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रुद्र संहिता · अध्याय 120

शरवण में कार्तिकेय का जन्म

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121

श्लोक 1 (shiva.rudra.120.1)

ब्रह्मोवाच । तदाकर्ण्य महादेवो योगज्ञानविशारदः । त्यक्तकामो न तत्याज सम्भोगं पार्वतीभयात्

brahmovāca tadākarṇya mahādevo yogajñānaviśāradaḥ tyaktakāmo na tatyāja sambhogaṁ pārvatībhayāt

ब्रह्मा जी ने कहा — यह सुनकर योग-ज्ञान में निपुण महादेव, यद्यपि उन्होंने काम का त्याग कर दिया था, फिर भी पार्वती के भय से उन्होंने संभोग नहीं छोड़ा।

श्लोक 2 (shiva.rudra.120.2)

आजगाम गृहद्वारि सुराणां निकटं शिवः । दैत्येन पीडितानां च शङ्करो भक्तवत्सलः

ājagāma gṛhadvāri surāṇāṁ nikaṭaṁ śivaḥ daityena pīḍitānāṁ ca śaṅkaro bhaktavatsalaḥ

भक्तवत्सल शंकर, दैत्य से पीड़ित उन देवताओं के निकट, अपने गृह-द्वार पर आए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.120.3)

देवाःसर्वे प्रभुं दृष्ट्वा हरिणा च मया शिवम् । बभूबुः सुखिनश्चाति तदा वै भक्तवत्सलम्

devāḥsarve prabhuṁ dṛṣṭvā hariṇā ca mayā śivam babhūbuḥ sukhinaścāti tadā vai bhaktavatsalam

उस भक्तवत्सल प्रभु शिव को हरि और मेरे सहित देखकर सभी देवता अत्यंत सुखी हुए।

श्लोक 4 (shiva.rudra.120.4)

इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सुराणां भगवान्भवः । प्रत्युवाच विषण्णात्मा दूयमानेन चेतसा

ityākarṇya vacasteṣāṁ surāṇāṁ bhagavānbhavaḥ pratyuvāca viṣaṇṇātmā dūyamānena cetasā

देवताओं के इन वचनों को सुनकर खिन्नमन तथा व्यथित हृदय से भगवान् भव ने उत्तर दिया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.120.5)

प्रणम्य सुमहाप्रीत्या नतस्कन्धाश्च निर्जराः । तुष्टुवुः शङ्करं सर्वे मया च हरिणा मुने

praṇamya sumahāprītyā nataskandhāśca nirjarāḥ tuṣṭuvuḥ śaṅkaraṁ sarve mayā ca hariṇā mune

हे मुने! अत्यंत प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हुए, नत-कंधों वाले समस्त देवताओं ने मेरे और हरि के साथ शंकर की स्तुति की।

श्लोक 6 (shiva.rudra.120.6)

देवा ऊचुः । देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो । अन्तर्यामी हि सर्वेषां सर्वं जानासि शङ्कर

devā ūcuḥ devadeva mahādeva karuṇāsāgara prabho antaryāmī hi sarveṣāṁ sarvaṁ jānāsi śaṅkara

देवताओं ने कहा — हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणासागर प्रभो! आप सबके अंतर्यामी हैं, हे शंकर, आप सब कुछ जानते हैं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.120.7)

देवकार्यं कुरु विभो रक्ष देवान् महेश्वर । जहि दैत्यान् कृपां कृत्वा तारकादीन् महाप्रभो

devakāryaṁ kuru vibho rakṣa devān maheśvara jahi daityān kṛpāṁ kṛtvā tārakādīn mahāprabho

हे विभो! देवकार्य सम्पन्न कीजिए, हे महेश्वर! देवताओं की रक्षा कीजिए। हे महाप्रभो! कृपा करके तारक आदि दैत्यों का वध कीजिए।

श्लोक 8 (shiva.rudra.120.8)

शिव उवाच । हे विष्णो हे विधे देवाः सर्वेषां वो मनोगतिः । यद्भावि तद्भवत्येव कोऽपि नो तन्निवारकः

śiva uvāca he viṣṇo he vidhe devāḥ sarveṣāṁ vo manogatiḥ yadbhāvi tadbhavatyeva ko'pi no tannivārakaḥ

शिव ने कहा — हे विष्णो! हे विधे! हे देवगणो! मैं तुम सबकी मनोगति जानता हूँ। जो होनहार है वह होकर ही रहता है, उसे रोकने वाला कोई नहीं है।

श्लोक 9 (shiva.rudra.120.9)

यज्जातं तज्जातमेव प्रस्तुतं शृणुतामराः । शिवरेतस्खलितं वीर्यं को ग्रहीष्यति मेऽधुना

yajjātaṁ tajjātameva prastutaṁ śṛṇutāmarāḥ śivaretaskhalitaṁ vīryaṁ ko grahīṣyati me'dhunā

हे अमरो! जो हो चुका सो हो चुका, अब यह प्रसंग सुनो — मेरा जो वीर्य स्खलित हो चुका है, उसे अब कौन ग्रहण करेगा?

