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रुद्र संहिता · अध्याय 128

तारकासुर-वध एवं देवोत्सव

अध्याय 127अध्याय-सूचीअध्याय 129

श्लोक 1 (shiva.rudra.128.1)

ब्रह्मोवाच निवार्य वीरभद्रं तं कुमारः परवीरहा । समैच्छत्तारकवधं स्मृत्वा शिवपदाम्बुजौ

brahmovāca nivārya vīrabhadraṁ taṁ kumāraḥ paravīrahā samaicchattārakavadhaṁ smṛtvā śivapadāmbujau

वीरभद्र को रोककर, शत्रुवीरों के संहारक कुमार ने स्वयं शिव के चरणकमलों का स्मरण करते हुए तारक-वध का निश्चय किया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.128.2)

जगर्जाथ महातेजाः कार्तिकेयो महाबलः । सन्नद्धः सोऽभवत्क्रुद्धः सैन्येन महता वृतः

jagarjātha mahātejāḥ kārtikeyo mahābalaḥ sannaddhaḥ so'bhavatkruddhaḥ sainyena mahatā vṛtaḥ

महातेजस्वी, महाबली कार्तिकेय तब गरज उठे; क्रोधित और सन्नद्ध होकर वे एक विशाल सेना से घिर गए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.128.3)

तदा जय जयेत्युक्तं सर्वैर्देवगणैस्तथा । संस्तुतो वाग्भिरिष्टाभिस्तदैव च सुरर्षिभिः

tadā jaya jayetyuktaṁ sarvairdevagaṇaistathā saṁstuto vāgbhiriṣṭābhistadaiva ca surarṣibhiḥ

तब समस्त देवगणों ने 'जय जय' का उद्घोष किया, और उसी क्षण देवर्षियों ने भी प्रिय वचनों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 4 (shiva.rudra.128.4)

तारकस्य कुमारस्य सङ्ग्रामोऽतीव दुःसहः । जातस्तदा महाघोरः सर्वभूत भयङ्करः

tārakasya kumārasya saṅgrāmo'tīva duḥsahaḥ jātastadā mahāghoraḥ sarvabhūta bhayaṅkaraḥ

तब तारक और कुमार के बीच अत्यंत दुःसह, महाघोर, सभी प्राणियों को भयभीत करने वाला युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.128.5)

शक्तिहस्तौ च तौ वीरौ युयुधाते परस्परम् । सर्वेषां पश्यतां तत्र महाश्चर्यवतां मुने

śaktihastau ca tau vīrau yuyudhāte parasparam sarveṣāṁ paśyatāṁ tatra mahāścaryavatāṁ mune

हे मुने! हाथों में शक्ति लिए वे दोनों वीर आपस में युद्ध करने लगे, और वहाँ देखने वाले सभी लोग महान आश्चर्य से भर गए।

श्लोक 6 (shiva.rudra.128.6)

शक्तिनिर्भिन्नदेहौ तौ महासाधनसंयुतौ । परस्परं वञ्चयन्तौ सिंहाविव महाबलौ

śaktinirbhinnadehau tau mahāsādhanasaṁyutau parasparaṁ vañcayantau siṁhāviva mahābalau

एक-दूसरे की शक्ति से देह बिंधे हुए, महान अस्त्रों से युक्त वे दोनों दो सिंहों के समान एक-दूसरे को छकाते हुए घूमते रहे।

श्लोक 7 (shiva.rudra.128.7)

वैतालिकं समाश्रित्य तथा खेचरकं मतम् । प्रापतं च समाश्रित्य शक्त्या शक्तिं विजघ्नतुः

vaitālikaṁ samāśritya tathā khecarakaṁ matam prāpataṁ ca samāśritya śaktyā śaktiṁ vijaghnatuḥ

वैतालिक विद्या का, तथा खेचरक मत का, और प्रापत विधि का भी सहारा लेकर वे शक्ति से शक्ति का प्रहार करते रहे।

श्लोक 8 (shiva.rudra.128.8)

एभिर्मन्त्रैर्महावीरौ चक्रतुर्युद्धमद्भुतम् । अन्योऽन्यं साधकौ भूत्वा महाबलपराक्रमौ

ebhirmantrairmahāvīrau cakraturyuddhamadbhutam anyo'nyaṁ sādhakau bhūtvā mahābalaparākramau

