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रुद्र संहिता · अध्याय 130

तारक-वध के पश्चात् देवों की स्तुति

अध्याय 129अध्याय-सूचीअध्याय 131

श्लोक 1 (shiva.rudra.130.1)

ब्रह्मोवाच निहतं तारकं दृष्ट्वा देवा विष्णुपुरोगमाः । तुष्टुवुः शाङ्करिं भक्त्या सर्वेऽन्ये मुदिताननाः

brahmovāca nihataṁ tārakaṁ dṛṣṭvā devā viṣṇupurogamāḥ tuṣṭuvuḥ śāṅkariṁ bhaktyā sarve'nye muditānanāḥ

तारक को मारा गया देखकर विष्णु आदि देवगण भक्तिपूर्वक शांकरि (शंकर-पुत्र) की स्तुति करने लगे, सभी प्रसन्नमुख होकर।

श्लोक 2 (shiva.rudra.130.2)

देवा ऊचुः । नमः कल्याणरूपाय नमस्ते विश्वमङ्गल । विश्वबन्धो नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन

devā ūcuḥ namaḥ kalyāṇarūpāya namaste viśvamaṅgala viśvabandho namaste'stu namaste viśvabhāvana

देवों ने कहा -- कल्याणस्वरूप को नमस्कार, विश्वमंगल को तुम्हें नमस्कार। विश्वबंधु को नमस्कार हो, विश्वभावन को नमस्कार हो।

श्लोक 3 (shiva.rudra.130.3)

नमोस्तु ते दानववर्यहन्त्रे बाणासुरप्राणहराय देव । प्रलम्बनाशाय पवित्ररूपिणे नमोनमः शङ्करतात तुभ्यम्

namostu te dānavavaryahantre bāṇāsuraprāṇaharāya deva pralambanāśāya pavitrarūpiṇe namonamaḥ śaṅkaratāta tubhyam

दानवश्रेष्ठ के संहारक, बाणासुर के प्राणहर्ता हे देव, तुम्हें नमस्कार हो। प्रलम्ब के नाशक, पवित्ररूप, हे शंकर-पुत्र, तुम्हें बारंबार नमस्कार।

श्लोक 4 (shiva.rudra.130.4)

त्वमेव कर्त्ता जगतां च भर्त्ता त्वमेव हर्त्ता शुचिज प्रसीद । प्रपञ्चभूतस्तव लोकबिम्बः प्रसीद शम्भ्वात्मज दीनबन्धो

tvameva karttā jagatāṁ ca bharttā tvameva harttā śucija prasīda prapañcabhūtastava lokabimbaḥ prasīda śambhvātmaja dīnabandho

तुम्हीं जगत के कर्ता, तुम्हीं भर्ता और तुम्हीं संहर्ता हो, हे पवित्रजन्मा! प्रसन्न होओ। यह सम्पूर्ण दृश्य जगत तुम्हारा ही प्रतिबिंब है; हे शंभु-पुत्र, हे दीनबंधु, प्रसन्न होओ।

श्लोक 5 (shiva.rudra.130.5)

देवरक्षाकर स्वामिन् रक्ष नः सर्वदा प्रभो । देवप्राणावनकर प्रसीद करुणाकर

devarakṣākara svāmin rakṣa naḥ sarvadā prabho devaprāṇāvanakara prasīda karuṇākara

हे देवरक्षक स्वामिन्, हे प्रभो, सदा हमारी रक्षा करो। हे देवप्राणरक्षक, हे करुणाकर, प्रसन्न होओ।

श्लोक 6 (shiva.rudra.130.6)

हत्वा त्वं तारकं दैत्यं परिवारयुतं विभो । मोचिताः सकला देवा विपद्भ्यः परमेश्वर

hatvā tvaṁ tārakaṁ daityaṁ parivārayutaṁ vibho mocitāḥ sakalā devā vipadbhyaḥ parameśvara

हे विभो, अपने परिवार सहित उस दैत्य तारक का वध करके, हे परमेश्वर, तुमने सभी देवों को विपत्ति से मुक्त कर दिया है।

