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रुद्र संहिता · अध्याय 109

मण्डपद्वारे वरागमनवर्णनम्

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

श्लोक 1 (shiva.rudra.109.1)

ब्रह्मोवाच । अथ शम्भुः प्रसन्नात्मा सदूतं स्वगणैःसुरैः । सर्वैरन्यैर्गिरेर्धाम जगाम सकुतूहलम्

brahmovāca atha śambhuḥ prasannātmā sadūtaṁ svagaṇaiḥsuraiḥ sarvairanyairgirerdhāma jagāma sakutūhalam

ब्रह्मा जी ने कहा -- "तब प्रसन्नचित्त शम्भु अपने गणों, दूत तथा देवताओं और अन्य सबके साथ कुतूहलपूर्वक पर्वत के भवन की ओर चले।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.109.2)

मेनापि स्त्रीगणैस्तैश्च हिमाचलवरप्रिया । तत उत्थाय स्वगृहाभ्यन्तरं सा जगाम ह

menāpi strīgaṇaistaiśca himācalavarapriyā tata utthāya svagṛhābhyantaraṁ sā jagāma ha

"हिमाचलनाथ की प्रिया मेना भी उन स्त्री-समूहों सहित वहाँ से उठकर अपने घर के भीतर चली गईं।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.109.3)

नीराजनार्थं शम्भोश्च दीपपात्रकरा सती । सर्वर्षिस्त्रीगणैस्साकमगच्छद् द्वारमादरात्

nīrājanārthaṁ śambhośca dīpapātrakarā satī sarvarṣistrīgaṇaissākamagacchad dvāramādarāt

"शम्भु की आरती के लिए दीपक-पात्र हाथ में लिए वह साध्वी समस्त ऋषि-पत्नियों के साथ आदरपूर्वक द्वार की ओर गई।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.109.4)

तत्रागतं महेशानं शङ्करं गिरिजावरम् । ददर्श प्रीतितो मेना सेवितं सकलैः सुरैः

tatrāgataṁ maheśānaṁ śaṅkaraṁ girijāvaram dadarśa prītito menā sevitaṁ sakalaiḥ suraiḥ

"वहाँ आए हुए, समस्त देवताओं द्वारा सेवित, गिरिजा के वर महेश शंकर को मेना ने प्रेमपूर्वक देखा।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.109.5)

चारुचम्पकवर्णाभं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् । ईषद्धास्यप्रसन्नास्यं रत्नस्वर्णादिभूषितम्

cārucampakavarṇābhaṁ pañcavaktraṁ trilocanam īṣaddhāsyaprasannāsyaṁ ratnasvarṇādibhūṣitam

चम्पक के सुन्दर वर्ण के समान कान्ति वाले, पाँच मुखों वाले, त्रिनेत्र, हल्की मुस्कान से प्रसन्न मुख वाले, रत्न-स्वर्ण आदि से विभूषित --

श्लोक 6 (shiva.rudra.109.6)

मालतीमालया युक्तं सद्रत्नमुकुटोज्ज्वलम् । सत्कण्ठाभरणं चारुवलयाङ्गदभूषितम्

mālatīmālayā yuktaṁ sadratnamukuṭojjvalam satkaṇṭhābharaṇaṁ cāruvalayāṅgadabhūṣitam

मालती की माला से युक्त, उत्तम रत्नजटित मुकुट से देदीप्यमान, गले के सुन्दर आभूषणों तथा मनोहर कड़े-बाजूबंदों से भूषित --

श्लोक 7 (shiva.rudra.109.7)

वह्निशौचेनातुलेन त्वतिसूक्ष्मेण चारुणा । अमूल्यवस्त्रयुग्मेन विचित्रेणातिराजितम्

vahniśaucenātulena tvatisūkṣmeṇa cāruṇā amūlyavastrayugmena vicitreṇātirājitam

अग्नि से शुद्ध किए गए, अनुपम, अत्यंत सूक्ष्म, सुन्दर तथा अमूल्य विचित्र वस्त्र-युगल से अत्यंत सुशोभित --

