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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 9

गंगा-यात्रा-विधि तथा सत्यधर्म-राजा-कथा

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (padma.7.9.1)

जैमिनिरुवाच- भूय एव गुरो ब्रूहि गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । गङ्गाकथामृतं पातुं माधुर्यात्पुनरिष्यते

jaiminiruvāca- bhūya eva guro brūhi gaṅgāmāhātmyamuttamam gaṅgākathāmṛtaṁ pātuṁ mādhuryātpunariṣyate

जैमिनि ने कहा — हे गुरो! फिर से गंगा की उत्तम महिमा कहिए; गंगा-कथा-रूपी अमृत को उसकी मधुरता के कारण मैं फिर पीना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (padma.7.9.2)

व्यास उवाच- तदप्यहं ब्रवीमि त्वां गङ्गाभक्तो यतो भवान् । तौ पादौ सफलौ नॄणां जाह्नवीतटगामिनौ

vyāsa uvāca- tadapyahaṁ bravīmi tvāṁ gaṅgābhakto yato bhavān tau pādau saphalau nṝṇāṁ jāhnavītaṭagāminau

व्यास जी ने कहा — वह भी मैं तुम्हें बताता हूँ, क्योंकि तुम गंगा-भक्त हो। मनुष्यों के वे दोनों पैर सफल हैं, जो जाह्नवी के तट पर जाते हैं।

श्लोक 3 (padma.7.9.3)

गङ्गाकल्लोलनिनदश्राविणौ श्रवणौ च तौ । सा जिह्वा या च जानाति स्वादुभेदं तदंभसः

gaṅgākallolaninadaśrāviṇau śravaṇau ca tau sā jihvā yā ca jānāti svādubhedaṁ tadaṁbhasaḥ

गंगा की लहरों की ध्वनि को सुनने वाले वे दोनों कान सफल हैं, और वह जीभ सफल है जो उस जल के स्वाद के भेद को जानती है।

श्लोक 4 (padma.7.9.4)

ते नेत्रे जाह्नवी चारुतरंगदर्शने च ते । तल्ललाटमिति प्रोक्तं गङ्गामृत्पुण्ड्रधारि यत्

te netre jāhnavī cārutaraṁgadarśane ca te tallalāṭamiti proktaṁ gaṅgāmṛtpuṇḍradhāri yat

वे दोनों नेत्र सफल हैं जो जाह्नवी की सुन्दर लहरों को देखते हैं; वही ललाट कहा गया है जो गंगा-मिट्टी का तिलक धारण करता है।

श्लोक 5 (padma.7.9.5)

तौ हस्तौ जाह्नवी तीरे हरि पूजापरायणौ । शरीरं सफलं तच्च विमले जाह्नवी जले

tau hastau jāhnavī tīre hari pūjāparāyaṇau śarīraṁ saphalaṁ tacca vimale jāhnavī jale

वे दोनों हाथ सफल हैं जो जाह्नवी के तट पर हरि की पूजा में तत्पर रहते हैं; और वह शरीर सफल है, जो निर्मल जाह्नवी-जल में,

श्लोक 6 (padma.7.9.6)

पतितं तद्द्विजश्रेष्ठ चतुर्वर्गफलप्रदम् । स्वर्गस्थाः पितरः सर्वे गच्छंतो जाह्नवीतटे

patitaṁ taddvijaśreṣṭha caturvargaphalapradam svargasthāḥ pitaraḥ sarve gacchaṁto jāhnavītaṭe

हे द्विजश्रेष्ठ! गिरकर, चतुर्वर्ग-फल का दाता बनता है। जाह्नवी के तट पर जाते हुए स्वर्गस्थ पितृगण सब,

श्लोक 7 (padma.7.9.7)

संदृश्य हृष्टाः शंसंति वदंत इति जैमिने । तत्पुण्यं कृतमस्माभिः सद्गतिप्राप्तये पुरा

saṁdṛśya hṛṣṭāḥ śaṁsaṁti vadaṁta iti jaimine tatpuṇyaṁ kṛtamasmābhiḥ sadgatiprāptaye purā

देखकर हर्षित होते हैं और हे जैमिनि, यह कहने लगते हैं — हमने ही पूर्वकाल में यह पुण्य किया था, जिससे सद्गति प्राप्त हुई।

श्लोक 8 (padma.7.9.8)

भविष्यत्यक्षयं तच्च यतः पुत्रोऽयमीदृशः । अनेन गाङ्गैः सलिलैर्वयं संप्रति तर्पिताः

bhaviṣyatyakṣayaṁ tacca yataḥ putro'yamīdṛśaḥ anena gāṅgaiḥ salilairvayaṁ saṁprati tarpitāḥ

वह अक्षय होगा, क्योंकि हमें ऐसा पुत्र मिला है। इस गंगाजल से अभी हम तृप्त हो चुके हैं।

श्लोक 9 (padma.7.9.9)

यास्यामः परमं धाम दुर्ल्लभं यत्सुरैरपि । गङ्गायां यानि द्रव्याणि दास्यत्यस्माकमात्मजः

yāsyāmaḥ paramaṁ dhāma durllabhaṁ yatsurairapi gaṅgāyāṁ yāni dravyāṇi dāsyatyasmākamātmajaḥ

हम उस परम धाम को जाएँगे जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। गंगा में जो भी वस्तुएँ हमारा यह पुत्र अर्पित करेगा,

श्लोक 10 (padma.7.9.10)

अस्मभ्यं तानि सर्वाणि भविष्यंत्यक्षयाणि वै । नरकस्थाश्च पितरः सर्वदुःखसमन्विताः

asmabhyaṁ tāni sarvāṇi bhaviṣyaṁtyakṣayāṇi vai narakasthāśca pitaraḥ sarvaduḥkhasamanvitāḥ

वे सब हमारे लिए अक्षय हो जाएँगी। और नरक में स्थित पितृगण, समस्त दुःखों से युक्त,

श्लोक 11 (padma.7.9.11)

वदंतीति सुतं दृष्ट्वा गच्छंतं जाह्नवीतटम् । कृतानि यानि पापानि नरकक्लेशदानि वै

vadaṁtīti sutaṁ dṛṣṭvā gacchaṁtaṁ jāhnavītaṭam kṛtāni yāni pāpāni narakakleśadāni vai

अपने पुत्र को जाह्नवी के तट की ओर जाते देखकर, यह कहने लगते हैं — जो नरक-यातना देने वाले पाप हमने किये थे,

श्लोक 12 (padma.7.9.12)

यास्यंति संक्षयं तानि पुत्रस्यापि प्रसादतः । विमुक्ता नरकक्लेशैर्वयं सर्वे सुदुःसहैः

yāsyaṁti saṁkṣayaṁ tāni putrasyāpi prasādataḥ vimuktā narakakleśairvayaṁ sarve suduḥsahaiḥ

वे भी हमारे पुत्र की कृपा से नष्ट हो जाएँगे। हम सब उन अत्यन्त असह्य नरक-यातनाओं से मुक्त होकर,

श्लोक 13 (padma.7.9.13)

अथ पुत्रप्रसादेन यास्यामः परमां गतिम् । यात्रां विधाय यो मर्त्यो गृहं मोहान्निवर्तते

atha putraprasādena yāsyāmaḥ paramāṁ gatim yātrāṁ vidhāya yo martyo gṛhaṁ mohānnivartate

पुत्र की कृपा से ही परम गति को प्राप्त होंगे। जो मनुष्य यात्रा आरम्भ करके मोह से घर लौट आता है,

श्लोक 14 (padma.7.9.14)

निराशाः पितरस्तस्य यांति सर्वे यथा गताः । आमिषं मैथुनं चैव दोलामश्वं गजं तथा

nirāśāḥ pitarastasya yāṁti sarve yathā gatāḥ āmiṣaṁ maithunaṁ caiva dolāmaśvaṁ gajaṁ tathā

उसके पितृगण सब निराश होकर वैसे ही लौट जाते हैं जैसे आये थे। यात्रा में मांस, मैथुन, पालकी, घोड़ा, हाथी,

श्लोक 15 (padma.7.9.15)

उपानहं चातपत्रं गंगायात्रासु वर्जयेत् । अध्वश्रमोद्भवं दुःखं दुष्करं न हि मन्यते

upānahaṁ cātapatraṁ gaṁgāyātrāsu varjayet adhvaśramodbhavaṁ duḥkhaṁ duṣkaraṁ na hi manyate

जूता और छाता — इन सबका गंगा-यात्रा में त्याग करना चाहिए। मार्ग के परिश्रम से उत्पन्न दुःख को कठिन नहीं मानना चाहिए,

श्लोक 16 (padma.7.9.16)

गृहे पद्मसुखं तत्र गङ्गास्नाने स्मरेन्न च । असत्यभाषणं चैव पाखंडसंगमेव च

gṛhe padmasukhaṁ tatra gaṅgāsnāne smarenna ca asatyabhāṣaṇaṁ caiva pākhaṁḍasaṁgameva ca

और वहाँ अपने घर के सुख-सा सुख गंगा-स्नान में याद नहीं करना चाहिए। असत्य भाषण, पाखण्डियों की संगति,

श्लोक 17 (padma.7.9.17)

द्विर्भोजनं च कलहं गंगायात्रासु वर्जयेत् । परनिंदां च लोभं च गर्वं च क्रोधमत्सरौ

dvirbhojanaṁ ca kalahaṁ gaṁgāyātrāsu varjayet paraniṁdāṁ ca lobhaṁ ca garvaṁ ca krodhamatsarau

दो बार भोजन करना, और कलह — गंगा-यात्रा में इन सबका त्याग करना चाहिए। दूसरों की निन्दा, लोभ, गर्व, क्रोध और ईर्ष्या,

श्लोक 18 (padma.7.9.18)

अत्यंतहास्यशोकं च गंगायात्रासु वर्जयेत् । मंचसुप्तमिवात्मानं चिंतयेद्भूमिशायिनम्

atyaṁtahāsyaśokaṁ ca gaṁgāyātrāsu varjayet maṁcasuptamivātmānaṁ ciṁtayedbhūmiśāyinam

अत्यधिक हँसी और शोक — गंगा-यात्रा में इनसे भी बचना चाहिए। खाट पर सोये हुए की भाँति नहीं, अपने आपको भूमि पर सोया हुआ सोचना चाहिए।

श्लोक 19 (padma.7.9.19)

गंगानाम सुनामानि वदेद्गच्छञ्जनः पथि । माहात्म्यं जाह्नवी देव्याः सर्वपापप्रणाशनम्

gaṁgānāma sunāmāni vadedgacchañjanaḥ pathi māhātmyaṁ jāhnavī devyāḥ sarvapāpapraṇāśanam

मार्ग में चलता हुआ मनुष्य गंगा के सुन्दर नामों का उच्चारण करे; जाह्नवी देवी की महिमा, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है,

श्लोक 20 (padma.7.9.20)

सुखदं मोक्षदं चैव कथयन्पथि गच्छति । गङ्गे देवि जगन्मातर्देहि संदर्शनं मम

sukhadaṁ mokṣadaṁ caiva kathayanpathi gacchati gaṅge devi jaganmātardehi saṁdarśanaṁ mama

सुख देने वाली और मुक्ति देने वाली महिमा को कहते हुए ही मार्ग में चले — हे गंगे! हे देवि! हे जगन्माता! मुझे अपना दर्शन दो।

श्लोक 21 (padma.7.9.21)