श्लोक 7 (shiva.rudra.130.7)

ब्रह्मोवाच एवं स्तुतः कुमारोऽसौ देवैर्विष्णुमुखैः प्रभुः । वरान्ददावभिनवान्सर्वेभ्यः क्रमशो मुने

brahmovāca evaṁ stutaḥ kumāro'sau devairviṣṇumukhaiḥ prabhuḥ varāndadāvabhinavānsarvebhyaḥ kramaśo mune

ब्रह्मा जी ने कहा -- हे मुने, विष्णु आदि देवों द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर प्रभु कुमार ने क्रमशः सबको नए-नए वर दिए।

श्लोक 8 (shiva.rudra.130.8)

शैलान्निरीक्ष्य स्तुवतस्ततःस गिरिशात्मजः । सुप्रसन्नतरो भूत्वा प्रोवाच प्रददद्वरान्

śailānnirīkṣya stuvatastataḥsa giriśātmajaḥ suprasannataro bhūtvā provāca pradadadvarān

तब पर्वतों को स्तुति करते देखकर गिरीश-पुत्र अत्यंत प्रसन्न होकर बोले, और वर देने लगे।

श्लोक 9 (shiva.rudra.130.9)

स्कन्द उवाच यूयं सर्वे पर्वता हि पूजनीयास्तपस्विभिः । कर्मिभिर्ज्ञानिभिश्चैव सेव्यमाना भविष्यथ

skanda uvāca yūyaṁ sarve parvatā hi pūjanīyāstapasvibhiḥ karmibhirjñānibhiścaiva sevyamānā bhaviṣyatha

स्कंद ने कहा -- तुम सब पर्वत तपस्वियों द्वारा पूजनीय होंगे, तथा कर्मकांडियों और ज्ञानियों द्वारा भी सेवा प्राप्त करोगे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.130.10)

शम्भोर्विशिष्टरूपाणि लिङ्गरूपाणि चैव हि । भविष्यथ न सन्देहः पर्वता वचनान्मम

śambhorviśiṣṭarūpāṇi liṅgarūpāṇi caiva hi bhaviṣyatha na sandehaḥ parvatā vacanānmama

मेरे इस वचन से, हे पर्वतो, निःसंदेह तुम शंभु के विशिष्ट रूप, लिंगरूप बन जाओगे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.130.11)

योऽयं मातामहो मेऽद्य हिमवान्पर्वतोत्तमः । तपस्विनां महाभागः फलदो हि भविष्यति

yo'yaṁ mātāmaho me'dya himavānparvatottamaḥ tapasvināṁ mahābhāgaḥ phalado hi bhaviṣyati

मेरे नाना यह हिमवान, जो पर्वतों में श्रेष्ठ है, महाभाग्यशाली, तपस्वियों को फल देने वाला बनेगा।

श्लोक 12 (shiva.rudra.130.12)

देवा ऊचुः । एवं दत्त्वा वरान् हत्वा तारकं चासुराधिपम् । त्वया कृताश्च सुखिनो वयं सर्वे चराचराः

devā ūcuḥ evaṁ dattvā varān hatvā tārakaṁ cāsurādhipam tvayā kṛtāśca sukhino vayaṁ sarve carācarāḥ

देवों ने कहा -- इस प्रकार वर देकर और असुराधिप तारक का वध करके, तुमने हम सभी चराचर को सुखी बना दिया है।

श्लोक 13 (shiva.rudra.130.13)

इदानीं खलु सुप्रीत्या कैलासं गिरिशालयम् । जननी जनकौ द्रष्टुं शिवाशम्भू त्वमर्हसि

idānīṁ khalu suprītyā kailāsaṁ giriśālayam jananī janakau draṣṭuṁ śivāśambhū tvamarhasi

अब तुम्हें प्रेमपूर्वक अपने माता-पिता, शिवा और शंभु के दर्शन हेतु गिरीश के धाम कैलास जाना चाहिए।

