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रुद्र संहिता · अध्याय 112

विवाह-संस्कार की समाप्ति एवं विधि-मोह

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

श्लोक 1 (shiva.rudra.112.1)

ब्रह्मोवाच । अथो ममाज्ञया विप्रैः संस्थाप्यानलमीश्वरः । होमं चकार तत्रैवमङ्के संस्थाप्य पार्वतीम्

brahmovāca atho mamājñayā vipraiḥ saṁsthāpyānalamīśvaraḥ homaṁ cakāra tatraivamaṅke saṁsthāpya pārvatīm

ब्रह्मा जी ने कहा -- "तत्पश्चात् मेरी आज्ञा से विप्रों द्वारा अग्नि स्थापित करवाकर ईश्वर ने वहीं पार्वती को अपनी गोद में बिठाकर होम किया।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.112.2)

ऋग्यजुस्साममन्त्रैश्चाहुतिं वह्नौ ददौ शिवः । लाजाञ्जलिं ददौ कालीभ्राता मैनाकसंज्ञकः

ṛgyajussāmamantraiścāhutiṁ vahnau dadau śivaḥ lājāñjaliṁ dadau kālībhrātā mainākasaṁjñakaḥ

"शिव ने ऋक्, यजुः और साम के मन्त्रों से अग्नि में आहुति दी; और काली (पार्वती) के भाई मैनाक नामक पर्वत ने लाजांजलि अर्पित की।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.112.3)

अथ काली शिवश्चोभौ चक्रतुर्विधिवन्मुदा । वह्निप्रदक्षिणां तात लोकाचारं विधाय च

atha kālī śivaścobhau cakraturvidhivanmudā vahnipradakṣiṇāṁ tāta lokācāraṁ vidhāya ca

"तत्पश्चात् काली और शिव दोनों ने हे तात! हर्षपूर्वक विधिवत् अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए लौकिक आचार का पालन किया।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.112.4)

तत्राद्भुतमलञ्चक्रे चरितं गिरिजापतिः । तदेव शृणु देवर्षे तवस्नेहाद् ब्रवीम्यहम्

tatrādbhutamalañcakre caritaṁ girijāpatiḥ tadeva śṛṇu devarṣe tavasnehād bravīmyaham

"वहाँ गिरिजापति (शिव) ने एक अद्भुत लीला की; हे देवर्षे! वही मैं स्नेहवश तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.112.5)

तस्मिन्नवसरे चाहं शिवमायाविमोहितः । अपश्यं चरणे देव्या नखेन्दुं च मनोहरम्

tasminnavasare cāhaṁ śivamāyāvimohitaḥ apaśyaṁ caraṇe devyā nakhenduṁ ca manoharam

"उस अवसर पर मैं शिव की माया से मोहित होकर देवी के चरण में चन्द्रमा-सदृश मनोहर नखों को देख बैठा।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.112.6)

दर्शनात्तस्य च तदाभूवं देवमुने ह्यहम् । मदनेन समाविष्टोऽतीव क्षुभितमानसः

darśanāttasya ca tadābhūvaṁ devamune hyaham madanena samāviṣṭo'tīva kṣubhitamānasaḥ

"हे देवमुने! उस दर्शन से मैं कामदेव के वशीभूत हो गया और मेरा मन अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.112.7)

मुहुर्मुहुरपश्यं वै तदङ्गं स्मरमोहितः । ततस्तद्दर्शनात्सद्यो वीर्यं मे प्राच्युतद्भुवि

muhurmuhurapaśyaṁ vai tadaṅgaṁ smaramohitaḥ tatastaddarśanātsadyo vīryaṁ me prācyutadbhuvi

"कामविमोहित होकर मैं बार-बार उस अंग को देखता रहा; उसी दर्शन से तत्काल मेरा वीर्य पृथ्वी पर स्खलित हो गया।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.112.8)

रेतसा क्षरता तेन लज्जितोऽहं पितामहः । मुने व्यमर्दं तच्छिन्नं चरणाभ्यां हि गोपयन्

retasā kṣaratā tena lajjito'haṁ pitāmahaḥ mune vyamardaṁ tacchinnaṁ caraṇābhyāṁ hi gopayan

"हे मुने! वीर्य के स्खलित होने से लज्जित हुआ मैं, पितामह, उसे अपने चरणों से मसलकर छिपाने लगा।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.112.9)

