक 128 (padma.7.23.128)

निरुच्छ्वासे महाघोरे चिक्षिपुश्च प्रमर्द्दने । असिपत्रवने घोरे नानाभक्षेषु पापिनः

nirucchvāse mahāghore cikṣipuśca pramarddane asipatravane ghore nānābhakṣeṣu pāpinaḥ

कुछ को अत्यंत भयंकर निरुच्छ्वास नरक में, कुछ को प्रमर्दन में, कुछ पापियों को भयंकर असिपत्रवन में, नाना प्रकार के भक्षण-स्थलों में डाला गया।

श्लोक 129 (padma.7.23.129)

वैतरण्यां तथा केऽपि चिक्षिपुर्यमकिंकराः । घोरे विष्ठाह्रदे कांश्चित्तुषांगारास्थिकंटकैः

vaitaraṇyāṁ tathā ke'pi cikṣipuryamakiṁkarāḥ ghore viṣṭhāhrade kāṁścittuṣāṁgārāsthikaṁṭakaiḥ

यम के सेवकों ने कुछ को वैतरणी नदी में फेंका, कुछ को भयंकर विष्ठा-सरोवर में, भूसी, अंगारों, हड्डियों और कांटों से भरे —

श्लोक 130 (padma.7.23.130)

पूर्णे नितांतसंतप्ते चिक्षिपुर्यमकिंकराः । पुरीषलेपने चैव पुरीषभोजने तथा

pūrṇe nitāṁtasaṁtapte cikṣipuryamakiṁkarāḥ purīṣalepane caiva purīṣabhojane tathā

— अत्यंत तपे हुए उस सरोवर में यम के सेवकों ने फेंका। कुछ को मल-लेपन में, कुछ को मल-भक्षण में लगाया।

श्लोक 131 (padma.7.23.131)

स्वमांसभोजने चैव स्थापिता यमकिंकरैः । श्लेष्माणं भुंजते केचित्केचिद्वीर्यं च भुंजते

svamāṁsabhojane caiva sthāpitā yamakiṁkaraiḥ śleṣmāṇaṁ bhuṁjate kecitkecidvīryaṁ ca bhuṁjate

यम के सेवकों ने कुछ को अपना ही मांस खाने में लगाया; कुछ कफ खाते हैं, कुछ वीर्य खाते हैं।

श्लोक 132 (padma.7.23.132)

पिबंति केचिन्मूत्राणि केचिद्रक्तानि पापिनः । केषांचिद्वदनेष्वेव जलौकाः पन्नगोपमाः

pibaṁti kecinmūtrāṇi kecidraktāni pāpinaḥ keṣāṁcidvadaneṣveva jalaukāḥ pannagopamāḥ

कुछ पापी मूत्र पीते हैं, कुछ रक्त पीते हैं; किसी-किसी के मुख में सर्प के समान जोंकें —

श्लोक 133 (padma.7.23.133)

पूर्यंते पन्नगाश्चैव यमदूतैर्भयंकरैः । उत्पाद्यंतेऽतिसंतप्तैर्जिह्वाश्च द्विजसत्तम

pūryaṁte pannagāścaiva yamadūtairbhayaṁkaraiḥ utpādyaṁte'tisaṁtaptairjihvāśca dvijasattama

— तथा वास्तविक सर्प भी, भयंकर यम-दूतों द्वारा भर दिए जाते हैं; हे द्विजसत्तम! अत्यंत तपाए हुए चिमटों से उनकी जीभें उखाड़ी जाती हैं।

श्लोक 134 (padma.7.23.134)

केषांचित्कर्णरंध्रेषु मुखेषु च कृतैनसाम् । तप्ततैलानि पूर्यंते निर्द्दयैर्यमकिंकरैः

keṣāṁcitkarṇaraṁdhreṣu mukheṣu ca kṛtainasām taptatailāni pūryaṁte nirddayairyamakiṁkaraiḥ

कुछ पापियों के कान के छिद्रों में और मुख में, निर्दय यम-सेवकों द्वारा तपा हुआ तेल भर दिया जाता है।

श्लोक 135 (padma.7.23.135)

