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रुद्र संहिता · अध्याय 111

शिवाशिवयोर्विवाहविधिकथनम्

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

श्लोक 1 (shiva.rudra.111.1)

ब्रह्मोवाच । एतस्मिन्नन्तरे तत्र गर्गाचार्यप्रणोदितः । हिमवान्मेनया सार्धं कन्यां दातुं प्रचक्रमे

brahmovāca etasminnantare tatra gargācāryapraṇoditaḥ himavānmenayā sārdhaṁ kanyāṁ dātuṁ pracakrame

ब्रह्मा जी ने कहा -- "इसी बीच वहाँ आचार्य गर्ग द्वारा प्रेरित होकर हिमवान ने मेना सहित कन्यादान का कार्य आरम्भ किया।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.111.2)

हैमं कलशमादाय मेना चार्धाङ्गमाश्रिता । हिमाद्रेश्च महाभागा वस्त्राभरणभूषिता

haimaṁ kalaśamādāya menā cārdhāṅgamāśritā himādreśca mahābhāgā vastrābharaṇabhūṣitā

"सुवर्ण-कलश लेकर, हिमाद्रि के अर्धांग रूप में स्थित, वस्त्र-आभूषणों से भूषित वह महाभागा मेना --"

श्लोक 3 (shiva.rudra.111.3)

पाद्यादिभिस्ततः शैलः प्रहृष्टः स्वपुरोहितः । तं वरं वरयामास वस्त्रचन्दनभूषणैः

pādyādibhistataḥ śailaḥ prahṛṣṭaḥ svapurohitaḥ taṁ varaṁ varayāmāsa vastracandanabhūṣaṇaiḥ

"-- तत्पश्चात् अत्यंत हर्षित पर्वत ने अपने पुरोहित सहित पाद्य आदि से, वस्त्र-चन्दन-आभूषणों से उस वर का सत्कार किया।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.111.4)

ततो हिमाद्रिणा प्रोक्ता द्विजास्तिथ्यादिकीर्तने । प्रयोगो भण्यतां तावदस्मिन्समय आगते

tato himādriṇā proktā dvijāstithyādikīrtane prayogo bhaṇyatāṁ tāvadasminsamaya āgate

"तत्पश्चात् हिमाद्रि ने ब्राह्मणों से कहा -- 'तिथि आदि के कीर्तन का प्रयोग अब कहा जाए, यह अवसर आ चुका है।'"

श्लोक 5 (shiva.rudra.111.5)

तथेति चोक्ता ते सर्वे कालज्ञा द्विजसत्तमाः । तिथ्यादिकीर्तनं चक्रुः प्रीत्या परमनिर्वृताः

tatheti coktā te sarve kālajñā dvijasattamāḥ tithyādikīrtanaṁ cakruḥ prītyā paramanirvṛtāḥ

"'ऐसा ही हो' कहकर काल के ज्ञाता वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण परम प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक तिथि आदि का कीर्तन करने लगे।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.111.6)

ततो हिमाचलः प्रीत्या शम्भुना प्रेरितो हृदा । सूतीकृतपरेशेन विहसन् शम्भुमब्रवीत्

tato himācalaḥ prītyā śambhunā prerito hṛdā sūtīkṛtapareśena vihasan śambhumabravīt

"तत्पश्चात् स्वयं शम्भु द्वारा हृदय से प्रेरित होकर, सुगम बने हुए उस परमेश्वर से हिमाचल ने प्रेमपूर्वक मुस्कुराते हुए यह कहा।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.111.7)

स्वगोत्रं कथ्यतां शम्भो प्रवरश्च कुलं तथा । नाम वेदं तथा शाखां माकार्षीः समयात्ययम्

svagotraṁ kathyatāṁ śambho pravaraśca kulaṁ tathā nāma vedaṁ tathā śākhāṁ mākārṣīḥ samayātyayam

"'हे शम्भु! अपना गोत्र, प्रवर तथा कुल भी बताइए; अपना नाम, वेद और शाखा भी -- इस अवसर को व्यर्थ न जाने दें।'"