श्लोक 8 (shiva.rudra.109.8)

चन्दनागरुकस्तूरीचारुकुङ्कुमभूषितम् । रत्नदर्पणहस्तं च कज्जलोज्ज्वललोचनम्

candanāgarukastūrīcārukuṅkumabhūṣitam ratnadarpaṇahastaṁ ca kajjalojjvalalocanam

चन्दन, अगर, कस्तूरी और सुन्दर कुंकुम से विभूषित, हाथ में रत्नजटित दर्पण लिए, काजल से उज्ज्वल नेत्रों वाले --

श्लोक 9 (shiva.rudra.109.9)

सर्वस्वप्रभयाच्छन्नमतीव सुमनोहरम् । अतीव तरुणं रम्यं भूषिताङ्गैश्च भूषितम्

sarvasvaprabhayācchannamatīva sumanoharam atīva taruṇaṁ ramyaṁ bhūṣitāṅgaiśca bhūṣitam

अपनी ही कान्ति से पूर्णतः आच्छादित, अत्यंत मनोहर, अत्यंत तरुण, रमणीय, भूषित अंगों से विभूषित --

श्लोक 10 (shiva.rudra.109.10)

कामिनीकान्तमव्यग्रं कोटिचन्द्राननाम्बुजम् । कोटिस्मराधिकतनुच्छविं सर्वाङ्गसुन्दरम्

kāminīkāntamavyagraṁ koṭicandrānanāmbujam koṭismarādhikatanucchaviṁ sarvāṅgasundaram

स्त्रियों के प्रिय, अविचल, करोड़ों चन्द्रमाओं के समान मुख-कमल वाले, करोड़ों कामदेवों से भी अधिक शरीर-कान्ति वाले, सर्वांग-सुन्दर --

श्लोक 11 (shiva.rudra.109.11)

ईदृग्विधं सुदेवं तं स्थितं स्वपुरतः प्रभुम् । दृष्ट्वा जामातरं मेना जहौ शोकं मुदान्विता

īdṛgvidhaṁ sudevaṁ taṁ sthitaṁ svapurataḥ prabhum dṛṣṭvā jāmātaraṁ menā jahau śokaṁ mudānvitā

अपने घर के सामने खड़े इस प्रकार के उस सुदेव प्रभु को, अपने जामाता को देखकर मेना हर्ष से भरकर शोक त्यागकर गई।

श्लोक 12 (shiva.rudra.109.12)

प्रशशंस स्वभाग्यं सा गिरिजां भूधरं कुलम् । मेने कृतार्थमात्मानं जहर्ष च पुनः पुनः

praśaśaṁsa svabhāgyaṁ sā girijāṁ bhūdharaṁ kulam mene kṛtārthamātmānaṁ jaharṣa ca punaḥ punaḥ

उसने अपने भाग्य की, गिरिजा की और पर्वत-कुल की प्रशंसा की; अपने को कृतार्थ मानते हुए वह बार-बार हर्षित हुई।

श्लोक 13 (shiva.rudra.109.13)

नीराजनं चकारासौ प्रफुल्लवदना सती । अवलोकपरा तत्र मेना जामातरं मुदा

nīrājanaṁ cakārāsau praphullavadanā satī avalokaparā tatra menā jāmātaraṁ mudā

प्रफुल्ल मुख वाली उस साध्वी ने वहाँ हर्षपूर्वक अपने जामाता को निहारते हुए उनकी आरती उतारी।

श्लोक 14 (shiva.rudra.109.14)

गिरिजोक्तमनुस्मृत्य मेना विस्मयमागता । मनसैव ह्युवाचेदं हर्षफुल्लाननाम्बुजा

girijoktamanusmṛtya menā vismayamāgatā manasaiva hyuvācedaṁ harṣaphullānanāmbujā

गिरिजा के कहे हुए वचन को स्मरण कर मेना विस्मय को प्राप्त हुई; हर्ष से खिले मुख-कमल वाली वह मन-ही-मन यह बोली।

श्लोक 15 (shiva.rudra.109.15)

