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रुद्र संहिता · अध्याय 105

देवगिरिमिलापवर्णनम्

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

श्लोक 1 (shiva.rudra.105.1)

ब्रह्मोवाच । अथाकर्ण्य गिरीशश्च निजपुर्युपकण्ठतः । प्राप्तमीशं सर्वगं वै मुमुदेऽति हिमालयः

brahmovāca athākarṇya girīśaśca nijapuryupakaṇṭhataḥ prāptamīśaṁ sarvagaṁ vai mumude'ti himālayaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "तत्पश्चात् सर्वव्यापी ईश्वर गिरीश (शिव) के अपनी नगरी के समीप पहुँचने का समाचार सुनकर हिमालय अत्यंत हर्षित हुए।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.105.2)

अथ सम्भृतसम्भारः सम्भाषां कर्तुमीश्वरम् । शैलान्प्रस्थापयामास ब्राह्मणानपि सर्वशः

atha sambhṛtasambhāraḥ sambhāṣāṁ kartumīśvaram śailānprasthāpayāmāsa brāhmaṇānapi sarvaśaḥ

"तत्पश्चात् सब सामग्री एकत्र कर, ईश्वर से भेंट करने हेतु उन्होंने पर्वतों को तथा सभी ब्राह्मणों को भी सब ओर भेजा।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.105.3)

स्वयं जगाम सद्भक्त्या प्राणेप्सुं द्रष्टुमीश्वरम् । भक्त्युद्रुतमनाः शैलः प्रशंसन् स्वविधिं मुदा

svayaṁ jagāma sadbhaktyā prāṇepsuṁ draṣṭumīśvaram bhaktyudrutamanāḥ śailaḥ praśaṁsan svavidhiṁ mudā

"वे स्वयं भी सच्ची भक्ति से, प्राणों के समान प्रिय ईश्वर के दर्शन हेतु चल पड़े; भक्ति से उद्वेलित मन वाले पर्वत अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए हर्षपूर्वक गए।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.105.4)

देवसेनां तदा दृष्ट्वा हिमवान्विस्मयं गतः । जगाम सम्मुखस्तत्र धन्योऽहमिति चिन्तयन्

devasenāṁ tadā dṛṣṭvā himavānvismayaṁ gataḥ jagāma sammukhastatra dhanyo'hamiti cintayan

"तब देवताओं की सेना को देखकर हिमवान विस्मित हो गए; वे यह सोचते हुए कि 'मैं धन्य हूँ', आगे बढ़कर उनके सम्मुख गए।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.105.5)

देवा हि तद्बलं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गताः । आनन्दं परमं प्रापुर्देवाश्च गिरयस्तथा

devā hi tadbalaṁ dṛṣṭvā vismayaṁ paramaṁ gatāḥ ānandaṁ paramaṁ prāpurdevāśca girayastathā

"देवताओं ने भी उस (पर्वतों की) सेना को देखकर परम विस्मय प्राप्त किया; देवता और पर्वत दोनों ही परम आनन्द को प्राप्त हुए।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.105.6)

पर्वतानां महासेना देवानां च तथा मुने । मिलित्वा विरराजेव पूर्वपश्चिमसागरौ

parvatānāṁ mahāsenā devānāṁ ca tathā mune militvā virarājeva pūrvapaścimasāgarau

"हे मुने! पर्वतों की और देवताओं की वह महासेना मिलकर ऐसी शोभित हुई मानो पूर्व और पश्चिम के समुद्र मिल गए हों।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.105.7)

परस्परं मिलित्वा ते देवाश्च पर्वतास्तथा । कृतकृत्यं तथात्मानं मेनिरे परया मुदा

parasparaṁ militvā te devāśca parvatāstathā kṛtakṛtyaṁ tathātmānaṁ menire parayā mudā

"परस्पर मिलकर वे देवता और पर्वत दोनों ही परम हर्ष से स्वयं को कृतकृत्य मानने लगे।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.105.8)

अथेश्वरं पुरो दृष्ट्वा प्रणनाम हिमालयः । सर्वे प्रणेमुर्गिरयो ब्राह्मणाश्च सदाशिवम्

atheśvaraṁ puro dṛṣṭvā praṇanāma himālayaḥ sarve praṇemurgirayo brāhmaṇāśca sadāśivam

"तब ईश्वर को सम्मुख देखकर हिमालय ने प्रणाम किया; सभी पर्वतों और ब्राह्मणों ने भी सदाशिव को प्रणाम किया।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.105.9)