श्लोक 10 (shiva.rudra.120.10)

स गृह्णीयादिति प्रोच्य पातयामास तद्भुवि । अग्निर्भूत्वा कपोतो हि प्रेरितःसर्वनिर्जरैः

sa gṛhṇīyāditi procya pātayāmāsa tadbhuvi agnirbhūtvā kapoto hi preritaḥsarvanirjaraiḥ

"इसे कोई ग्रहण करे" ऐसा कहकर उन्होंने उसे भूमि पर गिरा दिया; तब समस्त देवताओं द्वारा प्रेरित होकर अग्नि कपोत का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.120.11)

अभक्षच्छाम्भवं वीर्यं चञ्च्वा तु निखिलं तदा । एतस्मिन्नन्तरे तत्राजगाम गिरिजा मुने

abhakṣacchāmbhavaṁ vīryaṁ cañcvā tu nikhilaṁ tadā etasminnantare tatrājagāma girijā mune

उसने अपनी चोंच से शम्भु के उस समस्त वीर्य को खा लिया; इसी बीच हे मुने! वहाँ गिरिजा आ पहुँचीं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.120.12)

शिवागमविलम्बे च ददर्श सुरपुङ्गवान् ॥ ज्ञात्वा तद्वृत्तमखिलं महाक्रोधयुता शिवा

śivāgamavilambe ca dadarśa surapuṅgavān jñātvā tadvṛttamakhilaṁ mahākrodhayutā śivā

शिव के आने में विलम्ब होने के कारण उन्होंने वहाँ श्रेष्ठ देवताओं को देखा, और सारा वृत्तांत जानकर अत्यंत क्रोधित हुई शिवा —

श्लोक 13 (shiva.rudra.120.13)

उवाच त्रिदशान् सर्वान् हरिप्रभृतिकाँस्तदा

uvāca tridaśān sarvān hariprabhṛtikā~stadā

— तब उन्होंने हरि आदि समस्त देवताओं से कहा।

श्लोक 14 (shiva.rudra.120.14)

देव्युवाच । रे रे सुरगणाःसर्वे यूयं दुष्टा विशेषतः । स्वार्थसंसाधका नित्यं तदर्थं परदुःखदाः

devyuvāca re re suragaṇāḥsarve yūyaṁ duṣṭā viśeṣataḥ svārthasaṁsādhakā nityaṁ tadarthaṁ paraduḥkhadāḥ

देवी ने कहा — अरे अरे समस्त देवगणो! तुम विशेष रूप से दुष्ट हो — सदैव अपने ही स्वार्थ की सिद्धि में लगे रहते हो, और उसी के लिए दूसरों को दुःख देते हो।

श्लोक 15 (shiva.rudra.120.15)

स्वार्थहेतोर्महेशानमाराध्य परमं प्रभुम् । नष्टं चक्रुर्मद्विहारं वन्ध्याऽभवमहं सुराः

svārthahetormaheśānamārādhya paramaṁ prabhum naṣṭaṁ cakrurmadvihāraṁ vandhyā'bhavamahaṁ surāḥ

अपने स्वार्थ के लिए परम प्रभु महेश की आराधना करके तुमने मेरी क्रीड़ा को नष्ट कर दिया — हे सुरो! तुम्हारे कारण मैं वन्ध्या हो गई।

श्लोक 16 (shiva.rudra.120.16)

मां विरोध्य सुखं नैव केषाञ्चिदपि निर्जराः । तस्माद्दुःखं भवेद्वो हि दुष्टानां त्रिदिवौकसाम्

māṁ virodhya sukhaṁ naiva keṣāñcidapi nirjarāḥ tasmādduḥkhaṁ bhavedvo hi duṣṭānāṁ tridivaukasām

मेरा विरोध करके किसी भी देवता को कभी सुख प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए हे दुष्ट स्वर्गवासियो! तुम्हें भी दुःख भोगना पड़ेगा।

श्लोक 17 (shiva.rudra.120.17)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा विष्णुप्रमुखान् सुरान् सर्वान् शशाप सा । प्रज्वलन्ती प्रकोपेन शैलराजसुता शिवा

brahmovāca ityuktvā viṣṇupramukhān surān sarvān śaśāpa sā prajvalantī prakopena śailarājasutā śivā

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर क्रोध से प्रज्वलित शैलराजपुत्री शिवा ने विष्णु आदि समस्त देवताओं को शाप दे दिया।

श्लोक 18 (shiva.rudra.120.18)

पार्वत्युवाच । अद्यप्रभृति देवानां वन्ध्या भार्या भवन्त्विति । देवाश्च दुःखिताःसन्तु निखिला मद्विरोधिनः

pārvatyuvāca adyaprabhṛti devānāṁ vandhyā bhāryā bhavantviti devāśca duḥkhitāḥsantu nikhilā madvirodhinaḥ

पार्वती ने कहा — आज से देवताओं की पत्नियाँ बांझ हो जाएँ, और मेरा विरोध करने वाले समस्त देवगण दुःखी रहें।

श्लोक 19 (shiva.rudra.120.19)

ब्रह्मोवाच । इति शप्त्वाखिलान्देवान् विष्ण्वाद्यान्सकलेश्वरी । उवाच पावकं क्रुद्धा भक्षकं शिवरेतसः

brahmovāca iti śaptvākhilāndevān viṣṇvādyānsakaleśvarī uvāca pāvakaṁ kruddhā bhakṣakaṁ śivaretasaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — विष्णु आदि समस्त देवताओं को इस प्रकार शाप देकर क्रुद्ध सकलेश्वरी ने शिव-वीर्य के भक्षक अग्नि से कहा।

श्लोक 20 (shiva.rudra.120.20)