यद्वै पुरोक्तं च तया पार्वत्या मम तत्र च । ततोऽधिकं प्रपश्यामि सौन्दर्यं परमेशितुः

yadvai puroktaṁ ca tayā pārvatyā mama tatra ca tato'dhikaṁ prapaśyāmi saundaryaṁ parameśituḥ

"पार्वती ने पहले जो मुझसे उनके विषय में कहा था, उससे भी अधिक सुन्दरता मैं उन परमेश्वर की देख रही हूँ।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.109.16)

महेशस्य सुलावण्यमनिर्वाच्यं च सम्प्रति । एवं विस्मयमापन्ना मेना स्वगृहमाययौ

maheśasya sulāvaṇyamanirvācyaṁ ca samprati evaṁ vismayamāpannā menā svagṛhamāyayau

"महेश का यह सौन्दर्य अब तो वर्णन से परे ही है।" इस प्रकार विस्मय को प्राप्त हुई मेना अपने घर लौट आई।

श्लोक 17 (shiva.rudra.109.17)

प्रशशंसुर्युवतयो धन्या धन्या गिरेः सुता । दुर्गा भगवतीत्येवमूचुः काश्चन कन्यकाः

praśaśaṁsuryuvatayo dhanyā dhanyā gireḥ sutā durgā bhagavatītyevamūcuḥ kāścana kanyakāḥ

युवतियों ने प्रशंसा की -- "धन्य है, धन्य है पर्वत की पुत्री!" कुछ कन्याओं ने कहा -- "यह साक्षात् भगवती दुर्गा ही हैं!"

श्लोक 18 (shiva.rudra.109.18)

न दृष्टो वर इत्येवमस्माभिर्दानगोचरः । धन्या हि गिरिजादेवीमूचुः काश्चन कन्यकाः

na dṛṣṭo vara ityevamasmābhirdānagocaraḥ dhanyā hi girijādevīmūcuḥ kāścana kanyakāḥ

"हमने ऐसा दान-योग्य वर पहले कभी नहीं देखा।" कुछ कन्याओं ने कहा -- "धन्य हैं देवी गिरिजा!"

श्लोक 19 (shiva.rudra.109.19)

जगुर्गन्धर्वप्रवरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । दृष्ट्वा शङ्कररूपं च प्रहृष्टाः सर्वदेवताः

jagurgandharvapravarā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ dṛṣṭvā śaṅkararūpaṁ ca prahṛṣṭāḥ sarvadevatāḥ

श्रेष्ठ गन्धर्वों ने गान किया और अप्सराओं के समूहों ने नृत्य किया; शंकर का वह रूप देखकर सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए।

श्लोक 20 (shiva.rudra.109.20)

नानाप्रकारवाद्यानि वादका मधुराक्षरम् । नानाप्रकारशिल्पेन वादयामासुरादरात्

nānāprakāravādyāni vādakā madhurākṣaram nānāprakāraśilpena vādayāmāsurādarāt

वादकों ने नाना प्रकार के वाद्य मधुर स्वर में, नाना कुशलता से आदरपूर्वक बजाए।

श्लोक 21 (shiva.rudra.109.21)

हिमाचलोऽपि मुदितो द्वाराचारमथाकरोत् । मेनापि सर्वनारीभिर्महोत्सवपुरस्सरम्

himācalo'pi mudito dvārācāramathākarot menāpi sarvanārībhirmahotsavapurassaram

हिमाचल ने भी प्रसन्न होकर द्वार पर स्वागत-विधि सम्पन्न की; मेना ने भी समस्त स्त्रियों के साथ महोत्सवपूर्वक --

श्लोक 22 (shiva.rudra.109.22)

परपृच्छां चकारासौ मुदिता स्वगृहं ययौ । शिवो निवेदितं स्थानं जगाम गणनिर्जरैः

parapṛcchāṁ cakārāsau muditā svagṛhaṁ yayau śivo niveditaṁ sthānaṁ jagāma gaṇanirjaraiḥ

