रुद्र संहिता · अध्याय 117
पतिव्रता-धर्म-वर्णन
श्लोक 1 (shiva.rudra.117.1)
ब्रह्मोवाच । अथ सप्तर्षयस्ते च प्रोचुर्हिमगिरीश्वरम् । कारय स्वात्मजादेव्या यात्रामद्योचितां गिरे
brahmovāca atha saptarṣayaste ca procurhimagirīśvaram kāraya svātmajādevyā yātrāmadyocitāṁ gire
ब्रह्मा जी ने कहा -- "तत्पश्चात् उन सप्तर्षियों ने हिमगिरीश्वर से कहा -- 'हे पर्वत! आज अपनी पुत्री देवी की उचित यात्रा (विदाई) कराइए।'"
श्लोक 2 (shiva.rudra.117.2)
इति श्रुत्वा गिरीशो हि बुद्ध्वा तद्विरहं परम् । विषण्णोऽभून्महाप्रेम्णा कियत्कालं मुनीश्वर
iti śrutvā girīśo hi buddhvā tadvirahaṁ param viṣaṇṇo'bhūnmahāpremṇā kiyatkālaṁ munīśvara
"हे मुनीश्वर! यह सुनकर और उससे होने वाले वियोग की गहराई को समझकर पर्वतेश महाप्रेमवश कुछ समय के लिए विषण्ण हो गए।"
श्लोक 3 (shiva.rudra.117.3)
कियत्कालेन सम्प्राप्य चेतनां शैलराट् ततः । तथास्त्विति गिरामुक्त्वा मेनां सन्देशमब्रवीत्
kiyatkālena samprāpya cetanāṁ śailarāṭ tataḥ tathāstviti girāmuktvā menāṁ sandeśamabravīt
"कुछ समय बाद चेत प्राप्त कर पर्वतराज ने 'तथास्तु' कहकर मेना को यह संदेश सुनाया।"
श्लोक 4 (shiva.rudra.117.4)
शैलसन्देशमाकर्ण्य हर्षशोकवशा मुने । मेना संयापयामास कर्तुमासीत्समुद्यता
śailasandeśamākarṇya harṣaśokavaśā mune menā saṁyāpayāmāsa kartumāsītsamudyatā
"हे मुने! पर्वत का संदेश सुनकर हर्ष और शोक दोनों से युक्त मेना उसे पूरा करने के लिए तैयार हो गई।"
श्लोक 5 (shiva.rudra.117.5)
श्रुतिस्वकुलजाचारं चचार विधिवन्मुने । उत्सवं विविधं तत्र सा मेना क्षितिभृत्प्रिया
śrutisvakulajācāraṁ cacāra vidhivanmune utsavaṁ vividhaṁ tatra sā menā kṣitibhṛtpriyā
"हे मुने! उसने अपने कुल में प्रचलित रीति के अनुसार विधिपूर्वक कार्य किया; और पर्वत की प्रिया मेना ने वहाँ नाना प्रकार के उत्सव किए।"
श्लोक 6 (shiva.rudra.117.6)
गिरिजां भूषयामास नानारत्नांशुकैर्वरैः । द्वादशाभरणैश्चैव शृङ्गारैर्नृपसम्मितैः
girijāṁ bhūṣayāmāsa nānāratnāṁśukairvaraiḥ dvādaśābharaṇaiścaiva śṛṅgārairnṛpasammitaiḥ
"उसने गिरिजा को नाना उत्तम रत्न-वस्त्रों, बारह आभूषणों तथा राजोचित शृंगारों से सुसज्जित किया।"
श्लोक 7 (shiva.rudra.117.7)
मेनामनोगतिं बुद्ध्वा साध्व्येका द्विजकामिनी । गिरिजां शिक्षयामास पातिव्रत्यव्रतं परम्
menāmanogatiṁ buddhvā sādhvyekā dvijakāminī girijāṁ śikṣayāmāsa pātivratyavrataṁ param
"मेना के मन की गति को जानकर एक साध्वी ब्राह्मण-पत्नी ने गिरिजा को पातिव्रत्य के परम व्रत की शिक्षा दी।"
श्लोक 8 (shiva.rudra.117.8)
द्विजपत्न्युवाच । गिरिजे शृणु सुप्रीत्या मद्वचो धर्मवर्धनम् । इहामुत्रानन्दकरं शृण्वतां च सुखप्रदम्
dvijapatnyuvāca girije śṛṇu suprītyā madvaco dharmavardhanam ihāmutrānandakaraṁ śṛṇvatāṁ ca sukhapradam
द्विजपत्नी ने कहा -- "हे गिरिजे! मेरे इस धर्मवर्धक वचन को प्रेमपूर्वक सुनो, जो इस लोक और परलोक दोनों में आनन्दकारी तथा सुनने वालों को सुख देने वाला है।"
श्लोक 9 (shiva.rudra.117.9)
धन्या पतिव्रता नारी नान्या पूज्या विशेषतः । पावनी सर्वलोकानां सर्वपापौघनाशिनी
dhanyā pativratā nārī nānyā pūjyā viśeṣataḥ pāvanī sarvalokānāṁ sarvapāpaughanāśinī
"पतिव्रता नारी धन्य है, वह विशेष रूप से पूजनीय है, वह समस्त लोकों को पवित्र करने वाली तथा सभी पापों के समूह का नाश करने वाली है।"
श्लोक 10 (shiva.rudra.117.10)
सेवते या पतिं प्रेम्णा परमेश्वरवच्छिवे । इह भुक्त्वाखिलान् भोगानन्ते पत्या शिवां गतिम्
sevate yā patiṁ premṇā parameśvaravacchive iha bhuktvākhilān bhogānante patyā śivāṁ gatim
"हे शिवे! जो प्रेमपूर्वक परमेश्वर के समान अपने पति की सेवा करती है, वह यहाँ सब भोगों को भोगकर अन्त में अपने पति के साथ शिव-गति को प्राप्त होती है।"
श्लोक 11 (shiva.rudra.117.11)
पतिव्रता च सावित्री लोपामुद्रा ह्यरुन्धती । शाण्डिल्या शतरूपानसूया लक्ष्मीः स्वधा सती