पार्वत्युवाच । सर्वभक्षी भव शुचे पीडितात्मेति नित्यशः । शिवतत्त्वं न जानासि मूर्खोऽसि सुरकार्यकृत्

pārvatyuvāca sarvabhakṣī bhava śuce pīḍitātmeti nityaśaḥ śivatattvaṁ na jānāsi mūrkho'si surakāryakṛt

पार्वती ने कहा — हे शुचे! तू सदैव पीड़ित रहते हुए सर्वभक्षी बन जा। तू शिवतत्त्व को नहीं जानता, देवताओं का कार्य करने वाला मूर्ख है।

श्लोक 21 (shiva.rudra.120.21)

रे रे शठ महादुष्ट दुष्टानां दुष्टबोधवान् । अभक्षः शिववीर्यं यन्नाकार्षीरुचितं हितम्

re re śaṭha mahāduṣṭa duṣṭānāṁ duṣṭabodhavān abhakṣaḥ śivavīryaṁ yannākārṣīrucitaṁ hitam

अरे अरे नीच! हे महादुष्ट! दुष्टों को कुबुद्धि देने वाले! तूने शिव के वीर्य को खा लिया और उचित हितकारी कार्य नहीं किया।

श्लोक 22 (shiva.rudra.120.22)

ब्रह्मोवाच । इति शप्त्वा शिवा वह्निं सहेशेन नगात्मजा । जगाम स्वालयं शीघ्रमसन्तुष्टा ततो मुने

brahmovāca iti śaptvā śivā vahniṁ saheśena nagātmajā jagāma svālayaṁ śīghramasantuṣṭā tato mune

ब्रह्मा जी ने कहा — हे मुने! अग्नि को इस प्रकार शाप देकर असंतुष्ट पर्वतपुत्री शिवा शीघ्र ही ईश्वर सहित अपने धाम को चली गईं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.120.23)

गत्वा शिवा शिवं सम्यक् बोधयामास यत्नतः । अजीजनत्परं पुत्रं गणेशाख्यं मुनीश्वर

gatvā śivā śivaṁ samyak bodhayāmāsa yatnataḥ ajījanatparaṁ putraṁ gaṇeśākhyaṁ munīśvara

वहाँ जाकर शिवा ने प्रयत्नपूर्वक शिव को भलीभाँति समझाया, और हे मुनीश्वर! उन्होंने एक श्रेष्ठ पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम गणेश हुआ।

श्लोक 24 (shiva.rudra.120.24)

तद्वृत्तान्तमशेषं च वर्णयिष्ये मुनेऽग्रतः । इदानीं शृणु सुप्रीत्या गुहोत्पत्तिं वदाम्यहम्

tadvṛttāntamaśeṣaṁ ca varṇayiṣye mune'grataḥ idānīṁ śṛṇu suprītyā guhotpattiṁ vadāmyaham

उस समस्त वृत्तांत को मैं आगे कहूँगा, हे मुने। अभी प्रेमपूर्वक सुनो, मैं गुह (कार्तिकेय) के जन्म की कथा कहता हूँ।

श्लोक 25 (shiva.rudra.120.25)

पावकार्पितमन्नादि भुञ्जते निर्जराः खलु । वेदवाण्येति सर्वे ते सगर्भा अभवन्सुराः

pāvakārpitamannādi bhuñjate nirjarāḥ khalu vedavāṇyeti sarve te sagarbhā abhavansurāḥ

देवगण अग्नि में अर्पित अन्न आदि का ही भक्षण करते हैं — यह वेदवाणी है; इसी कारण वे सभी देवता गर्भवती हो गए।

श्लोक 26 (shiva.rudra.120.26)

ततोऽसहन्तस्तद्वीर्यं पीडिता ह्यभवन् सुराः । विष्ण्वाद्या निखिलाश्चाति शिवाज्ञानष्टबुद्धयः

tato'sahantastadvīryaṁ pīḍitā hyabhavan surāḥ viṣṇvādyā nikhilāścāti śivājñānaṣṭabuddhayaḥ

तत्पश्चात् उस वीर्य को सहन न कर पाने के कारण विष्णु आदि समस्त देवगण अत्यंत पीड़ित हो उठे, और शिव-तत्त्व के अज्ञान से उनकी बुद्धि भी नष्ट हो गई।

श्लोक 27 (shiva.rudra.120.27)

अथ विष्णुप्रभृतिकाःसर्वे देवा विमोहिताः । दह्यमाना ययुः शीघ्रं शरणं पार्वतीपतेः

atha viṣṇuprabhṛtikāḥsarve devā vimohitāḥ dahyamānā yayuḥ śīghraṁ śaraṇaṁ pārvatīpateḥ

तब विष्णु आदि समस्त देवगण अत्यंत मोहित और जलते हुए शीघ्र ही पार्वतीपति की शरण में गए।

श्लोक 28 (shiva.rudra.120.28)

शिवालयस्य ते द्वारि गत्वा सर्वे विनम्रकाः । तुष्टुवुःसशिवं शम्भुं प्रीत्या साञ्जलयःसुराः

śivālayasya te dvāri gatvā sarve vinamrakāḥ tuṣṭuvuḥsaśivaṁ śambhuṁ prītyā sāñjalayaḥsurāḥ

शिव के धाम के द्वार पर पहुँचकर सभी विनम्र देवताओं ने हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक शिवा सहित शम्भु की स्तुति की।

