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रुद्र संहिता · अध्याय 129

बाण-प्रलम्ब वध एवं कुमार की विजय, लिंग-स्थापना

अध्याय 128अध्याय-सूचीअध्याय 130

श्लोक 1 (shiva.rudra.129.1)

ब्रह्मोवाच एतस्मिन्नन्तरे तत्र क्रौञ्चनामाचलो मुने । आजगाम कुमारस्य शरणं बाणपीडितः

brahmovāca etasminnantare tatra krauñcanāmācalo mune ājagāma kumārasya śaraṇaṁ bāṇapīḍitaḥ

हे मुने! इसी बीच वहाँ क्रौंच नामक पर्वत, बाण से पीड़ित होकर, कुमार की शरण में आ पहुँचा।

श्लोक 2 (shiva.rudra.129.2)

पलायमानो यो युद्धादसोढा तेज ऐश्वरम् । तुतोदातीव स क्रौञ्चं कोट्यायुतबलान्वितः

palāyamāno yo yuddhādasoḍhā teja aiśvaram tutodātīva sa krauñcaṁ koṭyāyutabalānvitaḥ

अनेक करोड़ बल से युक्त वह असुर, ईश्वर के तेज को सहन न कर पाने के कारण युद्ध से भागा हुआ था, और उसने क्रौंच को अत्यंत पीड़ा दी।

श्लोक 3 (shiva.rudra.129.3)

प्रणिपत्य कुमारस्य स भक्त्या चरणाम्बुजम् । प्रेमनिर्भरया वाचा तुष्टाव गुहमादरात्

praṇipatya kumārasya sa bhaktyā caraṇāmbujam premanirbharayā vācā tuṣṭāva guhamādarāt

वह भक्तिपूर्वक कुमार के चरणकमलों में गिर पड़ा, और प्रेम से भरी वाणी से आदरपूर्वक गुह की स्तुति करने लगा।

श्लोक 4 (shiva.rudra.129.4)

क्रौञ्च उवाच कुमार स्कन्द देवेश तारकासुरनाशक । पाहि मां शरणापन्नं बाणासुरनिपीडितम्

krauñca uvāca kumāra skanda deveśa tārakāsuranāśaka pāhi māṁ śaraṇāpannaṁ bāṇāsuranipīḍitam

क्रौंच ने कहा -- हे कुमार, हे स्कंद, हे देवेश, हे तारकासुर के नाशक! शरणागत मुझ बाणासुर-पीड़ित की रक्षा करो।

श्लोक 5 (shiva.rudra.129.5)

सङ्गरात्ते महासेन समुच्छिन्नः पलायितः । न्यपीडयच्च माऽऽगत्य हा नाथ करुणाकर

saṅgarātte mahāsena samucchinnaḥ palāyitaḥ nyapīḍayacca mā''gatya hā nātha karuṇākara

हे महासेन, तुम्हारे संग्राम से टूटकर भागा हुआ वह मेरे पास आकर मुझे पीड़ा देने लगा। हा नाथ, हे करुणाकर!

श्लोक 6 (shiva.rudra.129.6)

तत्पीडितस्ते शरणमागतोऽहं सुदुःखितः । पलायमानो देवेश शरजन्मन् दयां कुरु

tatpīḍitaste śaraṇamāgato'haṁ suduḥkhitaḥ palāyamāno deveśa śarajanman dayāṁ kuru

उससे पीड़ित होकर, अत्यंत दुःखी और भागता हुआ मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। हे देवेश, हे शरजन्मा! मुझ पर दया करो।

श्लोक 7 (shiva.rudra.129.7)

दैत्यं तं नाशय विभो बाणाह्वं मां सुखीकुरु । दैत्यघ्नस्त्वं विशेषेण देवावनकरः स्वराट्

daityaṁ taṁ nāśaya vibho bāṇāhvaṁ māṁ sukhīkuru daityaghnastvaṁ viśeṣeṇa devāvanakaraḥ svarāṭ

हे विभो, बाण नामक उस दैत्य का नाश करो और मुझे सुखी करो। तुम विशेष रूप से दैत्यघाती और देवों के रक्षक स्वयं-सम्राट हो।

श्लोक 8 (shiva.rudra.129.8)

ब्रह्मोवाच इति क्रौञ्चस्तुतःस्कन्दः प्रसन्नो भक्तपालकः । गृहीत्वा शक्तिमतुलां स्वां सस्मार शिवो धिया

brahmovāca iti krauñcastutaḥskandaḥ prasanno bhaktapālakaḥ gṛhītvā śaktimatulāṁ svāṁ sasmāra śivo dhiyā

ब्रह्मा जी ने कहा -- क्रौंच द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर भक्तपालक स्कंद प्रसन्न हो गए; उन्होंने अपनी अनुपम शक्ति उठाई और मन में शिव का स्मरण किया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.129.9)