वचोभिः कोमलैरेभिः कुर्याच्छ्रमनिवारणम् । हा कथं सदनं त्यक्तमागतं वा कथं मया

vacobhiḥ komalairebhiḥ kuryācchramanivāraṇam hā kathaṁ sadanaṁ tyaktamāgataṁ vā kathaṁ mayā

इन्हीं कोमल वचनों से अपनी थकान को दूर करना चाहिए। "हाय! मैंने अपना घर कैसे त्यागा, या यहाँ कैसे आया,

श्लोक 22 (padma.7.9.22)

श्रमैरिति वदेद्यस्तु संपूर्णं तत्फलं नहि । क्व पर्यंङ्कः क्व मे पत्नी क्व च मे च सुहृद्गृहम्

śramairiti vadedyastu saṁpūrṇaṁ tatphalaṁ nahi kva paryaṁṅkaḥ kva me patnī kva ca me ca suhṛdgṛham

इतने परिश्रमों से" — जो ऐसा कहता है, उसे उस यात्रा का पूर्ण फल नहीं मिलता। "कहाँ मेरी शय्या, कहाँ मेरी पत्नी, और कहाँ मेरे मित्र का घर,

श्लोक 23 (padma.7.9.23)

स्वपामि प्रांतरे भूमौ कथं वाहं समागतः । धनधान्यादिवस्तूनां का गतिर्वा गृहे मम

svapāmi prāṁtare bhūmau kathaṁ vāhaṁ samāgataḥ dhanadhānyādivastūnāṁ kā gatirvā gṛhe mama

मैं वन में भूमि पर क्यों सोता हूँ, मैं यहाँ किस लिए आया? मेरे घर में धन-धान्य आदि वस्तुओं की क्या दशा है,

श्लोक 24 (padma.7.9.24)

कियद्भिर्दिवसैर्भूयो गमिष्याम्यहमालयम् । इति चिंताकुला ये च पथि गच्छंति मानवाः

kiyadbhirdivasairbhūyo gamiṣyāmyahamālayam iti ciṁtākulā ye ca pathi gacchaṁti mānavāḥ

कितने ही दिनों में मैं फिर अपने घर लौटूँगा" — इस प्रकार की चिन्ता से व्याकुल होकर जो लोग मार्ग में चलते हैं,

श्लोक 25 (padma.7.9.25)

गंगास्नानफलं तेषां संपूर्णं न भवेद्द्विज । गङ्गे गंतुं प्रतीतीरे यात्रेयं विहिता तव

gaṁgāsnānaphalaṁ teṣāṁ saṁpūrṇaṁ na bhaveddvija gaṅge gaṁtuṁ pratītīre yātreyaṁ vihitā tava

हे द्विज! उनके गंगा-स्नान का फल पूर्ण नहीं होता। हे गंगे! हे सरिद्वरे! तुम्हारे तट पर जाने के लिए यह यात्रा तुम्हारे लिए ही उपस्थित की गई है;

श्लोक 26 (padma.7.9.26)

निर्विघ्नां सिद्धिमाप्नोमि त्वत्प्रसादात्सरिद्वरे । इमं मंत्रं समुच्चार्य यात्राकाले विशेषतः

nirvighnāṁ siddhimāpnomi tvatprasādātsaridvare imaṁ maṁtraṁ samuccārya yātrākāle viśeṣataḥ

मैं तुम्हारी कृपा से विघ्न-रहित सिद्धि पाऊँ — इस मन्त्र का उच्चारण करके, यात्रा के समय विशेष रूप से,

श्लोक 27 (padma.7.9.27)

हर्षितो निलयाद्गच्छेद्वैष्णवैः सह जैमिने । नातिवेगेन गंतव्यं न तथा च शनैः शनैः

harṣito nilayādgacchedvaiṣṇavaiḥ saha jaimine nātivegena gaṁtavyaṁ na tathā ca śanaiḥ śanaiḥ

हे जैमिनि! प्रसन्नतापूर्वक अपने घर से वैष्णवों के साथ जाना चाहिए। न तो अत्यधिक तेज गति से, और न अत्यन्त धीरे-धीरे जाना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.7.9.28)

गङ्गायात्रासु कर्त्तव्यं नान्यत्कर्म विचक्षणैः । गंगातीरे प्रयागे तु वाणिज्यप्रमुखानि च

gaṅgāyātrāsu karttavyaṁ nānyatkarma vicakṣaṇaiḥ gaṁgātīre prayāge tu vāṇijyapramukhāni ca

बुद्धिमानों को गंगा-यात्रा में अन्य कोई कर्म नहीं करना चाहिए। गंगा-तट पर, प्रयाग में, व्यापार आदि,

श्लोक 29 (padma.7.9.29)

कार्याणि कुरुते यस्तु तत्पुण्यार्द्धं विनश्यति । जन्मजन्मार्जितं पापं स्वल्पं वा यदि वा बहु

kāryāṇi kurute yastu tatpuṇyārddhaṁ vinaśyati janmajanmārjitaṁ pāpaṁ svalpaṁ vā yadi vā bahu

जो भी कार्य करता है, उसका आधा पुण्य नष्ट हो जाता है। जन्म-जन्मान्तर में अर्जित पाप, चाहे थोड़ा हो या बहुत,

श्लोक 30 (padma.7.9.30)

गंगादेवीप्रसादेन सर्वं मे यास्यति क्षयम् । इत्युक्त्वा परमप्रीतः प्राज्ञो गङ्गातटं व्रजेत्

gaṁgādevīprasādena sarvaṁ me yāsyati kṣayam ityuktvā paramaprītaḥ prājño gaṅgātaṭaṁ vrajet

गंगा-देवी की कृपा से मेरा सब कुछ नष्ट हो जाएगा — यह कहकर, अत्यन्त प्रसन्न होकर बुद्धिमान् मनुष्य गंगा-तट की ओर जाए।

श्लोक 31 (padma.7.9.31)

दृष्ट्वा च मातरं गङ्गामिमं मंत्रमुदीरयेत् । अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्

dṛṣṭvā ca mātaraṁ gaṅgāmimaṁ maṁtramudīrayet adya me saphalaṁ janma jīvitaṁ ca sujīvitam

माता गंगा को देखकर उसे यह मन्त्र कहना चाहिए — आज मेरा जन्म सफल है, मेरा जीवन सुजीवन है,

श्लोक 32 (padma.7.9.32)

साक्षाद्ब्रह्मस्वरूपां त्वामपश्यमिति चक्षुषा । देवि त्वद्दर्शनादेव महापातकिनो मम

sākṣādbrahmasvarūpāṁ tvāmapaśyamiti cakṣuṣā devi tvaddarśanādeva mahāpātakino mama

क्योंकि मैंने साक्षात् ब्रह्म-स्वरूपिणी तुझे अपनी आँखों से देखा है। हे देवि! तुम्हारे दर्शन-मात्र से मेरे,

श्लोक 33 (padma.7.9.33)

विनष्टमभवत्पापं जन्मकोटिसमुद्भवम् । इत्युक्त्वा सकलं देहं निपात्य पृथिवीतले

vinaṣṭamabhavatpāpaṁ janmakoṭisamudbhavam ityuktvā sakalaṁ dehaṁ nipātya pṛthivītale

करोड़ों जन्मों में अर्जित उस पाप का, जो मुझे महापापी बनाता था, नाश हो गया — ऐसा कहकर, अपने सारे शरीर को पृथ्वी पर गिराकर,

श्लोक 34 (padma.7.9.34)

प्रणमेज्जाह्नवीं देवीं भक्तिभावसमन्वितः । ततः स्रोतःसमीपे च बद्धाञ्जलिरिमं पुनः

praṇamejjāhnavīṁ devīṁ bhaktibhāvasamanvitaḥ tataḥ srotaḥsamīpe ca baddhāñjalirimaṁ punaḥ

भक्तिभाव से युक्त होकर जाह्नवी देवी को प्रणाम करना चाहिए। फिर गंगा की धारा के निकट, हाथ जोड़कर, हे द्विजसत्तम,

श्लोक 35 (padma.7.9.35)

पठेन्मंत्रं भक्तिभावैः सुप्रीतो द्विजसत्तम । गंगे देवि जगद्धात्रि पादाभ्यां सलिलं तव

paṭhenmaṁtraṁ bhaktibhāvaiḥ suprīto dvijasattama gaṁge devi jagaddhātri pādābhyāṁ salilaṁ tava

भक्तिभाव से यह मन्त्र प्रसन्नतापूर्वक पढ़ना चाहिए — हे गंगे! हे देवि! हे जगत् की धारक! मैं तुम्हारे जल को अपने पैरों से,

श्लोक 36 (padma.7.9.36)

स्पृशामीत्यपराधं मे प्रसन्ना क्षंतुमर्हसि । स्वर्गारोहणसोपानं त्वदीयमुदकं शुभे

spṛśāmītyaparādhaṁ me prasannā kṣaṁtumarhasi svargārohaṇasopānaṁ tvadīyamudakaṁ śubhe

स्पर्श करता हूँ — यह मेरा अपराध है, इसे तुम प्रसन्न होकर क्षमा करने योग्य हो। हे शुभे! तुम्हारा यह जल स्वर्ग पर चढ़ने की सीढ़ी के समान है,

श्लोक 37 (padma.7.9.37)

अतः स्पृशामि पादाभ्यां गंगे देवि नमो नमः । ततस्तु मस्तके धृत्वा गांगेयं वारि भक्तितः

ataḥ spṛśāmi pādābhyāṁ gaṁge devi namo namaḥ tatastu mastake dhṛtvā gāṁgeyaṁ vāri bhaktitaḥ

इसलिए मैं इसे अपने पैरों से स्पर्श करता हूँ, हे गंगे! हे देवि! तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। फिर सिर पर गंगाजल भक्तिपूर्वक धारण करके,

श्लोक 38 (padma.7.9.38)

स्नानार्थं प्रविशेत्स्रोतः प्राज्ञो गंगेति कीर्तयन् । त्वत्कर्दमैरतिस्निग्धैः सर्वपापप्रणाशनैः

snānārthaṁ praviśetsrotaḥ prājño gaṁgeti kīrtayan tvatkardamairatisnigdhaiḥ sarvapāpapraṇāśanaiḥ

बुद्धिमान् मनुष्य "गंगा" का कीर्तन करते हुए स्नान के लिए धारा में प्रवेश करे — तुम्हारे अत्यन्त चिकने, सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने वाले कीचड़ से,

श्लोक 39 (padma.7.9.39)

मया संलिप्यते गात्रं मातर्मे हर पातकम् । गङ्गाकर्दमलिप्ताङ्गो गङ्गागङ्गेति कीर्तयन्

mayā saṁlipyate gātraṁ mātarme hara pātakam gaṅgākardamaliptāṅgo gaṅgāgaṅgeti kīrtayan

मैं अपने शरीर का लेप करता हूँ; हे माता! मेरे पाप को हर लो — इस प्रकार गंगा-कीचड़ से अंगों को लेप करके, "गंगा, गंगा" ऐसा कीर्तन करते हुए,

श्लोक 40 (padma.7.9.40)

सर्वकल्मषनाशिन्यां गङ्गायां स्नानमाचरेत् । भूयः पूर्वोक्तमन्त्रेण गृहीत्वा मृत्तिकां ततः

sarvakalmaṣanāśinyāṁ gaṅgāyāṁ snānamācaret bhūyaḥ pūrvoktamantreṇa gṛhītvā mṛttikāṁ tataḥ

समस्त कल्मष का नाश करने वाली गंगा में स्नान करना चाहिए। फिर पूर्व कहे गये मन्त्र से मिट्टी लेकर,