pativratā ca sāvitrī lopāmudrā hyarundhatī śāṇḍilyā śatarūpānasūyā lakṣmīḥ svadhā satī
"सावित्री, लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिल्या, शतरूपा, अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा तथा सती -- ये पतिव्रता हैं।"
श्लोक 12 (shiva.rudra.117.12)
संज्ञा च सुमतिः श्रद्धा मेना स्वाहा तथैव च । अन्या बह्व्योऽपि साध्व्यो हि नोक्ता विस्तारजाद्भयात्
saṁjñā ca sumatiḥ śraddhā menā svāhā tathaiva ca anyā bahvyo'pi sādhvyo hi noktā vistārajādbhayāt
"संज्ञा, सुमति, श्रद्धा, मेना तथा स्वाहा भी इसी प्रकार; अनेक अन्य साध्वी स्त्रियाँ भी हैं, विस्तार के भय से जिनका उल्लेख नहीं किया।"
श्लोक 13 (shiva.rudra.117.13)
पातिव्रत्यवृषेणैव ता गताः सर्वपूज्यताम् । ब्रह्मविष्णुहरैश्चापि मान्या जाता मुनीश्वरैः
pātivratyavṛṣeṇaiva tā gatāḥ sarvapūjyatām brahmaviṣṇuharaiścāpi mānyā jātā munīśvaraiḥ
"पातिव्रत्य के इस व्रत से ही वे सर्वपूज्य हुईं, और ब्रह्मा, विष्णु, हर तथा मुनीश्वरों द्वारा भी सम्मानित हुईं।"
श्लोक 14 (shiva.rudra.117.14)
सेव्यस्त्वया पतिस्तस्मात्सर्वदा शङ्करः प्रभुः । दीनानुग्रहकर्ता च सर्वसेव्यः सतां गतिः
sevyastvayā patistasmātsarvadā śaṅkaraḥ prabhuḥ dīnānugrahakartā ca sarvasevyaḥ satāṁ gatiḥ
"इसलिए तुम्हारे लिए सर्वदा सेव्य पति प्रभु शंकर हैं, जो दीनों पर अनुग्रह करने वाले, सबके सेव्य तथा सज्जनों की गति हैं।"
श्लोक 15 (shiva.rudra.117.15)
महान्पतिव्रताधर्मः श्रुतिस्मृतिषु नोदितः । यथैष वर्ण्यते श्रेष्ठो न तथान्योऽस्ति निश्चितम्
mahānpativratādharmaḥ śrutismṛtiṣu noditaḥ yathaiṣa varṇyate śreṣṭho na tathānyo'sti niścitam
"श्रुति और स्मृति में पातिव्रत्य-धर्म को महान् कहा गया है; जैसा यह श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसा निश्चय ही अन्य कोई नहीं है।"
श्लोक 16 (shiva.rudra.117.16)
भुञ्ज्याद्भुक्ते प्रिये पत्यौ पातिव्रत्यपरायणा । तिष्ठेत्तस्मिंञ्छिवे नारी सर्वथा सति तिष्ठति
bhuñjyādbhukte priye patyau pātivratyaparāyaṇā tiṣṭhettasmiṁñchive nārī sarvathā sati tiṣṭhati
"हे शिवे! पातिव्रत्य में तत्पर स्त्री को प्रिय पति के खा लेने पर ही भोजन करना चाहिए; जब तक वे जीवित हैं, वह सर्वथा उनके अनुसार आचरण करे।"
श्लोक 17 (shiva.rudra.117.17)
स्वप्यात्स्वपिति सा नित्यं बुध्येत्तु प्रथमं सुधीः । सर्वदा तद्धितं कुर्यादकैतवगतिः प्रिया
svapyātsvapiti sā nityaṁ budhyettu prathamaṁ sudhīḥ sarvadā taddhitaṁ kuryādakaitavagatiḥ priyā
"वह तभी सोए जब पति सो जाए, किन्तु बुद्धिमती नारी को सदा पहले जागना चाहिए; निष्कपट प्रिया सदा उनका हित ही करे।"
श्लोक 18 (shiva.rudra.117.18)
अनलङ्कृतमात्मानं दर्शयेन्न क्वचिच्छिवे । कार्यार्थं प्रोषिते तस्मिन् भवेन्मण्डनवर्जिता
analaṅkṛtamātmānaṁ darśayenna kvacicchive kāryārthaṁ proṣite tasmin bhavenmaṇḍanavarjitā
"हे शिवे! उसे कभी अपने आप को बिना शृंगार के न दिखाना चाहिए; परन्तु पति के कार्यवश परदेश जाने पर वह शृंगार से रहित रहे।"
श्लोक 19 (shiva.rudra.117.19)
पत्युर्नाम न गृह्णीयात् कदाचन पतिव्रता । आक्रुष्टापि न चाक्रोशेत्प्रसीदेत्ताडितापि च ॥ हन्यतामिति च ब्रूयात्स्वामिन्निति कृपां कुरु
patyurnāma na gṛhṇīyāt kadācana pativratā ākruṣṭāpi na cākrośetprasīdettāḍitāpi ca hanyatāmiti ca brūyātsvāminniti kṛpāṁ kuru
"पतिव्रता स्त्री को कभी भी अपने पति का नाम मुँह से नहीं लेना चाहिए; डाँटे जाने पर भी प्रतिवाद न करे, और मारे जाने पर भी शान्त रहे -- 'भले मुझे मार डालिए, हे स्वामिन्! दया कीजिए' -- ऐसा ही कहे।"
श्लोक 20 (shiva.rudra.117.20)
आहूता गृहकार्याणि त्यक्त्वा गच्छेत्तदन्तिकम् । सत्वरं साञ्जलिः प्रीत्या सुप्रणम्य वदेदिति
āhūtā gṛhakāryāṇi tyaktvā gacchettadantikam satvaraṁ sāñjaliḥ prītyā supraṇamya vadediti