श्लोक 8 (shiva.rudra.111.8)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य हिमाद्रेः शङ्करस्तदा । सुमुखो विमुखः सद्योऽप्यशोच्यः शोच्यतां गतः

brahmovāca ityākarṇya vacastasya himādreḥ śaṅkarastadā sumukho vimukhaḥ sadyo'pyaśocyaḥ śocyatāṁ gataḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "हिमाद्रि के इस वचन को सुनकर शंकर, जो अभी तक प्रसन्नमुख थे, तुरंत विमुख हो गए; वे स्वयं शोक-रहित होते हुए भी मानो शोकग्रस्त-से दिखे।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.111.9)

एवंविधः सुरवरैर्मुनिभिस्तदानीं गन्धर्वयक्षगणसिद्धगणैस्तथैव । दृष्टो निरुत्तरमुखो भगवान्महेशोऽ- कार्षीस्सुहास्यमथ तत्र स नारद त्वम्

evaṁvidhaḥ suravarairmunibhistadānīṁ gandharvayakṣagaṇasiddhagaṇaistathaiva dṛṣṭo niruttaramukho bhagavānmaheśo'- kārṣīssuhāsyamatha tatra sa nārada tvam

इस प्रकार श्रेष्ठ देवताओं, मुनियों तथा गन्धर्व, यक्ष और सिद्ध-गणों द्वारा उस समय निरुत्तर मुख वाले भगवान महेश को देखा गया; तब हे नारद! तुमने ही वहाँ एक सुन्दर मुस्कान बिखेरी।

श्लोक 10 (shiva.rudra.111.10)

वीणामवादयंस्त्वं हि ब्रह्मविज्ञोऽथ नारद । शिवेन प्रेरितस्तत्र मनसा शम्भुमानसः

vīṇāmavādayaṁstvaṁ hi brahmavijño'tha nārada śivena preritastatra manasā śambhumānasaḥ

ब्रह्मविद्या के ज्ञाता हे नारद! तब तुमने शिव द्वारा ही प्रेरित होकर, मन को शम्भु में लगाए हुए वीणा बजानी आरम्भ की।

श्लोक 11 (shiva.rudra.111.11)

तदा निवारितो धीमान् पर्वतेन्द्रेण वै हठात् । विष्णुना च मया देवैर्मुनिभिश्चाखिलैस्तथा

tadā nivārito dhīmān parvatendreṇa vai haṭhāt viṣṇunā ca mayā devairmunibhiścākhilaistathā

हे धीमान्! तब पर्वतराज ने, तथा विष्णु, मैंने और सभी देवताओं और मुनियों ने भी हठपूर्वक तुम्हें रोका।

श्लोक 12 (shiva.rudra.111.12)

न निवृत्तोऽभवस्त्वं हि स यदा शङ्करेच्छया । इति प्रोक्तोऽद्रिणा तर्हि वीणां मा वादयाधुना

na nivṛtto'bhavastvaṁ hi sa yadā śaṅkarecchayā iti prokto'driṇā tarhi vīṇāṁ mā vādayādhunā

परन्तु जब यह शंकर की ही इच्छा से हो रहा था, तब तुम नहीं रुके; तब पर्वत ने कहा -- 'तो फिर अभी वीणा मत बजाओ।'

श्लोक 13 (shiva.rudra.111.13)

सुनिषिद्धो हठात्तेन देवर्षे त्वं यदा बुध । प्रत्यवोचो गिरीशं तं सुसंस्मृत्य महेश्वरम्

suniṣiddho haṭhāttena devarṣe tvaṁ yadā budha pratyavoco girīśaṁ taṁ susaṁsmṛtya maheśvaram

हे देवर्षि, हे बुद्धिमान्! जब उसने तुम्हें हठपूर्वक इस प्रकार रोका, तब तुमने महेश्वर का भली-भाँति स्मरण करके उस गिरीश को उत्तर दिया।

श्लोक 14 (shiva.rudra.111.14)