श्लोक 41 (padma.7.9.41)

वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण गृहीत्वा मृत्तिकां पुनः । वक्ष्यमाणेन मंत्रेण भक्तितः स्नानमाचरेत्

vakṣyamāṇena mantreṇa gṛhītvā mṛttikāṁ punaḥ vakṣyamāṇena maṁtreṇa bhaktitaḥ snānamācaret

अब कहे जाने वाले मन्त्र से पुनः मिट्टी लेकर, अब कहे जाने वाले मन्त्र से भक्तिपूर्वक स्नान करना चाहिए —

श्लोक 42 (padma.7.9.42)

ब्रह्मस्वरूपे हे गङ्गे स्नानमाचर्यते मया । त्वदीये निर्मले तोये यथोक्तफलदा भव

brahmasvarūpe he gaṅge snānamācaryate mayā tvadīye nirmale toye yathoktaphaladā bhava

हे ब्रह्म-स्वरूपिणी गंगे! तुम्हारे इस निर्मल जल में मैं स्नान करता हूँ; यथोक्त फल देने वाली बनो।

श्लोक 43 (padma.7.9.43)

ततो निजेच्छया विप्र गङ्गायां लोकमातरि । स्नानं समाचरेत्प्राज्ञो गङ्गानारायणं स्मरन्

tato nijecchayā vipra gaṅgāyāṁ lokamātari snānaṁ samācaretprājño gaṅgānārāyaṇaṁ smaran

फिर, हे विप्र, अपनी इच्छा से, सम्पूर्ण लोकों की माता गंगा में, बुद्धिमान् मनुष्य को गंगा और नारायण दोनों का स्मरण करते हुए,

श्लोक 44 (padma.7.9.44)

एवं स्नात्वा तु गङ्गायां गात्रं वस्त्रेण मार्जयेत् । परिधेयांबरांबूनि गङ्गास्रोतसि न त्यजेत्

evaṁ snātvā tu gaṅgāyāṁ gātraṁ vastreṇa mārjayet paridheyāṁbarāṁbūni gaṅgāsrotasi na tyajet

स्नान करना चाहिए। इस प्रकार गंगा में स्नान करके, शरीर को वस्त्र से पोंछना चाहिए; पहने हुए वस्त्रों का जल गंगा की धारा में नहीं त्यागना चाहिए।

श्लोक 45 (padma.7.9.45)

न दंतधावनं कुर्याद्गङ्गागर्भे विचक्षणः । कुर्याच्चेन्मोहतः पुण्यं न गङ्गास्नानजं लभेत्

na daṁtadhāvanaṁ kuryādgaṅgāgarbhe vicakṣaṇaḥ kuryāccenmohataḥ puṇyaṁ na gaṅgāsnānajaṁ labhet

बुद्धिमान् मनुष्य को गंगा के भीतर दन्त-धावन नहीं करना चाहिए; यदि मोहवश ऐसा करे, तो गंगा-स्नान से उत्पन्न पुण्य नहीं मिलता।

श्लोक 46 (padma.7.9.46)

प्रभातेऽन्यत्र तां कृत्वा दंतकाष्ठादिकक्रियाम् । रात्रिवासं परित्यज्य गङ्गायां स्नानमाचरेत्

prabhāte'nyatra tāṁ kṛtvā daṁtakāṣṭhādikakriyām rātrivāsaṁ parityajya gaṅgāyāṁ snānamācaret

प्रभात में अन्यत्र दन्त-काष्ठ आदि क्रिया करके, रात्रि-वास को त्यागकर, गंगा में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 47 (padma.7.9.47)

बाह्यभूमिमगत्वा यो गङ्गायां स्नानमाचरेत् । गङ्गास्नानफलं सोऽपि संपूर्णं च लभेन्नहि

bāhyabhūmimagatvā yo gaṅgāyāṁ snānamācaret gaṅgāsnānaphalaṁ so'pi saṁpūrṇaṁ ca labhennahi

जो बाह्य-भूमि (शौच-स्थान) में गये बिना ही गंगा में स्नान करता है, उसे भी गंगा-स्नान का सम्पूर्ण फल नहीं मिलता।

श्लोक 48 (padma.7.9.48)

स्नात्वा च गङ्गामृत्पुंड्रं स्थाने स्थाने नयेद्बुधः । ततः स्थिरमनाः कुर्याद्विधिना तर्पणादिकम्

snātvā ca gaṅgāmṛtpuṁḍraṁ sthāne sthāne nayedbudhaḥ tataḥ sthiramanāḥ kuryādvidhinā tarpaṇādikam

स्नान करके, बुद्धिमान् व्यक्ति को हर स्थान पर गंगा-मिट्टी का तिलक लगाना चाहिए; फिर स्थिर मन से विधिपूर्वक तर्पण आदि करना चाहिए।

श्लोक 49 (padma.7.9.49)

गाङ्गेयैरुदकैर्यस्तु कुरुते पितृतर्पणम् । पितरस्तस्य तृप्यंति वर्षकोटिशतावधि

gāṅgeyairudakairyastu kurute pitṛtarpaṇam pitarastasya tṛpyaṁti varṣakoṭiśatāvadhi

जो गंगाजल से पितृ-तर्पण करता है, उसके पितृगण सैकड़ों करोड़ वर्षों तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 50 (padma.7.9.50)

गङ्गायां कुरुते यस्तु पितृश्राद्धं द्विजोत्तम । पितरस्तस्य तिष्ठंति संतुष्टास्त्रिदशालयम्

gaṅgāyāṁ kurute yastu pitṛśrāddhaṁ dvijottama pitarastasya tiṣṭhaṁti saṁtuṣṭāstridaśālayam

हे द्विजोत्तम! जो गंगा में पितृ-श्राद्ध करता है, उसके पितृगण सन्तुष्ट होकर स्वर्ग-लोक में निवास करते हैं।

श्लोक 51 (padma.7.9.51)

समाप्य स्नानकर्माणि गङ्गायां समुपोषितः । दानं देवार्चनं चैव जयोऽन्याश्च क्रियास्तथा । कृतास्तु यास्तु गङ्गायां क्षयस्तासां न विद्यते

samāpya snānakarmāṇi gaṅgāyāṁ samupoṣitaḥ dānaṁ devārcanaṁ caiva jayo'nyāśca kriyāstathā kṛtāstu yāstu gaṅgāyāṁ kṣayastāsāṁ na vidyate

स्नान का कार्य पूर्ण करके, गंगा में उपवास करके, दान, देव-अर्चन, जप और अन्य क्रियाएँ, जो गंगा में की जाती हैं, उनका कभी क्षय नहीं होता।

श्लोक 52 (padma.7.9.52)

समाप्य स्नानकर्माणि गंगायां समुपोषितः । कृतपंचमहायज्ञो गंगापूजां समाचरेत्

samāpya snānakarmāṇi gaṁgāyāṁ samupoṣitaḥ kṛtapaṁcamahāyajño gaṁgāpūjāṁ samācaret

स्नान का कार्य पूर्ण करके, गंगा में उपवास करके, पाँच महायज्ञ पूरे करके, गंगा की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 53 (padma.7.9.53)

गंगायाः प्रतिमां देव्याः श्रीविष्णोः प्रतिमां तथा । नालिकेरोदकैर्दिव्यैः स्नापयेद्भक्तितो बुधः

gaṁgāyāḥ pratimāṁ devyāḥ śrīviṣṇoḥ pratimāṁ tathā nālikerodakairdivyaiḥ snāpayedbhaktito budhaḥ

बुद्धिमान् व्यक्ति को देवी गंगा की प्रतिमा और श्रीविष्णु की प्रतिमा को दिव्य नारियल-जल से भक्तिपूर्वक स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 54 (padma.7.9.54)

जाह्नवीप्रतिमाभावान्नालिकेरोदकानि वै । निक्षिपेज्जाह्नवीतोये जाह्नवीं हृदि संस्मरन्

jāhnavīpratimābhāvānnālikerodakāni vai nikṣipejjāhnavītoye jāhnavīṁ hṛdi saṁsmaran

जाह्नवी की प्रतिमा न होने पर, नारियल-जल को ही जाह्नवी के जल में डालकर, हृदय में जाह्नवी का स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 55 (padma.7.9.55)

दिव्यैर्गंधैश्च दीपैश्च घृतपूर्णसमुज्ज्वलैः । धूपैः सुवासितैश्चैव नानापुष्पमनोहरैः

divyairgaṁdhaiśca dīpaiśca ghṛtapūrṇasamujjvalaiḥ dhūpaiḥ suvāsitaiścaiva nānāpuṣpamanoharaiḥ

दिव्य सुगन्धों से, घी से पूर्ण उज्ज्वल दीपों से, सुवासित धूप से, तथा नाना मनोहर पुष्पों से,

श्लोक 56 (padma.7.9.56)

नानाफलैः सुपक्वैश्च नैवेद्यैरुत्तमास्तथा । पाद्यार्घाचमनीयैश्च तांबूलैः खादिरान्वितैः

nānāphalaiḥ supakvaiśca naivedyairuttamāstathā pādyārghācamanīyaiśca tāṁbūlaiḥ khādirānvitaiḥ

नाना प्रकार के सुपक्व फलों से और उत्तम नैवेद्यों से, पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय जल से, खदिर-मिश्रित पान से,

श्लोक 57 (padma.7.9.57)

अन्यैरप्युपहारैश्च विशिष्टैर्निजभक्तितः । स्तवैर्नाना च नैवेद्यैर्गङ्गां विष्णुं च पूजयेत्

anyairapyupahāraiśca viśiṣṭairnijabhaktitaḥ stavairnānā ca naivedyairgaṅgāṁ viṣṇuṁ ca pūjayet

और अन्य विशिष्ट उपहारों से भी, अपनी भक्ति के अनुसार, अनेक स्तवों और नैवेद्यों से गंगा और विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 58 (padma.7.9.58)

ततः संपूजितां देवीं विष्णुं च परमेश्वरम् । अंगप्रदक्षिणां कुर्याद्भक्त्या वारत्रयं बुधः

tataḥ saṁpūjitāṁ devīṁ viṣṇuṁ ca parameśvaram aṁgapradakṣiṇāṁ kuryādbhaktyā vāratrayaṁ budhaḥ

फिर उस पूजित देवी और परमेश्वर विष्णु की, बुद्धिमान् व्यक्ति को भक्तिपूर्वक तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

श्लोक 59 (padma.7.9.59)

अथ स्थित्वा निराहारोऽपरेहनि सरिद्वरे । भोक्ष्यामि जह्नुतनये शरणं मे भवानघे

atha sthitvā nirāhāro'parehani saridvare bhokṣyāmi jahnutanaye śaraṇaṁ me bhavānaghe

फिर उस दिन बिना भोजन किये रहकर, अगले दिन भोजन करूँगा — हे जह्नु-कन्ये, हे निष्पाप! तुम मेरी शरण हो।

श्लोक 60 (padma.7.9.60)

एवं संकल्प्य मतिमान्कर्मणा मनसा गिरा । रात्रौ जागरणं कुर्याज्जितनिद्रो ऽतिहर्षितः

evaṁ saṁkalpya matimānkarmaṇā manasā girā rātrau jāgaraṇaṁ kuryājjitanidro 'tiharṣitaḥ

इस प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति कर्म, मन और वाणी से यह संकल्प करके, रात्रि में जागरण करे, नींद पर विजय पाकर, अत्यन्त हर्षित होकर।