वृषभस्थं प्रसन्नास्यं नानाभरणभूषितम् । दिव्यावयवलावण्यप्रकाशितदिगन्तरम्

vṛṣabhasthaṁ prasannāsyaṁ nānābharaṇabhūṣitam divyāvayavalāvaṇyaprakāśitadigantaram

उन्होंने देखा -- वृषभ पर आरूढ़, प्रसन्न मुखमण्डल वाले, नाना आभूषणों से भूषित, अपने दिव्य अंगों के लावण्य से दिशाओं को प्रकाशित करने वाले शिव को।

श्लोक 10 (shiva.rudra.105.10)

सुसूक्ष्माहतसत्पट्टवस्त्रशोभितविग्रहम् । सद्रत्नविलसन्मौलिं विहसन्तं शुचिप्रभम्

susūkṣmāhatasatpaṭṭavastraśobhitavigraham sadratnavilasanmauliṁ vihasantaṁ śuciprabham

अत्यंत सूक्ष्म, बुने हुए उत्तम रेशमी वस्त्रों से सुशोभित शरीर वाले, उत्तम रत्नों से चमकते मुकुट वाले, मुस्कुराते हुए, शुद्ध कान्ति वाले उस रूप को।

श्लोक 11 (shiva.rudra.105.11)

भूषाभूताहियुक्ताङ्गमद्भुतावयवप्रभम् । दिव्यद्युतिं सुरेशैश्च सेवितं करचामरैः

bhūṣābhūtāhiyuktāṅgamadbhutāvayavaprabham divyadyutiṁ sureśaiśca sevitaṁ karacāmaraiḥ

सर्प-आभूषणों से युक्त अंगों वाले, अद्भुत अंगों की कान्ति वाले, दिव्य द्युति वाले, देवताओं के स्वामियों द्वारा हाथों में चँवर लेकर सेवित उस रूप को।

श्लोक 12 (shiva.rudra.105.12)

वामस्थिताच्युतं दक्षभागस्थितविधिं प्रभुम् । पृष्ठस्थितहरिं पृष्ठपार्श्वस्थितसुरादिकम्

vāmasthitācyutaṁ dakṣabhāgasthitavidhiṁ prabhum pṛṣṭhasthitahariṁ pṛṣṭhapārśvasthitasurādikam

बाईं ओर अच्युत (विष्णु) खड़े थे, दाईं ओर प्रभु विधि (ब्रह्मा) खड़े थे; पीछे हरि खड़े थे और पार्श्व-भाग में अन्य देवगण खड़े थे।

श्लोक 13 (shiva.rudra.105.13)

नानाविधसुराद्यैश्च संस्तुतं लोकशङ्करम् । स्वहेत्वात्ततनुं ब्रह्म सर्वेशं वरदायकम्

nānāvidhasurādyaiśca saṁstutaṁ lokaśaṅkaram svahetvāttatanuṁ brahma sarveśaṁ varadāyakam

नाना प्रकार के देवताओं आदि द्वारा स्तुत, लोक-कल्याणकारी, स्वयं ही जिनका कारण-रूप शरीर है, ब्रह्मस्वरूप, सर्वेश्वर, वरदाता उस रूप को।

श्लोक 14 (shiva.rudra.105.14)

सगुणं निर्गुणं चापि भक्ताधीनं कृपाकरम् । प्रकृतेः पुरुषस्यापि परं सच्चित्सुखात्मकम्

saguṇaṁ nirguṇaṁ cāpi bhaktādhīnaṁ kṛpākaram prakṛteḥ puruṣasyāpi paraṁ saccitsukhātmakam

सगुण और साथ ही निर्गुण, भक्तों के अधीन रहने वाले, कृपा करने वाले; प्रकृति और पुरुष से भी परे, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप उस रूप को।

श्लोक 15 (shiva.rudra.105.15)

प्रभोर्दक्षिणभागे तु ददर्श हरिमच्युतम् । विनतातनयारूढं नानाभूषणभूषितम्

prabhordakṣiṇabhāge tu dadarśa harimacyutam vinatātanayārūḍhaṁ nānābhūṣaṇabhūṣitam

प्रभु के दाहिने भाग में उन्होंने विनता-पुत्र गरुड़ पर आरूढ़, नाना आभूषणों से भूषित हरि अच्युत (विष्णु) को देखा।

श्लोक 16 (shiva.rudra.105.16)