श्लोक 29 (shiva.rudra.120.29)

देवा ऊचुः । देवदेव महादेव गिरिजेश महाप्रभो । किं जातमधुना नाथ तव माया दुरत्यया

devā ūcuḥ devadeva mahādeva girijeśa mahāprabho kiṁ jātamadhunā nātha tava māyā duratyayā

देवताओं ने कहा — हे देवदेव! हे महादेव! हे गिरिजेश! हे महाप्रभो! अब यह क्या हो गया, हे नाथ? आपकी माया दुरत्यय है।

श्लोक 30 (shiva.rudra.120.30)

सगर्भाश्च वयं जाता दह्यमानाश्च रेतसा । तव शम्भो कुरु कृपां निवारय दशामिमाम्

sagarbhāśca vayaṁ jātā dahyamānāśca retasā tava śambho kuru kṛpāṁ nivāraya daśāmimām

हे शम्भो! हम गर्भवती हो गए हैं और उस वीर्य से जल रहे हैं। हम पर कृपा कीजिए और हमारी इस दशा को दूर कीजिए।

श्लोक 31 (shiva.rudra.120.31)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्याऽमरनुतिं परमेशः शिवापतिः । आजगाम द्रुतं द्वारि यत्र देवाः स्थिता मुने

brahmovāca ityākarṇyā'maranutiṁ parameśaḥ śivāpatiḥ ājagāma drutaṁ dvāri yatra devāḥ sthitā mune

ब्रह्मा जी ने कहा — देवताओं की इस स्तुति को सुनकर शिवापति परमेश्वर हे मुने! शीघ्र ही उस द्वार पर आए जहाँ देवगण खड़े थे।

श्लोक 32 (shiva.rudra.120.32)

आगतं शङ्करं द्वारि सर्वे देवाश्च साच्युताः । प्रणम्य तुष्टुवुः प्रीत्या नर्तका भक्तवत्सलम्

āgataṁ śaṅkaraṁ dvāri sarve devāśca sācyutāḥ praṇamya tuṣṭuvuḥ prītyā nartakā bhaktavatsalam

शंकर के द्वार पर आने पर विष्णु सहित समस्त देवताओं ने प्रणाम कर प्रेमपूर्वक उन भक्तवत्सल शंकर की स्तुति की।

श्लोक 33 (shiva.rudra.120.33)

देवा ऊचुः । शम्भो शिव महेशान त्वां नताः स्म विशेषतः । रक्ष नः शरणापन्नान् दह्यमानांश्च रेतसा

devā ūcuḥ śambho śiva maheśāna tvāṁ natāḥ sma viśeṣataḥ rakṣa naḥ śaraṇāpannān dahyamānāṁśca retasā

देवताओं ने कहा — हे शम्भो! हे शिव! हे महेशान! हम विशेष रूप से आपको नमन करते हैं। शरणागत तथा वीर्य से जलते हुए हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 34 (shiva.rudra.120.34)

इदं दुःखं हर हर भवामो हि मृता ध्रुवम् । त्वां विना कः समर्थोऽद्य देवदुःखनिवारणे

idaṁ duḥkhaṁ hara hara bhavāmo hi mṛtā dhruvam tvāṁ vinā kaḥ samartho'dya devaduḥkhanivāraṇe

हे हर! इस दुःख को हरिए, अन्यथा हम निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएँगे। आपके बिना आज देवताओं के दुःख को दूर करने में और कौन समर्थ है?

श्लोक 35 (shiva.rudra.120.35)

ब्रह्मोवाच । इति दीनतरं वाक्यमाकर्ण्य सुरराट् प्रभुः । प्रत्युवाच विहस्याथ स सुरान् भक्तवत्सलः

brahmovāca iti dīnataraṁ vākyamākarṇya surarāṭ prabhuḥ pratyuvāca vihasyātha sa surān bhaktavatsalaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — इस अत्यंत दीन वाणी को सुनकर भक्तवत्सल प्रभु ने मुस्कराते हुए देवताओं को उत्तर दिया।

श्लोक 36 (shiva.rudra.120.36)

शिव उवाच । हे हरे हे विधे देवाः सर्वे शृणुत मद्वचः । भविष्यति सुखं वोऽद्य सावधाना भवन्तु हि

śiva uvāca he hare he vidhe devāḥ sarve śṛṇuta madvacaḥ bhaviṣyati sukhaṁ vo'dya sāvadhānā bhavantu hi

शिव ने कहा — हे हरि! हे विधे! हे समस्त देवगण! मेरी बात सुनो। आज तुम्हें सुख प्राप्त होगा, किंतु सावधान रहना।

श्लोक 37 (shiva.rudra.120.37)

एतद्वमत मद्वीर्यं द्रुतमेवाखिलाःसुराः । सुखिनस्तद्विशेषेण शासनान्मम सुप्रभोः

etadvamata madvīryaṁ drutamevākhilāḥsurāḥ sukhinastadviśeṣeṇa śāsanānmama suprabhoḥ

हे समस्त सुरगणो! शीघ्र ही मेरे इस वीर्य को वमन कर दो; मेरी इस आज्ञा के पालन से तुम सब विशेष रूप से सुखी होगे।

श्लोक 38 (shiva.rudra.120.38)