श्लोक 61 (padma.7.9.61)

अशक्त्या च द्विजश्रेष्ठ फलाहारो भवेदधः । अन्नमात्रं न भुंजीत न च कुर्याद्धि भोजनम्

aśaktyā ca dvijaśreṣṭha phalāhāro bhavedadhaḥ annamātraṁ na bhuṁjīta na ca kuryāddhi bhojanam

हे द्विजश्रेष्ठ! जो अशक्त हो, वह फलाहार पर उतर सकता है; परन्तु केवल अन्न न खाए, और सामान्य भोजन तो कदापि न करे।

श्लोक 62 (padma.7.9.62)

प्रातर्गङ्गां च विष्णुं च पुनरभ्यर्च्य जैमिने । विप्राय दक्षिणां दद्याद्विभवस्यानुरूपतः

prātargaṅgāṁ ca viṣṇuṁ ca punarabhyarcya jaimine viprāya dakṣiṇāṁ dadyādvibhavasyānurūpataḥ

हे जैमिनि! प्रभात में गंगा और विष्णु दोनों की फिर से अर्चना करके, अपने वैभव के अनुरूप ब्राह्मण को दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 63 (padma.7.9.63)

अर्चनं जागरं चैव यत्कृतं पुरतस्तव । अच्छिद्रमस्तु तत्सर्वं त्वत्प्रसादात्सरिद्वरे

arcanaṁ jāgaraṁ caiva yatkṛtaṁ puratastava acchidramastu tatsarvaṁ tvatprasādātsaridvare

जो पूजा और जागरण तुम्हारे सामने किया गया है, हे सरिद्वरे! वह सब, तुम्हारी कृपा से, त्रुटि-रहित हो।

श्लोक 64 (padma.7.9.64)

इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य कृतनित्यक्रियो द्विजः । ततः सबंधुभिः सार्द्धं पारणं स्वयमाचरेत्

ityuktvā tāṁ namaskṛtya kṛtanityakriyo dvijaḥ tataḥ sabaṁdhubhiḥ sārddhaṁ pāraṇaṁ svayamācaret

यह कहकर, उसे नमस्कार करके, नित्य-कर्म पूर्ण करने वाला वह द्विज, फिर अपने बन्धुओं सहित, स्वयं व्रत का पारण करे।

श्लोक 65 (padma.7.9.65)

तीर्थोपवासमेवं यः कुरुते जाह्नवीतटे । तस्य पुण्यफलं वत्स वदतो मे निशामय

tīrthopavāsamevaṁ yaḥ kurute jāhnavītaṭe tasya puṇyaphalaṁ vatsa vadato me niśāmaya

इस प्रकार जो जाह्नवी के तट पर तीर्थ-उपवास करता है, हे वत्स! उसके पुण्य का फल, मुझसे कहा जाता है, सुनो।

श्लोक 66 (padma.7.9.66)

जन्मांतरार्जितैः पापैर्विमुक्तो विष्णुरूपधृक् । विष्णोः पुरं समासाद्य विष्णुना सह मोदते

janmāṁtarārjitaiḥ pāpairvimukto viṣṇurūpadhṛk viṣṇoḥ puraṁ samāsādya viṣṇunā saha modate

जन्म-जन्मान्तर में अर्जित पापों से मुक्त होकर, वह विष्णु का ही स्वरूप धारण करके, विष्णु के धाम को प्राप्त होकर, विष्णु के साथ आनन्द मनाता है।

श्लोक 67 (padma.7.9.67)

कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । स्थित्वा विष्णुपुरं सर्वं सुखं भुंक्ते सुदुर्ल्लभम्

kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca sthitvā viṣṇupuraṁ sarvaṁ sukhaṁ bhuṁkte sudurllabham

हजारों करोड़ कल्प और सैकड़ों करोड़ कल्प तक विष्णु के धाम में रहकर, वह अत्यन्त दुर्लभ सुख भोगता है।

श्लोक 68 (padma.7.9.68)

ततो नारायणादेशाद्ब्रह्मलोकं स गच्छति । ब्रह्मलोके सुखं भुंक्ते दुर्ल्लभं यत्सुरैरपि

tato nārāyaṇādeśādbrahmalokaṁ sa gacchati brahmaloke sukhaṁ bhuṁkte durllabhaṁ yatsurairapi

फिर नारायण की आज्ञा से वह ब्रह्मलोक को जाता है। ब्रह्मलोक में वह उस सुख को भोगता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 69 (padma.7.9.69)

तावत्कालं ब्रह्मलोके स्थित्वा ब्रह्मक्षयात्ततः । महादेवं ततो गच्छेद्रथमारुह्य शोभनम्

tāvatkālaṁ brahmaloke sthitvā brahmakṣayāttataḥ mahādevaṁ tato gacchedrathamāruhya śobhanam

उतने काल तक ब्रह्मलोक में रहकर, ब्रह्मा के क्षय होने पर, वह फिर सुन्दर रथ पर सवार होकर महादेव के धाम को जाता है।

श्लोक 70 (padma.7.9.70)

सुखं नानाविधं तत्र भुङ्क्तेऽत्यन्तसुदुर्ल्लभम् । गाणपत्यमवाप्नोति किमन्यैर्बहुभाषितैः

sukhaṁ nānāvidhaṁ tatra bhuṅkte'tyantasudurllabham gāṇapatyamavāpnoti kimanyairbahubhāṣitaiḥ

वहाँ अत्यन्त दुर्लभ, नाना प्रकार का सुख भोगता है, और गणपत्य पद प्राप्त करता है — इससे अधिक बहुत क्या कहें?

श्लोक 71 (padma.7.9.71)

तावत्कालं शिवपुरे स्थित्वा वै पुण्यवान्नरः । इन्द्रलोकं ततो गच्छेद्द्वितीय इव वासवः

tāvatkālaṁ śivapure sthitvā vai puṇyavānnaraḥ indralokaṁ tato gaccheddvitīya iva vāsavaḥ

उतने काल तक शिवपुर में पुण्यवान् मनुष्य रहकर, फिर इन्द्रलोक को जाता है, मानो दूसरा इन्द्र ही हो।

श्लोक 72 (padma.7.9.72)

तेन पुण्यात्मना सार्द्धं वसेदेकासने ततः । तत्र भुक्त्वाखिलान्कामान्कल्पकोटिशतावधि

tena puṇyātmanā sārddhaṁ vasedekāsane tataḥ tatra bhuktvākhilānkāmānkalpakoṭiśatāvadhi

उस पुण्यात्मा के साथ इन्द्र भी एक ही आसन पर बैठता है। वहाँ सैकड़ों करोड़ कल्पों तक समस्त कामनाओं को भोगकर,

श्लोक 73 (padma.7.9.73)

सूर्यलोकं ततो गच्छेद्द्वितीय इव चन्द्रमाः । तत्रामृतानि भुक्त्वा वै चिरं चन्द्रस्य सन्निधौ

sūryalokaṁ tato gaccheddvitīya iva candramāḥ tatrāmṛtāni bhuktvā vai ciraṁ candrasya sannidhau

फिर वह सूर्यलोक को जाता है, मानो दूसरा चन्द्रमा ही हो। वहाँ दीर्घकाल तक चन्द्रमा के सान्निध्य में अमृत-पान करके,

श्लोक 74 (padma.7.9.74)

पुनरागत्य पृथिवीं चक्रवर्ती नृपो भवेत् । पालयित्वा चिरं पृथ्वीं जित्वा वै सकलान्रिपून्

punarāgatya pṛthivīṁ cakravartī nṛpo bhavet pālayitvā ciraṁ pṛthvīṁ jitvā vai sakalānripūn

पुनः पृथ्वी पर लौटकर वह चक्रवर्ती राजा बनता है। समस्त शत्रुओं को जीतकर, दीर्घकाल तक पृथ्वी का पालन करके,

श्लोक 75 (padma.7.9.75)

आयुषोंऽते च गङ्गायां सुखं मृत्युमवाप्नुयात् । भूयः स एवमारुह्य विमानं सुमहायशाः

āyuṣoṁ'te ca gaṅgāyāṁ sukhaṁ mṛtyumavāpnuyāt bhūyaḥ sa evamāruhya vimānaṁ sumahāyaśāḥ

आयु के अन्त में गंगा में सुखपूर्वक मृत्यु प्राप्त करता है। फिर वह अत्यन्त यशस्वी पुरुष, उसी प्रकार विमान पर सवार होकर,

श्लोक 76 (padma.7.9.76)

पुरं भगवतो याति दैवतैरपि दुर्ल्लभम् । तत्र भुक्त्वाखिलान्भोगान्मन्वंतरचतुष्टयम्

puraṁ bhagavato yāti daivatairapi durllabham tatra bhuktvākhilānbhogānmanvaṁtaracatuṣṭayam

भगवान् के धाम को जाता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वहाँ चार मन्वन्तरों तक समस्त भोग भोगकर,

श्लोक 77 (padma.7.9.77)

परमं ज्ञानमासाद्य दुर्ल्लभं मोक्षमाप्नुयात् । जाह्नवीतीरयात्रायां दैवाद्यस्य भवेत्पथि

paramaṁ jñānamāsādya durllabhaṁ mokṣamāpnuyāt jāhnavītīrayātrāyāṁ daivādyasya bhavetpathi

परम ज्ञान प्राप्त करके वह दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करता है। जाह्नवी के तट की यात्रा में मार्ग में जिसकी दैव-योग से,

श्लोक 78 (padma.7.9.78)

पंचता सोऽपि परमं धाम गच्छेन्न संशयः । सत्यधर्मो नाम राजा धार्मिकश्च प्रियंवदः

paṁcatā so'pi paramaṁ dhāma gacchenna saṁśayaḥ satyadharmo nāma rājā dhārmikaśca priyaṁvadaḥ

मृत्यु हो जाती है, वह भी निःसन्देह परम धाम को जाता है। सत्यधर्म नाम का एक राजा, धार्मिक और मधुरभाषी,

श्लोक 79 (padma.7.9.79)

त्रेताद्वापरसंधौ च बभूव क्षितिमण्डले । विजया नाम महिषी तस्य भूमिपतेरभूत्

tretādvāparasaṁdhau ca babhūva kṣitimaṇḍale vijayā nāma mahiṣī tasya bhūmipaterabhūt

त्रेता और द्वापर के संधिकाल में, इस पृथ्वी-मण्डल पर था। उस भूपति की महारानी विजया नाम की थी,

श्लोक 80 (padma.7.9.80)

सुंदरी शीलयुक्ता सा पतिसेवापरायणा । सप्तवर्षसहस्राणि भुक्त्वा वसुमतीमिमाम्

suṁdarī śīlayuktā sā patisevāparāyaṇā saptavarṣasahasrāṇi bhuktvā vasumatīmimām

सुन्दरी, शीलवती, अपने पति की सेवा में तत्पर। सात हजार वर्षों तक इस पृथ्वी को भोगकर,

श्लोक 81 (padma.7.9.81)

कदाचित्प्राप्तकालोऽसौ सदारः पंचतां गतः । ततो यमभटैर्बद्धौ दंपती तौ भयंकरौ

kadācitprāptakālo'sau sadāraḥ paṁcatāṁ gataḥ tato yamabhaṭairbaddhau daṁpatī tau bhayaṁkarau

एक बार, समय पूर्ण होने पर, वह राजा अपनी पत्नी सहित मृत्यु को प्राप्त हो गया। तब उन भयंकर पति-पत्नी दोनों को यम-सेवकों ने बाँध लिया,

