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रुद्र संहिता · अध्याय 104

विवाहमण्डप-दर्शन से देवताओं के मोह का वर्णन

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

श्लोक 1 (shiva.rudra.104.1)

ब्रह्मोवाच । ततः सम्मन्त्र्य च मिथः प्राप्याज्ञां शाङ्करीं हरिः । मुने त्वां प्रेषयामास प्रथमं कुधरालयम्

brahmovāca tataḥ sammantrya ca mithaḥ prāpyājñāṁ śāṅkarīṁ hariḥ mune tvāṁ preṣayāmāsa prathamaṁ kudharālayam

ब्रह्मा जी ने कहा -- "तत्पश्चात् परस्पर विचार-विमर्श कर और शांकरी (देवी पार्वती) की आज्ञा पाकर हरि ने, हे मुने! तुम्हें सबसे पहले पर्वतराज के भवन भेजा।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.104.2)

अथ प्रणम्य सर्वेशं गतस्त्वं नारदाग्रतः । हरिणा नोदितः प्रीत्या हिमाचलगृहं प्रति

atha praṇamya sarveśaṁ gatastvaṁ nāradāgrataḥ hariṇā noditaḥ prītyā himācalagṛhaṁ prati

"तत्पश्चात् सर्वेश्वर को प्रणाम कर, हे नारद! हरि के द्वारा प्रेमपूर्वक भेजे जाकर तुम हिमाचल के भवन की ओर आगे बढ़ गए।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.104.3)

त्वं मुनेऽपश्य आत्मानं गत्वा तद्व्रीडयान्वितम् । कृत्रिमं रचितं तत्र विस्मितो विश्वकर्मणा

tvaṁ mune'paśya ātmānaṁ gatvā tadvrīḍayānvitam kṛtrimaṁ racitaṁ tatra vismito viśvakarmaṇā

"हे मुने! वहाँ जाकर तुमने स्वयं को एक प्रकार के विस्मय-सहित लज्जा से युक्त पाया; विश्वकर्मा द्वारा वहाँ रचित उस कृत्रिम रचना को देखकर तुम चकित हो गए।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.104.4)

श्रान्तस्त्वमात्मना तेन कृत्रिमेण महामुने । अवलोकपरः सोऽभूच्चरितं विश्वकर्मणः

śrāntastvamātmanā tena kṛtrimeṇa mahāmune avalokaparaḥ so'bhūccaritaṁ viśvakarmaṇaḥ

"हे महामुने! उस कृत्रिम रचना से स्वयं ही श्रान्त होकर तुम विश्वकर्मा की उस कारीगरी को देखने में तल्लीन हो गए।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.104.5)

प्रविष्टो मण्डपं तस्य हिमाद्रे रत्नचित्रितम् । सुवर्णकलशैर्जुष्टं रम्भादिबहुशोभितम्

praviṣṭo maṇḍapaṁ tasya himādre ratnacitritam suvarṇakalaśairjuṣṭaṁ rambhādibahuśobhitam

"तुम हिमाद्रि (हिमालय) के उस रत्नजटित, स्वर्णकलशों से सुशोभित तथा केले आदि से अत्यंत शोभायमान मण्डप में प्रविष्ट हुए।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.104.6)

सहस्रस्तम्भसंयुक्तं विचित्रं परमाद्भुतम् । वेदिकां च तथा दृष्ट्वा विस्मयं त्वं मुने ह्ययाः

sahasrastambhasaṁyuktaṁ vicitraṁ paramādbhutam vedikāṁ ca tathā dṛṣṭvā vismayaṁ tvaṁ mune hyayāḥ

"सहस्र स्तम्भों से युक्त, विचित्र तथा परम अद्भुत उस मण्डप और वेदी को देखकर, हे मुने! तुम विस्मय को प्राप्त हुए।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.104.7)

तदावोचश्च स मुने नारद त्वं नगेश्वरम् । विस्मितोऽतीव मनसि नष्टज्ञानो विमूढधीः

tadāvocaśca sa mune nārada tvaṁ nageśvaram vismito'tīva manasi naṣṭajñāno vimūḍhadhīḥ

"तब, हे मुने! अत्यंत विस्मित मन वाले, ज्ञान-रहित और मोहित बुद्धि वाले तुमने नगेश्वर (पर्वतराज हिमालय) से यह कहा।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.104.8)

आगतास्ते किमधुना देवा विष्णुपुरोगमाः । तथा महर्षयः सर्वे सिद्धा उपसुरास्तथा

āgatāste kimadhunā devā viṣṇupurogamāḥ tathā maharṣayaḥ sarve siddhā upasurāstathā

"'क्या अभी विष्णु आदि देवगण, तथा समस्त महर्षि, सिद्ध और उपसुर यहाँ आ चुके हैं?'"