-- कुशल-क्षेम पूछा और प्रसन्न होकर अपने घर लौट गई; शिव भी गणों और देवताओं सहित अपने नियत स्थान को गए।

श्लोक 23 (shiva.rudra.109.23)

एतस्मिन्नन्तरे दुर्गां शैलान्तः पुरचारिकाः । बहिर्जग्मुः समादाय पूजितुं कुलदेवताम्

etasminnantare durgāṁ śailāntaḥ puracārikāḥ bahirjagmuḥ samādāya pūjituṁ kuladevatām

इसी बीच पर्वत के अन्तःपुर की परिचारिकाएँ दुर्गा (पार्वती) को साथ लेकर कुलदेवता की पूजा करने के लिए बाहर गईं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.109.24)

तत्र तां ददृशुर्देवा निमेषरहिता मुदा । सुनीलाञ्जनवर्णाभां स्वाङ्गैश्च प्रतिभूषिताम्

tatra tāṁ dadṛśurdevā nimeṣarahitā mudā sunīlāñjanavarṇābhāṁ svāṅgaiśca pratibhūṣitām

वहाँ देवताओं ने उन्हें बिना पलक झपकाए हर्षपूर्वक देखा -- सुनील अंजन के समान वर्ण वाली, अपने अंगों से सुशोभित।

श्लोक 25 (shiva.rudra.109.25)

त्रिनेत्रादृतनेत्रां तामन्यवारितलोचनाम् । ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सकटाक्षां मनोहराम्

trinetrādṛtanetrāṁ tāmanyavāritalocanām īṣaddhāsyaprasannāsyāṁ sakaṭākṣāṁ manoharām

त्रिनेत्र (शिव) से ही आदर पाने वाले नेत्रों वाली, किसी और की ओर न देखने वाली, हल्की मुस्कान से प्रसन्न मुख वाली, कटाक्षयुक्त और मनोहर।

श्लोक 26 (shiva.rudra.109.26)

सुचारुकबरीभारां चारुपत्रकशोभिताम् । कस्तूरीबिन्दुभिस्सार्धं सिन्दूरबिन्दुशोभिताम्

sucārukabarībhārāṁ cārupatrakaśobhitām kastūrībindubhissārdhaṁ sindūrabinduśobhitām

सुन्दर घनी वेणी वाली, सुन्दर पत्र-रचना से शोभित, कस्तूरी-बिन्दुओं के साथ सिन्दूर-बिन्दुओं से शोभायमान।

श्लोक 27 (shiva.rudra.109.27)

रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षसा सुविराजिताम् । रत्नकेयूरवलयां रत्नकङ्कणमण्डिताम्

ratnendrasārahāreṇa vakṣasā suvirājitām ratnakeyūravalayāṁ ratnakaṅkaṇamaṇḍitām

श्रेष्ठ रत्नों के हार से वक्षस्थल पर सुशोभित, रत्नजटित केयूर-कड़ों वाली, रत्नजटित कंगनों से सज्जित।

श्लोक 28 (shiva.rudra.109.28)

सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च चारुगण्डस्थलोज्ज्वलाम् । मणिरत्नप्रभामुष्टिदन्तराजिविराजिताम्

sadratnakuṇḍalābhyāṁ ca cārugaṇḍasthalojjvalām maṇiratnaprabhāmuṣṭidantarājivirājitām

उत्तम रत्न-कुण्डलों से सुन्दर कपोलों वाली, मणि-रत्नों की कान्ति को भी मात करने वाली दन्त-पंक्ति से सुशोभित।

श्लोक 29 (shiva.rudra.109.29)

मधुबिम्बाधरोष्ठां च रत्नयावकसंयुताम् । रत्नदर्पणहस्तां च क्रीडापद्मविभूषिताम्

madhubimbādharoṣṭhāṁ ca ratnayāvakasaṁyutām ratnadarpaṇahastāṁ ca krīḍāpadmavibhūṣitām

बिम्बफल के समान मधुर अधरोष्ठ वाली, रत्नजटित महावर से युक्त, हाथ में रत्न-दर्पण लिए, क्रीड़ा-कमल से विभूषित।