इन्हीं मंत्र-विद्याओं से वे दोनों महावीर अद्भुत युद्ध करते रहे, एक-दूसरे पर विजय पाने का प्रयत्न करते हुए, दोनों महाबल-पराक्रम से युक्त।

श्लोक 9 (shiva.rudra.128.9)

महाबलं प्रकुर्वन्तौ परस्परवधैषिणौ । जघ्नतुः शक्तिधाराभी रणे रणविशारदौ

mahābalaṁ prakurvantau parasparavadhaiṣiṇau jaghnatuḥ śaktidhārābhī raṇe raṇaviśāradau

अपना महान बल दिखाते हुए, एक-दूसरे के वध की कामना करते हुए, रणकुशल वे दोनों शक्ति-प्रहारों की धारा से एक-दूसरे पर वार करते रहे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.128.10)

मूर्ध्नि कण्ठे तथा चोर्वोर्जान्वोश्चैव कटीतटे । वक्षस्युरसि पृष्ठे च चिच्छिदुश्च परस्परम्

mūrdhni kaṇṭhe tathā corvorjānvoścaiva kaṭītaṭe vakṣasyurasi pṛṣṭhe ca cicchiduśca parasparam

सिर पर, कंठ पर, जंघाओं पर, घुटनों पर, कटि-प्रदेश पर, वक्षस्थल पर, छाती पर और पीठ पर -- दोनों ने परस्पर एक-दूसरे को घायल कर दिया।

श्लोक 11 (shiva.rudra.128.11)

तदा तौ युध्यमानौ च हन्तुकामौ महाबलौ । वल्गन्तौ वीरशब्दैश्च नानायुद्धविशारदौ

tadā tau yudhyamānau ca hantukāmau mahābalau valgantau vīraśabdaiśca nānāyuddhaviśāradau

तब युद्ध करते हुए, एक-दूसरे के वध की इच्छा रखने वाले वे दोनों महाबली अनेक युद्ध-कुशलताओं में निपुण, वीरध्वनि करते हुए उछल-कूद करने लगे।

श्लोक 12 (shiva.rudra.128.12)

अभवन्प्रेक्षकाः सर्वे देवा गन्धर्वकिन्नराः । ऊचुः परस्परं तत्र कोऽस्मिन् युद्धे विजेष्यते

abhavanprekṣakāḥ sarve devā gandharvakinnarāḥ ūcuḥ parasparaṁ tatra ko'smin yuddhe vijeṣyate

देवगण, गंधर्व और किन्नर सब केवल दर्शक बनकर रह गए, और वहाँ आपस में कहने लगे -- 'इस युद्ध में विजयी कौन होगा?'

श्लोक 13 (shiva.rudra.128.13)

तदा नभोगता वाणी जगौ देवांश्च सान्त्वयन् । असुरं तारकं चात्र कुमारोऽयं हनिष्यति

tadā nabhogatā vāṇī jagau devāṁśca sāntvayan asuraṁ tārakaṁ cātra kumāro'yaṁ haniṣyati

तब आकाशवाणी हुई, जो देवों को सांत्वना देते हुए बोली -- 'यह कुमार यहाँ असुर तारक का वध करेगा।'

श्लोक 14 (shiva.rudra.128.14)

मा शोच्यतां सुरैः सर्वै सुखेन स्थीयतामिति । युष्मदर्थं शङ्करो हि पुत्ररूपेण संस्थितः

mā śocyatāṁ suraiḥ sarvai sukhena sthīyatāmiti yuṣmadarthaṁ śaṅkaro hi putrarūpeṇa saṁsthitaḥ

'हे देवगण, तुम सब शोक न करो, सुखपूर्वक स्थित रहो। तुम्हारे ही हित के लिए शंकर पुत्र के रूप में यहाँ स्थित हुए हैं।'

श्लोक 15 (shiva.rudra.128.15)

श्रुत्वा तदा तां गगने समीरितां वाचं शुभां स प्रमथैः समावृतः । निहन्तुकामः सुखितः कुमारको दैत्याधिपं तारकमाश्वभूत्तदा