श्लोक 9 (shiva.rudra.104.9)

महादेवो वृषारूढो गणैश्च परिवारितः । आगतः किं विवाहार्थं वद तथ्यं नगेश्वर

mahādevo vṛṣārūḍho gaṇaiśca parivāritaḥ āgataḥ kiṁ vivāhārthaṁ vada tathyaṁ nageśvara

"'वृषभ पर आरूढ़ और गणों से घिरे महादेव क्या विवाह के लिए आ गए हैं? हे नगेश्वर! सच-सच बताओ।'"

श्लोक 10 (shiva.rudra.104.10)

ब्रह्मोवाच । इत्येवं वचनं श्रुत्वा तव विस्मितचेतसः । उवाच त्वां मुने तथ्यं वाक्यं स हिमवान् गिरिः

brahmovāca ityevaṁ vacanaṁ śrutvā tava vismitacetasaḥ uvāca tvāṁ mune tathyaṁ vākyaṁ sa himavān giriḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "इस प्रकार के वचन सुनकर, हे मुने! विस्मित-चित्त वाले तुमसे उन हिमवान पर्वत ने यह सत्य वचन कहा।"

श्लोक 11 (shiva.rudra.104.11)

हिमवानुवाच । हे नारद महाप्राज्ञागतो नैवाधुना शिवः । विवाहार्थं च पार्वत्याः सगणः सवरातकः

himavānuvāca he nārada mahāprājñāgato naivādhunā śivaḥ vivāhārthaṁ ca pārvatyāḥ sagaṇaḥ savarātakaḥ

हिमवान ने कहा -- "हे नारद! हे महाप्राज्ञ! शिव अभी तक अपने गणों और वर-यात्रा सहित पार्वती के विवाह के लिए नहीं आए हैं।"

श्लोक 12 (shiva.rudra.104.12)

विश्वकर्मकृतं चित्रं विद्धि नारद सद्धिया । विस्मयं त्यज देवर्षे स्वस्थो भव शिवं स्मर

viśvakarmakṛtaṁ citraṁ viddhi nārada saddhiyā vismayaṁ tyaja devarṣe svastho bhava śivaṁ smara

"हे नारद! इस अद्भुत रचना को अच्छी बुद्धि से विश्वकर्मा की ही कृति जानो। हे देवर्षे! विस्मय त्याग दो, स्वस्थ रहो और शिव का स्मरण करो।"

श्लोक 13 (shiva.rudra.104.13)

भुक्त्वा विश्रम्य सुप्रीतः कृपां कृत्वा ममोपरि । मैनाकादिधरैः सार्धं गच्छ त्वं शङ्करान्तिकम्

bhuktvā viśramya suprītaḥ kṛpāṁ kṛtvā mamopari mainākādidharaiḥ sārdhaṁ gaccha tvaṁ śaṅkarāntikam

"भोजन और विश्राम कर, प्रसन्न होकर तथा मुझ पर कृपा कर, तुम मैनाक आदि पर्वतों के साथ शंकर के समीप जाओ।"

श्लोक 14 (shiva.rudra.104.14)

एभिस्समेतो गिरिभिर्महामते सम्प्रार्थ्य शीघ्रं शिवमत्र चानय । देवैः समेतं च महर्षिसङ्घैः सुरासुरैरर्चितपादपल्लवम्

ebhissameto giribhirmahāmate samprārthya śīghraṁ śivamatra cānaya devaiḥ sametaṁ ca maharṣisaṅghaiḥ surāsurairarcitapādapallavam

