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रुद्र संहिता · अध्याय 131

गणेश की उत्पत्ति

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132

श्लोक 1 (shiva.rudra.131.1)

सूत उवाच तारकारेरिति श्रुत्वा वृत्तमद्भुतमुत्तमम् । नारदः सुप्रसन्नोऽथ पप्रच्छ प्रीतितो विधिम्

sūta uvāca tārakāreriti śrutvā vṛttamadbhutamuttamam nāradaḥ suprasanno'tha papraccha prītito vidhim

सूत जी ने कहा -- तारक के शत्रु का यह अद्भुत और उत्तम वृत्तांत सुनकर नारद अत्यंत प्रसन्न हुए और प्रेमपूर्वक विधाता (ब्रह्मा) से पूछने लगे।

श्लोक 2 (shiva.rudra.131.2)

नारद उवाच देवदेव प्रजानाथ शिवज्ञाननिधे मया । श्रुतं कार्तिकसद्वृत्तममृतादपि चोत्तमम्

nārada uvāca devadeva prajānātha śivajñānanidhe mayā śrutaṁ kārtikasadvṛttamamṛtādapi cottamam

नारद ने कहा -- हे देवाधिदेव, हे प्रजापति, हे शिवज्ञान के भंडार! मैंने आपसे कार्तिकेय का यह उत्तम वृत्तांत सुना, जो अमृत से भी उत्तम है।

श्लोक 3 (shiva.rudra.131.3)

अधुना श्रोतुमिच्छामि गाणेशं वृत्तमुत्तमम् । तज्जन्मचरितं दिव्यं सर्वमङ्गलमङ्गलम्

adhunā śrotumicchāmi gāṇeśaṁ vṛttamuttamam tajjanmacaritaṁ divyaṁ sarvamaṅgalamaṅgalam

अब मैं गणेश का उत्तम वृत्तांत सुनना चाहता हूँ -- उनका दिव्य जन्म-चरित्र, जो समस्त मंगलों का भी मंगल है।

श्लोक 4 (shiva.rudra.131.4)

सूत उवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदस्य महामुनेः । प्रसन्नमानसो ब्रह्मा प्रत्युवाच शिवं स्मरन्

sūta uvāca ityākarṇya vacastasya nāradasya mahāmuneḥ prasannamānaso brahmā pratyuvāca śivaṁ smaran

सूत जी ने कहा -- महामुनि नारद के इन वचनों को सुनकर, प्रसन्नचित्त ब्रह्मा शिव का स्मरण करते हुए बोले।

श्लोक 5 (shiva.rudra.131.5)

ब्रह्मोवाच कल्पभेदाद्गणेशस्य जनिः प्रोक्ता विधेः परात् । शनिदृष्टं शिरश्छिन्नं सञ्चितं गाजमाननम्

brahmovāca kalpabhedādgaṇeśasya janiḥ proktā vidheḥ parāt śanidṛṣṭaṁ śiraśchinnaṁ sañcitaṁ gājamānanam

ब्रह्मा जी ने कहा -- कल्प-भेद के अनुसार गणेश का जन्म भिन्न-भिन्न प्रकार से कहा गया है -- कहीं शनि की दृष्टि से उनका सिर कट गया और उसके स्थान पर गजमुख जोड़ा गया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.131.6)

इदानीं श्वेतकल्पोक्ता गणेशोत्पत्तिरुच्यते । यत्र च्छिन्नं शिरस्तस्य शिवेन च कृपालुना

idānīṁ śvetakalpoktā gaṇeśotpattirucyate yatra cchinnaṁ śirastasya śivena ca kṛpālunā

अब मैं श्वेत-कल्प में कही गई गणेश की उत्पत्ति सुनाता हूँ, जिसमें उनका सिर कट गया था और दयालु शिव द्वारा पुनः स्थापित किया गया था।

श्लोक 7 (shiva.rudra.131.7)

सन्देहो नात्र कर्तव्यः शङ्करस्सूतिकृन्मुने । स हि सर्वाधिपः शम्भुर्निर्गुणः सगुणोऽपि हि

sandeho nātra kartavyaḥ śaṅkarassūtikṛnmune sa hi sarvādhipaḥ śambhurnirguṇaḥ saguṇo'pi hi

हे मुने, इसमें संदेह नहीं करना चाहिए -- शंकर ही जन्म देने वाले हैं। क्योंकि शंभु ही सबके स्वामी हैं, गुणरहित होते हुए भी सगुण हैं।

श्लोक 8 (shiva.rudra.131.8)