नारद उवाच । त्वं हि मूढत्वमापन्नो न जानासि च किञ्चन । वाच्ये महेशविषयेऽतीवासि त्वं बहिर्मुखः

nārada uvāca tvaṁ hi mūḍhatvamāpanno na jānāsi ca kiñcana vācye maheśaviṣaye'tīvāsi tvaṁ bahirmukhaḥ

नारद ने कहा -- "आप मोह को प्राप्त हो गए हैं, कुछ भी नहीं जानते; महेश के विषय में जो कहना उचित है, उसके प्रति आप अत्यंत विमुख हैं।"

श्लोक 15 (shiva.rudra.111.15)

त्वया पृष्ठो हरः साक्षात्स्वगोत्रकथनं प्रति । समयेऽस्मिंस्तदत्यन्तमुपहासकरं वचः

tvayā pṛṣṭho haraḥ sākṣātsvagotrakathanaṁ prati samaye'smiṁstadatyantamupahāsakaraṁ vacaḥ

"आपने साक्षात् हर से इस अवसर पर उनका अपना गोत्र पूछा -- यह वचन इस समय अत्यंत उपहासजनक है।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.111.16)

अस्य गोत्रं कुलं नाम नैव जानन्ति पर्वत । विष्णुब्रह्मादयोऽपीह परेषां का कथा स्मृता

asya gotraṁ kulaṁ nāma naiva jānanti parvata viṣṇubrahmādayo'pīha pareṣāṁ kā kathā smṛtā

"हे पर्वत! इनका गोत्र, कुल और नाम विष्णु-ब्रह्मा आदि भी यहाँ नहीं जानते -- फिर अन्य लोगों की तो क्या बात!"

श्लोक 17 (shiva.rudra.111.17)

यस्यैकदिवसे शैल ब्रह्मकोटिर्लयं गता । स एव शङ्करस्तेद्य दृष्टः कालीतपोबलात्

yasyaikadivase śaila brahmakoṭirlayaṁ gatā sa eva śaṅkarastedya dṛṣṭaḥ kālītapobalāt

"हे पर्वत! जिनके एक ही दिन में करोड़ों ब्रह्मा लय को प्राप्त हो जाते हैं, वही शंकर आज काली की तपस्या के बल से आपको दिखाई दिए हैं।"

श्लोक 18 (shiva.rudra.111.18)

अरूपोऽयं परब्रह्म निर्गुणः प्रकृतेः परः । निराकारो निर्विकारी मायाधीशः परात्परः

arūpo'yaṁ parabrahma nirguṇaḥ prakṛteḥ paraḥ nirākāro nirvikārī māyādhīśaḥ parātparaḥ

"यह अरूप परब्रह्म हैं, निर्गुण, प्रकृति से परे; निराकार, निर्विकार, माया के अधीश्वर, परात्पर।"

श्लोक 19 (shiva.rudra.111.19)

अगोत्रकुलनामा हि स्वतन्त्रो भक्तवत्सलः । तदिच्छया हि सगुणः सुतनुर्बहुनामभृत्

agotrakulanāmā hi svatantro bhaktavatsalaḥ tadicchayā hi saguṇaḥ sutanurbahunāmabhṛt

"गोत्र, कुल और नाम से रहित, स्वतन्त्र, भक्तवत्सल; अपनी ही इच्छा से सगुण, सुन्दर शरीर वाले और अनेक नामों को धारण करने वाले हैं।"

श्लोक 20 (shiva.rudra.111.20)

सुगोत्री गोत्रहीनश्च कुलहीनः कुलीनकः । पार्वतीतपसा सोऽद्य जामाता ते न संशयः

sugotrī gotrahīnaśca kulahīnaḥ kulīnakaḥ pārvatītapasā so'dya jāmātā te na saṁśayaḥ

"उत्तम गोत्र वाले होकर भी गोत्र-रहित, कुल-रहित होकर भी उत्तम कुल वाले -- वही आज पार्वती की तपस्या से निश्चय ही आपके जामाता हुए हैं।"

श्लोक 21 (shiva.rudra.111.21)