केषांचित्खङ्गधाराभिर्बाहुं च चरणं तथा । कर्णादिनासिकाश्चैव च्छिंदंति च दुरात्मनाम्

keṣāṁcitkhaṅgadhārābhirbāhuṁ ca caraṇaṁ tathā karṇādināsikāścaiva cchiṁdaṁti ca durātmanām

कुछ दुरात्माओं की भुजाओं, चरणों, कानों और नासिका को तलवारों की धार से काट दिया जाता है।

श्लोक 136 (padma.7.23.136)

शयनं कुर्वते केचिज्ज्वलदंगारसंचये । केचिन्नाराचतुल्येषु शयनं कंटकेषु च

śayanaṁ kurvate kecijjvaladaṁgārasaṁcaye kecinnārācatulyeṣu śayanaṁ kaṁṭakeṣu ca

कोई जलते हुए अंगारों के ढेर पर सोता है, कोई बाणों के समान तीखे कांटों पर सोता है।

श्लोक 137 (padma.7.23.137)

कर्दमेषु च तप्तेषु कांश्चिच्छमनकिंकराः । पातयंति द्विजश्रेष्ठ केशेष्वाकृष्य पापिनः

kardameṣu ca tapteṣu kāṁścicchamanakiṁkarāḥ pātayaṁti dvijaśreṣṭha keśeṣvākṛṣya pāpinaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! यम के सेवक कुछ पापियों को बालों से घसीटकर तपे हुए कीचड़ में पटक देते हैं।

श्लोक 138 (padma.7.23.138)

वमनेषु च केषांचिन्नखसंधिषु पापिनाम् । तप्तसूचीसहस्राणि प्रक्षिपंति मुहुर्मुहुः

vamaneṣu ca keṣāṁcinnakhasaṁdhiṣu pāpinām taptasūcīsahasrāṇi prakṣipaṁti muhurmuhuḥ

कुछ को उनकी ही वमन में डाला जाता है; कुछ पापियों के नाखूनों के जोड़ों में हजारों तपी हुई सुइयाँ बार-बार भोंकी जाती हैं।

श्लोक 139 (padma.7.23.139)

संतप्तलोहशूलाग्रे कांश्चिदारोपयंति वै । क्रंदंति कंटकैस्तीक्ष्णैः केषांचिन्मस्तकानि वै

saṁtaptalohaśūlāgre kāṁścidāropayaṁti vai kraṁdaṁti kaṁṭakaistīkṣṇaiḥ keṣāṁcinmastakāni vai

कुछ को तपी हुई लोहे की शूल की नोक पर बिठा दिया जाता है; कुछ के सिर तीक्ष्ण कांटों से बींधे जाते हैं, और वे चिल्लाते हैं।

श्लोक 140 (padma.7.23.140)

गृहीत्वा हस्तपादेषु शाल्मलिद्रुमकंटकैः । निष्कुषंति रुषा कांश्चिदार्त्तरावविराविणः

gṛhītvā hastapādeṣu śālmalidrumakaṁṭakaiḥ niṣkuṣaṁti ruṣā kāṁścidārttarāvavirāviṇaḥ

कुछ को हाथों-पैरों से पकड़कर, शाल्मलि वृक्ष के कांटों से क्रोधपूर्वक चीरा जाता है, और वे पीड़ा से चीखते हैं।

श्लोक 141 (padma.7.23.141)

बद्ध्वा गलेषु पाषाणं कांश्चिच्छमनकिंकराः । रक्तगर्ते पयोगर्ते पातयंति पुनः पुनः

baddhvā galeṣu pāṣāṇaṁ kāṁścicchamanakiṁkarāḥ raktagarte payogarte pātayaṁti punaḥ punaḥ

यम के सेवक कुछ के गले में पत्थर बाँधकर उन्हें बार-बार रक्त के गड्ढे और मवाद के गड्ढे में गिराते हैं।

श्लोक 142 (padma.7.23.142)

याम्यैर्दूतैरुद्गिरंति शिरांसि पापिनां नृणाम् । चूर्णयंत्युपलैर्याम्या मुहुर्मुहुरतिक्रुधा

yāmyairdūtairudgiraṁti śirāṁsi pāpināṁ nṛṇām cūrṇayaṁtyupalairyāmyā muhurmuhuratikrudhā