śrutvā tadā tāṁ gagane samīritāṁ vācaṁ śubhāṁ sa pramathaiḥ samāvṛtaḥ nihantukāmaḥ sukhitaḥ kumārako daityādhipaṁ tārakamāśvabhūttadā

आकाश में गूँजी उस शुभ वाणी को सुनकर, प्रमथगणों से घिरे हुए, सुखी हुए कुमार ने उसी क्षण दैत्याधिप तारक का वध करने का निश्चय कर लिया।

श्लोक 16 (shiva.rudra.128.16)

शक्त्या तया महाबाहुराजघान स्तनान्तरे । कुमारः स्म रुषाविष्टस्तारकासुरमोजसा

śaktyā tayā mahābāhurājaghāna stanāntare kumāraḥ sma ruṣāviṣṭastārakāsuramojasā

महाबाहु कुमार ने क्रोध से भरकर अपने पूरे बल से उसी शक्ति द्वारा तारकासुर की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.128.17)

तं प्रहारमनादृत्य तारको दैत्यपुङ्गवः । कुमारं चापि सङ्क्रुद्धः स्वशक्त्या सञ्जघान सः

taṁ prahāramanādṛtya tārako daityapuṅgavaḥ kumāraṁ cāpi saṅkruddhaḥ svaśaktyā sañjaghāna saḥ

दैत्यश्रेष्ठ तारक ने उस प्रहार की परवाह न करते हुए, अत्यंत क्रोधित होकर अपनी ही शक्ति से कुमार पर भी प्रहार कर दिया।

श्लोक 18 (shiva.rudra.128.18)

तेन शक्तिप्रहारेण शाङ्करिर्मूर्च्छितोऽभवत् । मुहूर्ताच्चेतनां प्राप स्तूयमानो महर्षिभिः

tena śaktiprahāreṇa śāṅkarirmūrcchito'bhavat muhūrtāccetanāṁ prāpa stūyamāno maharṣibhiḥ

उस शक्ति-प्रहार से शांकरि (शंकर-पुत्र) मूर्च्छित हो गए, किंतु महर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए वे क्षणभर में ही होश में आ गए।

श्लोक 19 (shiva.rudra.128.19)

यथा सिंहो मदोन्मत्तो हन्तुकामस्तथासुरम् । कुमारस्तारकं शक्त्या स जघान प्रतापवान्

yathā siṁho madonmatto hantukāmastathāsuram kumārastārakaṁ śaktyā sa jaghāna pratāpavān

जैसे मदमत्त सिंह वध करने को उद्यत हो, उसी प्रकार वह प्रतापी कुमार असुर तारक का वध करने हेतु अपनी शक्ति से उस पर टूट पड़ा।

श्लोक 20 (shiva.rudra.128.20)

एवं परस्परं तौ हि कुमारश्चापि तारकः । युयुधातेऽतिसंरब्धौ शक्तियुद्धविशारदौ

evaṁ parasparaṁ tau hi kumāraścāpi tārakaḥ yuyudhāte'tisaṁrabdhau śaktiyuddhaviśāradau

इस प्रकार शक्ति-युद्ध में कुशल, अत्यंत क्रोधित वे कुमार और तारक दोनों आपस में परस्पर युद्ध करते रहे।

श्लोक 21 (shiva.rudra.128.21)

अभ्यासपरमावास्तामन्योन्यं विजिगीषया । पदातिनौ युध्यमानौ चित्ररूपौ तरस्विनौ

abhyāsaparamāvāstāmanyonyaṁ vijigīṣayā padātinau yudhyamānau citrarūpau tarasvinau

अपने-अपने कौशल में तल्लीन, एक-दूसरे पर विजय की इच्छा रखते हुए, वे दोनों तीव्रगामी वीर पैदल ही अनेक विचित्र मुद्राओं में युद्ध करते रहे।

श्लोक 22 (shiva.rudra.128.22)

विविधैर्घातपुञ्जैस्तावन्योन्यं विनिजघ्नतुः । नानामार्गान्प्रकुर्वन्तौ गर्जन्तौ सुपराक्रमौ

vividhairghātapuñjaistāvanyonyaṁ vinijaghnatuḥ nānāmārgānprakurvantau garjantau suparākramau