"हे महामते! इन पर्वतों के साथ मिलकर, शीघ्र ही प्रार्थना कर शिव को यहाँ ले आओ -- जो देवताओं और महर्षियों के समूह से घिरे हैं तथा जिनके चरण-कमल सुर-असुर दोनों द्वारा पूजित हैं।"

श्लोक 15 (shiva.rudra.104.15)

ब्रह्मोवाच । तथेति चोक्त्वागम आशु हि त्वं तदैव तैः शैलसुतादिभिश्च । तत्रत्यकृत्यं सुविधाय भुक्त्वा महामनास्त्वं शिवसन्निधानम्

brahmovāca tatheti coktvāgama āśu hi tvaṁ tadaiva taiḥ śailasutādibhiśca tatratyakṛtyaṁ suvidhāya bhuktvā mahāmanāstvaṁ śivasannidhānam

ब्रह्मा जी ने कहा -- "'ऐसा ही हो' कहकर तुम शीघ्र ही उन पर्वत-पुत्रों के साथ वहाँ पहुँचे और वहाँ के कर्तव्य को भली-भाँति पूर्ण कर, भोजन कर, हे महामते! तुम शिव के समीप गए।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.104.16)

तत्र दृष्टो महादेवो देवादिपरिवारितः । नमस्कृतस्त्वया दीप्तः शैलैस्तैर्भक्तितश्च वै

tatra dṛṣṭo mahādevo devādiparivāritaḥ namaskṛtastvayā dīptaḥ śailaistairbhaktitaśca vai

"वहाँ देवों आदि से घिरे, तेजस्वी महादेव को देखकर तुमने और उन पर्वतों ने भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया।"

श्लोक 17 (shiva.rudra.104.17)

तदा मया विष्णुना च सर्वे देवाः सवासवाः । पप्रच्छुस्त्वां मुने सर्वे रुद्रस्यानुचरास्तथा

tadā mayā viṣṇunā ca sarve devāḥ savāsavāḥ papracchustvāṁ mune sarve rudrasyānucarāstathā

"तब मैंने और विष्णु ने, तथा इन्द्र सहित समस्त देवताओं ने और रुद्र के सभी अनुचरों ने भी, हे मुने! तुमसे प्रश्न किया।"

श्लोक 18 (shiva.rudra.104.18)

विस्मिताः पर्वतान्दृष्ट्वा सन्देहाकुलमानसाः । मैनाकसह्यमेर्वाद्यान्नानालङ्कारसंयुतान्

vismitāḥ parvatāndṛṣṭvā sandehākulamānasāḥ mainākasahyamervādyānnānālaṅkārasaṁyutān

"मैनाक, सह्य, मेरु आदि नाना अलंकारों से युक्त उन पर्वतों को देखकर विस्मित और संदेहाकुल मन वाले हम -- "

श्लोक 19 (shiva.rudra.104.19)

देवा ऊचुः । हे नारद महाप्राज्ञ विस्मितस्त्वं हि दृश्यसे । सत्कृतोऽसि हिमागेन किं न वा वद विस्तरात्

devā ūcuḥ he nārada mahāprājña vismitastvaṁ hi dṛśyase satkṛto'si himāgena kiṁ na vā vada vistarāt

देवताओं ने कहा -- "हे नारद! हे महाप्राज्ञ! तुम विस्मित दिख रहे हो। क्या हिमालय ने तुम्हारा सत्कार किया या नहीं, विस्तार से बताओ।"

श्लोक 20 (shiva.rudra.104.20)

एते कस्मात्समायाताः पर्वता इह सत्तमाः । मैनाकसह्यमेर्वाद्याः सुप्रतापाः स्वलङ्कृताः

ete kasmātsamāyātāḥ parvatā iha sattamāḥ mainākasahyamervādyāḥ supratāpāḥ svalaṅkṛtāḥ

"मैनाक, सह्य, मेरु आदि अत्यंत प्रतापी और सुसज्जित ये श्रेष्ठ पर्वत यहाँ किसलिए आए हैं?"