"बुलाए जाने पर वह गृह-कार्य छोड़कर तुरन्त उनके पास प्रेमपूर्वक हाथ जोड़े, भलीभाँति प्रणाम करके यह कहे --"
श्लोक 21 (shiva.rudra.117.21)
किमर्थं व्याहृता नाथ स प्रसादो विधीयताम् । तदादिष्टा चरेत्कर्म सुप्रसन्नेन चेतसा
kimarthaṁ vyāhṛtā nātha sa prasādo vidhīyatām tadādiṣṭā caretkarma suprasannena cetasā
"'हे नाथ! किसलिए मुझे पुकारा? वह आज्ञा दीजिए।' और जो आदेश मिले, उसे अत्यन्त प्रसन्न मन से पूरा करे।"
श्लोक 22 (shiva.rudra.117.22)
चिरं तिष्ठेन्न च द्वारे गच्छेन्नैव परालये । आदाय तत्त्वं यत्किञ्चित्कस्मैचिन्नार्पयेत्क्वचित्
ciraṁ tiṣṭhenna ca dvāre gacchennaiva parālaye ādāya tattvaṁ yatkiñcitkasmaicinnārpayetkvacit
"वह द्वार पर देर तक न खड़ी रहे, न ही दूसरे के घर जाए; कोई भी वस्तु लेकर उसे बिना पति की सम्मति के किसी को न दे।"
श्लोक 23 (shiva.rudra.117.23)
पूजोपकरणं सर्वमनुक्ता साधयेत्स्वयम् । प्रतीक्षमाणावसरं यथाकालोचितं हितम्
pūjopakaraṇaṁ sarvamanuktā sādhayetsvayam pratīkṣamāṇāvasaraṁ yathākālocitaṁ hitam
"बिना कहे भी वह स्वयं ही पूजा की सारी सामग्री समय के अनुकूल, हितकारी ढंग से तैयार रखे।"
श्लोक 24 (shiva.rudra.117.24)
न गच्छेत्तीर्थयात्रां वै पत्याज्ञां न विना क्वचित् । दूरतो वर्जयेत्सा हि समाजोत्सवदर्शनम्
na gacchettīrthayātrāṁ vai patyājñāṁ na vinā kvacit dūrato varjayetsā hi samājotsavadarśanam
"पति की आज्ञा के बिना वह कभी तीर्थयात्रा पर न जाए; समाज के उत्सव-दर्शन से भी वह दूर ही रहे।"
श्लोक 25 (shiva.rudra.117.25)
तीर्थार्थिनी तु या नारी पतिपादोदकं पिबेत् । तस्मिन्सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्राणि च न संशयः
tīrthārthinī tu yā nārī patipādodakaṁ pibet tasminsarvāṇi tīrthāni kṣetrāṇi ca na saṁśayaḥ
"तीर्थ की इच्छा रखने वाली स्त्री को पति के चरणामृत का पान करना चाहिए; उसी में समस्त तीर्थ और क्षेत्र निहित हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।"
श्लोक 26 (shiva.rudra.117.26)
भुञ्ज्यात्सा भर्तुरुच्छिष्टमिष्टमन्नादिकं च यत् । महाप्रसाद इत्युक्त्वा पतिदत्तं पतिव्रता
bhuñjyātsā bharturucchiṣṭamiṣṭamannādikaṁ ca yat mahāprasāda ityuktvā patidattaṁ pativratā
"पतिव्रता स्त्री पति का जूठा तथा उनके द्वारा दिया गया प्रिय अन्न आदि 'महाप्रसाद' कहकर ग्रहण करे।"
श्लोक 27 (shiva.rudra.117.27)
अविभज्य न चाश्नीयाद्देवपित्रतिथिष्वपि । परिचारकवर्गेषु गोषु भिक्षुकुलेषु च
avibhajya na cāśnīyāddevapitratithiṣvapi paricārakavargeṣu goṣu bhikṣukuleṣu ca
"वह देवताओं, पितरों, अतिथियों, सेवकों, गायों तथा भिक्षुकुलों को हिस्सा दिए बिना स्वयं भोजन न करे।"
श्लोक 28 (shiva.rudra.117.28)
संयतोपस्करा दक्षा हृष्टा व्ययपराङ्मुखी । भवेत्सा सर्वदा देवी पतिव्रतपरायणा
saṁyatopaskarā dakṣā hṛṣṭā vyayaparāṅmukhī bhavetsā sarvadā devī pativrataparāyaṇā
"पातिव्रत्य में तत्पर वह देवी-सम स्त्री सदा गृह-सामग्री को व्यवस्थित रखे, कुशल और प्रसन्नचित्त रहे, तथा अनावश्यक व्यय से बचे।"
श्लोक 29 (shiva.rudra.117.29)
कुर्यात्पत्यननुज्ञाता नोपवासव्रतादिकम् । अन्यथा तत्फलं नास्ति परत्र नरकं व्रजेत्
kuryātpatyananujñātā nopavāsavratādikam anyathā tatphalaṁ nāsti paratra narakaṁ vrajet
"पति की आज्ञा के बिना वह उपवास-व्रत आदि न करे; अन्यथा उसका कोई फल नहीं होता और परलोक में वह नरक को जाती है।"
श्लोक 30 (shiva.rudra.117.30)
सुखपूर्वं सुखासीनं रममाणं यदृच्छया । आन्तरेष्वपि कार्येषु पतिं नोत्थापयेत्क्वचित्
sukhapūrvaṁ sukhāsīnaṁ ramamāṇaṁ yadṛcchayā āntareṣvapi kāryeṣu patiṁ notthāpayetkvacit
"जब पति सुखपूर्वक बैठा हो, इच्छानुसार आनन्दित हो रहा हो, तब उसे किसी भी घरेलू कार्य के लिए भी उठने को विवश न करे।"
श्लोक 31 (shiva.rudra.117.31)
क्लीबं वा दुरवस्थं वा व्याधितं वृद्धमेव च । सुखितं दुःखितं वापि पतिमेकं न लङ्घयेत्
klībaṁ vā duravasthaṁ vā vyādhitaṁ vṛddhameva ca sukhitaṁ duḥkhitaṁ vāpi patimekaṁ na laṅghayet