श्लोक 14 (shiva.rudra.130.14)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा निखिला देवा विष्ण्वाद्याः प्राप्तशासनाः । कृत्वा महोत्सवं भूरि सकुमारा ययुर्गिरिम्

brahmovāca ityuktvā nikhilā devā viṣṇvādyāḥ prāptaśāsanāḥ kṛtvā mahotsavaṁ bhūri sakumārā yayurgirim

ब्रह्मा जी ने कहा -- ऐसा कहकर विष्णु आदि समस्त देवों ने आज्ञा पाकर, भूरि महोत्सव मनाते हुए कुमार सहित पर्वत की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 15 (shiva.rudra.130.15)

कुमारे गच्छति विभौ कैलासं शङ्करालयम् । महामङ्गलमुत्तस्थौ जयशब्दो बभूव ह

kumāre gacchati vibhau kailāsaṁ śaṅkarālayam mahāmaṅgalamuttasthau jayaśabdo babhūva ha

जब प्रभु कुमार शंकर के धाम कैलास की ओर जा रहे थे, तब महामंगल-ध्वनि और जय-जयकार गूँज उठा।

श्लोक 16 (shiva.rudra.130.16)

आरुरोह कुमारोऽसौ विमानं परमर्द्धिमत् । सर्वतोलङ्कृतं रम्यं सर्वोपरि विराजितम्

āruroha kumāro'sau vimānaṁ paramarddhimat sarvatolaṅkṛtaṁ ramyaṁ sarvopari virājitam

वह कुमार परम ऐश्वर्ययुक्त, सर्वत्र अलंकृत, रमणीय, सबसे ऊपर सुशोभित विमान पर सवार हुए।

श्लोक 17 (shiva.rudra.130.17)

अहं विष्णुश्च समुदौ तदा चामरधारिणौ । गुह मूर्ध्नि महाप्रीत्या मुनेऽभूवं ह्यतन्द्रितौ

ahaṁ viṣṇuśca samudau tadā cāmaradhāriṇau guha mūrdhni mahāprītyā mune'bhūvaṁ hyatandritau

हे मुने, मैं और विष्णु दोनों, बड़े प्रेम से, गुह के सिर पर बिना थके चंवर डुलाते रहे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.130.18)

इन्द्राद्या अमराः सर्वे कुर्वन्तो गुहसेवनम् । यथोचितं चतुर्दिक्षु जग्मुश्च प्रमुदास्तदा

indrādyā amarāḥ sarve kurvanto guhasevanam yathocitaṁ caturdikṣu jagmuśca pramudāstadā

इंद्र आदि सभी अमरगण गुह की सेवा करते हुए, यथोचित रूप से चारों दिशाओं में हर्षपूर्वक चले।

श्लोक 19 (shiva.rudra.130.19)

शम्भोर्जयं प्रभाषन्तः प्रापुस्ते शम्भुपर्वतम् । सानन्दा विविशुस्तत्रोच्चरितो मङ्गलध्वनिः

śambhorjayaṁ prabhāṣantaḥ prāpuste śambhuparvatam sānandā viviśustatroccarito maṅgaladhvaniḥ

शंभु की विजय की घोषणा करते हुए वे शंभु-पर्वत पर पहुँचे, और आनंदपूर्वक उसमें प्रवेश किया; वहाँ मंगल-ध्वनि गूँज उठी।

श्लोक 20 (shiva.rudra.130.20)

दृष्ट्वा शिवं शिवां चैव सर्वे विष्ण्वादयो द्रुतम् । प्रणम्य शङ्करं भक्त्या करौ बद्ध्वा विनम्रकाः

dṛṣṭvā śivaṁ śivāṁ caiva sarve viṣṇvādayo drutam praṇamya śaṅkaraṁ bhaktyā karau baddhvā vinamrakāḥ

शिव और शिवा दोनों को देखकर विष्णु आदि सभी ने तुरंत भक्तिपूर्वक शंकर को प्रणाम किया, हाथ जोड़े हुए, विनम्र होकर।

श्लोक 21 (shiva.rudra.130.21)