लीलाविहारिणा तेन मोहितं सचराचरम् । नो जानाति शिवं कोऽपि प्राज्ञोऽपि गिरिसत्तम

līlāvihāriṇā tena mohitaṁ sacarācaram no jānāti śivaṁ ko'pi prājño'pi girisattama

"अपनी लीला में विहार करने वाले उनके द्वारा यह सारा चराचर जगत मोहित है; हे श्रेष्ठ पर्वत! ज्ञानी होकर भी कोई शिव को नहीं जानता।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.111.22)

लिङ्गाकृतेर्महेशस्य केन दृष्टं न मस्तकम् । विष्णुर्गत्वा हि पातालं तदैनं नाप विस्मितः

liṅgākṛtermaheśasya kena dṛṣṭaṁ na mastakam viṣṇurgatvā hi pātālaṁ tadainaṁ nāpa vismitaḥ

"महेश के लिंगाकार स्वरूप का मस्तक किसने देखा है? विष्णु ने पाताल तक जाकर भी उसका अन्त नहीं पाया और विस्मित रह गए।"

श्लोक 23 (shiva.rudra.111.23)

किं बहूक्त्या नगश्रेष्ठ शिवमाया दुरत्यया । तदधीनास्त्रयो लोका हरिब्रह्मादयोऽपि च

kiṁ bahūktyā nagaśreṣṭha śivamāyā duratyayā tadadhīnāstrayo lokā haribrahmādayo'pi ca

"हे श्रेष्ठ पर्वत! अधिक कहने से क्या लाभ? शिव की माया दुर्लंघ्य है; तीनों लोक, हरि-ब्रह्मा आदि भी उसी के अधीन हैं।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.111.24)

तस्मात्त्वया शिवातात सुविचार्य प्रयत्नतः । न कर्तव्यो विमर्शोऽत्र त्वेवंविधवरे मनाक्

tasmāttvayā śivātāta suvicārya prayatnataḥ na kartavyo vimarśo'tra tvevaṁvidhavare manāk

"इसलिए, हे शिवा के पिता! भली-भाँति और पूर्ण प्रयत्न से विचार कर, ऐसे वर के विषय में तनिक भी संशय नहीं करना चाहिए।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.111.25)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा त्वं मुने ज्ञानी शिवेच्छाकार्यकारकः । प्रत्यवोचः पुनस्तं वै शैलेद्रं हर्षयन् गिरा

brahmovāca ityuktvā tvaṁ mune jñānī śivecchākāryakārakaḥ pratyavocaḥ punastaṁ vai śailedraṁ harṣayan girā

ब्रह्मा जी ने कहा -- "हे मुने! ऐसा कहकर तुम ज्ञानी, शिव की इच्छा को सम्पन्न करने वाले, फिर से उस पर्वतराज को अपने वचन से प्रसन्न करते हुए बोले।"

श्लोक 26 (shiva.rudra.111.26)

नारद उवाच । शृणु तात महाशैल शिवाजनक मद्वचः । तच्छ्रुत्वा तनयां देवीं देहि त्वं शङ्कराय हि

nārada uvāca śṛṇu tāta mahāśaila śivājanaka madvacaḥ tacchrutvā tanayāṁ devīṁ dehi tvaṁ śaṅkarāya hi

नारद ने कहा -- "हे तात, हे महाशैल, हे शिवा के पिता! मेरा वचन सुनिए; इसे सुनकर अपनी पुत्री देवी को शंकर को दे दीजिए।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.111.27)

सगुणस्य महेशस्य लीलया रूपधारिणः । गोत्रं कुलं विजानीहि नादमेव हि केवलम्

saguṇasya maheśasya līlayā rūpadhāriṇaḥ gotraṁ kulaṁ vijānīhi nādameva hi kevalam

"लीला से रूप धारण करने वाले सगुण महेश का गोत्र-कुल केवल नाद ही जानिए, और कुछ नहीं।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.111.28)

शिवो नादमयः सत्यं नादः शिवमयस्तथा । उभयोरन्तरं नास्ति नादस्य च शिवस्य च

śivo nādamayaḥ satyaṁ nādaḥ śivamayastathā ubhayorantaraṁ nāsti nādasya ca śivasya ca