श्लोक 82 (padma.7.9.82)

दुःखप्रदेन मार्गेण जग्मतुर्यममंदिरम् । तौ दृष्ट्वा धर्मराजोऽपि चित्रगुप्तमुवाच ह

duḥkhapradena mārgeṇa jagmaturyamamaṁdiram tau dṛṣṭvā dharmarājo'pi citraguptamuvāca ha

और दुःखदायी मार्ग से यमराज के धाम को ले गये। उन्हें देखकर धर्मराज ने भी चित्रगुप्त से कहा —

श्लोक 83 (padma.7.9.83)

एतयोः सर्वकर्माणि चित्रगुप्त विचारय । तेनाज्ञप्तश्चित्रगुप्तस्तयोः कर्माणि जैमिने

etayoḥ sarvakarmāṇi citragupta vicāraya tenājñaptaścitraguptastayoḥ karmāṇi jaimine

हे चित्रगुप्त! इन दोनों के सम्पूर्ण कर्मों का विचार करो। उनकी आज्ञा से चित्रगुप्त ने, हे जैमिनि, इन दोनों के कर्मों का,

श्लोक 84 (padma.7.9.84)

मूलाद्विचारयामास प्राह चेति कृताञ्जलि । चित्रगुप्त उवाच- एतयोः सकलं कर्म शृणु राजन्वदाम्यहम्

mūlādvicārayāmāsa prāha ceti kṛtāñjali citragupta uvāca- etayoḥ sakalaṁ karma śṛṇu rājanvadāmyaham

मूल से विचार करके, हाथ जोड़कर यह कहा। चित्रगुप्त ने कहा — हे राजन्! इन दोनों के सम्पूर्ण कर्म को सुनो, मैं कहता हूँ।

श्लोक 85 (padma.7.9.85)

शुभं वाप्यशुभं कर्म यदेताभ्यां कृतं भुवि । किंचिदस्या नयोपायं वदामि तदहं शृणु

śubhaṁ vāpyaśubhaṁ karma yadetābhyāṁ kṛtaṁ bhuvi kiṁcidasyā nayopāyaṁ vadāmi tadahaṁ śṛṇu

इन दोनों के द्वारा पृथ्वी पर जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म किया गया है, उसका थोड़ा-सा निर्णायक उपाय भी मैं बताता हूँ, वह सुनो।

श्लोक 86 (padma.7.9.86)

एकादा त्रासितो व्याघ्रैः कश्चिदेको मृगः प्रभो । वनाज्जीवनरक्षार्थमागतोऽस्य सभां प्रति

ekādā trāsito vyāghraiḥ kaścideko mṛgaḥ prabho vanājjīvanarakṣārthamāgato'sya sabhāṁ prati

हे प्रभो! एक बार बाघों से भयभीत होकर, एक मृग, प्राणों की रक्षा के लिए वन से भागकर, इसकी सभा की ओर आया।

श्लोक 87 (padma.7.9.87)

तमायांतं समालोक्य भूयोऽयं प्राप्तकौतुकः । जघने स्वयमुत्थाय खड्गेन तरसा मृगम्

tamāyāṁtaṁ samālokya bhūyo'yaṁ prāptakautukaḥ jaghane svayamutthāya khaḍgena tarasā mṛgam

उसे आते देखकर, यह, फिर से कौतुक से भरा हुआ, स्वयं उठकर, तलवार से शीघ्रतापूर्वक उस मृग की जाँघ पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 88 (padma.7.9.88)

जघान ह मृगं राजा शरणागतमप्यमुम् । तस्मात्सदारोभूपोऽयं दंडनीयस्त्वया प्रभो

jaghāna ha mṛgaṁ rājā śaraṇāgatamapyamum tasmātsadārobhūpo'yaṁ daṁḍanīyastvayā prabho

उस राजा ने शरणागत उस मृग को भी मार डाला। इसीलिए यह राजा, अपनी पत्नी सहित, आपके द्वारा दण्डनीय है, हे प्रभु।

श्लोक 89 (padma.7.9.89)

यावंति तस्य रोमाणि संस्थितानि कलेवरे । मन्वंतरसहस्राणि मन्वंतरशतानि च

yāvaṁti tasya romāṇi saṁsthitāni kalevare manvaṁtarasahasrāṇi manvaṁtaraśatāni ca

उसके शरीर पर जितने रोम स्थित थे, उतने ही हजार मन्वन्तरों और सैकड़ों मन्वन्तरों तक,

श्लोक 90 (padma.7.9.90)

कोटिकोटिकुलैर्युक्ता नारकी स्यान्न संशयः । शरणागतरक्षां यः प्राणैरपि धनैरपि

koṭikoṭikulairyuktā nārakī syānna saṁśayaḥ śaraṇāgatarakṣāṁ yaḥ prāṇairapi dhanairapi

करोड़ों-करोड़ों कुल-जनों सहित नारकी होना निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं। शरणागत की रक्षा जो मनुष्य अपने प्राणों से भी, धन से भी,

श्लोक 91 (padma.7.9.91)

कुरुते यो नरो ज्ञानी तस्य पुण्यं निशामय । सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो ब्रह्महत्यामुखैरपि

kurute yo naro jñānī tasya puṇyaṁ niśāmaya sarvapāpairvinirmukto brahmahatyāmukhairapi

करता है, उस ज्ञानी पुरुष का पुण्य सुनो। वह समस्त पापों से, यहाँ तक कि ब्रह्महत्या आदि पापों से भी मुक्त होकर,

श्लोक 92 (padma.7.9.92)

आयुषोऽन्ते व्रजेन्मोक्षं योगिनामपि दुर्ल्लभम् । यमाज्ञया ततो दूतैः सदारोऽसौ महीपतिः

āyuṣo'nte vrajenmokṣaṁ yogināmapi durllabham yamājñayā tato dūtaiḥ sadāro'sau mahīpatiḥ

आयु के अन्त में उस मोक्ष को प्राप्त होता है जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है। तब यमराज की आज्ञा से, दूतों द्वारा, वह राजा अपनी पत्नी सहित,

श्लोक 93 (padma.7.9.93)

असिपत्रवने घोरे स्थापितोऽत्यंतदुःखदे । असितुल्यानि पत्राणि यतस्तेषां च शाखिनाम्

asipatravane ghore sthāpito'tyaṁtaduḥkhade asitulyāni patrāṇi yatasteṣāṁ ca śākhinām

अत्यन्त दुःखदायी, भयंकर असिपत्र-वन में स्थापित किया गया। जिन वृक्षों के पत्ते तलवार के समान होते हैं, उसे,

श्लोक 94 (padma.7.9.94)

असिपत्रवनं प्राहुरतस्तद्वै मनीषिणः । स्थित्वासिपत्रविपिने युगकोटिशतानि च

asipatravanaṁ prāhuratastadvai manīṣiṇaḥ sthitvāsipatravipine yugakoṭiśatāni ca

बुद्धिमान् लोग असिपत्र-वन कहते हैं। उस असिपत्र-वन में सैकड़ों करोड़ युगों तक रहकर,

श्लोक 95 (padma.7.9.95)

सदारो नरकं भेजे व्याघ्रभक्ष्याह्वयं ततः । निरयं तं प्रविशति सर्वोपद्रवसंयुतम्

sadāro narakaṁ bheje vyāghrabhakṣyāhvayaṁ tataḥ nirayaṁ taṁ praviśati sarvopadravasaṁyutam

वह राजा, अपनी पत्नी सहित, फिर व्याघ्रभक्ष्य नामक नरक को प्राप्त हुआ। उस समस्त उपद्रवों से युक्त नरक में जो प्रवेश करता है,

श्लोक 96 (padma.7.9.96)

भवेच्च भक्ष्यो व्याघ्रेण व्याघ्रभक्ष्यस्ततः स्मृतः । युगकोटिसहस्राणि स्थित्वा तत्र स भूपतिः

bhavecca bhakṣyo vyāghreṇa vyāghrabhakṣyastataḥ smṛtaḥ yugakoṭisahasrāṇi sthitvā tatra sa bhūpatiḥ

वह बाघ का भक्ष्य बनता है, इसीलिए उसे व्याघ्रभक्ष्य कहा गया है। हजारों करोड़ युगों तक वहाँ रहकर, वह राजा,

श्लोक 97 (padma.7.9.97)

सदारोऽजनि पापांते भेकयोनिं गतः क्षितौ । जातिस्मरौ ततस्तौ तु भेकीभेकौ सुदुःखितौ

sadāro'jani pāpāṁte bhekayoniṁ gataḥ kṣitau jātismarau tatastau tu bhekībhekau suduḥkhitau

अपनी पत्नी सहित, पाप के अन्त में मेढक-योनि में उत्पन्न हुआ। जातिस्मर होकर वे दोनों, मेढक और मेढकी, अत्यन्त दुःखी,

श्लोक 98 (padma.7.9.98)

तीरे तस्थतुरेकस्मिन्सततं कीटभोजिनौ । अथैकदा तेन पथा पुण्याहं प्राप्य मानवाः

tīre tasthaturekasminsatataṁ kīṭabhojinau athaikadā tena pathā puṇyāhaṁ prāpya mānavāḥ

एक तट पर सदा कीड़े-मकोड़े खाते हुए रहने लगे। एक बार उसी मार्ग से, पुण्य-तिथि पाकर, मनुष्य,

श्लोक 99 (padma.7.9.99)

गच्छंति जाह्नवीतीरं तांस्तौ ददृशतुर्द्विज । भेक उवाच- वर्षाभ्वि मोहाद्यत्सर्वं पापं कर्म कृतं मया

gacchaṁti jāhnavītīraṁ tāṁstau dadṛśaturdvija bheka uvāca- varṣābhvi mohādyatsarvaṁ pāpaṁ karma kṛtaṁ mayā

जाह्नवी के तट की ओर जाते हुए, हे द्विज, उन दोनों ने उन्हें देखा। मेढक ने कहा — हे वर्षाभू! मोह से जो भी सारा पाप-कर्म मैंने किया था,

श्लोक 100 (padma.7.9.100)

अद्यापि कर्मणा तेन दुःखमावां न मुंचति । त्यक्त्वा शरीरं गंगायां मुक्ताः स्युः पापिनोऽपि च

adyāpi karmaṇā tena duḥkhamāvāṁ na muṁcati tyaktvā śarīraṁ gaṁgāyāṁ muktāḥ syuḥ pāpino'pi ca

उसी कर्म के कारण, आज भी वह दुःख हमें नहीं छोड़ता। गंगा में शरीर त्यागकर, पापी भी मुक्त हो जाते हैं;

श्लोक 101 (padma.7.9.101)

तथाप्येवं विधं दुःखमनुभूयावहे कथम् । गंगायां त्यक्तुमिच्छामि संप्रत्येतत्कलेवरम्

tathāpyevaṁ vidhaṁ duḥkhamanubhūyāvahe katham gaṁgāyāṁ tyaktumicchāmi saṁpratyetatkalevaram

फिर भी हम इस प्रकार का दुःख कब तक भोगते रहें? मैं इस समय अपने इस शरीर को गंगा में त्यागना चाहता हूँ।

श्लोक 102 (padma.7.9.102)

का युक्तिर्ब्रूहि तां कांते तितीर्षुर्दुःखसागरम् । वर्षाभ्वी तद्वचः श्रुत्वा प्राहेति विनयान्विता

kā yuktirbrūhi tāṁ kāṁte titīrṣurduḥkhasāgaram varṣābhvī tadvacaḥ śrutvā prāheti vinayānvitā