तज्ज्ञात्वा च महादेवश्चुकोपातीव नारद । हन्तुमैच्छत्तदा शीघ्रं मां विधिं काममोहितम्

tajjñātvā ca mahādevaścukopātīva nārada hantumaicchattadā śīghraṁ māṁ vidhiṁ kāmamohitam

"हे नारद! यह जानकर महादेव अत्यन्त क्रुद्ध हो गए और कामविमोहित मुझ विधि को तत्काल मार डालना चाहा।"

श्लोक 10 (shiva.rudra.112.10)

हाहाकारो महानासीत्तत्र सर्वत्र नारद । जनाश्चकम्पिरे सर्वे भयमायाति विश्वभृत्

hāhākāro mahānāsīttatra sarvatra nārada janāścakampire sarve bhayamāyāti viśvabhṛt

"हे नारद! वहाँ सर्वत्र महान हाहाकार मच गया; सभी लोग काँप उठे और विश्व के पालनकर्ताओं तक को भय व्याप्त हो गया।"

श्लोक 11 (shiva.rudra.112.11)

ततस्तं तुष्टुवुः शम्भुं विष्ण्वाद्या निर्जरा मुने । सकोपम्प्रज्वलन्तं च तेजसा हन्तुमुद्यतम्

tatastaṁ tuṣṭuvuḥ śambhuṁ viṣṇvādyā nirjarā mune sakopamprajvalantaṁ ca tejasā hantumudyatam

"हे मुने! तब क्रोध से प्रज्वलित एवं तेज से मुझे मारने को उद्यत शम्भु की विष्णु आदि अमर देवताओं ने स्तुति की।"

श्लोक 12 (shiva.rudra.112.12)

देवा ऊचुः । देवदेव जगद्व्यापिन् परमेश सदाशिव । जगदीश जगन्नाथ सम्प्रसीद जगन्मय

devā ūcuḥ devadeva jagadvyāpin parameśa sadāśiva jagadīśa jagannātha samprasīda jaganmaya

देवताओं ने कहा -- "हे देवदेव! हे जगत्व्यापी! हे परमेश! हे सदाशिव! हे जगदीश! हे जगन्नाथ! हे जगन्मय! प्रसन्न होइए।"

श्लोक 13 (shiva.rudra.112.13)

सर्वेषामपि भावानां त्वमात्मा हेतुरीश्वरः । निर्विकारोऽव्ययो नित्यो निर्विकल्पोऽक्षरः परः

sarveṣāmapi bhāvānāṁ tvamātmā heturīśvaraḥ nirvikāro'vyayo nityo nirvikalpo'kṣaraḥ paraḥ

"आप ही समस्त भावों के आत्मा और कारण, ईश्वर हैं -- निर्विकार, अव्यय, नित्य, निर्विकल्प, अक्षर तथा परम हैं।"

श्लोक 14 (shiva.rudra.112.14)

आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः । यतोऽव्ययः स नैतानि तत्सत्यम्ब्रह्म चिद्भवान्

ādyantāvasya yanmadhyamidamanyadahaṁ bahiḥ yato'vyayaḥ sa naitāni tatsatyambrahma cidbhavān

"जिसका आदि-अन्त है, जो मध्य है, यह 'अन्य' और 'बाह्य' -- ये सब आप नहीं, क्योंकि आप अव्यय हैं; वही सत्य ब्रह्म, चिद्रूप आप ही हैं।"

श्लोक 15 (shiva.rudra.112.15)

तवैव चरणाम्भोजं मुक्तिकामा दृढव्रताः । विसृज्योभयतः सङ्गं मुनयः समुपासते

tavaiva caraṇāmbhojaṁ muktikāmā dṛḍhavratāḥ visṛjyobhayataḥ saṅgaṁ munayaḥ samupāsate

"मुक्ति की कामना करने वाले, दृढ़-व्रती मुनिजन दोनों प्रकार की आसक्ति त्यागकर केवल आपके चरण-कमल की उपासना करते हैं।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.112.16)

त्वं ब्रह्म पूर्णममृतं विशोकं निर्गुणम्परम् । आनन्दमात्रमव्यग्रमविकारमनात्मकम्

tvaṁ brahma pūrṇamamṛtaṁ viśokaṁ nirguṇamparam ānandamātramavyagramavikāramanātmakam