कुमारोऽपि विनीतात्मा विमानादवतीर्य च । प्रणनाम मुदा शम्भुं शिवां सिंहासनस्थिताम्

kumāro'pi vinītātmā vimānādavatīrya ca praṇanāma mudā śambhuṁ śivāṁ siṁhāsanasthitām

विनीत हृदय कुमार भी विमान से उतरकर, हर्षपूर्वक शंभु और सिंहासनस्थ शिवा को प्रणाम करने लगे।

श्लोक 22 (shiva.rudra.130.22)

अथ दृष्ट्वा कुमारं तं तनयं प्राणवल्लभम् । तौ दम्पती शिवौ देवौ मुमुदातेऽति नारद

atha dṛṣṭvā kumāraṁ taṁ tanayaṁ prāṇavallabham tau dampatī śivau devau mumudāte'ti nārada

हे नारद, अपने प्राणों से भी प्रिय पुत्र कुमार को देखकर वह दिव्य दंपती, शिव और शिवा, अत्यंत आनंदित हो उठे।

श्लोक 23 (shiva.rudra.130.23)

महाप्रभुःसमुत्थाप्य तमुत्सङ्गे न्यवेशयत् । मूर्ध्नि जघ्रौ मुदा स्नेहात्तं पस्पर्श करेण ह

mahāprabhuḥsamutthāpya tamutsaṅge nyaveśayat mūrdhni jaghrau mudā snehāttaṁ pasparśa kareṇa ha

महाप्रभु ने उन्हें उठाकर अपनी गोद में बिठाया; प्रेम और हर्ष से उनके सिर को सूँघा और अपने हाथ से उन्हें स्पर्श किया।

श्लोक 24 (shiva.rudra.130.24)

महानन्दभरः शम्भुश्चकार मुखचुम्बनम् । कुमारस्य महास्नेहात् तारकारेर्महाप्रभोः

mahānandabharaḥ śambhuścakāra mukhacumbanam kumārasya mahāsnehāt tārakārermahāprabhoḥ

महाआनंद से भरे शंभु ने तारक के शत्रु उस महाप्रभु कुमार के मुख का गहरे स्नेह से चुंबन किया।

श्लोक 25 (shiva.rudra.130.25)

शिवापि तं समुत्थाप्य स्वोत्सङ्गे संन्यवेशयत् । कृत्वा मूर्ध्नि महास्नेहात् तन्मुखाब्जं चुचुम्ब हि

śivāpi taṁ samutthāpya svotsaṅge saṁnyaveśayat kṛtvā mūrdhni mahāsnehāt tanmukhābjaṁ cucumba hi

शिवा ने भी उन्हें उठाकर अपनी गोद में बिठाया, गहरे स्नेह से उनके सिर को सूँघा और उनके मुखकमल का चुंबन किया।

श्लोक 26 (shiva.rudra.130.26)

तयोस्तदा महामोदो ववृधेऽतीव नारद । दम्पत्योः शिवयोस्तात भवाचारं प्रकुर्वतोः

tayostadā mahāmodo vavṛdhe'tīva nārada dampatyoḥ śivayostāta bhavācāraṁ prakurvatoḥ

हे नारद, हे तात, उस दंपती शिव-शिवा का, सामान्य लौकिक स्नेह-व्यवहार करते हुए, महाआनंद उस समय अत्यंत बढ़ गया।

श्लोक 27 (shiva.rudra.130.27)

तदोत्सवो महानासीन्नानाश्चर्यः शिवालये । जयशब्दो नमश्शब्दो बभूवातीव सर्वतः

tadotsavo mahānāsīnnānāścaryaḥ śivālaye jayaśabdo namaśśabdo babhūvātīva sarvataḥ

तब शिव के धाम में अनेक आश्चर्यों से भरा महान उत्सव हुआ, और सर्वत्र 'जय' और 'नमः' का उद्घोष अत्यधिक गूँज उठा।

श्लोक 28 (shiva.rudra.130.28)