"शिव सत्य ही नादमय हैं, और नाद भी शिवमय है; नाद और शिव में कोई अन्तर नहीं है।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.111.29)

सृष्टौ प्रथमजत्वाद्धि लीलासगुणरूपिणः । शिवान्नादस्य शैलेन्द्र सर्वोत्कृष्टस्ततः स हि

sṛṣṭau prathamajatvāddhi līlāsaguṇarūpiṇaḥ śivānnādasya śailendra sarvotkṛṣṭastataḥ sa hi

"हे शैलेन्द्र! सृष्टि में लीला से सगुण-रूपधारी शिव से भी नाद प्रथम-जात होने के कारण सबसे उत्कृष्ट है।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.111.30)

अतो हि वादिता वीणा प्रेरितेन मयाद्य वै । सर्वेश्वरेण मनसा शङ्करेण हिमालय

ato hi vāditā vīṇā preritena mayādya vai sarveśvareṇa manasā śaṅkareṇa himālaya

"हे हिमालय! इसीलिए आज मुझसे सर्वेश्वर शंकर द्वारा मन से प्रेरित होकर वीणा बजाई गई।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.111.31)

ब्रह्मोवाच । एतच्छ्रुत्वा तव मुने वचस्तत्तु गिरिश्वरः । हिमाद्रिस्तोषमापन्नो गतविस्मयमानसः

brahmovāca etacchrutvā tava mune vacastattu giriśvaraḥ himādristoṣamāpanno gatavismayamānasaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "हे मुने! तुम्हारे इस वचन को सुनकर गिरीश्वर हिमाद्रि संतोष को प्राप्त हुए, उनके मन का विस्मय दूर हो गया।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.111.32)

अथ विष्णुप्रभृतयः सुराश्च मुनयस्तथा । साधु साध्विति ते सर्वे प्रोचुर्विगतविस्मयाः

atha viṣṇuprabhṛtayaḥ surāśca munayastathā sādhu sādhviti te sarve procurvigatavismayāḥ

"तब विष्णु आदि देवता और मुनिगण भी विस्मय-रहित होकर वे सब 'साधु! साधु!' कहने लगे।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.111.33)

महेश्वरस्य गाम्भीर्यं ज्ञात्वा सर्वे विचक्षणाः । सविस्मया महामोदान्विताः प्रोचुः परस्परम्

maheśvarasya gāmbhīryaṁ jñātvā sarve vicakṣaṇāḥ savismayā mahāmodānvitāḥ procuḥ parasparam

"महेश्वर की गम्भीरता को जानकर वे सभी विचक्षण जन विस्मय और महान आनन्द से युक्त होकर परस्पर कहने लगे --"

श्लोक 34 (shiva.rudra.111.34)

यस्याज्ञया जगदिदं च विशालमेव जातं परात्परतरो निजबोधरूपः । शर्वः स्वतन्त्रगतिकृत्परभावगम्यः सोऽसौ त्रिलोकपतिरद्य च नः सुदृष्टः

yasyājñayā jagadidaṁ ca viśālameva jātaṁ parātparataro nijabodharūpaḥ śarvaḥ svatantragatikṛtparabhāvagamyaḥ so'sau trilokapatiradya ca naḥ sudṛṣṭaḥ

"जिनकी आज्ञा से यह विशाल जगत उत्पन्न हुआ है, जो परात्पर, स्वयं-बोध-स्वरूप हैं; जो शर्व स्वतन्त्र गति वाले, केवल परम भाव से ही जाने जाने योग्य हैं -- वही त्रिलोकपति आज हमें भली-भाँति दिखाई दिए हैं।"

श्लोक 35 (shiva.rudra.111.35)

अथ ते पर्वतश्रेष्ठा मेर्वाद्या जातसम्भ्रमाः । ऊचुस्ते चैकपद्येन हिमवन्तं नगेश्वरम्

atha te parvataśreṣṭhā mervādyā jātasambhramāḥ ūcuste caikapadyena himavantaṁ nageśvaram