श्लोक 21 (shiva.rudra.104.21)

कन्यां दास्यति शैलोऽसौ शम्भवे वा न नारद । हिमालयगृहे तात किं भवत्यद्य तद्वद

kanyāṁ dāsyati śailo'sau śambhave vā na nārada himālayagṛhe tāta kiṁ bhavatyadya tadvada

"हे नारद! क्या वह पर्वत अपनी कन्या शम्भु को देगा या नहीं? हे तात! हिमालय के घर में आज क्या हो रहा है, बताओ।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.104.22)

इति सन्दिग्धमनसामस्माकं च दिवौकसाम् । वद त्वं पृच्छमानानां सन्देहं हर सुव्रत

iti sandigdhamanasāmasmākaṁ ca divaukasām vada tvaṁ pṛcchamānānāṁ sandehaṁ hara suvrata

"इस प्रकार संदिग्ध-मन वाले हम देवताओं के, हे सुव्रत! पूछने पर तुम बताओ और हमारा संदेह दूर करो।"

श्लोक 23 (shiva.rudra.104.23)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तेषां विष्ण्वादीनान्दिवौकसाम् । अवोचस्तान्मुने त्वं हि विस्मितस्त्वाष्ट्रमायया

brahmovāca ityākarṇya vacasteṣāṁ viṣṇvādīnāndivaukasām avocastānmune tvaṁ hi vismitastvāṣṭramāyayā

ब्रह्मा जी ने कहा -- "विष्णु आदि उन देवताओं के इन वचनों को सुनकर, हे मुने! तुम्ष्ट्र की माया से विस्मित होकर भी उनसे बोले।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.104.24)

एकान्तमाश्रित्य च मां हि विष्णु- मभाषथा वाक्यमिदं मुने त्वम् । शचीपतिं सर्वसुरेश्वरं वै पक्षच्छिदं पूर्वरिपुं धराणाम्

ekāntamāśritya ca māṁ hi viṣṇu- mabhāṣathā vākyamidaṁ mune tvam śacīpatiṁ sarvasureśvaraṁ vai pakṣacchidaṁ pūrvaripuṁ dharāṇām

"तब हे मुने! विष्णु के साथ शची के स्वामी को -- जो समस्त देवताओं के ईश्वर, पर्वतों के पंख काटने वाले तथा पर्वत-शिखरों के पुरातन शत्रु हैं -- एकान्त में ले जाकर तुमने उनसे यह वचन कहा।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.104.25)

नारद उवाच । त्वष्ट्रा कृतं तद्विकृतं विचित्रं विमोहनं सर्वदिवौकसां हि । येनैव सर्वान्स विमोहितुं सुरान् समिच्छति प्रेमत एव युक्त्या

nārada uvāca tvaṣṭrā kṛtaṁ tadvikṛtaṁ vicitraṁ vimohanaṁ sarvadivaukasāṁ hi yenaiva sarvānsa vimohituṁ surān samicchati premata eva yuktyā

नारद ने कहा -- "यह समस्त देवताओं को मोहित करने वाली विचित्र और विकृत रचना त्वष्टा ने ही बनाई है, जिससे वह प्रेमपूर्वक ही युक्ति से सब देवताओं को मोहित करना चाहता है।"

श्लोक 26 (shiva.rudra.104.26)

पुरा कृतं तस्य विमोहनं त्वया सुविस्मृतं तत् सकलं शचीपते । तस्मादसौ त्वां विजिगीषुरेव गृहे ध्रुवं तस्य गिरेर्महात्मनः

purā kṛtaṁ tasya vimohanaṁ tvayā suvismṛtaṁ tat sakalaṁ śacīpate tasmādasau tvāṁ vijigīṣureva gṛhe dhruvaṁ tasya girermahātmanaḥ

"हे शचीपति! पूर्वकाल में तुमने ही उसे मोहित किया था -- वह सब तुम भूल गए हो। इसीलिए वह निश्चय ही उस महात्मा पर्वत के घर में तुम्हें जीतने की इच्छा से आया है।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.104.27)

अहं विमोहितस्तेन प्रतिरूपेण भास्वता । तथा विष्णुः कृतस्तेन ब्रह्मा शक्रोऽपि तादृशः

ahaṁ vimohitastena pratirūpeṇa bhāsvatā tathā viṣṇuḥ kṛtastena brahmā śakro'pi tādṛśaḥ