तल्लीलयाखिलं विश्वं सृज्यते पाल्यते तथा । विनाश्यते मुनिश्रेष्ठ प्रस्तुतं शृणु चादरात्

tallīlayākhilaṁ viśvaṁ sṛjyate pālyate tathā vināśyate muniśreṣṭha prastutaṁ śṛṇu cādarāt

उन्हीं की लीला से सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि, पालन तथा संहार होता है, हे मुनिश्रेष्ठ। अब आदरपूर्वक जो कहा जा रहा है, उसे सुनो।

श्लोक 9 (shiva.rudra.131.9)

उद्वाहिते शिवे चात्र कैलासं च गते सति । कियता चैव कालेन जातो गणपतेर्भवः

udvāhite śive cātra kailāsaṁ ca gate sati kiyatā caiva kālena jāto gaṇapaterbhavaḥ

जब शिव का विवाह हो चुका था और वे कैलास जा चुके थे, तब कुछ काल बीतने पर गणपति के जन्म की घटना घटी।

श्लोक 10 (shiva.rudra.131.10)

एकस्मिन्नेव काले च जया च विजया सखी । पार्वत्या च मिलित्वा वै विचारे तत्पराभवत्

ekasminneva kāle ca jayā ca vijayā sakhī pārvatyā ca militvā vai vicāre tatparābhavat

एक बार जया और विजया नामक दोनों सखियाँ पार्वती से मिलकर किसी विचार में तल्लीन हो गईं।

श्लोक 11 (shiva.rudra.131.11)

रुद्रस्य च गणाःसर्वे शिवस्याज्ञापरायणाः । ते सर्वेऽप्यस्मदीयाश्च नन्दिभृङ्गिपुरस्सराः

rudrasya ca gaṇāḥsarve śivasyājñāparāyaṇāḥ te sarve'pyasmadīyāśca nandibhṛṅgipurassarāḥ

रुद्र के सभी गण, जो शिव की आज्ञा के परायण हैं, नंदी और भृंगी को आगे किए हुए, वे सब भी हमारे ही माने जाते हैं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.131.12)

प्रमथास्ते ह्यसङ्ख्याता अस्मदीयो न कश्चन । द्वारि तिष्ठन्ति ते सर्वे शङ्कराज्ञापरायणाः

pramathāste hyasaṅkhyātā asmadīyo na kaścana dvāri tiṣṭhanti te sarve śaṅkarājñāparāyaṇāḥ

वे असंख्य प्रमथगण, जो वास्तव में हमारे अपने नहीं हैं, सभी द्वार पर खड़े रहते हैं, केवल शंकर की आज्ञा के परायण।

श्लोक 13 (shiva.rudra.131.13)

ते सर्वेप्यस्मदीयांश्च तथापि न मिलेन्मनः । एकश्चैवास्मदीयो हि रचनीयस्त्वयानघे

te sarvepyasmadīyāṁśca tathāpi na milenmanaḥ ekaścaivāsmadīyo hi racanīyastvayānaghe

वे सब भी हमारे कहलाकर भी हमारा मन संतुष्ट नहीं होता। हे निष्पाप, तुम्हें ही ऐसा कोई एक रचना चाहिए जो पूर्णतः हमारा अपना हो।

श्लोक 14 (shiva.rudra.131.14)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा पार्वती देवी सखीभ्यां सुन्दरं वचः । हितं मेने तदा तच्च कर्तुं स्माप्यध्यवस्यति

brahmovāca ityuktvā pārvatī devī sakhībhyāṁ sundaraṁ vacaḥ hitaṁ mene tadā tacca kartuṁ smāpyadhyavasyati

ब्रह्मा जी ने कहा -- अपनी दोनों सखियों का यह सुंदर वचन सुनकर देवी पार्वती ने उसे हितकर माना, और उसे कर दिखाने का संकल्प कर लिया।

श्लोक 15 (shiva.rudra.131.15)

ततः कदाचिन्मज्जत्यां पार्वत्यां वै सदाशिवः । नन्दिनं परिभर्त्स्याथ ह्याजगाम गृहान्तरम्

tataḥ kadācinmajjatyāṁ pārvatyāṁ vai sadāśivaḥ nandinaṁ paribhartsyātha hyājagāma gṛhāntaram

तब एक बार जब पार्वती स्नान कर रही थीं, सदाशिव नंदी को डाँटकर भीतर के कक्ष में चले आए।

श्लोक 16 (shiva.rudra.131.16)

आयान्तं शङ्करं दृष्ट्वाऽसमये जगदम्बिका । उत्तस्थौ मज्जती सा वै लज्जिता सुन्दरी तदा