"चाहे पति नपुंसक हो, दुरवस्था में हो, रोगी हो, वृद्ध हो, सुखी हो या दुःखी हो -- वह अपने एकमात्र पति की कभी अवहेलना न करे।"
श्लोक 32 (shiva.rudra.117.32)
स्त्रीधर्मिणी त्रिरात्रं च स्वमुखं नैव दर्शयेत् । स्ववाक्यं श्रावयेन्नापि यावत्स्नानान्न शुध्यति
strīdharmiṇī trirātraṁ ca svamukhaṁ naiva darśayet svavākyaṁ śrāvayennāpi yāvatsnānānna śudhyati
"रजस्वला होने पर तीन रात तक वह अपना मुख न दिखाए, और स्नान से शुद्ध होने तक अपनी वाणी भी किसी को न सुनाए।"
श्लोक 33 (shiva.rudra.117.33)
सुस्नाता भर्तृवदनमीक्षेतान्यस्य न क्वचित् । अथवा मनसि ध्यात्वा पतिं भानुं विलोकयेत्
susnātā bhartṛvadanamīkṣetānyasya na kvacit athavā manasi dhyātvā patiṁ bhānuṁ vilokayet
"भलीभाँति स्नान करने के बाद वह पति के मुख को छोड़कर किसी अन्य को न देखे; अथवा मन में पति का ध्यान कर सूर्य को देखे।"
श्लोक 34 (shiva.rudra.117.34)
हरिद्राकुङ्कुमं चैव सिन्दूरं कज्जलादिकम् । कूर्पासकं च ताम्बूलं माङ्गल्याभरणादिकम्
haridrākuṅkumaṁ caiva sindūraṁ kajjalādikam kūrpāsakaṁ ca tāmbūlaṁ māṅgalyābharaṇādikam
"हल्दी, कुंकुम, सिन्दूर, काजल आदि, चोली, ताम्बूल तथा मांगल्य-आभूषण आदि --"
श्लोक 35 (shiva.rudra.117.35)
केशसंस्कारकबरीकरकर्णादिभूषणम् । भर्तुरायुष्यमिच्छन्ती दूरयेन्न पतिव्रता
keśasaṁskārakabarīkarakarṇādibhūṣaṇam bharturāyuṣyamicchantī dūrayenna pativratā
"-- केश-संस्कार, वेणी, हाथ-कान के आभूषण -- पति की दीर्घायु चाहने वाली पतिव्रता इन्हें कभी न छोड़े।"
श्लोक 36 (shiva.rudra.117.36)
न रजक्या न बन्धक्या तथा श्रमणया न च । न च दुर्भगया क्वापि सखित्वं कारयेत् क्वचित्
na rajakyā na bandhakyā tathā śramaṇayā na ca na ca durbhagayā kvāpi sakhitvaṁ kārayet kvacit
"वह कभी धोबिन से, वेश्या से, संन्यासिनी से अथवा अभागी स्त्री से मित्रता न करे।"
श्लोक 37 (shiva.rudra.117.37)
पतिविद्वेषिणीं नारीं न सा सम्भाषयेत् क्वचित् । नैकाकिनी क्वचित्तिष्ठेन्नग्ना स्नायान्न च क्वचित्
patividveṣiṇīṁ nārīṁ na sā sambhāṣayet kvacit naikākinī kvacittiṣṭhennagnā snāyānna ca kvacit
"पति से द्वेष रखने वाली स्त्री से वह कभी बातचीत न करे; कभी अकेली न रहे और कभी नग्न होकर स्नान न करे।"
श्लोक 38 (shiva.rudra.117.38)
नोलूखले न मुसले न वर्द्धन्यां दृषद्यपि । न यन्त्रके न देहल्यां सती च प्रवसेत् क्वचित्
nolūkhale na musale na varddhanyāṁ dṛṣadyapi na yantrake na dehalyāṁ satī ca pravaset kvacit
"साध्वी स्त्री ऊखल, मूसल, सिलबट्टे, चक्की, किसी यंत्र या देहली पर कभी न बैठे।"
श्लोक 39 (shiva.rudra.117.39)
विना व्यवायसमयं प्रागल्भ्यं नाचरेत् क्वचित् । यत्र यत्र रुचिर्भर्तुस्तत्र प्रेमवती भवेत्
vinā vyavāyasamayaṁ prāgalbhyaṁ nācaret kvacit yatra yatra rucirbhartustatra premavatī bhavet
"संभोग के समय के अतिरिक्त वह कभी उद्दंडता का आचरण न करे; पति की जहाँ भी रुचि हो, वहीं वह प्रेमपूर्वक हो।"
श्लोक 40 (shiva.rudra.117.40)
हृष्टाहृष्टे विषण्णा स्याद्विषण्णास्ये प्रिये प्रिया । पतिव्रता भवेद्देवी सदा पतिहितैषिणी
hṛṣṭāhṛṣṭe viṣaṇṇā syādviṣaṇṇāsye priye priyā pativratā bhaveddevī sadā patihitaiṣiṇī
"पति के प्रसन्न होने पर वह प्रसन्न रहे, उनके उदास होने पर वह भी उदास रहे; पातिव्रत्यपरायणा देवी-सम स्त्री सदा पति के हित की कामना करे।"
श्लोक 41 (shiva.rudra.117.41)
एकरूपा भवेत्पुण्या सम्पत्सु च विपत्सु च । विकृतिं स्वात्मनः क्वापि न कुर्याद्धैर्यधारिणी
ekarūpā bhavetpuṇyā sampatsu ca vipatsu ca vikṛtiṁ svātmanaḥ kvāpi na kuryāddhairyadhāriṇī
"संपत्ति और विपत्ति दोनों में वह पुण्यशीला स्त्री एक-सी रहे; धैर्यवती होकर वह कभी अपने में विकार न लाए।"
श्लोक 42 (shiva.rudra.117.42)
सर्पिर्लवणतैलादिक्षयेऽपि च पतिव्रता । पतिं नास्तीति न ब्रूयादायासेषु न योजयेत्
sarpirlavaṇatailādikṣaye'pi ca pativratā patiṁ nāstīti na brūyādāyāseṣu na yojayet