"मैं स्वयं उसके द्वारा एक तेजस्वी प्रतिरूप से मोहित हुआ था; इसी प्रकार विष्णु को और ब्रह्मा को, तथा शक्र को भी उसने वैसा ही किया।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.104.28)

किं बहूक्तेन देवेश सर्वदेवगणाः कृताः । कृत्रिमाश्चित्ररूपेण न किञ्चिदवशेषितम्

kiṁ bahūktena deveśa sarvadevagaṇāḥ kṛtāḥ kṛtrimāścitrarūpeṇa na kiñcidavaśeṣitam

"हे देवेश! अधिक कहने से क्या लाभ? समस्त देवगणों को कृत्रिम रूप से विचित्र रूपों में बना दिया गया है, कुछ भी शेष नहीं छोड़ा गया।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.104.29)

विमोहनार्थं सर्वेषां देवानां च विशेषतः । कृता माया चित्रमयी परिहासविकारिणी

vimohanārthaṁ sarveṣāṁ devānāṁ ca viśeṣataḥ kṛtā māyā citramayī parihāsavikāriṇī

"विशेष रूप से समस्त देवताओं को मोहित करने के लिए यह विचित्र, परिहासपूर्ण और परिवर्तनशील माया रची गई है।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.104.30)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य देवेन्द्रो वाक्यमब्रवीत् । विष्णुम्प्रति तदा शीघ्रं भयाकुलतनुर्हरिम्

brahmovāca tacchrutvā vacanaṁ tasya devendro vākyamabravīt viṣṇumprati tadā śīghraṁ bhayākulatanurharim

ब्रह्मा जी ने कहा -- "उसके इन वचनों को सुनकर देवेन्द्र भय से व्याकुल शरीर होकर तुरंत विष्णु से यह वचन बोले।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.104.31)

देवेन्द्र उवाच । देवदेव रमानाथ त्वष्टा मां निहनिष्यति । पुत्रशोकेन तप्तोऽसौ व्याजेनानेन नान्यथा

devendra uvāca devadeva ramānātha tvaṣṭā māṁ nihaniṣyati putraśokena tapto'sau vyājenānena nānyathā

देवेन्द्र ने कहा -- "हे देवदेव! हे रमानाथ! त्वष्टा मुझे मार डालेगा -- पुत्र-शोक से संतप्त वह इसी छल के द्वारा और किसी प्रकार नहीं, अवश्य ही ऐसा करेगा।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.104.32)

ब्रह्मोवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः । उवाच प्रहसन् वाक्यं शक्रमाश्वासयंस्तदा

brahmovāca tasya tadvacanaṁ śrutvā devadevo janārdanaḥ uvāca prahasan vākyaṁ śakramāśvāsayaṁstadā

ब्रह्मा जी ने कहा -- "उनके इस वचन को सुनकर देवदेव जनार्दन ने हँसते हुए शक्र को आश्वासन देते हुए यह वचन कहा।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.104.33)

विष्णुरुवाच । निवातकवचैः पूर्वं मोहितोऽसि शचीपते । महाविद्याबलेनैव दानवैः पूर्ववैरिभिः

viṣṇuruvāca nivātakavacaiḥ pūrvaṁ mohito'si śacīpate mahāvidyābalenaiva dānavaiḥ pūrvavairibhiḥ

विष्णु ने कहा -- "हे शचीपति! पहले भी तुम निवातकवच दानवों की महाविद्या के बल से ही मोहित हुए थे, अपने पुराने शत्रुओं द्वारा।"

श्लोक 34 (shiva.rudra.104.34)

पर्वतो हिमवानेष तथान्येऽखिलपर्वताः । विपक्षा हि कृताः सर्वे मम वाक्याच्च वासव

parvato himavāneṣa tathānye'khilaparvatāḥ vipakṣā hi kṛtāḥ sarve mama vākyācca vāsava

"हे वासव! यह हिमवान पर्वत तथा अन्य सभी पर्वत, ये सब मेरे ही वचन से तुम्हारे विपक्ष में बनाए गए हैं।"

श्लोक 35 (shiva.rudra.104.35)