"आप पूर्ण, अमृतस्वरूप, शोकरहित, निर्गुण, परम, केवल आनन्दस्वरूप, अव्यग्र, अविकारी और निरहंकार ब्रह्म हैं।"

श्लोक 17 (shiva.rudra.112.17)

विश्वस्य हेतुरुदयस्थितिसंयमनस्य हि । तदपेक्षतयात्मेशोऽनपेक्षः सर्वदा विभुः

viśvasya heturudayasthitisaṁyamanasya hi tadapekṣatayātmeśo'napekṣaḥ sarvadā vibhuḥ

"आप ही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण हैं; उसकी अपेक्षा से आत्मेश्वर कहलाते हुए भी आप सदा स्वयं अनपेक्ष एवं सर्वव्यापी हैं।"

श्लोक 18 (shiva.rudra.112.18)

एकस्त्वमेव सदसद् द्वयमद्वयमेव च । स्वर्णं कृताकृतमिव वस्तुभेदो न चैव हि

ekastvameva sadasad dvayamadvayameva ca svarṇaṁ kṛtākṛtamiva vastubhedo na caiva hi

"आप ही एक हैं -- सत्-असत्, द्वैत और अद्वैत भी; जैसे स्वर्ण गढ़ा हुआ या अगढ़ा हो, वस्तुतः उसमें कोई भेद नहीं होता।"

श्लोक 19 (shiva.rudra.112.19)

अज्ञानतस्त्वयि जनैर्विकल्पो विदितो यतः । तस्माद् भ्रमप्रतीकारो निरुपाधेर्न हि स्वतः

ajñānatastvayi janairvikalpo vidito yataḥ tasmād bhramapratīkāro nirupādherna hi svataḥ

"अज्ञानवश ही लोगों को आपमें भेद प्रतीत होता है; अतः जो उपाधिरहित है, उसमें यह भ्रम अपने-आप दूर करने योग्य नहीं है (वह स्वतः निरुपाधि है)।"

श्लोक 20 (shiva.rudra.112.20)

धन्या वयं महेशान तव दर्शनमात्रतः । दृढभक्तजनानन्दप्रदः शम्भो दयां कुरु

dhanyā vayaṁ maheśāna tava darśanamātrataḥ dṛḍhabhaktajanānandapradaḥ śambho dayāṁ kuru

"हे महेशान! आपके दर्शनमात्र से हम धन्य हो गए; हे शम्भो! अपने दृढ़ भक्तों को आनन्द देने वाले, हम पर दया कीजिए।"

श्लोक 21 (shiva.rudra.112.21)

त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतेस्त्वं परः पुमान् । विश्वेश्वरो जगन्नाथो निर्विकारः परात्परः

tvamādistvamanādiśca prakṛtestvaṁ paraḥ pumān viśveśvaro jagannātho nirvikāraḥ parātparaḥ

"आप ही आदि हैं और आप ही अनादि भी; आप प्रकृति से परे पुरुष, विश्वेश्वर, जगन्नाथ, निर्विकार तथा परात्पर हैं।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.112.22)

योऽयं ब्रह्मास्ति रजसा विश्वमूर्तिः पितामहः । त्वत्प्रसादात्प्रभो विष्णुः सत्त्वेन पुरुषोत्तमः

yo'yaṁ brahmāsti rajasā viśvamūrtiḥ pitāmahaḥ tvatprasādātprabho viṣṇuḥ sattvena puruṣottamaḥ

"आपकी कृपा से ही, हे प्रभो! रजोगुण से यह ब्रह्मा विश्वमूर्ति पितामह है, और सत्त्वगुण से विष्णु पुरुषोत्तम हैं।"

श्लोक 23 (shiva.rudra.112.23)

कालाग्निरुद्रस्तमसा परमात्मा गुणैः परः । सदा शिवो महेशानःसर्वव्यापी महेश्वरः

kālāgnirudrastamasā paramātmā guṇaiḥ paraḥ sadā śivo maheśānaḥsarvavyāpī maheśvaraḥ

"तमोगुण से आप ही कालाग्नि रुद्र हैं, किन्तु परमात्मस्वरूप में गुणों से परे हैं -- सदा शिव, महेशान, सर्वव्यापी महेश्वर।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.112.24)