ब्रह्मोवाच । इत्याज्ञां शिरसाऽधाय विष्ण्वाद्याः सकलाः सुराः । अकार्षुर्वमनं शीघ्रं स्मरन्तः शिवमव्ययम्

brahmovāca ityājñāṁ śirasā'dhāya viṣṇvādyāḥ sakalāḥ surāḥ akārṣurvamanaṁ śīghraṁ smarantaḥ śivamavyayam

ब्रह्मा जी ने कहा — इस आज्ञा को शिरोधार्य कर विष्णु आदि समस्त देवताओं ने अविनाशी शिव का स्मरण करते हुए शीघ्र ही वमन कर दिया।

श्लोक 39 (shiva.rudra.120.39)

तच्छम्भुरेतःस्वर्णाभं पर्वताकारमद्भुतम् । अभवत्पतितं भूमौ स्पृशद् द्यामेव सुप्रभम्

tacchambhuretaḥsvarṇābhaṁ parvatākāramadbhutam abhavatpatitaṁ bhūmau spṛśad dyāmeva suprabham

शम्भु का वह वीर्य स्वर्णाभ, पर्वताकार तथा अद्भुत रूप में, अपनी प्रभा से आकाश को स्पर्श करता हुआ, पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 40 (shiva.rudra.120.40)

अभवन्सुखिनःसर्वे सुराः सर्वेऽच्युतादयः । अस्तुवन् परमेशानं शङ्करं भक्तवत्सलम्

abhavansukhinaḥsarve surāḥ sarve'cyutādayaḥ astuvan parameśānaṁ śaṅkaraṁ bhaktavatsalam

अच्युत आदि समस्त देवगण सुखी हो गए और भक्तवत्सल परमेश्वर शंकर की स्तुति करने लगे।

श्लोक 41 (shiva.rudra.120.41)

पावकस्त्वभवन्नैव सुखी तत्र मुनीश्वर । तस्याज्ञां परमोऽदाद्वै शङ्करः परमेश्वरः

pāvakastvabhavannaiva sukhī tatra munīśvara tasyājñāṁ paramo'dādvai śaṅkaraḥ parameśvaraḥ

किन्तु हे मुनीश्वर! वहाँ केवल अग्नि सुखी नहीं हो सके; तब परमेश्वर शंकर ने उन्हें एक आज्ञा (वरदान) प्रदान की।

श्लोक 42 (shiva.rudra.120.42)

ततः सवह्निर्विकलः साञ्जलिर्नतको मुने । अस्तौच्छिवं सुखी नात्मा वचनं चेदमब्रवीत्

tataḥ savahnirvikalaḥ sāñjalirnatako mune astaucchivaṁ sukhī nātmā vacanaṁ cedamabravīt

तत्पश्चात् व्याकुल अग्नि ने हाथ जोड़कर, झुककर, हे मुने! शिव की स्तुति की, यद्यपि वे स्वयं सुखी नहीं थे, और यह वचन कहा।

श्लोक 43 (shiva.rudra.120.43)

अग्निरुवाच । देवदेव महेशान मूढोऽहं तव सेवकः । क्षमस्व मेऽपराधं हि मम दाहं निवारय

agniruvāca devadeva maheśāna mūḍho'haṁ tava sevakaḥ kṣamasva me'parādhaṁ hi mama dāhaṁ nivāraya

अग्नि ने कहा — हे देवदेव! हे महेशान! मैं आपका मूढ़ सेवक हूँ। मेरे अपराध को क्षमा कीजिए और मेरी इस जलन को दूर कीजिए।

श्लोक 44 (shiva.rudra.120.44)

त्वं दीनवत्सलः स्वामिन् शङ्करः परमेश्वरः । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पावको दीनवत्सलम्

tvaṁ dīnavatsalaḥ svāmin śaṅkaraḥ parameśvaraḥ pratyuvāca prasannātmā pāvako dīnavatsalam

"हे स्वामिन्! आप दीनवत्सल शंकर परमेश्वर हैं" — ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त अग्नि ने उस दीनवत्सल शिव को यह वचन कहा।

श्लोक 45 (shiva.rudra.120.45)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य शुचेर्वाणीं स शम्भुः परमेश्वरः । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पावकं दीनवत्सलः

brahmovāca ityākarṇya śucervāṇīṁ sa śambhuḥ parameśvaraḥ pratyuvāca prasannātmā pāvakaṁ dīnavatsalaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — शुचि की यह वाणी सुनकर प्रसन्नचित्त तथा दीनवत्सल शम्भु परमेश्वर ने पावक को उत्तर दिया।

श्लोक 46 (shiva.rudra.120.46)

शिव उवाच । कृतं त्वनुचितं कर्म मद्रेतो भक्षितं हि यत् । अतो निवृत्तस्ते दाहः पापाधिक्यान्मदाज्ञया

śiva uvāca kṛtaṁ tvanucitaṁ karma madreto bhakṣitaṁ hi yat ato nivṛttaste dāhaḥ pāpādhikyānmadājñayā

शिव ने कहा — तूने अनुचित कर्म किया कि मेरे वीर्य का भक्षण कर लिया। तथापि, तेरे उस अपराध की अधिकता के बावजूद, मेरी आज्ञा से अब तेरी यह जलन दूर हो गई।

श्लोक 47 (shiva.rudra.120.47)

इदानीं त्वं सुखी नाम शुचे मच्छरणागतः । अतः प्रसन्नो जातोऽहं सर्वं दुःखं विनश्यति

idānīṁ tvaṁ sukhī nāma śuce maccharaṇāgataḥ ataḥ prasanno jāto'haṁ sarvaṁ duḥkhaṁ vinaśyati