चिक्षेप तां समुद्दिश्य स बाणं शङ्करात्मजः । महाशब्दो बभूवाथ जज्वलुश्च दिशो नभः

cikṣepa tāṁ samuddiśya sa bāṇaṁ śaṅkarātmajaḥ mahāśabdo babhūvātha jajvaluśca diśo nabhaḥ

शंकर-पुत्र ने उसे बाण की ओर लक्ष्य करके फेंक दिया; तब महाध्वनि हुई और दिशाएँ तथा आकाश जल उठे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.129.10)

सबलं भस्मसात्कृत्वासुरं तं क्षणमात्रतः । गुहोपकण्ठं शक्तिः सा जगाम परमा मुने

sabalaṁ bhasmasātkṛtvāsuraṁ taṁ kṣaṇamātrataḥ guhopakaṇṭhaṁ śaktiḥ sā jagāma paramā mune

हे मुने, उस असुर को उसकी सेना सहित क्षणमात्र में भस्म कर वह परम शक्ति गुह के पास लौट आई।

श्लोक 11 (shiva.rudra.129.11)

ततः कुमारः प्रोवाच क्रौञ्चं गिरिवरं प्रभुः । निर्भयः स्वगृहं गच्छ नष्टः स सबलोऽसुरः

tataḥ kumāraḥ provāca krauñcaṁ girivaraṁ prabhuḥ nirbhayaḥ svagṛhaṁ gaccha naṣṭaḥ sa sabalo'suraḥ

तब प्रभु कुमार ने पर्वतश्रेष्ठ क्रौंच से कहा -- 'निर्भय होकर अपने घर जाओ, वह असुर अपनी सेना सहित नष्ट हो गया।'

श्लोक 12 (shiva.rudra.129.12)

तच्छुत्वा स्वामिवचनं मुदितो गिरिराट् तदा । स्तुत्वा गुहं तदारातिं स्वधाम प्रत्यपद्यत

tacchutvā svāmivacanaṁ mudito girirāṭ tadā stutvā guhaṁ tadārātiṁ svadhāma pratyapadyata

अपने स्वामी का यह वचन सुनकर पर्वतराज हर्षित हुए, गुह की, उस शत्रुनाशक की स्तुति करके अपने ही धाम को लौट गए।

श्लोक 13 (shiva.rudra.129.13)

ततः स्कन्दो महेशस्य मुदा स्थापितवान्मुने । त्रीणि लिङ्गानि तत्रैव पापघ्नानि विधानतः

tataḥ skando maheśasya mudā sthāpitavānmune trīṇi liṅgāni tatraiva pāpaghnāni vidhānataḥ

हे मुने, तब स्कंद ने हर्षपूर्वक विधिपूर्वक वहीं महेश के तीन पापनाशक लिंगों की स्थापना की।

श्लोक 14 (shiva.rudra.129.14)

प्रतिज्ञेश्वरनामादौ कपालेश्वरमादरात् । कुमारेश्वरमेवाथ सर्वसिद्धिप्रदं त्रयम्

pratijñeśvaranāmādau kapāleśvaramādarāt kumāreśvaramevātha sarvasiddhipradaṁ trayam

पहले प्रतिज्ञेश्वर नाम से, फिर आदरपूर्वक कपालेश्वर नाम से, और फिर कुमारेश्वर नाम से -- ये तीनों सर्वसिद्धिप्रद।

श्लोक 15 (shiva.rudra.129.15)

पुनःसर्वेश्वरस्तत्र जयस्तम्भसमीपतः । स्तम्भेश्वराभिधं लिङ्गं गुहः स्थापितवान्मुदा

punaḥsarveśvarastatra jayastambhasamīpataḥ stambheśvarābhidhaṁ liṅgaṁ guhaḥ sthāpitavānmudā

फिर विजय-स्तंभ के समीप वहाँ गुह ने हर्षपूर्वक सर्वेश्वर के स्तंभेश्वर नामक लिंग की स्थापना की।

श्लोक 16 (shiva.rudra.129.16)

ततः सर्वे सुरास्तत्र विष्णुप्रभृतयो मुदा । लिङ्गं स्थापितवन्तस्ते देवदेवस्य शूलिनः

tataḥ sarve surāstatra viṣṇuprabhṛtayo mudā liṅgaṁ sthāpitavantaste devadevasya śūlinaḥ

तब वहाँ विष्णु आदि समस्त देवगणों ने भी हर्षपूर्वक त्रिशूलधारी देवाधिदेव का एक लिंग स्थापित किया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.129.17)