ततःसुरगणाः सर्वे विष्ण्वाद्या मुनयस्तथा । सुप्रणम्य मुदा शम्भुं तुष्टुवुः सशिवं मुने

tataḥsuragaṇāḥ sarve viṣṇvādyā munayastathā supraṇamya mudā śambhuṁ tuṣṭuvuḥ saśivaṁ mune

हे मुने, तब विष्णु आदि सभी देवगणों और मुनियों ने भी हर्षपूर्वक शंभु को प्रणाम करके शिवा सहित उनकी स्तुति की।

श्लोक 29 (shiva.rudra.130.29)

देवा ऊचुः । देवदेव महादेव भक्तानामभयप्रद । नमो नमस्ते बहुशः कृपाकर महेश्वर

devā ūcuḥ devadeva mahādeva bhaktānāmabhayaprada namo namaste bahuśaḥ kṛpākara maheśvara

देवों ने कहा -- हे देवाधिदेव, हे महादेव, भक्तों को अभय देने वाले! हे कृपाकर महेश्वर, तुम्हें बारंबार नमस्कार, नमस्कार।

श्लोक 30 (shiva.rudra.130.30)

अद्भुता ते महादेव महालीला सुखप्रदा । सर्वेषां शङ्कर सतां दीनबन्धो महाप्रभो

adbhutā te mahādeva mahālīlā sukhapradā sarveṣāṁ śaṅkara satāṁ dīnabandho mahāprabho

हे महादेव, तुम्हारी यह अद्भुत महालीला सज्जनों को सुख देने वाली है, हे शंकर, हे दीनबंधु, हे महाप्रभो।

श्लोक 31 (shiva.rudra.130.31)

एवं मूढधियश्चाज्ञाः पूजायां ते सनातनम् । आवाहनं न जानीमो गतिं नैव प्रभोद्भुताम्

evaṁ mūḍhadhiyaścājñāḥ pūjāyāṁ te sanātanam āvāhanaṁ na jānīmo gatiṁ naiva prabhodbhutām

हम मूढ़बुद्धि और अज्ञानी तुम्हारी सनातन पूजा-विधि का आवाहन नहीं जानते, न ही हे प्रभो, तुम्हारी अद्भुत गति जानते हैं।

श्लोक 32 (shiva.rudra.130.32)

गङ्गासलिलधाराय ह्याधाराय गुणात्मने । नमस्ते त्रिदशेशाय शङ्कराय नमोनमः

gaṅgāsaliladhārāya hyādhārāya guṇātmane namaste tridaśeśāya śaṅkarāya namonamaḥ

गंगाजल की धारा के आधार, गुणों की आत्मा -- हे त्रिदशेश (देवेश), तुम्हें नमस्कार, हे शंकर, बारंबार नमस्कार।

श्लोक 33 (shiva.rudra.130.33)

वृषाङ्काय महेशाय गणानां पतये नमः । सर्वेश्वराय देवाय त्रिलोकपतये नमः

vṛṣāṅkāya maheśāya gaṇānāṁ pataye namaḥ sarveśvarāya devāya trilokapataye namaḥ

वृषभ-चिह्नधारी महेश को, गणों के स्वामी को नमस्कार। सर्वेश्वर देव, त्रिलोक के स्वामी को नमस्कार।

श्लोक 34 (shiva.rudra.130.34)

संहर्त्रे जगतां नाथ सर्वेषां ते नमो नमः । भर्त्रे कर्त्रे च देवेश त्रिगुणेशाय शाश्वते

saṁhartre jagatāṁ nātha sarveṣāṁ te namo namaḥ bhartre kartre ca deveśa triguṇeśāya śāśvate

हे नाथ, समस्त जगतों के संहारक तुम्हें बारंबार नमस्कार। हे देवेश, भर्ता और कर्ता, त्रिगुणेश, शाश्वत तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 35 (shiva.rudra.130.35)

विसङ्गाय परेशाय शिवाय परमात्मने । निष्प्रपञ्चाय शुद्धाय परमायाव्ययाय च

visaṅgāya pareśāya śivāya paramātmane niṣprapañcāya śuddhāya paramāyāvyayāya ca

असंग परमेश को, शिव को, परमात्मा को; निष्प्रपंच, शुद्ध, परम और अव्यय को नमस्कार।

श्लोक 36 (shiva.rudra.130.36)