अनेक प्रकार के प्रहार-समूहों से वे परस्पर एक-दूसरे को घायल करते रहे, विविध युद्ध-मार्गों का प्रयोग करते हुए गर्जना करते रहे, दोनों महापराक्रमी।

श्लोक 23 (shiva.rudra.128.23)

अवलोकपराः सर्वे देवगन्धर्वकिन्नराः । विस्मयं परमं जग्मुर्नोचुः किञ्चन तत्र ते

avalokaparāḥ sarve devagandharvakinnarāḥ vismayaṁ paramaṁ jagmurnocuḥ kiñcana tatra te

देवगण, गंधर्व और किन्नर -- सभी केवल देखते ही रह गए, परम आश्चर्य को प्राप्त हुए, और वहाँ कुछ भी न कह सके।

श्लोक 24 (shiva.rudra.128.24)

न ववौ पवमानश्च निष्प्रभोऽभूद्दिवाकरः । चचाल वसुधा सर्वा सशैलवनकानना

na vavau pavamānaśca niṣprabho'bhūddivākaraḥ cacāla vasudhā sarvā saśailavanakānanā

वायु बहना बंद हो गया, सूर्य निष्प्रभ हो गया, और पर्वतों, वनों और सघन झाड़ियों सहित संपूर्ण पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 25 (shiva.rudra.128.25)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र हिमालयमुखा धराः । स्नेहार्दितास्तदा जग्मुः कुमारं च परीप्सवः

etasminnantare tatra himālayamukhā dharāḥ snehārditāstadā jagmuḥ kumāraṁ ca parīpsavaḥ

इसी बीच वहाँ हिमालय आदि पर्वत, स्नेह से आर्द्र होकर, कुमार की रक्षा की कामना से वहाँ चले आए।

श्लोक 26 (shiva.rudra.128.26)

ततः स दृष्ट्वा तान्सर्वान्भयभीतांश्च शाङ्करिः । पर्वतान्गिरिजापुत्रो बभाषे परिबोधयन्

tataḥ sa dṛṣṭvā tānsarvānbhayabhītāṁśca śāṅkariḥ parvatāngirijāputro babhāṣe paribodhayan

तब उन सब पर्वतों को भयभीत देखकर, गिरिजापुत्र शांकरि ने उन्हें सांत्वना देते हुए यह कहा।

श्लोक 27 (shiva.rudra.128.27)

कुमार उवाच मा खिद्यतां महाभागा मा चिन्तां कुर्वतां नगाः । घातयाम्यद्य पापिष्ठं सर्वेषां वः प्रपश्यताम्

kumāra uvāca mā khidyatāṁ mahābhāgā mā cintāṁ kurvatāṁ nagāḥ ghātayāmyadya pāpiṣṭhaṁ sarveṣāṁ vaḥ prapaśyatām

कुमार ने कहा -- 'हे महाभाग्यशाली पर्वतो, दुःखी न हों, चिंता न करें। आज मैं तुम सबके देखते-देखते इस पापी का वध करता हूँ।'

श्लोक 28 (shiva.rudra.128.28)

एवं समाश्वास्य तदा पर्वतान् निर्जरान् गणान् । प्रणम्य गिरिजां शम्भुमाददे शक्तिमुत्प्रभाम्

evaṁ samāśvāsya tadā parvatān nirjarān gaṇān praṇamya girijāṁ śambhumādade śaktimutprabhām

इस प्रकार पर्वतों, देवगणों और गणों को सांत्वना देकर, गिरिजा और शंभु को प्रणाम कर उन्होंने अपनी तेजस्वी शक्ति उठा ली।

श्लोक 29 (shiva.rudra.128.29)

तं तारकं हन्तुमनाः करशक्तिर्महाप्रभुः । विरराज महावीरः कुमारः शम्भुबालकः

taṁ tārakaṁ hantumanāḥ karaśaktirmahāprabhuḥ virarāja mahāvīraḥ kumāraḥ śambhubālakaḥ

तारक का वध करने के लिए मन में ठानकर, हाथ में शक्ति लिए वह महाप्रभु, महावीर, शंभु-पुत्र कुमार अत्यंत शोभायमान हो उठे।

श्लोक 30 (shiva.rudra.128.30)