"तब मेरु आदि वे श्रेष्ठ पर्वत उत्सुकता से भरकर एक साथ पर्वतराज हिमवान से यह कहने लगे।"

श्लोक 36 (shiva.rudra.111.36)

पर्वता ऊचुः । कन्यादाने स्थीयतां चाद्य शैल- नाथोक्त्या किं कार्यनाशस्तवैव । सत्यं ब्रूमो नात्र कार्यो विमर्शः तस्मात्कन्या दीयतामीश्वराय

parvatā ūcuḥ kanyādāne sthīyatāṁ cādya śaila- nāthoktyā kiṁ kāryanāśastavaiva satyaṁ brūmo nātra kāryo vimarśaḥ tasmātkanyā dīyatāmīśvarāya

पर्वतों ने कहा -- "हे शैलनाथ! आज कन्यादान में दृढ़ रहिए -- केवल वचनों से आप स्वयं ही इस कार्य का नाश क्यों करें? हम सत्य कहते हैं, यहाँ कोई विचार-विमर्श नहीं करना चाहिए; इसलिए कन्या ईश्वर को दे दी जाए।"

श्लोक 37 (shiva.rudra.111.37)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां सुहृदां स हिमालयः । स्वकन्यादानमकरोच्छिवाय विधिनोदितः

brahmovāca tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ suhṛdāṁ sa himālayaḥ svakanyādānamakarocchivāya vidhinoditaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "अपने उन सुहृदों के इस वचन को सुनकर हिमालय ने विधिपूर्वक प्रेरित होकर अपनी कन्या का दान शिव को कर दिया।"

श्लोक 38 (shiva.rudra.111.38)

इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर । भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर

imāṁ kanyāṁ tubhyamahaṁ dadāmi parameśvara bhāryārthaṁ parigṛhṇīṣva prasīda sakaleśvara

"हे परमेश्वर! यह कन्या मैं आपको देता हूँ; इसे पत्नी रूप में ग्रहण कीजिए, हे सकलेश्वर! प्रसन्न होइए।"

श्लोक 39 (shiva.rudra.111.39)

तस्मै रुद्राय महते मन्त्रेणानेन दत्तवान् । हिमाचलो निजां कन्यां पार्वतीं त्रिजगत्प्रसूम्

tasmai rudrāya mahate mantreṇānena dattavān himācalo nijāṁ kanyāṁ pārvatīṁ trijagatprasūm

इस मन्त्र के साथ हिमाचल ने उन महान रुद्र को अपनी पुत्री, त्रिलोक की जननी पार्वती, अर्पित कर दी।

श्लोक 40 (shiva.rudra.111.40)

इत्थं शिवाकरं शैलं शिवहस्ते निधाय च । मुमोदातीव मनसि तीर्णकाममहार्णवः

itthaṁ śivākaraṁ śailaṁ śivahaste nidhāya ca mumodātīva manasi tīrṇakāmamahārṇavaḥ

इस प्रकार शिवा का हाथ शिव के हाथ में देकर वह पर्वत मन-ही-मन अत्यंत हर्षित हुआ, मानो कामनाओं के महासागर को पार कर गया हो।

श्लोक 41 (shiva.rudra.111.41)

वेदमन्त्रेण गिरिशो गिरिजाकरपङ्कजम् । जग्राह स्वकरेणाशु प्रसन्नः परमेश्वरः

vedamantreṇa giriśo girijākarapaṅkajam jagrāha svakareṇāśu prasannaḥ parameśvaraḥ

वेद-मन्त्र के साथ गिरीश परमेश्वर ने अत्यंत प्रसन्न होकर गिरिजा के कर-कमल को शीघ्र ही अपने हाथ में ग्रहण किया।

श्लोक 42 (shiva.rudra.111.42)

क्षितिं संस्पृश्य कामस्य कोऽदादिति मनुं मुने । पपाठ शङ्करः प्रीत्या दर्शयँल्लौकिकीं गतिम्

kṣitiṁ saṁspṛśya kāmasya ko'dāditi manuṁ mune papāṭha śaṅkaraḥ prītyā darśaya~llaukikīṁ gatim