"घी, नमक, तेल आदि की कमी होने पर भी पतिव्रता स्त्री कभी 'कुछ नहीं है' न कहे और अपने पति को चिन्ता में न डाले।"
श्लोक 43 (shiva.rudra.117.43)
विधेर्विष्णोर्हराद्वापि पतिरेकोऽधिको मतः । पतिव्रताया देवेशि स्वपतिश्शिव एव च
vidherviṣṇorharādvāpi patireko'dhiko mataḥ pativratāyā deveśi svapatiśśiva eva ca
"पतिव्रता स्त्री के लिए ब्रह्मा, विष्णु या हर से भी बढ़कर पति ही माना जाता है; हे देवेशि! पतिव्रता का अपना पति ही साक्षात् शिव है।"
श्लोक 44 (shiva.rudra.117.44)
व्रतोपवासनियमं पतिमुल्लङ्घ्य याचरेत् । आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता निरयमृच्छति
vratopavāsaniyamaṁ patimullaṅghya yācaret āyuṣyaṁ harate bharturmṛtā nirayamṛcchati
"जो स्त्री पति की अवहेलना करके व्रत, उपवास, नियम आदि करती है, वह अपने पति की आयु घटाती है और मरकर नरक को जाती है।"
श्लोक 45 (shiva.rudra.117.45)
उक्ता प्रत्युत्तरं दद्याद्या नारी क्रोधतत्परा । सरमा जायते ग्रामे शृगाली निर्जने वने
uktā pratyuttaraṁ dadyādyā nārī krodhatatparā saramā jāyate grāme śṛgālī nirjane vane
"जो स्त्री कुछ कहे जाने पर क्रोधपूर्वक उत्तर देती है, वह गाँव में कुतिया और निर्जन वन में सियारिन बनकर जन्म लेती है।"
श्लोक 46 (shiva.rudra.117.46)
उच्चासनं न सेवेत न व्रजेद्दुष्टसन्निधौ । न च कातरवाक्यानि वदेन्नारी पतिं क्वचित्
uccāsanaṁ na seveta na vrajedduṣṭasannidhau na ca kātaravākyāni vadennārī patiṁ kvacit
"वह ऊँचे आसन का सेवन न करे, दुष्टों के समीप न जाए, और स्त्री को अपने पति से कभी भयभीत करने वाली बातें नहीं कहनी चाहिए।"
श्लोक 47 (shiva.rudra.117.47)
अपवादं न च ब्रूयात्कलहं दूरतस्त्यजेत् । गुरूणां सन्निधौ क्वापि नोच्चैर्ब्रूयान्न वै हसेत्
apavādaṁ na ca brūyātkalahaṁ dūratastyajet gurūṇāṁ sannidhau kvāpi noccairbrūyānna vai haset
"वह निंदा न करे, कलह से दूर रहे; गुरुजनों की उपस्थिति में वह कभी ऊँची आवाज़ में न बोले और न हँसे।"
श्लोक 48 (shiva.rudra.117.48)
बाह्यादायान्तमालोक्य त्वरितान्नजलाशनैः । ताम्बूलैर्वसनैश्चापि पादसंवाहनादिभिः
bāhyādāyāntamālokya tvaritānnajalāśanaiḥ tāmbūlairvasanaiścāpi pādasaṁvāhanādibhiḥ
"पति को बाहर से आते देखकर तुरन्त अन्न-जल आदि के भोजन से, ताम्बूल और वस्त्रों से, तथा पैर दबाने आदि से --"
श्लोक 49 (shiva.rudra.117.49)
तथैव चाटुवचनैः खेदसन्नोदनैः परैः । या प्रियं प्रीणयेत्प्रीता त्रिलोकी प्रीणिता तया
tathaiva cāṭuvacanaiḥ khedasannodanaiḥ paraiḥ yā priyaṁ prīṇayetprītā trilokī prīṇitā tayā
"-- तथा मधुर वचनों और थकान दूर करने वाली अन्य बातों से जो स्त्री प्रेमपूर्वक अपने प्रिय को प्रसन्न करती है, उसने मानो सारे त्रिलोक को प्रसन्न कर दिया।"
श्लोक 50 (shiva.rudra.117.50)
मितं ददाति जनको मितं भ्राता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं भर्तारं पूजयेत्सदा
mitaṁ dadāti janako mitaṁ bhrātā mitaṁ sutaḥ amitasya hi dātāraṁ bhartāraṁ pūjayetsadā
"पिता मात्रा में देता है, भाई मात्रा में देता है, पुत्र भी मात्रा में देता है; परन्तु असीम देने वाले पति की सदैव पूजा करनी चाहिए।"
श्लोक 51 (shiva.rudra.117.51)
भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च । तस्मात्सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्
bhartā devo gururbhartā dharmatīrthavratāni ca tasmātsarvaṁ parityajya patimekaṁ samarcayet
"पति ही देवता है, पति ही गुरु है, पति ही धर्म, तीर्थ और व्रत है; इसलिए सब कुछ त्यागकर स्त्री केवल पति की ही पूजा करे।"
श्लोक 52 (shiva.rudra.117.52)
या भर्तारं परित्यज्य रहश्चरति दुर्मतिः । उलूकी जायते क्रूरा वृक्षकोटरशायिनी
yā bhartāraṁ parityajya rahaścarati durmatiḥ ulūkī jāyate krūrā vṛkṣakoṭaraśāyinī
"जो दुर्बुद्धि स्त्री पति को त्यागकर गुप्त रूप से विचरण करती है, वह क्रूर उलूकी बनकर वृक्ष की कोटर में निवास करती है।"