तेऽनुस्मृत्या तु वै दृष्ट्वा मायया गिरयो ह्यमी । जेतुमिच्छन्ति ये मूढा न भेतव्यमरावपि

te'nusmṛtyā tu vai dṛṣṭvā māyayā girayo hyamī jetumicchanti ye mūḍhā na bhetavyamarāvapi

"उस पुरानी स्मृति के कारण ही, माया से इन पर्वतों को देखकर, वे मूढ़ तुम्हें जीतना चाहते हैं -- किन्तु शत्रु से भी तुम्हें डरना नहीं चाहिए।"

श्लोक 36 (shiva.rudra.104.36)

ईश्वरो नो हि सर्वेषां शङ्करो भक्तवत्सलः । सर्वथा कुशलं शक्र करिष्यति न संशयः

īśvaro no hi sarveṣāṁ śaṅkaro bhaktavatsalaḥ sarvathā kuśalaṁ śakra kariṣyati na saṁśayaḥ

"हम सबके ईश्वर तो शंकर ही हैं, जो भक्तवत्सल हैं। हे शक्र! वे सब प्रकार से कल्याण ही करेंगे, इसमें संशय नहीं है।"

श्लोक 37 (shiva.rudra.104.37)

ब्रह्मोवाच । एवं संवदमानं तं शक्रं विकृतमानसम् । हरिणोक्तश्च गिरिशो लौकिकीं गतिमाश्रितः

brahmovāca evaṁ saṁvadamānaṁ taṁ śakraṁ vikṛtamānasam hariṇoktaśca giriśo laukikīṁ gatimāśritaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "इस प्रकार विकृत मन वाले शक्र से हरि के बातचीत करते समय, लौकिक व्यवहार का आश्रय लेते हुए गिरीश (शिव) ने भी हरि से यह कहा -- "

श्लोक 38 (shiva.rudra.104.38)

ईश्वर उवाच । हे हरे हे सुरेशान किं ब्रूथोऽद्य परस्परम् । इत्युक्त्वा तौ महेशानो मुने त्वां प्रत्युवाच सः

īśvara uvāca he hare he sureśāna kiṁ brūtho'dya parasparam ityuktvā tau maheśāno mune tvāṁ pratyuvāca saḥ

ईश्वर ने कहा -- "हे हरि! हे सुरेशान! आज तुम दोनों आपस में क्या कह रहे हो?" ऐसा कहकर उन महेश्वर ने, हे मुने! तुमसे भी यह कहा -- "

श्लोक 39 (shiva.rudra.104.39)

किं नु वक्ति महाशैलो यथार्थं वद नारद । वृत्तान्तं सकलं ब्रूहि न गोप्यं कर्तुमर्हसि

kiṁ nu vakti mahāśailo yathārthaṁ vada nārada vṛttāntaṁ sakalaṁ brūhi na gopyaṁ kartumarhasi

"'महापर्वत क्या कह रहे हैं? हे नारद! यथार्थ बताओ। सम्पूर्ण वृत्तान्त कहो, इसे छिपाना तुम्हें उचित नहीं है।'"

श्लोक 40 (shiva.rudra.104.40)

ददाति वा नैव ददाति शैलः सुतां स्वकीयां वद तच्च शीघ्रम् । किं ते दृष्टं किं कृतन्तत्र गत्वा प्रीत्या सर्वं तद्वदाश्वद्य तात

dadāti vā naiva dadāti śailaḥ sutāṁ svakīyāṁ vada tacca śīghram kiṁ te dṛṣṭaṁ kiṁ kṛtantatra gatvā prītyā sarvaṁ tadvadāśvadya tāta

"'पर्वत अपनी कन्या देगा या नहीं देगा -- यह शीघ्र बताओ। तुमने वहाँ जाकर क्या देखा, क्या हुआ -- हे तात! वह सब आज ही प्रेमपूर्वक शीघ्र बताओ।'"

श्लोक 41 (shiva.rudra.104.41)

ब्रह्मोवाच । हत्युक्तः शम्भुना तत्र मुने त्वं देवदर्शनः । सर्वं रहस्यवोचो वै यद् दृष्टं तत्र मण्डपे

brahmovāca hatyuktaḥ śambhunā tatra mune tvaṁ devadarśanaḥ sarvaṁ rahasyavoco vai yad dṛṣṭaṁ tatra maṇḍape