यम के दूत पापी मनुष्यों के सिरों को चूर-चूर करते हैं, अत्यंत क्रोध से बार-बार पत्थरों से उन्हें पीसते हैं।

श्लोक 143 (padma.7.23.143)

वक्षोमध्येषु केषांचिल्लोहकीलकसंचयान् । आरोपयंति लोकानां क्रंदतां दुरितात्मनाम्

vakṣomadhyeṣu keṣāṁcillohakīlakasaṁcayān āropayaṁti lokānāṁ kraṁdatāṁ duritātmanām

कुछ पापी लोगों की छाती के बीच में लोहे की कीलों के ढेर ठोंके जाते हैं, जबकि वे चीखते रहते हैं।

श्लोक 144 (padma.7.23.144)

चक्षूंषि बडिशैः केषामुत्पाट्यंते कृतैनसाम् । केषांचिन्नासिका एव पूर्य्यंते वृश्चिकैर्द्विज

cakṣūṁṣi baḍiśaiḥ keṣāmutpāṭyaṁte kṛtainasām keṣāṁcinnāsikā eva pūryyaṁte vṛścikairdvija

कुछ पापियों की आँखें बड़शी से निकाली जाती हैं; हे द्विज! किसी-किसी की नासिका बिच्छुओं से भर दी जाती है।

श्लोक 145 (padma.7.23.145)

केषांचिद्वृक्षशाखायां बद्ध्वा पादांश्च पाशकैः । ज्वालयंति तले वह्निं सधूमं यमकिंकराः

keṣāṁcidvṛkṣaśākhāyāṁ baddhvā pādāṁśca pāśakaiḥ jvālayaṁti tale vahniṁ sadhūmaṁ yamakiṁkarāḥ

यम के सेवक किसी-किसी के पैरों को वृक्ष की शाखा से पाशों द्वारा बाँधकर, उनके नीचे धुआँ उठाती हुई आग जलाते हैं।

श्लोक 146 (padma.7.23.146)

धूमपानं प्रकुर्वन्ति ते तत्र कृतकिल्विषाः । अधोमुखा ऊर्ध्वपादास्तस्थुराचन्द्र तारकम्

dhūmapānaṁ prakurvanti te tatra kṛtakilviṣāḥ adhomukhā ūrdhvapādāstasthurācandra tārakam

वे पापी वहाँ धुएँ का पान करते हैं; सिर नीचे और पैर ऊपर करके वे चंद्रमा और तारों के रहने तक दीर्घकाल खड़े रहते हैं।

श्लोक 147 (padma.7.23.147)

मुसलैर्मुद्गरैः केचित्ताड्यमानाः पुनः पुनः । याम्यैर्दूतैरुद्गिरन्ति शोणितानि व्यथाकुलाः

musalairmudgaraiḥ kecittāḍyamānāḥ punaḥ punaḥ yāmyairdūtairudgiranti śoṇitāni vyathākulāḥ

कुछ को मूसलों और मुद्गरों से बार-बार पीटा जाता है, वे यम के दूतों द्वारा पीड़ित होकर रक्त वमन करते हैं।

श्लोक 148 (padma.7.23.148)

अन्धकारमये गेहे पूतिगन्धवति द्विज । दंशैश्च मशकैश्चैव केचित्सीदंति पापिनः

andhakāramaye gehe pūtigandhavati dvija daṁśaiśca maśakaiścaiva kecitsīdaṁti pāpinaḥ

हे द्विज! अंधकारमय, दुर्गंधपूर्ण घर में कुछ पापी डाँस और मच्छरों से पीड़ित होकर दुःखी होते हैं।

श्लोक 149 (padma.7.23.149)

भस्मानि भुञ्जते केचित्कृमीन्केचिच्च भुञ्जते । केचिद्दुर्गन्धमांसानि केचिच्च पूतिमृत्तिकाम्

bhasmāni bhuñjate kecitkṛmīnkecicca bhuñjate keciddurgandhamāṁsāni kecicca pūtimṛttikām

कोई राख खाते हैं, कोई कीड़े खाते हैं, कोई दुर्गंधित मांस खाते हैं, कोई सड़ी हुई मिट्टी खाते हैं।