āyāntaṁ śaṅkaraṁ dṛṣṭvā'samaye jagadambikā uttasthau majjatī sā vai lajjitā sundarī tadā

असमय में शंकर को आते देखकर, स्नान करती हुई वह सुंदरी जगदंबिका लज्जावश उठ खड़ी हुई।

श्लोक 17 (shiva.rudra.131.17)

तस्मिन्नवसरे देवी कौतुकेनातिसंयुता । तदीयं तद्वचश्चैव हितं मेने सुखावहम्

tasminnavasare devī kautukenātisaṁyutā tadīyaṁ tadvacaścaiva hitaṁ mene sukhāvaham

उसी अवसर पर देवी, अत्यंत कौतूहल से भरकर, अपनी सखियों के उस वचन को हितकर और सुखदायी मानने लगीं।

श्लोक 18 (shiva.rudra.131.18)

एवं जाते तदा काले कदाचित्पार्वती शिवा । विचिन्त्य मनसा चेति परमाया परेश्वरी

evaṁ jāte tadā kāle kadācitpārvatī śivā vicintya manasā ceti paramāyā pareśvarī

इस प्रकार वह अवसर आने पर, एक बार शिवा पार्वती, परमेश्वरी परमा माया, मन में यह विचार करने लगीं --

श्लोक 19 (shiva.rudra.131.19)

मदीयः सेवकः कश्चिद्भवेच्छुभतरः कृती । मदाज्ञया परं नान्यद्रेखामात्रं चलेदिह

madīyaḥ sevakaḥ kaścidbhavecchubhataraḥ kṛtī madājñayā paraṁ nānyadrekhāmātraṁ calediha

'मेरा कोई ऐसा सेवक हो, जो अत्यंत मंगलकारी और कुशल हो, जो मेरी आज्ञा के अतिरिक्त एक रेखामात्र भी इधर-उधर न हो।'

श्लोक 20 (shiva.rudra.131.20)

विचार्येति च सा देवी वपुषो मलसम्भवम् । पुरुषं निर्ममौ सा तु सर्वलक्षणसंयुतम्

vicāryeti ca sā devī vapuṣo malasambhavam puruṣaṁ nirmamau sā tu sarvalakṣaṇasaṁyutam

ऐसा विचारकर उस देवी ने अपने शरीर के मैल से एक पुरुष का निर्माण किया, जो सर्वलक्षणों से संपन्न था।

श्लोक 21 (shiva.rudra.131.21)

सर्वावयवनिर्दोषं सर्वावयव सुन्दरम् । विशालं सर्वशोभाढ्यं महाबलपराक्रमम्

sarvāvayavanirdoṣaṁ sarvāvayava sundaram viśālaṁ sarvaśobhāḍhyaṁ mahābalaparākramam

सर्वांग निर्दोष, सर्वांग सुंदर, विशाल शरीर वाला, सर्वप्रकार की शोभा से युक्त, महाबल-पराक्रमी।

श्लोक 22 (shiva.rudra.131.22)

वस्त्राणि च तदा तस्मै दत्त्वा सा विविधानि हि । नानालङ्करणं चैव बह्वाशिषमनुत्तमाम्

vastrāṇi ca tadā tasmai dattvā sā vividhāni hi nānālaṅkaraṇaṁ caiva bahvāśiṣamanuttamām

तब उन्होंने उसे नाना प्रकार के वस्त्र दिए, विविध आभूषण दिए, तथा प्रचुर एवं अनुपम आशीर्वाद प्रदान किया।

श्लोक 23 (shiva.rudra.131.23)

मत्पुत्रस्त्वं मदीयोऽसि नान्यः कश्चिदिहास्ति मे । एवमुक्तः स पुरुषो नमस्कृत्य शिवां जगौ

matputrastvaṁ madīyo'si nānyaḥ kaścidihāsti me evamuktaḥ sa puruṣo namaskṛtya śivāṁ jagau

'तुम मेरे पुत्र हो, तुम पूर्णतः मेरे ही हो; यहाँ मेरा कोई अन्य नहीं है' -- ऐसा कहे जाने पर उस पुरुष ने शिवा को प्रणाम करके कहा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.131.24)

गणेश उवाच किं कार्यं विद्यते तेऽद्य करवाणि तवोदितम् । इत्युक्ता सा तदा तेन प्रत्युवाच सुतं शिवा

gaṇeśa uvāca kiṁ kāryaṁ vidyate te'dya karavāṇi tavoditam ityuktā sā tadā tena pratyuvāca sutaṁ śivā