श्लोक 53 (shiva.rudra.117.53)
ताडिता ताडितुं चेच्छेत्सा व्याघ्री वृषदंशिका । कटाक्षयति यान्यं वै केकराक्षी तु सा भवेत्
tāḍitā tāḍituṁ cecchetsā vyāghrī vṛṣadaṁśikā kaṭākṣayati yānyaṁ vai kekarākṣī tu sā bhavet
"मारे जाने पर जो मारना चाहती है, वह व्याघ्री या नेवली बनती है; जो किसी अन्य पर कटाक्ष करती है, वह भेंगी आँखों वाली होती है।"
श्लोक 54 (shiva.rudra.117.54)
या भर्तारं परित्यज्य मिष्टमश्नाति केवलम् । ग्रामे वा सूकरी भूयाद्वल्गुर्वापि स्वविड्भुजा
yā bhartāraṁ parityajya miṣṭamaśnāti kevalam grāme vā sūkarī bhūyādvalgurvāpi svaviḍbhujā
"जो स्त्री पति को छोड़कर अकेली मिष्टान्न खाती है, वह गाँव में सूअरी या अपनी विष्ठा खाने वाली सियारिन बनती है।"
श्लोक 55 (shiva.rudra.117.55)
या तुं कृत्य प्रियं ब्रूयान् मूका सा जायते खलु । या सपत्नीं सदेर्ष्येत दुर्भगा सा पुनः पुनः
yā tuṁ kṛtya priyaṁ brūyān mūkā sā jāyate khalu yā sapatnīṁ saderṣyeta durbhagā sā punaḥ punaḥ
"जो प्रिय के प्रति कठोर वचन कहती है, वह निश्चय ही गूँगी बनकर जन्म लेती है; जो सौत से सदा ईर्ष्या करती है, वह बार-बार अभागी बनती है।"
श्लोक 56 (shiva.rudra.117.56)
दृष्टिं विलुप्य भर्त्तुर्या कश्चिदन्यं समीक्षते । काणा च विमुखी चापि कुरूपापि च जायते
dṛṣṭiṁ vilupya bhartturyā kaścidanyaṁ samīkṣate kāṇā ca vimukhī cāpi kurūpāpi ca jāyate
"जो पति की दृष्टि बचाकर किसी अन्य पुरुष को देखती है, वह काणी, विरूप और कुरूप बनकर जन्म लेती है।"
श्लोक 57 (shiva.rudra.117.57)
जीवहीनो यथा देहः क्षणादशुचितां व्रजेत् । भर्तृहीना तथा योषित्सुस्नाताप्यशुचिः सदा
jīvahīno yathā dehaḥ kṣaṇādaśucitāṁ vrajet bhartṛhīnā tathā yoṣitsusnātāpyaśuciḥ sadā
"जैसे प्राणहीन शरीर क्षणभर में अपवित्र हो जाता है, वैसे ही पतिविहीन स्त्री भलीभाँति स्नान करने पर भी सदा अपवित्र ही रहती है।"
श्लोक 58 (shiva.rudra.117.58)
सा धन्या जननी लोके स धन्यो जनकः पिता । धन्यःस च पतिर्यस्य गृहे देवी पतिव्रता
sā dhanyā jananī loke sa dhanyo janakaḥ pitā dhanyaḥsa ca patiryasya gṛhe devī pativratā
"वह माता धन्य है, वह जनक पिता धन्य है, और वह पति धन्य है, जिसके घर में देवी-सम पतिव्रता स्त्री निवास करती है।"
श्लोक 59 (shiva.rudra.117.59)
पितृवंश्याः मातृवंश्याः पतिवंश्यास्त्रयस्त्रयः । पतिव्रतायाः पुण्येन स्वर्गे सौख्यानि भुञ्जते
pitṛvaṁśyāḥ mātṛvaṁśyāḥ pativaṁśyāstrayastrayaḥ pativratāyāḥ puṇyena svarge saukhyāni bhuñjate
"पिता के, माता के तथा पति के -- ये तीनों कुल पतिव्रता स्त्री के पुण्य से स्वर्ग में सुख भोगते हैं।"
श्लोक 60 (shiva.rudra.117.60)
शीलभङ्गेन दुर्वृत्ताः पातयन्ति कुलत्रयम् । पितुर्मातुस्तथा पत्युरिहामुत्रापि दुःखिता
śīlabhaṅgena durvṛttāḥ pātayanti kulatrayam piturmātustathā patyurihāmutrāpi duḥkhitā
"परन्तु शीलभंग करने वाली दुराचारिणी पिता, माता और पति -- तीनों कुलों को अधोगति में ले जाती है, और स्वयं इस लोक और परलोक दोनों में दुःखी होती है।"
श्लोक 61 (shiva.rudra.117.61)
पतिव्रतायाश्चरणो यत्र यत्र स्पृशेद्भुवम् । तत्र तत्र भवेत्सा हि पापहन्त्री सुपावनी
pativratāyāścaraṇo yatra yatra spṛśedbhuvam tatra tatra bhavetsā hi pāpahantrī supāvanī
"पतिव्रता स्त्री का चरण जिस-जिस पृथ्वी को स्पर्श करता है, वहाँ-वहाँ वह पाप का नाश करने वाली तथा परम पवित्र करने वाली होती है।"
श्लोक 62 (shiva.rudra.117.62)
विभुः पतिव्रतास्पर्शं कुरुते भानुमानपि । सोमो गन्धवहश्चापि स्वपावित्र्याय नान्यथा
vibhuḥ pativratāsparśaṁ kurute bhānumānapi somo gandhavahaścāpi svapāvitryāya nānyathā
"शक्तिशाली सूर्य, चन्द्रमा तथा वायु भी अपनी ही पवित्रता के लिए पतिव्रता स्त्री का स्पर्श चाहते हैं, अन्यथा नहीं।"
श्लोक 63 (shiva.rudra.117.63)
आपः पतिव्रतास्पर्शमभिलष्यन्ति सर्वदा । अद्य जाड्यविनाशो नो जातस्त्वद्यान्यपावनाः