हे मुने! पृथ्वी का स्पर्श कर शंकर ने प्रेमपूर्वक 'कामस्य को अदात्' इस मन्त्र का पाठ किया, लौकिक आचार को प्रदर्शित करते हुए।

श्लोक 43 (shiva.rudra.111.43)

महोत्सवो महानासीत्सर्वत्र प्रमुदावहः । बभूव जयसंरावो दिवि भूम्यन्तरिक्षके

mahotsavo mahānāsītsarvatra pramudāvahaḥ babhūva jayasaṁrāvo divi bhūmyantarikṣake

सर्वत्र आनन्ददायक महान उत्सव हुआ; स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में जय-जयकार गूँज उठी।

श्लोक 44 (shiva.rudra.111.44)

साधुशब्दं नमः शब्दं चक्रुः सर्वेऽतिहर्षिताः । गन्धर्वाः सुजगुः प्रीत्या ननृतुश्चाप्सरोगणाः

sādhuśabdaṁ namaḥ śabdaṁ cakruḥ sarve'tiharṣitāḥ gandharvāḥ sujaguḥ prītyā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ

सभी अत्यंत हर्षित होकर 'साधु' और 'नमः' शब्द बोलने लगे; गन्धर्वों ने प्रेमपूर्वक सुन्दर गान किया, अप्सराओं के समूहों ने नृत्य किया।

श्लोक 45 (shiva.rudra.111.45)

हिमाचलस्य पौरा हि मुमुदुश्चाति चेतसि । मङ्गलं महदासीद्वै महोत्सवपुरस्सरम्

himācalasya paurā hi mumuduścāti cetasi maṅgalaṁ mahadāsīdvai mahotsavapurassaram

हिमाचल के नगरवासी मन-ही-मन अत्यंत हर्षित हुए; महोत्सव के साथ वहाँ महान मंगल हुआ।

श्लोक 46 (shiva.rudra.111.46)

अहं विष्णुश्च शक्रश्च निर्जरा मुनयोऽखिलाः । हर्षिता ह्यभवंश्चाति प्रफुल्लवदनाम्बुजाः

ahaṁ viṣṇuśca śakraśca nirjarā munayo'khilāḥ harṣitā hyabhavaṁścāti praphullavadanāmbujāḥ

मैं, विष्णु, शक्र तथा समस्त अमरगण और मुनिगण अत्यंत हर्षित हो उठे, हमारे मुख-कमल हर्ष से खिल उठे।

श्लोक 47 (shiva.rudra.111.47)

अथ शैलवरः सोऽदात्सुप्रसन्नो हिमाचलः । शिवाय कन्यादानस्य साङ्गतां सुयथोचिताम्

atha śailavaraḥ so'dātsuprasanno himācalaḥ śivāya kanyādānasya sāṅgatāṁ suyathocitām

तब वह अत्यंत प्रसन्न श्रेष्ठ पर्वत हिमाचल ने कन्यादान की सांगोपांग विधि यथोचित रूप से शिव को सम्पन्न कर दी।

श्लोक 48 (shiva.rudra.111.48)

ततो बन्धुजनास्तस्य शिवां सम्पूज्य भक्तितः । ददुः शिवाय सद्द्रव्यं नानाविधिविधानतः

tato bandhujanāstasya śivāṁ sampūjya bhaktitaḥ daduḥ śivāya saddravyaṁ nānāvidhividhānataḥ

तत्पश्चात् उनके बन्धुजनों ने भक्तिपूर्वक शिवा की पूजा कर, नाना विधि-विधान से शिव को उत्तम द्रव्य अर्पित किए।

श्लोक 49 (shiva.rudra.111.49)

हिमालयस्तुष्टमनाः पार्वतीशिवप्रीतये । नानाविधानि द्रव्याणि ददौ तत्र मुनीश्वर

himālayastuṣṭamanāḥ pārvatīśivaprītaye nānāvidhāni dravyāṇi dadau tatra munīśvara