व्यक्तं महच्च भूतादिस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । त्वयैवाधिष्ठितान्येव विश्वमूर्ते महेश्वर

vyaktaṁ mahacca bhūtādistanmātrāṇīndriyāṇi ca tvayaivādhiṣṭhitānyeva viśvamūrte maheśvara

"हे विश्वमूर्ते महेश्वर! व्यक्त जगत्, महत्तत्त्व, भूतादि, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ -- ये सब आपके ही अधिष्ठान में हैं।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.112.25)

महादेव परेशान करुणाकर शङ्कर । प्रसीद देवदेवेश प्रसीद पुरुषोत्तम

mahādeva pareśāna karuṇākara śaṅkara prasīda devadeveśa prasīda puruṣottama

"हे महादेव! हे परेशान! हे करुणाकर! हे शङ्कर! प्रसन्न होइए, हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए, हे पुरुषोत्तम!"

श्लोक 26 (shiva.rudra.112.26)

वासांसि सागराः सप्त दिशश्चैव महाभुजाः । द्यौर्मूर्धा ते विभोर्नाभिः खं वायुर्नासिका ततः

vāsāṁsi sāgarāḥ sapta diśaścaiva mahābhujāḥ dyaurmūrdhā te vibhornābhiḥ khaṁ vāyurnāsikā tataḥ

"सातों समुद्र आपके वस्त्र हैं और महाभुजाएँ दिशाएँ हैं; हे विभो! स्वर्ग आपका मस्तक, आकाश नाभि और वायु नासिका है।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.112.27)

चक्षूंष्यग्नी रविस्सोमः केशा मेघास्तव प्रभो । नक्षत्रतारकाद्याश्च ग्रहाश्चैव विभूषणम्

cakṣūṁṣyagnī ravissomaḥ keśā meghāstava prabho nakṣatratārakādyāśca grahāścaiva vibhūṣaṇam

"हे प्रभो! अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं, मेघ आपके केश हैं, तथा नक्षत्र, तारे और ग्रह आपके आभूषण हैं।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.112.28)

कथं स्तोष्यामि देवेश त्वां विभो परमेश्वर । वाचामगोचरोऽसि त्वं मनसा चापि शङ्कर

kathaṁ stoṣyāmi deveśa tvāṁ vibho parameśvara vācāmagocaro'si tvaṁ manasā cāpi śaṅkara

"हे देवेश! हे विभो! हे परमेश्वर! मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? हे शङ्कर! आप तो वाणी और मन दोनों की पहुँच से परे हैं।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.112.29)

पञ्चास्याय च रुद्राय पञ्चाशत्कोटिमूर्तये । त्र्यधिपाय वरिष्ठाय विद्यातत्त्वाय ते नमः

pañcāsyāya ca rudrāya pañcāśatkoṭimūrtaye tryadhipāya variṣṭhāya vidyātattvāya te namaḥ

"पंचमुख, पचास कोटि मूर्तियों वाले, त्रिलोक के अधिपति, सर्वश्रेष्ठ, विद्यातत्त्वस्वरूप रुद्र को नमस्कार है।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.112.30)

अनिर्देश्याय नित्याय विद्युज्ज्वालाय रूपिणे । अग्निवर्णाय देवाय शङ्कराय नमो नमः

anirdeśyāya nityāya vidyujjvālāya rūpiṇe agnivarṇāya devāya śaṅkarāya namo namaḥ

"अनिर्देश्य, नित्य, विद्युत्-ज्वाला के समान रूप वाले, अग्निवर्ण देव शङ्कर को बारम्बार नमस्कार है।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.112.31)

विद्युत्कोटिप्रतीकाशमष्टकोणं सुशोभनम् । रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय नमो नमः

vidyutkoṭipratīkāśamaṣṭakoṇaṁ suśobhanam rūpamāsthāya loke'smin saṁsthitāya namo namaḥ

"करोड़ों बिजलियों के समान कान्तिमान्, अष्टकोण, अत्यन्त सुशोभित रूप धारण कर इस लोक में स्थित आपको बारम्बार नमस्कार है।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.112.32)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तेषां प्रसन्नः परमेश्वरः । ब्रह्मणे मे ददौ शीघ्रमभयं भक्तवत्सलः

brahmovāca ityākarṇya vacasteṣāṁ prasannaḥ parameśvaraḥ brahmaṇe me dadau śīghramabhayaṁ bhaktavatsalaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- "उनकी यह वाणी सुनकर भक्तवत्सल परमेश्वर प्रसन्न हुए और तुरन्त मुझ ब्रह्मा को अभय प्रदान किया।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.112.33)