हे प्रिये! क्या उपाय हो सकता है, वह बताओ — मैं इस दुःख-सागर को पार करना चाहता हूँ। वर्षाभू ने उसका यह वचन सुनकर, विनयपूर्वक यह कहा।

श्लोक 103 (padma.7.9.103)

वर्षाभ्व्युवाच- दुःखं न शक्यते सोढुं स्वामिन्नेतद् द्रुतं कुरु । ततस्तौ दंपती विप्र स्मृत्वा गंगां शुभप्रदाम्

varṣābhvyuvāca- duḥkhaṁ na śakyate soḍhuṁ svāminnetad drutaṁ kuru tatastau daṁpatī vipra smṛtvā gaṁgāṁ śubhapradām

वर्षाभू ने कहा — हे स्वामिन्! यह दुःख सहा नहीं जा सकता, इसे शीघ्र ही कीजिए। तब वे दोनों पति-पत्नी, हे विप्र, कल्याण देने वाली गंगा का स्मरण करके,

श्लोक 104 (padma.7.9.104)

सहसा चक्रतुर्यात्रां मरणायोपहर्षितौ । अथैतौ पथि गच्छंतौ चिरकालं बुभुक्षितौ

sahasā cakraturyātrāṁ maraṇāyopaharṣitau athaitau pathi gacchaṁtau cirakālaṁ bubhukṣitau

मृत्यु के लिए उत्साहित होकर, तत्काल यात्रा आरम्भ कर दी। फिर मार्ग में चलते हुए वे दोनों, दीर्घकाल से भूखे,

श्लोक 105 (padma.7.9.105)

अपश्यत्पापकृत्क्ष्वेडः कालसर्पो भयंकरः । कालसर्प्प उवाच- दर्दुरौ पापिनौ येथाः प्राप्तकालौ युवां ततः

apaśyatpāpakṛtkṣveḍaḥ kālasarpo bhayaṁkaraḥ kālasarppa uvāca- dardurau pāpinau yethāḥ prāptakālau yuvāṁ tataḥ

पापाचारी, भयंकर काल-सर्प को, जो फुफकार रहा था, देखने लगे। कालसर्प ने कहा — हे दोनों मेढको! तुम पापी हो, तुम्हारा समय आ गया है,

श्लोक 106 (padma.7.9.106)

अथ नूनं भक्षितव्यौ क्षुधितेन मया युवाम् । ततस्तावतिसंत्रस्तौ दंपती दुःखभागिनौ

atha nūnaṁ bhakṣitavyau kṣudhitena mayā yuvām tatastāvatisaṁtrastau daṁpatī duḥkhabhāginau

इसलिए भूखे मुझे तुम दोनों को अवश्य ही खाना चाहिए। तब वे दोनों पति-पत्नी, अत्यन्त भयभीत और दुःख से भरे हुए,

श्लोक 107 (padma.7.9.107)

इत्यूचतुर्वचो भक्त्या कालसर्पं पुरोगतम् । नास्ति मृत्युभयं सर्प स्वल्पमप्यावयोर्हृदि

ityūcaturvaco bhaktyā kālasarpaṁ purogatam nāsti mṛtyubhayaṁ sarpa svalpamapyāvayorhṛdi

आगे खड़े उस काल-सर्प से भक्तिपूर्वक यह वचन बोले — हे सर्प! हमारे हृदय में मृत्यु का भय तनिक भी नहीं है।

श्लोक 108 (padma.7.9.108)

अहमासं पुरा राजा सत्यधर्माह्वयः क्षितौ । इयं च विजया नाम महिषी संस्थिता मम

ahamāsaṁ purā rājā satyadharmāhvayaḥ kṣitau iyaṁ ca vijayā nāma mahiṣī saṁsthitā mama

मैं पूर्वकाल में इस पृथ्वी पर सत्यधर्म नाम का राजा था; और यह विजया नाम की मेरी महारानी थी।

श्लोक 109 (padma.7.9.109)

मया दुरात्मना मोहान्नितः शरणं गतः ?। तेनैव कर्मणा भुक्तं चिरं दुःखं यमालये

mayā durātmanā mohānnitaḥ śaraṇaṁ gataḥ ? tenaiva karmaṇā bhuktaṁ ciraṁ duḥkhaṁ yamālaye

मेरे द्वारा, दुरात्मा होकर, मोह से मारा गया वह मृग, जो शरण को आया था — उसी कर्म के कारण मैंने यमराज के धाम में दीर्घकाल तक दुःख भोगा है।

श्लोक 110 (padma.7.9.110)

भोक्तुं स्वकर्मणः शेषं भेकयोनौ स्त्रिया सह । सोऽहं यातोऽस्मि पापेन कृतं कर्म न मुंचति

bhoktuṁ svakarmaṇaḥ śeṣaṁ bhekayonau striyā saha so'haṁ yāto'smi pāpena kṛtaṁ karma na muṁcati

उसी कर्म का शेष भोगने के लिए, अपनी पत्नी सहित, मेढक-योनि में — मैं वह हूँ, जो पाप के फलस्वरूप यहाँ आया हूँ; किया गया कर्म पीछा नहीं छोड़ता।

श्लोक 111 (padma.7.9.111)

सत्यमावां जिगमिषू परमं धाम पन्नग । व्रजावो जाह्नवीतीरं शरीरत्यागहेतवे

satyamāvāṁ jigamiṣū paramaṁ dhāma pannaga vrajāvo jāhnavītīraṁ śarīratyāgahetave

हे सर्प! हम दोनों वास्तव में परम धाम को जाना चाहते हैं; हम जाह्नवी के तट पर, शरीर त्यागने के उद्देश्य से, जा रहे हैं।

श्लोक 112 (padma.7.9.112)

त्यजाविवेकतां सर्प नरकक्लेशदायिनीम् । आवां संखाद्य भवतो भविष्यति सुखं कियत्

tyajāvivekatāṁ sarpa narakakleśadāyinīm āvāṁ saṁkhādya bhavato bhaviṣyati sukhaṁ kiyat

हे सर्प! नरक की यातना देने वाले उस अविवेक को त्याग दो; हमें खाकर तुम्हें कितना सुख मिलेगा?

श्लोक 113 (padma.7.9.113)

आवयोर्हृदये विष्णुस्तवापि हृदये हरिः । अतएव त्वया सार्द्धं शत्रुता का भुजंगम

āvayorhṛdaye viṣṇustavāpi hṛdaye hariḥ ataeva tvayā sārddhaṁ śatrutā kā bhujaṁgama

हमारे हृदय में विष्णु हैं, और तुम्हारे हृदय में भी हरि ही हैं; इसलिए, हे भुजंग! तुमसे कैसी शत्रुता?

श्लोक 114 (padma.7.9.114)

प्राणिहिंसा न कर्तव्या कदापि च विचक्षणैः । क्रियतेऽपि च तद्धिंसां विदधाति स्वयं विधिः

prāṇihiṁsā na kartavyā kadāpi ca vicakṣaṇaiḥ kriyate'pi ca taddhiṁsāṁ vidadhāti svayaṁ vidhiḥ

बुद्धिमानों को प्राणी-हिंसा कभी नहीं करनी चाहिए। यदि की भी जाती है, तो विधाता स्वयं ही उसका फल हिंसा के रूप में देता है।

श्लोक 115 (padma.7.9.115)

आयुः पुत्राश्च दाराश्च संपदश्च यशांसि च । हिंसां दत्वा मनुष्याणां हरेद्दुष्टो विधिः स्वयम्

āyuḥ putrāśca dārāśca saṁpadaśca yaśāṁsi ca hiṁsāṁ datvā manuṣyāṇāṁ haredduṣṭo vidhiḥ svayam

आयु, पुत्र, पत्नी, सम्पदाएँ और यश — मनुष्यों को हिंसा का फल देकर, दुष्ट विधाता स्वयं ही इन्हें हर लेता है।

श्लोक 116 (padma.7.9.116)

किं जपैः किं तपोभिर्वा किं दानैः किमु चाध्वरैः । हिंसेति वर्णद्वितयं यस्यास्ति हृदये सदा

kiṁ japaiḥ kiṁ tapobhirvā kiṁ dānaiḥ kimu cādhvaraiḥ hiṁseti varṇadvitayaṁ yasyāsti hṛdaye sadā

जप से क्या, तप से क्या, दान से क्या, यज्ञों से भी क्या, यदि "हिंसा" इन दो अक्षरों से बना यह शब्द सदा हृदय में बना रहे?

श्लोक 117 (padma.7.9.117)

यः प्राणिहिंसको मर्त्यः स एव हरिहिंसकः । सर्वप्राणिशरीरस्थो भगवान्कमलापतिः

yaḥ prāṇihiṁsako martyaḥ sa eva harihiṁsakaḥ sarvaprāṇiśarīrastho bhagavānkamalāpatiḥ

जो मरणशील प्राणी को मारता है, वही हरि को भी मारता है; क्योंकि भगवान् लक्ष्मीपति समस्त प्राणियों के शरीर में स्थित हैं।

श्लोक 118 (padma.7.9.118)

आत्मानं बहुधा सृष्ट्वा भगवान्भूतभावनः । संसारकौतुकागारे क्रीडेच्छिशुरिव स्वयम्

ātmānaṁ bahudhā sṛṣṭvā bhagavānbhūtabhāvanaḥ saṁsārakautukāgāre krīḍecchiśuriva svayam

सभी प्राणियों को रचने वाले भगवान्, स्वयं ही अपने आपको अनेक रूपों में विस्तार करके, इस संसार-रूपी कौतुक-गृह में स्वयं एक शिशु की तरह क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 119 (padma.7.9.119)

शरीरिणः शरीरं हि निलयः परमात्मनः । परमात्मा स्वयं विष्णुरतो हिंसां विवर्जयेत्

śarīriṇaḥ śarīraṁ hi nilayaḥ paramātmanaḥ paramātmā svayaṁ viṣṇurato hiṁsāṁ vivarjayet

प्राणी का शरीर ही परमात्मा का निवास-स्थान है; परमात्मा स्वयं विष्णु ही हैं, इसीलिए हिंसा का सर्वथा त्याग करना चाहिए।

श्लोक 120 (padma.7.9.120)

परप्राणविनाशेन चात्मतुष्टिर्विधीयते

paraprāṇavināśena cātmatuṣṭirvidhīyate

दूसरे के प्राणों के विनाश से अपनी सन्तुष्टि की जाती है —

श्लोक 121 (padma.7.9.121)

क्षणं स्यादात्मनस्तुष्टिरन्यस्य प्राणसंक्षयः । चरित्रमेतल्लोकानामत्यद्भुतमिव क्षितौ

kṣaṇaṁ syādātmanastuṣṭiranyasya prāṇasaṁkṣayaḥ caritrametallokānāmatyadbhutamiva kṣitau

अपने लिए क्षणभर की सन्तुष्टि, और दूसरे के प्राणों का ही क्षय। लोगों का यह आचरण इस पृथ्वी पर अत्यन्त अद्भुत है,

श्लोक 122 (padma.7.9.122)

आत्मतृप्तिं प्रकुर्वंति परं हत्वातियत्नतः । धीमान्नात्मपरिज्ञानं कदाचित्कुरुते नहि

ātmatṛptiṁ prakurvaṁti paraṁ hatvātiyatnataḥ dhīmānnātmaparijñānaṁ kadācitkurute nahi