सर्वेषां शिवलिङ्गानां महिमाभूत्तदाद्भुतः । सर्वकामप्रदश्चापि मुक्तिदो भक्तिकारिणाम्

sarveṣāṁ śivaliṅgānāṁ mahimābhūttadādbhutaḥ sarvakāmapradaścāpi muktido bhaktikāriṇām

इन सभी शिवलिंगों की महिमा तब अद्भुत हो गई -- सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली और भक्ति करने वालों को मुक्ति देने वाली।

श्लोक 18 (shiva.rudra.129.18)

ततः सर्वे सुरा विष्णुप्रमुखाः प्रीतमानसाः । ऐच्छन्गिरिवरं गन्तुं पुरस्कृत्य गुहं मुदा

tataḥ sarve surā viṣṇupramukhāḥ prītamānasāḥ aicchangirivaraṁ gantuṁ puraskṛtya guhaṁ mudā

तब विष्णु आदि सभी देवगण प्रसन्नचित्त होकर, गुह को आगे करके उस पर्वतश्रेष्ठ की ओर जाने की इच्छा करने लगे।

श्लोक 19 (shiva.rudra.129.19)

तस्मिन्नवसरे शेषपुत्रः कुमुदनामकः । आजगाम कुमारस्य शरणं दैत्यपीडितः

tasminnavasare śeṣaputraḥ kumudanāmakaḥ ājagāma kumārasya śaraṇaṁ daityapīḍitaḥ

उसी अवसर पर शेष का पुत्र, कुमुद नामक, किसी दैत्य से पीड़ित होकर कुमार की शरण में आया।

श्लोक 20 (shiva.rudra.129.20)

प्रलम्बाख्योऽसुरो यो हि रणादस्मात्पलायितः । स तत्रोपद्रवं चक्रे प्रबलस्तारकानुगः

pralambākhyo'suro yo hi raṇādasmātpalāyitaḥ sa tatropadravaṁ cakre prabalastārakānugaḥ

प्रलम्ब नामक जो असुर इस युद्धभूमि से भाग गया था, वह तारक का अनुयायी बलवान असुर वहाँ उत्पात मचाने लगा।

श्लोक 21 (shiva.rudra.129.21)

सोऽथ शेषस्य तनयः कुमुदोऽहिपतेर्महान् । कुमारशरणं प्राप्तस्तुष्टाव गिरिजात्मजम्

so'tha śeṣasya tanayaḥ kumudo'hipatermahān kumāraśaraṇaṁ prāptastuṣṭāva girijātmajam

नागराज शेष का वह महान पुत्र कुमुद, कुमार की शरण पाकर, गिरिजा-पुत्र की स्तुति करने लगा।

श्लोक 22 (shiva.rudra.129.22)

कुमुद उवाच देवदेव महादेव वरतात महाप्रभो । पीडितोऽहं प्रलम्बेन त्वाऽहं शरणमागतः

kumuda uvāca devadeva mahādeva varatāta mahāprabho pīḍito'haṁ pralambena tvā'haṁ śaraṇamāgataḥ

कुमुद ने कहा -- हे देवाधिदेव, हे महादेव, हे श्रेष्ठ पितृतुल्य, हे महाप्रभो! मैं प्रलम्ब से पीड़ित होकर तुम्हारी शरण में आया हूँ।

श्लोक 23 (shiva.rudra.129.23)

पाहि मां शरणापन्नं प्रलम्बासुरपीडितम् । कुमार स्कन्द देवेश तारकारे महाप्रभो

pāhi māṁ śaraṇāpannaṁ pralambāsurapīḍitam kumāra skanda deveśa tārakāre mahāprabho

प्रलम्बासुर से पीड़ित शरणागत मेरी रक्षा करो, हे कुमार, हे स्कंद, हे देवेश, हे तारक के शत्रु, हे महाप्रभो!

श्लोक 24 (shiva.rudra.129.24)

त्वं दीनबन्धुः करुणासिन्धुरानतवत्सलः । खलनिग्रहकर्ता हि शरण्यश्च सतां गतिः

tvaṁ dīnabandhuḥ karuṇāsindhurānatavatsalaḥ khalanigrahakartā hi śaraṇyaśca satāṁ gatiḥ

तुम दीनों के बंधु हो, करुणा के सागर हो, नमन करने वालों पर वत्सल हो, दुष्टों का दमन करने वाले हो, शरणागतों के आश्रय और सज्जनों की गति हो।

श्लोक 25 (shiva.rudra.129.25)

कुमुदेनस्तुतश्चेत्थं विज्ञप्तस्तद्वधाय हि । स्वाश्च शक्तिं स जग्राह स्मृत्वा शिवपदाम्बुजौ

kumudenastutaścetthaṁ vijñaptastadvadhāya hi svāśca śaktiṁ sa jagrāha smṛtvā śivapadāmbujau