शक्त्या तया जघानाथ कुमारस्तारकासुरम् । तेजसाढ्यः शङ्करस्य लोकक्लेशकरं च तम्

śaktyā tayā jaghānātha kumārastārakāsuram tejasāḍhyaḥ śaṅkarasya lokakleśakaraṁ ca tam

तब शंकर के तेज से परिपूर्ण कुमार ने उस शक्ति से लोक को क्लेश देने वाले उस तारकासुर पर प्रहार किया।

श्लोक 31 (shiva.rudra.128.31)

पपात सद्यः सहसा विशीर्णाङ्गोऽसुरः क्षितौ । तारकाख्यो महावीरःसर्वासुरगणाधिपः

papāta sadyaḥ sahasā viśīrṇāṅgo'suraḥ kṣitau tārakākhyo mahāvīraḥsarvāsuragaṇādhipaḥ

वह असुर तत्काल ही अंग-भंग होकर सहसा भूमि पर गिर पड़ा -- वही महावीर, सम्पूर्ण असुर-गणों का अधिपति, तारक नामधारी।

श्लोक 32 (shiva.rudra.128.32)

कुमारेण हतः सोऽतिवीरः स खलु तारकः । लयं ययौ च तत्रैव सर्वेषां पश्यतां मुने

kumāreṇa hataḥ so'tivīraḥ sa khalu tārakaḥ layaṁ yayau ca tatraiva sarveṣāṁ paśyatāṁ mune

हे मुने! कुमार के हाथों मारा गया वह अतिवीर तारक सबके देखते-देखते वहीं लय को प्राप्त हो गया।

श्लोक 33 (shiva.rudra.128.33)

तथा तं पतितं दृष्ट्वा तारकं बलवत्तरम् । न जघान पुनर्वीरः स गत्वा व्यसुमाहवे

tathā taṁ patitaṁ dṛṣṭvā tārakaṁ balavattaram na jaghāna punarvīraḥ sa gatvā vyasumāhave

उस महाबली तारक को इस प्रकार गिरा हुआ देखकर, वह वीर पुनः उस पर प्रहार नहीं करता, क्योंकि युद्ध में वह पहले ही प्राणहीन हो चुका था।

श्लोक 34 (shiva.rudra.128.34)

हते तस्मिन्महादैत्ये तारकाख्ये महाबले । क्षयं प्रणीता बहवोऽसुरा देवगणैस्तदा

hate tasminmahādaitye tārakākhye mahābale kṣayaṁ praṇītā bahavo'surā devagaṇaistadā

जब वह महाबली महादैत्य तारक इस प्रकार मारा गया, तब देवगणों द्वारा और भी अनेक असुर विनाश को प्राप्त हुए।

श्लोक 35 (shiva.rudra.128.35)

केचिद्भीताः प्राञ्जलयो बभूवुस्तत्र चाहवे । छिन्नभिन्नाङ्गकाः केचिन्मृता दैत्याःसहस्रशः

kecidbhītāḥ prāñjalayo babhūvustatra cāhave chinnabhinnāṅgakāḥ kecinmṛtā daityāḥsahasraśaḥ

कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े वहीं खड़े रह गए, तथा कुछ दैत्य अंग-अंग कटकर हजारों की संख्या में वहीं मृत हो गए।

श्लोक 36 (shiva.rudra.128.36)

केचिज्जाताः कुमारस्य शरणं शरणार्थिनः । वदन्तः पाहि पाहीति दैत्याः साञ्जलयस्तदा

kecijjātāḥ kumārasya śaraṇaṁ śaraṇārthinaḥ vadantaḥ pāhi pāhīti daityāḥ sāñjalayastadā

कुछ दैत्य शरणार्थी होकर हाथ जोड़े कुमार की शरण में आ गए, पुकारते हुए -- 'रक्षा करो, रक्षा करो!'