ब्रह्मा जी ने कहा -- "इस प्रकार शम्भु के द्वारा कहे जाने पर, हे मुने! देवताओं के दर्शन कर चुके तुमने वहाँ मण्डप में जो कुछ देखा था, वह सब गोपनीय रूप से (एकान्त में) कह दिया।"

श्लोक 42 (shiva.rudra.104.42)

नारद उवाच । देवदेव महादेव शृणु मद्वचनं शुभम् । नास्ति विघ्नभयं नाथ विवाहे किञ्चिदेव हि

nārada uvāca devadeva mahādeva śṛṇu madvacanaṁ śubham nāsti vighnabhayaṁ nātha vivāhe kiñcideva hi

नारद ने कहा -- "हे देवदेव! हे महादेव! मेरा शुभ वचन सुनिए -- हे नाथ! इस विवाह में विघ्न का कोई भय नहीं है।"

श्लोक 43 (shiva.rudra.104.43)

अवश्यमेव शैलेशस्तुभ्यं दास्यति कन्यकाम् । त्वामानयितुमायाता इमे शैला न संशयः

avaśyameva śaileśastubhyaṁ dāsyati kanyakām tvāmānayitumāyātā ime śailā na saṁśayaḥ

"'पर्वतराज अवश्य ही आपको अपनी कन्या देंगे; ये पर्वत आपको लाने के लिए ही आए हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।'"

श्लोक 44 (shiva.rudra.104.44)

किन्तु ह्यमरमोहार्थं माया विरचिताद्भुता । कुतूहलार्थं सर्वज्ञ न कश्चिद्विघ्नसम्भवः

kintu hyamaramohārthaṁ māyā viracitādbhutā kutūhalārthaṁ sarvajña na kaścidvighnasambhavaḥ

"'किन्तु, हे सर्वज्ञ! देवताओं को मोहित करने के लिए और कुतूहल के लिए ही यह अद्भुत माया रची गई है, इसमें विघ्न की कोई संभावना नहीं है।'"

श्लोक 45 (shiva.rudra.104.45)

विचित्रं मण्डपं गेहेऽकार्षीत्तस्य तदाज्ञया । विश्वकर्मा महामायी नानाश्चर्यमयं विभो

vicitraṁ maṇḍapaṁ gehe'kārṣīttasya tadājñayā viśvakarmā mahāmāyī nānāścaryamayaṁ vibho

"'हे विभो! उनकी आज्ञा से महामायावी विश्वकर्मा ने उनके घर में नाना आश्चर्यों से युक्त एक विचित्र मण्डप बनाया है।'"

श्लोक 46 (shiva.rudra.104.46)

सर्वदेवसमाजश्च कृतस्तत्र विमोहनः । तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप्तोऽहं तन्मायाविमोहितः

sarvadevasamājaśca kṛtastatra vimohanaḥ taṁ dṛṣṭvā vismayaṁ prāpto'haṁ tanmāyāvimohitaḥ

"'वहाँ समस्त देवताओं जैसा मोहक समाज रचा गया है; उसे देखकर मैं भी विस्मय को प्राप्त हुआ, उसी माया से मोहित होकर।'"

श्लोक 47 (shiva.rudra.104.47)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा तद्वचस्तात लोकाचारकरः प्रभुः । हर्यादीन्प्रहसन् शम्भुरुवाच सकलान्सुरान्

brahmovāca tacchrutvā tadvacastāta lokācārakaraḥ prabhuḥ haryādīnprahasan śambhuruvāca sakalānsurān

ब्रह्मा जी ने कहा -- "हे तात! उन वचनों को सुनकर, लोकाचार का पालन करने वाले प्रभु शम्भु ने हँसते हुए हरि आदि समस्त देवताओं से कहा -- "

श्लोक 48 (shiva.rudra.104.48)

ईश्वर उवाच । कन्यां दास्यति चेन्मह्यं पर्वतो हि हिमाचलः । मायया मम किं कार्यं वद विष्णो यथातथम्

īśvara uvāca kanyāṁ dāsyati cenmahyaṁ parvato hi himācalaḥ māyayā mama kiṁ kāryaṁ vada viṣṇo yathātatham