दण्डहस्ताय कालाय पाशहस्ताय ते नमः । वेदमन्त्रप्रधानाय शतजिह्वाय ते नमः

daṇḍahastāya kālāya pāśahastāya te namaḥ vedamantrapradhānāya śatajihvāya te namaḥ

दंडधारी काल को, पाशधारी को तुम्हें नमस्कार। वेदमंत्रों में प्रधान, शतजिह्व को तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 37 (shiva.rudra.130.37)

भूतं भव्यं भविष्यं च स्थावरं जङ्गमं च यत् । तव देहात्समुत्पन्नं सर्वथा परमेश्वर

bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyaṁ ca sthāvaraṁ jaṅgamaṁ ca yat tava dehātsamutpannaṁ sarvathā parameśvara

जो हो चुका, जो है और जो होने वाला है, स्थावर और जंगम जो कुछ भी है -- हे परमेश्वर, सब कुछ सर्वथा तुम्हारे ही शरीर से उत्पन्न है।

श्लोक 38 (shiva.rudra.130.38)

पाहि नः सर्वदा स्वामिन्प्रसीद भगवन्प्रभो । वयं ते शरणापन्नाः सर्वथा परमेश्वर

pāhi naḥ sarvadā svāminprasīda bhagavanprabho vayaṁ te śaraṇāpannāḥ sarvathā parameśvara

हे स्वामिन्, सदा हमारी रक्षा करो, हे भगवन् प्रभो, प्रसन्न होओ। हे परमेश्वर, हम सर्वथा तुम्हारी शरण में आए हैं।

श्लोक 39 (shiva.rudra.130.39)

शितिकण्ठाय रुद्राय स्वाहाकाराय ते नमः । अरूपाय सरूपाय विश्वरूपाय ते नमः

śitikaṇṭhāya rudrāya svāhākārāya te namaḥ arūpāya sarūpāya viśvarūpāya te namaḥ

शितिकंठ, रुद्र, स्वाहाकार को तुम्हें नमस्कार। अरूप और सरूप, विश्वरूप को तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 40 (shiva.rudra.130.40)

शिवाय नीलकण्ठाय चिताभस्माङ्गधारिणे । नित्यं नीलशिखण्डाय श्रीकण्ठाय नमोनमः

śivāya nīlakaṇṭhāya citābhasmāṅgadhāriṇe nityaṁ nīlaśikhaṇḍāya śrīkaṇṭhāya namonamaḥ

शिव, नीलकंठ, चिता-भस्म से अंगों को धारण करने वाले; नित्य नीलशिखंड, श्रीकंठ को बारंबार नमस्कार।

श्लोक 41 (shiva.rudra.130.41)

सर्वप्रणतदेहाय संयमप्रणताय च । महादेवाय शर्वाय सर्वार्चितपदाय च

sarvapraṇatadehāya saṁyamapraṇatāya ca mahādevāya śarvāya sarvārcitapadāya ca

जिनके आगे सबका शरीर झुक जाता है, जो स्वयं संयम के आगे झुकते हैं; महादेव को, शर्व को, जिनके चरण सबसे पूजित हैं, उन्हें नमस्कार।

श्लोक 42 (shiva.rudra.130.42)

त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः । आत्मा च सर्वभूतानां साङ्ख्यैः पुरुष उच्यसे

tvaṁ brahmā sarvadevānāṁ rudrāṇāṁ nīlalohitaḥ ātmā ca sarvabhūtānāṁ sāṅkhyaiḥ puruṣa ucyase

तुम्हीं सब देवों में ब्रह्मा हो, रुद्रों में नीललोहित हो; तुम्हीं सब भूतों की आत्मा हो, सांख्यवादियों द्वारा पुरुष कहलाते हो।

श्लोक 43 (shiva.rudra.130.43)