कि वे बड़े प्रयत्न से दूसरों को मारकर अपनी तृप्ति करते हैं; बुद्धिमान् व्यक्ति ऐसा अपने बारे में विचार कभी नहीं करता।

श्लोक 123 (padma.7.9.123)

अहं विष्णुरसौविष्णुरिति चेतसि भावयेत् । परदुःखेन यो दुःखी सुखी यश्च परश्रिया

ahaṁ viṣṇurasauviṣṇuriti cetasi bhāvayet paraduḥkhena yo duḥkhī sukhī yaśca paraśriyā

"मैं विष्णु हूँ, यह भी विष्णु है" — ऐसा हृदय में भावना करनी चाहिए। जो दूसरे के दुःख से दुःखी होता है, और दूसरे की सम्पदा से सुखी होता है,

श्लोक 124 (padma.7.9.124)

संसारेऽस्मिन्स विज्ञेयः साक्षादेव हरिः स्वयम् । धिगस्तु तत्सुखं नॄणां मोहवंचितचेतसाम्

saṁsāre'sminsa vijñeyaḥ sākṣādeva hariḥ svayam dhigastu tatsukhaṁ nṝṇāṁ mohavaṁcitacetasām

इस संसार में उसे साक्षात् हरि ही जानना चाहिए। मोह से ठगे हुए चित्त वाले मनुष्यों के उस सुख को धिक्कार है,

श्लोक 125 (padma.7.9.125)

परहिंसाविधानेन सुखं यत्स्याद्भुजंगम । सुखानि वापि दुःखानि दीयंते यानि जंतवे

parahiṁsāvidhānena sukhaṁ yatsyādbhujaṁgama sukhāni vāpi duḥkhāni dīyaṁte yāni jaṁtave

हे भुजंग! जो दूसरे की हिंसा करके प्राप्त होता है। सुख हों या दुःख, जो भी प्राणी को दिये जाते हैं,

श्लोक 126 (padma.7.9.126)

अचिरेणैव तानि स्म लभंते भुवि मानवाः । तस्माद्धिंसां परित्यज्य भुजंगम सुखी भव

acireṇaiva tāni sma labhaṁte bhuvi mānavāḥ tasmāddhiṁsāṁ parityajya bhujaṁgama sukhī bhava

उन्हें ही मनुष्य इस पृथ्वी पर बहुत जल्दी स्वयं भी प्राप्त करते हैं। इसलिए, हे भुजंग! हिंसा त्यागकर सुखी बनो।

श्लोक 127 (padma.7.9.127)

त्वयि प्रसन्ने गच्छावः पारं दुःखमहोदधेः । सर्प उवाच- यदा स्यात्परहिंसायां नूनं मे नातिपातकम्

tvayi prasanne gacchāvaḥ pāraṁ duḥkhamahodadheḥ sarpa uvāca- yadā syātparahiṁsāyāṁ nūnaṁ me nātipātakam

तुम्हारे प्रसन्न होने पर ही हम इस दुःख-सागर के पार जा सकेंगे। सर्प ने कहा — यदि पर-हिंसा में मेरा कोई विशेष पाप ही न हो,

श्लोक 128 (padma.7.9.128)

तदा कथमहो सृष्टै वेधसा भक्ष्यभक्षकौ । परहिंसा न कर्तव्या सत्यमेतत्त्वयोदितम्

tadā kathamaho sṛṣṭai vedhasā bhakṣyabhakṣakau parahiṁsā na kartavyā satyametattvayoditam

तो फिर विधाता ने भक्ष्य और भक्षक — इन दोनों को क्यों रचा? पर-हिंसा नहीं करनी चाहिए — यह तुमने ठीक ही कहा है।

श्लोक 129 (padma.7.9.129)

किंतु सर्वेषु भक्ष्येषु हिंसा संभाव्यते नहि । नारायणो विश्वरूपः सत्यमेतन्न संशयः

kiṁtu sarveṣu bhakṣyeṣu hiṁsā saṁbhāvyate nahi nārāyaṇo viśvarūpaḥ satyametanna saṁśayaḥ

परन्तु समस्त भक्ष्य-पदार्थों में हिंसा सम्भव ही नहीं मानी जाती। नारायण विश्व-रूप हैं — यह सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 130 (padma.7.9.130)

भक्ष्यभक्षकसंयुक्तं स्वयमेव ससर्ज ह । सृजति स्वयमात्मानमात्मानं रक्षति स्वयम्

bhakṣyabhakṣakasaṁyuktaṁ svayameva sasarja ha sṛjati svayamātmānamātmānaṁ rakṣati svayam

उन्होंने ही स्वयं इस भक्ष्य-भक्षक-सहित सृष्टि रची है; वे स्वयं अपने आपको रचते हैं, स्वयं अपनी रक्षा करते हैं,

श्लोक 131 (padma.7.9.131)

आत्मानं स्वयमेवात्ति सृष्टिरेवंविधा हरेः । शक्तोऽहं किं युवां हंतुं कालरूपी स्वयं विधिः

ātmānaṁ svayamevātti sṛṣṭirevaṁvidhā hareḥ śakto'haṁ kiṁ yuvāṁ haṁtuṁ kālarūpī svayaṁ vidhiḥ

और स्वयं ही अपने आपको खाता है — हरि की सृष्टि इसी प्रकार की है। क्या मैं तुम दोनों को मारने में समर्थ नहीं हूँ? काल-रूपधारी विधाता स्वयं ही,

श्लोक 132 (padma.7.9.132)

संप्रति प्रेषयामास कार्येस्मिन्मां स्वयं हरिः । युवां ससर्ज यो देवो यश्च रक्षति वां सदा

saṁprati preṣayāmāsa kāryesminmāṁ svayaṁ hariḥ yuvāṁ sasarja yo devo yaśca rakṣati vāṁ sadā

इसी कार्य के लिए इस समय मुझे स्वयं हरि ने भेजा है। जिस देव ने तुम दोनों को रचा है, और जो सदा तुम दोनों की रक्षा करता है,

श्लोक 133 (padma.7.9.133)

कालरूपी स एवाद्य हंति हेतुं विधाय माम् । व्यास उवाच-। ततस्तेन भुजंगेन भक्षितौ तौ च दंपती

kālarūpī sa evādya haṁti hetuṁ vidhāya mām vyāsa uvāca- tatastena bhujaṁgena bhakṣitau tau ca daṁpatī

वही आज, काल-रूप धारण करके, मुझे निमित्त बनाकर तुम्हें मार रहा है। व्यास जी ने कहा — तब उस सर्प ने उन दोनों पति-पत्नी को,

श्लोक 134 (padma.7.9.134)

गङ्गा गंगेति जल्पंतौ महत्या क्षुधया पथि । जाह्नवीतीरयात्रायां पादेपादे जनाविमौ

gaṅgā gaṁgeti jalpaṁtau mahatyā kṣudhayā pathi jāhnavītīrayātrāyāṁ pādepāde janāvimau

"गंगा, गंगा" कहते हुए, अत्यन्त भूख के साथ मार्ग में ही खा लिया। जाह्नवी के तट की यात्रा में, पैर-पैर पर,

श्लोक 135 (padma.7.9.135)

अश्वमेधाख्य यज्ञानां प्राप्तवंतौ महाफलम् । तस्मादेनौ महात्मानौ बह्वश्वमेधधारिणौ

aśvamedhākhya yajñānāṁ prāptavaṁtau mahāphalam tasmādenau mahātmānau bahvaśvamedhadhāriṇau

अश्वमेध नामक यज्ञों का महान् फल उन दोनों लोगों को प्राप्त हुआ। इसीलिए वे दोनों महात्मा, अनेक अश्वमेध यज्ञों के धारक बन गये।

श्लोक 136 (padma.7.9.136)

एतयोः सदृशो नास्ति शतक्रतुरहं यतः । निजाधिकारेणैवान्यमवलंब्य पुरंदरः

etayoḥ sadṛśo nāsti śatakraturahaṁ yataḥ nijādhikāreṇaivānyamavalaṁbya puraṁdaraḥ

इनके समान कोई नहीं है, क्योंकि मैं शतक्रतु (सौ यज्ञ करने वाला इन्द्र) भी हूँ — यह सोचकर, इन्द्र, अपने अधिकार को छोड़कर, किसी अन्य का सहारा लेकर,

श्लोक 137 (padma.7.9.137)

अर्घ्यहस्तः पादचारी वृतो देवैः समाययौ । अथ रम्भोर्वशी चैव सुंदर्योऽन्याश्च हर्षिताः

arghyahastaḥ pādacārī vṛto devaiḥ samāyayau atha rambhorvaśī caiva suṁdaryo'nyāśca harṣitāḥ

अर्घ्य हाथ में लेकर, पैदल चलकर, देवताओं से घिरा हुआ, स्वयं आया। तब रम्भा, उर्वशी और अन्य हर्षित सुन्दरियाँ,

श्लोक 138 (padma.7.9.138)

अन्योन्यं कथयामासुर्निजयौवनगर्विताः । अयं पुण्यात्मनां श्रेष्ठो रसज्ञोऽत्यंतसुन्दरः

anyonyaṁ kathayāmāsurnijayauvanagarvitāḥ ayaṁ puṇyātmanāṁ śreṣṭho rasajño'tyaṁtasundaraḥ

अपने ही यौवन के गर्व से भरी हुई, आपस में यह कहने लगीं — यह पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ, रस का ज्ञाता, अत्यन्त सुन्दर,

श्लोक 139 (padma.7.9.139)

आयातोऽमुं करिष्यामि स्ववशं सेवितैः स्वकैः । काचित्कांचिद्वदत्येतज्जानामि सकलां कलाम्

āyāto'muṁ kariṣyāmi svavaśaṁ sevitaiḥ svakaiḥ kācitkāṁcidvadatyetajjānāmi sakalāṁ kalām

आया है, मैं इसे अपनी सेविकाओं द्वारा अपने वश में करूँगी — ऐसा एक कोई कहती। एक और कहती — मैं समस्त कलाओं को जानती हूँ,

श्लोक 140 (padma.7.9.140)

अतएव भविष्यामि कांताहमस्य भूपतेः । काचित्कांचिदिति ब्रूयात्ते शक्रोपि वशो मम

ataeva bhaviṣyāmi kāṁtāhamasya bhūpateḥ kācitkāṁciditi brūyātte śakropi vaśo mama

इसलिए मैं ही इस राजा की प्रिया बनूँगी — ऐसा एक कोई कहती। इन्द्र भी मेरे अधीन है,

श्लोक 141 (padma.7.9.141)

किमत्र चित्रं वशगो भूपालोऽयं भविष्यति

kimatra citraṁ vaśago bhūpālo'yaṁ bhaviṣyati

इसमें क्या आश्चर्य कि यह राजा भी मेरे वश में हो जाएगा — ऐसा एक कोई कहती।

श्लोक 142 (padma.7.9.142)

भर्त्ता ममायं च पतिर्ममायं स्वामी ममायं मम नाथ एषः । इतीव सर्वाः परमप्रमोदैर्वदंति नार्योखिलसद्गुणज्ञाः

bharttā mamāyaṁ ca patirmamāyaṁ svāmī mamāyaṁ mama nātha eṣaḥ itīva sarvāḥ paramapramodairvadaṁti nāryokhilasadguṇajñāḥ

"यह मेरा भर्ता है, यह मेरा पति है, यह मेरा स्वामी है, यह मेरा नाथ है" — इस प्रकार, हे विप्र, समस्त सद्गुणों को जानने वाली वे सभी स्त्रियाँ, अत्यन्त उल्लास से यह कहने लगीं।

श्लोक 143 (padma.7.9.143)

उच्चावचं विप्र निशम्य तासां जगाद काचिद्गुणिनी रसज्ञा । सौदास्यकांतां नृपतिः स्वयं यां भजत्ययं किं कलहेन नार्यः

uccāvacaṁ vipra niśamya tāsāṁ jagāda kācidguṇinī rasajñā saudāsyakāṁtāṁ nṛpatiḥ svayaṁ yāṁ bhajatyayaṁ kiṁ kalahena nāryaḥ

उनकी यह ऊँची-नीची बातें सुनकर, हे विप्र, कोई एक गुणवती और रसिका स्त्री बोली — यह राजा तो स्वयं अपनी विजया-प्रिया को ही भजता है; हे स्त्रियो! तुम इस कलह से क्या पाओगी?