श्लोक 150 (padma.7.23.150)

श्वभिर्व्याघ्रैः शृगालैश्च वज्रदन्तनखैस्तथा । ऋक्षैः केचिद्भक्ष्यमाणाः क्रंदन्ति रुधिराप्लुताः

śvabhirvyāghraiḥ śṛgālaiśca vajradantanakhaistathā ṛkṣaiḥ kecidbhakṣyamāṇāḥ kraṁdanti rudhirāplutāḥ

कुत्तों, बाघों, गीदड़ों और वज्र के समान दाँत-नाखून वाले भालुओं द्वारा खाए जाते हुए कुछ पापी, रक्त में डूबे हुए चिल्लाते हैं।

श्लोक 151 (padma.7.23.151)

नितांतोग्रविषैः सर्पैर्भक्ष्यमाणास्तथापरे । अन्ये महिषशृंगाग्रनिर्भिन्नवक्षसो द्विज

nitāṁtograviṣaiḥ sarpairbhakṣyamāṇāstathāpare anye mahiṣaśṛṁgāgranirbhinnavakṣaso dvija

कुछ अन्य अत्यंत भयंकर विषैले सर्पों द्वारा खाए जाते हैं; हे द्विज! अन्य लोगों की छाती भैंसों के सींगों की नोक से बींध दी जाती है।

श्लोक 152 (padma.7.23.152)

पतन्ति मूर्च्छिताः पृथ्वीं सिंचंतो रुधिरैर्महीम् । यमदूतधनुर्मुक्तैर्घोरैराशीविषोपमैः

patanti mūrcchitāḥ pṛthvīṁ siṁcaṁto rudhirairmahīm yamadūtadhanurmuktairghorairāśīviṣopamaiḥ

यम के दूतों के धनुषों से छूटे हुए भयंकर, विषैले सर्प के समान बाणों से घायल होकर, वे पृथ्वी को रक्त से सींचते हुए मूर्च्छित होकर गिरते हैं।

श्लोक 153 (padma.7.23.153)

जर्जराखिलदेहाश्च लुठंत्यन्ये महीतले । तप्तायः पिण्डनिलयं तप्तपाषाणमेव च

jarjarākhiladehāśca luṭhaṁtyanye mahītale taptāyaḥ piṇḍanilayaṁ taptapāṣāṇameva ca

कुछ का सम्पूर्ण शरीर जर्जर होकर पृथ्वी पर लोटता है; तपे हुए लोहे के पिंड और तपे हुए पत्थर वाले स्थान —

श्लोक 154 (padma.7.23.154)

दंशशस्त्रेण केषांचित्कुष्णंति वदनेषु च । नासारन्ध्रेषु केषांचिद्यमदूता मुखेषु च

daṁśaśastreṇa keṣāṁcitkuṣṇaṁti vadaneṣu ca nāsārandhreṣu keṣāṁcidyamadūtā mukheṣu ca

— कुछ के मुख में डंक जैसे शस्त्र से घाव किए जाते हैं; यम के दूत कुछ की नासिका के छिद्रों में और मुख में —

श्लोक 155 (padma.7.23.155)

श्वासानिलनिरोधार्थं नासारन्ध्रं वयंति वै । केषांचित्तीक्ष्णधाराभिर्यमशाक्तिभिरुद्धतैः

śvāsānilanirodhārthaṁ nāsārandhraṁ vayaṁti vai keṣāṁcittīkṣṇadhārābhiryamaśāktibhiruddhataiḥ

— साँस को रोकने के लिए उनकी नासिका के छिद्रों को बुन देते हैं। कुछ का शरीर यम की तीक्ष्ण धार वाली, उग्र शक्ति से —

श्लोक 156 (padma.7.23.156)

उत्पाट्यंतेंगचर्माणि यमदूतैर्महाबलैः । कांश्चिद्गृहीत्वा केशेषु निपात्य पृथिवीतले

utpāṭyaṁteṁgacarmāṇi yamadūtairmahābalaiḥ kāṁścidgṛhītvā keśeṣu nipātya pṛthivītale