āpaḥ pativratāsparśamabhilaṣyanti sarvadā adya jāḍyavināśo no jātastvadyānyapāvanāḥ
"जल सदा पतिव्रता स्त्री के स्पर्श की कामना करता है, यह सोचकर कि 'आज हमारी जड़ता नष्ट हो; इसके बिना अन्य सब अपवित्र ही हैं।'"
श्लोक 64 (shiva.rudra.117.64)
भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च । भार्या धर्मफलावाप्त्यै भार्या सन्तानवृद्धये
bhāryā mūlaṁ gṛhasthasya bhāryā mūlaṁ sukhasya ca bhāryā dharmaphalāvāptyai bhāryā santānavṛddhaye
"पत्नी गृहस्थ का मूल है, पत्नी सुख का मूल है; पत्नी धर्म का फल प्राप्त कराने वाली है, पत्नी संतान की वृद्धि कराने वाली है।"
श्लोक 65 (shiva.rudra.117.65)
गृहे गृहे न किं नार्यो रूपलावण्यगर्विताः । परं विश्वेशभक्त्यैव लभ्यते स्त्री पतिव्रता
gṛhe gṛhe na kiṁ nāryo rūpalāvaṇyagarvitāḥ paraṁ viśveśabhaktyaiva labhyate strī pativratā
"घर-घर में क्या रूप-लावण्य पर गर्व करने वाली स्त्रियाँ नहीं हैं? परन्तु सच्ची पतिव्रता स्त्री तो विश्वेश्वर की भक्ति से ही प्राप्त होती है।"
श्लोक 66 (shiva.rudra.117.66)
परलोकस्त्वयं लोको जीयते भार्यया द्वयम् । देवपित्रतिथीज्यादि नाभार्यः कर्म चार्हति
paralokastvayaṁ loko jīyate bhāryayā dvayam devapitratithījyādi nābhāryaḥ karma cārhati
"यह लोक तथा परलोक दोनों पत्नी के द्वारा ही जीते जाते हैं; बिना पत्नी के पुरुष देव, पितर और अतिथि आदि के कर्म का अधिकारी नहीं होता।"
श्लोक 67 (shiva.rudra.117.67)
गृहस्थः स हि विज्ञेयो यस्य गेहे पतिव्रता । ग्रस्यतेऽन्यान्प्रतिदिनं राक्षस्या जरया यथा
gṛhasthaḥ sa hi vijñeyo yasya gehe pativratā grasyate'nyānpratidinaṁ rākṣasyā jarayā yathā
"जिसके घर में पतिव्रता स्त्री हो, वही सच्चा गृहस्थ जानना चाहिए; अन्यथा वृद्धावस्था रूपी राक्षसी प्रतिदिन उसे निगलती जाती है।"
श्लोक 68 (shiva.rudra.117.68)
यथा गङ्गावगाहेन शरीरं पावनं भवेत् । तथा पतिव्रतां दृष्ट्वा सकलं पावनं भवेत्
yathā gaṅgāvagāhena śarīraṁ pāvanaṁ bhavet tathā pativratāṁ dṛṣṭvā sakalaṁ pāvanaṁ bhavet
"जैसे गंगा-स्नान से शरीर पवित्र होता है, वैसे ही पतिव्रता स्त्री का दर्शन करने मात्र से सब कुछ पवित्र हो जाता है।"
श्लोक 69 (shiva.rudra.117.69)
न गङ्गाया तया भेदो या नारी पतिदेवता । उमाशिवसमौ साक्षात्तस्मात्तौ पूजयेद्बुधः
na gaṅgāyā tayā bhedo yā nārī patidevatā umāśivasamau sākṣāttasmāttau pūjayedbudhaḥ
"जो नारी पति को ही देवता मानती है, उसमें और गंगा में कोई अन्तर नहीं है; वह दम्पति साक्षात् उमा-शिव के समान है, अतः बुद्धिमान् उन दोनों की पूजा करे।"
श्लोक 70 (shiva.rudra.117.70)
तारः पतिः श्रुतिर्नारी क्षमा सा स स्वयं तपः । फलं पतिः सत्क्रिया सा धन्यौ तौ दम्पती शिवे
tāraḥ patiḥ śrutirnārī kṣamā sā sa svayaṁ tapaḥ phalaṁ patiḥ satkriyā sā dhanyau tau dampatī śive
"हे शिवे! पति प्रणव (ॐ) है, स्त्री श्रुति है; वह क्षमा है, वे स्वयं तप हैं; पति फल है, वह सत्क्रिया है -- धन्य है वह दम्पति।"
श्लोक 71 (shiva.rudra.117.71)
एवं पतिव्रताधर्मो वर्णितस्ते गिरीन्द्रजे । तद्भेदान् शृणु सुप्रीत्या सावधानतयाद्य मे
evaṁ pativratādharmo varṇitaste girīndraje tadbhedān śṛṇu suprītyā sāvadhānatayādya me
"हे गिरीन्द्रजे! इस प्रकार तुम्हें पतिव्रता-धर्म का वर्णन किया गया; अब उसके भेदों को प्रेमपूर्वक तथा सावधानी से आज मुझसे सुनो।"
श्लोक 72 (shiva.rudra.117.72)
चतुर्विधास्ताः कथिता नार्यो देवि पतिव्रताः । उत्तमादिविभेदेन स्मरतां पापहारिकाः
caturvidhāstāḥ kathitā nāryo devi pativratāḥ uttamādivibhedena smaratāṁ pāpahārikāḥ
"हे देवि! उत्तम-आदि भेदों से पतिव्रता स्त्रियाँ चार प्रकार की कही गई हैं, जिनका स्मरण मात्र पापों का नाश करता है।"
श्लोक 73 (shiva.rudra.117.73)
उत्तमा मध्यमा चैव निकृष्टातिनिकृष्टिका । ब्रुवे तासां लक्षणानि सावधानतया शृणु
uttamā madhyamā caiva nikṛṣṭātinikṛṣṭikā bruve tāsāṁ lakṣaṇāni sāvadhānatayā śṛṇu