श्लोक 37 (shiva.rudra.128.37)

कियन्तश्च हतास्तत्र कियन्तश्च पलायिताः । पलायमाना व्यथितास्ताडिता निर्ज्जरैर्गणैः

kiyantaśca hatāstatra kiyantaśca palāyitāḥ palāyamānā vyathitāstāḍitā nirjjarairgaṇaiḥ

कुछ वहीं मारे गए, कुछ भाग खड़े हुए; और भागते हुए वे अमरगणों द्वारा ताड़ित होकर व्यथित हो उठे।

श्लोक 38 (shiva.rudra.128.38)

सहस्रशः प्रविष्टास्ते पाताले च जिजीषवः । पलायमानास्ते सर्वे भग्नाशा दैन्यमागताः

sahasraśaḥ praviṣṭāste pātāle ca jijīṣavaḥ palāyamānāste sarve bhagnāśā dainyamāgatāḥ

जीवित रहने की इच्छा से हजारों की संख्या में वे पाताल में जा घुसे; भागते हुए वे सब आशाहीन होकर दीनता को प्राप्त हुए।

श्लोक 39 (shiva.rudra.128.39)

एवं सर्वं दैत्यसैन्यं भ्रष्टं जातं मुनीश्वर । न केचित्तत्र सन्तस्थुर्गणदेवभयात्तदा

evaṁ sarvaṁ daityasainyaṁ bhraṣṭaṁ jātaṁ munīśvara na kecittatra santasthurgaṇadevabhayāttadā

हे मुनीश्वर! इस प्रकार सम्पूर्ण दैत्य-सेना छिन्न-भिन्न हो गई; देवों और गणों के भय से वहाँ कोई भी टिक न सका।

श्लोक 40 (shiva.rudra.128.40)

आसीन्निष्कण्टकं सर्वं हते तस्मिन्दुरात्मनि । ते देवाः सुखमापन्नाः सर्वे शक्रादयस्तदा

āsīnniṣkaṇṭakaṁ sarvaṁ hate tasmindurātmani te devāḥ sukhamāpannāḥ sarve śakrādayastadā

उस दुरात्मा के मारे जाने पर सर्वत्र निष्कंटकता (निर्भयता) छा गई, और इंद्र आदि सभी देवगण सुख को प्राप्त हुए।

श्लोक 41 (shiva.rudra.128.41)

एवं विजयमापन्नं कुमारं निखिलाः सुराः । बभूवुर्युगपद् हृष्टास्त्रिलोकाश्च महासुखा

evaṁ vijayamāpannaṁ kumāraṁ nikhilāḥ surāḥ babhūvuryugapad hṛṣṭāstrilokāśca mahāsukhā

इस प्रकार विजय पाने वाले कुमार को देखकर सभी देवगण एक साथ हर्षित हो उठे, और तीनों लोक महासुख को प्राप्त हुए।

श्लोक 42 (shiva.rudra.128.42)

तदा शिवोऽपि तं ज्ञात्वा विजयं कार्तिकस्य च । तत्राजगाम स मुदा सगणः प्रियया सह

tadā śivo'pi taṁ jñātvā vijayaṁ kārtikasya ca tatrājagāma sa mudā sagaṇaḥ priyayā saha

तब कार्तिकेय की विजय का समाचार पाकर शिव भी अपने गणों और अपनी प्रियतमा के साथ हर्षपूर्वक वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 43 (shiva.rudra.128.43)

स्वात्मजं स्वाङ्कमारोप्य कुमारं सूर्यवर्चसम् । लालयामास सुप्रीत्या शिवा च स्नेहसङ्कुला

svātmajaṁ svāṅkamāropya kumāraṁ sūryavarcasam lālayāmāsa suprītyā śivā ca snehasaṅkulā

सूर्य के समान तेजस्वी अपने पुत्र कुमार को गोद में उठाकर, शिव ने अत्यंत प्रेम से उसे दुलारा, और स्नेह से भरी शिवा ने भी।

श्लोक 44 (shiva.rudra.128.44)

हिमालयस्तदागत्य स्वपुत्रैः परिवारितः । सबन्धुःसानुगः शम्भुं तुष्टाव च शिवां गुहम्

himālayastadāgatya svaputraiḥ parivāritaḥ sabandhuḥsānugaḥ śambhuṁ tuṣṭāva ca śivāṁ guham

तब हिमालय भी अपने पुत्रों से घिरे हुए, बंधु-बांधवों सहित वहाँ आए और शंभु, शिवा तथा गुह की स्तुति की।

श्लोक 45 (shiva.rudra.128.45)

ततो देवगणाः सर्वे मुनयः सिद्धचारणाः । तुष्टुवुः शाङ्करिं शम्भुं गिरिजां तुषितां भृशम्

tato devagaṇāḥ sarve munayaḥ siddhacāraṇāḥ tuṣṭuvuḥ śāṅkariṁ śambhuṁ girijāṁ tuṣitāṁ bhṛśam