— यम के महाबली दूतों द्वारा उनकी अंग-चर्म को उखाड़ा जाता है; कुछ को बालों से पकड़कर पृथ्वी पर पटककर —

श्लोक 157 (padma.7.23.157)

कीलैः पादादिभिर्घातैस्ताडयंति सदैव हि । केचित्क्षारांबुधाराभिः संतप्ताः कृतपातकाः

kīlaiḥ pādādibhirghātaistāḍayaṁti sadaiva hi kecitkṣārāṁbudhārābhiḥ saṁtaptāḥ kṛtapātakāḥ

— कीलों से, पैरों की चोट से, वे उन्हें सदा पीटते रहते हैं। पाप करने वाले कुछ लोग, खारे जल की धाराओं से संतप्त होकर —

श्लोक 158 (padma.7.23.158)

क्षारांबुपानं कुर्वंति क्रंदंतो बहुधा द्विज । पित्तपानं महाभाग केचित्कुर्वन्ति पापिनः

kṣārāṁbupānaṁ kurvaṁti kraṁdaṁto bahudhā dvija pittapānaṁ mahābhāga kecitkurvanti pāpinaḥ

— बहुत रोते हुए खारा जल पीते हैं, हे द्विज! हे महाभाग! कुछ पापी पित्त-पान करते हैं।

श्लोक 159 (padma.7.23.159)

स्नुहीक्षीराणि केचिच्च पिबंति पापिनां वराः । केषांचित्स्वपतां भूमौ वक्षःसु यमकिंकरैः

snuhīkṣīrāṇi kecicca pibaṁti pāpināṁ varāḥ keṣāṁcitsvapatāṁ bhūmau vakṣaḥsu yamakiṁkaraiḥ

पापियों में से कुछ स्नुही के दूध पीते हैं। भूमि पर सोए हुए कुछ की छाती पर यम के सेवकों द्वारा —

श्लोक 160 (padma.7.23.160)

दीयंते गुरुपाषाणाः संतप्ताः पर्वतोपमाः । काष्ठखंडद्वयं दत्वा ग्रीवायां च गले तथा

dīyaṁte gurupāṣāṇāḥ saṁtaptāḥ parvatopamāḥ kāṣṭhakhaṁḍadvayaṁ datvā grīvāyāṁ ca gale tathā

— पर्वत के समान भारी, तपे हुए पत्थर रख दिए जाते हैं। किसी-किसी की गर्दन और गले में लकड़ी के दो टुकड़े लगाकर —

श्लोक 161 (padma.7.23.161)

उदग्रमुखं बध्नन्ति केषांचिद्दृढपाशकैः । आरोप्य वृक्षशाखायां कांश्चिद्भूमौ क्षिपंति च

udagramukhaṁ badhnanti keṣāṁciddṛḍhapāśakaiḥ āropya vṛkṣaśākhāyāṁ kāṁścidbhūmau kṣipaṁti ca

— किसी-किसी का मुँह ऊपर की ओर करके दृढ़ पाशों से बाँधा जाता है; किसी को वृक्ष की शाखा पर चढ़ाकर, किसी को भूमि पर फेंका जाता है।

श्लोक 162 (padma.7.23.162)

उत्थापयंति भूमौ च प्रक्षिपंति पुनः पुनः । एवं ते पापिनः सर्वे क्षुधितास्तृषितास्तथा

utthāpayaṁti bhūmau ca prakṣipaṁti punaḥ punaḥ evaṁ te pāpinaḥ sarve kṣudhitāstṛṣitāstathā

बार-बार भूमि से उठाकर वे उन्हें बार-बार फेंकते हैं। इस प्रकार वे समस्त पापी भूखे और प्यासे होकर —

श्लोक 163 (padma.7.23.163)

त्राहि त्राहीति जल्पंतो रुदंति यातनागृहे । युगकल्पांतपर्यंतं भुक्त्वा निरययातनाम्

trāhi trāhīti jalpaṁto rudaṁti yātanāgṛhe yugakalpāṁtaparyaṁtaṁ bhuktvā nirayayātanām

— "बचाओ, बचाओ!" कहते हुए उस यातना-गृह में रोते रहते हैं। युग और कल्प के अंत तक नरक की यातना भोगकर —