पर्वतानां सुमेरुस्त्वं नक्षत्राणां च चन्द्रमाः । ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं देवानां वासवस्तथा

parvatānāṁ sumerustvaṁ nakṣatrāṇāṁ ca candramāḥ ṛṣīṇāṁ ca vasiṣṭhastvaṁ devānāṁ vāsavastathā

पर्वतों में तुम सुमेरु हो, नक्षत्रों में चंद्रमा; ऋषियों में तुम वसिष्ठ हो, तथा देवों में वासव (इंद्र)।

श्लोक 44 (shiva.rudra.130.44)

ॐङ्कारस्सर्ववेदानां त्राता भव महेश्वर । त्वं च लोकहितार्थाय भूतानि परिषिञ्चसि

oṁṅkārassarvavedānāṁ trātā bhava maheśvara tvaṁ ca lokahitārthāya bhūtāni pariṣiñcasi

तुम सब वेदों के ॐकार हो; हे महेश्वर, हमारे रक्षक बनो। तुम लोकहित के लिए ही सब प्राणियों का पोषण करते हो।

श्लोक 45 (shiva.rudra.130.45)

महेश्वर महाभाग शुभाशुभनिरीक्षक । आप्यायास्मान्हि देवेश कर्तॄन्वै वचनं तव

maheśvara mahābhāga śubhāśubhanirīkṣaka āpyāyāsmānhi deveśa kartṝnvai vacanaṁ tava

हे महेश्वर, हे महाभाग, शुभ-अशुभ के साक्षी! हे देवेश, तुम्हारे वचन का पालन करने वाले हम सबका पोषण करो।

श्लोक 46 (shiva.rudra.130.46)

रूपकोटिसहस्रेषु रूपकोटिशतेषु ते । अन्तं गन्तुं न शक्ताः स्म देवदेव नमोऽस्तु ते

rūpakoṭisahasreṣu rūpakoṭiśateṣu te antaṁ gantuṁ na śaktāḥ sma devadeva namo'stu te

तुम्हारे करोड़ों-अरबों रूपों का, तुम्हारे शतकोटि रूपों का अंत पाने में हम असमर्थ हैं। हे देवाधिदेव, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 47 (shiva.rudra.130.47)

ब्रह्मोवाच इति स्तुत्वाऽखिला देवा विष्ण्वाद्याःप्रमुखस्थिताः । मुहुर्मुहुस्सुप्रणम्य स्कन्दं कृत्वा पुरस्सरम्

brahmovāca iti stutvā'khilā devā viṣṇvādyāḥpramukhasthitāḥ muhurmuhussupraṇamya skandaṁ kṛtvā purassaram

ब्रह्मा जी ने कहा -- इस प्रकार स्तुति करके विष्णु आदि प्रमुख सभी देवगणों ने स्कंद को आगे करके बार-बार भलीभाँति प्रणाम किया।

श्लोक 48 (shiva.rudra.130.48)

देवस्तुतिं समाकर्ण्य शिवःसर्वेश्वरः स्वराट् । सुप्रसन्नो बभूवाथ विजहास दयापरः

devastutiṁ samākarṇya śivaḥsarveśvaraḥ svarāṭ suprasanno babhūvātha vijahāsa dayāparaḥ

देवों की स्तुति सुनकर सर्वेश्वर, स्वयं-सम्राट शिव अत्यंत प्रसन्न हो गए और मुस्कुरा उठे, दयालु हृदय से।

श्लोक 49 (shiva.rudra.130.49)

उवाच सुप्रसन्नात्मा विष्ण्वादीन्सुरसत्तमान् । शङ्करः परमेशानो दीनबन्धुःसतां गतिः

uvāca suprasannātmā viṣṇvādīnsurasattamān śaṅkaraḥ parameśāno dīnabandhuḥsatāṁ gatiḥ

दीनबंधु, सज्जनों की गति, परमेशान शंकर ने प्रसन्नचित्त होकर विष्णु आदि श्रेष्ठ देवताओं से कहा।

श्लोक 50 (shiva.rudra.130.50)