अब हे शुचे! तुम मेरी शरण में आकर सचमुच सुखी हो गए हो; इसलिए मैं प्रसन्न हुआ हूँ, और तुम्हारा सारा दुःख नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 48 (shiva.rudra.120.48)

कस्याश्चित्सुस्त्रियां योनौ मद्रेतस्त्यज यत्नतः । भविष्यति सुखी त्वं हि निर्दाहात्मा विशेषतः

kasyāścitsustriyāṁ yonau madretastyaja yatnataḥ bhaviṣyati sukhī tvaṁ hi nirdāhātmā viśeṣataḥ

प्रयत्नपूर्वक किसी सुशील स्त्री की योनि में मेरे इस वीर्य को त्याग दो; तब तुम विशेष रूप से दाहरहित होकर सुखी हो जाओगे।

श्लोक 49 (shiva.rudra.120.49)

ब्रह्मोवाच । शम्भुवाक्यं निशम्येति प्रत्युवाच शनैः शुचिः । साञ्जलिर्नतकः प्रीत्या शङ्करं भक्तशङ्करम्

brahmovāca śambhuvākyaṁ niśamyeti pratyuvāca śanaiḥ śuciḥ sāñjalirnatakaḥ prītyā śaṅkaraṁ bhaktaśaṅkaram

ब्रह्मा जी ने कहा — शम्भु के इस वचन को सुनकर शुचि ने धीरे से, हाथ जोड़कर, झुककर, प्रेमपूर्वक भक्तकल्याणकारी शंकर को उत्तर दिया।

श्लोक 50 (shiva.rudra.120.50)

दुरासदमिदं तेजस्तव नाथ महेश्वर । काचिन्नास्ति विना शक्त्या धर्तुं योनौ जगत्त्रये

durāsadamidaṁ tejastava nātha maheśvara kācinnāsti vinā śaktyā dhartuṁ yonau jagattraye

हे नाथ! हे महेश्वर! आपका यह तेज अत्यंत दुर्धर है। शक्ति को छोड़कर तीनों लोकों में ऐसी कोई स्त्री नहीं है जो इसे अपनी योनि में धारण कर सके।

श्लोक 51 (shiva.rudra.120.51)

इत्थं यदाऽब्रवीद्वह्निस्तदा त्वं मुनिसत्तम । शङ्करप्रेरितः प्रात्थ हृदाग्निमुपकारकः

itthaṁ yadā'bravīdvahnistadā tvaṁ munisattama śaṅkarapreritaḥ prāttha hṛdāgnimupakārakaḥ

जब अग्नि ने ऐसा कहा, हे मुनिश्रेष्ठ! तब शंकर की प्रेरणा से आप स्वयं उपकार की भावना से हृदयपूर्वक अग्नि के पास गए।

श्लोक 52 (shiva.rudra.120.52)

नारद उवाच । शृणु मद्वचनं वह्ने तव दाहहरं शुभम् । परमानन्ददं रम्यं सर्वकष्टनिवारकम्

nārada uvāca śṛṇu madvacanaṁ vahne tava dāhaharaṁ śubham paramānandadaṁ ramyaṁ sarvakaṣṭanivārakam

नारद ने कहा — हे अग्नि! मेरे इस शुभ वचन को सुनो, जो तुम्हारी जलन को दूर करने वाला, परम आनन्द देने वाला, रम्य तथा समस्त कष्टों को दूर करने वाला है।

श्लोक 53 (shiva.rudra.120.53)

कृत्वोपायमिमं वह्ने सुखी भव विदाहकः । शिवेच्छया मया सम्यगुक्तं तातेदमादरात्

kṛtvopāyamimaṁ vahne sukhī bhava vidāhakaḥ śivecchayā mayā samyaguktaṁ tātedamādarāt

हे वह्ने! इस उपाय को अपनाकर दाहरहित होकर सुखी हो जाओ। हे तात! शिव की इच्छा से मैंने यह बात तुम्हें आदरपूर्वक भलीभाँति बताई है।

श्लोक 54 (shiva.rudra.120.54)

तपोमासस्नानकर्त्र्यः स्त्रियो याःस्युः प्रगे शुचे । तद्देहेषु स्थापय त्वं शिवरेतस्त्विदं महत्

tapomāsasnānakartryaḥ striyo yāḥsyuḥ prage śuce taddeheṣu sthāpaya tvaṁ śivaretastvidaṁ mahat

हे शुचे! तपोमास (माघ मास) में जो स्त्रियाँ प्रातःकाल स्नान करने वाली हों, उनके शरीर में तुम इस महान शिव-वीर्य को स्थापित कर दो।

श्लोक 55 (shiva.rudra.120.55)

ब्रह्मोवाच । तस्मिन्नवसरे तत्रागताः सप्तमुनिस्त्रियः । तपोमासि स्नानकामाः प्रातः सन्नियमा मुने

brahmovāca tasminnavasare tatrāgatāḥ saptamunistriyaḥ tapomāsi snānakāmāḥ prātaḥ sanniyamā mune

ब्रह्मा जी ने कहा — उसी समय हे मुने! तपोमास में प्रातःकाल स्नान की इच्छा से नियमपूर्वक सात मुनि-पत्नियाँ वहाँ आईं।