अथ सर्वे सुरास्तत्र विष्ण्वाद्या मुनयस्तथा । अभवन्सुस्मितास्तात चक्रुश्च परमोत्सवम्

atha sarve surāstatra viṣṇvādyā munayastathā abhavansusmitāstāta cakruśca paramotsavam

"हे तात! तब वहाँ विष्णु आदि सभी देवगण और मुनिगण मुस्कुराते हुए परम उत्सव मनाने लगे।"

श्लोक 34 (shiva.rudra.112.34)

मम तद्रेतसा तात मर्दितेन मुहुर्मुहुः । अभवन्कणकास्तत्र भूरिशः परमोज्ज्वलाः

mama tadretasā tāta marditena muhurmuhuḥ abhavankaṇakāstatra bhūriśaḥ paramojjvalāḥ

"हे तात! बार-बार मसले जाने से मेरे उस वीर्य से वहाँ अनेक अत्यन्त तेजस्वी कण उत्पन्न हुए।"

श्लोक 35 (shiva.rudra.112.35)

ऋषयो बहवो जाता बालखिल्याः सहस्रशः । कणकैस्तैश्च वीर्यस्य प्रज्वलद्भिः स्वतेजसा

ṛṣayo bahavo jātā bālakhilyāḥ sahasraśaḥ kaṇakaistaiśca vīryasya prajvaladbhiḥ svatejasā

"अपने तेज से प्रज्वलित उन्हीं वीर्य-कणों से सहस्रों बालखिल्य नामक ऋषि उत्पन्न हुए।"

श्लोक 36 (shiva.rudra.112.36)

अथ ते ऋषयः सर्वे उपतस्थुस्तदा मुने । ममान्तिकं परप्रीत्या तात तातेति चाब्रुवन्

atha te ṛṣayaḥ sarve upatasthustadā mune mamāntikaṁ paraprītyā tāta tāteti cābruvan

"हे मुने! तब वे सभी ऋषि परम प्रेम से मेरे निकट आकर 'तात, तात' कहने लगे।"

श्लोक 37 (shiva.rudra.112.37)

ईश्वरेच्छाप्रयुक्तेन प्रोक्तास्ते नारदेन हि । बालखिल्यास्तु ते तत्र कोपयुक्तेन चेतसा

īśvarecchāprayuktena proktāste nāradena hi bālakhilyāstu te tatra kopayuktena cetasā

"तब ईश्वर की इच्छा से प्रेरित नारद ने क्रुद्ध चित्त से उन बालखिल्यों को यह कहा।"

श्लोक 38 (shiva.rudra.112.38)

नारद उवाच । गच्छध्वं सङ्गता यूयं पर्वतं गन्धमादनम् । न स्थातव्यं भवद्भिश्च न हि वोऽत्र प्रयोजनम्

nārada uvāca gacchadhvaṁ saṅgatā yūyaṁ parvataṁ gandhamādanam na sthātavyaṁ bhavadbhiśca na hi vo'tra prayojanam

नारद ने कहा -- "तुम सब एक साथ गन्धमादन पर्वत पर जाओ; यहाँ तुम्हें रुकना नहीं चाहिए, इससे तुम्हारा कोई प्रयोजन नहीं है।"

श्लोक 39 (shiva.rudra.112.39)

तत्र तप्त्वा तपश्चाति भवितारो मुनीश्वराः । सूर्यशिष्याः शिवस्यैवाज्ञया मे कथितं त्विदम्

tatra taptvā tapaścāti bhavitāro munīśvarāḥ sūryaśiṣyāḥ śivasyaivājñayā me kathitaṁ tvidam

"वहाँ घोर तपस्या करके तुम महान् मुनीश्वर और सूर्य के शिष्य बनोगे; यह मैंने शिव की ही आज्ञा से तुम्हें बताया है।"

श्लोक 40 (shiva.rudra.112.40)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्तास्ते तदा सर्वे बालखिल्याश्च पर्वतम् । सत्वरं प्रययुर्नत्वा शङ्करं गन्धमादनम्

brahmovāca ityuktāste tadā sarve bālakhilyāśca parvatam satvaraṁ prayayurnatvā śaṅkaraṁ gandhamādanam