तब सभी देवगणों, मुनियों, सिद्धों और चारणों ने अत्यंत प्रसन्न शांकरि शंभु और गिरिजा की भूरि-भूरि स्तुति की।

श्लोक 46 (shiva.rudra.128.46)

पुष्पवृष्टिं सुमहतीं चक्रुश्चोपसुरास्तदा । जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः

puṣpavṛṣṭiṁ sumahatīṁ cakruścopasurāstadā jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ

उपसुरगणों ने उस समय अत्यंत विशाल पुष्पवृष्टि की; गंधर्वपतियों ने गीत गाए और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे।

श्लोक 47 (shiva.rudra.128.47)

वादित्राणि तथा नेदुस्तदानीं च विशेषतः । जयशब्दो नमः शब्दो बभूवोच्चैर्मुहुर्मुहुः

vāditrāṇi tathā nedustadānīṁ ca viśeṣataḥ jayaśabdo namaḥ śabdo babhūvoccairmuhurmuhuḥ

उस समय वाद्ययंत्र विशेष रूप से गूँज उठे, और बार-बार 'जय' तथा 'नमः' के उद्घोष ऊँचे स्वर में गूँजने लगे।

श्लोक 48 (shiva.rudra.128.48)

ततो मयाच्युतश्चापि सन्तुष्टोऽभूद्विशेषतः । शिवं शिवां कुमारं च सन्तुष्टाव समादरात्

tato mayācyutaścāpi santuṣṭo'bhūdviśeṣataḥ śivaṁ śivāṁ kumāraṁ ca santuṣṭāva samādarāt

तब मैं (ब्रह्मा) और अच्युत (विष्णु) भी विशेष रूप से संतुष्ट हुए, और आदरपूर्वक शिव, शिवा और कुमार की स्तुति की।

श्लोक 49 (shiva.rudra.128.49)

कुमारमग्रतः कृत्वा हरिकेन्द्रमुखाः सुराः । चक्रुर्नीराजनं प्रीत्या मुनयश्चापरे तथा

kumāramagrataḥ kṛtvā harikendramukhāḥ surāḥ cakrurnīrājanaṁ prītyā munayaścāpare tathā

कुमार को आगे करके हरि और इंद्र आदि प्रमुख देवगणों ने, तथा अन्य मुनियों ने भी, प्रेमपूर्वक उनकी आरती उतारी।

श्लोक 50 (shiva.rudra.128.50)

गीतवादित्रघोषेण ब्रह्मघोषेण भूयसा । तदोत्सवो महानासीत्कीर्तनं च विशेषतः

gītavāditraghoṣeṇa brahmaghoṣeṇa bhūyasā tadotsavo mahānāsītkīrtanaṁ ca viśeṣataḥ

गीत-वाद्य की ध्वनि और भूरि वेदघोष से उस समय एक महान उत्सव हुआ, और विशेष रूप से भूरि कीर्तन भी हुआ।

श्लोक 51 (shiva.rudra.128.51)

गीतवाद्यैः सुप्रसन्नैस्तथा साञ्जलिभिर्मुने । स्तूयमानो जगन्नाथः सर्वैर्देवगणैरभूत्

gītavādyaiḥ suprasannaistathā sāñjalibhirmune stūyamāno jagannāthaḥ sarvairdevagaṇairabhūt

हे मुने! सुप्रसन्न गीत-वाद्यों और हाथ जोड़े हुए भक्तों द्वारा जगन्नाथ (शिव) की सभी देवगणों ने स्तुति की।

श्लोक 52 (shiva.rudra.128.52)

ततःस भगवान् रुद्रो भवान्या जगदम्बया । सर्वैः स्तुतो जगामाथ स्वगिरिं स्वगणैर्वृतः

tataḥsa bhagavān rudro bhavānyā jagadambayā sarvaiḥ stuto jagāmātha svagiriṁ svagaṇairvṛtaḥ

तब वे भगवान रुद्र, सबके द्वारा स्तुत होकर, जगदंबा भवानी के साथ अपने ही गणों से घिरे हुए अपने पर्वत को लौट गए।

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