गणेश ने कहा -- आज आपके लिए क्या कार्य है? जो आप आज्ञा दें, मैं वही करूँ। यह सुनकर शिवा ने अपने पुत्र से कहा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.131.25)

शिवोवाच हे तात शृणु मद्वाक्यं द्वारपालो भवाद्य मे । मत्पुत्रस्त्वं मदीयोऽसि नान्यथा कश्चिदस्ति मे

śivovāca he tāta śṛṇu madvākyaṁ dvārapālo bhavādya me matputrastvaṁ madīyo'si nānyathā kaścidasti me

शिवा ने कहा -- हे तात, मेरा वचन सुनो, आज से तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ। तुम मेरे पुत्र हो, तुम पूर्णतः मेरे ही हो, अन्यथा मेरा कोई नहीं है।

श्लोक 26 (shiva.rudra.131.26)

विना मदाज्ञां सत्पुत्र नैवायान्मद्गृहान्तरम् । कोऽपि क्वापि हठात्तात सत्यमेतन्मयोदितम्

vinā madājñāṁ satputra naivāyānmadgṛhāntaram ko'pi kvāpi haṭhāttāta satyametanmayoditam

मेरी आज्ञा के बिना, हे सत्पुत्र, कोई भी कहीं से भी हठपूर्वक मेरे घर के भीतर न आने पाए, हे तात -- यह मैं सत्य कहती हूँ।

श्लोक 27 (shiva.rudra.131.27)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा च ददौ तस्मै यष्टिं चातिदृढां मुने । तदीयं रूपमालोक्य सुन्दरं हर्षमागता

brahmovāca ityuktvā ca dadau tasmai yaṣṭiṁ cātidṛḍhāṁ mune tadīyaṁ rūpamālokya sundaraṁ harṣamāgatā

ब्रह्मा जी ने कहा -- हे मुने, ऐसा कहकर उन्होंने उसे एक अत्यंत दृढ़ यष्टि (लाठी) दी; और उसके सुंदर रूप को देखकर वे हर्षित हो उठीं।

श्लोक 28 (shiva.rudra.131.28)

मुखमाचुम्ब्य सुप्रीत्यालिङ्ग्य तं कृपया सुतम् । स्वद्वारि स्थापयामास यष्टिपाणिं गणाधिपम्

mukhamācumbya suprītyāliṅgya taṁ kṛpayā sutam svadvāri sthāpayāmāsa yaṣṭipāṇiṁ gaṇādhipam

उस पुत्र के मुख को प्रेमपूर्वक चूमकर और स्नेह से आलिंगन करके, उन्होंने यष्टिधारी गणाधिप को अपने द्वार पर स्थापित कर दिया।

श्लोक 29 (shiva.rudra.131.29)

अथ देवीसुतस्तात गृहद्वारि स्थितो गणः । यष्टिपाणिर्महावीरः पार्वतीहितकाम्यया

atha devīsutastāta gṛhadvāri sthito gaṇaḥ yaṣṭipāṇirmahāvīraḥ pārvatīhitakāmyayā

हे तात, तब देवी का वह पुत्र, महावीर गण, पार्वती के हित की कामना से यष्टि हाथ में लिए घर के द्वार पर खड़ा हो गया।

श्लोक 30 (shiva.rudra.131.30)

स्वद्वारि स्थापयित्वा तं गणेशं स्वसुतं शिवा । स्वयं च मज्जती सा वै संस्थितासीत्सखीयुता

svadvāri sthāpayitvā taṁ gaṇeśaṁ svasutaṁ śivā svayaṁ ca majjatī sā vai saṁsthitāsītsakhīyutā

अपने पुत्र गणेश को द्वार पर स्थापित करके शिवा स्वयं अपनी सखियों सहित वहीं स्नान करती रहीं।

श्लोक 31 (shiva.rudra.131.31)

एतस्मिन्नेव काले तु शिवो द्वारि समागतः । कौतुकी मुनिर्शादूल नानालीलाविशारदः

etasminneva kāle tu śivo dvāri samāgataḥ kautukī munirśādūla nānālīlāviśāradaḥ

ठीक उसी समय शिव, कौतुकी और नाना प्रकार की लीलाओं में निपुण वे मुनिश्रेष्ठ, द्वार पर आ पहुँचे।

श्लोक 32 (shiva.rudra.131.32)

उवाच च शिवेशं तमविज्ञाय गणाधिपः । मातुराज्ञां विना देव गम्यतां न त्वयाधुना

uvāca ca śiveśaṁ tamavijñāya gaṇādhipaḥ māturājñāṁ vinā deva gamyatāṁ na tvayādhunā