ब्रह्मा जी ने कहा -- "यह सुनकर वे सभी बालखिल्य शीघ्र ही शङ्कर को प्रणाम कर गन्धमादन पर्वत की ओर चले गए।"

श्लोक 41 (shiva.rudra.112.41)

विष्ण्वादिभिस्तदाभूवं श्वासितोऽहं मुनीश्वर । निर्भयः परमेशानप्रेरितैस्तैर्महात्मभिः

viṣṇvādibhistadābhūvaṁ śvāsito'haṁ munīśvara nirbhayaḥ parameśānapreritaistairmahātmabhiḥ

"हे मुनीश्वर! तब परमेश्वर की प्रेरणा से उन महात्मा विष्णु आदि ने मुझे सांत्वना देकर निर्भय कर दिया।"

श्लोक 42 (shiva.rudra.112.42)

अस्तवं चापि सर्वेशं शङ्करं भक्तवत्सलम् । सर्वकार्यकरं ज्ञात्वा दुष्टगर्वापहारकम्

astavaṁ cāpi sarveśaṁ śaṅkaraṁ bhaktavatsalam sarvakāryakaraṁ jñātvā duṣṭagarvāpahārakam

"भक्तवत्सल, दुष्ट-गर्व-नाशक तथा सब कार्यों के कर्ता शंकर को जानकर मैंने भी सर्वेश की स्तुति की।"

श्लोक 43 (shiva.rudra.112.43)

देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो । त्वमेव कर्ता सर्वस्य भर्ता हर्ता च सर्वथा

devadeva mahādeva karuṇāsāgara prabho tvameva kartā sarvasya bhartā hartā ca sarvathā

"हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणासागर! हे प्रभो! आप ही सबके सर्वथा कर्ता, भर्ता और हर्ता हैं।"

श्लोक 44 (shiva.rudra.112.44)

त्वदिच्छया हि सकलं स्थितं हि सचराचरम् । तन्त्यां यथा बलीवर्दा मया ज्ञातं विशेषतः

tvadicchayā hi sakalaṁ sthitaṁ hi sacarācaram tantyāṁ yathā balīvardā mayā jñātaṁ viśeṣataḥ

"आपकी ही इच्छा से यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उसी प्रकार स्थित है जैसे बैल रस्सी से बँधे रहते हैं -- यह मैंने विशेष रूप से जान लिया है।"

श्लोक 45 (shiva.rudra.112.45)

इत्येवमुक्त्वा सोऽहं वै प्रणामं च कृताञ्जलिः । अन्येऽपि तुष्टुवुः सर्वे विष्ण्वाद्यास्तं महेश्वरम्

ityevamuktvā so'haṁ vai praṇāmaṁ ca kṛtāñjaliḥ anye'pi tuṣṭuvuḥ sarve viṣṇvādyāstaṁ maheśvaram

"ऐसा कहकर हाथ जोड़े हुए मैंने प्रणाम किया; और विष्णु आदि सभी अन्य देवताओं ने भी उन महेश्वर की स्तुति की।"

श्लोक 46 (shiva.rudra.112.46)

अथाकर्ण्य नुतिं शुद्धां मम दीनतया तदा । विष्ण्वादीनाञ्च सर्वेषां प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः

athākarṇya nutiṁ śuddhāṁ mama dīnatayā tadā viṣṇvādīnāñca sarveṣāṁ prasanno'bhūnmaheśvaraḥ

"तब मेरी दीनतापूर्ण शुद्ध स्तुति तथा विष्णु आदि सबकी स्तुति सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गए।"

श्लोक 47 (shiva.rudra.112.47)

ददौ सोऽतिवरं मह्यमभयं प्रीतमानसः । सर्वे सुखमतीवापुरत्यामोदमहं मुने

dadau so'tivaraṁ mahyamabhayaṁ prītamānasaḥ sarve sukhamatīvāpuratyāmodamahaṁ mune

"प्रीतचित्त होकर उन्होंने मुझे अभय का उत्तम वर दिया; और हे मुने! सभी को अत्यन्त सुख प्राप्त हुआ तथा मुझे भी परम आनन्द मिला।"

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