श्लोक 144 (padma.7.9.144)

सुन्दर्य्यस्तास्ततः सर्वाः संत्यज्य कलहं द्विज । आजग्मुर्हृदयोत्साहैः सर्वाभरणभूषिताः

sundaryyastāstataḥ sarvāḥ saṁtyajya kalahaṁ dvija ājagmurhṛdayotsāhaiḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ

तब वे सभी सुन्दरियाँ, हे द्विज, कलह को त्यागकर, हृदय के उत्साह से भरकर, सम्पूर्ण आभूषणों से सजी हुई आगे आईं।

श्लोक 145 (padma.7.9.145)

अथ तं नृपतिश्रेष्ठ सदारं गतकल्मषम् । पाद्याद्यैः पूजयामासुः प्राहेति च पुरंदरः

atha taṁ nṛpatiśreṣṭha sadāraṁ gatakalmaṣam pādyādyaiḥ pūjayāmāsuḥ prāheti ca puraṁdaraḥ

फिर उस श्रेष्ठ राजा को, अपनी पत्नी सहित, पाप-रहित हुए उसे, पाद्य आदि से पूजा की, और इन्द्र ने यह कहा।

श्लोक 146 (padma.7.9.146)

रथे निवेशयामास पुष्पके स्त्रीसमन्वितम् । भेरीमृदंगमधुरी डिंडिमानकनिःस्वनैः

rathe niveśayāmāsa puṣpake strīsamanvitam bherīmṛdaṁgamadhurī ḍiṁḍimānakaniḥsvanaiḥ

उसे अपनी पत्नी सहित पुष्पक-रथ पर बिठाया। भेरी, मृदंग, मधुर वाद्यों, डिण्डिम और आनक की ध्वनियों से,

श्लोक 147 (padma.7.9.147)

करकं कणनादैश्च करतालस्वनैस्तथा । जयशब्दैश्च देवानां नाकः शब्दमयोऽभवत्

karakaṁ kaṇanādaiśca karatālasvanaistathā jayaśabdaiśca devānāṁ nākaḥ śabdamayo'bhavat

जल-घड़ों के गुंजन से, ताली की ध्वनि से, और देवताओं की जय-जयकार से, स्वर्ग-लोक ध्वनियों से परिपूर्ण हो गया।

श्लोक 148 (padma.7.9.148)

देवाङ्गना चारुहस्त श्वेतचामरमारुतैः । वीजितः सरथारूढः सदारस्त्रिदिवं ययौ

devāṅganā cāruhasta śvetacāmaramārutaiḥ vījitaḥ sarathārūḍhaḥ sadārastridivaṁ yayau

देवांगनाओं के सुन्दर हाथों से हिलाये गये श्वेत चँवरों की वायु से पंखा झला जाता हुआ, वह, अपनी पत्नी सहित रथ पर सवार, स्वर्ग को गया।

श्लोक 149 (padma.7.9.149)

ततः शक्रः स्वयं तस्मै सत्यधर्माय भूभुजे । दत्तवान्निजासनार्द्धं शुभो वै क्षयशंकया

tataḥ śakraḥ svayaṁ tasmai satyadharmāya bhūbhuje dattavānnijāsanārddhaṁ śubho vai kṣayaśaṁkayā

फिर इन्द्र ने स्वयं ही, हे राजन्, उस सत्यधर्म राजा के लिए, क्षय के भय से, अपने आधे आसन को सहर्ष दे दिया।

श्लोक 150 (padma.7.9.150)

शक्रेण सह भूपोऽसौ वसन्नेकासने सदा । शक्रत्वमकरोत्स्वर्गे केशवस्यानुकंपया

śakreṇa saha bhūpo'sau vasannekāsane sadā śakratvamakarotsvarge keśavasyānukaṁpayā

इन्द्र के साथ, एक ही आसन पर सदा बैठा हुआ वह राजा, केशव की कृपा से स्वर्ग में इन्द्रत्व ही करने लगा।

श्लोक 151 (padma.7.9.151)

युगकोटिसहस्राणि दिवि भुक्त्वाखिलं सुखम् । रथमारुह्यवैकुंठं ययौ भगवदाज्ञया

yugakoṭisahasrāṇi divi bhuktvākhilaṁ sukham rathamāruhyavaikuṁṭhaṁ yayau bhagavadājñayā

हजारों करोड़ युगों तक स्वर्ग में सम्पूर्ण सुख भोगकर, वह रथ पर सवार होकर, भगवान् की आज्ञा से वैकुण्ठ गया।

श्लोक 152 (padma.7.9.152)

तत्र मन्वंतरं भुक्त्वा सर्वभोगमनोरमम् । परमं ज्ञानमासाद्या सदारो मोक्षमाप्तवान्

tatra manvaṁtaraṁ bhuktvā sarvabhogamanoramam paramaṁ jñānamāsādyā sadāro mokṣamāptavān

वहाँ एक मन्वन्तर तक समस्त मनोहर भोगों को भोगकर, परम ज्ञान प्राप्त करके, अपनी पत्नी सहित उसने मोक्ष प्राप्त किया।

श्लोक 153 (padma.7.9.153)

जाह्नवीतीरयात्रायां शरीरं त्यजतः पथि । फलमेवंविधं विप्र मया सर्वं प्रकीर्तितम्

jāhnavītīrayātrāyāṁ śarīraṁ tyajataḥ pathi phalamevaṁvidhaṁ vipra mayā sarvaṁ prakīrtitam

जाह्नवी के तट की यात्रा में, मार्ग में शरीर त्यागने वाले का, हे विप्र, ऐसा ही फल है — यह सब मैंने कह दिया।

श्लोक 154 (padma.7.9.154)

जाह्नवीतीरगमने मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः । न कालनियमः प्रोक्तो नारदाद्यैर्महर्षिभिः

jāhnavītīragamane munibhistatvadarśibhiḥ na kālaniyamaḥ prokto nāradādyairmaharṣibhiḥ

जाह्नवी के तट पर जाने के लिए, तत्त्व-दर्शी मुनियों और नारद आदि महर्षियों द्वारा कोई काल-नियम नहीं बताया गया है।

श्लोक 155 (padma.7.9.155)

यदायदा द्विजश्रेष्ठ गङ्गायां स्नानमाचरेत् । तदातदाऽक्षयं पुण्यं लभते मानवो ध्रुवम्

yadāyadā dvijaśreṣṭha gaṅgāyāṁ snānamācaret tadātadā'kṣayaṁ puṇyaṁ labhate mānavo dhruvam

हे द्विजश्रेष्ठ! जब-जब मनुष्य गंगा में स्नान करता है, तब-तब वह निश्चय ही अक्षय पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 156 (padma.7.9.156)

गंगा सर्वाणि पापानि नाशयंतीति निश्चयः । कुर्यात्पुनःपुनः पापं न च गंगा पुनाति तम्

gaṁgā sarvāṇi pāpāni nāśayaṁtīti niścayaḥ kuryātpunaḥpunaḥ pāpaṁ na ca gaṁgā punāti tam

गंगा समस्त पापों का नाश करती है — यह निश्चित है; परन्तु मनुष्य को बार-बार पाप नहीं करना चाहिए, क्योंकि गंगा उसे बार-बार पवित्र नहीं करती।

श्लोक 157 (padma.7.9.157)

पापबुद्धिं परित्यज्य गंगायां लोकमातरि । स्नानं कुरुत हे लोका यदि सद्गतिमिच्छथ

pāpabuddhiṁ parityajya gaṁgāyāṁ lokamātari snānaṁ kuruta he lokā yadi sadgatimicchatha

हे लोगो! पाप-बुद्धि को त्यागकर, सम्पूर्ण लोकों की माता गंगा में स्नान करो, यदि तुम सद्गति चाहते हो।

श्लोक 158 (padma.7.9.158)

यत्पुण्यं गंगास्नानात्तु मानवानां भवेद्दिवज । तत्पुण्यं प्राप्यते विप्र कर्मभिः कैः सुदुस्तरैः

yatpuṇyaṁ gaṁgāsnānāttu mānavānāṁ bhaveddivaja tatpuṇyaṁ prāpyate vipra karmabhiḥ kaiḥ sudustaraiḥ

हे द्विज! गंगा-स्नान से मनुष्यों को जो पुण्य मिलता है, हे विप्र, वह पुण्य किन-किन अत्यन्त दुष्कर कर्मों से प्राप्त होता है?

श्लोक 159 (padma.7.9.159)

आसाराणां भूमिरेणोः संख्यां कर्तुं तु शक्यते । भागीरथीगुणास्ते न शक्या वक्तुं न च द्विज

āsārāṇāṁ bhūmireṇoḥ saṁkhyāṁ kartuṁ tu śakyate bhāgīrathīguṇāste na śakyā vaktuṁ na ca dvija

वर्षा की बूँदों और पृथ्वी की धूल की गिनती की जा सकती है, परन्तु भागीरथी के गुणों को कहना सम्भव नहीं है, हे द्विज।

श्लोक 160 (padma.7.9.160)

विचार्य सर्वशास्त्राणि त्वदीयानि मयोच्यते । गंगांभसि सकृत्स्नात्वा मोक्षमाप्नोति मानवः

vicārya sarvaśāstrāṇi tvadīyāni mayocyate gaṁgāṁbhasi sakṛtsnātvā mokṣamāpnoti mānavaḥ

समस्त शास्त्रों को विचारकर मैं तुम्हें यह कहता हूँ — गंगाजल में एक बार स्नान करके ही मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 161 (padma.7.9.161)

स्नानं कूपजलेऽपि यस्तु कुरुते गंगां विचिंत्य प्रभुं देवानां सकलार्त्तशोकदुरितत्रासौघविध्वंसिनीम् । मुक्तः सोऽपि समस्तपातकचयैर्गोविप्रहत्यादिभिर्गच्छेद्विष्णुपुरं समस्तसुखदं गंगाप्रसादाद्दिवज

snānaṁ kūpajale'pi yastu kurute gaṁgāṁ viciṁtya prabhuṁ devānāṁ sakalārttaśokaduritatrāsaughavidhvaṁsinīm muktaḥ so'pi samastapātakacayairgoviprahatyādibhirgacchedviṣṇupuraṁ samastasukhadaṁ gaṁgāprasādāddivaja

जो देवताओं के स्वामी, समस्त पीड़ा, शोक, पाप और भय के समूह का नाश करने वाली गंगा का स्मरण करते हुए, कुएँ के जल में भी स्नान करता है, वह भी गोवध, ब्रह्महत्या आदि समस्त पापों के समूह से मुक्त होकर, गंगा की कृपा से, हे द्विज, समस्त सुख देने वाले विष्णु के धाम को जाता है।

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