शिव उवाच हे हरे हे विधे देवा वाक्यं मे शृणुतादरात् । सर्वथाऽहं सतां त्राता देवानां वः कृपानिधिः

śiva uvāca he hare he vidhe devā vākyaṁ me śṛṇutādarāt sarvathā'haṁ satāṁ trātā devānāṁ vaḥ kṛpānidhiḥ

शिव ने कहा -- हे हरि, हे विधि, हे देवगण, आदरपूर्वक मेरा वचन सुनो। मैं ही सदा सज्जनों का त्राता, तुम देवों के लिए कृपा का भंडार हूँ।

श्लोक 51 (shiva.rudra.130.51)

दुष्टहन्ता त्रिलोकेशः शङ्करो भक्तवत्सलः । कर्ता भर्ता च हर्ता च सर्वेषां निर्विकारवान्

duṣṭahantā trilokeśaḥ śaṅkaro bhaktavatsalaḥ kartā bhartā ca hartā ca sarveṣāṁ nirvikāravān

दुष्टों का संहारक, त्रिलोकेश, भक्तवत्सल शंकर ही सबका कर्ता, भर्ता और संहर्ता है, और स्वयं सब विकारों से रहित है।

श्लोक 52 (shiva.rudra.130.52)

यदा यदा भवेद्दुःखं युष्माकं देवसत्तमाः । तदा तदा मां यूयं वै भजन्तु सुखहेतवे

yadā yadā bhavedduḥkhaṁ yuṣmākaṁ devasattamāḥ tadā tadā māṁ yūyaṁ vai bhajantu sukhahetave

हे श्रेष्ठ देवगण, जब-जब तुम्हें दुःख हो, तब-तब तुम्हें अपने सुख के लिए मुझ ही को भजना चाहिए।

श्लोक 53 (shiva.rudra.130.53)

ब्रह्मोवाच इत्याज्ञप्तास्तदा देवा विष्ण्वाद्याः समुनीश्वराः । शिवां प्रणम्य सशिवं कुमारं च मुदान्विताः

brahmovāca ityājñaptāstadā devā viṣṇvādyāḥ samunīśvarāḥ śivāṁ praṇamya saśivaṁ kumāraṁ ca mudānvitāḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- इस प्रकार आज्ञप्त होकर विष्णु आदि देवगण और मुनीश्वर, प्रसन्नचित्त होकर शिवा तथा शिव-कुमार को प्रणाम करने लगे।

श्लोक 54 (shiva.rudra.130.54)

कथयन्तो यशो रम्यं शिवयोः शाङ्करेश्च तत् । आनन्दं परमं प्राप्य स्वधामानि ययुर्मुने

kathayanto yaśo ramyaṁ śivayoḥ śāṅkareśca tat ānandaṁ paramaṁ prāpya svadhāmāni yayurmune

हे मुने, शिव-दंपती और शंकर-पुत्र के उस रमणीय यश का वर्णन करते हुए, परम आनंद पाकर वे अपने-अपने धामों को चले गए।

श्लोक 55 (shiva.rudra.130.55)

शिवोऽपि शिवया सार्द्धं सगणः परमेश्वरः । कुमारेणयुतः प्रीत्योवास तस्मिन्गिरौ मुदा

śivo'pi śivayā sārddhaṁ sagaṇaḥ parameśvaraḥ kumāreṇayutaḥ prītyovāsa tasmingirau mudā

परमेश्वर शिव भी अपने गणों तथा कुमार सहित शिवा के साथ प्रेमपूर्वक हर्षित होकर उसी पर्वत पर निवास करने लगे।

श्लोक 56 (shiva.rudra.130.56)

इत्येवं कथितं सर्वं कौमारं चरितं मुने । शैवं च सुखदं दिव्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

ityevaṁ kathitaṁ sarvaṁ kaumāraṁ caritaṁ mune śaivaṁ ca sukhadaṁ divyaṁ kimanyacchrotumicchasi

हे मुने, इस प्रकार मैंने कुमार और शिव का यह संपूर्ण सुखदायी दिव्य चरित्र सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

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