उन्हें न पहचानते हुए गणाधिप ने शिव-रूप उन ईश्वर से कहा -- 'हे देव, मेरी माता की आज्ञा के बिना अभी आप भीतर नहीं जा सकते।'

श्लोक 33 (shiva.rudra.131.33)

मज्जनार्थं स्थिता माता क्व यासीतो व्रजाधुना । इत्युक्त्वा यष्टिकां तस्य रोधनाय तदाग्रहीत्

majjanārthaṁ sthitā mātā kva yāsīto vrajādhunā ityuktvā yaṣṭikāṁ tasya rodhanāya tadāgrahīt

'माता स्नान के लिए बैठी हैं, अभी आप कहाँ जाना चाहते हैं? अभी कहीं और चले जाइए।' ऐसा कहकर उसने उन्हें रोकने के लिए अपनी यष्टि उठा ली।

श्लोक 34 (shiva.rudra.131.34)

तं दृष्ट्वा तु शिवः प्राह कं निषेधसि मूढधीः । मां न जानास्यसद्बुद्धे शिवोऽहमिति नान्यथा

taṁ dṛṣṭvā tu śivaḥ prāha kaṁ niṣedhasi mūḍhadhīḥ māṁ na jānāsyasadbuddhe śivo'hamiti nānyathā

उसे देखकर शिव बोले -- 'हे मूढ़बुद्धि, तुम किसे रोक रहे हो? हे असद्बुद्धे, तुम मुझे नहीं जानते -- मैं ही शिव हूँ, और कोई नहीं।'

श्लोक 35 (shiva.rudra.131.35)

ताडितस्तेन यष्ट्या हि गणेशेन महेश्वरः । प्रत्युवाच स तं पुत्रं बहुलीलश्च कोपितः

tāḍitastena yaṣṭyā hi gaṇeśena maheśvaraḥ pratyuvāca sa taṁ putraṁ bahulīlaśca kopitaḥ

गणेश की उस यष्टि से आहत होकर महेश्वर ने, जो अनेक प्रकार की लीलाओं में रमण करते हैं, क्रोधित होकर अपने उस पुत्र को उत्तर दिया।

श्लोक 36 (shiva.rudra.131.36)

शिव उवाच मुर्खोऽसि त्वं न जानासि शिवोऽहं गिरिजापतिः । स्वगृहं यामि रे बाल निषेधसि कथं हि माम्

śiva uvāca murkho'si tvaṁ na jānāsi śivo'haṁ girijāpatiḥ svagṛhaṁ yāmi re bāla niṣedhasi kathaṁ hi mām

शिव ने कहा -- तुम मूर्ख हो, नहीं जानते कि मैं गिरिजा का पति शिव हूँ। मैं अपने ही घर जा रहा हूँ, हे बालक, तुम मुझे क्यों रोकते हो?

श्लोक 37 (shiva.rudra.131.37)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा प्रविशन्तं तं महेशं गणनायकः । क्रोधं कृत्वा ततो विप्र दण्डेनाताडयत्पुनः

brahmovāca ityuktvā praviśantaṁ taṁ maheśaṁ gaṇanāyakaḥ krodhaṁ kṛtvā tato vipra daṇḍenātāḍayatpunaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- ऐसा कहकर, भीतर प्रवेश करते हुए महेश को गणनायक ने क्रोधित होकर, हे विप्र, पुनः दंड से मारा।

श्लोक 38 (shiva.rudra.131.38)

ततश्शिवश्च सङ्क्रुद्धो गणानाज्ञापयन्निजान् । को वाऽयं वर्तते किं च क्रियते पश्यतां गणाः

tataśśivaśca saṅkruddho gaṇānājñāpayannijān ko vā'yaṁ vartate kiṁ ca kriyate paśyatāṁ gaṇāḥ

तब शिव अत्यंत क्रुद्ध होकर अपने गणों को आज्ञा देने लगे -- 'यह कौन है, और क्या कर रहा है? हे गणो, देखो तो सही!'

श्लोक 39 (shiva.rudra.131.39)

इत्युक्त्वा तु शिवस्तत्र स्थितः क्रुद्धो गृहाद्बहिः । भवाचाररतःस्वामी बह्वद्भुतसुलीलकः

ityuktvā tu śivastatra sthitaḥ kruddho gṛhādbahiḥ bhavācārarataḥsvāmī bahvadbhutasulīlakaḥ

ऐसा कहकर शिव क्रोधित होकर वहीं घर के बाहर खड़े रहे -- वे स्वामी, जो लौकिक व्यवहार में रमण करते हैं, अनेक अद्भुत सुंदर लीलाओं के स्रोत।

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