इस प्रकार कुमुद द्वारा स्तुत और उस असुर के वध के लिए विनती किए जाने पर, शिव के चरणकमलों का स्मरण करते हुए उन्होंने अपनी शक्ति उठाई।

श्लोक 26 (shiva.rudra.129.26)

चिक्षेप तां समुद्दिश्य प्रलम्बं गिरिजासुतः । महाशब्दो बभूवाथ जज्वलुश्च दिशो नभः

cikṣepa tāṁ samuddiśya pralambaṁ girijāsutaḥ mahāśabdo babhūvātha jajvaluśca diśo nabhaḥ

गिरिजा-पुत्र ने उसे प्रलम्ब की ओर लक्ष्य करके फेंक दिया; तब महाध्वनि हुई और दिशाएँ तथा आकाश जल उठे।

श्लोक 27 (shiva.rudra.129.27)

तं सायुतबलं शक्तिर्द्रुतं कृत्वा च भस्मसात् । गुहोपकण्ठं सहसाजगामाक्लिष्टकारिणी

taṁ sāyutabalaṁ śaktirdrutaṁ kṛtvā ca bhasmasāt guhopakaṇṭhaṁ sahasājagāmākliṣṭakāriṇī

दस सहस्र सेना सहित उसे शीघ्र ही भस्म करके, वह अक्लांतकारिणी (कभी न थकने वाली) शक्ति सहसा गुह के पास लौट आई।

श्लोक 28 (shiva.rudra.129.28)

ततः कुमारः प्रोवाच कुमुदं नागबालकम् । निर्भयः स्वगृहं गच्छ नष्टः स सबलोऽसुरः

tataḥ kumāraḥ provāca kumudaṁ nāgabālakam nirbhayaḥ svagṛhaṁ gaccha naṣṭaḥ sa sabalo'suraḥ

तब कुमार ने नागबालक कुमुद से कहा -- 'निर्भय होकर अपने घर जाओ, वह असुर अपनी सेना सहित नष्ट हो गया।'

श्लोक 29 (shiva.rudra.129.29)

तच्छुत्वा गुहवाक्यं स कुमुदोऽहिपतेः सुतः । स्तुत्वा कुमारं नत्वा च पातालं मुदितो ययौ

tacchutvā guhavākyaṁ sa kumudo'hipateḥ sutaḥ stutvā kumāraṁ natvā ca pātālaṁ mudito yayau

गुह के इस वचन को सुनकर नागपति-पुत्र वह कुमुद, कुमार की स्तुति करके और उन्हें नमन करके हर्षपूर्वक पाताल को गया।

श्लोक 30 (shiva.rudra.129.30)

एवं कुमारविजयं वर्णितं ते मुनीश्वर । चरितं तारकवधं परमाश्चर्यकारकम्

evaṁ kumāravijayaṁ varṇitaṁ te munīśvara caritaṁ tārakavadhaṁ paramāścaryakārakam

हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने तुम्हें कुमार की विजय का, तारक-वध का, यह परम आश्चर्यकारी चरित्र सुनाया।

श्लोक 31 (shiva.rudra.129.31)

सर्वपापहरं दिव्यं सर्वकामप्रदं नृणाम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं भुक्तिमुक्तिप्रदं सताम्

sarvapāpaharaṁ divyaṁ sarvakāmapradaṁ nṛṇām dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ bhuktimuktipradaṁ satām

यह सम्पूर्ण पापों का नाशक, दिव्य, मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है; यह धन्य, यशदायी, आयुष्यवर्धक तथा सज्जनों को भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.129.32)

ये कीर्तयन्ति सुयशोऽमितभाग्ययुता नराः । कुमारचरितं दिव्यं शिवलोकं प्रयान्ति ते

ye kīrtayanti suyaśo'mitabhāgyayutā narāḥ kumāracaritaṁ divyaṁ śivalokaṁ prayānti te

जो अपार सौभाग्य से युक्त मनुष्य इस दिव्य कुमार-चरित्र का सुयश कीर्तन करते हैं, वे शिवलोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 33 (shiva.rudra.129.33)

श्रोष्यन्ति ये च तत्कीर्तिं भक्त्या श्रद्धान्विता जनाः । मुक्तिं प्राप्स्यन्ति ते दिव्यामिह भुक्त्वा परं सुखम्

śroṣyanti ye ca tatkīrtiṁ bhaktyā śraddhānvitā janāḥ muktiṁ prāpsyanti te divyāmiha bhuktvā paraṁ sukham

और जो श्रद्धायुक्त लोग भक्तिपूर्वक इस कीर्ति को सुनते हैं, वे इस लोक में परम सुख भोगकर उस दिव्य मुक्ति को प्राप्त करेंगे।

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