श्लोक 164 (padma.7.23.164)

नातिभुक्त्वा पापशेषे जायंते पापयोनिषु । पापयोनौ समुत्पन्ना भवंति व्याधिपीडिताः

nātibhuktvā pāpaśeṣe jāyaṁte pāpayoniṣu pāpayonau samutpannā bhavaṁti vyādhipīḍitāḥ

— अपने पाप-शेष को पूरी तरह भोगे बिना ही वे पापयोनियों में जन्म लेते हैं; पापयोनि में उत्पन्न होकर वे रोगों से पीड़ित होते हैं।

श्लोक 165 (padma.7.23.165)

हीनांगा अधिकांगाश्च दुःखिनः पापसेवकाः । अपुत्रा अतिमूर्खाश्च परहिंसापरायणाः

hīnāṁgā adhikāṁgāśca duḥkhinaḥ pāpasevakāḥ aputrā atimūrkhāśca parahiṁsāparāyaṇāḥ

वे अंग-हीन या अतिरिक्त अंगों वाले, दुःखी, पाप-सेवी, पुत्रहीन, अत्यंत मूर्ख और दूसरों को कष्ट देने में लीन होते हैं।

श्लोक 166 (padma.7.23.166)

अल्पायुषोऽल्पमतयः कुभार्यापतयस्तथा । नित्यं पापानि कर्माणि कर्मणा मनसा गिरा

alpāyuṣo'lpamatayaḥ kubhāryāpatayastathā nityaṁ pāpāni karmāṇi karmaṇā manasā girā

वे अल्पायु, अल्पबुद्धि, दुष्ट पत्नी वाले होते हैं, और मन, वाणी तथा कर्म से नित्य पाप ही करते हैं।

श्लोक 167 (padma.7.23.167)

पुनः पापप्रभावेन निरयं यांति पूर्ववत् । तस्मात्पापं न कर्तव्यं कदाचिदपि सत्तमैः

punaḥ pāpaprabhāvena nirayaṁ yāṁti pūrvavat tasmātpāpaṁ na kartavyaṁ kadācidapi sattamaiḥ

फिर उसी पाप के प्रभाव से वे पूर्व की तरह ही नरक को जाते हैं; इसलिए सज्जनों को कभी भी पाप नहीं करना चाहिए।

श्लोक 168 (padma.7.23.168)

नराणां कृतपापानां नरकान्नास्ति निष्कृतिः । संक्षेपात्पापिनां दुःखं निरुक्तं द्विजसत्तम

narāṇāṁ kṛtapāpānāṁ narakānnāsti niṣkṛtiḥ saṁkṣepātpāpināṁ duḥkhaṁ niruktaṁ dvijasattama

पाप करने वाले मनुष्यों को नरक से मुक्ति नहीं मिलती। हे द्विजसत्तम! पापियों के दुःख को संक्षेप में बताया गया।

श्लोक 169 (padma.7.23.169)

सम्यग्वक्तुं कः क्षमोस्ति वर्षायुतशतैरपि । दुर्गतीनां ततो दृष्ट्वा मनुजानां कृतैनसाम्

samyagvaktuṁ kaḥ kṣamosti varṣāyutaśatairapi durgatīnāṁ tato dṛṣṭvā manujānāṁ kṛtainasām

सैकड़ों-हज़ारों वर्षों में भी उसे पूर्णतः कहने में कौन समर्थ है? इस प्रकार पाप करने वाले मनुष्यों की दुर्गति देखकर —

श्लोक 170 (padma.7.23.170)

आवां विमानमारुह्य नारायणपुरं गतौ । कल्पकोटिसहस्राणि भुक्त्वा भोगान्हरेर्गृहे

āvāṁ vimānamāruhya nārāyaṇapuraṁ gatau kalpakoṭisahasrāṇi bhuktvā bhogānharergṛhe

— हम दोनों विमान पर चढ़कर नारायण के धाम को गए। हरि के धाम में करोड़ों-हजारों कल्पों तक भोग भोगकर —

श्लोक 171 (padma.7.23.171)