प्रभोश्च वामभागे तु मुने मां सन्ददर्श ह । चतुर्मुखं महाशोभं स्वपरीवारसंयुतम्

prabhośca vāmabhāge tu mune māṁ sandadarśa ha caturmukhaṁ mahāśobhaṁ svaparīvārasaṁyutam

और हे मुने! प्रभु के बाएँ भाग में उन्होंने मुझे भी देखा -- चतुर्मुख, महाशोभासम्पन्न, अपने परिवार सहित।

श्लोक 17 (shiva.rudra.105.17)

एतौ सुरेश्वरौ दृष्ट्वा शिवस्यातिप्रियौ सदा । प्रणनाम गिरीशश्च सपरीवार आदरात्

etau sureśvarau dṛṣṭvā śivasyātipriyau sadā praṇanāma girīśaśca saparīvāra ādarāt

शिव के सदा अत्यंत प्रिय इन दोनों देवेश्वरों को देखकर गिरीश (हिमालय) ने अपने परिवार सहित आदरपूर्वक प्रणाम किया।

श्लोक 18 (shiva.rudra.105.18)

तथा शिवस्य पृष्ठे च पार्श्वयोः सुविराजितान् । देवादीन्प्रणनामासौ दृष्ट्वा गिरिवरेश्वरः

tathā śivasya pṛṣṭhe ca pārśvayoḥ suvirājitān devādīnpraṇanāmāsau dṛṣṭvā girivareśvaraḥ

इसी प्रकार शिव के पीछे और दोनों ओर सुशोभित देवताओं आदि को देखकर उस श्रेष्ठ पर्वत-स्वामी ने उन्हें भी प्रणाम किया।

श्लोक 19 (shiva.rudra.105.19)

शिवाज्ञया पुरो भूत्वा जगाम स्वपुरं गिरिः । शेषहर्यात्मभूः शीघ्रं मुनिभिर्निर्जरादिभिः

śivājñayā puro bhūtvā jagāma svapuraṁ giriḥ śeṣaharyātmabhūḥ śīghraṁ munibhirnirjarādibhiḥ

शिव की आज्ञा से आगे होकर, हरि, आत्मभू (ब्रह्मा) आदि तथा शेष मुनियों और देवताओं के साथ पर्वत शीघ्र ही अपनी नगरी की ओर चल पड़े।

श्लोक 20 (shiva.rudra.105.20)

सर्वे मुनिसुराद्याश्च गच्छन्तः प्रभुणा सह । गिरेः पुरं समुदिताः शशंसुर्बहु नारद

sarve munisurādyāśca gacchantaḥ prabhuṇā saha gireḥ puraṁ samuditāḥ śaśaṁsurbahu nārada

हे नारद! सभी मुनि, देवता आदि प्रभु के साथ चलते हुए, हर्षित होकर पर्वत की नगरी की बहुत प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 21 (shiva.rudra.105.21)

रचिते शिखरे रम्ये संस्थाप्य देवतादिकम् । जगाम हिमवाँस्तत्र यत्रास्ति विधिवेदिका

racite śikhare ramye saṁsthāpya devatādikam jagāma himavā~statra yatrāsti vidhivedikā

सुसज्जित सुन्दर शिखर पर देवताओं आदि को बिठाकर हिमवान वहाँ गए जहाँ विधि-वेदिका (यज्ञ-वेदी) स्थित थी।

श्लोक 22 (shiva.rudra.105.22)

कारयित्वा विशेषेण चतुष्कं तोरणैर्युतम् । स्नानदानादिकं कृत्वा परीक्षामकरोत्तदा

kārayitvā viśeṣeṇa catuṣkaṁ toraṇairyutam snānadānādikaṁ kṛtvā parīkṣāmakarottadā

विशेष रूप से तोरणों से सुसज्जित चतुष्कोण मण्डप बनवाकर, स्नान-दान आदि कर, उन्होंने तब अंतिम निरीक्षण किया।

श्लोक 23 (shiva.rudra.105.23)

स्वपुत्रान्प्रेषयामास शिवस्य निकटे तथा । हिमो विष्ण्वादिसम्पूर्णवर्गयुक्तस्य शैलराट्

svaputrānpreṣayāmāsa śivasya nikaṭe tathā himo viṣṇvādisampūrṇavargayuktasya śailarāṭ

पर्वतराज हिमालय ने विष्णु आदि समस्त वर्ग से युक्त शिव के समीप अपने पुत्रों को भेजा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.105.24)

कर्तुमैच्छद्वराचारं महोत्सवपुरस्सरम् । महाहर्षयुतः सर्वबन्धुयुग्घिमशैलराट्

kartumaicchadvarācāraṁ mahotsavapurassaram mahāharṣayutaḥ sarvabandhuyugghimaśailarāṭ