ईश्वर ने कहा -- "यदि हिमाचल पर्वत मुझे अपनी कन्या देगा ही, तो हे विष्णो! मुझे इस माया से क्या प्रयोजन? यथार्थ बताओ।"

श्लोक 49 (shiva.rudra.104.49)

हे ब्रह्मन् शक्र मुनयः सुरा ब्रूत यथार्थतः । मायया मम किं कार्यं कन्यां दास्यति चेद्गिरिः

he brahman śakra munayaḥ surā brūta yathārthataḥ māyayā mama kiṁ kāryaṁ kanyāṁ dāsyati cedgiriḥ

"हे ब्रह्मन्! हे शक्र! हे मुनियो! हे देवगण! यथार्थ रूप से बताओ -- यदि पर्वत कन्या देगा ही, तो मुझे माया से क्या प्रयोजन?"

श्लोक 50 (shiva.rudra.104.50)

केनाप्युपायेन फलं हि साध्य- मित्युच्यते पण्डितैर्न्यायविद्भिः । तस्मात्सर्वैर्गम्यतां शीघ्रमेव कार्यार्थिभिर्विष्णुपुरोगमैश्च

kenāpyupāyena phalaṁ hi sādhya- mityucyate paṇḍitairnyāyavidbhiḥ tasmātsarvairgamyatāṁ śīghrameva kāryārthibhirviṣṇupurogamaiśca

"'किसी न किसी उपाय से ही फल सिद्ध होता है' -- ऐसा न्यायवेत्ता पण्डितजन कहते हैं। इसलिए कार्य-सिद्धि के इच्छुक विष्णु आदि सभी शीघ्र ही वहाँ जाएँ।"

श्लोक 51 (shiva.rudra.104.51)

ब्रह्मोवाच । एवं संवदमानोऽसौ देवैः शम्भुरभूत्तदा । कृतः स्मरेणेव वशी वशं वा प्राकृतो नरः

brahmovāca evaṁ saṁvadamāno'sau devaiḥ śambhurabhūttadā kṛtaḥ smareṇeva vaśī vaśaṁ vā prākṛto naraḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "इस प्रकार देवताओं से वार्तालाप करते हुए शम्भु उस समय ऐसे हो गए मानो कामदेव द्वारा वश में किए गए या साधारण मनुष्य के समान किसी के वश में हुए हों।"

श्लोक 52 (shiva.rudra.104.52)

अथ शम्भ्वाज्ञया सर्वे विष्ण्वाद्या निर्जरास्तदा । ऋषयश्च महात्मानो ययुर्मोहभ्रमावहम्

atha śambhvājñayā sarve viṣṇvādyā nirjarāstadā ṛṣayaśca mahātmāno yayurmohabhramāvaham

"तब शम्भु की आज्ञा से विष्णु आदि सभी देवगण और महात्मा ऋषिगण उस मोह-भ्रम को साथ लेकर वहाँ चल पड़े।"

श्लोक 53 (shiva.rudra.104.53)

पुरस्कृत्य मुने त्वां च पर्वतांस्तान्सविस्मयाः । हिमाद्रेश्च तदा जग्मुर्मन्दिरं परमाद्भुतम्

puraskṛtya mune tvāṁ ca parvatāṁstānsavismayāḥ himādreśca tadā jagmurmandiraṁ paramādbhutam

"हे मुने! तुम्हें और उन पर्वतों को आगे कर, विस्मय से भरे हुए वे तब हिमाद्रि के परम अद्भुत भवन की ओर गए।"

श्लोक 54 (shiva.rudra.104.54)

अथ विष्ण्वादिसंयुक्तो मुदितैःस्वबलैर्युतः । आजगामोपहैमागपुरं प्रमुदितो हरः

atha viṣṇvādisaṁyukto muditaiḥsvabalairyutaḥ ājagāmopahaimāgapuraṁ pramudito haraḥ

"तब विष्णु आदि से युक्त, अपनी प्रसन्न सेनाओं सहित हर (शिव) अत्यंत हर्षित होकर हिमालय-पर्वत की नगरी के समीप आ पहुँचे।"

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