श्लोक 56 (shiva.rudra.120.56)

स्नानं कृत्वा स्त्रियस्ता हि महाशीतार्द्दिताश्च षट् । गन्तुकामा मुने याता वह्निज्वालासमीपतः

snānaṁ kṛtvā striyastā hi mahāśītārdditāśca ṣaṭ gantukāmā mune yātā vahnijvālāsamīpataḥ

स्नान करने के बाद अत्यंत शीत से पीड़ित उन स्त्रियों में से छह हे मुने! तापने की इच्छा से अग्नि की ज्वाला के समीप गईं।

श्लोक 57 (shiva.rudra.120.57)

विमोहिताश्च ता दृष्ट्वारुन्धती गिरिशाज्ञया । निषिषेध विशेषेण सुचरित्रा सुबोधिनी

vimohitāśca tā dṛṣṭvārundhatī giriśājñayā niṣiṣedha viśeṣeṇa sucaritrā subodhinī

उन्हें मोहित हुआ देखकर सच्चरित्रा एवं सुबोधिनी अरुन्धती ने गिरीश की ही इच्छा से उन्हें विशेष रूप से रोका।

श्लोक 58 (shiva.rudra.120.58)

ताः षड् मुनिस्त्रियो मोहाद्धठात्तत्र गता मुने । स्वशीतविनिवृत्त्यर्थं मोहिताः शिवमायया

tāḥ ṣaḍ munistriyo mohāddhaṭhāttatra gatā mune svaśītavinivṛttyarthaṁ mohitāḥ śivamāyayā

फिर भी वे छहों मुनि-पत्नियाँ मोहवश हे मुने! अपनी शीत-निवृत्ति के लिए हठपूर्वक वहाँ चली गईं, क्योंकि वे शिव की माया से मोहित थीं।

श्लोक 59 (shiva.rudra.120.59)

तद्रेतःकणिकाः सद्यस्तद्देहान् विविशुर्मुने । रोमद्वाराऽखिला वह्निरभूद्दाहविवर्जितः

tadretaḥkaṇikāḥ sadyastaddehān viviśurmune romadvārā'khilā vahnirabhūddāhavivarjitaḥ

उस वीर्य के कण तत्काल उन स्त्रियों के शरीर में हे मुने! सभी रोमकूपों के द्वारा प्रविष्ट हो गए, और अग्नि पूर्णतः दाहरहित हो गया।

श्लोक 60 (shiva.rudra.120.60)

अन्तर्धाय द्रुतं वह्निर्ज्वालारूपो जगाम ह । सुखी स्वलोकं मनसा स्मरंस्त्वां शङ्करं च तम्

antardhāya drutaṁ vahnirjvālārūpo jagāma ha sukhī svalokaṁ manasā smaraṁstvāṁ śaṅkaraṁ ca tam

अग्नि ज्वाला के रूप में तत्काल अन्तर्धान होकर, मन में नारद तथा उन शंकर का स्मरण करते हुए, सुखपूर्वक अपने लोक को चला गया।

श्लोक 61 (shiva.rudra.120.61)

सगर्भास्ताः स्त्रियः साधोऽभवन् दाहप्रपीडिताः । जग्मुःस्वभवनं तातारुन्धती दुःखिताग्निना

sagarbhāstāḥ striyaḥ sādho'bhavan dāhaprapīḍitāḥ jagmuḥsvabhavanaṁ tātārundhatī duḥkhitāgninā

हे साधो! वे स्त्रियाँ गर्भवती हो गईं तथा दाह से पीड़ित हुईं; वे अपने-अपने घर लौट गईं, और हे तात! अरुन्धती उस अग्नि-कांड से दुःखी हुईं।

श्लोक 62 (shiva.rudra.120.62)

दृष्ट्वा स्वस्त्रीगतिं तात नाथाः क्रोधाकुला द्रुतम् । तत्यजुस्ताः स्त्रियस्तात सुसम्मन्त्र्य परस्परम्

dṛṣṭvā svastrīgatiṁ tāta nāthāḥ krodhākulā drutam tatyajustāḥ striyastāta susammantrya parasparam

अपनी-अपनी पत्नियों की यह दशा देखकर हे तात! उनके पति क्रोध से व्याकुल हो गए और आपस में भलीभाँति विचार-विमर्श करके उन्होंने उन स्त्रियों को त्याग दिया।

श्लोक 63 (shiva.rudra.120.63)

अथ ताः षट् स्त्रियःसर्वा दृष्ट्वा स्वव्यभिचारकम् । महादुःखान्वितास्ताताभवन्नाकुलमानसाः

atha tāḥ ṣaṭ striyaḥsarvā dṛṣṭvā svavyabhicārakam mahāduḥkhānvitāstātābhavannākulamānasāḥ

तब उन छहों स्त्रियों ने अपने ऊपर लगे इस व्यभिचार के दोष को देखकर हे तात! अत्यंत दुःखी होकर व्याकुल-मन हो गईं।

श्लोक 64 (shiva.rudra.120.64)

तत्यजुश्शिवरेतस्तद्गर्भरूपं मुनिस्त्रियः । ता हिमाचलपृष्ठेऽथाभवन् दाहविवर्जिताः

tatyajuśśivaretastadgarbharūpaṁ munistriyaḥ tā himācalapṛṣṭhe'thābhavan dāhavivarjitāḥ