अत्यंत हर्षित तथा समस्त बन्धुजनों से युक्त हिमशैलराज महोत्सवपूर्वक वर-सत्कार की विधि सम्पन्न करना चाहते थे।

श्लोक 25 (shiva.rudra.105.25)

अथ ते गिरिपुत्राश्च तत्र गत्वा प्रणम्य तम् । सस्ववर्गं प्रार्थनान्तामूचुः शैलेश्वरस्य वै

atha te giriputrāśca tatra gatvā praṇamya tam sasvavargaṁ prārthanāntāmūcuḥ śaileśvarasya vai

तब वे पर्वत-पुत्र वहाँ जाकर, उन्हें प्रणाम कर, अपने परिवार सहित, पर्वतेश्वर के निमंत्रण-वचन को कह सुनाए।

श्लोक 26 (shiva.rudra.105.26)

ततस्ते स्वालयं जग्मुः शैलपुत्रास्तदाज्ञया । शैलराजाय सञ्चख्युः ते चायान्तीति हर्षिताः

tataste svālayaṁ jagmuḥ śailaputrāstadājñayā śailarājāya sañcakhyuḥ te cāyāntīti harṣitāḥ

तत्पश्चात् उनकी आज्ञा से वे पर्वत-पुत्र अपने घर लौट गए और हर्षित होकर पर्वतराज को यह बताया कि वे (शिव आदि) आ रहे हैं।

श्लोक 27 (shiva.rudra.105.27)

अथ देवाः प्रार्थनान्तां गिरेः श्रुत्वातिहर्षिताः । मुने विष्ण्वादयः सर्वे सेश्वरा मुमुदुर्भृशम्

atha devāḥ prārthanāntāṁ gireḥ śrutvātiharṣitāḥ mune viṣṇvādayaḥ sarve seśvarā mumudurbhṛśam

तब हे मुने! पर्वत के निमंत्रण-वचन को सुनकर देवगण अत्यंत हर्षित हुए; विष्णु आदि सभी देवता ईश्वर सहित अत्यंत आनन्दित हुए।

श्लोक 28 (shiva.rudra.105.28)

कृत्वा सुवेषं सर्वेऽपि निर्जरा मुनयो गणाः । गमनं चक्रुरन्येऽपि प्रभुणा गिरिराड्गृहम्

kṛtvā suveṣaṁ sarve'pi nirjarā munayo gaṇāḥ gamanaṁ cakruranye'pi prabhuṇā girirāḍgṛham

सुन्दर वेश धारण कर, देवगण, मुनिगण, गणगण तथा अन्य सभी प्रभु के साथ पर्वतराज के भवन की ओर चल पड़े।

श्लोक 29 (shiva.rudra.105.29)

तस्मिन्नवसरे मेना द्रष्टुकामाभवच्छिवम् । प्रभोराह्वाययामास मुने त्वां मुनिसत्तमम्

tasminnavasare menā draṣṭukāmābhavacchivam prabhorāhvāyayāmāsa mune tvāṁ munisattamam

उसी अवसर पर मेना को शिव के दर्शन की इच्छा हुई; उन्होंने प्रभु की सभा से, हे मुने! मुनिश्रेष्ठ तुम्हें बुलवाया।

श्लोक 30 (shiva.rudra.105.30)

अगमस्त्वं मुने तत्र प्रभुणा प्रेरितस्तदा । मनसा शिवहृद्धेतुं पूर्णं कर्तुं तमिच्छता

agamastvaṁ mune tatra prabhuṇā preritastadā manasā śivahṛddhetuṁ pūrṇaṁ kartuṁ tamicchatā

हे मुने! तब तुम प्रभु द्वारा भेजे जाकर वहाँ गए, जो अपने मन में शिव के हृदय की उस इच्छा को पूर्ण करना चाहते थे।

श्लोक 31 (shiva.rudra.105.31)

त्वां प्रणम्य मुने मेना प्राह विस्मितमानसा । द्रष्टुकामा प्रभो रूपं शङ्करस्य मदापहम्

tvāṁ praṇamya mune menā prāha vismitamānasā draṣṭukāmā prabho rūpaṁ śaṅkarasya madāpaham

हे मुने! तुम्हें प्रणाम कर, विस्मित मन वाली मेना ने कहा -- वह प्रभु शंकर के उस रूप को देखना चाहती थीं जो सारे अभिमान को हर लेने वाला है।

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