श्लोक 30 (shiva.rudra.109.30)

चन्दनागुरुकस्तूरीकुङ्कुमेनातिचर्चिताम् । क्वणन्मञ्जीरपादां च रक्ताङ्घ्रितलराजिताम्

candanāgurukastūrīkuṅkumenāticarcitām kvaṇanmañjīrapādāṁ ca raktāṅghritalarājitām

चन्दन, अगर, कस्तूरी और कुंकुम से भली-भाँति चर्चित, पैरों में बजते हुए नूपुरों वाली, लाल तलवों से सुशोभित।

श्लोक 31 (shiva.rudra.109.31)

प्रणेमुः शिरसा देवीं भक्तियुक्ताः समेनकाम् । सर्वे सुरादयो दृष्ट्वा जगदाद्यां जगत्प्रसूम्

praṇemuḥ śirasā devīṁ bhaktiyuktāḥ samenakām sarve surādayo dṛṣṭvā jagadādyāṁ jagatprasūm

जगत की आदि, जगत की जननी उस देवी को देखकर सभी देवता आदि ने मेना सहित भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम किया।

श्लोक 32 (shiva.rudra.109.32)

त्रिनेत्रो नेत्रकोणेन तां ददर्श मुदान्वितः । शिवः सत्याकृतिं दृष्ट्वा विजहौ विरहज्वरम्

trinetro netrakoṇena tāṁ dadarśa mudānvitaḥ śivaḥ satyākṛtiṁ dṛṣṭvā vijahau virahajvaram

त्रिनेत्र शिव ने आँख के कोने से हर्षपूर्वक उसे देखा; उस सत्यस्वरूपा को देखकर शिव ने विरह का ज्वर त्याग दिया।

श्लोक 33 (shiva.rudra.109.33)

शिवः सर्वं विसस्मार शिवासंन्यस्तलोचनः । पुलकाञ्चितसर्वाङ्गो हर्षाद्गौरीविलोचनः

śivaḥ sarvaṁ visasmāra śivāsaṁnyastalocanaḥ pulakāñcitasarvāṅgo harṣādgaurīvilocanaḥ

शिवा में ही नेत्र लगाए हुए शिव सब कुछ भूल गए; हर्ष से गौरी को देखते हुए उनका सारा शरीर रोमांचित हो उठा।

श्लोक 34 (shiva.rudra.109.34)

अथ काली बहिः पुर्या गत्वा पूज्य कुलाम्बिकाम् । विवेश भवनं रम्यं स्वपितुस्सद्विजाङ्गना

atha kālī bahiḥ puryā gatvā pūjya kulāmbikām viveśa bhavanaṁ ramyaṁ svapitussadvijāṅganā

तब काली (पार्वती) नगर के बाहर जाकर कुलदेवी की पूजा कर, वह सती वधू अपने पिता के सुन्दर भवन में लौट आई।

श्लोक 35 (shiva.rudra.109.35)

शङ्करोऽपि सुरैः सार्धं हरिणा ब्रह्मणा तथा । हिमाचलसमुद्दिष्टं स्वस्थानमगमन्मुदा

śaṅkaro'pi suraiḥ sārdhaṁ hariṇā brahmaṇā tathā himācalasamuddiṣṭaṁ svasthānamagamanmudā

शंकर भी देवताओं, हरि और ब्रह्मा सहित हिमाचल द्वारा नियत किए गए अपने स्थान पर प्रसन्नतापूर्वक गए।

श्लोक 36 (shiva.rudra.109.36)

तत्र सर्वे सुखं तस्थुः सेवन्तः शङ्करं यथा । सम्मानिता गिरीशेन नानाविधसुसम्पदा

tatra sarve sukhaṁ tasthuḥ sevantaḥ śaṅkaraṁ yathā sammānitā girīśena nānāvidhasusampadā

वहाँ सभी सुखपूर्वक ठहरे, यथोचित शंकर की सेवा करते हुए, गिरीश द्वारा नाना प्रकार की उत्तम सम्पदा से सम्मानित होकर।

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