हे मुनीश्वर! संतुष्ट-मन हिमालय ने पार्वती और शिव की प्रसन्नता के लिए वहाँ नाना प्रकार की वस्तुएँ अर्पित कीं।

श्लोक 50 (shiva.rudra.111.50)

यौतुकानि ददौ तस्मै रत्नानि विविधानि च । चारुरत्नविकाराणि पात्राणि विविधानि च

yautukāni dadau tasmai ratnāni vividhāni ca cāruratnavikārāṇi pātrāṇi vividhāni ca

उन्होंने उन्हें दहेज में नाना प्रकार के रत्न, तथा सुन्दर रत्नों से बने विविध पात्र अर्पित किए।

श्लोक 51 (shiva.rudra.111.51)

गवां लक्षं हयानां च सज्जितानां शतं तथा । दासीनामनुरक्तानां लक्षं सद्द्रव्यभूषितम्

gavāṁ lakṣaṁ hayānāṁ ca sajjitānāṁ śataṁ tathā dāsīnāmanuraktānāṁ lakṣaṁ saddravyabhūṣitam

एक लाख गौएँ, सौ सुसज्जित घोड़े, तथा उत्तम वस्तुओं से भूषित एक लाख अनुरक्त दासियाँ भी दीं।

श्लोक 52 (shiva.rudra.111.52)

नागानां शतलक्षं हि रथानां च तथा मुने । सुवर्णजटितानां च रत्नसारविनिर्मितम्

nāgānāṁ śatalakṣaṁ hi rathānāṁ ca tathā mune suvarṇajaṭitānāṁ ca ratnasāravinirmitam

हे मुने! एक लाख हाथी, और सुवर्ण-जटित तथा उत्तम रत्नों से निर्मित रथ भी उन्होंने दिए।

श्लोक 53 (shiva.rudra.111.53)

इत्थं हिमालयो दत्त्वा स्वसुतां गिरिजां शिवाम् । शिवाय परमेशाय विधिनाप कृतार्थताम्

itthaṁ himālayo dattvā svasutāṁ girijāṁ śivām śivāya parameśāya vidhināpa kṛtārthatām

इस प्रकार अपनी पुत्री गिरिजा शिवा को परमेश्वर शिव को विधिपूर्वक अर्पित कर हिमालय ने कृतार्थता प्राप्त की।

श्लोक 54 (shiva.rudra.111.54)

अथ शैलवरो माध्यन्दिनोक्तस्तोत्रतो मुदा । तुष्टाव परमेशानं सद्गिरा सुकृताञ्जलिः

atha śailavaro mādhyandinoktastotrato mudā tuṣṭāva parameśānaṁ sadgirā sukṛtāñjaliḥ

तत्पश्चात् उस श्रेष्ठ पर्वत ने माध्यन्दिन-विहित स्तोत्र से हर्षपूर्वक, हाथ जोड़कर, उत्तम वाणी से परमेश की स्तुति की।

श्लोक 55 (shiva.rudra.111.55)

ततो वेदविदा तेनाज्ञप्ता मुनिगणास्तदा । शिरोऽभिषेकं चक्रुस्ते शिवायाः परमोत्सवाः

tato vedavidā tenājñaptā munigaṇāstadā śiro'bhiṣekaṁ cakruste śivāyāḥ paramotsavāḥ

तत्पश्चात् वेद के उस ज्ञाता (हिमालय) की आज्ञा से मुनिगणों ने परम उत्सवपूर्वक शिवा का शिरो-अभिषेक किया।

श्लोक 56 (shiva.rudra.111.56)

देवाभिधानमुच्चार्य पर्युक्षणविधिं व्यधुः । महोत्सवस्तदा चासीन्महानन्दकरो मुने

devābhidhānamuccārya paryukṣaṇavidhiṁ vyadhuḥ mahotsavastadā cāsīnmahānandakaro mune

देवताओं के नाम का उच्चारण कर उन्होंने पर्युक्षण (जल-सिंचन) की विधि सम्पन्न की; हे मुने! तब वहाँ महान आनन्द देने वाला वह महोत्सव हुआ।

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