उन मुनि-पत्नियों ने गर्भरूप में स्थित उस शिव-वीर्य को त्याग दिया; और हिमाचल के उस प्रान्त पर वे दाहरहित हो गईं।

श्लोक 65 (shiva.rudra.120.65)

असहन् शिवरेतस्तद्धिमाद्रिः कम्पमुद्वहन् । गङ्गायां प्राक्षिपत्तूर्णमसह्यं दाहपीडितः

asahan śivaretastaddhimādriḥ kampamudvahan gaṅgāyāṁ prākṣipattūrṇamasahyaṁ dāhapīḍitaḥ

उस असह्य शिव-वीर्य को सहन न कर पाने के कारण, कम्पित हिमाचल, दाह से पीड़ित होकर, उसे तत्काल गंगा में डाल दिया।

श्लोक 66 (shiva.rudra.120.66)

गङ्गयाऽपि च तद्वीर्यं दुस्सहं परमात्मनः । निःक्षिप्तं हि शरस्तम्बे तरङ्गैः स्वैर्मुनीश्वर

gaṅgayā'pi ca tadvīryaṁ dussahaṁ paramātmanaḥ niḥkṣiptaṁ hi śarastambe taraṅgaiḥ svairmunīśvara

हे मुनीश्वर! गंगा भी परमात्मा के उस दुस्सह वीर्य को धारण न कर सकीं और अपनी तरंगों द्वारा उसे सरकंडों के झुरमुट में डाल दिया।

श्लोक 67 (shiva.rudra.120.67)

पतितं तत्र तद्रेतो द्रुतं बालो बभूव ह । सुन्दरः सुभगः श्रीमांस्तेजस्वी प्रीतिवर्द्धनः

patitaṁ tatra tadreto drutaṁ bālo babhūva ha sundaraḥ subhagaḥ śrīmāṁstejasvī prītivarddhanaḥ

वहाँ गिरा हुआ वह वीर्य शीघ्र ही एक बालक के रूप में परिणत हो गया — सुंदर, सौभाग्यशाली, श्रीमान्, तेजस्वी और प्रीति बढ़ाने वाला।

श्लोक 68 (shiva.rudra.120.68)

मार्गमासे सिते पक्षे तिथौ षष्ठ्यां मुनीश्वर । प्रादुर्भावोऽभवत्तस्य शिवपुत्रस्य भूतले

mārgamāse site pakṣe tithau ṣaṣṭhyāṁ munīśvara prādurbhāvo'bhavattasya śivaputrasya bhūtale

हे मुनीश्वर! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को उस शिवपुत्र का पृथ्वी पर प्राकट्य हुआ।

श्लोक 69 (shiva.rudra.120.69)

तस्मिन्नवसरे ब्रह्मन्नकस्माद्धिमशैलजा । अभूतां सुखिनौ तत्र स्वगिरौ गिरिशोऽपि च

tasminnavasare brahmannakasmāddhimaśailajā abhūtāṁ sukhinau tatra svagirau giriśo'pi ca

उसी समय हे ब्रह्मन्! अकस्मात् हिमाचल-पुत्री तथा गिरीश, दोनों अपने पर्वत पर सुखी हो उठे।

श्लोक 70 (shiva.rudra.120.70)

शिवाकुचाभ्यां सुस्राव पय आनन्दसम्भवम् । तत्र गत्वा च सर्वेषां सुखमासीन्मुनेऽधिकम्

śivākucābhyāṁ susrāva paya ānandasambhavam tatra gatvā ca sarveṣāṁ sukhamāsīnmune'dhikam

शिवा के स्तनों से आनन्दजनित दुग्ध बहने लगा; और हे मुने! वहाँ पहुँचकर सबको अत्यधिक सुख की अनुभूति हुई।

श्लोक 71 (shiva.rudra.120.71)

मङ्गलं चाऽभवत्तात त्रिलोक्यां सुखदं सताम् । खलानामभवद्विघ्नो दैत्यानां च विशेषतः

maṅgalaṁ cā'bhavattāta trilokyāṁ sukhadaṁ satām khalānāmabhavadvighno daityānāṁ ca viśeṣataḥ

हे तात! तीनों लोकों में मंगल हुआ, जो सज्जनों को सुखदायक था; और दुष्टों तथा विशेष रूप से दैत्यों के लिए विघ्न उत्पन्न हुआ।

श्लोक 72 (shiva.rudra.120.72)

अकस्मादभवद् व्योम्नि परमो दुन्दुभिध्वनिः । पुष्पवृष्टिः पपाताऽशु बालकोपरि नारद

akasmādabhavad vyomni paramo dundubhidhvaniḥ puṣpavṛṣṭiḥ papātā'śu bālakopari nārada

हे नारद! आकाश में सहसा दुन्दुभियों की परम ध्वनि गूँज उठी, और उस बालक के ऊपर शीघ्र ही पुष्पवृष्टि होने लगी।

श्लोक 73 (shiva.rudra.120.73)

विष्ण्वादीनां समस्तानां देवानां मुनिसत्तम । अभूदकस्मात्परम आनन्दः परमोत्सवः

viṣṇvādīnāṁ samastānāṁ devānāṁ munisattama abhūdakasmātparama ānandaḥ paramotsavaḥ

हे मुनिसत्तम! विष्णु आदि समस्त देवताओं में सहसा परम आनन्द तथा महान उत्सव उत्पन्न हो गया।

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