"उत्तमा, मध्यमा, निकृष्टा तथा अति-निकृष्टा -- मैं उनके लक्षण बताता हूँ, सावधानी से सुनो।"
श्लोक 74 (shiva.rudra.117.74)
स्वप्नेऽपि यन्मनो नित्यं स्वपतिं पश्यति ध्रुवम् । नान्यं परपतिं भद्रे उत्तमा सा प्रकीर्तिता
svapne'pi yanmano nityaṁ svapatiṁ paśyati dhruvam nānyaṁ parapatiṁ bhadre uttamā sā prakīrtitā
"हे भद्रे! जिसका मन स्वप्न में भी सदा निश्चय ही केवल अपने पति को ही देखता है, किसी अन्य पर-पुरुष को नहीं -- वह उत्तमा कही गई है।"
श्लोक 75 (shiva.rudra.117.75)
या पितृभ्रातृसुतवत् परं पश्यति सद्धिया । मध्यमा सा हि कथिता शैलजे वै पतिव्रता
yā pitṛbhrātṛsutavat paraṁ paśyati saddhiyā madhyamā sā hi kathitā śailaje vai pativratā
"हे शैलजे! जो सद्बुद्धि से अन्य पुरुष को पिता, भाई या पुत्र के समान देखती है, वह मध्यमा पतिव्रता कही गई है।"
श्लोक 76 (shiva.rudra.117.76)
बुद्ध्वा स्वधर्मं मनसा व्यभिचारं करोति न । निकृष्टा कथिता सा हि सुचरित्रा च पार्वति
buddhvā svadharmaṁ manasā vyabhicāraṁ karoti na nikṛṣṭā kathitā sā hi sucaritrā ca pārvati
"हे पार्वती! जो अपने धर्म को समझकर मन से व्यभिचार नहीं करती, वह सच्चरित्रा फिर भी निकृष्टा कही गई है।"
श्लोक 77 (shiva.rudra.117.77)
पत्युः कुलस्य च भयाद्व्यभिचारं करोति न । पतिव्रताऽधमा सा हि कथिता पूर्वसूरिभिः
patyuḥ kulasya ca bhayādvyabhicāraṁ karoti na pativratā'dhamā sā hi kathitā pūrvasūribhiḥ
"जो पति के कुल के भय से व्यभिचार नहीं करती, उसे प्राचीन आचार्यों ने अधमा पतिव्रता कहा है।"
श्लोक 78 (shiva.rudra.117.78)
चतुर्विधा अपि शिवे पापहन्त्र्यः पतिव्रताः । पावनाः सर्वलोकानामिहामुत्रापि हर्षिताः
caturvidhā api śive pāpahantryaḥ pativratāḥ pāvanāḥ sarvalokānāmihāmutrāpi harṣitāḥ
"हे शिवे! ये चारों ही प्रकार की पतिव्रता स्त्रियाँ पापनाशिनी, समस्त लोकों को पवित्र करने वाली तथा इस लोक और परलोक दोनों में हर्षित रहने वाली हैं।"
श्लोक 79 (shiva.rudra.117.79)
पातिव्रत्यप्रभावेणात्रिस्त्रिया त्रिसुरार्थनात् । जीवितो विप्र एको हि मृतो वाराहशापतः
pātivratyaprabhāveṇātristriyā trisurārthanāt jīvito vipra eko hi mṛto vārāhaśāpataḥ
"पातिव्रत्य के प्रभाव से ही अत्रि की पत्नी की तीनों देवताओं से की गई प्रार्थना पर वराह के शाप से मृत एक विप्र पुनः जीवित हो गया।"
श्लोक 80 (shiva.rudra.117.80)
एवं ज्ञात्वा शिवे नित्यं कर्तव्यं पतिसेवनम् । त्वया शैलात्मजे प्रीत्या सर्वकामप्रदं सदा
evaṁ jñātvā śive nityaṁ kartavyaṁ patisevanam tvayā śailātmaje prītyā sarvakāmapradaṁ sadā
"हे शिवे! यह सब जानकर, हे शैलात्मजे! तुम्हें सदा प्रेमपूर्वक पति की सेवा करनी चाहिए; यही सर्वकामप्रद है।"
श्लोक 81 (shiva.rudra.117.81)
जगदम्बा महेशी त्वं शिवः साक्षात्पतिस्तव । तव स्मरणतो नार्यो भवन्ति हि पतिव्रताः
jagadambā maheśī tvaṁ śivaḥ sākṣātpatistava tava smaraṇato nāryo bhavanti hi pativratāḥ
"तुम स्वयं जगदम्बा, महेशी हो, और शिव स्वयं तुम्हारे साक्षात् पति हैं; तुम्हारे स्मरण मात्र से ही स्त्रियाँ पतिव्रता बन जाती हैं।"
श्लोक 82 (shiva.rudra.117.82)
त्वदग्रे कथनेनानेन किं देवि प्रयोजनम् । तथापि कथितं मेऽद्य जगदाचारतः शिवे
tvadagre kathanenānena kiṁ devi prayojanam tathāpi kathitaṁ me'dya jagadācārataḥ śive
"हे देवि! तुम्हारे समक्ष यह सब कहने का क्या प्रयोजन? फिर भी, हे शिवे! मैंने आज यह लोकाचार के अनुसार ही कह दिया।"
श्लोक 83 (shiva.rudra.117.83)
ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा विररामासौ द्विजस्त्री सुप्रणम्य ताम् । शिवां मुदमतिप्राप पार्वती शङ्करप्रिया
brahmovāca ityuktvā virarāmāsau dvijastrī supraṇamya tām śivāṁ mudamatiprāpa pārvatī śaṅkarapriyā
ब्रह्मा जी ने कहा -- "ऐसा कहकर वह ब्राह्मण-पत्नी उन्हें भलीभाँति प्रणाम कर मौन हो गई; और शंकर-प्रिया पार्वती अत्यन्त आनन्दित हुईं।"