जातौ वै राजवंशेऽस्मिन्विशुद्धे द्विजसत्तम । अत्र भुक्त्वाखिलान्भोगान्सर्वसंपत्समन्वितान्

jātau vai rājavaṁśe'sminviśuddhe dvijasattama atra bhuktvākhilānbhogānsarvasaṁpatsamanvitān

— हे द्विजसत्तम! हम इसी विशुद्ध राजवंश में जन्मे। यहाँ समस्त संपत्तियों से युक्त समस्त भोगों को भोगकर —

श्लोक 172 (padma.7.23.172)

सुखमृत्युं समासाद्य गंतव्यं परमं पदम् । एकादशीव्रतसमं व्रतं नास्ति जगत्त्रये

sukhamṛtyuṁ samāsādya gaṁtavyaṁ paramaṁ padam ekādaśīvratasamaṁ vrataṁ nāsti jagattraye

— हम सुख-मृत्यु प्राप्त कर परम पद को जाएँगे। तीनों लोकों में एकादशी-व्रत के समान कोई व्रत नहीं है।

श्लोक 173 (padma.7.23.173)

अनिच्छयापि यत्कृत्वा गतिरेवंविधाऽवयोः । एकादशीव्रतं ये तु भक्तिभावेन कुर्वते

anicchayāpi yatkṛtvā gatirevaṁvidhā'vayoḥ ekādaśīvrataṁ ye tu bhaktibhāvena kurvate

जिसे अनिच्छापूर्वक करके भी हम दोनों को ऐसी गति प्राप्त हुई — जो लोग एकादशी-व्रत भक्तिभाव से करते हैं —

श्लोक 174 (padma.7.23.174)

न जाने किं भवेत्तेषां वासुदेवानुकम्पया । इति ते कथितं सर्वं पृष्टं ब्राह्मणसत्तम

na jāne kiṁ bhavetteṣāṁ vāsudevānukampayā iti te kathitaṁ sarvaṁ pṛṣṭaṁ brāhmaṇasattama

— मैं नहीं जानती कि वासुदेव की कृपा से उन्हें क्या प्राप्त होगा। हे ब्राह्मणसत्तम! इस प्रकार तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कहा गया।

श्लोक 175 (padma.7.23.175)

विष्णोर्दिवसमाहात्म्यं किमन्यच्छ्रोतुमर्हसि । व्यास उवाच- तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा स विप्रः परमार्थवित्

viṣṇordivasamāhātmyaṁ kimanyacchrotumarhasi vyāsa uvāca- tasyaitadvacanaṁ śrutvā sa vipraḥ paramārthavit

विष्णु के दिन की महिमा के विषय में और क्या सुनना चाहते हो? व्यास जी ने कहा — उसके इन वचनों को सुनकर, परमार्थ के ज्ञाता उस ब्राह्मण ने —

श्लोक 176 (padma.7.23.176)

एकादशीव्रते चित्तं चकार सुदृढं निजम् । स राजा राजमहिषी चिरं भुक्त्वा वसुंधराम्

ekādaśīvrate cittaṁ cakāra sudṛḍhaṁ nijam sa rājā rājamahiṣī ciraṁ bhuktvā vasuṁdharām

— अपने चित्त को एकादशी-व्रत में अत्यंत दृढ़ कर लिया। वह राजा और रानी दीर्घकाल तक पृथ्वी का भोग कर —

श्लोक 177 (padma.7.23.177)

अंते विष्णुपुरं गत्वा प्राप्तवंतौ परं पदम् । व्रतराजस्य माहात्म्यं ये शृण्वंति पठंति च

aṁte viṣṇupuraṁ gatvā prāptavaṁtau paraṁ padam vratarājasya māhātmyaṁ ye śṛṇvaṁti paṭhaṁti ca

— अंत में विष्णु के धाम को जाकर परम पद को प्राप्त हुए। व्रतों के राजा की इस महिमा को जो सुनते और पढ़ते हैं —

श्लोक 178 (padma.7.23.178)

पापजालैर्विनिर्मुक्ता लभंते हरिसन्निधौ

pāpajālairvinirmuktā labhaṁte harisannidhau

— वे पाप-जाल से मुक्त होकर हरि की सन्निधि को प्राप्त करते हैं।

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